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बिरहिनी मंदिर दियना बार—(यारी)--ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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रविवार, 18 मार्च 2018

बिरहिनी मंदिर दियना बार—प्रवचन-10


शरद चांदनी बरसी—(प्रवचन—दसवां)

दिनांक 20 जनवरी, 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना

प्रश्‍नसार :

1—भगवान! आपने कहा: "सत्संग, जागो। सुबह पास ही है; हाथ फैलाओ और पकड़ो। परमात्मा को याद करने का क्षण सत्संग, करीब आ गया। नाचो, गुनगुनाओ, मस्त होओ। बांटो। जागो--नाचते हुए।'
इस मधुभरी मस्ती को छलकते देख अपने अपने न रहे। घर घर न रहा। यह कैसा जागना हुआ--लोग नफरत करने लगे! भगवान, यह कैसी नई जिंदगी आई! गुनगुनाती, नाचती हुई, मधुभरी मस्ती ले आई! सब छूट गया!

2—रिंदों के लिए तो मैखाना काबे के बराबर होता है
मुर्शिद की गली का हर फेरा इक हज के बराबर होता है।

3—प्यारे प्रभु! ये तन, मन, जीवन सुलग उठे
कोई ऐसी आग लगाए है--कोई ऐसी आग लगाए है
प्रेम पथ पर चला है राही
मारग चला नहीं जाता
हाथ पकड़ कर मुझ अंधे को
हरि की ओर झुकाए है
कोई ऐसी आग लगाए है।

बिरहिनी मंदिर दियना बार—प्रवचन-09


कह यारी घर ही मिलै—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 19 जनवरी, 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना

सारसूत्र :

जोतिसरूपी आतमा, घट घट रही समाय।
परमतत्त मन भावनो नेक न इत-उत जाय।।
रूप रेख बरनौं कहा, कोटि सूर परगास।
अगम अगोचर रूप है कोउ पावै हरि को दास।।
नैनन आगे देखिए, तेजपुंज जगदीस।
बाहर भीतर रमि रह्यो, सो धरि राखो सीस।।
आठ पहर निरखत रहौ, सनमुख सदा हजूर।
कह यारी घर ही मिलै, काहे जाते दूर।।
आतम-नारि सुहागिनी, सुंदर आपु संवारि।
पिय मिलने को उठि चली, चौमुख दियना बारि।।

ह मेरा एकाकी जीवन--
कहां-कहां भटकेगा जाने।
पानी में बहते प्रसून-सा
कहां-कहां अटकेगा जाने।
लहरों की इंगिति ही गति है,
परवश हूं मैं, यही नियति है।

बिरहिनी मंदिर दियना बार—प्रवचन-08


सत्‍य के अनबोल बोल—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 18 जनवरी, 1979;
श्री ओशो आश्रम पूना।
प्रश्‍न सार:

1—भगवान! स्वामी चैतन्य भारती जब शिविर लेने जाते हैं, तो कहते हैं कि मैं भी ज्ञान को उपलब्ध हो गया हूं। ऐसा किस भाव से कहते हैं?
2—मैं आपको सुनते-सुनते कई बार रोने लगता हूं और मुझे पता भी नहीं चलता कि कब मेरे आंसू सूख गए और मैं आनंद-विभोर होकर उड़ानें भरने लगा! कृपया इस स्थिति को समझाएं।
3—आप कहते हैं कि यहां खोने को कुछ भी नहीं है। फिर भी मैं क्यों सब कुछ दांव पर नहीं लगा सकता हूं?
4—भगवान! आप जीवन के जिस महाकाव्य को गाए चले जा रहे हैं, उसके अनबोले बोल क्या हैं?--कभी उससे उठी प्रेम की उत्ताल लहरें अंतर बाहर भिगो जाती हैं; कभी उससे रंगे मन-प्राण शीतल कर जाती हैं, और कभी शून्य घेरता है--संगीतमय होकर।


पहला प्रश्न:

भगवान! स्वामी चैतन्य भारती जब शिविर लेने जाते हैं तो कहते हैं मैं भी ज्ञान को उपलब्ध हो गया हूं। ऐसा किस भाव से कहते हैं?

बिरहिनी मंदिर दियना बार—प्रवचन-07


मरिके यारी जुग-जुग-जीया—(प्रवचन—सातवां)
दिनांक 17 जनवरी, 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना

सारसूत्र :

बिन बंदगी इस आलम में, खाना तुझे हराम है रे।।
बंदा करै सोई बंदगी, खिदमत में आठो जाम है रे।
यारी मौला बिसारिके, तू क्या लागा बेकाम है रे।
कुछ जीते बंदगी कर ले, आखिर को गोर मुकाम है रे।।

गुरु के चरन की रज लैके, दोउ नैन के बीच अंजन दीया।
तिमिर माहिं उजियार हुआ, निरंकार पिया को देखि लीया।।
कोटि सुरज तंह छपे घने, तीनि लोक धनी पाह पीया।
सतगुरु ने जो करी किरपा, मरिके यारी जुग-जुग जीया।।

तब लग खोजे चला जावै, जब लग मुददा नहिं हाथ आवै।
जब खोज मरै तब घर करै, फिर खोज पकरके बैठ जावै।।
आप में आप को आप देखै, और कहूं नहिं चित्त जावै।
यारी मुददा हासिल हुआ, आगे को चलना क्या भावै।।

शनिवार, 17 मार्च 2018

बिरहिनी मंदिर दियना बार—प्रवचन-06


प्रार्थना के पंख—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 16 जनवरी, 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार :
1—हम आपसे जो सवाल पूछ रहे हैं, वे सब मूर्च्छा से पूछे गए हैं। और आपका जवाब तो पूर्ण चैतन्य से आ रहा है। तो इन दोनों का मिलन कैसे संभव हो? और मिलन नहीं होता, तब तो सवाल पूछना ही गलत है। तब आप हमें जो सवाल पूछने के लिए कहते हैं, उसका क्या मतलब है?
2—आपने कहा दर्शनों के अध्ययन से ईश्वर नहीं मिलता। मैं पूछना चाहता हूं कि फिर ईश्वर कैसे मिलता है?
3—आप हर रोज इतनी पिलाते हो, फिर भी तृप्त होने के बजाए प्यास दिन-ब-दिन बढ़ती नहीं है, ऐसा क्यों?
4—भगवान! न जाने किस पुण्य के प्रताप से, न जाने कौन से जन्म-जन्मांतर की नेह-डोर से बंधकर आपकी अनुकंपा, आपके इस सान्निध्य का सुअवसर प्राप्त हुआ, कि आपके पवित्र करकमलों से संन्यास प्राप्त कर धन्य हो गया। भगवान! हमारा सारा देश कर्जदार है आपका। विश्व के कोने-कोने से अनवरत प्रतिदिन लोग चले आ रहे हैं, यहां प्रेम के सागर में डूबे जा रहे हैं। आकंठ पी रहे हैं--बरसते अमृत की रसधार को!
बनी रहे अंगूर लता ये, जिससे बनती हैं डाला
बनी रहे यह माटी जिससे बनता है मदिरा प्याला
बने रहे ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला
5—प्रार्थनाएं परिणाम न लाएं क्या करें?

बिरहिनी मंदिर दियना बार—प्रवचन-05

तत्‍वमसि—(प्रवचन—पांचवां)  

दिनांक 15 जनवरी, 1979; 
श्री ओशो आश्रम, पूना।

सारसूत्र:

आंधरे को हाथी हरि, हाथ जाको जैसो आयो,
बूझो जिन जैसो तिन तैसोई बतायो है।।
टकाटोरी दिन रैन हिये हू के फूटे नैन,
आंधरे को आरसी में कहां दरसायो है।।
भूल की खबरि नाहिं जासो यह भयो मुलक,
वाकों बिसारि भोंदू डारेन अरुझायो है।।
आपनो सरूप रूप आपू माहिं देखै नाहिं
कहै यारी आंधरे ने हाथी कैसो पायो है!

ब पे आ जाते संगीत सहारे साकी
वलवले दिल के अगर गम से संवरना सीखें
वो जबां-जो है शफक, फूल सितारे साकी
हम भी पा लेते हैं गर जिंदगी करना सीखें
बात बन जाती है तरकीब सुरों की साकी
हर तास्सुर से नए रूप में ढल जाती है
फिर कोई बात नहीं रहती है बाकी साकी
और हर बात पे तरकीब बदल जाती है
ऐसे जज्बों की उठाने यहीं हैं साकी
लफ्ज-ओ-मआनी के तिलिस्मात से जो हैं आगे

बिरहिनी मंदिर दियना बार—प्रवचन-04


संन्यास--एक नयी आँख—(प्रवचन—चौथा)


दिनांक 14 जनवरी, 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—भगवान! बचपन से ही सुनता रहा हूं तथाकथित साधु-महात्माओं से कि संसार असार है। इधर आप कहते हैं कि संसार असार नहीं है--एक प्रेमपूर्ण महोत्सव है, अविरल रसपूर्ण बहता हुआ झरना है। पीने वाला चाहिए।
रवीन्द्रनाथ ने भी एक बार कहा था: "मोरिते चाहिना आमि, एक शुन्दोर भूवने! मैं इस सुंदर रसपूर्ण संसार को छोड़कर यूं ही मरना नहीं चाहता।
यह सब मुझे विश्वास ही नहीं आता था। न जाने किसके अनजान आमंत्रण से यहां चला आया, अनायास और यहां आश्रमवासियों में जो निष्पाप बालक सुलभ चपलता देखी तो बस ठगा सा रह गया। मनुष्य के जीवन में इतना रस, ऐसे अकथनीय अमृत की रसधार परमात्मा के रूप में आप बरसाते हैं...ऐसी कल्पना ही न थी। लेकिन इधर आपने खूब फंसाया मुझे। अब आफत में पड़ा। क्योंकि जब अब घर वापिस लौटूंगा तो वही बासा घिसा-पिटा जीवन उपलब्ध होगा। कृपया अब आप ही मेरा मार्गदर्शन करें। इसलिए कल आपके पवित्र कर-कमलों से संन्यास भी लिया है। अब तो तुम्हीं ने दर्द दिया है  तुम्हीं दवा देना!

2—भगवान! आश्चर्य है कि भारत की राजधानी से निकलने वाली एक पोर्नो पत्रिका ने, जो अश्लीलता का धंधा करती है, लिखा है कि आपको फांसी दे दी जाये। इसका राज क्या है भगवान?

3—मैं हृदय की वेदना  व्यक्त करना चाहता हूं, जो कि मैंने आज तक किसी से व्यक्त नहीं की।
मेरे मन की हालत खंड-खंड हो गई है। एक तरफ सत्संग का प्रेम और परमात्मा से मिलन की चाहत और दूसरी तरफ भौतिक कामवासना की तरफ हर पल का झुकाव। आज प्रौढ़ावस्था तक उससे छुटकारा नहीं पा सका हूं। समझ आती है तो अधूरी रहती है। और स्त्री शरीर के अनेक अनुभवों के बावजूद भी, और ज्यादा वृति तंग करती है। सब अच्छी कही हुई बातें और सिखावनें बाहर ही रह जाती हैं। मैं वही का वही! सब भूलकर लोलुप हो जाता हूं। वासना मन को घेरे रहती है। स्वप्न में भी वही चलता है।
 किस क्रिया से मैं छुटकारा या समता पा सकूं, वह रास्ता दिखाएं। कृपा करें।

4—प्रेम को अंधा कहा गया है और आप प्रेम सिखाते हैं। प्रेम को पागलपन कहा है और आप प्रेम सिखाते हैं। प्रेम को स्वप्न कहा गया है और आप प्रेम सिखाते हैं! क्यों?

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

बिरहिनी मंदिर दियना बार—प्रवचन-03



निरगुन चुनरी निर्बान—(प्रवचन—तीसरा)


दिनांक 13 जनवरी, 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना।

सारसूत्र :

निरगुन चुनरी निर्बान, कोउ ओढ़ै संत सुजान।।
षट दरसन में जाइ खोजो, और बीच हैरान।।
जोतिसरूप सुहागिनी चुनरी, आव बधू धर ध्यान।।
हद बेहद के बाहरे यारी, संतन को उत्तम ज्ञान।।
कोऊ गुरु गम ओढ़ै चुनरिया, निरगुन चुनरी निर्बान।।
उडू उडू रे विहंगम चढु आकाश।
जहं नहिं चांद सूर निसबासर, सदा अमरपुर अगम बास।।
देखै उरध अगाध निरंतर, हरष सोक नहिं जम कै त्रास।।
कह यारी उहं बधिक फांस नहिं, पल पायो जगमग परकास।।

बिरहिनी मंदिर दियना बार—प्रवचन-02



जागो सखि, बसंत आ गया—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 12 जनवरी,1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार :
1—उस परम प्रभु परमात्मा का सत्य नाम क्या है?

2—भगवान, सिक्ख-निरंकारी संघर्ष के संबंध में आपका क्या मत है? क्या यह खतरा नहीं है कि जो लोग आपके दर्शन या विचार के साथ असहमत ही नहीं उसे सहने को भी तैयार नहीं हैं, वे आपके साथ भी ऐसी ही स्थिति पैदा करें?

3—भगवान, अगर मैं अपनी खुद की बात कहूं तो ध्यान के गहरे अनुभव जब मैंने कृष्णमूर्ति या आपका नाम तक न सुना था तब हुए। यह स्वानुभव किसी भी विधि का अभ्यास किए बिना ही हुआ। इसलिए कृष्णमूर्ति जब यह कह रहे हैं कि किसी विधि का अभ्यास मत करो; वह सहज ही घटित होता है तब यह बात मुझे स्वाभाविक मालूम होती है। आखिर कृष्णमूर्ति का जोर सतत जागरूकता और केंद्ररहित हो जीवन से सीखना--इस पर तो है ही, जिसके फलस्वरूप ध्यान घट सकता है। अगर मैं भूलता नहीं हूं, तो आप कृष्णमूर्ति के इस विधान से सहमत नहीं हैं। इसमें मुझे तो काफी अचरज भी होता है। आपका दृष्टिकोण समझने की उम्मीद रखता हूं।

4—भगवान! संन्यास लूं या नहीं, डर लगता है संसार का। झेल पाऊंगा लोगों का विरोध या नहीं?

बिरहिनी मंदिर दियना बार—प्रवचन-01




यारी कहै सुनो भाई संतो—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 11 जनवरी, 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना

सारसूत्र :

बिरहिनी मंदिर दियना बार।
बिन बाती बिन तेल जुगति सों बिन दीपक उजियार।।
प्रानपिया मेरे गृह आयो, रचि-रचि सेज संवार।।
सुखमन सेज परमतत रहिया, पिया निर्गुन निरकार।।
गावहु री मिलि आनंद मंगल, यारी मिलि के यार।।
रसना राम कहत तें थाको।
पानी कहे कहुं प्यास बुझत है, प्यास बुझे जदि चाखो।।
पुरुष-नाम नारी ज्यों जानै, जानि बूझि जनि थाखो।।
दृष्टि से मुष्टि नहिं आवै, नाम निरंजन वाको।।
गुरु परताप साध की संगति, उलट दृष्टि जब ताको।।
यारी कहै सुनो भाई संतो, बज्र बेधि कियो नाको।।

बिरहिनी मंदिर दियना बार—(यारी)--ओशो



बिरहिनी मंदिर दियना बार—(यारी)


ओशो

यारी की पुकार भी खाली नहीं गयी। यारी भी भर उठे--बड़ी सुगंध से! और लुटी सुगंध! उनके गीतों में बंटी सुगंध! और जब भी किसी व्यक्ति के जीवन में परमात्मा का आगमन होता है तो गीतों की झड़ी लग जाती है; उस व्यक्ति की श्वास-श्वास गीत बन जाता है। उसका उठना-बैठना संगीत हो जाता है। उसके पैर जहां पड़ जाते हैं वहां तीर्थ बन जाते हैं।
ऐसे ही एक अदभुत व्यक्ति के साथ आज हम यात्रा शुरू करते हैं। यारी का जन्म हुआ दिल्ली में। नाम था: यार मुहम्मद। फिर मुहम्मद तो जल्दी ही खो गया; क्योंकि जिसे परमात्मा को पुकारना हो, वह हिंदू नहीं रह सकता, वह मुसलमान भी नहीं रह सकता, वह ईसाई भी नहीं रह सकता। परमात्मा को पुकारने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं।