दिनांक 10 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।
पहला प्रश्न :
अष्टावक्र—गीता में जीवन—मुक्त की चर्चा कई बार हुई है। जीवन—मुक्त पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।
वन जैसा है वैसी ही मृत्यु होगी। जो उस पार है वैसा ही इस पार होना पडेगा। जैसे तुम यहां हो वैसे ही वहां हो सकोगे। क्योंकि तुम एक सिलसिला हो, एक तारतम्य हो। ऐसा मत सोचना कि मृत्यु के इस पार तो अंधेरे में जीयोगे और मृत्यु के उस पार प्रकाश में। जो यहां नहीं हो सका, वह केवल शरीर छूट जाने से नहीं हो जायेगा। तुम तुम ही रहोगे। मौत से कुछ भेद नहीं पड़ता है। तुम आनंदित थे जीवन में, तो मृत्यु के पार भी आनंदित रहोगे; फुत्यु के मध्य भी आनंदित रहोगे। तुम दुखी थे तो मृत्यु तुम्हें सुख न दे पायेगी। अगर तुम जीवन में नर्क में हो तो जीवन के पार भी नर्क ही तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा। इसे तुम ठीक से समझ लो।


