आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 20, नवम्बर, सन्
1980
दसवां प्रवचन-(सत्य की उदघोषणा)
पहला प्रश्न: भगवान, श्री दत्ताबाल आपसे बहुत बुरी तरह जल-भुन गए हैं। लगता है कि उन्हें पहले
से ही आपसे व्यक्तिगत रूप से जलन थी। और अब उन्हें विवेकानंद का बहाना मिल गया है।
उन्होंने कहा है कि आचार्य रजनीश चरस, गांजा, भांग खिला-पिला कर लोगों को समाधि दिलाते हैं, जब कि
विवेकानंद सिर्फ छूकर ही समाधि दिला देते थे!
उन्होंने और भी निम्न बातें आपके संबंध में कही
हैं, कृपया प्रकाश डालें।
पहली कि आचार्य रजनीश स्वघोषित भगवान हैं।
दूसरी कि आचार्य रजनीश अज्ञानी हैं।
तीसरी कि आचार्य रजनीश का व्यक्तित्व अत्यंत
महत्वहीन है।
चौथी कि आचार्य रजनीश ने हिंदू देवताओं को कामी
और भोगी कह कर हिंदू धर्म का अपमान किया है।
पांचवीं कि आचार्य रजनीश की तुलना विवेकानंद से
कभी भी नहीं हो सकती है।
छठवीं कि स्वामी विवेकानंद ने अकालग्रस्त लोगों
की सहायता के लिए अपना आश्रम बेचने की तैयारी दिखाई थी। क्या आचार्य रजनीश ऐसा कर
सकते हैं?
और सातवीं कि श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि
अगले जन्म में मैं एक हरिजन की कुटिया की सफाई करूंगा। क्या आचार्य रजनीश भी ऐसा
कर सकते हैं?
वंदना!



