सारसूत्र :
वृच्छा फरैं न आपको, नदी न अंचवै नीर।
परस्वारथ के कारने, संतन धरै सरीर।।
बड़े बड़ाई में भुले, छोटे हैं सिरदार।
पलटू मीठो कूप-जल, समुंद पड़ा है खार।।
हिरदे में तो कुटिल है, बोलै वचन रसाल।
पलटू वह केहि काम का, ज्यों नारुन-फल लाल।।
सब तीरथ में खोजिया, गहरी बुड़की मार।
पलटू जल के बीच में, किन पाया करतार।।
पलटू जहवां दो अमल, रैयत होय उजाड़।
इक घर में दस देवता, क्योंकर बसै बजार।।
हिंदू पूजै देवखरा, मुसलमान महजीद।
पलटू पूजै बोलता, जो खाय दीद बरदीद।।
चारि बरन को मेटिकै, भक्ति चलाया मूल।
गुरु गोविंद के बाग में, पलटू फूला फूल।।
