प्रभु-प्रीति कठिन-सातवां प्रवचन
सूत्र :
साई से लगन कठिन है भाई।
जैसे पपीहा प्यासा बूंद का, पिया
पिया रट लाई।।
प्यासे प्राण तरफै दिनराती, और
नीर ना भाई।।
जैसे मिरगा सब्द-सनेही, सब्द सुनन को
जाई।।
सब्द सुने और सत-प्राणदान दे, तनिको
नाहिं डराई।
जैसे सती चढ़ी सत-ऊपर, पिया की राह
मन भाई।।
पावक देखि डरै वह नाहीं, हंसते बैठे
सदा माई।
छोड़ो तन अपने का आसा, निर्भय हवे
गुन गाई।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, नाहिं तो
जन्म नसाई।।
लोका जानि न भूलो भाई!
अला एकै नूर उपजाया, ताकी कैसी
निंदा।
ता नूरै थें सब जग कीया, कौन भला कौन
मंदा।
ता अला की गति नाहिं जानी, गुरि
गुड़ दीवा मीठा।
कहै कबीर मैं पुरा पाया, सब घटि साहब
दीठा।
जहिया किरतम न हता, धरती हती न
नीर।
उतपति परलय ना हता, तब की कहै
कबीर।।
‘साई से लगन कठिन है भाई।’
प्रभु से प्रेम कठिन है। कारण? अपने से
प्रेम बहुत; अहंकार से लगाव बहुत। वहां कठिनाई है। कबीर के वचन तुम्हें
विरोधाभासी लगेंगे, क्योंकि एक तरफ तो वे बार-बार कहते हैं--सहज-योग; प्रभु
को पाना बड़ा सहज है और आज अचानक कहते हैंः ‘साईं से लगन
कठिन है भाई।’
दोनों बातें सच हैं। परमात्मा को पाना सहज ही है, क्योंकि
वह हमारा स्वभाव है। उससे दूर होना कठिन है। स्वभाव से कोई कैसे दूर हो सकेगा!
जो हमारे प्राणों का प्राण है, उससे हम क्षण
भर को भी विलग कैसे हो सकते हैं! भूल जाएं भला; भूलने से कुछ
बात बदलती नहीं। तुम्हें याद न रहे कि तुम कौन हो, लेकिन फिर भी
तुम वही होते हो--जो तुम हो। विस्मरण हो जाता है, स्मरण हो
जाता है, लेकिन अस्तित्व तो एकरस है। जब जानते थे, तब
भी वही; जब नहीं जानते, तब भी वही। जब फिर जान लोगे, तब
भी वही।
इसलिए बुद्ध ने कहा कि जब मैंने जाना, तो इतना ही
जाना कि जानने को कुछ भी नहीं था। और जब मैंने पाया, तो इतना ही
पाया कि पाने को कुछ भी नहीं था। जो मैं था, उससे भर
पहचान हो गई। था मैं सदा से वही।
परमात्मा तुम्हारी श्वास की श्वास है; तुम्हारे
रोएं-रोएं में समाया है। तुम झूठ हो; परमात्मा सच है। इसलिए परमात्मा
को पाना कठिन तो कैसे होगा?
मछली जैसे सागर में है, ऐसे हम
परमात्मा में हैं। मछली को सागर पाना कठिन है? यह बात ही
व्यर्थ है। मछली ने सागर कभी छोड़ा ही नहीं। और मछली तो कभी सागर छोड़ भी दे,
तुम
परमात्मा को नहीं छोड़ सकते। क्योंकि परमात्मा बाहर ही होता तो छूट भी जाता।
परमात्मा भीतर भी है। परमात्मा ही है।
इसलिए जब कोई पूछता है कि ईश्वर कहां खोजें, तो
गलत सवाल पूछता है। खोजा--कि भटक जाओगे। खोज का मतलब ही होता हैः तुमने मान
लिया--कहीं दूर है। खोज का मतलब ही होता है कि तुमने मान लिया कि तुम खो चुके हो।
ऐसी भ्रांति से शुरुआत करोगे, तो पाओगे कैसे?
परमात्मा खोजना नहीं पड़ता। खोज व्यर्थ है--ऐसा जानते ही मिल
जाता है।
परमात्मा को पाने के लिए दौड़ना भी नहीं पड़ता। दौड़ते तो दूर के
लिए हैं। जो पास से भी पास है, उसके लिए कहां दौड़ कर जाओगे? दौड़ोगे,
तो
और दूर निकल जाओगे! दौड़ोगे, तो भटक जाओगे। रुक जाओ। ठहर जाओ। शरीर
तो चले ही नहीं, मन भी न चले। जहां तन-मन दोनों ठहर जाते हैं, वहीं
मिलन हो जाता है।
यह मिलन बड़ा अदभुत है। दौड़ कर नहीं होता--ठहर कर होता है।
आपा-धापी भागा-भागी आवश्यक नहीं है। थिरता, अपने में बैठ
जाना, रम जाना।
एक क्षण को भी जब तुम्हारा चित्त कहीं और न जाएगा, जब
कोई वासना की तरंग तुम्हें अपने पर सवार करके दूर-दूर न ले जाने लगेगी; जब
कोई इच्छा तुम्हारे भीतर पंख न फड़फड़ाएगी; जब सब शांत होगा और मौन होगा;
तुम
उसी क्षण पाओगेः पाने को कुछ भी नहीं है। जिसे हम खोजते थे, वह सदा से हमारा
है। शायद पाने की दौड़-धूप में ही भूल गए थे। पाने में इतने उत्सुक हो गए थे कि याद
ही न रही थी!
कभी तुमने देखा नः आदमी चश्मा आंख पर रखा होता है और चश्मे को
ही खोजने लगता है। चश्मे से ही चश्मे को खोजने लगता है--कि चश्मा कहां है? कभी
तुमने देखा नहीं कि आदमी अपनी पेंसिल, अपनी कलम काम में लगाए होता है
और खोजने लगता है! कई बार तुमने भी चीजें खोजी होंगी, जो तुम्हारे
हाथ में थीं; भूल गए क्षण भर को। बस, ऐसी ही भूल
हुई है।
परमात्मा खोया नहीं है हमने, सिर्फ भूल गए
हैं। विस्मृति है। इसलिए संत कहते हैंः स्मृति से, सुमिरन से
फिर मिलन हो जाएगा।
तो कबीर एक तरफ तो सहज-योग के प्रतिपादक हैं--कि परमात्मा से
ज्यादा सरल और कोई बात नहीं। लेकिन आज कहते हैंः ‘साई से लगन
कठिन है भाई।’ यह उसका दूसरा पहलू है।
परमात्मा को पाना तो सरल है, लेकिन
परमात्मा से प्रेम लगाना बड़ा कठिन है। बाधा परमात्मा नहीं है; बाधा
हमारा अहंकार है।
प्रेम में तो अहंकार को जलना होता है। प्रेम में तो आदमी को
पागल होना होता है। और हमारा अहंकार बड़ा बुद्धिमान है! बड़ा हिसाबी-किताबी है!
हृदय की तो हम सुनते ही नहीं। अगर हृदय की हम सुनें, तो
परमात्मा को अभी पा लें। हम बुद्धि की सुनते हैं। बुद्धि गणित है--प्रेम नहीं।
परमात्मा को पाने का द्वार प्रेम है--गणित नहीं। गणित से संसार
की चीजें पाई जाती हैं। तर्क से संसार जीता जाता है। परमात्मा की तरफ जो चला है,
वह
तो प्रेम से ही पाएगा। और मजा है कि तर्क जीतना चाहता है, प्रेम हारना
चाहता है। प्रेम हार कर विजेता हो जाता है! प्रेम एक तरह का जादू है।
तो कबीर जब यह कहते हैं कि ‘साईं से लगन
कठिन है भाई’, तो वे यह कह रहे हैं कि तुम बड़े कठिन हो। तुम बड़े कठोर हो।
तुम्हारा हृदय पाषाण हो गया है। तुम्हारे भीतर से प्रेम की उमंग उठती ही नहीं। तुम्हारे
भीतर से प्यास उठती ही नहीं।
तुम परमात्मा की भी कभी बात करते हो, तो ऐसे ही
ऊपर-ऊपर; दांव पर जरा भी कुछ लगाने की तैयारी नहीं होती। छोटी सी चीज भी
दांव पर लगानी हो, तो तुम झिझक जाते हो।
मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि अगर हम गैरिक
वस्त्र न पहनें, तो संन्यास नहीं हो सकता? वस्त्र ही
बदल रहे हो, कुछ खास बदल भी नहीं रहे हो! मगर वह भी बदलना न पड़े--ऐसी
आकांक्षा है।
‘वस्त्र न बदलें, तो नहीं चलेगा?’--लोग
पूछते हैं! वस्त्र तक बदलने में घबड़ा रहे हो, आत्मा बदलने
में तो बड़ी मुश्किल पड़ेगी।
वस्त्र बदलने में क्या अड़चन आएगी? लोग हंसेगे
चार दिन। व्यंग्य करेंगे। समझेंगेः पागल हो गए! होश गंवा दिया। यही न--कि अहंकार
को थोड़ी चोटें लगेगी और क्या होगा?
एक अहंकार था तुम्हारा कि तुम बड़े बुद्धिमान हो। अब लोग कहेंगे
कि तुम पागल हो गए। चार दिन लोग हंस लेंगे; इस अहंकार को
चोटें पड़ेंगी।
एक सम्राट एक सूफी फकीर के पास गया। वह संन्यस्त होना चाहता
था। फकीर का दरबार लगा था। उसके शिष्य बैठै थे; उसकी बातें
सुन रहे थे।
जब सम्राट ने निवेदन किया मैं संन्यस्त होना चाहता हूं,
मुझे
भी दीक्षा दें, तो उस फकीर ने कहा कि ‘शर्त पूरी कर सकोगे?’ सम्राट
सम्राट ही था। उसने कहा,‘पूछने की जरूरत नहीं है। जब मैं आया ही
हूं संन्यस्त होने, तो कोई भी शर्त पूरी करूंगा। बेशर्त मेरा समर्पण है। जो
कहोगे--पूरा करूंगा। जब तय कर लिया परमात्मा को पाना है, तो अब जो भी
दांव पर लगता हो, लग जाए। सब लगाने की तैयारी करके ही आया हूं। पूछने की जरूरत
नहीं है। आज्ञा हो।’
फकीर ने कहा, ‘तो ऐसा करोः कपड़े उतार दो और नग्न हो
जाओ। और ये जूते पड़े है मेरे, ये हाथ में ले लो और चले जाओ बीच बाजार
में; अपने
सिर पर जूता मारते जाना और हंसते रहना। पूरे गांव का चक्कर लगा आओ।’
नंगे--जूता मारते--सम्राट अपनी ही राजधानी में! लेकिन सम्राट
ने वस्त्र उतार दिए; जूता उठा लिया।
फकीर के शिष्यों को दया आ गई। एक बूढ़े शिष्यने कहा कि ‘आप
यह क्या कह रहे हैं? हमसे आपने कभी ऐसी अपेक्षा नहीं की। आज आप इतने कठोर क्यों हैं?
आप
में हमने सदा दया पाई है, करुणा पाई है। आज आप इतने पत्थर जैसे
कठोर क्यों हैं? और यह बेचारा सम्राट है; इसकी की यह
राजधानी है। आप भलीभांति परिचित हैं। इसे नग्न उड़ाएंगे। भीड़-भाड इसके पीछे चलेगी।
लोग पत्थर फेकेंगे। लोग गालियां देंगे। लोग कहेंगेः सम्राट पागल हो गया है।’
फकीर ने कहा, ‘कठोर हूं, इसीलिए कि
तुम जब आए थे, तो तुम्हारा अहंकार भी बहुत छोटा था। इतने कठोर होने की जरूरत
भी न थी। यह आदमी सम्राट रहा है; इसका बड़ा सुसंस्कृत, शृंगारित
अहंकार है; बड़ा सुशिक्षित, बड़ा सूक्ष्म, बड़ी व्यवस्था
से सम्हाला और बड़ा किया गया, आरोपित किया गया अहंकार है। इसके साथ
मुझे कठोर होना ही पड़ेगा।’
लेकिन सम्राट तो चल पड़ा; उसने तो यह
बात भी नहीं सुनी। उसने तो जूता उठा लिया और वह सिर पर जूते मारने लगा। सारा गांव
हंसा।
और ध्यान रखनाः अगर एक साधारण फकीर जूता मारता निकल जाए तो
शायद ज्यादा लोग न भी हंसंे। लेकिन जब सम्राट अपने को जूता मारते निकले और
नंगा...।
तो सारी राजधानी इकट्ठी हो गई, लोगों ने
दुकानें बंद कर दीं। काम-धाम सब बंद हो गया। भारी जुलूस हो गया इकट्ठा! और जब वह
राजमहल के सामने पहंुचा, तो उसकी स्त्रियां रोती थीं; उसके
बेटे रोते थे--कि यह क्या हो गया।
लेकिन जब सम्राट लौटा, तो वह दूसरा ही आदमी होकर लौटा
था। घंटे दो घंटे का ही फर्क हुआ था। घंटे दो घंटे ही नगर में घूमा था। लेकिन लौटा,
तो
वह आदमी ही दूसरा था।
वह फकीर के चरणों में गिर पड़ा। फकीर ने कहा,‘अब
मुझे और कुछ न करना पड़ेगा। तूने आखिरी बात पहले कदम में कर दी। तू निश्चित
हिम्मतवर है। तू निश्चित ही सम्राट होने योग्य आदमी है। तू वस्तुतः सम्राट है।
तुम कभी आकर मुझसे पूछते होः कपड़े न बदलें तो? तुम
क्या पूछ रहे हो? तुम यह पूछ रहे हो कि दांव पर कुछ न लगाना पड़े। किसी को पता न
चले कि मैं कुछ ऐसी बात कर रहा हूं, जो बुद्धिमान नहीं करते। तुम
अपनी प्रतिष्ठा जरा भी नहीं खोना चाहते। तुम अहंकार को बचाना चाहते हो--और
परमात्मा को पाना चाहते हो। यह नहीं होगा। इसलिए कबीर कहते हैंः ‘साईं
से लगन कठिन है भाई।’
साईं स्वामी का रूप है। साईं का अर्थ होता है--प्यारे। प्यारे
से लगन लगानी हो, तो प्रेम से ही लगती है। प्यारे को पाने का ढंग प्रेम है। कैसा
प्रेम?
‘जैसे पपीहा प्यासा बूंद का, पिया पिया रट
लाई।’ जैसे पपीहा चिल्लाता--रोता; बूंद के लिए
तड़फता। ‘पिया पिया रट लाई...’ ऐसा ही प्रेमी जब रटन से भर जाता
है, जब
परमात्मा के सिवाय न कुछ सूझता, न कुछ बूझता; जब उसकी ही
तस्वीर दिखाई पड़ती है आंखों में और उसके ही सपने तैरते रातों में; उठता
है, बैठता
है, तो
उनकी ही धुन समाई रहती है।
जो भी देखता है चारों तरफ, उसकी ही याद
आती है। फूल को खिलते देखता है, तो उसी को, खिलते हुए
पाता है। सूरज को ऊगते हुए देखता है, तो उसी को ऊ गते हुए पाता है।
रात तारों से भरी देखता है, तो उसी का जलवा; उसी का
चमत्कार।
जहां भी नजर अटकती है प्रेमी की, वहां वह अपने
प्यारे को ही पाता है। प्रेमी कुछ और देखता ही नहीं। प्रेम अंधा हो जाता है। उसे
एक ही चीज दिखाई पड़ती है। अनेक खो जाते हैं।
हर एक दुख का मदावा भी मुहब्बत
मुहब्बत मुस्तकिल आजार भी है।
मेरी मस्ती पे इतना तयन क्यूं है।
कोई इस बज्म में हुशियार भी है।
न दे दाद इस कदर भी जप्ते गम की
ये गम नाकाबिले इजहार भी है।
प्रेमी जानते हैं कि हर मुसीबत की जड़ भी प्रेम है। और हर
मुसीबत का इलाज भी प्रेम है।
खयाल करनाः तुम्हारी मुसीबत क्या है? तुम्हारे
जीवन का संताप दुख-पीड़ा क्या है? तुम्हारी चिंता क्या है?--संसार
से बहुत प्रेम या अपने अहंकार से बहुत प्रेम। यही तुम्हारी मुसीबत है। यही
तुम्हारा रोग है। औषधि क्या है? उपचार क्या है?--परमात्मा से
प्रेम।
‘हर इक दुख का मदावा भी मुहब्बत।’ प्रेम ही
उपचार है हरेक दुख का। ‘मुहब्बत मुस्तकिल आजार भी है।’ लेकिन
सारे उपद्रवों को जड़ में भी मुहब्बत है।
मुहब्बत को तुम समझ लो, तो सब समझ
लिया। प्रेम को समझ लिया, तो जीवन के सब राज समझ लिए।
गलत से प्रेम हो जाए, तो मुश्किल और सही से प्रेम हो
जाए, तो
सब ठीक। सही के प्रेम में तुम भी ठीक हो जाते हो। गलत के प्रेम में तुम भी गलत हो
जाते हो।
प्रेम तुम्हारा नरक भी है--तुम्हारा स्वर्ग भी। प्रेम तुम्हारी
परतंत्रता भी--तुम्हारी स्वतंत्रता भी।
सत्य से प्रेम लग जाए, साईं से लगन लग जाए, तो
फिर जीवन में हजार--हजार कमल खिलते हैं। फिर जीवन एक उत्सव बन जाता है। संसार से
प्रेम लग जाए, तो जीवन में दुख बढ़ते चले जाते हैं; रोज-रोज
अंधेरा घना होता चला जाता है।
‘मेरी मस्ती पे इतना तयन क्यूं है?’ और प्रेमी
कहता है--कि मेरी मस्ती की इतनी निंदा, मेरी मस्ती पर इतनी नाराजगी!
मेरी मस्ती का इतना अस्वीकार!
मेरी मस्ती पे इतना तयन क्यूं है
कोई इस बज्म में हुशियार भी है।
और इस सारे संसार में तुमने किसी को हुशियार देखा है? सिर्फ
मेरी मोहब्बत पर इतनी नाराजी? सिर्फ मेरी बेहोशी पर इतनी नाराजी?
सिर्फ
मेरे पागलपन पर इतनी नाराजी?
यहां सभी पागल हैं। हां, कोई धन के
पीछे पागल है, तो तुम उसे पागल नहीं कहते। और कोई ध्यान के पीछे अगर पागल हो
जाए, तो
उसे पागल कहते हो। बड़ा मजा है! तुम्हारा तर्क भी खूब!
कोई पद के पीछे पागल हो जाए, तो उसे तुम
पागल नहीं कहते। और कोई प्रभु के पीछे पागल हो जाए, तो तुम पागल
कहते हो!
यहां सभी पागल हैं। अलग-अलग ढंग के पागलपन हैं। ठीक पागलपन है।
और गलतपन है; लेकिन यहां सभी पागल हैं।
मेरी मस्ती पे इतना तयन क्यूं है।
कोई इस बज्म में हुशियार भी है।
और प्रेमी कहता हैः
न दे दाद इस कदर भी जप्ते गम की
ये गम नाकाबिले इजहार भी है।
और प्रेमी कहता है कि मैं चुप हूं, अपने गम को
कहता भी नहीं, तो मेरी प्रशंसा मत करो--मेरी चुप्पी, मेरे मौन की
प्रशंसा मत करो। मजबूरी है मेरी। यह गम ऐसा है कि कहा नहीं जा सकता। यह चोट ऐसी है
कि बताई नहीं जा सकती। जो खाता है, वही जानता है।
साईं से लगन कठिन है भाई।
जैसे पपीहा प्यासा बूंद का, पिया पिया रट
लाई।
प्यासे प्राण तरफै दिनराती, और नीर ना
भाई।
चाहे कुछ भी हो जाए, उसे और नहीं चाहिए; उसे
कुछ और नहीं चाहिए। उसकी सारी चाहतें एक चाहत बन गई है।
मनुष्य की हजार चाहतें हैंे--भक्त की एक चाहत।
मनुष्य चाहता हैः यह भी हो, वह भी हो। धन
भी, पद
भी; प्रतिष्ठा,
मान,
सम्मान--हजार
चाहतें हैं। इसलिए मनुष्य बंटा है--हजार खंड़ो में। भक्त की एक ही चाहत है--कि
परमात्मा हो। इसलिए भक्त अविभाजित हो जाता है, एक हो जाता
है।
जब एक चाह होती है, तो तुम एक हो जाते हो। जब एक चाह
होती है, तो तुम्हारे सारे खंड एक दूसरे में मिल कर संयुक्त हो जाते
हैं। तुम्हारे जीवन में एक केंद्र पैदा हो जाता है। तुम्हारे भीतर आत्मा होती है।
जब तुम्हारी चाहें हजार होती हैं, तो तुम हजार
हिस्सों में बंट जाते हो। हजार चाहों को पूरा करोगे; तो हजार
हिस्सों में बंटना ही पड़ेगा। एक हाथ से पद खोजोगे; एक हाथ से धन
खोजोगे; एक पैर से टटोलोगे कुछ और। एक हिस्सा इस दिशा में भेजोगे,
एक
हिस्सा उस दिशा में भेजोगे! छितर-बितर जाओगे। खंड-खंड हो जाओगे। टूट जाओगे।
इसलिए तो तुम संसार में टूटे हुए लोग देखते हो--जिनके जीवन में
कोई एक एकजूटता नहीं है। एकजूटता हो भी तो कैसे हो? एक चाह नहीं
है।
भक्त एकजूट होता है। एक ही उसकी चाह है--परमात्मा। इसलिए उसे
हजार दिशाओं में नहीं जाना पड़ता।
और परमात्मा की चाह कुछ ऐसी है कि उसे कहीं जाना ही नहीं पड़ता।
बाहर जाने की जरूरत ही नहीं रह जाती। आंख बंद कर के भीतर डूबने लगता है। भक्त में
आत्मा का जन्म होता है।
लेकिन कठिन है। क्योंकि यह जो मन है, यह कहता हैः
भोग लो; चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात! यह भी भोग लो; वह
भी भोग लो। यह मन कहता है कि थोड़ी चेष्टा करोगे, तो सब मिल
जाएगा। चेष्टा की बात है। थोड़ा पुरुषार्थ करो।
यह अहंकार कहता है कि यहां से ऐसे ही बिना भोगे चले गए! कुछ
नाम कर जाओ। कुछ दिखा जाओ दुनिया को कि आए थे; कि लोग याद
रखें कि कोई था। ऐसे ही शून्य की तरह आए और शून्य की तरह चले गए! नहीं; इतिहास
में रेखाएं छोड़ जाओ। हस्ताक्षर कर जाओ पत्थरों पर। तुम तो चले जाओगे, लेकिन
तुम्हारी याद रहे। तुम विशिष्ट हो। तुम खास हो। तुम अपने खासपन को सिद्ध करो। ऐसा
अहंकार उकसाता है। मन फुसलाता है।
और जिंदगी धीरे-धीरे इतने खंडों में बंट जाती है कि तुम एक
व्यक्ति हो यह कहना भी ठीक नहीं मालूम पड़ता है। तुम एक भीड़ हो जाते हो। फिर भीड़ का
शोरगुल है। फिर भीड़ की ऐचां-तानी है।
जैसे एक ही आदमी कई घोड़ों पर सवार हो गया है या एक ही आदमी कई
नावों पर सवार हो गया है, जो अलग दिशाओं में जा रही है; उसके
जीवन में अगर तनाव न होगा, तो क्या शांति होगी?
लेकिन हम इस तनाव को झेेलने को राजी है! हम इस तनाव के नीचे
दबे पड़े हैं; उठ भी नहीं सकते। हम तैयार हैं इसके लिए! लेकिन परमात्मा की
तलाश पैदा नहीं होती। क्योंकि यह सारा तनाव एक आशा पर टिका है--कि आज नहीं कल मैं
धनी हो जाऊंगा, पद पर पहुंच जाऊंगा। यह थोड़े ही दिन की बात है; पर
मंजिल करीब आती है। पहुंच जाऊंगा। थोड़ा श्रम और, थोड़ी तकलीफ
और। कोई कभी नहीं पहुंचा। कोई कभी नहीं पहुंचता है। कोई कभी पहुंच भी नहीं सकता
है।
जिंदगी बहुत छोटी है। और ये आशाएं दुष्पूर हैं। और ये वासनाएं
ऐसी हैं कि कभी भरती ही नहीं। वासना का स्वरूप ही न भरना है। जितना भरो, उतनी
ही जैसे कोई आग को बुझाने के लिए घी फेंकता हो...। जितना भरने की कोशिश करो,
उतना
घी मिलता है आग को। उतनी आग भभक कर उठती है।
जो भी तुम वासना को देते हो, वह वासना का
भोजन बन जाता है। वासना और मजबूत हो जाती है।
धन की चाह है; जितना धन दोगे, धन की चाह उतनी
बढ़ती चली जाएगी। पद की चाह है; जितना पद मिलेगा, उतनी पद की
चाह बढ़ती चली जाएगी।
तुम अपने ही जीवन के निरीक्षण से देखो। ये कोई सिद्धांत नहीं
हैं। ये जीवन के सहज तथ्य हैं।
तुमने अब तक कुछ तो पूरा करने की कोशिश की होगी, वह
पूरा हुआ? तुमने जो भी पूरा करने की कोशिश की है, जितनी तुमने
कोशिश की है, उतनी ही भूख बढ़ती गई है, और प्यास
बढ़ती गई है! यह कैसा जल है कि कंठ जल रहा है? जल से तृप्ति
तो मिलती नहीं, कंठ की और आग भड़कती है। यही सारा संसार है।
इसलिए बुद्ध ने कहा हैः यह सारा संसार लपटों से घिरा है। तुम
जागो। और इसमें बंट मत जाओ; बिखर मत जाओ। अपने को समेटो। इस समेटने
का नाम ही योग है।
योग का अर्थ हैः जो अपने को समेट ले। योग शब्द का अर्थ हैः जो
अपने को जोड़ ले; जो एक बन जाए। जिसके जीवन में योग घट जाए, उसके
जीवन में आत्मा फलित होती है।
भोग का अर्थ हैः खंड-खंड टूट जाना। योग का अर्थ हैः अखंड हो
जाना।
‘साईं से लगन कठिन है भाई।’
जुआरी चाहिए कोई!
और परमात्मा के प्रेम में बहुत बार ऐसे पड़ाव आएंगे, जब
मन कहेगाः लौट चलो। बहुत हो गया। पता नहीं--परमात्मा है भी या नहीं।
बड़ी प्रगाढ़ श्रद्धा चाहिए। यह भरोसा चाहिए कि परमात्मा न भी हो,
तो
भी खोजने जैसा है। और संसार है भी, तो भी खोजने जैसा नहीं है। यही श्रद्धा
का अर्थ है।
संसार दिखाई पड़ता है--फिर भी खोजने जैसा नहीं। और परमात्मा
दिखाई नहीं पड़ता, फिर भी खोजने जैसा है। शायद इसीलिए खोजने जैसा है।
जो नहीं दिखाई पड़ता, उसी को देखने का मजा है। जो हाथ
नहीं आता, उसी को हाथ लेने का आनंद है।
जो छिपा है, उसी को उघाड़ना है। संसार तो उघड़ा खड़ा है,
नंगा
खड़ा है। परमात्मा घूंघट में है। यह घूंघट उठाना पड़े। मगर इस घूंघट को उठाने की
कीमत भी चुकानी पड़ती है।
दिल जलाने से कहां दूर अंधेरा होगा
रात ये वो है कि मुश्किल से सबेरा होगा।
क्यूं न अब बज-ए-जुनूं तर्क करें, लौट चलें
इससे आगे है जो जंगल वो घनेरा होगा
ये जरूरी तो नहीं, इतना भी खुशफह्म न बन
वो जमाना जो न मेरा रहा, तेरा होगा
खिदमते-राजमहल पर उन्हें देखा मामूर
जो ये कहते थे सरे-दार बसेरा होगा
राहे-पुरपेज को सहल इतना बतानेवाला
राहबर हो नहीं सकता है, लुटेरा होगा
वो भी इन्सान है ऐ दिल उसे इल्.जाम न दे
जाने उसको भी किन आफात ने घेरा होगा
दिल जलाने से कहां दूर अंधेरा होगा।
रात ये वो है कि मुश्किल से सबेरा होगा
नहीं; मुश्किल से ही नहीं--सबेरा होता ही
नहीं। रात ये वह कि यहां सबेरा होता ही नहीं।
संसार ऐसी रात है, जिसका कोई सवेरा नहीं। और
परमात्मा ऐसा सवेरा है, जिसकी कोई सांझ नहीं। इसे शास्त्रों ने
अलग-अलग ढंग से कहा है। लेकिन यही बात है। सार की, और पते की
बात है; याद रखना। संसार ऐसी रात है, जिसका कोई
सबेरा नहीं। परमात्मा ऐसा सवेरा है, जिसकी कोई सांझ नहीं। रोशनी है
परमात्मा। प्रकाश है परमात्मा। और संसार तो गहन अंधेेरा है। फिर इसमें तुम कितना
ही दिल को जलाओ।
दिल जलाने से कहां दूर अंधेरा होगा
रात ये वो है कि मुश्किल से सबेरा होगा।
और कई बार तुम्हें लगेगा; बार-बार लगता
है; रोज
तो लगता है। ऐसा आदमी खोजना कठिन है, जिसे यह बात कई बार झलक में न आ
जाती हो कि संसार में कुछ सार नहीं है।
इतना बुद्धिहीन आदमी होता ही नहीं, जिसको यह समझ
में न आ जाता हो कि यहां कुछ सार नहीं है। फिर भी लगे रहते हैं--किसी पुरानी आदत
के कारण, संस्कार के कारण। न लगें, तो क्या
करें--इस कारण।
न जाएं संसार में, तो कहां जाएं? कुछ
और सूझता नहीं।
सारे लोग संसार में जा रहे हैं! सारा समूह यहां जा रहा है! भीड़
की धक्का-धुक्की में तुम भी चलते जाते हो। बहुत बार तुम्हें समझ में भी आता है कि
क्या फायदा? कहां जा रहा ह्रूं! लेकिन और कहां जाएं?
‘क्यूं न अब बज-ए-जुनूं तक करें, लौट चलें?’
कई बार ऐसा खयाल आता है कि यह क्या पागलपन कर रहे हैं! इस
पागलपन को छोड़ें और लौट चलें। ‘इससे आगे जो जंगल है वो घनेरा होगा।’
क्योंकि
यह सारे संसार की यात्रा अंततः मौत में ले जाती है। तुम्हारा जीवन और कहां ले जाता
है? मौत
में ले जाता है। ‘इससे आगे जो जंगल है, वो घनेरा होगा।’
अगर जीवन का तुमने ठीक उपयोग न कर लिया, तो जीवन
सिर्फ मौत में ले जाएगा। कब्र में उतार देगा।
निश्चित ही जो जंगल आगे आ रहा है, वह ज्यादा
घना है। और जो अंधेरा आगे आ रहा है, वह और भी भयंकर है।
जिंदगी का अंधेरा ही बड़ा है, मौत का
अंधेेरा तो निश्चित ही और भी बड़ा होगा।
लेकिन हमारा मन ऐसा कहता रहता है--कि माना सिकंदर का नहीं हुआ;
नेपोलियन
नहीं जीता; माना बड़े-बड़े अरबपति भी खाली हाथ गए; लेकिन कौन
जाने--मैं जीत जाऊं! कौन जाने मैं अपवाद होऊं!
तुम अपने को सदा अपवाद मानते रहते हो। जब भी कोई मरता है,
तुम
यही सोचते हो कि बेचारा! तुम्हें यह खयाल नहीं आता कि मेरी भी घड़ी करीब आती है।
तुम दो आंसू टपका आते हो। तुम दो सहानुभूति की बातें कह आते हो। तुम इस तरह समझते
हो, जैसे
इस बेचारे पर कोई मुसीबत आ गई। इस पर जो मुसीबत आई है, वह तुम पर भी
आ रही है। इस पर आने के कारण तुम्हारी और करीब आ गई है। यह भी क्यू में खड़ा था;
एक
आदमी कम हुआ। तुम्हारा क्यू और आगे सरक गया। मौत के करीब तुम पहुंच गए--थोड़े और
ज्यादा।
हर आदमी के मरने में तुम मरते हो। लेकिन मन कहता कि मैं नहीं
मरूंगा। मौत सदा किसी और की होती है। सदा कोई और मरता है!
ये जरूरी तो नहीं, इतना भी खुशफह्म न बन
वो जमाना जो न मेरा रहा, तेरा होगा?
लेकिन जो जानते हैं, उनसे पूछो। वे कहते हैंः जो
जमाना हमारा नहीं हुआ वह तुम्हारा कैसे होगा? ‘इतना भी
खुशफह्म न बन।’ इतना भी अपने सौभाग्य का भरोसा मत कर। यह जमाना किसी का भी
नहीं हुआ।
‘राहे-पुरपेज को सहल इतना बताने वाला
राहबर हो नहीं सकता है, लुटेरा होगा।
और जो जिंदगी के इस उलझे हुए रास्ते को सहल ही कह देता है,
वह
राहबर नहीं हो सकता--पथ-प्रदर्शक नहीं हो सकता--लुटेरा होगा। वह कहीं ले जाकर
गली-कूचों में अंधेरे में लूट लेगा। इसलिए कबीर कहते हैंः ‘साईं से लगन
कठिन है भाई।’
जो कह देता हो कि रोज सुबह दस मिनट मंत्र पढ़ लेने से सब हो
जाएगा; कि एक किताब में राम-राम लिख लेने से रोज, सब
हो जाएगा; कि किसी पत्थर की मूर्ति के सामने दीया जला लेने से सब हो
जाएगा; कि चार फूल पड़ोसियों के बगीचे से चुरा कर मंदिर में चढ़ा आने से
सब हो जाएगा--इतना जो सरल कहते हों, वे राहबर नहीं हैं, वे
पथ-प्रदर्शक नहीं हैं; वे लुटेरे हैं।
वे तुम्हारे मन को समझते हैं...तुम सस्ती चीजें चाहते हो,
वे
सस्ता परमात्मा तुम्हें दे देते हैं। सस्ता परमात्मा पाने की आशा में तुम लुट जाते
हो।
ये जो इतने हिंदू, इतने मुसलमान, इतने
जैन, ईसाई
लुटते हैं--मंदिरों में, मस्जिदों में--ये अकारण ही नहीं लुट रहे
हैं। इसके पीछे एक तर्क हैः सस्ते में परमात्मा पाना चाहते हैं। मुफ्त मिल जाए।
अब कैसा मजा हैः कोई सोचता है कि एक तिलक लगा लेने से; कि
एक जनेऊ पहन लेने से; कोई सोचता है कि रोज जाकर मंदिर में सिर पटक आने से; कोई
सोचता है रोज सुबह गीता या कुरान पढ़ लेनें से बस, सब हो जाएगा।
नहीं; मामला इतना आसान नहीं। पपीहे से पूछो।
जैसे पपीहा प्यासा बूंद का, पिया पिया रट
लाई।
प्यासे प्राण तरफै दिनराती, और नीर भा
भाई।
और पानी तुम ले जाओ दूसरा, तो तैयार
नहीं है। चातक तो स्वाति की ही बूंद मांगता है। और पानी नहीं स्वीकार करता। स्वाति
की बूंद ही जब गिरेगी, तो उसके कंठ को स्वीकार होगी।
सिंह घास-पात नहीं खाते हैं। और मान-सरोवर के हंसों को तुम
नाली की कीचड़ में न बिठा सकोगे। ‘हंसा तो मोती चुगै।’
जब तुम्हारे भीतर परमात्मा की प्यास उठेगी, तो
तुम सिर्फ मोती ही चुगोगे। तुम सिर्फ परमात्मा को ही पाना चाहोगे और कुछ भी
तुम्हें तृप्त न कर सकेगा। ये संसार के खिलौने फिर तुम्हें भरमा न सकेंगे।
दीये भी हों तो पुजारी सूरज के, सांस क्या
लेंगे तारंगी में
कहो पतंगों से रक्स करलें, चिराग की
धीमी रौशनी में।
मुआफ ऐ नाजे-रहानुमाई, पहुंच के मंजिल पे भी न पाई
वो लज्जते-ख्वाब जो मयस्सर हुई हो सरे-राहे-खस्तगी में।
बफा को थोड़ी सी बेनियाजी कम इल्तफाती ने तेरी दे दी
अब और क्या चाहिए खुदी को मेरी मुहब्बत की बेखुदी में।
छुपी न जब खाके-आस्तां मे छुपेगी क्या चश्मे-चुक्तदां से
वो इक शिकन जो जरा सी उभरी जबीने-मजबूरे बंदगी में।
इधर अंधेरे की लानते हैं, उधर उजाले की
जहमतें है
तेरे मुसाफिर लगाएं बिस्तर, कहां पे
सहरा-ए-जिंदगी में।
‘जमील’ हम उठ के गिर पड़े और गुजर गया कारवां
हमारा
गुबारा की बात तक न पूछी मुसाफिरों ने रवारवी में।
जब तुम गिरोगे...। यह कारवां, जिसके साथ
तुम चले थे, जिस पर बड़ा भरोसा किया था; यह भीड़-भाड़;
पूछेगी
भी नहीं तुम्हारी बात। जब तुम गिर पड़ोगे, यह कारवां ऐसे ही चलता जाएगा। यह
लौट कर भी नहीं देखेगा कि कौन गिर गया।
‘जमील’ हम उठ के गिर पड़े और गुजर गया कारवां
हमारा
गुबार की बात तक न पूछी मुसाफिरों ने रवारवी में।
लोग इतनी जल्दी में हैं जाने की, कौन फिकर
करेगा कि कोई मिट्टी में गिर गया; कि कोई पीछे दब गया! इसी भीड़ के पैरों
के नीचे दब कर मर जाओगे।
जिस भीड़ को तुमने संगी-साथी समझा है, यह भीड़
संगी-साथी नहीं है। ये भागते हुए लोग, ऐसे भागते रहेंगे; तुम
गिर जाओगे, तो कोई हाथ का सहारा भी न देगा। और इनमें से कोई तुम्हारे साथ
जाने को राजी भी न होगा।
‘दीये भी हों तो पुजारी सूरज के, सांस क्या
लेंगे तीरंगी में।’ यह ठीक बात कही है--कि दीया भी जला दो अंधेरी रात में, तो
सूरज का चाहक है, उसे कुछ आनंद न आएगा। जो सूरज को चाहता है, दीयों
से तृप्त नहीं होगा।
इस जिंदगी में अगर थोड़े बहुत कहीं कोई सुख के क्षण भी आते हों,
तो
वे इतने क्षणभंगुर है--पानी के बबूलों जैसे हैं--कि जिसने शाश्वत को चाहा है,
उसे
उनसे कोई तृप्ति नहीं हो सकती।
यहां कभी-कभी झलक भी मिल जाती हो प्रेम की, तो
भी जिसने प्रार्थना को पहचाना है, उसे उस प्रेम से कुछ तृप्ति नहीं होती।
उस प्रेम में बड़ी गंदगी मिली है। उस प्रेम में शुद्ध सुवास नहीं है। उसमें वासना
की दुर्गंध है। ‘दीये भी हों तो पुजारी सूरज के, सांस क्या
लेंगे तीरंगी में।’
अंधेरी रात में सूरज का पुजारी तो रोता ही रहेगा। दीया भी जला
हो, तो
भी रोता रहेगा।
‘कहो पतंगों से रक्स कर लें, चिराग की
धीमी रौशनी में।’ हां, कोई पतंगे हों, तो वे नाच
लें --चिराग की धीमी रोशनी में। लेकिन सूरज का पुजारी...?
इस संसार के लोग पतंगों की तरह हैं, जो टिमटिमाती
रोशनियों में--जो अब बुझी तब बुझी, जो कभी न कभी बुझ जाने वाली हैं--रक्स
कर लेते हैं; नाच कर लेते हैं।
शाश्वत को खोजो, क्योंकि उसी को खोज कर फिर खोना
नहीं पड़ता।
सूरज के पुजारी बनो। मिट्टी को दीयों की पूजा कब तक? रोशनी
खोजो। अंधेरे के द्वार पर
बंदगी कब तक? देह के सुख और उनके भ्रमों में कब तक
पड़े रहोगे? आत्मा का सुख खोजो।
कठिन है। कठिन इसलिए है कि ये जो हजार-हजार सुख मालूम होते
हैं--देह के, ये कहेंगेः इतनी जल्दी क्या! थोड़े रुको। थोड़ा यह भी कर लो,
थोड़ा
वह भी कर लो; फिर परमात्मा तो सदा है, पीछे कर
लेना।
इसलिए तो लोग कहते हैंः संन्यास जीवन के अंत में ले लेंगे।
बूढ़े हो जाएंगे, तब ले लेंगे। अभी तो जिंदगी है; जिंदगी रक्स
पर है। अभी तो ताजा है। अभी तो थोड़ा भोग लें। अभी तो जवानी है, थोड़ा
जवानी का रस ले लें।
ध्यान रखनाः जवानी में ही ऊर्जा है और शक्ति है। चाहे संसार का
रस ले लो, और चाहे परमात्मा को पुकार लो।
बुढ़ापे में न तो संसार भोगने की शक्ति रह जाती; जब
संसार ही भोगने की शक्ति नहीं रह जाती, तो तुम कैसे परमात्मा को भोगने
चल सकोगे? वह तो हारे-थके आदमी का नाम है। वह कहता हैः अब संसार में तो
कुछ मिलने को रहा नहीं; अब संसार में रहनें की हिम्मत भी नहीं
रही। चलो, अब परमात्मा को ही पुकार लें। कुछ हो जाए तो हो जाए। वह तो
धोखा है, आत्म-प्रवंचना है।
इसलिए बुद्ध और महावीर ने युवकों को संन्यास दिया। हिंदू बहुत
नाराज हुए थे। क्योंकि हिंदुओं ने सदा से मान रखा थाः संन्यास बुढ़ापे की बात है।
चैथी अवस्था में--पचहत्तर साल के बाद। पहले तो पचहत्तर साल तक बहुत कम लोग जीते
हैं। और उन दिनों तो बिलकुल नहीं जीते थे, जिन दिनों ये पचहत्तर साल की बात
लिखी गई। उन दिनों तो ज्यादा से ज्यादा आदमी चालीस साल...। क्योंकि जितनी पुरानी
हड्डियां मिली हैं, खोज-बीन की गई सारी दुनिया में, तो ऐसी कोई
हड्डी नहीं मिली है अब तक जो चालीस की उम्र से ज्यादा आदमी की हो।
तुम्हारे शास्त्र कुछ भी कहें, लेकिन प्रमाण
जरा भी नहीं है कि लोग सौ साल जीते थे। यह बात बिलकुल झूठी है। एक आदमी की हड्डी
नहीं मिली, जो चालीस से ऊपर की उम्र की हो। लोग चालीस के इर्द-गिर्द मर
जाते थे। लेकिन यह था--कि लोगों को न आंकड़े आते थे, न संख्या आती
थी, न
कैलेंडर था, न डायरी थी, न घड़ी थी। तो चालीस साल भी शायद चार सौ
साल जैसे लगते हों। अभी भी गांव में ऐसा हो जाता है।
देहात में जाकर आदमी से पूछोः तुम्हारी उम्र कितनी है? उसे
पता नहीं है! कब पैदा हुए थे? उसे पता नहीं। उसकी गिनती ही दस
अंगुलियों पर पूरी हो जाती है। इसके आगे गिनना बहुत मुश्किल मामला है। उसे फिकर भी
नहीं है। एक लिहाज से अच्छा भी है।
शायद यही कारण है कि पुरानी किताबें कहतीं हैं कि उन दिनों में
बूढ़े आदमियों के भी बाल सफेद नहीं होते थे। यह बात सभी संभव हो सकती है, जब
बूढ़े आदमी तीस पैंतीस साल में मर जाते हों।
बूढ़े आदमियों के दांत नहीं गिरते थे। लोग सोचते हैं कि बहुत
मजबूत रहे होंगे! कुल मामला इतना है कि वे तीस-चालीस के पहले मर जाते थे, तो
दांत कहां से गिरेंगे?
पुराने शास्त्र कहते हैं कि उन दिनों कोई बेटा बाप के सामने
नहीं मरता था। बात ठीक है। जब बाप पैंतीस-चालीस साल में मर जाए, तो
बेटों को इतनी जल्दी मरने की जरूरत भी नहीं है। अब तो बहुत बेटे बाप के सामने मरते
हैं। और जितनी उम्र बढ़ती जाती है, जैसे अमरीका में या स्वीडन में, जहां
उम्र अस्सी साल, पचासी साल हो गई हो--औसत उम्र, जहां सौ साल
का आदमी आसानी से मिल जाता हो, उसके बच्चे अगर उसके सामने मर जाएं,
तो
कुछ आश्चर्य नहीं। कभी-कभी तो नाती-पोते मर जाते हैं।
रूस में जहां कुछ लोगों की उम्र डेढ़ सौ के करीब पहुंच गई है,
वहां
तो बेटों के बेटों के बेटे भी मर जाते हैं। तो डेढ़ सौ साल का कोई आदमी जीएगा,
तो
उसकी लम्बी यात्रा हो गई।
वैज्ञानिक कहते हैं कि पुराने दिनों में, आज
से तीन हजार साल पहले, चालीस साल आखिरी उम्र की सीमा थी। और
हिंदू कहते हैं, पचहत्तर साल में संन्यासी हो जाना! पच्चीस साल तक तो
ब्रह्मचर्य; फिर पचास साल तक गृहस्थ; फिर पचहत्तर
साल तक वानप्रस्थ; फिर पचहत्तर से सौ साल तक संन्यासी! तो शायद ही कभी संन्यासी
कोई हो पाए।
इसलिए जब तक ये शास्त्र मान गए--इस देश में संन्यासियों की
संख्या बहुत नहीं थी। ऐसे इक्के-दुक्के ऋषि-मुनि होते थे, क्योंकि उतनी
लंबी उम्र तक कोई नहीं जीता था।
इस देश में संन्यासियों का प्रादुर्भाव हुआ--बुद्ध और महावीर
के साथ। क्योंकि उन्होंने जवान को दीक्षित किया। जब जवान को दीक्षित किया, तो
हजारों लाखों की संख्या में लोग संन्यस्त हुए।
लेकिन फिर भी संन्यास अटका रहा। हिंदुओं ने उम्र से अटका दिया
था; और
महावीर ने संन्यास का अर्थ ऐसा किया--कि संसार छोड़ कर ही जाना पड़ेगा--उससे अटका
दिया। बहुत लोग संसार छोड़ कर नहीं जा सके। और जरूरी नहीं है कि वे बुरे लोग हों।
अक्सर तो ऐसा होता है कि बुरे लोग जल्दी से संसार छोड़ कर चले
जाते हैं। जिस आदमी में थोड़ी दया है, करुणा है, वह अपने
बच्चे की भी सोचेगा कि इसको मैं छोड़ जा रहा हूं; पैदा मैंने
किया है। इसको छोड़ कर जंगल भाग जाऊंगा--क्या यह उचित है? क्या यह
अहिंसा है?
जैनियों ने कभी नहीं पूछी यह बात! पानी छान कर पीते हैं। लेकिन
एक आदमी अपने छोटे से बच्चे को जो अभी-अभी पैदा हुआ है, छोड़ कर भाग
जाता है, इसमें हिंसा नहीं देखते!
एक स्त्री को तुम विवाह कर लाए थे। भरोसा दिया था--जीवन भर साथ
देने का। फिर एक दिन तुम अचानक जंगल चले जाते हो। और तुम यह भी नहीं सोचते कि
तुमने कोई हिंसा की।
तुम एक अंधेरी रात में स्त्री को अकेली छोड़ आए हो। तुम्हारे
भरोसे पर चली थी। तुम्हारे भरोसे के कारण तुम्हारे बच्चे की मां बनी थी। और तुम
भागे जा रहे हो!
मेरे देखे बुरे लोग जल्दी संसार छोड़ कर भाग जाते हैं, क्योंकि
उनमें करुणा का कोई बोध नहीं होता। कठोर लोग, हिंसक लोग,
दुष्ट
प्रकृति के लोग जैनमुनि हो जाते हैं। जिनमें थोड़ी सी भी सदवृत्ती होगी, वे
हजार बार सोचेंगे।
तो उम्र से तो मुक्त कर दिया बुद्ध और महावीर ने, तो
संख्या बढ़ी। संन्यासी काफी संख्या में हुए। बुद्ध के लाखों और महावीर के हजारों
संन्यासी हुए। यह शुभ थी बात। लेकिन उन्होंने एक दूसरी झंझट लगा दी--कि संसार छोड़
कर जाना चाहिए।
सभी लोग संसार छोड़ कर नहीं जा सकते। और सभी लोग चले जाएं,
तो
महावीर को भी रोटी देने वाला नहीं मिल सकता। सभी लोग चले जाएं, तो
जो छोड़ कर चले गए हैं, उनका पालन-पोषण करने वाला कोई नहीं
रहेगा।
अगर जैन मुनियों की सब जैन मान लें और कहें कि चलो, हम
भी मुनि हुए जाते हैं, तो तुम एक दिन देखोगे कि जैन मुनि दुकान
कर रहे हैं! कि बाजार में काम खोज रहे हैं कि नौकरी के दफ्तर के सामने क्यू में
खड़े हैं! क्या करोगे फिर?
तुमने संसार छोड़ दिया है, इसीलिए छोड़
सके हो कि तुम्हारा संसार में कोई है, जो तुम्हारी देखभाल कर लेता है,
रोटी-रोजी-कपड़ा-मकान
का इंतजाम कर देता है। अगर वह भी छोड़ दे, तो पता चलेगा।
मैं चाहता हूं कि तुम जहां हो, वहीं रह कर
संन्यस्त हो जाओ। संन्यास मन की भाव-दशा हो। यह चित्त का जागरण हो।
संसार में तुम्हारा रस न रह जाए। बस, इतना काफी
है। विरस हो जाओ। संसार में तुम्हारी दौड़ न रह जाए, तुम्हारी दौड़
परमात्मा में हो जाए, फिर तुम जहां हो, वहीं रहो। कहीं जाने की जरूरत
नहीं। पति हो तो पति; और पत्नी हो तो पत्नी। बच्चे हैं, तो बच्चों की
फिकर करना। यह भी तुम्हारा परमात्मा की तरफ प्रेम प्रकट करने का एक ढंग है। यह
उसका ही संसार है। ये पत्नी, बच्चे बेटे उसके ही हैं। इसमें तुम्हारा
क्या है?
जिस तरह मैं संन्यास को देखता हूं, अगर वैसी
धारणा प्रचलित हो जाए, तो दुनिया में बहुत लोग संन्यासी हो
सकते हैं।
उम्र की बाधा नहीं और यह त्याग का अतिशय आग्रह नहीं।
वृत्ति-त्याग--वस्तु-त्याग नहीं। वस्तुएं उसी की हैं--और उसी की रहेंगी। इसलिए
कबीर कहते हैंः मेरा-तेरा क्या हैं? और शरम नहीं आती--मेरा तेरा
कहते!
जैसे पपीहा प्यासा बूंद का, पिया पिया रट
लाई।
प्यासे प्राण तरफै दिनराती, और नीर ना
भाई।
जैसे मिरगा सब्द-सनेही, सब्द सुनन को
जाई।
सब्द सुनै और प्रानदान दे, तनिको नाहिं
डराई।
मृग बांसुरी की आवाज सुन कर पास आ जाता है। या सर्प बीन की
आवाज सुन कर पास आ जाता है। फिकर नहीं करता कि प्राण खोने पड़ेंगे। ऐसे ही परमात्मा
का परम प्रेमी अगर मौत भी आती हो, तो भी परमात्मा के प्रेम में बाधा नहीं
बनने देगा। न तो जीवन बाधा बनेगा, न मृत्यु बाधा बनेगी।
सब दांव पर लगाने की तैयारी होनी चाहिए। इतना ही पागलपन हो,
इतना
ही उन्माद हो, तो ही कोई पा सकता हैः
जैसे मिरगा सब्द-सनेही, सब्द सुनन को
जाई।
सब्द सुनै और प्रानदान दे, तनिको नाहिं
डराई।
सर ये कहता है गवारा नहीं अब बारिशे संग।
दिल ये कहता है उसी कूचे में जाया जाय।
जिस कूचे में पत्थर पड़े हैं सिर पर तो बुद्धि तो कहती हैः अब
वहां मत जाओ। वह प्रेमी की जो गली है या प्रेयसी की जो गली है, अब
वहां मत जाओ--भूल कर मत जाओ--बुद्धि कहती है। वहां पत्थर पड़ते हैं।
‘सर ये कहता है गवारा नहीं अब बारिशे संग।’ अब
और पत्थर खाने की हिम्मत नहीं है।
‘दिल ये कहता है उसी कूचे में जाया जाय।’ लेकिन दिल
कहता हैः चलो वहीं। सिर जाए तो जाए; प्राण जाएं तो जाए; चलो
वहीं,
मंदिर वहीं है।
जैसे मिरगा सब्द सनेही, सब्द सुनन को
जाई।
सब्द सुनै और प्रानदान दे, तनिको नाहिं
डराई
जैसे सती चढ़ी सत-ऊपर, पिया की राह मन भाई।
पावक देखि डरै वह नहीं, हंसत बैठे
सदा माई।
‘जैसे सती चढ़ी सत-ऊपर, पिया की राह मन भाई।’ यह
अपूर्व घटना केवल इस देश में घटी है। सती की घटना सिर्फ इस देश में घटी है।
क्योंकि इस देश ने प्रेम के तत्व को समझा।
दुनिया में कोई देश इतना सौभाग्यशाली नहीं है कि प्रेम के तत्व
को इतना समझा हो। और स्त्रियों ने पुरुषों को मात दे दी सती होने में। और
स्त्रियों ने सदा के लिए सिद्ध कर दिया कि पुरुष के प्रेम की बातचीत ऊपरी-ऊपरी है।
हजारों स्त्रियां अपने प्रेमियों के साथ चिता पर चढ़ गईं। लेकिन
एक भी प्रेमी अपनी प्रेयसी के साथ चिता पर नहीं चढ़ा है। सतियां बहुत हुईं; सता
एक भी नहीं हुआ। इससे जाहिर होता है कि पुरुष हृदय से नहीं जीता, बुद्धि
से ही जीता है; लफ्फाजी करता है!
हालांकि यह मजे की बात है कि प्रेम के सब गीत पुरुष लिखते हैं।
प्रेम की कहानियां पुरुष लिखते हैं। प्रेम के उपन्यास पुरुष रचते हैं। लेकिन
स्त्रियों ने प्रेम के प्रमाण दिए हैं। और इससे बड़ा कोई प्रमाण नहीं हो सकता कि
प्रेमी चल बसा, तो स्त्री ने तय किया कि अब उसके बिना रहने का क्या अर्थ होगा!
रहने का मजा उसके साथ था। रहने में सार्थकता उसके साथ थी। वही प्राणों का प्राण
था। उसके बिना क्या अर्थ? उसके बिना जीवन मृत्यु से भी बदतर है।
यह अपूर्व घटना थी। असाधारण घटना थी। अतिमानवीय घटना थी। और
आसान नहीं है। तुम्हें पता हैः जरा सा हाथ जल जाता है, तो कितनी
तकलीफ होती है! जरा आग के पास हाथ ले जाओ, तो पता चलेगा।
जलती चिता में जीते जी बैठ जाना! अपनी देह को जलते देखना! जरूर
प्रेम का बल देह के बल से ज्यादा होगा, तभी यह संभव हो सकता है। प्यारे
से लगाव अपनी देह के लगाव से ज्यादा होगा, तभी यह हो सकता है।
इस स्त्री ने, जो चिता पर चढ़ गई है, और शांत
भाव से बैठ कर आग में अपने को समर्पित कर दिया है, इस बात की
घोषणा कर दी कि आदमी शरीर ही नहीं है; आदमी शरीर से कुछ ज्यादा है।
आदमी आत्मा है। नहीं तो यह घटना घट ही नहीं सकती।
अगर आदमी केवल शरीर मात्र है, जैसा कि
पदार्थवादी और नास्तिक कहते हैं कि आदमी सिर्फ देह मात्रा है, तो
यह सती की घटना नहीं घट सकती। फिर यह कौन है? क्योंकि देह
तो जलना नहीं चाहती। देह क्यों जलना चाहे? देह तो कहेगीः यह आदमी गया,
तो
गया; दूसरा
आदमी खोज लो।
इसलिए देहवादी देशों मे सती का तो सवाल ही नहीं है। सती की तो
बात ही व्यर्थ है। देहवादी देशों में तलाक का प्रचार बढ़ गया। क्योंकि ठीक है;
इस
आदमी से जब तक सुख मिलता है, ठीक है! जब नहीं मिलता, बात
खत्म हो गई। संबंध देह का है। और
देह के पास कोई ऊंचे मूल्य नहीं है! सुख मिलता हो इस आदमी के
साथ, तो
ठीक है। नहीं मिलता हो, तो बात खातम हो गई। तो विदा हो जाओ।
जो स्त्रियां चिता पर चढ़ गईं और सहज भाव से मृत्यु को अंगीकार
कर लिया; मृत्यु के अंगीकार में ही पता चलता है कि उन्हें कुछ-कुछ अमृत
का स्वाद लग गया होगा।
जरा सोचोः एक स्त्री को, एक युवती को,
एक
विधवा को अपने प्रेमी की चिता पर बैठे हुए...सोचो...उसके भीतर क्या घटता होगा?
देह
तो कहती होगीः चलो उठो। ये भयंकर लपटें; यह असह्य पीड़ा; यह
नरक। देह तो होश खो देती होगी। देह तो खींचती होगी कि चलो, उठो, भागो।
देह तो भगा ही देगी। लेकिन कौन उसे रोके हुए है? देह से कुछ
ज्यादा है मनुष्य। उस ज्यादा का उसे अनुभव हो रहा है।
इस चिता पर चढ़े हुए, जलते-जलते वह स्त्री की आत्मा का
अनुभव कर लेगी। यह तो आत्मा को ही अनुभव करने का एक उपाय था--सती का प्रयोग।
पुरुष इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए। यद्यपि पुरुषों ने शास्त्र
लिखे हैं कि आदमी देह नहीं है, आत्मा है। और पुरुषों ने शास्त्र लिखे
हैं कि प्रेम से ही सत्य मिलता है। और पुरुषों ने सारी बातें कहीं है; लेकिन
एक पुरुष ने भी यह हिम्मत न की--कि अपनी प्रेयसी के साथ चढ़ जाता चिता पर।
इधर प्रेयसी मरी नहीं कि पुरुष दूसरी स्त्री की तलाश में लग
जाता है। मरघट पर ही उसके घरवाले विचार करने लगते हैं कि अब इसकी शादी कहां कर
दें! इसमें पुरुष का बड़ा गहरा अपमान है। इसमें जाहिर होता है कि पुरुष ज्यादा
शरीरवादी है; स्त्री ज्यादा आत्मवादी है।
‘जैसे सति चढ़ी सत-ऊपर, पिया की राह मन भाई। उसने कहा;
जीवन
जाए--जाए लेकिन मैं पिया के साथ जाती हूं। ‘पिया की राह
मन भाई।’ अब पिया मर गया तो मैं भी मरती हूं। जीवन साथ था, मौत
भी साथ होगी।
सती की यह व्यवस्था धीरे-धीरे विकृत हो गई, क्योंकि
इस जगत में श्रेष्ठतम सत्य भी विकृत हो जाते हैं। और विकृत की पुरुष ने। विकृति कब
हो गई?
धीरे-धीरे पुरुष को यह भाव पकड़ गया कि मेरे मरने के बाद मेरी
स्त्री मेरी चिता पर चढ़नी ही चाहिए। प्रतिष्ठा की बात हो गई। फलां आदमी मरा,
उसकी
स्त्री चिता पर चढ़ गई। अब तुम सोचने लगे कि मैं मर जाऊं, पता नहीं,
मेरी
स्त्री चढ़े चिता पर, न चढ़े। न चढ़े, तो मेरी बदनामी होगी। यह भी अहंकार का
हिस्सा हो गया! तो मेरी स्त्री भी चढ़नी चाहिए इसका आयोजन पक्का कर लेना जरूरी है।
नहीं तो लोग कहेंगेः अरे, इसकी स्त्री नहीं चढ़ी। तो इनमें प्रेम
नहीं था! या इसकी स्त्री इसके प्रति सच में ही लगाव से भरी नहीं थी। या इस स्त्री
का मन किसी और से लगा था। या यह स्त्री दुराचारिणी है। या यह पुरुष इस स्त्री को
तृप्त नहीं कर पाया। न मालूम लोग क्या-क्या सोचेंगे। बदनामी हाथ लगेगी।
तो लोग इंतजाम करने लगे कि इनकी पत्नी को चढ़ना चाहिए।
जो बात सहज होती है, उसमें तो सौंदर्य है। जो बात सहज
होती है, उसमें तो एक अपूर्व घटना है, चमत्कार है।
लेकिन जब जबरदस्ती की जाने लगी, तो बात गंदी हो गई। और गंदगी पुरुष
लाया--अहंकार के कारण।
तो आयोजन होने लगा कि जब भी कोई मरे, तो सारा गांव
उसकी स्त्री को खदेड़ कर जाकर चढ़ा दे चिता पर। स्त्रियां भाग रही हैं और उनको
जबरदस्ती चढ़ाया जा रहा है! जबरदस्ती चढ़ाने के लिए पूरा इंतजाम किया जाता था। इतना
घी फेंका जाता था, इतना तेल फेंका जाता था कि आग ऐसी भभके कि एक ही भभके में
स्त्री समाप्त हो जाए।
और चारों तरफ पंडे-पुजारी हाथ में जलती मशालें लेकर खड़े रहते
थे--कि अगर स्त्री भागे, निकले...। क्योंकि आग आग है। और जब तुम
अपने मन से नहीं गए हो, तो भागोगे ही। तो कहीं अधजली स्त्री
बाहर न आए, तो उसकी मशालों से वापस चिता में धकेल देने की व्यवस्था थी।
और ढोल-नगाड़े बजाए जाते थे खूब, ताकि वह
रोएगी, चीखेगी, चिल्लाएगी...। मरेगा कोई तो ऐसे ही थोड़े
मरेगा! हां, अपने स्वानुभाव से कोई मरता हो, स्वप्रतीति
से कोई मरता हो, सहज स्फूर्ति से कोई मरता हो, तब तो बात और
है। लेकिन जब जबरदस्ती किया जा रहा है, तो वह चीखेगी। भयंकर चीख
निकलेगी। वह चीख लेकिन जब पूरे गांव में गूंज जाएगी। और चीख सिद्ध कर जाएगी कि
स्त्री को जबरदस्ती...सती हुई नहीं है, करवाई गई है। तो बड़े बैंड़-नगाड़े
बजाते और बड़े जोरों से मंत्रोच्चार करते हैः हरे कृष्ण हरे राम करते। और इतना घी
फेंकते कि धुआं काफी हो जाए, ताकि किसी को दिखाई भी न पड़े कि क्या हो
रहा है।
यह तो हत्या थी! इसलिए अंग्रेजों को यह हत्या बंद करनी पड़ी।
अंग्रेजों ने सती की प्रथा बंद नहीं की। सती की प्रथा तो उसके बहुत पहले मर चुकी
थी। जो उन्होंने बंद किया, वह स्त्रियों की हत्या थी। इसलिए मैं
नहीं कहता कि उन्होंने बुरा किया। उन्होनें ठीक किया। असली बात तो खो गई थी। असली
फूल तो जा चुके थे; प्लास्टिक के फूल रह गए थे। और इनके कारण हजारों स्त्रियां
सताई जा रही थीं। जबरदस्ती सताई जा रही थीं।
अगर कोई स्त्री किसी तरह बच भी जाती, न जाती,
न
होती सती, तो जीवन भर अपमान सहती। जीवन भर समझी जाती कि उसका आचरण गलत
है। इसलिए विधवा को कोई सम्मान नहीं होता था। विधवा का अपमान था। उसका जीना दूभर
हो जाता था। यह जीवन दूभर कर देना इसी के लिए था, ताकि आदमी
यही तय करे कि बेहतर यह है कि मैं मर जाऊं। जीना तो और भी मुश्किल होगा!
कोई स्त्री विधवा हो जाती, तो सोचती कि
अब बेहतर यही है कि मर ही जाऊं। क्योंकि जीना तो और कठिन होगा। मरना तो क्षण में
हो जाएगा। आग की तकलीफ है; दो घड़ी में बीत जाएगी। मगर यह जिंदगी तो
न मालूम कितने वर्ष चले। यह अपमान भारी होगा, लंबा होगा।
सती की प्रथा अपने आप में बड़ी प्यारी थी। वह प्रेम का बड़ा अदभुत प्रमाण थी;
और
आत्मा की बड़ी घोषणा थी।
जैसे सती चढ़ी सत-ऊपर,पिया की राह मन भाई।
पावक देखि डरै वह नाहीं, हंसत बैठे
सदा माई।
वहां बैठी है आग पर, लेकिन प्रसन्न है। प्रसन्न है कि
अपने प्रेमी के साथ जा रही है। उमंग से भरी है--कि अपने प्यारे के हाथ में हाथ है।
कि अपने प्यारे का सिर अपनी गोद में लिए बैठी है। कि जीवन में साथ था ही था,
मृत्यु
में भी साथ है। मृत्यु भी जुदा न कर पाई। प्रेम ने मौत को भी हरा दिया।
ऐसा ही जब कोई परमात्मा को भी प्रेम करता है कि अपने जीवन से
भी अगर कीमत चुकानी पड़े, तो तैयार हो; आग में भी जल
जाना पड़े, तो तैयार हो; तभी कोई मिल पाता है।
साईं से लगन कठिन है भाई।
छोड़ो तन आने की आसा, निर्भय ह्वै गुन गाई।
और जब तक तुम्हें अपने तन में बहुत रस लगा है, तब
तक तुम परमात्मा को न पा सकोगे।
परमात्मा तुम्हारे भीतर ही मौजूद है; तुम्हारे तन
में ही छिपा है। तन तुम्हारा मंदिर है; परमात्मा तुम्हारे मंदिर का
देवता है। लेकिन तुम्हारी नजरें दीवारों पर अटकी हैं। इसलिए मंदिर में विराजे
देवता को तुम नहीं देख पाते हो।
‘छोड़ो तन आने की आसा, निर्भय ह्वै गुन गाई।’ छोड़ो
फिकर तन की। तन की फिकर छोड़ते ही आदमी में अभय का जन्म होता है। तन के कारण भय है।
क्योंकि तन के कारण मृत्यु है। मृत्यु के कारण भय है। जिस दिन तुमने जानाः मैं तन
नहीं हूं, उसी दिन मृत्यु भी गई--और भय भी गया। फिर तुम--‘निर्भय
हूवै गुन गाई।’ फिर तुम प्रभु का निर्भय होकर गुणगान करो; स्तुति
करो। फिर नाचो। फिर ही नाच सकोगे।
‘कहत कबीर सुनो भाई साधो, नहीं तो जन्म
नसाई।’ और सुन लो, कबीर कहते हैं, ऐसा कर लो तो
ठीक, नहीं
तो जीवन का अवसर व्यर्थ गया।
माना कि प्रेम लगाना कठिन है प्रभु से, लेकिन लगा
लो। न लगाया, तो जीवन अकारण गया। तब तुम कृतार्थ नहीं हुए। फल न लगे,
फूल
न लगे तुम्हारे जीवन में। तुम्हारा जीवन ऐसे ही था, जेसे बांझ
वृक्ष।
‘लोका जानि न भूलो भाई।’ कबीर कहते
हैंः प्रभु की महिमा को जानो--भूलो मत। इस संसार में अपनी स्मृति को बहुत मत उलझा
दो।
‘लोका जानि न भूलो भाई।’
संसार है--ठीक है; अपनी जगह ठीक है, मगर
इसमें इतने मत भरम जाओ कि प्रभु का स्रमण भूल जाए। उसकी याद तो बनी ही रहे।
क्योंकि अंततः वही हमारा घर है। अंततः वही हमें जाना है। क्योंकि वहीं से हम आए
हैं, वही
स्रोत है; वही गंतव्य है।
‘खालिक खलक खलक में खालिक, सब घर रह्यो
समाई।’ सृष्टिकर्ता सृष्टि में छिपा है--‘खालिक खलक
खलक में खालिक।’ सृष्टिकर्ता सृष्टि में छिपा है। और सृष्टि सृष्टिकर्ता में
छिपी है। यह वक्तव्य ध्यान में रखना।
परमात्मा संसार से अलग-थलग नहीं है। कहीं दूर आकाश में नहीं
बैठा है। यहीं छिपा है। कण-कण में छिपा है। क्षण-क्षण में छिपा है। परमात्मा इस
सारे अस्तित्व में छिपा है।
जैसे परमात्मा इस अस्तित्व में छिपा है, यह अस्तित्व
परमात्मा में छिपा है। दोनों संयुक्त हैं।
दोनों जुड़े हैं। इसलिए संसार को छोड़ने की जरूरत नहीं
है--परमात्मा को पाने के लिए। सच तो यह हैः अगर संसार तुमने बिलकुल छोड़ दिया,
तो
कैसे परमात्मा को पाओगे? क्योंकि परमात्मा संसार में छिपा है।
यहीं पाओ; यहीं खोजो; यहीं खोदो।
जैसे मिट्टी खोदो, तो जल हाथ लगता है। ऐसे संसार खोदो, तो परमात्मा
हाथ लगता है। तुम सोच कर कि मिट्टी खोदने से क्या सार; मिट्टी छोड़
कर भाग गए, तो जल का स्रोत जो छिपा था, उससे भी
वंचित रह जाओगे।
‘खालिक खलक खलक में खालिक, सब घर रह्यो
समाई।’ सब तरफ वही है; सब में वही है।
‘अला एकै नूर उपजाया, ताकि कैसा निंदा।’ और
कहते हैं कबीर कि एक ही आाह ने एक ही नूर से, एक ही रोशनी
से सब उपजाया है, इसलिए संसार की कैसी निंदा करते हो?
‘अला एकै नूर उपजाया, ताकि कैसा निंदा।’ अपनी
रोशनी से संसार को बनाया है। यह संसार उसकी सृष्टि है। जैसे कोई चित्रकार अपने
प्रेम से चित्र बनाता; कोई मूर्तिकार मूर्ति गढ़ता; और
कोई कवि गीत रचता; ऐसे परमात्मा ने सृष्टि रची। यह उसका आनंद है। इसकी निंदा कर
रहे हो?
संसार की निंदा मत करो, क्योंकि
संसार की निंदा अंततः परमात्मा की निंदा है। संसार से जागना तो जरूर है, लेकिन
निंदा की कोई आवश्यकता नहीं है।
ऐसा ही समझो कि अगर किसी की मूर्ति, किसी
मूर्तिकार की मूर्ति को देख कर तुम मूर्ति की निंदा करो, तो यह अंततः
मूर्तिकार की ही निंदा है। मूर्ति की निंदा मूर्तिकार की तरफ ही इशारा करेगी।
मूर्ति की प्रशंसा मूर्ति की ही थोड़ी प्रशंसा है; मूर्तिकार की
ही प्रशंसा है। और यह भी सच है कि मूर्ति से जागना है; मूर्ति में
खो नहीं जाना है। नहीं तो मूर्तिकार को कब पाओगे? मूर्ति की
निंदा भी नहीं करनी है; और मूर्ति में खो भी नहीं जाना है।
मूर्ति ही सब कुछ नहीं है। मूर्ति तो केवल संकेत है कि आस-पास कहीं मूर्तिकार छिपा
है।
ऐसा ही समझो कि एक जंगल में तुम जा रहे हो; घने
जंगल में जहां कोई रास्ता नहीं। पगडंडी भी नहीं। और अचानक तुम्हे अपने पैर के पास
पड़ी हुई एक घड़ी मिल जाती है। क्या तुम्हें उसी क्षण प्रमाण न मिल जाएगा कि घड़ी का
मालिक आस-पास होगा? और घड़ी अगर चल भी रही हो, तो ज्यादा
देर नहीं हुई घड़ी के मालिक के हाथ से छूटे हुए। हालांकि कोई और प्रमाण नहीं है। न
पैरों का कोई चिह्न है। लेकिन घड़ी है; तो घड़ी किसी की खबर दिलाती है;
कोई
होगा। आस-पास ही होगा। ज्यादा दूर भी नहीं निकला होगा।
यह जगत चल रहा है; यह घड़ी चल रही है। और यह इतना विराट
आयोजन है कि बिना मालिक के नहीं हो सकता। यह व्यवस्था सूचक है। यह किन्हीं हाथों
की खबर देती है; किन्हीं अनोखे हाथों की। यह रचयिता की तरफ इशारा करती है।
तुम जब वृक्षों को देखते हो, पक्षियों को
देखते हो, चांद-तारों को देखते हो, तो क्या
तुम्हारे मन में यह सवाल नहीं उठताः इतना विराट आयोजन! इतनी शांति और संगीत से चल
रहा है! यह व्यवस्था बिना केंद्र के नहीं हो सकती। कभी की अराजकता हो गई होती।
चीजें टकरा गई होतीं। टूट गई होतीं। बिखर गई होतीं, गिर गई
होतीं।
हम जिंदगी में व्यवस्था कर करके भी नहीं व्यवस्था कर पाते और
यहां व्यवस्था दिखाई ही नहीं पड़ती और फिर भी सब व्यवस्थित है!
हम तो चैराहे पर पुलिसवाला खड़ा करते हैं, तब
भी लोग गलत चलते चले जाते हैं। चांद-तारों के राहों पर कोई पुलिसवाला नहीं खड़ा है
और कहीं तख्तियां भी नहीं लगी हैं कि बाएं चलो! और कहीं रास्ते पर लाईट भी नहीं
लगी है--कि अभी रुको; अभी मत चलो। अभी दूसरे निकल रहे हैं।
कितने चांद-तारे हैं, कोई टकराता नहीं! सब अपूर्व
शांति से चल रहा हैा अनूठी व्यवस्था है। व्यवस्थापक दिखाई भी नहीं पड़ता।
इतना विराट आयोजन--और कहीं कोई सीधे-साफ प्रत्यक्ष दर्शन नहीं
होते। इससे यह सिद्ध होता है कि जो व्यवस्थापक है, वह भीतर ही
कहीं छिपा है--बाहर नहीं खड़ा है। बाहर खड़ा होता, तो हम देख
लेते। वह आज्ञा नहीं दे रहा है--कि हे चांद-तारों, बाएं चलो;
कि
अभी रुको; अभी दूसरे तारे निकलते हैं। अभी ट्रैफिक बंद किया जाता है। अभी
दूसरों को निकल जाने दो!
कोई कहीं आता नहीं देता। और सब ऐसे चल रहा है, जेसा
आज्ञा देने से भी नहीं चल सकता है। तो व्यवस्थापक कहीं व्यवस्था में ही छिपा है।
हाथ अलग नहीं हैं। वृक्षों में फैला है। पहाड़ो में छिपा है। चांद-तारों में छिपा
है। तुम में मुझ में छिपा है।
खालिक खलक खलक में खालिक, सब घर रह्यो
समाई।
अला एकै नूर उपजाया, ताकि कैसी निंदा।
ता नूरै थें सब जग कीया, कौन भला कौन
मंदा।
और कबीर कहते हैंः उसी एक ने ही सब पैदा किया, फिर
कौन अच्छा? कौन बुरा? हिंदू अच्छे, कि मुसलमान;
कि
ब्राह्मण अच्छे कि शूद्र? सब नासमझियां हैं।
कौन अच्छा और कौन बुरा? सब एक
परमात्मा से आए हैं, इसलिए सभी परमात्मरूप हैं। अच्छे बुरे की बातें सब व्यर्थ हैं।
ता अला की गति नहीं जानी, गुरि गुड़
दीवा मीठा।
कहै कबीर मैं पूरा पाया, सब घटि साहब
दीठा।
‘ता अला की गति नहीं जानी, गुरि गुड़
दीवा मीठा।’ सदगुरु इतनी मीठी बातें देते हैं, ऐसा मीठा गुड़
देते हैं, फिर भी तुम स्वाद नहीं ले पाते?
क्या है स्वाद सदगुरु का? सदगुरु का एक
ही स्वाद है--कि अल्लाह की गति का पता चल जाए; परमात्मा के
रहस्य का पता चल जाए।
‘ता अला की गति नहीं जानी, गुरि गुड़
दीवा मीठा।’
सद्गुरु एक ही तो मिठाई बांटते हैं!
एक बार ऐसा हुआ कि काशी की एक छोट सी गली में...। काशी की
गलियां ऐसे ही छोटी! दो काशी के दुकानदारों में झगड़ा हो गया। दोनों मिठाई वाले थे।
जब झगड़ा हो गया, तो एक-दूसरे पर लड्डू फेंकने लगे। और कुछ था भी नहीं फेंकने
कोई मारामारी हो गई लड्डू की! भीड़ इकट्ठी हुई! भीड़ ने खूब मजा लूटा, क्योंकि
लड्डू मिले। इधर के लड्डू भी मिले, उधर के लड्डू भी मिले। कहते हैं,
कोई
फकीर वहां खड़ा देख रहा था, वह बहुत हंसने लगा। उसने कहाः ऐसे ही
गुरुओं के बीच कभी अगर विवाद भी छिड़ जाता है, तो लड्डू ही
फेंके जाते हैं।
अब महावीर और बुद्ध में जो विवाद है, देखने वाले
के लिए, दोनों तरफ से लड्डू फेंके जा रहे हैं। शंकराचार्य और बुद्ध में
जो विवाद है, दोनों तरफ से लड्डू फेंके जा रहे हैं। अगर तुम्हारे पास आंखें
हों, तो
तुम खूब लूट लो। मगर तुम अंधे हो! तुम लड्डू तो देखते ही नहीं। तुम अपने पत्थर उठा
लेते हो। तुम्हारे पास तो पत्थर ही हैं।
तो शंकराचार्य का अनुयायी बुद्ध के खिलाफ हो जाता है--कि उखाड़
फेंको बुद्ध धर्म को हिंदुस्तान से; कि बुद्ध के भिक्षुओं को जला
देता है अग्नि में। कड़ाओं पर चढ़ा देता है। तुम्हारे पास यही है। तुम चूक ही गए।
संत तो विवाद भी करते हैं, तो भी मिठाई
ही बरसती है और तुम अगर सम्वाद भी करते हो, तो भी
गाली-गलौच के अतिरिक्त और तुम्हारे पास है भी क्या!
‘ता अला की गति नहीं जानी, गुरि गुड़
दीवा मीठा।’ कबीर कहते हैंः गुरु एक ही तो बात देता है। हजार तरह से एक ही
बात कहता है। नये-नये रंग, नये-नये ढंग से एक ही गीत गाता है। उसकी
टेक एक है और वह टेक यह है कि किसी तरह तुम्हें आाह की यह छिपी हुई गति दिखाई पड़
जाए।
यह जो सारा जगत गतिमान हो रहा है, उस गतिमान के
पीछे उसका ही हाथ है। वही गत्यात्मक है। यही जिस दिन समझ में आ जाएगा, उस
दिन सभी सदगुरुओं की मीठी वाणी तुम्हें समझ आ गई। वेद-कुरान-पुराण--सब समण आ गए।
‘कहै कबीर मैं पूरा पाया, सब घटि साहब
दीठा।’
और जब मैंने गुरु के वचन का पूरा रस ले लिया, तो
मैंने सब पा लिया। ‘कहै कबीर मैंने पूरा पाया।’
पूरे पाने की कसौटी क्या है? किस आदमी ने
परमात्मा को पूरा पा लिया? इसकी कसौटी क्या है? इसकी
कसौटी कबीर कहते हैंः ‘सब घटि साहब दीठा।’
जिसको सब जगह परमात्मा दिखाई पड़ने लगे--मंदिर में मस्जिद में,
गुरुद्वारे
में गिरजे में, स्त्री में पुरुष में, ब्राह्मण में, शूद्र
में, हिंदू-मुसलमान-इसाई
में, जैने
में बौद्ध में, पशुओं-पक्षियों में पत्थर-पहाड़ों में, राम में रावण
में, अच्छे
में बुरे में, साधु में असाधु में,--जिसे सब जगह परमात्मा दिखाई पड़ने
लगे। उजाले में अंधेरे में; जिंदगी में मौत में; जिसे
कोई द्वंद्व न रह जाए, उसने पूरा पा लिया।
ता अला की गति नहीं जानी, गुरि गुड़
दीवा मीठा।
कहै कबीर मैं पूरा पाया, सब घटि साहब
दीठा।
जहिया किरतम न हता, धरती हती नीर
उतपति परलय ना हता, बत की कहै कबीर
बड़ा अदभुत वचन है। अनूठे वचनों में से एक है। जीसस के वचनों
में एक वचन है, जो इसके करीब आता है।
जीसस एक गांव में लोगों को समझा रहे हैं। यहूदियों की भीड़ है।
क्योंकि यहूदी ही थे; और तो वहां कोई था नहीं। एक यहूदी रबाई ने पूछा कि महानुभाव!
अब्राहम का नाम सुना कभी?’
अब्राहम यहूदियों का सब से पहला पैगंबर, यहूदियों का
पिता, जैसे राम हिंदुओं के लिए प्यारे, वैसे अब्राहम
यहूदियों के लिए प्यारे। और कुछ का तो कहना है कि राम और अब्राहम एक ही आदमी के दो
नाम हैं। अब्राहम का पुराना नाम है--अबराम। और ‘अब’ का
मतलब होता है--श्री--हिब्रू में। तो जो हिंदी में श्रीराम का अर्थ होता है,
वह
अबराम का अर्थ होता है--हिब्रू में।
संभव है कि कहीं बहुत प्राचीन समय में, दूर, राम
को मानने वाले लोग दो हिस्सों में बंट गए हों। और ये ही दो धर्म दुनिया में सब से
ज्यादा पुराने हैं--हिंदू और यहूदी। और इन्हीं दो धर्मों से दुनिया के सब धर्म
निकले हैं। यहूदियों से निकली--ईसाइयत और इस्लाम। और हिंदुओं से निकले--बौद्ध और
जैन। इतने ही धर्म हैं दुनिया में खास।
यहूदी और हिंदू दो मूलधर्म मालूम होते हैं। दोनों के पीछे राम
का नाम है।
तो उस यहूदी ने पूछा कि ‘अब्राहम का
नाम सुना कभी?’ और जीसस ने जो कहा, वह बड़ी अनूठी बात कही। जीसस ने
कहा, ‘जब अब्राहम भी पैदा नहीं हुआ था, तब भी मैं
था।’ यह
तो बड़ी चोट करने वाली बात हो गई। और यहूदियों को बहुत बुरा लगा कि ‘जब
अब्राहम भी नहीं थे, तब भी मैं था! मैं अब्राहम से पुराना हूं।’
जीसस यह कह रहे हैं कि मैं शाश्वत हूं। तुम भी शाश्वत हो। रूप
आते हैं, जाते हैं। अब्राहम आया और गया। जीसस आया और गया। तुम आए और गए।
ये रूप ही हैं, जो आते हैं और जाते हैं--आकृतियां। लेकिन जो भीतर छिपा हुआ
सत्य है, वह शाश्वत है।
‘कबीर कहते हैंः ‘जहिया किरतम न हता...।’ कबीर
कहते हंैः जब कर्ता भी नहीं था; ‘धरती हती न नीर...।’ और न
पानी था और न पृथ्वी थी; ‘उतपति परलय ना हता...।’ जब
उत्पत्ति भी नहीं हुई थी संसार की; प्रलय की तो बात ही कहां! ‘तब
की कहै कबीर।’ कबीर तब की कह रहा है।
कबीर उस मूल स्त्रोत की कह रहा है, जिससे सब
आया। कबीर उसकी देख कर कह रहा है। अब्राहम से पहले जीसस!
और कबीर तो और भी एक कदम आगे बढ़ गए; वे कहते हंैः
परमात्मा से पहले कबीर। ‘जहिया किरतम न हता’--कर्ता
भी नहीं था, बनाने वाला भी नहीं था; कुछ बना नहीं
था--‘धरती
हती न नीर...। सृष्टि हुई ही न थी; सब शून्य था--महाशून्य था।
‘उतपति परलय ना हता, तब की कहै कबीर।’
तुम भी थे तब--अब्राहम से पहले। तुम भी थे तब--धरती हती न नीर।
तुम पुराने हो। तुम अति पुरातन हो। तुम सनातन हो। तुम्हें याद भर नहीं रही,
कबीर
को याद आ गई है।
तुम वही हो, जो मूल में था। यही अर्थ है कहने का
तत्वमसि--तुम परमात्मा हो। सब तुम्हारे बाद में हुआ है। और सब मिट जाएगा, तब
भी तुम बचोगे। तुम्हारा कोई मिटना नहीं; तुम अमृत हो।
ता अला की गति नहीं जानी, गुरि गुड़
दीवा मीठा।
कहै कबीर मैं पूरा पाया, सब घटि साहब
दीठा।
जहिया किरतम न हता, धरती हती न नरी।
उतपति परलय ना हता, तब की कहै कबीर।
कबीर पर पंडित-पुरोहित, मुल्ला-मौलवी
बहुत नाराज हो गए थे--कि कबीर अपने को समझता क्या है! जुलाहा है कबीर, अपने
को समझता क्या है? यह कह क्या रहा है कि जब कुछ भी नहीं था, तब
भी मैं था। और मैं तब की बात कह रहा हूं। कोई नई बात नहीं कह रहा हूं। वेद नहीं
रचे गए थे, तब की मैं कह रहा हूं। उपनिषद के ऋषि नहीं हुए थे, तब
की मैं कह रहा हूं। बुद्ध, महावीर को किसी ने जाना नहीं था,
तब
की मैं कह रहा हूं।
कबीर की यह हिम्मत की बात...। पंडित-पुरोहित तो आग बबूला हो
गए। उस समय के पंडित-पुरोहितों ने मिल कर कबीर के खिलाफ बड़ा उपद्रव मचा दिया। वे
तो कहने लगेः यह आदमी अहंकारी है। यह अक्सर हुआ है।
सत्य की घोषणा अक्सर भ्रांति दे सकती है कि यह अहंकार है।
लेकिन सत्य की घोषणा वही कर सकता है, जिसका अहंकार बिलकुल चला गया हो।
कबीर में अगर जरा भी अहंकार होता, तो थोड़े
झिझकते। सोचते कि यह मैं क्या कह रहा हूं? थोड़े डरते कि लोग क्या कहेंगे!
अहंकारी आदमी बहुत सोच-समझ कर चलता है। असल में अहंकारी आदमी
अपने अहंकार की घोषणा बड़े परोक्ष ढंग से करता है; प्रत्यक्ष
ढंग से कभी नहीं करता। क्योंकि प्रत्यक्ष ढंग से करेगा, तो और सब
अहंकारी मौजूद हैं, वे गरदन दबा देंगे।
अहंकारी आदमी अपने अहंकार की घोषणा ऐसे करता है कि तुम्हंे पता
भी चल जाए, और तुम उसके खिलाफ कुछ कर भी न सको। वह हाथ जोड़ दे--जैसा
राजनेता करते हैं--वह हाथ जोड़ कर झुक जाता है। और कहता हैः आप के पैर की धूल हूं।
मैं तो आपका सेवक!
सेवकों को सत्ता में जाने का इतना रस क्यों है? ऐसे
ही पैर दबाओ लोगों के; लोग तैयार हैं। कौन मना कर रहा है?
लेकिन
सेवकों को सत्ता में जाने का रस है। असल में सत्ता में जाने के लिए ही वे सेवक
बनने का ढोंग रचते हैं, झुकते हैं। तुम्हारे चरण छूने को तैयार
रहते हैं। सिर पर चढ़ने की आकांक्षा है। बड़ी विनम्रता का वातावरण पैदा करते हैं।
तुम उसी राजनेता को ज्यादा मत दोगे, जो बहुत
विनम्रता बताएगा। जो झुकेगा; जो तुम्हारे अहंकार को फुसलाएगा;
जो
कहेगाः मैं तो कुछ नहीं, बस, आप का सेवक
हूं। एक छोटा-मोटा सेवक--मुझे मौका दो सेवा का।
मगर सेवा के लिए सत्ता में जाने की कोई जरूरत ही नहीं। और
कभी-कभी तो ऐसा हो जाता है। कि जनता कहती हैः हमें आप से सेवा करवानी नहीं। मगर आप
कहते हैंः हम करके रहेंगे। हम तो सेवा करेंगे। चाहे तुम करवाओ, न
करवाओ; हम तो करेंगे। हमें तो सेवा में रस है।
मैंने सुना, एक स्कूल में पादरी ने बच्चों को कहा कि
कुछ सेवा का काम किया करो। सातवें दिन उसने पूछा कि कुछ सेवा का काम किया? एक
बच्चे ने हाथ हिलाया। उससे पादरी ने पूछाः ‘क्या सेवा का
काम किया?’ उसने कहाः ‘एक बूढ़ी स्त्री को रास्ता पार करवा
दिया।’ पादरी ने कहाः ‘बहुत अच्छा किया। सदा बूढ़ों का ध्यान
रखो।’
दूसरे से पूछाः ‘तुने क्या किया?’ वह
भी हाथ हिला रहा था। उसने कहा कि ‘मैने भी एक बूढ़ी स्त्री को रास्ता पार
करवा दिया।’
पादरी थोड़ा सोचा कि इसको भी बूढ़ी स्त्री मिल गई! मगर कोई
आश्चर्य नहीं। कई बूढ़ी स्त्रियां हैं।
तीसरा हाथ हिला रहा था, उससे पूछा,
‘तूने
क्या किया?’ उसने कहाः ‘मेने भी एक बूढ़ी स्त्री को रास्ता पार
करवा दिया।’ तब तो बात जरा ज्यादा हो गई। उसने कहाः ‘तुम तीनों को
बूढ़ी स्त्रियां मिल गईं!’
उन तीनों ने कहाः ‘तीन नहीं थीं। एक ही थी।’
तो
पादरी ने पूछा, ‘एक को पार करवाने के लिए तीन की जरूरत पड़ी?’ उन्होने
कहा, ‘तीन भी बड़ी मुश्किल से पार करवा पाए। वह तो जाना ही नहीं चाहती
थी उस तरफ। वह तो हमें सेवा करनी थी। आपने कहा थाि किसी बूढ़े को रास्ते पार
करवाना। हम सेवा का मौका तलाश कर रहे थे। वह स्त्री तो बड़ी चिल्लाती थी; गालियां
बकती थी। मगर हमने करवा ही दिया!’
ऐसे कुछ राजनेता सेवा करने को उत्सुक है, वे
कहते हैंः हम तो करेंगे सेवा। सेवा में इतनी क्या उत्सुकता होगी? सेवा
में नहीं--सत्ता में उत्सुकता है। और सत्ता सेवा से मिलती है; काम
से कम--सेवा के ढोंग से मिलती है।
अहंकारी आदमी बड़ी तरकीबों से अपने अहंकार पूरे करता है।
यह घोषणा तो निर-अहंकारियों की है। जीसस का यह कहना कि मैं
अब्राहम के पहले था; कृष्णा का यह कहना अर्जुन सेः ‘सर्वधर्मान्
परित्यज्य मामेकम् शरणम् व्रज--सब छोड़; मेरी शरण आ।’ कबीर
का यह कहनाः
‘कहै कबीर मैं पूरा पाया, सब घटि साहब
दीठा।’
जहिया किरतम न हता, धरती हती न नीरी।
उतपति परलय ना हता, तब की कहै कबीर।
यह अत्यंत विनम्रता की घोषणाएं हैं; निर-अहंकार
की घोषणाएं हैं। अहंकारी तो इतनी हिम्मत कर ही नहीं सकते। क्यों--अहंकारी इतनी
हिम्मत क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि अहंकार के लिए तो उन्हें लोगों
पर निर्भर रहना पड़ता है। इस बात को समझना।
तुम्हारा अहंकार तो लोगों के ऊपर निर्भर है। अगर लोग सम्मान करेंगे,
तो
ही तुम्हारा अहंकार बचता है। अगर लोगों ने सम्मान नहीं किया, तो
तुम्हारा अहंकार कहां रहेगा?
तो अहंकारी को तो दूसरे के अहंकार को तृप्त करना पड़ता है,
ताकि
परोक्ष रूप से उसका अहंकार तृप्त हो। अहंकारी अगर खुद घोषणा कर दे, तो
तुम सब हट जाओगे। तुम कहोगे, यह आदमी अहंकारी है।
जैसे कोई नेता आकर खड़ा हो जाए और कहे कि नमस्कार करो मुझे। तुम
मेरे चरण की धूल हो। और मैं सत्ता में उत्सुक हूं। और मुझे दिल्ली जाना है। मुझे
प्रधानमंत्री बनना है। मुझे वोट देना। और नहीं दिया, तो ठीक नहीं
होगा।
तो यह आदमी जीतेगा कभी? यह आदमी कभी
नहीं जीत सकेगा। इसके जीतने का कोई उपाय नहीं। उसको एक वोट नहीं मिलेगा। यह तो कोई
उपाय न हुआ!
अहंकार के लिए तो दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है। तो दूसरा
जैसा चाहते हैं, वैसा ढोंग रचाना पड़ता है।
कबीर यह घोषणा कर रहे हैं। इस घोषणा का मतलब है कि कबीर दूसरे
पर निर्भर नहीं हैं। इसका यह मतलब है कि अब कबीर को दूसरे से अपने अहंकार को पुष्ट
करवाने की कोई आकांक्षा नहीं है। यह निर-अहंकार की घोषणा है। हालांकि बड़ी अहंकारी
मालूम पड़ती है। इससे भ्रांति में मर पड़ जाना।
जब जीसस कहते हैंः मैं ईश्वर का पुत्र हूं और जब बुद्ध ने कहा
कि मैंने वह समाधि पा ली है, जो सर्वोत्कृष्ट है; जिसको
कभी करोड़ दो करोड़ में, हजारों वर्षों में कोई एकाध पा सकता
है--तो यह मत समझना कि यह अहंकार की घोषणा है। यह केवल तथ्य की सूचना है।
जब महावीर ने कहा कि मैं परमात्म-रूप हो गया हूं; कि
मेरी आत्मा परमात्मा हो गई है, तो यह कोई अहंकार की घोषणा नहीं है।
अहंकार तो समाज-निर्भर होता है। अहंकार तो तुम्हें दूसरों से
मांगना पड़ता है। अहंकार तो भिखारी है। अहंकार इतनी हिम्मत कहां कर सकेगा? भिखमंगों
की इतनी हिम्मत नहीं होती। यह तो सम्राटों की ही हिम्मत है।
ता अला की गति नहीं जानी, गुरु गुड़
दीवा मीठा।
कहै कबीर मैं पूरा पाया, सब घटि साहब
दीठा।
मैने पूरा-पूरा पा लिया--कबीर कहते हैं। कुछ नहीं बचा पाने को,
मैंने
सब पा लिया। मैंने पूरा परमात्मा पा लिया। मैं परमात्मा हो गया हूं।
जहिया किरतम न हता, धरती हती न नीर।
उतपति परलय ना हता, तब की कहै कबीर।
और यह कबीर के संबंध में घोषणा नहीं है; यह तुम्हारे
संबंध में घोषणा है। कृष्ण जब कहते हैः मेरी शरण आ, तो कृष्ण ‘अपनी’
शरण
की बात नहीं कर रहे हैं। कृष्ण कह रहे हंैः जो मेरे भीतर छिपा बैठा है, मैंने
पहचान लिया, तू ने नहीं पहचाना। पहचानने वाले की शरण आ जा, ताकि
तू भी पहचान ले।
यह मेरी-तेरी की बात ही नहीं है। मेरा-तेरा कहां?
जब जीसस कहते हैंः मैं अब्राहम से पहले था; अब्राहम
भी नहीं था तब मैं था; तब वे सिर्फ याद दिला रहे हैं तुम्हें
कि तुम भी पहले थे।
इतिहास पीछे आया; हम पहले से हैं; हम
सदा से हैं; हम शाश्वत हैं। समय तो छोटी सी कहानी है--सपना है; हम
समय के बाहर हैं।
वही कबीर कह रहे हैं। जब कबीर कह रहे हैं कि मैं पहले था,
तो
वे यह नहीं कह रहे हैं कि मैं पहले था; तुम पहले नहीं थे। वे कह रहे
हैंः मैंने पहचान लिया; तुमने अभी तक नहीं पहचाना। तुम भी पहचान
जाओ, इसलिए
मकान की मुंडेरों पर चढ़ कर चिल्लाता हूं। तुम भी पहचान जाओ। इसलिए कहता हूं। जो
मैं अपने संबंध में कह रहा हूं, वह तुम्हारे संबंध में भी उतना ही सच
है। क्यों? क्योंकि कबीर जानते हैं कि मैं और तू अलग कहां है। एक का ही
राज है। एक का ही विस्तार है।
जो यहां बोल रहा है, वही तुम्हारे भीतर सुन रहा है।
तो जो भी मैं अपने संबंध में कहूं, याद रखना, वह तुम्हारे
संबंध में भी कहा गया है। अगर मैं अपने संबंध में कहूं और तुम्हारे संबंध में
इनकार करूं, तो अहंकार होगा। लेकिन मेरी घोषणा में अगर तुम भी सम्मिलित हो,
तुम्हारी
घोषणा भी सम्मिलित है, तो अहंकार का कोई प्रश्न ही नहीं।
लेकिन यह वचन जब तुम पहली दफे पढ़ोगे, तो अहंकार
जैसे मालूम पड़ सकते हैं। पड़ेंगे ही। क्योंकि तुम्हारे अहंकार को चोट लगेगी।
अक्सर ऐसा होता है कि जब तुम्हारे अहंकार को चोट लगती है,
तब
तुम चिल्लाते लगते हो कि यह आदमी अहंकारी है। लेकिन तुम गौर से देखना। इस आदमी ने
कुछ बात कही अहंकार की--या कि सिर्फ तुम्हारे अहंकार को चोट लगी?
तुम उस आदमी को विनम्र कहते हो, जो तुम्हारे
अहंकार का पोषण करता है। कोई आकर तुम्हारे पैर छू लेता है। तुम कहते होः ‘बड़े
विनम्र हैं। बड़े भले आदमी हैं आप।’ और कोई आकर तुम्हारा सिर झुका कर अपना
पैर छुआ दे, तो तुम को विनम्र बना रहा है कोई बुरा तो नहीं कर रहा है!
तुम्हारा लाभ ही कर रहा है; तुम्हारा कल्याण ही चाहता है। मगर तब
तुम नाराज हो जाओगे।
अहंकार को चोट लगती है, तो तुम
तिलमिलाते हो। तुम अपनी तिलमिलाहट का बदला ऐसा लेते हो कि तुम कहते होः कबीर
अहंकारी है।
कबीर को मारने की कोशिश की गई। कबीर की हत्या की कोशिश की गई।
कबीर को जहर देने की कोशिश की गई। क्योंकि ब्राह्मणों को यह बात जंची नहीं--कि हम
कुछ भी नहीं; और जुलाहा कहता है कि जब भगवान भी नहीं था, जब
कुछ बना भी नहीं था--धरती हती न नीर, तब की कहै कबीर! यह कहां की
बातें कर रहा है? यह जुलाहा होश में है अपने? कि पागल हो
गया है?
कबीर पागल हुए हैं--ऐसी चर्चा ब्राह्मणों ने चला रखी थी। और
कबीर अहंकारी हैं--ऐसी अफवाहें रखी थी। इसलिए कबीर जैसे अदभुत पुरुष से भी यह देश
वंचित रह गया।
कबीर का जैसा लाभ हो सकता था; कबीर की वाणी
जितनी मंगलदायी हो सकती थी, नहीं हो पाई।
कबीर में बड़ा रहस्य, बड़ा जादू है। कबीर में ऐसा जादू
है कि जो तुम्हें जगा दे। कबीर में ऐसा जादू है कि तुम्हें कबीर बना दे। कबीर में
ऐसा जादू है कि तुम्हें वहां पहुंचा दे--उस मूल-स्रोत पर--जहां से सब आया है;
और
जहां एक दिन सब लीन हो जाता है।
आज इतना ही।
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