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गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-40



अध्याय—40 (ध्‍यान का अनुभव)

स तरह से ये जीवन के चौथे मृत्यु द्वार को मैं छूकर आया हूं। ये एक नादानी नहीं तो ओर क्‍या है क्‍या अभी भी मेरे अंदर बालपन एक अलहड़ पन समया है, अकसर बहुत लाडप्यार के कारण आदमी का लडकपन कैसा थिर सा हो जाता है मानों उसमें गति ही न हो। आज आधुनिक भागदौड में बच्चे कितनी जल्दी अपना बालपन खो देते है। ओर युवां अपना यूवा पन। समाज उनको स्वछंद विकास करने ही नहीं देता है। इस सुंदर माहोल में जीवन का रस्‍सा स्‍वाद अनुभव बड़े भाग्य से मिलता है ओर मेरी नजरों में इसकी कोई कदर नहीं। मैं इस अमूल्य अवसर को यूहीं फेंकता फिरता हूं। इस वरदान की अगर मैं कदर नहीं करुंगा तो कब—कब मेरे पास फिर लोट का आयेगा कब—कब कुदरत मुझे मोंके देती रहेगी। जीवन में जरूर कुछ अच्छा किया होगा....तो ये स्थान ये मनुष्य मुझे मिले है। मुझे इस सब की कदर करनी चाहिए नहीं तो प्रकृति भी नाराज हो जायेगी। आपने द्वारे दिये इस जीवन की कदर ने देख कर इसे मुझसे छिन लेगी। ओर मैं तो खुद ही इसे फैंकने के लिए तैयार हूं। ये सब बातें सोच कर मेरा मन उदास हो गया। ओर मुझे अंदर से अपने पर क्रोध ओर गिलानि एक साथ हो रही थी। ओर मन में एक पश्चाताप भी कि अब ऐसा नहीं करूंगा परंतु ऐसा पहली बार नहीं उन पहली दुर्घटनाओं के बाद भी शायद मैंने ऐसा ही सोचा होगा।

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-39



अध्‍याय—39 (मेरा घर आना)

गह मैंने पहचान ली थी। धूंधली यादे जो गहरे में कहीं दबी पड़ी थी या कहीं सो गई थी। वह अब धीरे—धीरे जग रही थी। जैसे जैसे मन शांत ओर खुशी से भर रहा था सब बहुत अच्‍छा लग रहा था। लग रहा था वहीं सब फिर से लोट आयेगा ओर सच कहूं तो वहीं नहीं होगा उससे कहीं अधिक किमती होगा। क्योकि खोने के बाद अगर आप उस वस्‍तु या समय की किमत नहीं जान पाते तो आप जी नहीं रहे आप केवल अपने को ढो रहे हो। सब साफ दिखाई देने का मतलब यह नहीं है कि आपने उसे पा लिया। अभी भी एक लंबी दूरी ओर बाधाये थी जो मुझे पार करनी थी। कितने ही मेरे साथी कुत्‍ते मेरा मार्ग रोकेगें ओर मुझे उनसे अपने आप को बचाते हुए घर जाना होगा। ओर इस हालत में देख कर पता नहीं घर के प्राणी मुझे पहचानेगे या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं की वह मुझे घर से ही निकाल दे। कि अब तुम्‍हारी जरूरत नही है। क्‍योंकि में कितनी ही बार उन लोगो को परेशान कर चूका हूं परंतु मन में भगवान से दूआ कर रहा हूं कि एक बार—बस एक बार इस बास मुझे उस घर में जाने दे फिर देखना में कितने अच्‍छे बच्‍चे की तरह रहूगा। कोई शरारत नहीं करूंगा। अगर वह जंगल न भी ले जायेगे तो में घर पर ही रह लूंगा।

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-38



अध्‍याय—38 (लोट के बुद्धु घर को आये)

मैं कितनी देर सोता रहा...परंतु ये तो पक्‍का था कि नींद बहुत गहरी आयी। ओर गहरी नींद में कुदरत हमारी बिगडी संरचना को ठीक करने अति उत्तम समझती है। आप का विरोध खत्म हो गया ओर कुदरत आप पर अपना अप्रेशन कर सकती है। शायद इस लिए हजारों रोगो का एक राम बाण है गहरी नींद।  उठा तो सर का भार कुछ कम महसूस हो रहा था। अंदर से लगा की उठ कर चलदूं। रात कितनी बिती थी इस बात का भी मुझे कुछ पता नहीं था। चांद अभी आमान में काफी उपर है। परंतु कभी कभी उसे बादल आकर ढक लेते है। फिर भी काफी रोशनी थी। चारों ओर कोई नहीं था। दूर कहीं पर उल्‍लु के बोलने की कर्क नाद सुनाई दे रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि किधर चलू कहां चलू......चलने में मुझे कमजोरी महसूस हो रही थी। मैं याद करने की कोशिश कर रहा था कि मैं कौन हूं? धीरे—धीरे अच्‍छा लग रहा था। लग रहा था मैं चल पडू रास्‍ते का मुझे  कोई भान नहीं था कि किधर जाना है। एक अंजान शक्‍ति मुझे चलने के लिए मजबूर कर रही थी। सो मैं चल दिया। चाँद की शितलता मस्‍तिष्‍क में एक ठंड़ा पर भर रही थी। दूर दराज तक फैला पहाड़ी जंगल। कहीं कहीं अधिक गहराई थी सो जरा सम्‍हल कर चलना पड़ रहा था।

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-37



अध्‍याय—37 (मेरा जीवन संघर्ष)

ता नहीं मैं वहां कितनी देर तक में पड़ा रहा या सोता रहा या केवल स्वास चलती रही ये जीवन है तो मैं जीवित था...मैं कोन हुं कहां इस बात का मुझे कुछ भी भान नहीं था। मेरी आंखें खूली तो मैंने इधर उधर देखने कि कोशिश की तो चारों ओर चहल पहल थी। कूछ लोग हाथों में थालियां लिय इधर उधर जा रहे थे....मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब क्‍या है.....ओर ये कौन है.....तभी जोर से मंदिर का घंटा बजा ओर एक कोलाहल सा सुनाई देने लगा....एक तारबंद की तरह.....एक लयवदता चारों ओर फैल गई। हवा अभी चल रही थी। पहले तो मैं सोचने लगा की मैं कहां हूं......एक पेड़ के नीचे एक उंचे से चबुतरे पर मैं लेटा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं यहां कब आया। मैं कौन हूं......ये सब क्‍या है.....एक ना समझे से दृष्‍य मेरी आंखों के सामने तैरने लगे। लेकिन इतना सब होने पर भी किस  तरह से शरीर अपना काम करता है। उसने निर्देश दिया कि उसे प्‍यास लगी है। तब मुझे लगा की मुझे खड़ा होना चाहिए.....ओर मैं किचड़ में सने शरीर को उठाने कि कोशिश करने लगा.....बडी मुश्‍किल से मैंने अपने शरीर उठाया.....पूरा बदन पीड़ा से करहा रहा था। शरीर पर किचड़ सूख कर झड गई थी। लगा की अभी अगर उठ कर खड़ा हुआ तो गिर जाऊंगा। फिर कुछ देर शरीर को अपनी अवस्‍था में आने का इंतजार करने लगा। तब उठा तो देखता क्‍या हूं कि में तो एक उंचे चबुतरे पर एक पेड़ के नीचे लेटा हूं....मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं यहां पर कब आया?.....ओर कैसे आया?.....परंतु कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस समझ आ रहा था तो इतना की पानी पीना है।

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-36



अध्‍याय—36 (मेरा दवा की गोलियां खाना)

कुछ भय ओर अभय हमारे शरीर में किस तरह से जमा रहे है। जैसे—जैसे हम बड़े होते जाते है हमारे चेतन या अचेतन में जमा सब भाव हमारे मन पर प्रकट होने लग जाते है। इसी तरह से अचानक मुझे बीमार आदमी से अधिक भय लगने लगा था। जब भी कोई बीमार होता तो मैं उसके पास जाने से कतरता था। जिसका कारण में खुद भी नहीं जातना था हां इतना जानता था कि जब मैं बिमार होता थोड़ा या अधिक तो मुझे लगता मैं मर जाऊंगा। पहले इस बात का मुझे कोई भय नहीं था। ये अभी कुछ ही दिनों से ऐसा हुआ है। किसी—किसी ध्‍यान का संगीत सूननें पर भी मेरे अंदर तक प्राण कांप जाते ओर में डर कर सुबकने लग जाता था। वह संगीत ऐसा मेरे अंदर घंसता चला जाता की जैसे वह मुझे चीर रहा है। ओर मैं दो टुकडो में विभाजन हो रहा हूं। मैं चाह कर भी उस समय अपने शरीर को हिला नहीं सकता था। परंतु एक जागरण अंदर होता जो मुझे ये सब महसुस करा रहा था। मैं डर रहा हूं ओर मैं हिल नहीं सकता। जैसे मुझे कोई जोर से दबा रहा है एक पतली सुरंग की भांति ओर मुझे डर लगता की में इसमें फंस गया तो कैसे निकलुंगा। तब अकसर या तो मम्मी या पापा अपना ध्यान छोड कर मुझे सहलाते ओर आवाज देते.....तब मैं धीरे-धीर शरीर पर आता। वहां आने का मन नही था वह भय भी कितना शांति दाई था.....उसे शब्द नहीं दिये जा सकते।

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-35

अध्‍याय—35-(मां के अवशेष)
आज मैं दिन भर खुब सोता रहा....परंतु पापा जी का काम तो अधिक बढ़ गया था। उन्हें तो वरूण भैया को जाकर स्‍कूल से भी लाना और दूकान के लिए दूध भी लाना होता था। परंतु पापाजी मेहनत से कभी नहीं डरते थे। रात को जब पापा जी दूकान से आये तो आप शनिवार था और कल बच्‍चों के स्‍कूल की छूट्टी थी। इसलिए आज वह रात का ध्‍यान भी नहीं कर सकते थे....आज दिन का ध्‍यान मैंने खराब कर दिया और अब रात के ध्‍यान को बच्‍चे नहीं करने देंगे क्‍योंकि वह कहानी सुनाने की जिद्द कर रहे है। इतने बड़े हो गये है फिर भी कहानी बच्‍चों की तरह से सुनने की जिद्द करते है। सच पापा जी कहानी बहुत मजेदार सुनाते है....मैं भी उस संगत का आनंद मैं भी लेता था। पापा जी शब्‍दों के साथ जो भाव और उतेजना भरते है उस सब को केवल पीता हूं....ओर सब के बीच अपना अधिकार समझ कर घुस जाता हूं। एक बात और है अगर अपनी कहानी का आनंद लेना है तो आपको उसमें डुबना ही होगा। तब आपको पानी के बहार अपनी गर्दन नहीं निकालनी अपनी बुद्धि को एक तरफ ताक पर रखना होगा...एक सरलता एक सहजता ही आपको उसमें डुबो सकती है। तब आपको बच्‍चा बनना ही होगा।

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-34

अध्‍याय34 (गिदड़ो से मुठभेड़ )

 ल के जंगल के आनंद को मैं रात भर भूल नहीं पाया और उसको अपनी सूंदर स्‍मृतियों में सजो रखना चाहता था। परंतु मुझे क्‍या मालूम था हम आज भी जंगल में जायेंगे। क्‍योंकि अभी राम रतन अंकल तो आये नहीं थे इस लिए पापा जी दूकान से जल्‍दी आ जाते और हम नियम से जंगल में जाने लगे। जब हम दूकान के पास जा रहे होते तो मम्‍मी जी मुझे अपने पास बुलाना चाहती परंतु में कन्‍नी काट जाता की अब दौस्‍ती ठीक नहीं है....जंगल में जाने के दाव को में किसी पनीर या किसी दोस्‍ती की कीमत पर छोड़ना नहीं चाहता था। और मेरी इस हरकत से मम्‍मी बहुत जोर से हंसती और मेरे पास आकर मुझे प्‍यार करती और एक पनीर का टूगडा जबरदस्‍ती मेरे मुंह में ठस देती और में डर सहमा सा वहां से जल्‍दी जंगल की और जाने के छटपटता। बीच—बीच में गली के चम्‍मच कुत्‍ते भी पास आकर मुह चाटते और समर्पण कर के लेट जाते तब भी मुझे गुस्‍सा आता की नाहक टाईम खराबकर रहा है।
सुबह का घूमना कितना अनमोल है यह मैंने पहली बार जाना था। वैसे हम अकसर तो दिन में 10—11 बजे ही जाते थे या श्‍याम 4—5 बजे परंतु अब हम सुबह सात बजे जा रहे थे कई दिन से। पहले जब घूमने जाते तो जिस दिन घूमने जाते उस दिन तो बहुत अच्‍छा लगता परंतु अगले दिन बदन बहुत दुखता था। परंतु रोज—रोज जाने से थकावट महसूस नहीं होती। अभी प्रकृति पूरी तरह से जगी नहीं होती......दूर सूर्य की किरणें वक्षों के कोमल पत्‍तो को छूकर सहला रही होती और उन पर जमी ओस के लिबास को छिन रही होती।

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-33



अध्‍याय33 (जंगल का आनंद)

      क दिन मन को ने जाने क्‍यों बेचैनी ने घेर लिया। कहीं बैठना या कुछ भी करना अच्‍छा नहीं लग रहा था। शरीर एक कैद महसूस कर रहा था और मन एक घुटन। लगता था किसी खूले आकाश में चला जाऊं। बच्‍चे तो आज स्‍कूल गये हुऐ थे। पापाजी अभी दूकान से अभी आकर बैठे ही थे। शायद अब नाह धो कर ध्‍यान की तैयारी करेंगे। मैं उठा और उसके सामने जाकर बैठ गया। मुझे इस तरह से अपने पास बैठा देख कर वह समझ गये कि मुझे कुछ कहना है। पापा जी न जाने क्‍यों मन की बात बहुत जल्‍दी ही जान लेते थे। जैसे सब कुछ मेरी आंखों में लिखा मिल जाता है। मुझे और पास बुला कर मेरी गर्दन और सर पर हाथ फेरने लगे। मेरे दोनों कानों को उन्‍होंने अपने हाथ से पकड़ लिया। शायद वह गर्म थे। तभी वह कहने लगे तुझे क्‍या तनाव है कान इतने गर्म क्‍यों कर रखे है। वह मेरे कानों को प्‍यार से सहलाने लगे। मैंने उनकी गोद में सर रख दिया। कुछ देर इसी तरह से बैठे रहकर अचानक में उठा और अंदर कोठे से जाकर उनकी पुराने जूते जो वह अकसर जंगल में पहन कर जाते थे। उन्‍हें मुंह से पकड़ कर ले आया ओर लाकर उनके सामने खड़ा हो गया। ये सब देख कर तो उन्‍हें बड़ा अचरज हुआ। अरे पागल अब इतनी दोपहरी में जंगल....अभी तो मैं दुकान से आय हूं....

बुधवार, 29 नवंबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-32



अध्‍याय32 मेरा खुब सूरत अध्‍याय 

      पिरामिड का बनने का काम लगाता नहीं चलता था। परंतु बीच—बीच में उसमें अविराम आ जाता था। क्‍योंकि रामरतन अंकल जब भी अपने घर जाते तो दो तीन महीने से पहले कभी नहीं आते थे। चाहे वह दिपावली हो या होली हो। क्‍योंकि घर पर जाने के बाद पाँच काम आपका इंतजार कर रहे होते है सो उन्‍हें भी निपटाना होता था। फिर यहां आने के बाद तो वह पड़े ही रह जायेगे। परंतु ये कोई चिंता का विषय नहीं था ये तो पूरे घर लिए एक आनंद उत्‍सव और छूट्टी का माहोल हो जाता था। इन्‍हीं दिनों तो जंगल में घूमने में आनंद आता था क्‍योंकि होली के दिनों में मौसम बसंत का होता है। और दीपावली के समय में भी बारीस जा चूकि होती है और शरद आने को होती है। सौ दोनों संध्‍या बड़ी सुंदर होती है। परंतु अब काम की गति कुछ पहले से अधिक हो गई थी। क्‍योंकि रामरतन अंकल ने अब इधर उधर के सारे काम छोड़ दिये थे। और केवल यही काम अपने हाथ से करते थे। काम को न देखों तो कोन काम करता है।

सोमवार, 13 नवंबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-31



अध्‍याय31 नये घर का खरिदना

            गांव के पास जो खुबसुरत जंगल था जहां मेरी पैदाईस हुई थी.....वो सच ही सुंदर था। वह इस लिए सुंदर नहीं कह रहा कि वहां मैं पैदा हुआ। पानी के कल—कल बहते सीतल झरने....गहरे....मिट्टीके खाल....उंच्‍चे शिशम, शहमल, अमलाता और ढाक के साथ—साथ बबूल और रोंझ के दरखत। हजारो तरह के जंगली फल और जड़ी बुटीया। जानवर के नाम पर नीलगाय....जंगली गायें के झुंड के झुंड.....गिदडो की बहुतायत थी। और दूर दराज सड़क के पार बंदरों की आबादी थी। शायह ये प्राणीगहरे जंगल में रहना इस लिए पसंद नहीं करता क्‍योंकि यह वो सब चीजे खा लेता है जो मनुष्‍य खाता है। और थोड़ा चपल भी है। साथ—साथ इस हिंदुओं ने हुनमान के साथ जोड़ कर एक और महत्‍व दे दिया था। फिर भी कभी—कभार कोई बंदर अपने पद हटाये जानेके बाद गांवकी और आ जाता है। कहावत तो कि गीदड की जब मौत आती हे वे वह गांव की और दौड़ता है.....परंतु समय ने ये सब कहावत बदल दी है...वह भी गांव के आस पास रहकर अपनापेट भरता है। अगर हिंसक न हो तो शायद मनुष्‍य किसी प्राणी को नहीं मारता। ये जो बंदर गांवमें आते है ये होते तो हष्‍ठ—पुष्‍ठ है पंरतु इनके शरीर पर बहुत जगह जखमों के निशान होते है। लेकिन इस बार तो बंदर की जगह लंगुरबंदर घर पर आ गया। एक तो हमारे घर में पेड़ आदि बहुत है....इसके साथ कुछ पेड़ फलों के भी है....अनारअमरूद...शरीफा....आवला.....फालसा.....ओर चीकु.....शायद ये फल के वृक्ष भी उसे अपनी और अधिक लुभाते है।

रविवार, 12 नवंबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-30



अध्‍याय—30 मेरी मुक्‍ति

      दिसम्बर की शरदऋतु के दिन थे ठंडी हवा अंदर तक शरीर कंपा दे रही थी। तभी अचानक घर में कुछ अजीब सी हरकत शुरू हो गई। जब भी कुछ इस तरह की हरकत घर में होती तो मैं भयभीत हो जाता था। जरूर कही कुछ गलत होने वाला है। उस ऐकांत से बहुत डर जाता था जो मुझे जीना होता था। मन भी कैसा है उस जैसे जीने के लिए छोड दिया जायेऔर मेरा शक शुभा सही निकला। लगातार रोज छत पर ब्रैड सुखाई जा रही थी। और उन्‍हें एक बड़े से ड्रम में भर कर रखा जा रहा था। इत्मीनान से ऐसा काम पहले भी होता था परंतु बहुत छोटे पैमाने पर। या फिर गीदड़ों के लिए ब्रेड ले जाई जाती थी। इस तरह प्रचुर मात्रा में सूखाई जा रही है ओर उन्‍हें एक जगह जगह सम्‍हाल कर रखा जा रहा है। मन में कहीं चौर था, एक भय की आहट होने लेगी....कि जरूर कोई आपतकालिन स्‍थिति आने वाली है। वैसे मुझे सुखी हुई कुरमुरी ब्रैड़ खाने में मजा बहुत आता है।
      लेकिन बात कुछ और ही चल रही थी। घर के अंदर सब समान जमाया जा रहा था। बड़े—बड़े सूट केस खुले रखे थे। मेरे मन को एकदम से धक्‍का लगा हो न हो ये कहीं जाने की तैयारी चल रही है। पिछली बार तो भईया और दीदी  मेरे साथ रह गई थी। इस बार तो ये लोग भी बहुत खुश धूम रहे है। मैंने लाख पास जाकर सूधने की कोशिश की....परंतु मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। शायद भय के कारण में घबरा गया था ओर मेरे सुघंने की इंद्री भी ठीक तरह से काम नहीं कर रही थी। क्‍योंकि में साफ देख रहा था मन पर एक तनवा बह रहा है।

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-29


अध्‍याय–29   जीवन कुछ है?

      जीवन इतना सरल नहीं है जितना हम जीते या जानते है। वह अपने में एक अटुट गहराई समटे हुए रहता है। उसकी परत—दर—परत एक—एक नया आयाम लेकर आती है। उपरी सतह पर जिस तरह से धूल खरपतवार जमा होता है, वहीं गहराई में कहीं अधिक चिकनी मिट्टी और अधिक गहराई में गिलापन लिये होती है।
      आने वाला समय तो न जाने कहां पतन की और गिर रहा हो। मनुष्‍य लाख मांसाहारी हो गया है तो क्‍या वह अपने पालतू कुत्‍ते का मांस खा सकता है, नहीं। तो फिर कुत्‍ता इतना गिर सकता है। हां, लेकिन अब सूना है किसी देश में शायद कोरिया में लोग पालतु कुत्‍तो को भी मार कर खा जाते है। शायद वो मनुष्‍य को खा जाते होंगे.....या आने वाले कल जरूर उनका वही कदम होगा। किसी पशु को खुद पाल कर खाना अति कठिन कार्य है। क्‍योंकि उसका भरोसा तो देखो। क्‍या मेरा मालिक मेरी गर्दन पर जब छूरी या चाकू रखेगा तो मैं सोच सकता हूं कि वो में मार कर खा जायेगा। कभी नहीं। उसके इन्‍हीं हाथों ने न जाने कितने ही प्‍यार भरे कोर मुझे खिलाये है। अगर इस तरह से कोई मारता है तो वह उसकी ही चेतना निम्‍मन तल पर चला जाता है। फिर शायद उसमे मनुष्‍यता नाम की कोई चीज नहीं रह जाती। खेर ये तो संसार है नित बदलता ही रहता है। कभी अंधकार तो कभी प्रकाश। 

बुधवार, 8 नवंबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-28



अध्‍याय—28 पिरामिड का बनाना


पिरामिड के बनने का काम चलता रहा। पिछले दिनों जैसे ही ध्‍यान का कमरा टूटा था और जो लोग ध्‍यान करने के लिए आना बंद हो गये थे। इन कुछ ही महीनों के इंतजार के बाद उन की तादाद बढ़ गई थी। मेरी  समझ में नहीं आ रहा था। ऐसा कैसे हो गया। क्‍योंकि शायद निषेद को निमंत्रण है। और धीरे—धीरे लोगों की भीड़ बढ़ रही थी। जैसे हर चीज का एक समय होता है। जब पेड़ बड़ा होगा तो उसमें फूल आएंगे और उसके बाद फलों से लद जायेगा। यहीं शायद यहां हो रहा था। पिरामिड का ढांचा बन कर तैयार तो गया था परंतु अभी उस के अंदर पलास्टर नहीं हुआ था। लेकिन लोगों को कहां सब्र था। वह तो मौके की तलाश में ही थे। कि जैसे ही ध्‍यान के लिए द्वार खुले और वो आये।
क्‍योंकि पापा जी ने ध्‍यान का समय ऐसा र्निधारित कर रखा था जो उन्‍हें सुविधा जनक हो। जैसे दिन के 10 बजे दूकान बंद कर के आते थे और 11 बजे ध्‍यान शुरू हो जाता था। ध्‍यान के बाद भी पापा जी को बहुत काम होता था। वरूण भैया को स्‍कूल से लेकर आते थे। क्‍योंकि शायद वरूण भैया सबसे ज्‍यादा दूर पढ़ने के लिए जाते थे। पता नहीं अब कितनी दूर मैं यह कहा नहीं सकता। हिमांशु भैया के तो स्‍कूल की बस आती थी। और दीदी तो बड़ी हो गई थी वह तो खूद स्‍कूल चली जाती थी और आ भी जाती थी। लेकिन वरूण भैया को स्‍कूल छोड़ना और फिर लेने जाना। वो भी घड़ी की सूईयों कि तरह। जल्‍दी भी नहीं जाया जा सकता है और देर भी नहीं की जा सकती क्‍योंकि फिर वहां पर भैया इंतजार करेगा। 

सोमवार, 6 नवंबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-27



अध्‍याय—27—प्‍यार और  दुलार  

      पिरामिड ऊपर और ऊपर उठता चला जा रहा था। इतना ऊपर की मैं उसे देख भी नहीं सकता था। उपर सर करने से मुझे चक्‍कर आते थे और वह असमान के उस कोने का छूता सा प्रतीत होता था। जैसे—जैसे वह ऊपर जा रहा था चारों और से पतला हाता जा रहा था। अंदर से देखने पर तो और भी अधिक भय लगता था। क्‍योंकि बीच से खाली होने के कारण चारों और से दीवारे ऐसे लग रही थी जैसे अभी अंदर गिरी। उसके अंदर से चढ़ने के लिए जो पेड़ बंधी थी। अब भी मैं मोका देख कर चढ़ जाता था। वह गिरने वाली बात तो न जाने में कब का भूल गया था। हमारे शरीर में कोई भय यह सोच इतनी देर तक थिर नहीं रह सकती। कोई पीड़ा या दुख हमारा पीछा मनुष्य की तरह नहीं करता जन्‍म—जन्‍म तक।
      परंतु फिर भी उस के उपर और उपर चढ़ना मेरे बूते के बहार की बात थी। जब एक बार मैने दूसरी और झांक कर देखा तो मेरे प्राण ही निकल गये थे। बाप रे बाप कितना नीचा है। पहले में जहां से कूद कर भाग जाता था। वह तो नीचे धरातल पर ही रह गया। अब तो हम बादलों के पास आ गये है। एक मजेदार डर और लगता है। जब हम उचे पैड पर चढ़े होते और आसमान में बादल चल रहे होते तो ऐसा उड़ने का एहसास होता की बादल तो खड़े है और ये पिरामिड चल रहा है।

रविवार, 5 नवंबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-26



अध्‍याय—26—मेरा दुस्साहस और पापा का साहस


      र जाते—जाते दिन निकल आया था। चारों और चहल पहल थी। परंतु मेरी और किसी का ध्‍यान नहीं गया। बस एक आधा गली के कुत्‍ते ने देख और स्‍वभाव अनुसार मुझे भौंका। लेकिन ये केवल उनके संदेश मात्र ही माना जायेगा। कि हम सतर्क है अपने इलाके में। हमारी नजरों से कोई बच कर नहीं जा सकता। बस वह बैठे—बैठे ही भोंकते रह, परंतु वह भी आगे आने कि हिम्‍मत नही कर सके। मैं घर जाने  का एक ही रास्‍ता जानता था। पीछे की तरफ से जहां से अक्‍सर में भागने  के लिए तो उपयोग करता था। परंतु  छत से घर जाने  के लिए वापसी में बहुत कठिन होता था। क्‍योंकि उपर से तो 8—10 फीट भी कूद कर आ सकता था परंतु वापस तो इतना कूद कर चढ़ नहीं सकता था। अपने साथ मामी का मकान था।
मैं वहीं पर अक्‍सर पहूंच जाता था। वहीं अपनी हीरों कुत्‍ते वाली कथाएं। परंतु आज ऐसा कुछ नहीं कर सका। केवल छत पर खड़ा हो कर रोता रहा। कि मुझे कोई उतरा लो। मामी हमारे घर पर गई और मम्‍मी जी को बुला कर कहने लगी तोहरा पौनी आया है। गली में आज भी भीड़ लग गई थी। परंतु मेरे उपर से न कूदने के कारण लोग तरह—तरह की बातें कर रहे थे। लगता है हीरों कुत्‍ता अब बूढ़ा हो गया है। मम्‍मी ने दीदी को कहा की पोनी आज उतर नहीं पा रहा। और लकड़ी की सीढ़ीयों से तू उतार नहीं सकेगी।

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-25



अध्‍याय—25—मां के साथ गुज़ारे वो अनमोल क्षण

      ये कैसी अनहोनी घटना थी। जो मुझे इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। एक तरफ मेरी घायल मां जो मृत्‍यु सैय्या पर पड़ी थी। शायद वह मुझे जीवित देख कर अति प्रसन्‍न थी। और मैं एक तरफ तो उदास था। और एक तरफ मां से मिलने का आनंद भी मुझे महसूस हो रहा था। अब समझ में नहीं आ रहा था किसे पहले मनाऊं। इस जंगल में भी मेरी मां मुझसे हृष्ट पुष्ट थी। मैं उसके पास जाकर बैठ गया। और उसके घावों को चाटनें लगा। जिन से बहकर खून जम कर सूख गया था। जख्‍म बहुत गहरे थे। गर्दन—सर और पीठ पर बुरी तरह से फाड़ रखा था वैसे तो पूरा का पूरा शरीर ही घायल कर रखा था। इन घावों को देख कर मुझे लगा उसके उपर कम से कम दस जानवरों ने एक साथ हमला किया होगा। मेरे इस तरह पास होने से और चाटनें से उसे कितना सुकून मिला ये उसकी आंखों की तृप्ति बता रही थी। वह आंखें बद कर गहरी श्‍वास ले रही थी। मानों मेरे प्रेम और छूआन को आत्‍म सात कर जाना चाहती हो।

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-24


अध्‍याय—24—मां से मिलन

      रीर की हष्‍टपुष्‍टता के कारण हमारा मन भी निडर और साहसी हो जाता है। मुझे अपनी ताकत और शरीर की चपलता पर बड़ा नाज हो गया था। या यूं कह सकते है। कि मुझे अपने जीवनी पर बहुत घमंड हो गया था। मैं घर से निकल कर गलियों में साहस और बिना भय के निडर घूमता था। शरीर मेरा पतला और छरहरा जरूर था पर मेरी ताकत मेरी गर्दन के आस पास थी। जब मैं इन गांव के कुत्‍तों को देखता तो मुझे बड़ा अचरज होता था। ये वैसे तो देखने में बहुत हृष्टपुष्ट दिखाई देते है। परंतु इनकी गर्दन शरीर के बनस्‍पत एक दम से पतली होती है। इसी लिए जब भी मैं लड़ता तो न तो ये मुझे पकड़ ही पाते थे। अरे मेरी पकड़ के सामने उनकी बोलती बंद हो जाती थी। तब मैं यही सोचता था मेरी मां जंगली होने के कारण में इन सब से भिन्‍न हूं।
क्योंकि हमें तो शिकार को पकड़ना उसे मारना होता था। तभी अपना पेट भर पाते थे। और ये मुस्टंडा कुछ भी नहीं करते....केवल लात, घुस्‍से और दुतकार के साथ भोजन पाते है। मेरी नस्‍ल कुत्‍तों से अधिक भेडीयों से अधिक मिलती थी। भारत में हिमालय की तराई या गुजरात की पट्टी पर पाये जाने वाले भेड़िया लगभग मेरे ही जैसे होते है।

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-23



(अध्‍याय—23) सन्‍यास एक कला है


      शायद सितम्‍बर माह का ही होगा, बरसात खत्‍म हो गई थी। शरद ऋतु आने में अभी कुछ देरी थी। दिन भर धूप तेज रहती थी। परंतु सूर्य के अस्‍त होते ही एक मधुर सीतलता छा जाती थी। भारतीय  तिथि में इसे कार्तिक माह कहा जाता था। यह एक प्रकार का सुहाना बसंत ही है। जो गर्मी के बाद शरत ऋतु की और अग्रसर हो रहा होता था। इन्‍हीं दिनों हिंदुओं की राम लीला शुरू होती थी। और बच्‍चों के स्‍कूल की छुट्टी हो गई थी। इसी सब से यह तिथि मुझे आज भी याद है। क्‍योंकि पार्क में बहुत बड़ी सी स्‍टेज बना कर रात—रात भर राम लीला खेली जाती थी। जब में पार्क में सुबह जाता तो वहां पर हजारों लोगों के पद चाप की खुशबु महसूस होती थी। तभी मैं समझ जाता था, रात को यहां पर हजूम—हजूम लोग इक्कट्ठे हुए होंगे। परंतु मैं वहां रात को कभी नहीं जा सकता था।
क्‍योंकि लोग नाहक कुत्‍तों को देख कर इतना डर जाते है या घिन्‍न करते है। जबकि हम तो प्रत्‍येक मनुष्‍य का सम्‍मान करते है। हमारे आँगन में जो भेल पत्र और अमरूद का वृक्ष था उस पर श्‍याम के समय चिड़ियों के झुंड का झुंड अठखेलियाँ करते  थे।

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-22




अध्याय22 मेरी शरारतें

      जैसे—जैसे मैं बड़ा हो रहा था, मेरी शरारतें भी बढ़ती जा रही थी। हालांकि में उन पर काबू पाने की भरसक कोशिश कर रहा था। परंतु पशु स्‍वभाव से जो मुझे पीढ़ी दर पीढी मिला था वह मेरे बस के बहार हो जाता था। कितना ही कोशिश करू परंतु अंदर धक्‍के मारती उर्जा मुझे कुछ न कुछ गलती करने को मजबूर कर देती थी। शरीर का विकास भी इन घटनाओं की जड़ था। जैसे नये दांतों का उगना। अब वह दाँत किसी चीज को फाड़ना चाहते है। वही अभ्‍यास उनकी मजबूती की जड़ है। अब इस बात का पता नहीं चलता कि किसे काटे या किसे फाड़े।
जब सब लोग ध्‍यान में चले जाते तब मुझे बहुत अकेला पन खलता था। और मुझे उस समय यह सधन महसूस होता था कि मैं कुत्‍ता हूं, मनुष्‍य नहीं। इसी सब की हीनता मुझे क्रोध करने को उकसाती थी। कि सब लोग अंदर चले गये और मुझे बहार छोड़ दिया। जब की मुझे अंदर जाना बहुत अच्‍छा लगता था। और मैं किसी को कुछ कहता भी नहीं था किसी एक कोने में आराम से बैठ कर आंखे बद कर लेता था।

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-21



अध्याय21 मेरा पापा जी को काटना

      पनी एक आदत से मैं बहुत परेशान था, जो इतनी खराब थी कि उसने मुझे ही नहीं जिनके साथ मैं रहता था उन्‍हें कष्‍ट ही नहीं दिये उन्‍हें सताया भी बहुत। ऐसा नहीं था की मैं इस कमजोरी को नहीं जानता था। परंतु मेरी मजबूरी थी या उसे मेरा जंगलीपन कह लीजिए जो मेरे बार—बार चाहने से भी मुझसे छूट नहीं रही थी। शायद यहीं तो बंधन जो हमें अपने में कैद किये हुए है। जो सामने आकर हमें अपनी आदत लगती है।
घर में इतना प्‍यार मिलता है, कोई बंधन नहीं, पूर्ण मुक्‍ति है। कहीं बैठो, परंतु न जाने क्‍यों फिर भी उस चार दीवारी में एक प्रकार सी घुटन महसूस होती थी। जरा भी मुझे मोका मिले घर से बाहर जाने का तो मैं चूकता नही था। फिर सब भूल जाता था, कोई डांटे, मारे.....कुछ भी करे मुझे बुला नहीं सकता। बस अगर में अपने आप में झांक कर देखू तो वहीं एक मात्र बुराई जो मेरे पूरे जीवन पर छाई रही। उस आजादी के सामने मुझे कुछ भी अच्‍छा नहीं लगता था।