अध्याय—40
(ध्यान का अनुभव)
इस तरह से
ये जीवन के चौथे मृत्यु द्वार को मैं छूकर आया हूं। ये एक नादानी नहीं तो ओर क्या
है क्या अभी भी मेरे अंदर बालपन एक अलहड़ पन समया है, अकसर बहुत लाडप्यार के कारण
आदमी का लडकपन कैसा थिर सा हो जाता है मानों उसमें गति ही न हो। आज आधुनिक भागदौड में
बच्चे कितनी जल्दी अपना बालपन खो देते है। ओर युवां अपना यूवा पन। समाज उनको स्वछंद
विकास करने ही नहीं देता है। इस सुंदर माहोल में जीवन का रस्सा स्वाद अनुभव बड़े
भाग्य से मिलता है ओर मेरी नजरों में इसकी कोई कदर नहीं। मैं इस अमूल्य अवसर को यूहीं
फेंकता फिरता हूं। इस वरदान की अगर मैं कदर नहीं करुंगा तो कब—कब मेरे पास फिर लोट
का आयेगा कब—कब कुदरत मुझे मोंके देती रहेगी। जीवन में जरूर कुछ अच्छा किया होगा....तो
ये स्थान ये मनुष्य मुझे मिले है। मुझे इस सब की कदर करनी चाहिए नहीं तो प्रकृति
भी नाराज हो जायेगी। आपने द्वारे दिये इस जीवन की कदर ने देख कर इसे मुझसे छिन
लेगी। ओर मैं तो खुद ही इसे फैंकने के लिए तैयार हूं। ये सब बातें सोच कर मेरा मन
उदास हो गया। ओर मुझे अंदर से अपने पर क्रोध ओर गिलानि एक साथ हो रही थी। ओर मन
में एक पश्चाताप भी कि अब ऐसा नहीं करूंगा परंतु ऐसा पहली बार नहीं उन पहली दुर्घटनाओं
के बाद भी शायद मैंने ऐसा ही सोचा होगा।










