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मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-10



आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो

दिनांक 20, नवम्बर, सन् 1980

दसवां प्रवचन-(सत्य की उदघोषणा)

 पहला प्रश्न: भगवान, श्री दत्ताबाल आपसे बहुत बुरी तरह जल-भुन गए हैं। लगता है कि उन्हें पहले से ही आपसे व्यक्तिगत रूप से जलन थी। और अब उन्हें विवेकानंद का बहाना मिल गया है। उन्होंने कहा है कि आचार्य रजनीश चरस, गांजा, भांग खिला-पिला कर लोगों को समाधि दिलाते हैं, जब कि विवेकानंद सिर्फ छूकर ही समाधि दिला देते थे!
उन्होंने और भी निम्न बातें आपके संबंध में कही हैं, कृपया प्रकाश डालें।
पहली कि आचार्य रजनीश स्वघोषित भगवान हैं।
दूसरी कि आचार्य रजनीश अज्ञानी हैं।
तीसरी कि आचार्य रजनीश का व्यक्तित्व अत्यंत महत्वहीन है।
चौथी कि आचार्य रजनीश ने हिंदू देवताओं को कामी और भोगी कह कर हिंदू धर्म का अपमान किया है।
पांचवीं कि आचार्य रजनीश की तुलना विवेकानंद से कभी भी नहीं हो सकती है।
छठवीं कि स्वामी विवेकानंद ने अकालग्रस्त लोगों की सहायता के लिए अपना आश्रम बेचने की तैयारी दिखाई थी। क्या आचार्य रजनीश ऐसा कर सकते हैं?
और सातवीं कि श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि अगले जन्म में मैं एक हरिजन की कुटिया की सफाई करूंगा। क्या आचार्य रजनीश भी ऐसा कर सकते हैं?

 वंदना!

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-09



आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 19, नवम्बर, सन् 1980

नौवां प्रवचन-(पहले ध्यान--फिर सेवा)

 पहला प्रश्न: भगवान, मैं एक विचारशील युवक हूं, जिसे अपने देश के मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं। यह अंधविश्वासों तथा दकियानूसी विचारों से दबा हमारा भारत बिलकुल नरक बन गया है। मेरा खून खौल-खौल उठता है इसकी सड़ी-गली स्थिति देख कर और इस अभागे देश के लिए कुछ करने के लिए अधीर हो उठता हूं।
भगवान, एक व्यक्ति के नाते इस देश के प्रति मेरा क्या कर्तव्य है? मैं क्या करूं कि इस देश की दीन-हीनता, भुखमरी, पाखंड, काहिलता और सड़ांध मिट जाए?

 निर्मल घोष!
पहली बात, अकेले विचारशील होने से कुछ भी न होगा। अंधेरा हो, तो रोशनी के विचार से मिटता नहीं। रोशनी चाहिए! बीमारी हो, तो स्वास्थ्य का कितना ही चिंतन करो, कुछ हाथ न लगेगा। औषधि चाहिए! विचार तो नपुंसक है।

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-08



आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 18, नवम्बर, सन् 1980

आठवां प्रवचन-(चिंतन नहीं--मौन अनुभूति)

 पहला प्रश्न: भगवान,
      उत्तमा तत्त्वचिंतैव मध्यम शास्त्रचिंतनम्।
           अधमा तंत्रचिंता च तीर्थ भ्रांत्यधमाधमा।।
      अनुभूतिं विना मूढ़ो वृथा ब्रह्मणि मोदते।
             प्रतिबिंबितशाखाग्रफलास्वादनमोदवत।।
तत्व का चिंतन उत्तम है, शास्त्र का चिंतन मध्यम है, तंत्र की चिंता अधम है और तीर्थों में भटकना अधम से भी अधम है। जैसे कोई पेड़ की छाया में प्रतिबिंबित फल को खाकर प्रसन्न हो, वैसे ही वास्तविक अनुभव के बिना मूढ़ मनुष्य ब्रह्म का आनंद पाने की व्यर्थ कल्पना करता है।
भगवान, हमें मैत्रेयी उपनिषद के इन दो सूत्रों का अभिप्राय समझाने की अनुकंपा करें।

 पूर्णानंद!
तत्व का चिंतन उत्तम है, क्योंकि तत्व का चिंतन हो ही नहीं सकता। तत्व का चिंतन असंभव है। तत्व वस्तु नहीं है, विषय नहीं है। तत्व तो तुम्हारी जीवन-ऊर्जा है, तुम्हारा स्वरूप है, तुम्हारी चेतना है। तत्व का चिंतन नहीं होता, तत्व की चेतना होती है।

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-07



आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 17, नवम्बर, सन् 1980

सातवां प्रवचन-(गुरु तीर्थ हैं)

 पहला प्रश्न: भगवान,
      बलं वाव विज्ञानाद् भूयः;
      अपि ह शतं विज्ञानवतां
      एको बलवान आकंपयते।
      स यदा बली भवति, अथोत्थाता भवति, उत्तिष्ठन परिचारिता भवति,
      परिचरन उपसत्ता भवति, उपसीदन द्रष्टा भवति,
      श्रोता भवति, मन्ता भवति,
      बुद्धा भवति,र् कत्ता भवति, विज्ञाता भवति।।
विज्ञान से बल श्रेष्ठ है, क्योंकि एक बलवान मनुष्य सौ विद्वानों को डराता है। बलवान होने पर ही मनुष्य उठ कर खड़ा होता है; उठने पर वह गुरु की सेवा करता है; सेवा करने से वह गुरु के पास बैठने लायक बनता है; पास बैठने से द्रष्टा बनता है, श्रोता बनता है, मनन करने वाला बनता है, बुद्ध बनता है, कर्ता बनता है, विज्ञानी बनता है।
भगवान, छांदोग्य उपनिषद के इस अजीब से सूत्र का आशय क्या है, यह हमें विशद रूप से समझाने की अनुकंपा करें।

 सहजानंद!

यह सूत्र निश्चय ही अजीब सा मालूम होता है, अजीब है नहीं। है तो बहुत प्यारा, है तो बहुत अनूठा, अद्वितीय। छांदोग्य उपनिषद का जैसे सारा छंद इसमें समा गया है। जैसे सारा, हजार-हजार फूलों से निचोड़ कर कोई इत्र इकट्ठा करे, ऐसा यह सूत्र है। पर अजीब सा लगेगा, क्योंकि सत्य भाषा में आते-आते अजीब सा ही हो जाता है।

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-06



आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 16, नवम्बर, सन् 1980

छठवां प्रवचन-(ऋषि पृथ्वी के नमक हैं)

 पहला प्रश्न: भगवान,
      लौकिकानां हि साधूनामर्थ वागनुवर्तते।
      ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति।।
लौकिक साधुओं की वाणी अर्थ का अनुसरण करती है; लेकिन जो आदि ऋषि थे, उनकी वाणी का अनुसरण अर्थ करता था।
भगवान, वसिष्ठ के इस सूत्र को समझाने की अनुकंपा करें। क्या आदि ऋषि वास्तव में इतने ही श्रेष्ठ थे?

 योग प्रतीक्षा!
साधु, और लौकिक! वह बात ही विरोधाभासी है। फिर साधु और असाधु में भेद क्या रहा? असाधु वह, जो लौकिक; जिसकी दृष्टि पदार्थ के पार नहीं देख पाती, पदार्थ में ही अटक जाती है; अंधा है जो। क्योंकि पदार्थ को ही देखने से बड़ा और क्या अंधापन होगा!
अस्तित्व परमात्मा से भरपूर है--सौंदर्य से, सत्य से, आनंद से; और तुम्हें केवल पदार्थ ही दिखाई पड़ता हो! एक बात जाहिर होती है उससे कि तुम्हारे पास सूक्ष्म को देखने की दृष्टि नहीं; सिर्फ स्थूल तुम्हारी पकड़ में आता है।

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-05



आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 15, नवम्बर, सन् 1980

पांचवां प्रवचन-(अंतःकरण का अतिक्रमण)

 पहला प्रश्न: भगवान,
      यं यं लोकं मनसा संविभाति
           विशुद्धसत्वः कामयते यांश्च कामान्।
      तं तं लोकं जयते तांश्च कामां--
           स्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चवेद भूतिकामः।।
जिसका अंतःकरण शुद्ध है, ऐसा आत्मवेत्ता, मन से जिस-जिस लोक की भावना करता है और जिन-जिन कामनाओं की कामना करता है, वह उस-उस लोक को और उन-उन कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। इसलिए जो अपना कल्याण चाहता है, उसे आत्मवेत्ता की अर्चना करनी चाहिए।
भगवान, मुंडकोपनिषद के इस सूत्र का अभिप्राय समझाने की अनुकंपा करें।

 सहजानंद!

इसके पहले कि हम सूत्र के विश्लेषण में उतरें, कुछ आधारभूत बातें समझ लेनी उपयोगी हैं।
पहली: जब तक कामना है, तब तक आत्मा शुद्ध नहीं। आत्मा की अशुद्धि का और अर्थ ही क्या होता है? कामना की कीचड़! फिर कामना धन की हो, पद की हो, प्रतिष्ठा की हो; मोक्ष की हो, निर्वाण की हो, ब्रह्मज्ञान की हो; इससे भेद नहीं पड़ता।

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-04



आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 14, नवम्बर, सन् 1980

चौथा प्रवचन-(वर्तमान क्षण की धन्यता)

 पहला प्रश्न: भगवान,
      भविष्यं नानुसंधत्ते नातीतं चिन्तयत्यसौ।
      वर्तमान   निमेषं   तु   हसन्नेवानुवर्तते।।
भविष्य का अनुसंधान नहीं, न अतीत की चिंता। हंसते हुए वर्तमान में जीना।
लगता है, योगवासिष्ठ का यह श्लोक आपकी देशना का संस्कृत अनुवाद है। इसे हमें फिर एक बार समझाने की कृपा करें।

 सहजानंद!
मन या तो अतीत होता है या भविष्य। वर्तमान में मन की कोई सत्ता नहीं। और मन ही संसार है; इसलिए वर्तमान में संसार की भी कोई सत्ता नहीं। और मन ही समय है; इसलिए वर्तमान में समय की भी कोई सत्ता नहीं।
अतीत का वस्तुतः कोई अस्तित्व तो नहीं है, सिर्फ स्मृतियां हैं। जैसे रेत पर छूटे हुए पगचिह्न। सांप तो जा चुका, धूल पर पड़ी लकीर रह गई। ऐसे ही चित्त पर, जो बीत गया है, व्यतीत हो गया है, उसकी छाप रह जाती है। उसी छाप में अधिकतर लोग जीते हैं।

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-03



आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 13, नवम्बर, सन् 1980

तीसरा प्रवचन-(तप, ब्रह्मचर्य और सम्यक ज्ञान)

 पहला प्रश्न: भगवान,
      सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
           सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।
      अंतःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो
             यं पश्यंति यतयः क्षीणदोषाः।।
यह आत्मा सत्य, तप, सम्यक ज्ञान और ब्रह्मचर्य से ही प्राप्त किया जा सकता है। जिसे दोषहीन यति देखते हैं, वह शुभ्र आत्मा इसी शरीर के अंदर वर्तमान है।
भगवान, मुंडकोपनिषद के इस सूत्र को हमारे लिए बोधगम्य बनाने की कृपा करें।

 शरणानंद!
यह सूत्र तो सरल है, पर हजारों वर्षों की व्याख्याओं ने इसे बहुत जटिल कर दिया है। नासमझ सुलझाने चलते हैं तो और उलझा देते हैं! नीम-हकीम से सावधान रहना जरूरी है। बीमारी इतनी खतरनाक नहीं, जितना नीम-हकीम खतरनाक सिद्ध हो सकता है। बीमारी का तो इलाज है, लेकिन नीम-हकीम के चक्कर में पड़ जाओ, तो इलाज नहीं है।

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-02



आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 12, नवम्बर, सन् 1980

दूसरा प्रवचन-(नास्तिकता: अनिवार्य प्रक्रिया)

 पहला प्रश्न: भगवान, जीवन के चालीस वर्ष नास्तिक समाजवादी विचारधारा में गंवाने के बाद पिछले पंद्रह वर्षों से आपका संपर्क पाया। और जीवन में जो आनंद और उत्सव का अनुभव किया, उसका कैसे वर्णन करूं? और कैसे अपनी कृतज्ञता प्रकट करूं? शब्द बिलकुल ओछे पड़ गए हैं। आप क्या मिले, बस सब कुछ मिल गया! प्रभु, मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

 अमृत बोधिसत्व!
आस्तिक होने के लिए नास्तिक होना अत्यंत अनिवार्य है। अभागे हैं वे जिन्होंने कभी नास्तिकता नहीं चखी, क्योंकि वे आस्तिकता का स्वाद न समझ पाएंगे। आस्तिकता उभर कर प्रकट होती है, नास्तिकता की पृष्ठभूमि चाहिए। जैसे ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं सफेद खड़िया से, अक्षर-अक्षर साफ दिखाई पड़ता है। यूं तो सफेद दीवाल पर भी लिख सकते हैं, मगर तब अक्षर दिखाई न पड़ेंगे।
इस जगत के बड़े से बड़े दुर्भाग्यों में से एक है कि हम प्रत्येक बच्चे को नास्तिक बनने के पहले आस्तिक बना देते हैं। वह आस्तिकता झूठी होती है,

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-01



आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 11, नवम्बर, सन् 1980

पहला प्रवचन-(संसार पाठशाला है)

 पहला प्रश्न: भगवान, विश्राम के लिए अनंत आकाश में उड़ने वाला पक्षी घास का छोटा सा घोंसला बनाता है। और विश्राम के लिए आदमी ने पहले गुफा खोजी, और फिर झोपड़ा और मकान बनाया। और आप आज अनहद में बिसराम की चर्चा शुरू कर रहे हैं।
भगवान, यह अनहद में बिसराम क्या है, यह हमें समझाने की कृपा करें।

 आनंद मैत्रेय!
विश्राम के लिए पक्षी घोंसला बनाए, इसमें तो कुछ भी अड़चन नहीं। क्योंकि घोंसले में किया गया विश्राम, आकाश में उड़ने की तैयारी का अंग है। आकाश से विरोध नहीं है घोंसले का। घोंसला सहयोगी है, परिपूरक है। सतत तो कोई आकाश में उड़ता नहीं रह सकता। देह तो थकेगी। देह को विश्राम की जरूरत भी पड़ेगी।