दिनांक 13 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।
प्रवचन-छट्ठवां-(अश्लीलता: नैतिकता का फल)
प्रश्न यह है कि चित्रों में, पोस्टर्स
वगैरह में अश्लील चीजें पेश की जाती हैं। तो लोग अश्लील हैं, यानी पोस्टर्स से, इनसे नहीं बदले हैं, मगर वे खुद अश्लील हैं ही। इसलिए वे जो चित्र वगैरह में ले आते हैं। तो
मेरा सवाल यह है कि यह जो कार्य-कारण संबंध है वह एकमार्गी नहीं है, द्विमार्गी है। हो सकता है कि लोग थोड़े अश्लील हों, अश्लील
चीजें पसंद करते हों। मगर ये चित्र, ये पोस्टर्स, ये फिल्म वगैरह उस अश्लीलता को और ज्यादा बढ़ाएं, कुछ
ऐसा पेश करते हैं। तो इसलिए सिर्फ लोगों की अश्लीलता यही कारण है, मगर दूसरी तरफ से वह कार्य-कारण संबंध जो है, द्विमार्गी
चलता है। इसलिए अगर कोई कहे कि फिल्म और पोस्टर बढ़ा रहे होंगे या अश्लीलता कम की
जानी चाहिए...
वे
मित्र पूछ रहे हैं कि ऐसा मैंने कहा कि लोग अश्लील हैं, उनके मन
की मांग अश्लीलता की है, इसीलिए अश्लील चित्र, फिल्में, गीत उन्हें पसंद पड़ते हैं। मित्र पूछ रहे
हैं कि यह संबंध दोहरा हो सकता है। यह हो सकता है कि अश्लील चित्रों, फिल्मों और गीतों को सुन कर उनमें अश्लीलता भी पैदा होती हो।

