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शनिवार, 12 अगस्त 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-06



देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

छठवां-प्रवचन
तोड़ने का एक और उपक्रम

मेरे प्रिय आत्मन्!
मित्रों ने बहुत से प्रश्न से पूछे हैं। एक मित्र ने पूछा है: महापुरुषों की आलोचना की बजाय उचित होगा कि सृजनात्मक रूप से मैं क्या देखना चाहता हूं देश को, समाज को, उस संबंध में कहूं।

लेकिन आलोचना से इतने भयभीत होने की क्या बात है। क्या यह वैसा ही नहीं है हम कहें कि पुराने मकान को तोड़ने की बजाय नये मकान को बनाना ही उचित है? पुराने को तोड़े बिना नये को बनाया कब किसने है? और कैसे बना सकता है? विध्वंस भी रचना की प्रक्रिया का हिस्सा है। तोड़ना भी बनाने के लिए जरूरी हिस्सा है। अतीत की आलोचना भविष्य में गति करने का पहला चरण है और जो लोग अतीत की आलोचना से भयभीत होते हैं, वे वे ही लोग हैं जो भविष्य में जाने में सामर्थ्य भी नहीं दिखा सकते हैं।
लेकिन इतना भय क्या है? सृजनात्मक आलोचना, एक क्रिएटिव क्रिटिसिज्म से इतना भय क्या है? क्या हमारे महापुरुष इतने छोटे हैं कि उनकी आलोचना से हमें भयभीत होने की जरूरत पड़े। और अगर वे इतने छोटे हैं तब तो उनकी आलोचना जरूर ही होनी चाहिए, क्योंकि उनसे हमारा छुटकारा हो जाएगा। और अगर वे इतने छोटे नहीं हैं तो आलोचना से उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है।
दोनों हालत में आलोचना कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकती है। लेकिन यह हमारा पूरा देश ही आलोचना से भयभीत हो गया है। यह हम आज से भयभीत हैं ऐसा नहीं, यह हम हमेशा से भयभीत हैं। और जो समाज अपने अतीत की आलोचना नहीं करता, वह भविष्य के लिए निर्णय भी नहीं ले पाता है कि कहां कदम रखने हैं, कैसे कदम रखने हैं। उसका सारा अतीत बिना आलोचना के, अनक्रिटिसाइज्ड इकट्ठा हो जाता है। उस सारे अतीत में से चुनाव करना मुश्किल हो जाता है कि क्या चुनना है। उस अतीत में से क्या छोड़ना है, यह जानना मुश्किल हो जाता है। उस अतीत का बोझ इतना हो जाता है कि उस अतीत के नीचे हम दब कर मर सकते हैं, उस अतीत के कंधे पर खड़े होकर भविष्य की ओर उठ नहीं सकते हैं।
भारत का अतीत हमारा चुना हुआ अतीत नहीं है, एक ढेर की भांति हमारे सिर पर बैठा हुआ है। उसमें सब तरह की बातें बैठी हुई हैं। उसमें विरोधी कंट्राडिक्शंस बैठे हुए हैं और उन सबको हम झेल रहे हैं और उन सबके साथ हम जीने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए भारत में इतना कंफ्यूजन है, इतना विभ्रम है। हम कोई निर्णय नहीं ले सके। हमारे अतीत में कृष्ण हैं, जो युद्ध के मैदान पर लड़ते हैं, वे भी हमें पूज्य हैं। हमारे अतीत में महावीर हैं, जो कहते हैं, एक कीड़े को भी मारना पाप है, युद्ध में लड़ने की तो बात ही अलग, वे भी हमारे पूज्य हैं। न हमने महावीर पर कभी विचार किया, न कभी कृष्ण पर विचार किया। दोनों हमारे मन में बैठे हुए हैं। और उन दोनों की वजह से हमारे मन में कंफ्यूजन पैदा होना अनिवार्य है।
एक तरफ कृष्ण हैं, जो कहते हैं, न कोई मरता है और न कोई मारा जाता है, इसलिए युद्ध में कोई भय नहीं है। दूसरी तरफ महावीर हैं, जो कहते हैं कि जरा सा भी चींटी का मर जाना नरक जाने का द्वार है, इसलिए युद्ध और हिंसा से बचना।
कुछ हमें तय करना पड़ेगा, कौन है ठीक? कुछ हमें निर्णय लेने होंगे, क्या है सही?
लेकिन हम कहते हैं कि अतीत की आलोचना मत करो, अतीत का विचार मत करो। तब अतीत के हजारों-हजारों वर्षों में, हजारों-हजारों विचारों का जो संग्रह हमारे ऊपर इकट्ठा हो गया है वह सारा संग्रह हमारे प्राणों पर बैठा हुआ है। उस सारे संग्रह कि नीचे हम दबे जा रहे हैं और जी रहे हैं और हम कोई भी निर्णय नहीं ले पाते कि इस देश का व्यक्तित्व एक स्पष्ट निखार को उपलब्ध हो। शायद आपको पता न हो, इस देश में कितनी धाराएं रही हैं विचार की। वे सारी की सारी धाराएं भारतीय मस्तिष्क में इकट्ठी होकर बैठ गईं। वे बहुत विरोधी धाराएं हैं और उन विरोधी धाराओं के कारण हमारा व्यक्तित्व खंडित हो गया है, स्प्लिट हो गया है।
भारत में किसी आदमी के पास इंटिग्रेटेड पर्सनैलिटी जिसको हम कहें, एक समग्र समूचा व्यक्तित्व कहें, इकट्ठा व्यक्तित्व कहें, एक स्वर वाला व्यक्तित्व कहें, वह नहीं है। उसके भीतर न मालूम कितने स्वर हैं। उन सभी स्वरों के बीच उसे जीना पड़ता है। इससे एक मल्टि-पर्सनैलिटी, एक बहु-व्यक्तित्व भीतर पैदा हो गया है। जिसमें से कुछ निर्णय नहीं हो पाता कि हमारा स्वरूप क्या है, हमारा व्यक्तित्व क्या है, हम कहां खड़े हैं, वह हमें कुछ भी पता नहीं चल पाता। और इस सबके पीछे एक ही कारण है कि हमने अपने अतीत की आलोचना करने से भय दिखलाया है।
और अगर हम आगे भी यह जारी रखते हैं तो भारत की सारी प्रतिभा कुंठित हो गई है, और कुंठित हो जाएगी। बहुत स्पष्ट विचार होना चाहिए, बहुत स्पष्ट सूझ होनी चाहिए। न कोई गांधी का मूल्य है, न महावीर का, न कृष्ण का, मूल्य है इस देश के भविष्य का। अगर बड़े से बड़े महापुरुष को भी उस भविष्य के लिए छोड़ना पड़े, तो छोड़ने की तैयारी होनी चाहिए। सवाल यह नहीं है कि हम छोड़ दें, सवाल यह है कि इस देश का भविष्य महत्वपूर्ण है या इस देश के अतीत के महापुरुष महत्वपूर्ण हैं? बड़े से बड़े महापुरुष से पैदा होने वाला छोटे से छोटा बच्चा भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह भविष्य है, वह कल आएगा, वह कल जीएगा, कल वह बनेगा। उसको ध्यान में रखना है। लेकिन हमारा मुल्क, हमारी पूरी चिंता उनको ध्यान में रखती है जो जी चुके और जा चुके। यह समादर ठीक है, लेकिन यह समादर महंगा पड़ रहा है। आने वाले बच्चे का सम्मान चाहिए। उस बच्चे के सम्मान, उसके भविष्य, उसके जीवन के लिए विचार चाहिए।
हमें बहुत ही स्पष्ट, बहुत आदरपूर्वक अतीत की आलोचना करनी पड़ेगी। आलोचना का अर्थ निंदा नहीं है। यह भी एक अजीब पागलपन है। इस मुल्क में आलोचना करने का मतलब निंदा समझा जाता है। यह हमारी क्षुद्र बुद्धि का सबूत है। इसका मतलब यह है कि हम निंदा करने को ही आलोचना समझते हैं या आलोचना करने को निंदा समझते हैं।
गांधी की आलोचना, गांधी की निंदा नहीं है। मेरी बात की आप आलोचना करें, तो वह मेरी निंदा नहीं है, बल्कि मेरी बात की आलोचना करने से आप खबर देते हैं कि आपने मेरी बात को मूल्य दिया। इस योग्य समझा कि आप उस पर सोच रहे हैं। नहीं, आलोचना निंदा नहीं है, आलोचना सम्मान है। हम आलोचना हर किसी की नहीं करने बैठे जाते हैं, कोई ऐरे-गैरे की आलोचना करने सारा मुल्क नहीं बैठ जाएगा। जिसकी हम आलोचना करने बैठते हैं, हम यह मान कर चलते हैं कि उस व्यक्ति की आलोचना या उस व्यक्ति का विचार देश के हित या अहित में महत्वपूर्ण हो सकता है।
माक्र्स की मृत्यु हुई। उसकी मृत्यु पर थोड़े से मित्र, दस-बीस मित्र ही उसकी कब्र पर इकट्ठे थे। एंजिल्स ने उसकी कब्र पर बोलते हुए एक बात कही। एंजिल्स ने कहा कि माक्र्स एक महापुरुष था। मित्रों को हैरानी हुई, क्योंकि अगर महापुरुष था तो कुल बीस-पच्चीस लोग कब्र पर छोड?ने आए थे। मित्रों ने पूछा कि महापुरुष? तो एंजिल्स ने कहा कि मैं इसलिए कहता हूं महापुरुष माक्र्स को कि जो भी उसकी बात सुनेगा, उसे या तो माक्र्स के पक्ष में होना पड़ेगा या विपक्ष में होना पड़ेगा। दो के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। जो भी माक्र्स की बात सुनेगा, उसे या तो माक्र्स के पक्ष में होना पड़ेगा  या विपक्ष में होना पड़ेगा। माक्र्स की उपेक्षा कोई भी नहीं कर सकता है। इसलिए मैं कहता हूं, यह महापुरुष है।
यह बड़ी अदभुत बात कही एंजिल्स ने। माक्र्स के महापुरुष होने का कारण यह कि उसके विचार की उपेक्षा नहीं की जा सकती। आप इनडिफरेंट नहीं हो सकते उसके विचार के प्रति। आपको कोई न कोई निर्णय लेना ही पड़ेगा। चाहे पक्ष में, चाहे विपक्ष में। जिस मनुष्य के विचार के संबंध में हमें कोई न कोई निर्णय लेना ही पड़े उसको ही महापुरुष कहा जा सकता है, और किसी को नहीं। और जब आप अपने महापुरुष के विपक्ष में होने की सामर्थ्य तोड़ देना चाहते हैं। गांधी के विपक्ष में कोई न हो सके जब आप ऐसी कोशिश करते हैं, तो आपको पता नहीं, आप अपने हाथ से गांधी की जमीन खींच रहे हैं। क्योंकि जिस आदमी के विपक्ष में कोई नहीं हो सकता, ध्यान रहे, उसके पक्ष में भी कोई कभी नहीं होगा।
जिसके विपक्ष में कोई कभी नहीं हो सकता उसके पक्ष में भी कोई कभी नहीं होगा। जिसके विपक्ष में होने की जरूरत नहीं पड़ती उसके पक्ष में होने की भी कोई जरूरत नहीं पड़ती है। और जिसके विपक्ष में हमें होने की आवश्यकता नहीं है, हम तब ऊपरी तौर से कहते रहेंगे कि हम उसके पक्ष में हैं, लेकिन हमारे प्राण कभी उसके पक्ष में नहीं हो सकते हैं। हम पक्ष में उसी के हो सकते हैं, जिसके विपक्ष में होना भी जरूरी मालूम पड़ सकता हो।
 एक जमाना था, ईश्वर के विरोध में वे लोग समझे जाते थे जो नास्तिक थे, जो कहते थे ईश्वर नहीं है। पिछली सदी में एक विचारक ने लिखा कि नास्तिक फिर भी ईश्वर को आदर देते थे, क्योंकि वे ईश्वर को विचारणीय मानते थे। वे ईश्वर पर किताबें लिखते थे, तर्क करते थे और सिद्ध करना चाहते थे कि ईश्वर नहीं है। जमाना नास्तिकता से भी आगे जा चुका है। अब किसी से कहो कि ईश्वर, तो वह कहता है, छोड़ो, यह कोई बात करने योग्य नहीं है। नास्तिक तो ईश्वर को पूरा सम्मान देता है, हो सकता है आस्तिक से ज्यादा सम्मान देता हो। और सच तो यह है कि आस्तिक से ज्यादा सम्मान ही नास्तिक देता है, क्योंकि आस्तिक शायद ही कभी ईश्वर के संबंध में इतना विचार करता हो जितना नास्तिक करता है। और यह भी हो सकता है कि आस्तिक वे ही लोग बने बैठे हुए हैं जो ईश्वर के संबंध में विचार वगैरह नहीं करना चाहते, उस झंझट में नहीं पड़ना चाहते, कहते हैं, ठीक है, है, होगा, जरूर होगा, होना ही चाहिए।
लेकिन नास्तिक प्राणों की बाजी लगता है ईश्वर के लिए। उसके लिए ईश्वर एक लिविंग प्रॉब्लम है। उसे तय ही करना है कि ईश्वर है या नहीं, क्योंकि उसी तय करने पर उसका जीवन निर्भर करेगा कि वह किस तरह जीए।
आस्तिक कहता है कि है, और जीता इस तरह है जैसे नास्तिक को जीना चाहिए। आस्तिक कहता है कि है परमात्मा, मंदिर में पूजा कर आता है और जीता ऐसे है जैसे परमात्मा पृथ्वी पर कहीं भी न हो। यह आस्तिक का सम्मान है या उस नास्तिक का सम्मान है जो ईश्वर को प्राणों की बाजी लगा लेता है। सोचता है दिन और रात, विचार करता है, निर्णय करता है, तर्क करता है, संदेह करता है, सोचता है, खोजता है, ईश्वर है? वह उसके प्राणों का सवाल है। अगर होगा तो उसे जिंदगी बदलनी पड़ेगी, नहीं होगा तो जिंदगी दूसरी तरह की होगी। लेकिन नास्तिक ईश्वर को उपेक्षा के योग्य नहीं मानता।
हमारी नई सदी में लाखों लोग ऐसे हैं जो नास्तिक भी नहीं हैं। वे कहते हैं, ईश्वर, होगा या नहीं होगा, कोई प्रयोजन नहीं है। यह पहली दफा ईश्वर की मौत की खबर है। ईश्वर मरने के करीब पहुंच गया यह इसकी खबर है। नास्तिक ईश्वर को नहीं मरने देगा, लेकिन यह उपेक्षा, यह इनडिफरेंस कि ईश्वर की बात उठे और लोग कहें कि छोड़ो, कोई और बात करें। यह इनडिफरेंस ईश्वर की मौत हो सकती है। और आप जान कर हैरान होंगे, अगर दुनिया में नास्तिक न होते तो आस्तिक कभी के इनडिफरेंट हो चुके होते, उन्होंने कभी की फिक्र छोड़ दी होती ईश्वर की। वह जो नास्तिक विरोध किए जाता है, आलोचना किए जाता है, वह आस्तिक को बल देता रहता है कि वह सोचे, फिर सोचे, फिर सोचे ईश्वर है या नहीं।
दुनिया में विचार को जन्माने में, विचार को गतिमान करने में कंफर्मिस्ट जो होते हैं, स्वीकार करने वाले जो लोग होते हैं, आस्थावादी जो होते हैं, उन्होंने कोई भी हाथ नहीं बंटाया है।
आपको शायद पता न हो, वेद और उपनिषद से आकर भारत में विचार की धारा रुक गई थी, बिलकुल रुक गई थी। महावीर और बुद्ध, प्रबुद्ध कात्यायन, मक्खली गोशल, संजय वेलट्ठी पुत्त, इन सारे लोग ने वह धारा तोड़ी। इन सारे लोगों ने विरोध किया है--वेद का, उपनिषद का। महावीर जैसा आलोचक खोजने से मिलेगा दुनिया में? बुद्ध जैसा आलोचक खोजने से मिलेगा? बुद्ध और महावीर और दूसरे लोगों ने तोड़ दी सारी परंपरा। एक तूफान आ गया सारे मुल्क में। सारे मुल्क में चिंतन पैदा हुआ। उस चिंतन की धारा में फिर वसुबंधु और नागार्जुन और दिग्नाग और धर्मकीर्ति और कुंदकुंद और उमास्वाति और सारी परंपरा और शंकर और रामानुज और निंबार्क।
बुद्ध और महावीर ने जो आलोचना की उस आलोचना को उत्तर देने के लिए, उस आलोचना के पक्ष में खड़े होने के लिए एक हजार साल तक चिंतन चला। एक हजार साल तक जवाब खोजना पड़ा बुद्ध के लिए, महावीर के लिए। या बुद्ध और महावीर के पक्ष में दलील खोजनी पड़ी। एक हजार साल मुल्क की प्रतिभा ने मंथन किया। अदभुत-अदभुत अनुभव उस मंथन से उपलब्ध हुए। उस मंथन से शंकर जैसा आदमी पैदा हुआ, नागार्जुन जैसा अदभुत आदमी पैदा हुआ, उस मंथन से, उस आलोचना के परिणाम से। अगर बुद्ध और महावीर ने आलोचना न की होती तो हिंदुस्तान में शंकर और नागार्जुन के पैदा होने की कोई संभावना नहीं थी। वे उस आलोचना के प्रतिफल थे। लेकिन फिर शंकर के बाद आलोचना क्षीण पड़ गई। फिर शंकर को स्वीकार कर लिया गया। शंकर के बाद फिर आलोचना नहीं हो सकी, फिर एक हजार साल भारत में बुद्धि की दृष्टि से अकाल का समय बीता। फिर एक हजार साल तक आलोचना करने से हम भयभीत हो गए। क्योंकि बुद्ध और महावीर ने आलोचना की थी, तो हमें पंद्रह सौ साल तक उस आलोचना के लिए सोचना पड़ा था।
आदमी सोचना नहीं चाहता। आदमी सुस्त और काहिल है। वह समझता है कि बिना सोचे काम चल जाए तो बहुत अच्छा। तो पंद्रह सौ साल तक टक्कर लेनी पड़ी मस्तिष्क को, श्रम करना पड़ा। तो आदमी ने सोचा कि अब छोड़ो फिक्र, शंकर पर विश्वास कर लो। शंकर पर विश्वास कर लिया गया। हजार साल से फिर आलोचना बंद हो गई। फिर हिंदुस्तान में, इन हजार सालों में उस तरह के लोग पैदा न हो सके कि नागार्जुन, बुद्ध या महावीर पैदा हो सकते। वे नहीं पैदा हो सके।
अब भारत का पुनर्जागरण का युग आया। देश स्वतंत्र हुआ। अगर इस स्वतंत्रता के साथ भारत के मस्तिष्क में आलोचना की शक्ति नहीं जगती है तो हिंदुस्तान की प्रतिभा का जन्म नहीं होगा, यह मैं आपसे कह देना चाहता हूं। चाहिए तीव्र आलोचना कि हिंदुस्तान में पचास वर्षों तक दस-पच्चीस तीव्र आलोचक पैदा हों जो हिंदुस्तान की जड़ें हिला दें। उसके मस्तिष्क को हिला दें। तो हम आने वाली सदी में फिर बुद्ध और महावीर और शंकर जैसे लोग पैदा कर सकेंगे। नहीं तो हम पैदा नहीं कर सकेंगे। मगर हम बिलकुल नपुंसक, इंपोटेंट हो गए हैं। हमारी जान निकलती है जरा सा विचार करने में, जरा सा विचार, जरा सी आलोचना, हमारे प्राण कंपते हैं। इतनी कमजोर कौम प्रतिभा पैदा नहीं कर सकती है। इतनी कमजोर कौम कैसे प्रतिभा पैदा करेगी? प्रतिभा तो एक साधना है, प्रतिभा तो एक श्रम है।
आपको पता है कि तीन सौ वर्षों में यूरोप में जो भी विकास हुआ है वह किन लोगों की वजह से हुआ है? आस्तिकों की वजह से? श्रद्धा करने वालों की वजह से? कंफर्मिस्ट लोगों की वजह से? आर्थोडाक्स लोगों की वजह से? रूढ़िग्रस्त लोगों की वजह से? रूढ़िग्रस्त लोगों की वजह से दुनिया में कभी कोई विकास नहीं हुआ। किसके द्वारा विकास हुआ है? उन विद्रोहियों की वजह से जिन्होंने सारी रूढ़ि तोड़ने की हिम्मत की, जिन्होंने संदेह किया, विश्वास नहीं। जिन्होंने आलोचना की, आस्था नहीं।
तीन सौ वर्ष के उन वाल्तेयर, या रूसो, या दीदरो, या नीत्शे, या फ्रायड और माक्र्स ऐसे लोगों की वजह से पश्चिम की प्रतिभा को झकझोड़ मिला। प्रतिभा चौंक गई। उत्तर खोजना जरूरी हो गया। या तो पक्ष या विपक्ष में होना पड़ेगा। कोई विकल्प न रहा कि आप चुपचाप अपनी सुस्ती में और उपेक्षा में बैठे रहें। अब नीत्शे को सुनिएगा तो उसका पक्ष या विपक्ष, कहीं न कहीं आपको होना पड़ेगा। आप यह नहीं कह सकते कि ठीक है, सुन लिया। आपको यह कहना ही पड़ेगा कि नीत्शे ठीक है या गलत है। दो के अतिरिक्त तीसरा कोई रास्ता नहीं है।
और जब आपको किसी को ठीक या गलत कहने के लिए सोचना पड़ता है तो आपकी प्रतिभा में अंकुर आने शुरू होते हैं। लेकिन जब आप कहते हैं आलोचना करनी ही नहीं है, आलोचना विध्वंसात्मक है, हमें तो जो कहना है वह कहना चाहिए। तो दुनिया के सभी श्रेष्ठ विचारक विध्वंसात्मक थे, लेकिन बाद में हमें याद भी नहीं रह जाता कि वे कितने बड़े आलोचक रहे होंगे, कितने बड़े आलोचक रहे होंगे। और कैसी तीव्र आलोचना की होगी। हम तो समझते हैं कि आलोचना यानी गाली-गलौज हो गई।
यह जो हमारी आज की धारणा है, इस धारणा को बिलकुल आग लगा देने की जरूरत है। एक-एक बच्चे को संदेह सिखाया जाना चाहिए, डाउट सिखाया जाना चाहिए। एक-एक बच्चे को क्रिटिकल होने की, आलोचनात्मक होने की प्रेरणा देनी चाहिए। एक-एक बच्चे को--मां-बाप को, गुरु को कहना चाहिए कि हमारी बात मान मत लेना, विचार करना, सोचना, झगड़ना, हिम्मत से हमसे लड़ना। अगर तुम्हारे विवेक को स्वीकार हो तो ही मानना अन्यथा मत मानना। अगर हम इतनी हिम्मत दिखाएंगे तो हिंदुस्तान की प्रतिभा विकसित होगी, अन्यथा नहीं विकसित हो सकती। क्या करूं? आपकी बात मान लूं, आलोचना नहीं करनी चाहिए? या कि यह देखूं कि आने वाले मुल्क का भविष्य आलोचना से ही पैदा हो सकता है?
मैंने कल शायद कहा कि राधाकृष्णन कोई विचारक नहीं हैं। बस चिट्ठियां आ गईं कि आपने बहुत बुरा काम कर दिया आपने राधाकृष्णन को ऐसा कैसे कह दिया?
राधाकृष्णन विचारक हैं या नहीं, यह सोचना चाहिए। मैंने कह दिया कोई मान लेने की जरूरत है? मैं कहता हूं कि नहीं हैं विचारक--मैं कहता हूं तो मैं उसके लिए दलील देता हूं। आप सोचिए कि हैं विचारक तो दलील खोजिए। बस इतना ही मैं चाहता हूं कि विचार की प्रक्रिया चले। हो सकता है कि राधाकृष्णन विचारक सिद्ध हों विचार करने से और मेरी बात गलत सिद्ध हो। लेकिन मुझे कहना नहीं चाहिए यह कौन सी बात हुई?
मुझे जो लगता है वह मुझे कहना चाहिए। मुझे लगता है कि राधाकृष्णन कोई विचारक नहीं हैं। केवल एक टीकाकार हैं, एक व्याख्याकार हैं, एक अनुवादक हैं। एक अच्छे अनुवादक हैं, एक अच्छे कमेंटेटर हैं, एक अच्छे टीकाकार हैं। उन्होंने पूरब की सारी धारणाओं को पश्चिम में जितनी सुंदरता से पहुंचाया उतना कोई मनुष्य कभी भी नहीं पहुंचाया। लेकिन विचारक वे नहीं हैं। उन्होंने एक नये विचार को जन्म नहीं दिया। उनकी सारी किताबों में एक भी सूत्र ऐसा नहीं है जो उनकी मौलिक प्रतिभा से जन्मा हो। वे सब गीता, उपनिषद और वेदों के उधार सूत्र हैं। विचारक वे नहीं हैं, विचारक होने का कोई सवाल नहीं है उनका। लेकिन हमने कुछ ऐसी हालत पकड़ ली है कि जिस आदमी की हम प्रशंसा करेंगे उसकी हम सब तरह से प्रशंसा करेंगे। हम फिर कोई हिस्सा नहीं छोड़ सकते उसका कि वह न हो, वह सभी होना चाहिए।
हिंदुस्तान में एक पागल भाव पैदा हो गया है कि हमारे महापुरुष में सभी कुछ होना चाहिए। दुनिया के किसी महापुरुष में सभी कुछ नहीं होता। अगर आप महावीर के पास पूछने जाएंगे कि साइकिल का पंचर कैसे सुधारा जा सकता है? तो महावीर नहीं बता सकते। इसके लिए तो साइकिल का जो, कोने पर बैठा हुआ, एक टपरा लगाए हुए बैठा हुआ आदमी वही बता सकेगा। लेकिन हमारी धारणा यह कि महावीर सर्वज्ञ हैं। वे ही सभी कुछ जानते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं जिसको वे नहीं जानते। पागलपन की बातें हैं।
बुद्ध ने मजाक उड़ाया है इस धारणा का जैनियों की । बुद्ध ने कहा है कि एक ज्ञानी हैं। उनके भक्त कहते हैं कि वे सर्वज्ञ हैं, वे त्रिकालज्ञ हैं, वे तीनों काल जानते हैं। लेकिन उन्हीं ज्ञानी को मैंने ऐसे घरों के सामने भिक्षा मांगते देखा है जहां बाद में पता चलता है घर में कोई है ही नहीं। मैंने उन्हीं ज्ञानी को रास्ते पर चलते हुए कुत्ते की पूंछ पर पैर पड़ते देखा है। बाद में पता चलता है कि अंधेरे में कुत्ता सोया हुआ था और उनके भक्त कहते हैं कि वे त्रिकालज्ञ हैं, तीनों काल जानते हैं!
बुद्ध बड़े महिमाशाली हैं। लेकिन शंकर कहते हैं कि मैंने सुना है कि भगवान ने बुद्ध को इसलिए अवतार दिया, यह कहानी शंकर ने गढ़ी, कहानी शंकर ने गढ़ी कि मैंने सुना है कि नरक और स्वर्ग बनाए भगवान ने। लेकिन नरक में कोई जाता ही नहीं था, तो नरक का जो अधिकारी था उसने भगवान को जाकर कहा, नरक में कोई आता ही नहीं, तो मुझे किसलिए बैठाया हुआ है? तो भगवान ने बुद्ध को अवतार दिया कि तुम जाकर लोगों को भ्रष्ट करो ताकि वे नरक जा सकें।
तो शंकर गलत कह रहे हैं? शंकर गलत कह रहे हैं और सही कह रहे हैं यह सोचने की बात है। लेकिन शंकर को कहने का हक है। शंकर को कहने का हक है, जो उसे ठीक लगता है वह कह रहा है। उसे लगता है कि बुद्ध ने लोगों को भ्रष्ट किया। बुद्ध ने, जिनके लिए हम सोचते हैं उनके जैसा महापुरुष जगत में कोई पैदा नहीं हुआ। लेकिन शंकर कहता है कि भ्रष्ट किया है। और शंकर की उम्र कितनी है? शंकर ने जब यह बात कही तब उसकी उम्र तीस साल है। लेकिन अच्छे लोग रहे होंगे, शंकर की बात भी उन्होंने सुनी। न तो पत्थर मारे, न कहा कि बहिष्कार कर देंगे। शंकर के समय तक बुद्ध तो भगवान हो चुके थे। और एक छोकरे ने, एक गरीब घर के छोकरे ने कहना शुरू कर दिया कि नहीं, यह भ्रष्ट करने को आदमी पैदा हुआ है। इसने दुनिया को बनाया नहीं, बिगाड़ा। हिम्मतवर लोग थे। जब इतनी हिम्मत होती है तो विचार विकसित होता है।
हमने सारी हिम्मत खो दी है। और फिर हम चाहते हैं कि हम विचारशील हो जाएं। हम विचारशील नहीं हो सकेंगे। विचार का जन्म होता है संदेह से, विचार का जन्म होता है संघर्ष से, विचार का जन्म होता है आलोचना से। इसलिए यह मत कहें मुझसे कि मैं आलोचना न करूं!
मैं तो आलोचना करूंगा और जितना आप कहेंगे उतना खोज-खोज कर करूंगा। और एक-एक महापुरुष का पीछा करूंगा, क्योंकि मुझे जरूरत मालूम होती है। मुझे जरूरत मालूम होती है, मुझे आवश्यकता लगती है कि इस समय देश के लिए सबसे बड़ी जरूरत अगर कुछ है तो वह यह है, इस समय देश का हजारों साल से रुका हुआ विचार का अवरुद्ध प्रवाह टूट जाए, बहने लगे हमारी सरिता फिर से। फिर से हम सोचने लगें, फिर से हम पूछने लगें, फिर से इंक्वायरी पैदा हो जाए। कैसे अदभुत लोग रहे होंगे। खोजते थे कितने दूर-दूर तक, कितनी दूर-दूर तक यात्राएं करते थे। नालंदा में दस हजार विद्यार्थी थे। सारे हिंदुस्तान के कोने-कोने से हिंदुस्तान के बाहर से अफगानिस्तान से और बर्मा से और चीन से हजारों मील की पैदल यात्रा करके आते थे संदेह सीखने, तर्क सीखने, पूछने, जिज्ञासा करने।
एथेंस में जहां विचार का जन्म हुआ यूरोप में, थोड़े से दिनों में एक आदमी ने विचार को जन्म दिला दिया--उस साक्रेटीज ने। क्या किया साक्रेटीज ने? साक्रेटीज ने जिंदगी के सारे मसले फिर से उठा दिए। एक-एक प्रश्न फिर से खड़ा कर दिया। एक-एक प्रश्न को जो हम समझते थे हल हो गया, फिर से जिंदा बना दिया। जब सारे प्रश्न जिंदा हो गए तो सोचना मजबूरी हो गई। उस सोचने से अरस्तू पैदा हुआ, प्लेटो पैदा हुआ, प्लेटीनस पैदा हुआ। वे सारे के सारे लोग पैदा हुए। सारे यूरोप की धारा पैदा हुई एक आदमी से, साक्रेटीज से। क्योंकि उसने क्वेश्चनिंग पैदा कर दी। उसने एक भी प्रश्न को नहीं रहने दिया। अस्तव्यस्त कर दिए सारे उत्तर। अतीत ने जो भी उत्तर दिए थे, सब गड़बड़ कर दिए और आदमी को वहां खड़ा कर दिया जहां वह पूछे: क्या है सत्य?
साक्रेटीज से लोग कहते कि तुम उत्तर दो। तुम तो बताओ कि सत्य क्या है। वह कहता, यह मेरा काम नहीं। मेरा काम यह है बताना कि सत्य क्या नहीं है। सत्य क्या है वह तो तुम्हारे भीतर जिज्ञासा पैदा हो जाएगी तो तुम खोज लोगे। असत्य क्या है वह मैं बता दूं, मेरा काम पूरा हो जाता।
साक्रेटीज ने कहा, मैं तो एक मिडवाइफ की तरह हूं, एक दाई की तरह हूं। मेरा काम बच्चे को जन्माना नहीं है, केवल बच्चों के लिए द्वार दे देना है कि वह जन्म जाए। बच्चा तो तुमसे पैदा होगा। मैं बच्चा नहीं पैदा कर सकता हूं।
साक्रेटीज ने कहा, मैं तो संदेह पैदा करूंगा।
साक्रेटीज से लोग डरते थे। अगर रास्ते पर मिल जाए तो नमस्कार करने में डरते थे। क्योंकि उससे नमस्कार की कि कोई झंझट खड़ी हो जाए। तो तुमने नमस्कार की, तो वह फौरन पूछेगा, आपने नमस्कार क्यों की? अब आप कुछ तो कहेंगे, आप कुछ कहेंगे और डायलाग शुरू हो जाएगा।
साक्रेटीज से लोग बचने लगे। वे यह देख लेते कि वह आ रहा है, वे दूसरी गली से निकल जाते। लेकिन उस अकेले आदमी ने मौत पर खेल कर...क्योंकि इसका बदला लिया है एथेंस के लोगों ने उससे। हम उस आदमी से बदला लेते हैं जो हमारा अज्ञान प्रकट कर देता है। इसका पता है आपको? हम उस आदमी से हमेशा बदला लेते हैं जो हमारा अज्ञान प्रकट कर देता है। क्योंकि वह हमारे अहंकार को चोट पहुंचा देता है। जिस बात को हम समझते थे हम जानते हैं, वह आकर बता देता है कि नहीं जानते। बहुत गुस्सा आता उस आदमी पर कि हम तो माने बैठे थे कि हम जानते थे, निश्चिंत हो गए थे, खोज पूरी हो गई थी। इस आदमी ने फिर झंझट खड़ी कर दी। यह फिर इसने ऐसी बातें उठा दीं जिनसे शक पैदा होता है कि हम जानते हैं या नहीं जानते? गुस्सा आता है उस आदमी पर। ऐसे आदमी से हमने हमेशा बदला लिया है।
सारे एथेंस के लोग परेशान हो गए, क्योंकि साक्रेटीज ने सारे पुराने ज्ञान को भूमिसात कर दिया, पुराने भवन को गिरा दिया। एक-एक आदमी की आस्था की जमीन खींच ली, एक-एक आदमी अंधेरे में लटक गया और एक-एक आदमी कहने लगा, यह आदमी बहुत खतरनाक है। इस आदमी से छुटकारा चाहिए। यह हमें शांति से न जीने देगा।
साक्रेटीज पर उन्होंने मुकदमा चलाया और कहा कि यह साक्रेटीज लोगों का दिमाग खराब करता है। यह हमारे युवकों का दिमाग बिगाड़ता है। इस आदमी को फांसी होनी चाहिए। इसको जहर पिलाना चाहिए। साक्रेटीज से अदालत के अध्यक्ष ने कहा, क्योंकि साक्रेटीज बहुत प्यारा आदमी था। मजिस्ट्रेट ने उसे कहा कि साक्रेटीज अगर तुम यह वचन दे दो कि आगे से तुम सत्य की बातें नहीं करोगे तो हम तुम्हें छोड़ सकते हैं। साक्रेटीज ने कहा, कि वह तो मेरा धंधा है सत्य की बातें करना। अगर वह धंधा ही छूट जाए तो मैं जीकर भी क्या करूंगा?
साक्रेटीज से वह अध्यक्ष कह रहा है अदालत का कि तुम सत्य की बातें और जिज्ञासा और प्रश्न खड़े नहीं करोगे। साक्रेटीज वहीं अदालत में पूछता है, क्या महानुभव मैं पूछ सकता हूं, सत्य क्या है? यह तो पक्का हो जाए पहले कि सत्य क्या है, तो फिर मैं सोचूं भी कि उसे छोड़ना कि नहीं छोड़ना। सत्य का अर्थ क्या है? सत्य कहां है?
वह अध्यक्ष बोला कि यही तो हम कहते हैं कि यह सब बकवास तुम छोड़ दो।
साक्रेटीज ने कहा कि मैं जिंदगी छोड़ दूंगा, लेकिन यह नहीं छोडूंगा। क्योंकि सत्य से ज्यादा प्यारा कुछ भी नहीं है। और सत्य की खोज में जिसे जाना है, उसे झूठे ज्ञान को छोड़ना पड़ता है। लोग मुझसे नाराज हो गए हैं क्योंकि मैंने उनसे झूठा ज्ञान छीन लिया है और सच्चे ज्ञान पर जाने के लिए वे हिम्मत और साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। इसलिए एक वैक्यूम, एक शून्य पैदा हो गया है। लेकिन मैं यह शून्य पैदा करता रहूंगा या मर जाऊं या जिंदा रहूंगा तो सत्य बोलता रहूंगा। सत्य के बिना मैं कैसे जी सकता हूं?
उस आदमी ने मर जाना पसंद किया, लेकिन उसी आदमी ने एथेंस की संस्कृति को आकाश तक उठा दिया। उस अकेले आदमी ने जिसका खून किया गया, जिसको जहर पिलाया गया, उस एक आदमी की वजह से पश्चिम की सारी संस्कृति की गंगा पैदा हुई। उसकी गंगोत्री साक्रेटीज में है।
हिंदुस्तान में साक्रेटीज, सुकरात जैसे लोगों की जरूरत है ताकि हजारों साल का बंधा हुआ प्रवाह टूट जाए, मुक्त हो सके। हिंदुस्तान फिर सोच सके, फिर विचार कर सके। हमें खयाल ही नहीं, हम जितना विश्वास कर लेते हैं उतना ही विचार करना मुश्किल हो जाता है। विश्वास विचार की हत्या है। जितना हम विश्वास करते हैं उतनी विचार की कोई जरूरत नहीं रह जाती है। विचार की जरूरत तो तब पैदा होती है जब हम विश्वास नहीं करते। जब हम मान लेते हैं कि गांधी महात्मा हैं, काम खत्म हो गया। बच्चे को हमने कह दिया कि वे महात्मा हैं, बात खत्म हो गई। बच्चे को पूछना चाहिए कि महात्मा वे कैसे हैं? क्यों हैं? वही महात्मा क्यों हैं और कोई महात्मा क्यों नहीं हैं? ऐसी बात क्या है जिसे हम महात्मा मानें? लेकिन बाप कहेगा कि नहीं, इतनी बातचीत की जरूरत नहीं है। हम जो कहते हैं वह मानो!
हमेशा पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी से कहती है, हम जो कहते हैं वह मानो! यह पुरानी पीढ़ी की कमजोरी बताती है, ताकत नहीं। क्योंकि जब भी कोई आदमी कहता है, मैं जो कहता हूं मानो, तो वह बता रहा है कि वह कमजोर आदमी है। उसको अपनी बात मनवाने के लिए विवेक को जगाने का विश्वास वह नहीं कर सकता। वह डंडे के बल पर कह रहा है कि मैं जो कहता हूं वह मानो! मानना पड़ेगा! मेरी उम्र ज्यादा है! मेरा अनुभव ज्यादा है! मैंने जिंदगी देखी है! देखी होगी जिंदगी आपने। लेकिन जो जिंदगी आपने देखी, ये बच्चे उस जिंदगी को कभी नहीं देखेंगे। ये दूसरी जिंदगी देखेंगे। कृपा करके अपनी जिंदगी का ज्ञान इनकी छाती पर मत थोपों। इनको मुक्त करो ताकि ये जो नई जिंदगी देखेंगे उसको देख सकें। लेकिन नहीं, हम भयभीत लोग, कहीं ज्ञान न खो जाए, कहीं आस्था न खो जाए, कहीं विश्वास न खो जाए, कहीं श्रद्धा न खो जाए, कहीं सब खो न जाए। और है हमारे पास कुछ भी नहीं। सब खोया हुआ है। सिर्फ धुआं-धुआं है। कुछ भी नहीं है हमारे पास।
मैंने सुनी है एक कहानी। एक सम्राट के दरबार में एक आदमी ने आकर कहा था कि मैं स्वर्ग से वस्त्र ला सकता हूं तुम्हारे लिए। उस सम्राट ने कहा, स्वर्ग के वस्त्र? सुने नहीं कभी, देखे नहीं कभी। उस आदमी ने कहा, मैं ले आऊंगा, देख भी सकेंगे, पहन भी सकेंगे। लेकिन बहुत खर्च करना पड़ेगा। कई करोड़ रुपये खर्च हो जाएंगे। क्योंकि रिश्वत की आदत देवताओं तक पहुंच गई है। जब से ये दिल्ली के राजनीतिज्ञ मर-मर कर स्वर्ग पहुंच गए हैं तब से रिश्वत की आदत वहां पहुंच गई। वहां भी रिश्वत जारी हो गई है, क्योंकि देवता कहते हैं हम आदमियों से पीछे थोड़े ही रह जाएंगे। और यहां पांच रुपये की रिश्वत चलती है, वहां तो करोड़ों से नीचे बात नहीं होती, क्योंकि देवताओं का लोक है।
सम्राट ने कहा, कोई हर्ज नहीं, लेकिन धोखा देने की कोशिश मत करना! करोड़ों रुपये देंगे तुम्हें, लेकिन भागने की कोशिश मत करना! मुश्किल में पड़ जाओगे। उसने कहा, भागने का सवाल नहीं है। महल के चारों तरफ पहरा कर दिया जाए, मैं महल के भीतर ही रहूंगा। क्योंकि देवताओं का रास्ता सड़कों से होकर नहीं जाता, वह तो अंतरिक्ष यात्रा है अंदर की। वहीं से अंदर से कोशिश करूंगा। आप घबड़ाइए मत। तलवारें नंगी लगा दी गईं। उस आदमी ने छह महीने का समय मांगा और छह महीने में कई करोड़ रुपये सम्राट से ले लिए। दरबारी हैरान थे और चिंतित थे। लेकिन सम्राट ने कहा, घबड़ाहट क्या है, जाएगा कहां, रुपये लेकर जाएगा कहां महल के बाहर।
छह महीने पूरे होने पर सारी राजधानी में हजारों लोग इकट्ठे हो गए, लाखों लोग इकट्ठे हो गए देखने को। वह आदमी ठीक समय बारह बजे, जो उसने दिया था, एक बहुमूल्य पेटी लिए हुए महल के बाहर आ गया। अब तो कोई शक की बात न थी। वह सब जुलूस पूरा का पूरा राजमहल पहुंचा। दूर-दूर के राजा, सम्राट, धनपति दरबार में इकट्ठे थे देखने को। उस आदमी ने पेटी वहां रखी और कहा, महाराज यह ले आया। ये वस्त्र आ गए। अब आप मेरे पास आ जाएं। मैं देवताओं के वस्त्र दे दूं। आप पहन लें।
महाराज ने अपनी पगड़ी दी। उसने पगड़ी उस पेटी में डाल दी। वहां से खाली हाथ बाहर निकाला और कहा, महाराज यह पगड़ी दिखाई पड़ती है? हाथ में कुछ भी न था। महाराज ने गौर से देखा। उस आदमी ने कहा, खयाल रहे, देवताओं ने चलते वक्त मुझसे कहा था यह पगड़ी और ये कपड़े उसी को दिखाई पड़ेंगे जो अपने ही बाप से पैदा हुआ हो। उस सम्राट ने कहा, हां-हां, दिखाई पड़ती है, क्यों दिखाई नहीं पड़ेगी। बड़ी सुंदर पगड़ी है, बड़ी सुंदर पगड़ी है, ऐसी पगड़ी न तो कभी देखी, न सुनी।
दरबारियों ने सुना। किसी को भी पगड़ी दिखाई नहीं पड़ती थी। पगड़ी होती तो दिखाई पड़ती। लेकिन दरबारियों ने देखा कि इस वक्त यह कहना कि नहीं दिखाई पड़ती है, व्यर्थ अपने मरे हुए बाप पर शक पैदा करवाने से क्या फायदा है। पगड़ी से हमको लेना-देना क्या है। अपने बाप को बचाओ, पगड़ी से प्रयोजन क्या है। वे भी तालियां बजाने लगे और कहने लगे, धन्य महाराज, धन्य! पृथ्वी पर ऐसा अवसर कभी नहीं आया। ऐसी पगड़ी कभी देखी नहीं गई। एक-एक आदमी अपने मन में सोच रहा था कि बड़ी गड़बड़ बात है। लेकिन उसने देखा कि सारे लोग कहते हैं कि पगड़ी है तो उसने सोचा कि हो सकता है अपने बाप गड़बड़ रहे हों, लेकिन यह भी किसी से कहने की बात नहीं है। अपने भीतर जान लिया, वह ठीक है। अपना राज अपने घर में रखो। जब सारे लोग कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे।
हमारी यही दलील है कि सारे लोग कहते हैं तो ठीक कहते होंगे। जब पूरा हिंदुस्तान कहता है कि फलां आदमी महावीर भगवान है, फलां आदमी बुद्ध पैगंबर है, फलां आदमी महात्मा है, तो ठीक ही कहता होगा। जब सब लोग कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। अब अकेले क्यों झंझट में पड़ना। उन लोगों ने सोचा, अपनी झंझट। जिसको जितना डर लगा वह उतना बाहर आगे आ गया और कहने लगा कि अहा महाराज, धन्य हैं। क्योंकि उसे लगा कि कहीं मैंने धीरे-धीरे कहा तो आस-पास के लोगों को शक न हो जाए कि यह आदमी थोड़े धीरे-धीरे बोलता है।
जितने चोर होते हैं दुनिया में उतने जोर से चिल्लाते हैं कि चोरी किसने की है। चोर को पकड़ो। वे चोर चिल्लाते हैं ये बातें ताकि किसी को शक न हो जाए कि यह आदमी कुछ भी नहीं चिल्ला रहा, कहीं चोर न हो। रिश्वतखोर चिल्लाते हैं कि मुल्क से रिश्वत बंद होनी चाहिए, बेईमान नेता मुल्क के सामने भाषण देते हैं और कहते हैं कि भ्रष्टाचार नष्ट करना है। और जितने जोर से मंच पर चिल्लाते हैं भ्रष्टाचार नष्ट करना है, जनता समझती है यह बेचारा तो कम से कम भ्रष्टाचारी नहीं होगा, नहीं तो इतना भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलता? और जनता को पता नहीं कि भ्रष्टाचारी को भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना ही पड़ता है।
सम्राट ने देखा कि जब सारा दरबार कह रहा है तो समझ गया वह कि अपने पिता गड़बड़ रहे हैं। अब कुछ बोलना ठीक नहीं। जो कुछ हो, कपड़े हों या न हों, स्वीकार कर लेना ठीक है। पगड़ी पहन ली उसने जो थी ही नहीं। कोट पहन लिया उसने जो था ही नहीं। एक-एक वस्त्र उसका छीनने लगा, वह नंगा होने लगा। आखिरी वस्त्र रह गया तब वह घबड़ाया कि यह तो बड़ी मुश्किल बात है। कहीं कपड़े मालूम नहीं होते। बस आखिरी अंडरवियर रह गया। अब यह भी जाता है।
और उस आदमी ने कहा कि महाराज यह अंडरवियर देवताओं का पहनिए, इसको निकालिए। अब वह जरा घबड़ाया। यहां तक तो गनीमत थी। और दरबारी हैं कि ताली पीटे जा रहे हैं कि महाराज कितने सुंदर मालूम पड़ रहे हैं इन वस्त्रों में आप। और महाराज बिलकुल नंगे हो गए हैं। वे नंगे खड़े हुए हैं।
उस आदमी ने धीरे से कहा, महाराज घबड़ाइए मत। सबको अपने बाप की फिक्र है। जल्दी निकालिए, नहीं तो झंझट हो जाएगी, लोगों को पता चल जाएगा।
उन्होंने जल्दी अंडरवियर निकाल दिया, क्योंकि यह तो घबड़ाहट का मामला था। वे बिलकुल नग्न खड़े हो गए और दरबारी तो नाच रहे हैं खुशी में कि धन्य हैं महाराज और एक-एक आदमी को राजा नंगा दिखाई पड़ रहा है। लेकिन अब कोई उपाय नहीं है। रानी भी देख रही है कि राजा नंगा है, लेकिन कुछ कह नहीं सकती। वह भी ताली पीट रही, कह रही, महाराज इतने सुंदर आप कभी नहीं दिखाई पड़े।
और तब उस आदमी ने कहा कि महाराज देवताओं ने मुझसे कहा था कि जब यह वस्त्र महाराज पहन लें तो उनकी शोभा-यात्रा, उनका प्रोसेशन निकाला जाना चाहिए। राजधानी में हजारों लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं, रास्ते के किनारों पर लाखों लोग खड़े हैं। वे कहते हैं, हम महाराज के दर्शन करेंगे। रथ तैयार है, आप कृपा करके रथ पर सवार होइए। आप बाहर चलिए।
अब महाराज और भी घबड़ाए। अभी तक तो कम से कम दरबारी थे, अपने ही मित्र थे, परिचित थे, घर के लोग थे। यह झंझट। उस आदमी ने राजा के कान में कहा, आप घबड़ाइए मत, आपके रथ के पहले एक डुगडुगी पिटती चलेगी और खबर की जाएगी कि ये वस्त्र उसी को दिखाई पड़ेंगे जो अपने ही बाप से पैदा हुआ। आप घबड़ाइए मत। जैसे आदमी ये भीतर हैं वैसे ही आदमी बाहर हैं। सब तरफ एक से एक बेवकूफ आदमी हैं। आप घबड़ाइए मत। और अगर आपने इनकार किया कि मैं बाहर नहीं जाता हूं, तो लोगों को शक हो जाएगा, आपके पिता पर शक हो जाएगा।
राजा ने कहा, चलो भाई। क्योंकि यह पिता पर ही शक।
एक दफा आदमी झूठ में फंस जाए तो फिर कहां रुके यह बहुत मुश्किल हो जाता है। जो आदमी झूठ में पहले ही कदम पर रुक जाता है वह रुक सकता है। जो दस-पांच कदम आगे चल गया फिर बहुत मुश्किल हो जाती है। लौटना भी मुश्किल, आगे जाना भी मुश्किल। उस बेचारे गरीब सम्राट को नंगा जाकर रथ पर खड़ा होना पड़ा। उसके सामने ही डुगडुगी पिटने लगी कि ये वस्त्र सम्राट के सुंदर वस्त्र देवताओं के वस्त्र हैं। ये वस्त्र उन्हीं को दिखाई पड़ेंगे जो अपने ही बाप से पैदा हुए हैं। और सबको वस्त्र दिखाई पड़ने लगे। एकदम प्रशंसा होने लगी।
गांव में खबर तो पहले ही पहुंच गई थी यह। सब लोग तैयार होकर आए थे कि अपने बाप की रक्षा करनी है और वस्त्र भी देखने थे। वस्त्र तो दिखाई न पड़ते थे। राजा नंगा था। लेकिन सारा जनसमूह कहने लगा कि ऐसे सुंदर वस्त्र सपनों में भी नहीं देखे, लेकिन कुछ छोटे बच्चे अपने बापों के कंधों पर चढ़ कर आ गए थे, वे अपने बाप से कहने लगे, पिताजी, राजा नंगा है! उनके पिताजी ने कहा, चुप नासमझ! अभी तेरा ज्ञान कम है, अभी तेरी उम्र कम है। ये बातें अनुभव से आती हैं, ये बड़ी गहरी बातें हैं। जब मेरे उम्र का हो जाएगा, अनुभव मिल जाएगा तो वस्त्र दिखाई पड़ने लगेंगे। ये बड़े अनुभव से दिखाई पड़ते हैं। जो बच्चे चुप नहीं हुए, उनके मां-बाप उनका मुंह बंद करके भीड़ के पीछे खिसक गए। क्योंकि बच्चों का क्या भरोसा, आस-पास के लोग सुन लें कि इस आदमी के लड़के ने यह कहा है!
हमेशा भीड़ के भय के कारण हम सत्यों को स्वीकार किए बैठे रहते हैं, भीड़ का भय, फियर ऑफ क्राउड। जिसको हम सत्य मान कर बैठें हैं वह सत्य है? या सिर्फ भीड़ का भय है कि चारों तरफ के लोग क्या कहेंगे? चारों तरफ के लोग जिसको मानते हैं उसको हम भी मानते हैं। ऐसा आदमी सत्य की खोज में कभी भी नहीं जा सकता है, जो भीड़ को स्वीकार कर लेता है।
सत्य की खोज भीड़ से मुक्त होने की खोज है। वह जो पब्लिक ओपिनियन है, वह जो भीड़ का मत है, उसको जो पकड़ कर बैठ जाता है वह आदमी सत्य की यात्रा में एक कदम भी नहीं उठा सकता, क्योंकि भीड़ एक-दूसरे से भयभीत है। आप जिनसे भयभीत हैं वे आपसे भयभीत हैं, यह म्युचुअल फियर है, इससे छुटकारा बहुत मुश्किल है। और लोग क्या कहेंगे, दुनिया क्या कहेगी, जब सब लोग ऐसा मानते हैं तो ठीक ही होगा। सत्य की ये धारणाएं सत्य की धारणाएं नहीं असत्य को सत्य बनाने की तरकीबें हैं। वह जो फॉल्स है, जो मिथ्या है, जो झूठा है, उसको भीड़ के द्वारा बल इकट्ठा किया जाता है। सत्य तो अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। लेकिन असत्य को भीड़ का मत चाहिए, उसके बिना खड़ा नहीं हो सकता।
इसीलिए तो दुनिया में जब असत्य को फैलाना हो, जब असत्य को प्रचारित करना हो तो एक आदमी हिम्मत नहीं जुटा पाता। भीड़ चाहिए, भीड़ के साथ प्रचार चाहिए, भीड़ के साथ भय चाहिए, क्योंकि भय के बिना भीड़ भी मानने को राजी नहीं होगी। इसलिए वे कहते हैं कि अगर ईश्वर को नहीं माना, तो नरक जाना पड़ेगा। अब नरक जाने की तैयारी किसी की भी नहीं हो सकती। ईश्वर को न मानने की तैयारी बहुत लोगों की हो सकती है, लेकिन नरक जाने की तैयारी और फिर नरक का चित्र कि वहां आग के कड़ाहे जल रहे हैं अनंत काल से, तेल भरा है उनमें, न तेल चुकता है, न आग चुकती है और आदमी उनमें सड़ाए जा रहे हैं, जलाएं जा रहे हैं। आदमी मरता भी नहीं है उस कड़ाह में, सिर्फ जलता है। करोड़ों-करोड़ों कीड़े हैं जो आदमी के जाते ही उसके शरीर में सब तरफ से घुस जाते हैं, हजारों छेद कर देते हैं, चक्कर लगाते हैं उसके शरीर में वे कीड़े, वे कीड़े मरते नहीं, वे कीड़े अमर हैं और आदमी के शरीर भर में छिद्र-छिद्र हो जाते हैं, छलनी हो जाता है, लेकिन वह भी मरता नहीं है और लाखों-करोड़ों कीड़े उसके शरीर में सब तरफ से घूसते हैं और दौड़ते हैं।
इस तरह की घबड़ाहटें पैदा करते हैं वे। वे कहते हैं, अगर नहीं मानोगे, नरक जाना पड़ेगा। तो आदमी सोचता है कि मान ही लो। ऐसा नरक अगर कहीं हुआ, तो कौन झंझट में पड़े।
ठीक है तुम्हारे भगवान हैं। वे कहते हैं, और जो भगवान को मान लेगा, हमारे भगवान को, क्योंकि भगवान बहुत प्रकार के हैं। भगवान का कोई एक प्रकार नहीं, कोई एक क्वालिटी नहीं, बहुत भेद हैं, बहुत सी वेराइटी हैं भगवान की। मुसलमान का भगवान अलग तरह का है, हिंदू का अलग तरह का है, ईसाई का अलग तरह का है, इसका इस तरह का है, उसका उस तरह का है। जितने तरह के लोग हैं उतने तरह के भगवान हैं। वे सब कहते हैं कि हमारे भगवान को! अगर दूसरे के भगवान को माना तो फिर तुम समझ लेना, नरक के सिवाय कोई रास्ता नहीं रह जाएगा। क्योंकि आखिर में जीसस क्राइस्ट ही बचाएंगे, ईसाई कहता है। मुसलमान कहता है, जब मोहम्मद को पुकारोगे तब वही बचाएंगे कोई और बचाने वाला नहीं है। तो ध्यान रखना, अगर मोहम्मद से बचे तो गए दोजख में, अगर जीसस से बचे तो जलना पड़ेगा अनंत काल तक अग्नि में।
हां, और जो जीसस को मानेंगे, मोहम्मद को मानेंगे उनके लिए स्वर्ग में सारी सुख-सुविधाओं का इंतजाम है। उनके लिए वहां सुंदर महल हैं। और स्वर्ग पता है आपको, यहां तो आप एकाध कमरे को एयरकंडीशन कर पाते हैं, स्वर्ग पूरा का पूरा एयरकंडीशन है, शीतल मंद बयार वहां बहती रहती है सदा। वहां सूरज निकलता है लेकिन ताप नहीं होता, सिर्फ प्रकाश होता है। वहां वृक्ष कभी कुम्हलाते नहीं, फूल कभी मुरझाते नहीं, वहां पत्ते कभी पीले नहीं पड़ते, वहां कभी बुढ़ापा नहीं होता। स्त्रियों की उम्र वहां सोलह वर्ष पर रुक जाती है, उसके आगे नहीं जाती। ऐसा सुंदर स्वर्ग! वहां वृक्ष हैं, कल्पवृक्ष, जिनके नीचे बैठ कर जो भी आप कामना करें वह कामना करते ही पूरी हो जाती है। ऐसा नहीं कि फिर उसके लिए कोई श्रम करना पड़ता हो, ऐसा नहीं कि किसी से कहना पड़ता हो। आप वृक्ष के नीचे बैठ गए और आपने कहा कि एक देवी मौजूद हो जाए, देवी मौजूद हो जाएगी। आपने कहा कि पलंग आ जाए, पलंग आ जाएगा, आंख खुली है पलंग सामने मौजूद है। वहां कामना की और पूरी हो जाती है, ऐसे कल्पवृक्ष हैं। जो हमारे भगवान को मानेगा उसको ऐसे कल्पवृक्ष मिलेंगे, जो नहीं मानेगा उसको नरक में डाल दिया जाएगा।
यह भय के आधार पर आदमी को कुछ भी मनाने की कोशिश की जाती है। फिर भीड़ का भय, जिनके साथ जीना है उनके अनुकूल न रहो तो बहुत मुसीबत हो जाती है, वे मुसीबत में डाल देंगे, जीना मुश्किल कर देंगे। लड़की का विवाह होना मुश्किल हो जाएगा, समाज की जिंदगी कठिन हो जाएगी। उसके भय से मानते चलो जो लोग कहते हैं। भीड़ के भय को मान लो। भीड़ जिसको कहे भगवान उसको भगवान, भीड़ जिसको कहे शास्त्र उसको शास्त्र, भीड़ कहे रात है अभी तो कहना रात, भीड़ कहे दिन है तो कहना दिन। लेकिन भीड़ को मानने वाला व्यक्ति कभी भी आत्मा के विकास को उपलब्ध नहीं होता।
आत्मा के विकास को वे उपलब्ध होते हैं जो सत्य की सतत चेष्टा करते हैं खोज की, जो सत्य के लिए कुछ भी खोने को तैयार होते हैं, जो सत्य के लिए सब कुछ दांव पर लगाने का साहस जुटाते हैं, वे लोग सत्य को उपलब्ध होते हैं।
लेकिन इस देश ने तो सत्य को पाने की सामर्थ्य और आकांक्षा ही खो दी है। वह कहता है आलोचना ही मत करना, वह कहता है विचार ही मत करना। नहीं, मैं आपसे प्रार्थना करूंगा, विचार करना, संदेह करना, आलोचना करना। आपके महात्मा और आपके महापुरुष इतनी कच्ची मिट्टी के नहीं हैं कि आपकी आलोचना और आपके विचार से नष्ट हो जाएंगे। वे बचेंगे और निखर कर बचेंगे जैसे स्वर्ण आग से गुजर कर और साफ हो जाता है वैसे ही आलोचना की निरंतर धारा से गुजर कर महापुरुष और निखर कर प्रकट हो जाते हैं। उनमें भयभीत होने की कोई भी जरूरत नहीं। और जो नहीं प्रकट हो सकेंगे उनसे जितनी जल्दी छुटकारा हो जाए उतना ही अच्छा है। उनके साथ कब तक जीएंगे हम? उनको जिलाने की जरूरत क्या है? इसलिए मैंने जान कर एक उदाहरण की तरह गांधी को चुन कर बात की है और अगर मुझे खयाल आ गया तो मैं एक-एक महापुरुष पर बात करने का विचार करता हूं और एक-एक महापुरुष पर विचार करना पड़ेगा।
मुल्क की प्रतिभा को जगाना जरूरी है। मुल्क के सोए प्राणों को फिर से गति देनी जरूरी है, मुल्क के मन में फिर एक मंथन पैदा करना जरूरी है। अगर मनन पैदा हो जाए, अगर चिंतन पैदा हो जाए, अगर विचार पैदा हो जाए, तो हम हजारों साल के अंधकार को मिटाने में समर्थ हो जाएंगे। एक छोटा सा दीया और हजारों साल का अंधकार मिट जाता है। अंधकार यह नहीं कहता कि मैं हजारों साल पुराना हूं इसलिए इस छोटे से दीये से कैसे मिटूंगा, नहीं मिटता। एक दिन का दीया है इससे मैं कैसे मिटूंगा, मैं हजारों साल पुराना हूं। नहीं, एक छोटा सा दीया, कितना ही पुराना अंधकार हो मिट जाता है। विचार का दीया जले इस देश के प्राणों में तो हजारों साल का अंधकार मिट सकता है।

मेरी बातों को इन तीनों में इतने प्रेम और इतनी शांति से सुना, उससे बहुत अनुगृहीत हूं। और परमात्मा से प्रार्थना करता हूं कि आपके विचार का दीया जलेगा। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्वीकार करें।


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