सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो
अंतर-आकाश के फूल—प्रवचन-दसवां
दिनांक 09 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।
पहला प्रश्न: भगवान,
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्
यस्मिन
देवा अधि विश्वे निषेदुः।
यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति
य इत् दद्
विदुस्त इमे समासते।।
जिसमें सब देवता भलीभांति स्थित हैं उसी अविनाशी
परम व्योम में सब वेदों का निवास है। जो उसे नहीं जानता वह वेदों से क्या निष्कर्ष
निकालेगा? परंतु जो जानता है
उसे वह उसी में से भलीभांति मिल जाता है।
भगवान, श्वेताश्वर उपनिषद के
इस सूत्र को हमारे लिए खोलने की अनुकंपा करें।
सत्यानंद,
यह सूत्र उन थोड़े-से अदभुत सूत्रों में से एक है जिन्हें गलत समझना तो
आसान, सही समझना बहुत मुश्किल। एक-एक शब्द की गहराई में
उतरना जरूरी है। एक-एक शब्द जैसे जीवन-अनुभव का निचोड़ है। हजारों गुलाबों से जैसे
इत्र की कुछ बूंदें बनें, ऐसे हजारों समाधि के अनुभव इस एक
सूत्र में पिरोए हुए हैं।


