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मंगलवार, 12 जून 2018

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--60

प्रभु—मंदिर यह देह री—प्रवचन—पंद्रहवां

दिनांक 10 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

पहला प्रश्न :

अष्टावक्र—गीता में जीवन—मुक्त की चर्चा कई बार हुई है। जीवन—मुक्त पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

 न जैसा है वैसी ही मृत्यु होगी। जो उस पार है वैसा ही इस पार होना पडेगा। जैसे तुम यहां हो वैसे ही वहां हो सकोगे। क्योंकि तुम एक सिलसिला हो, एक तारतम्य हो। ऐसा मत सोचना कि मृत्यु के इस पार तो अंधेरे में जीयोगे और मृत्यु के उस पार प्रकाश में। जो यहां नहीं हो सका, वह केवल शरीर छूट जाने से नहीं हो जायेगा। तुम तुम ही रहोगे। मौत से कुछ भेद नहीं पड़ता है। तुम आनंदित थे जीवन में, तो मृत्यु के पार भी आनंदित रहोगे; फुत्यु के मध्य भी आनंदित रहोगे। तुम दुखी थे तो मृत्यु तुम्हें सुख न दे पायेगी। अगर तुम जीवन में नर्क में हो तो जीवन के पार भी नर्क ही तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा। इसे तुम ठीक से समझ लो।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--59

साक्षी स्‍वाद है संन्‍यास का—प्रवचन—चौदहवां

दिनांक 9 दिसंबर, 1976
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

अष्‍टावक्र उवाच:

क्व मोह: क्‍व न वा विश्वं क्‍व ध्यानं क्‍व मुक्तता।
सर्वसंकल्पसीमायां विश्रांतस्य महात्मन:।। 110।!
येन विश्वमिदं दुष्टं स नास्तीति करोति वै।
निर्वासन: किं कुस्ते यश्यब्रयि न यश्यति।। 111।।
येन दूष्‍टं परं ब्रह्म सोउहं ब्रह्मेति चितयेत्।
किं चिंतयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न यश्यति।। 112।।
दुष्टो येनात्मविक्षेयो निरोधं कुस्ले त्वसौ।
उदारस्तु न विक्षिक्त: साथ्याभावात्करोति किम्।। 113।।
धीरो लोकवियर्यस्तो वर्तमानोउपि लोकवत्।
न समाथि न विक्षेप न लेपं स्वस्थ पश्यति।। 114।।
भावाभावविहीनो यस्तुप्तो निर्वासनो बध:।
नैव किंचिक्ततं तेन लोकद्वष्ट्या विकुर्वता।। 115।।
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रह:।
यदा यत्कर्त्तुमायाति तकृत्वा तिष्ठत: सुखम्।। 116।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--58

संन्‍यास—सहज होने की प्रक्रिया—प्रवचन—तैरहवां  
दिनांक 8 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

आपने संन्यास देते ही मुक्त करने की बात कही, लेकिन मुक्त होते ही संन्यासी का जीवन आमूल रूप से परिवर्तित क्यों नहीं हो पाता है? हालत ऐसी है कि संन्यास के बाद भी वह अपनी पुरानी मनोदशा में ही जीता है। कभी—कभी तो सामान्य सतह से भी नीचे गिर जाता है। मुक्ति का सुवास उसे तत्‍क्षण एक ईमानदार महामानव क्यों नहीं बना पाता? क्या इससे 'संचित' का संकेत नहीं मिलता कि सब कुछ पूर्व—कर्म से बंधा है, नीयत है?

हली बात मैंने कहा, मैं संन्यास देते ही तुम्हें मुक्त कर देता हूं;
मैंने यह नहीं कहा कि तुम मुक्त हो जाते हो। मेरे मुक्त करने से तुम कैसे मुक्त हो जाओगे? मेरी घोषणा के साथ जब तक तुम्हारा सहयोग न हो, तुम मुक्त न हो पाओगे। तुमने अगर अपने बंधनों में ही प्रेम बना रखा है और जंजीरें तुम्हें आभूषण मालूम होने लगी हैं

अष्‍टावक्र: महागीता--प्रवचन--57

तथाता का सूत्र—सेतु है—प्रवचन—बारहवां

दिनांक 7 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

अष्‍टावक्र उवाच:

आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ व कल्पितौ।
निष्काम: किविजानाति किंब्रूते च करोति किम्।। 184।।
अयं सोउहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पना:।
सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीभूतस्थ योगिनः।। 185।।
न विक्षेयो न चैकाग्रयं नातिबोधो न मूढ़ता।
न सुखं न च वा दुःखमुयशांतस्थ योगिनः।। 186।।
स्वराज्ये भैशवृत्तौ न लाभालाभे जने वने।
निर्विकल्यस्वभावस्थ न विशेषोउस्ति योगिनः।। 187।।
क्य धर्म: क्य न वा काम: क्य चार्थ क्य विवेकिता।
ड़दं कृतमिद नेति द्वंद्वैर्मुक्तस्थ योगिनः।। 188।।
कृत्य किमयि नैवास्ति न कायि हृदि रंजना।
यथा जीवनमेवेह जीवनमुक्तस्थ योगिनः।। 189।।

अष्‍टावक्र: महागीता--प्रवचन--56

आलसी शिरोमणि—प्रवचन—ग्‍यारहवां

6 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

बड़ी जहमतें उठायीं तेरी बंदगी के पीछे मेरी हर खुशी मिटी है तेरी हर खुशी के पीछे मैं कहा—कहा न भटका तेरी बकी के पीछे! अब आगे मैं क्या करूं, यह बताने की अनकंपा करें।

 रने में भटकन है। फिर पूछते हो, आगे क्या करूं! तो मतलब हुआ : अभी भटकने से मन भरा नहीं। करना ही भटकाव है। साक्षी बनो, कर्ता न रहो।..... .तो फिर मेरे पास आ कर भी कहीं पहुंचे नहीं। फिर भटकोगे। किया कि भटके। करने में भटकन है। कर्ता होने में भटकन है। लेकिन मन बिना किये नहीं मानता। वह कहता है, अब कुछ बतायें, क्या करें?

अष्‍टावक्र: महागीता--प्रवचन--55

परमात्‍मा हमारा स्‍वभावसिद्ध अधिकार है—प्रवचन--दसवां

दिनांक 5 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

सूत्रसार:

अष्‍टावक्र उवाच:

यस्य बोधोदये तावक्यम्नवद्भवति भ्रम:।
तस्मै सुखैकरूयाय नम: शांताय तेजसे।। 177।।
अर्जयित्वाउखिलानार्थान् भोगानाम्मोति पुष्कलान्।
नहि सर्वयरित्यागमतरेण सखी भवेत।। 178।।
कर्तव्यदु:खमार्तडब्बालादग्धांतरात्मनः।
कुतः प्रशमयीयूषधारा सारमृते सुखम्।। 179।।
भवोउयं भावनामात्रो न किंचित्यरमार्थत।
नात्‍स्‍यभाव: स्वभावानां भावाभार्वावभाविनाम्।। 180।।
न दूरं न च संकोचाल्लब्धमेवात्मन: पदम्।
निर्विकल्प निरायासं निर्विकार निरंजनम्।। 181।।
व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रत:।
वीतशोका विराजंते निरावरणदृष्टय:।। 182।।
समस्त कल्यनामात्रमात्मा मक्त: सनातन:।
इति विज्ञाय धीरो हि किमथ्यस्यति बालवत्।। 183।।

अष्‍टावक्र: महागीता--प्रवचन--54

साक्षी, ताओ और तथाता—प्रवचन—नौवां

      दिनांक 4 दिसंबर, 1976;
      श्री रजनीश आश्रम पूना।
     प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

अष्टावक्र के साक्षी, लाओत्सु के ताओ और आपकी तथाता में समता क्या है और भेद क्या है?
मता बहुत है, भेद बहुत थोड़ा।
लाओत्सु ने जिसे ताओ कहा है वह ठीक वही है जिसे वेदों में ऋत कहा है—ऋतंभरा, या जिसे बुद्ध ने धम्म, धर्म कहा; जो जीवन को चलाने वाला परम सिद्धात है, जो सब सिद्धातो का सिद्धात है, जो इस विराट विश्व के अंतरतम में छिपा हुआ सूत्र है। जैसे माला के मनके हैं और उनमें धागा पिरोया हुआ है; एक ही धागा सारे मनकों को संभाले हुए है। हजार—हजार नियम हैं जगत में, इन सब नियमों को संभालने वाला एक परम नियम भी होना चाहिए; अन्यथा सब बिखर जायेगा, माला टूट जायेगी। मनके दिखाई पड़ते हैं; भीतर छिपा धागा दिखाई नहीं पड़ता। दिखाई पड़ना भी नहीं चाहिए; नहीं तो माला ठीक से बनायी नहीं गयी।

अष्‍टावक्र:महागीता--प्रवचन--53

धर्म अर्थात सन्‍नाटे की साधना—प्रवचन—आठवां  

3 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

सूत्र:

सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वां मृत्युं वा समुपस्थितम्।
अविह्वलमना स्वस्थो मुक्त एव महाशय:।। 170।।
सखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु च विपत्स च।
विशेषो नैव धीरस्थ सर्वत्र समदर्शिन:।। 171।।
न हिंसा नैव कारुण्य नौद्धत्यं न च दीनता।
नाश्चर्यं नैव च क्षोभ: क्षीणसंसरणे नरो। 172।।
न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुप:।
असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमयाश्नते।। 173।।
समाधानासमाधानहिताहितविकल्यना:।
शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थित:।। 174।।
निर्ममो निरहंकारो न किचिदिति निश्चित:।
अंतर्गलित सर्वाश: कर्वन्नयि करोति न।। 175।।
मन: प्रकाशसंमोहस्वम्मजाड्यविवर्जित:।
दशां कामयि संप्राप्तो भवेदगलितमानम:।। 176।।

अष्‍टावक्र: महागीता--प्रवचन--52

तू स्‍वयं मंदिर है—प्रवचन—सातवां  

दिनांक 2 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

आपने कहा कि संसार के प्रति तृप्ति और परमात्मा के प्रति अतृप्ति होनी चाहिए। और आपने यह भी कहा कि कोई भी आकांक्षा न रहे; जो है उसका स्वीकार, उसका साक्षी—भाव रहे। इन दोनों वक्तव्यों के बीच जो विरोधाभास है, उसे स्पष्ट करने की अनकंपा करें।

 विरोधाभास दिखता है, है नहीं। और दिखता इसलिए है कि तुम जो भाषा समझ सकते हो वह सत्य की भाषा नहीं। और सत्य की जो भाषा है वह तुम्हारी समझ में नहीं आती।
जैसे समझो.. जो तुम समझ सको वहीं से समझना ठीक होगा।
कहते हैं, प्रेम में हार, जीत है। दिखता है विरोधाभास है। क्योंकि हार कैसे जीत होगी? जीत में जीत होती है। और अगर प्रेम को न जाना हो तो तुम कहोगे, यह तो बात उलटबांसी हो गयी, यह तो पहेली हो गयी। हार में कैसे जीत होगी पृ लेकिन अगर प्रेम की एक बूंद भी तुम्हारे जीवन में आयी हो, जरा—सा झोंका भी प्रेम का आया हो, एक लहर भी उठी हो, तो तुम तत्क्षण पहचान लोगे विरोधाभास नहीं है।

अष्‍टावक्र: महागीता--प्रवचन--51

शून्‍य की वीणा: विराट के स्‍वर—प्रवचन—छठवां

दिनांक 1 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

अष्‍टावक्र उवाच--

कृतार्थोउनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधी कृती।
यश्यंच्छण्वमृशजिं घ्रन्नश्नब्रास्ते यथासुखम्।। 164।। 
शून्य द्वष्टिर्वृथर चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि न।
न सहा न विरक्तिर्वा क्षीण संसार सागरे।। 165।।
न जागर्ति न निद्राति नोन्यीलति न मीलति।
अहो यरदशा क्यायि वर्तते मुक्तचेतस।। 166।।
सर्वत्र दुश्यते स्वस्थ: सर्वत्र विमलाशय।
समस्तवासनामुक्तो मुक्त: सर्वत्र सजते।। 167।। 
पश्यंच्छण्वनव्यूर्शाब्ज घ्रन्नश्नत्राह्यन्वदन्वव्रजन्।
र्ड़हितानीहितैर्म?क्तो मुक्त एव महाशय:।। 168।।
न निन्दति न न स्तौति न हष्यति न कष्यति।
न ददाति न गृहणाति मुक्त: सर्वत्र नीरस:।। 169।।

अष्‍टावक्र: महागीता--प्रवचन--50

रसो वै स:--प्रवचन—पाँचवाँ  

दिनांक 30 नवंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

काम, क्रोध, लोभ, मोह क्या समय की ही छायाएं हैं? समय का सार क्या है? कृपा करके हमें समझायें।

 मय को दो ढंग से सोचा जा सकता है। एक तो घड़ी का समय है, वह तो बाहर है। उससे तुम्हारा कुछ लेना— देना नहीं है। एक तुम्हारे भीतर समय है। उस भीतर के समय से घड़ी का कुछ लेना—देना नहीं है। तो जब भी मैं कहता हूं कि वासना समय है, कामना समय है, तृष्णा समय है—तो तुम घड़ी का समय मत समझना। तुम्हारे भीतर एक समय है। जब हम कहते हैं, बुद्ध और महावीर कालातीत हो गये, तो ऐसा नहीं है कि घड़ी चलती होती है तो उनके लिए बंद हो जाती है। घड़ी तो चलती रहती hऐ—भीतर की घड़ी बंद हो गयी। ध्यान में, समाधि में, भीतर का समय शून्य हो जाता है।

सोमवार, 11 जून 2018

अष्‍टावक्र: महागीता--प्रवचन--49

सहज ज्ञान का फल है तृप्‍ति—प्रवचन—चौथा

दिनांक 29 नवंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

अष्‍टावक्र: उवाज:

तेन ज्ञानफलं प्राप्त योगाभ्यासफलं तथा।
तृप्त: स्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकी रमते तु य:।। 157।।
न कदाचिज्जगत्यस्मिंस्तत्त्वज्ञो हन्त खिद्यति।
यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्मांडमंडलम्।। 158।।
न जातु विषय!: केउपि स्वारामं हर्षयज्यमी।
सल्लकीपल्लवप्रीतिमिवेमं निम्बयल्लवा:।। 159।।
यस्‍तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्याधिवासित।
अभुक्तेषु निराकांक्षी ताइशो भवदुर्लभ:।।160।।
बुभुमुरिह संसारे मुमुमुरपि दृश्यते।
भोगमोक्षनिराकांक्षरई विरलो हि महाशय:।। 161।।