मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक 10 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-दसवां
* सदगुरु की पुकार
* जागरण चाहिए--अभ्यास नहीं
* बांटो--लुटाओ
प्रश्न-सार
*मैं चकित हूं यह देख कर कि आपके तीर्थ में किस भांति
देश-देश से दूर-दूर की यात्राएं करके लोग आ रहे हैं! और आप हैं कि कभी अपने कक्ष
से भी बाहर नहीं जाते! यह चमत्कार क्या है?
*क्या परमात्मा को पाने के लिए भी किसी अभ्यास की जरूरत
होती है?
*आपसे जो मिला है, उसे बांटूं या
सम्हालूं?
*पहला प्रश्न: भगवान! मैं चकित हूं यह देख कर कि आपके
तीर्थ में किस भांति देश-देश से दूर-दूर की यात्राएं करके लोग आ रहे हैं। और आप
हैं कि कभी अपने कक्ष से भी बाहर नहीं जाते! यह चमत्कार क्या है? समझावें।
प्रेम कीर्ति! चमत्कार इसमें
जरा भी नहीं। एस धम्मो सनंतनो! ऐसा ही सनातन नियम है। दीया जलेगा, तो परवाने दूर-दूर से खोजते चले आएंगे। दीये को उन्हें ढूंढ़ने नहीं जाना
पड़ता। दीया अपनी जगह होता है; परवाने आते हैं। और परवाने
मिटने आते हैं, दीये के साथ जल कर एक हो जाने आते हैं!


