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शनिवार, 30 सितंबर 2017

दरिया कहे शब्द निरवाना-(दरिया बिहारवाले)-प्रवचन-09



सतगुरु करहु जहाज—(प्रवचन-नौवां)

दिनांक 29 जनवरी 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना

सारसूत्र :

पांच तत्त की कोठरी, तामें जाल जंजाल।
जीव तहां बासा करै, निपट नगीचे काल।।
दरिया तन से नहिं जुदा, सब किछु तन के माहिं।
जोग-जुगति सौं पाइये, बिना जुगति किछु नाहिं।।
दरिया दिल दरियाव है अगम अपार बेअंत।
सब महं तुम, तुम में सभे, जानि मरम कोइ संत।।
माला टोपी भेष नहिं, नहिं सोना सिंगार।
सदा भाव सतसंग है, जो कोई गहै करार।।
परआतम के पूजते, निर्मल नाम अधार।
पंडित पत्थल पूजते, भटके जम के द्वार।।
सुमिरन माला भेष नहिं, नाहीं मसि को अंक।
सत्त सुकृत दृढ़ लाइकै, तब तोरै गढ़ बंक।।
दरिया भवजल अगम अति, सतगुरु करहु जहाज।
तेहि पर हंस चढ़ाइकै, जाइ करहु सुखराज।।
कोठा महल अटारियां, सुन उ स्रवन बहु राग।
सतगुरु सबद चीन्हें बिना, ज्यों पंछिन महं काग।।
दरिया कहै सब्द निरबाना!

दरिया कहे शब्द निरवाना-(दरिया बिहारवाले)-प्रवचन-08



मिटो: देखो: जानो—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 28 जनवरी 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना

प्रश्‍नसार :

1—भगवान, क्या संतोष रखकर जीना ठीक नहीं है?

2—भगवान, इटली के नए वामपक्ष (न्यू लेफ्ट) के अधिकांश नौजवान आपसे संबंधित होते जा रहे हैं। आप क्या इसे वामपक्ष विकास मानेंगे या अपने प्रयोग के सही बोध की विकृति?

3—नीति और धर्म में क्या भेद है?

4—भगवान, भक्त की चरम अवस्था के संबंध में कुछ कहें!

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

दरिया कहे शब्द निरवाना-(दरिया बिहारवाले)--प्रवचन-07

निर्वाण तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 27 जनवरी 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना

सारसूत्र :

तीनी लोक के ऊपरे, अभय लोक बिस्तार
सत्त सुकृत परवाना पावै, पहुंचै जा करार।
जोतिहि ब्रह्मा, बिस्नु हहिं, संकर जोगी ध्यान।
सत्तपुरुष छपलोक महं, ताको सकल जहान।।
सोभा अगम अपार, हंसवंस सुख पावहीं।
कोइ ग्यानी करै विचार, प्रेमतत्तुर जा उर बसै।।
जो सत शब्द बिचारै कोई। अभय लोक सीधारै सोई।।
कहन सुनन किमिकरि बनि आवै। सत्तनाम निजु परवै पावै।।
लीजै निरखि भेद निजु सारा। समुझि परै तब उतरै पारा।।
कंचल डाहै पावक जाई। ऐसे तन कै डाहहु भाई।।
जो हीरा घन सहै घनोर। होहि हिरंबर बहुरि न फैरा।।।

दरिया कहे शब्द निरवाना--(दरिया बिहारवाले)--प्रवचन-06

आज जी भर देख लो तुम चांद को—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 26 जनवरी 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना

प्रश्‍नसार :

1—भगवान, आपके प्रेम में बंध संन्यास ले लिया है। और अब भय लगता है कि पता नहीं क्या होगा?

2—क्या आपकी धारणा के भारत पर कुछ कहने की मेहरबानी करेंगे?

3—जीवन व्यर्थ क्यों मालूम होता है? आपके पास आने पर अर्थ की थोड़ी झलक मिलती है, पर वह खो-खो जाती है।

4—आपने मेरे हृदय में प्रभु-प्रेम की आग लगा दी है। अब मैं जल रहा हूं। भगवान, इस आग को शांत करें!

5—मैं संन्यास तो लेना चाहता हूं, पर अभी नहीं। सोच-विचार कर फिर आऊंगा। आपका आदेश क्या है?

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

दरिया कहे शब्द निरवाना--(दरिया बिहारवाले)--प्रवचन-03



भजन भरोसा एक बल—(प्रवचन—तीसरा)
दिनांक 23 जनवरी 1979 ;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

सारसूत्र :
बेवाह के मिलन सों, नैन भया खुसहाल।
दिल मन मस्त मतवल हुआ, गूंगा गहिर रसाल।।
भजन भरोसा एक बल, एक आस बिस्वास।
प्रीति प्रतीति इक नाम पर, सोइ संत बिबेकी दास।।
है खुसबोई पास में, जानि परै नहिं सोय।
भरम लगे भटकत फिरे, तिरथ बरत सब कोय।।
जंगम जोगी सेपड़ा पड़े काल के हाथ।
कह दरिया सोइ बाचिहै, सत्तनाम के साथ।।
बारिधि अगम अथाह जल, बोहित बिनु किमि पर।
कनहरिया गुरु ना मिला, बूड़त है मंजधार।

बुधवार, 27 सितंबर 2017

दरिया कहे शब्द निरवाना-(दरिया बिहारवाले्)--प्रवचन-02



वसंत तो परमात्मा का स्वभाव है—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 22 जनवरी, 1979;
श्री ओशो आश्रम, पूना

प्रश्‍नसार :

1—आपने संन्यासरूपी प्रसाद दिया है, वह पचा सकूंगी या नहीं?

2—मैं वृद्ध हो गया हूं, सोचता था कि अब मेरे लिए कोई उपाय नहीं है। लेकिन...भगवान, यह क्या हो रहा है? मैं कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा हूं?

3—भगवान,
प्रेम की चुनरी ओढ़ा दी है आपने।
खूब-खूब अनुग्रह से भर गयी हूं।
बहाने और भी होते जो जिंदगी के लिए
हम एक बार तेरी आरजू भी खो देते

4—एक मित्र का अनूठा बयान...।

5—वसंत तो परमात्‍मा का स्‍वभाव है।

दरिया कहै शब्द निरबाना-(दरिया बिहारवाले)--प्रवचन--01



अबरि के बार सम्हारी—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 21 जनवरी 1976;
श्री ओशो आश्रम, पूना

सारसूत्र :
भीतर मैल चहल कै लागी, ऊपर तन धोवै है।
अविगत मुरति महल कै भीतर, वाका पंथ न जोवे है।।
जगति बिना कोई भेद न पौवे, साध-सगति का गोवे हैं।।
कह दरिया कुटने बे गोदी, सीस पटकि का रोवे है।।
विहंगम, कौन दिसा उड़ि जैहौ।

नाम बिहूना सो परहीना, भरमि-भरमि भौर रहिहौ।।
गुरुनिन्दर वद संत के द्रोही, निन्दै जनम गंवैहौ।
परदारा परसंग परस्पर, कहहु कौन गुन लहिहौ।।
मद पी माति मदन तन व्यापेउ, अमृत तजि विष खैहौ।
समुझहु नहिं वा दिन की बातें, पल-पल घात लगैहौ।।
चरनकंवल बिनु सो नर बूड़ेउ, उभि चुभि थाह न पैहौ।
कहै दरिया सतनाम भजन बिनु, रोइ रोइ जनम गंवैहौ।।
बुधजन, चलहु अगम पथ भारी।

दरिया बिहारवाले--दरिया कहै शब्द निरबाना-ओशो



दरिया कहै शब्द निरबाना (दरियादास बिहारवाले)

(ओशो)
 रिया जैसे व्यक्ति के शब्द दरिया के भीतर जन्म गए शून्य से उत्पन्न होते हैं।
वे उसके शून्य की तरंगें हैं। वे उसके भीतर हो रहे अनाहत नाद में डूबे हुए आते हैं। और जैसे कोई बगीचे से गुजरे, चाहे फूलों को न भी छुए और चाहे वृक्षों को आलिंगन न भी करे, लेकिन हवा में तैरते हुए पराग के कण, फूलों की गंध के कण उसके वस्त्रों को सुवासित कर देते हैं। कुछ दिखायी नहीं पड़ता कि कहीं फूल छुए, कि कही कोई पराग वस्त्रों पर गिरी, अनदेखी ही, अदृश्य ही उसके वस्त्र सुवासित हो जाते हैं। गुलाब की झाड़ियों के पास से निकलते हो तो गुलाब की कुछ गंध तुम्हें घेरे हुए दूर तक पीछा करती है। ऐसे ही शब्द जब किसी के भीतर खिले फूलों के पास से गुजर कर आते हैं तो उन फूलों की थोड़ी गंध ले आते हैं। मगर गंध बड़ी भनी है। गंध अनाक्रामक है। गंध बड़ी सूक्ष्मातिसूक्ष्म है। जो हृदय को बिलकुल खोलकर सुनेंगे, शायद उनके नासापुटों को भर दे; शायद उनके प्राण में उमंग बनकर नाचे; शायद उनके भीतर की वीणा के तार छू जाएं; शायद उनके भीतर अनाहत का जागरण होने लगे; शायद उनकी आंखें खुलें, उन्मेष हो,