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गुरुवार, 14 जून 2018

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--75

मन का निस्तरण(प्रवचनपंद्रहवां)

दिनांक 25 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, कोरे गांव पार्क पूना।

सूत्र:

सर्वारंभेषु निष्कामो यश्चरेद्बालवन्मुनि:।
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्माणि।। 24०।।
स एव धन्य आत्मज्ञ: सर्वभावेषु यः सम:।
पश्यन् श्रृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्नश्नन्निस्तर्षमानस:।। 241।।
क्य संसार: क्य चाभास: क्य साध्य क्य च साधनम्।
आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्येव सर्वदा।। 242।।
स जयत्यर्थसंन्यासी पूर्णस्वरसविग्रह:।
अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते।। 243।।
बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्वो महाशय:।
भोगमोक्षनिराकाक्षी सदा सर्वत्र नीरस:।। 244।।
महदादि जगद्द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम्।
विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते।। 245।।
सर्वारंभेषु निष्कामो यः चरेत् बालवन्यूनि।
न लेप: तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेsपि कर्माणि।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--74

अवनी पर आकाश गा रहा(प्रवचनचौहदवां)


दिनांक 24 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पूना।

पहला प्रश्न :

पूर्वीय मनीषा सदगुरूओं को मनोवैज्ञानिक का संबोधन क्यों नहीं देती? क्या सदगुरु मनोवैज्ञानिक से किन्हीं अर्थों में बिलकुल भिन्न है? कृपा करके समझाइए।

नोवैज्ञानिक मनस्विद नहीं है। मन के संबंध में जानता है, मन को नहीं जानता। मन के संबंध में जानना एक बात है, मन को जानना बिलकुल दूसरी। मन के संबंध में जानना तो मन से ही हो जाता है। मन को जानना मन के पार गए बिना नहीं होता। साक्षी जानता है मन को। मन को जानने के लिए मन से भिन्न होना पड़ेगा, पार होना पड़ेगा। मन से ऊपर उठना पड़ेगा। मन से जो घिरे हैं वे मन को न जान पाएंगे।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--73

मूढ़ कौन, अमूढ़ कौनप्रवचनतेहरवां

दिनांक 23 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पूना।

अष्टावक्र उवाच।

अकुर्वन्नपि संक्षोभात् व्यग्र: सर्वत्र मूढ़धी।
कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलों हि निराकुल:।।234।।
सुखमास्ते सुखं शेते सुखमायाति याति च।
सुखं वक्ति सुखं भुक्ते व्यवहारेऽपि शांतधी:।।235।।
स्वभावाद्यस्य नैवार्तिलोकवदव्यवहारिण:।
महाहृद इवाक्षोभ्यो गतक्लेश: सुशोभते।।236।।
निवृत्तिरपि मूढ़स्य प्रवृत्तिरुपजायते।
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी।।237।।
परिग्रहेषु वैराग्य प्रायो मूढ़स्य दृश्यते।
देहे विगलिताशस्य क्य राग: क्य विरागता।।238।।
भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढ़स्य सर्वदा।
भाव्यभावनया सा तु स्वस्थयादृष्टिरूपिणी।।239।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--72

सदगुरूओं के अनूठे ढंग—(प्रवचन—बारहवां)  


 22 जनवरी, 1977
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

कृष्णमूर्ति परम ज्ञानी होकर भी अन्य सदगुरूओं के कार्यों की निंदा, आलोचना क्यों करते हैं?

 ब तक परम ज्ञानी न हो जाओ, न समझ सकोगे। अज्ञान के तल से जो निंदा और आलोचना मालूम होती है, ज्ञान के तल से वह केवल करुणा है। तुम भटक न जाओ इसलिए; तुम गलत में न पड़ जाओ इसलिए; जब श्रेष्ठ उपलब्ध हो तो तुम निकृष्ट न चुन लो इसलिए।
फिर खयाल रहे कि सत्य की अनंत अभिव्यक्तियां हैं। और सत्य की प्रत्येक अभिव्यक्ति 'मैं सही हूं, इस भाव के साथ ही पैदा होती है। सत्य स्वत: प्रमाण है। इसलिए जब भी सत्य का अनुभव होता है तो जो भी अभिव्यक्ति सत्य को मिलती है, वह इतनी प्रगाढ़ता से मिलती है कि इससे अतिरिक्त सब गलत है, यह भाव उसमें सम्मिलित होता है।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--71

निराकार ,निरामय साक्षित्व—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

दिनांक 21 जनवरी, 1977;
श्री रजनीश आश्रम, कोरेगांवपार्क पूना।

अष्टावक्रउवाच।

अकर्तृत्वमभोक्तृत्व वात्मनो मन्यते यदा।
तदा क्षीणा भवंत्येव समस्ताश्चित्तवृत्तय:।।227।।
उच्छृंखलाप्यकृतिका स्थितिर्धीरस्य सजते।
न तु संस्पृहचित्तस्य शांतिर्मूढुस्य कृत्रिमा।।228।।
विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुकाबुद्धय:।।229।।
श्रोत्रिय देवता तीर्थमंगनां अति प्रियम्।
दृष्ट्वासम्पूज्य धीरस्यनकापिहृदिवासना।।23०।।
भृत्यै: पुत्रै: कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजै:।
विहस्यधिक्कृतोयोगीनयातिविकृतिमनाक्।।231।।
संतुष्टोऽपि न संतुष्ट: खिन्नोऽपि न च खिद्यते।
तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा व जानन्ते।।232।।
कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरय।
शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः।।233।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--70

स्वातन्त्रात् परम पदम--(प्रवचन—नौवां)


दिनांक 19 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम कोरगांव पार्क पूना,

सूत्र:

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिता शरणार्थिन:।
विशंति झटिति क्रोड निरोधैकाग्न्यसिद्धये।। 22।।।
निर्वासन हरि दृष्टत्वा तूष्णीं विषयदतिन।
पलायंते न शक्तास्ते सेवते कृतचाटव।। 222।।
न मुक्तिकारिका धते निशको युक्तमानस:।
पश्यन्धृण्वन्स्पृशनजघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम्।। 223।।
वस्तु श्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकु ल:।
नैवाचारमनाचारमौदास्य वा प्रपश्यति।। 224।।
यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजु:।
शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत्।। 225।।
स्वातब्यात् सुखमान्नोति स्वातंन्याल्लभते परम।
स्वातष्यान्निर्वृतिं गच्छेत् स्वातंव्वात् परमं पदम-।। 226।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--69

स्वातन्त्रात् परम पदम--(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 19 जनवरी, ।977;
श्री ओशो आश्रम कोरगांव पार्क पूना,

सूत्र:

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिता शरणार्थिन:।
विशंति झटिति क्रोड निरोधैकाग्न्यसिद्धये।। 22।।।
निर्वासन हरि दृष्टत्वा तूष्णीं विषयदतिन।
पलायंते न शक्तास्ते सेवते कृतचाटव।। 222।।
न मुक्तिकारिका धते निशको युक्तमानस:।
पश्यन्धृण्वन्स्पृशनजघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम्।। 223।।
वस्तु श्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकु ल:।
नैवाचारमनाचारमौदास्य वा प्रपश्यति।। 224।।
यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजु:।
शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत्।। 225।।
स्वातब्यात् सुखमान्नोति स्वातंन्याल्लभते परम।
स्वातष्यान्निर्वृतिं गच्छेत् स्वातंव्वात् परमं पदम-।। 226।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--68

मन तो मौसम-सा चंचल—(प्रवचन—आठवां)

 8 जनवरी, 977,
श्री ओशो  आश्रम, कोरेगांव, पूना

पहला प्रश्न :

आपने कहा कि ज्ञानी स्पदरहित हो जाता है और आपने यह भी कहा कि जिस में स्पंदन नहीं है वह चीज मृत है। कृपापूर्वक समझाएं कि स्पंदनरहित होकर ज्ञानी पुरुष कैसे जीवित रहते हैं।

एक और भी स्पंदन है, और एक और भी जीवन है, जहां अस्मिता तो नहीं है लेकिन अस्तित्व है; जहां मैं तो नहीं हूं परमात्मा है। जहां अहंकार तो मर गया, जा चुका, अतीत हो गया, लेकिन अहंकार के पार भी एक जीवन है, एक स्पंदन है। वस्तुत: तो वही जीवन है।
तो ज्ञानी एक अर्थ में तो मृत हो जाता है, और एक अर्थ में परम रूप से जीवित हो जाता है। इस अर्थ में मृत हो जाता है कि अब अपने ही माध्यम से परमात्मा को जीता है, स्वयं को नहीं। इस अर्थ में मृत हो जाता है कि अब अहंकार की तो कब बन गई। अब खुदी तो न रही, खुदा है। और खुदा भरपूर है। अब परमात्मा बहता है। ज्ञानी तो बांस की पोंगरी हो गया। प्रभु गाता है तो गीत पैदा होता है। बांसुरी खुद नहीं गाती, लेकिन बांसुरी का भी गीत है। बांसुरी से गीत पैदा होता है। बांसुरी माध्यम बनती है, बाधा नहीं डालती।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--67

दृश्य से द्रष्टा में छलांग—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 17 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पूना।

सूत्र:

क्यात्मनो दर्शन तस्य यदृष्टमवलंबते।
धीरास्तं तं न पश्यति पश्यंत्यात्मानमव्ययम्।।216।।
क्य निरोधो विमूढ़स्य यो निर्बंध करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदाऽसावकृत्रिम:।।217।।
भावस्य भावक: कश्चिन्न किचिद्भावकोऽपर:।
उभयाभावक: कश्चिदेवमेव निराकुल:।।218।।
शुद्धमद्वयमात्मान भावयति कुबुद्धय:।
न तु जानन्ति समोहाद्यावज्जीवमनिर्वृता।।219।।
मुमुक्षोर्बुद्धिरालबमतरेण न विद्यते।
निरालंबैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा।।22०।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--66

अपनी बानी प्रेम की बानी—प्रवचन—छठवां

दिनांक 16 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

चार—पांच वर्षों से आपको सुन रहा हूं। कभी—कभी संन्यास लेने की इच्छा प्रगाढ़ हो जाती है, इसलिए इस बार आपके पास संन्यास लेने के लिए आया हूं। लेकिन जब से घर से निकला हूं तब से शरीर में कंपन और मन में कुछ घबड़ाहट का अनुभव हो रहा है। और मन संन्यास के लिए राजी नहीं मालूम होता। यह क्या है और अब क्या करूं?

न कैसे राजी होगा संन्यास के लिए? संन्यास तो मन की मृत्यु है। संन्यास तो मन का आत्मघात है। तो मन तो बेचैन हो, यह स्वाभाविक है। मन तो डरे, कंपे, यह स्वाभाविक है। मन तो हजार बाधाएं खड़ी करे, यह स्वाभाविक है। मन चुपचाप राजी हो जाए तो चमत्कार है। मन तो छोटी—मोटी बातों में भी राजी नहीं होता, दुविधा—द्वंद्व खड़ा करता है। छोटी—मोटी बातों में, जहां कुछ भी दांव पर नहीं है—यह कपड़ा पहनूं या यह पहनम मन वहां भी द्वंद्वग्रस्त हो जाता है। यह करूं या वह करूं, वहां मन डांवाडोल होने लगता है।