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मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-06



चेत सके तो चेत-(विविध)-ओशो
दिनांक 13 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।
प्रवचन-छट्ठवां-(अश्लीलता: नैतिकता का फल)

प्रश्न यह है कि चित्रों में, पोस्टर्स वगैरह में अश्लील चीजें पेश की जाती हैं। तो लोग अश्लील हैं, यानी पोस्टर्स से, इनसे नहीं बदले हैं, मगर वे खुद अश्लील हैं ही। इसलिए वे जो चित्र वगैरह में ले आते हैं। तो मेरा सवाल यह है कि यह जो कार्य-कारण संबंध है वह एकमार्गी नहीं है, द्विमार्गी है। हो सकता है कि लोग थोड़े अश्लील हों, अश्लील चीजें पसंद करते हों। मगर ये चित्र, ये पोस्टर्स, ये फिल्म वगैरह उस अश्लीलता को और ज्यादा बढ़ाएं, कुछ ऐसा पेश करते हैं। तो इसलिए सिर्फ लोगों की अश्लीलता यही कारण है, मगर दूसरी तरफ से वह कार्य-कारण संबंध जो है, द्विमार्गी चलता है। इसलिए अगर कोई कहे कि फिल्म और पोस्टर बढ़ा रहे होंगे या अश्लीलता कम की जानी चाहिए...
वे मित्र पूछ रहे हैं कि ऐसा मैंने कहा कि लोग अश्लील हैं, उनके मन की मांग अश्लीलता की है, इसीलिए अश्लील चित्र, फिल्में, गीत उन्हें पसंद पड़ते हैं। मित्र पूछ रहे हैं कि यह संबंध दोहरा हो सकता है। यह हो सकता है कि अश्लील चित्रों, फिल्मों और गीतों को सुन कर उनमें अश्लीलता भी पैदा होती हो।

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-05



चेत सके तो चेत-(विविध)-ओशो

दिनांक 11 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।
प्रवचन-पांचवा-(खोलो नये ऊर्जा द्वार)

कोई भी काम टेंशन पैदा कर रहा है, कोई भी काम ऊब पैदा कर रहा है। काम सवाल ही नहीं है। हम कैसे काम को लेते हैं--यह सवाल है। हमारा एटिटयूड क्या है। काम तो सब बोरिंग हैं। रोज रिपिटीटिव हैं। वही तुम्हें फिर करना पड़ेगा--चाहे दफ्तर जाओ, चाहे पढ़ाने जाओ, चाहे फैक्ट्री में जाओ, चाहे मजदूरी करो। रोज वही काम करना पड़ेगा। और एक बंधे हुए घेरे में रोज घूमना पड़ेगा। वह उबाने वाला हो ही जाएगा। पुनरुक्ति ऊबाती है, रिपीटीशन बोर्डम है। इसलिए यह तो सवाल ही नहीं है।
और रोज काम बदलोगे तो जिंदगी मुश्किल में पड़ जाएगी। और रोज-रोज काम बदला, तो बदलना भी रिपिटीटिव हो जाएगा, वह भी उबाने लगेगा। जो भी चीज दोहरने लगेगी, वह उबाने वाली हो जाएगी।

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-04



चेत सके तो चेत-(विविध)-ओशो
दिनांक 10 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।
प्रवचन-चौथा-(धर्म और चिंतन)
बुद्ध ने अपने पिछले जन्म की एक कहानी कही है। पिछले जन्म की कहानी है। तब वे बुद्धपुरुष नहीं थे। और उस जन्म में, जो उस जमाने में एक बुद्धपुरुष थे, वे उनके दर्शन करने गए थे। तो जब उन्होंने उन बुद्धपुरुष के पैर छुए, पैर छूकर वे उठ ही पाए थे कि वे बुद्धपुरुष भी झुके और इनके पैर छू लिए! ये बहुत हैरान हो गए। इन्होंने कहा कि मैं आपके पैर छुऊं, नमस्कार करूं, यह तो ठीक है। आप मेरे पैर छुएं और नमस्कार करें, यह तो मेरी समझ के बाहर हो गया! तो उस बुद्धपुरुष ने कहा कि यह तुम्हारी समझ के बाहर है। क्योंकि मुझमें जो वास्तविक हो गया है, वह तुममें संभावना है। और आज नहीं कल तुममें भी वास्तविक हो जाएगा। वास्तविक हो जाएगा तुममें भी; जो आज बीज है वह कल वृक्ष हो जाएगा। मैं उस संभावना को नमस्कार करता हूं। और इसलिए कर रहा हूं ताकि तुम्हें याद दिला सकूं कि तुममें भी वह संभावना है।

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-03



चेत सके तो चेत-(विविध)
ओशो
दिनांक 09 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।
प्रवचन-तीसरा-(धर्म की क्रांति)

पिछले साल साईंबाबा आए थे और हमारे राज्यपाल जी, मुख्यमंत्री जी, वे भी वहां गए थे। और सुना है कि प्रधानमंत्री की पत्नी को एक ताबीज भी दिया था। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि आध्यात्मिकता और चमत्कारों के बीच कोई नाता है?

आध्यात्मिकता और चमत्कार के बीच एक नाता है, वह नाता विरोध का है। आध्यात्मिक व्यक्ति चमत्कार के लिए राजी नहीं होगा, यह नाता है। और जो व्यक्ति चमत्कार के लिए राजी होता हो, उसे मदारी कहना चाहिए, आध्यात्मिक नहीं।
लेकिन मदारीपन से बहुत लोग प्रभावित होते हैं। अध्यात्म से प्रभावित होना भी बहुत मुश्किल है। मदारीपन बहुत तेजी से प्रभावित करता है। और इस भ्रम में हमें नहीं रहना चाहिए कि हमारे राज्यपाल या हमारे न्यायाधीश या हमारे मंत्री और मुख्यमंत्री, मदारियों के प्रभाव से मुक्त हैं। बल्कि सच तो यह है कि वे ज्यादा प्रभाव में हैं।

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-02



चेत सके तो चेत-(विविध)
ओशो
दिनांक 08 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।
प्रवचन-दसरा-(प्राचीन से नवीन)
आचार्य श्री, आपकी स्पीच से, क्या करना चाहिए, ऐसा कुछ ज्यादा समझ में आता है। मगर कैसे करना चाहिए? और खासतौर से इंडिविजुअल बेस पर नहीं, मगर एज ए कम्युनिटी और एज ए सोसाइटी क्या करना चाहिए, वह जरा ज्यादा डिटेल में आप बताएं।

वह तो मैं दुबारा आऊं और दिन या दो दिन रुकूं, तो आसान पड़ेगा।
लेकिन अभी तो मुल्क के सामने करने की एक ही बात है कि कुछ भी करने की जल्दी नहीं करनी चाहिए और विचार की एक हवा फैलानी चाहिए। करने की बहुत जल्दी नहीं करनी चाहिए अभी। क्योंकि जब तक मुल्क के पास ठीक विचार न हो, हम जो भी करने की कोशिश करेंगे, उससे गलत और उपद्रव ही होने का डर ज्यादा है। तो मुल्क के पास ठीक-ठीक माइंड नहीं है, इसलिए एक्शन की बहुत जल्दी गङ्ढे में ले जाने वाली है और कहीं नहीं ले जाने वाली है।
तो मेरा कहना है, अभी एक पांच-दस साल तो मुल्क को एक माइंड क्रिएट करने की कोशिश करनी चाहिए। फिर उस माइंड के पीछे एक्शन तो आता है, जैसे छाया आपके पीछे आती है। एक्शन बहुत कीमत का है ही नहीं।

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-01



चेत सके तो चेत-(विविध)

ओशो
दिनांक 07 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।
प्रवचन-पहला-(चिंतन की स्वतंत्रता)
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी बात कहूंगा।
एक बहुत पुराना गांव था। और उस गांव से भी ज्यादा पुराना एक चर्च था उस गांव में। उस चर्च की सारी दीवालें गिरने के करीब हो गई थीं। न तो कोई उपासक उस चर्च के भीतर प्रार्थना करने जाता था, न कोई कभी उस चर्च के भीतर...चर्च के भीतर जाना तो दूर, उसके पास से निकलने में भी लोग डरते थे। वह चर्च कभी भी गिर सकता था। हवाएं चलती थीं, तो गांव के लोग सोचते थे, आज चर्च गिर जाएगा। आकाश में बादल गरजते थे, तो गांव के लोग बाहर निकल कर देखते थे, चर्च गिर तो नहीं गया! बिजली चमकती थी, तो डर होता था, चर्च गिर जाएगा। ऐसे चर्च में कौन प्रार्थना करने जाता? चर्च बिलकुल मरा हुआ था, लेकिन फिर भी खड़ा हुआ था।