कुल पेज दृश्य

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 10 मई 2017

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10



मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 10 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-दसवां   

* सदगुरु की पुकार
* जागरण चाहिए--अभ्यास नहीं
* बांटो--लुटाओ

प्रश्न-सार


*मैं चकित हूं यह देख कर कि आपके तीर्थ में किस भांति देश-देश से दूर-दूर की यात्राएं करके लोग आ रहे हैं! और आप हैं कि कभी अपने कक्ष से भी बाहर नहीं जाते! यह चमत्कार क्या है?
*क्या परमात्मा को पाने के लिए भी किसी अभ्यास की जरूरत होती है?
*आपसे जो मिला है, उसे बांटूं या सम्हालूं?

*पहला प्रश्न: भगवान! मैं चकित हूं यह देख कर कि आपके तीर्थ में किस भांति देश-देश से दूर-दूर की यात्राएं करके लोग आ रहे हैं। और आप हैं कि कभी अपने कक्ष से भी बाहर नहीं जाते! यह चमत्कार क्या है? समझावें।

प्रेम कीर्ति! चमत्कार इसमें जरा भी नहीं। एस धम्मो सनंतनो! ऐसा ही सनातन नियम है। दीया जलेगा, तो परवाने दूर-दूर से खोजते चले आएंगे। दीये को उन्हें ढूंढ़ने नहीं जाना पड़ता। दीया अपनी जगह होता है; परवाने आते हैं। और परवाने मिटने आते हैं, दीये के साथ जल कर एक हो जाने आते हैं!

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-09



मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 09 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-नौवां   

* नये मनुष्य का आगमन
* धर्म के व्यापारी
* समर्पण की मस्ती
* विवाह का फंदा
* सत्य और सूली

प्रश्न-सार

*आप कहते हैं कि भावी मनुष्य, नया मनुष्य--जिसके निर्माण में आप संलग्न हैं--एक साथ विज्ञानी, कवि और संत तीनों होगा। इस दृष्टि को विस्तार से समझाने की अनुकंपा करें।
*धर्म के लिए सबसे बड़ा खतरा किससे हैं?
*अस्सलाम आलेकुम! सलाम तो बचपन से किया, लेकिन यहां जब संगीत-ध्यान में इसे गाया, तो एक सरूर सा आया। रोना भी आया और हंसना भी। खिल गए मेरे प्राण। दिल किया कि आपके पैरों को चूमूं। झुकूं--झुकूं--और झुकता ही रहूं। शुक्रिया आपका!
*शादी घरवालों की मर्जी से करें या स्वयं के चुनाव से?
*आप आनंद बांटते ही चले जाते हैं। और लोग हैं कि अमृत के उत्तर में आपको विष देते हैं। उनके संबंध में आपका क्या वक्तव्य है?

*पहला प्रश्न: भगवान! आप कहते हैं कि भावी मनुष्य, नया मनुष्य--जिसके निर्माण में आप संलग्न हैं--एक साथ विज्ञानी, कवि और संत तीनों होगा। इस दृष्टि को विस्तार से समझाने की अनुकंपा करें।

आनंद मैत्रेय! मैं अखंड मनुष्य को स्वीकार करता हूं। खंडित मनुष्य सुविधापूर्ण हो सकता है, लेकिन न तो शांत होगा, न आनंदित होगा। खंडित मनुष्य उपयोगी हो सकता है, लेकिन उल्लासपूर्ण नहीं। और अतीत में मनुष्य के खंडों को ही स्वीकार किया गया है।

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-08



मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 08 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-आठवां   

* बुद्धत्व की धन्यता
* मनुष्य है: मृण्मय में चिन्मय
* संन्यास का फूल
* रूपांतरण की प्यास

प्रश्न-सार

*आपको देखा तो लगा कि मेरा जीवन व्यर्थ ही चला गया है। अब मैं क्या करूं, क्या न करूं?
*मनुष्य देह मात्र ही है या कुछ और भी?
*मैं संन्यास लेने के लिए आतुर हूं, लेकिन फिर भी वर्ष भर से झिझक रहा हूं। यह भी शंका मन में है कि संन्यास लेने से भी क्या होगा?
*मैं भी रूपांतरित होना चाहती हूं। स्वप्नों में बहुत जीवन गंवाया। लेकिन अब मुझे बचाओ। मेरे लिए क्या आदेश है?

*पहला प्रश्न: भगवान! आपको देखा तो लगा कि मेरा जीवन व्यर्थ ही चला गया है। अब मैं क्या करूं, क्या न करूं?

हरीश! जीवन तो साधारणतः व्यर्थ ही जाता है। लाखों में एकाध व्यक्ति का जीवन सार्थक होता है; जब कि सभी का सार्थक हो सकता था; जब कि सभी सार्थक होने की संभावना लेकर जन्मे थे।
प्रत्येक व्यक्ति बीज है परमात्मा का। लेकिन बीज फूल नहीं है; फूल हो सकता है। बीज संभावना है--सत्य नहीं। और संभावनाओं को सत्य में परिणत करने का नाम ही साधना है।

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07



 मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 07 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-सातवां   

* अभीप्सा का जन्म
* पात्रता
* प्रतिभा है--निर्विचार चैतन्य
* अंतिम चाह

प्रश्न-सार
*यह परमात्मा की खोज क्या है? लोगों को इस खोज में लगे देखता हूं तो चकित होता हूं। मैं स्वयं तो ऐसी कोई आकांक्षा या अभीप्सा अपने भीतर नहीं पाता हूं!
*परमात्मा को कैसे तृप्त करूं?
*प्रतिभा किसे कहते हैं?
*मैं जिसे चाहता हूं, उसे ही पाना असंभव हो जाता है। जीवन में भी जिन्हें चाहा, प्राणपण से चाहा, मगर न पा सका। कहीं यही स्थिति परमात्मा के संबंध में भी तो नहीं होगी कि परमात्मा को चाहूं और न पा सकूं?

*पहला प्रश्न: भगवान! यह परमात्मा की खोज क्या है? लोगों को इस खोज में लगे देखता हूं तो चकित होता हूं। मैं स्वयं तो ऐसी कोई आकांक्षा या अभीप्सा अपने भीतर नहीं पाता हूं!

सुरेंद्रनाथ! परमात्मा की खोज तो एक ऐसा मधुर रोग है कि जिसे लगे, वही जाने। यह तो स्वाद है। और स्वाद शब्दों में व्यक्त नहीं होते। यह तो अंतर्तम में उठी एक अभीप्सा है, जिसके लिए कोई कारण दिया नहीं जा सकता।

मंगलवार, 9 मई 2017

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06



मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 06 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-छट्ठवां   

* अहोभाव, धन्यवाद--पश्चात्ताप नहीं
* निष्प्र्रश्न चेतना
* सदगुरु का जादू

प्रश्न-सार

*क्या प्रार्थना पश्चात्ताप ही नहीं है?

*जीवन के अर्थ को कहां खोजें? कैसे खोजें?

*आपने क्या कर दिया है? मैं ऐसा आनंदित तो कभी भी न था। शायद इसे ही लोग आपका सम्मोहन कहते हैं!

*पहला प्रश्न: भगवान! क्या प्रार्थना पश्चात्ताप ही नहीं है?

नरेश! प्रार्थना और पश्चात्ताप का कोई भी नाता नहीं; दूर का भी नाता नहीं। पश्चात्ताप अहंकार की ही प्रक्रिया है; अहंकार ही अपने को सजाने-संवारने में लगा है; जो भूलें-चूकें हुई हैं, उन्हें लीपने-पोतने का प्रयास कर रहा है। पश्चात्ताप अतीत-उन्मुख होता है, और प्रार्थना वर्तमान के क्षण में समग्ररूप से डूब जाने का नाम है। प्रार्थना का न तो कोई अतीत है, न कोई भविष्य। न तो पश्चात्ताप है प्रार्थना, और न कोई आयोजन। न तो मांग है प्रार्थना में--यह मिले, वह मिले; और न इस बात की स्वीकृति है कि मुझसे यह भूल हुई, वह भूल हुई। भूलों की याद, भूलों के लिए क्षमा-प्रार्थना--यह भी अहंकार है।

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05



मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 05 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-पांचवां  

* संन्यास का आमंत्रण
* सदगुरु की मधुशाला
* जागो
* मीठा दर्द

प्रश्न-सार

*कैसे लूं संन्यास? मन में सेर् ईष्या, अहंकार, क्रोध, कुछ भी तो नहीं निकाल पाती! और आप जो बार-बार रात-दिन स्वप्न में सामने रहते हैं! क्या करूं?

*मेरा पात्र इतना बड़ा नहीं है कि आपको समा सके। जब भी मैं आपको प्रवेश देती हूं, आपकी ऊर्जा इतनी अतिशय होती है कि वह हंसी, रुदन या नृत्य बन कर बह जाती है। कभी-कभी मैं सोचती हूं कि कहीं मैं आपके उदार आशीषों को लेने में कृपण तो नहीं हो रही! या ऊर्जा के व्यक्त होने का यही सही ढंग है?

*मैं संसार को जगाना चाहता हूं। क्या करूं?

*मेरे नैना सावन-भादों, फिर भी मेरा मन प्यासा! यह प्यास कहां से उठती है? प्यास में आनंद और दर्द दोनों कैसे हैं?

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04



मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक 04 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-चौथा  
* धर्म है प्रेम की पराकाष्ठा
* अहंकार और समर्पण

प्रश्न-सार

*धर्म क्या है?
*शिष्यत्व और समर्पण में क्या दासता का कुछ अंश है? और आज के मनुष्य के लिए समर्पण कठिन क्यों हो गया है?

*पहला प्रश्न: भगवान! धर्म क्या है?

रामनारायण! धर्म प्रेम की अंतिम पराकाष्ठा है। प्रेम जैसे फूल है, धर्म प्रेम के फूल की सुवास है। काम है बीज; प्रेम है फूल; धर्म है फूल से उड़ गई सुगंध। इसलिए धर्म अदृश्य है।
दृश्य तो होते हैं बुद्ध, कृष्ण, कबीर, नानक। ये फूल हैं। इनके आस-पास सुगंध की तरह जो व्याप्त होता है, वह धर्म है। जो बुद्धि से सोचने चलते हैं, उन्हें वह दिखाई नहीं पड़ता। वह दिखाई पड़ने वाली बात नहीं, मुट्ठी में आ जाए ऐसा तथ्य नहीं, शब्दों में समा जाए ऐसा अनुभव नहीं।

सोमवार, 8 मई 2017

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03



मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 03 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-तीसरा

* प्रेम की आग
* शिष्य की परीक्षा
* संन्यास का उत्सव

प्रश्न-सार

*आप कहते हैं--प्रेम करो; तुम्हारे सभी प्रेम का निचोड़ ही प्रार्थना बनेगी।
परंतु मैं तो प्रेम करने में बहुत ही कतराता हूं!

*क्या कभी सदगुरु भी शिष्य की परीक्षा लेता है?

*कभी संन्यास जीवन की महिमा से मंडित था। आज वह मृत्यु का पर्यायवाची है। संन्यास मृत्यु का पर्यायवाची कैसे बन गया?

 पहला प्रश्न: भगवान! आप कहते हैं--प्रेम करो; तुम्हारे सभी प्रेम का निचोड़ ही प्रार्थना बनेगी। परंतु मैं तो प्रेम करने में बहुत ही कतराता हूं!

 योग भरत! कौन नहीं कतराता? प्रेम की लोग बातें करते हैं; बातें करना प्रेम से बचने का एक उपाय है। प्रेम की बात तो प्रेम नहीं। प्रेम की बात तो प्रेम के अभाव को ढंकने की कला है। हां, लोग प्रेम के गीत गाते हैं--वे भी उधार; वे भी अपने निज अनुभव के नहीं। लोग प्रेम की प्रशंसा भी करते हैं, स्तुति करते हैं; प्रेम का समादर करते हैं। लेकिन इस समादर में अनुभव नहीं है, प्रामाणिकता नहीं है। यह समादर मन का भुलावा है।

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02



मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 02 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-दूसरा  
* ध्यान, प्रेम और संन्यास
* प्रेम का निखार
* दुख क्यों है

प्रश्न-सार
*संन्यास, ध्यान और प्रेम को आप छलांग कहते हैं। छलांग से आपका क्या आशय है?

*आप कहते हैं कि प्रेम प्रगाढ़ होकर प्रार्थना बनता है और प्रार्थना परमात्मा की ओर ले जाती है। जब कि मेरे जीवन में प्रेम दुख बन गया है। कृपापूर्वक इस संबंध में मार्ग-दर्शन करें।

*मैं दुखी क्यों हूं?

पहला प्रश्न: भगवान! संन्यास, ध्यान और प्रेम को आप छलांग कहते हैं। छलांग से आपका क्या आशय है?

नरेंद्र! जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है--ध्यान हो, प्रेम हो, या संन्यास हो--उसकी उपलब्धि गणित की भांति नहीं होती; उसकी उपलब्धि की प्रक्रिया नहीं होती, सीढ़ियां नहीं होतीं। उसमें कोई क्रमिक गति नहीं होती। विस्फोट होता है। एक क्षण में सब घट जाता है। सोच-विचार नहीं--एक हार्दिक दशा है, एक भाव की दशा है। अचानक! जैसे दीया जलाओ, तो अंधेरा क्रमशः दूर नहीं होता--कि पहले थोड़ा हटा, फिर और थोड़ा हटा, फिर और थोड़ा हटा। इधर दीया जला, उधर अंधेरा नहीं हुआ--एक क्षण में, युगपत।

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-01



मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 01 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-पहला
* धर्म की आड़ में अहंकार
* अहंकार अंधकार है
* अनुग्रह भाव

प्रश्न-सार
*क्या भारत-भूमि ही धार्मिकता की दृष्टि से अग्रणी रहेगी या इसमें भी विदेशी साधक अग्रणी हो जाएंगे? क्या आपकी संपदा से फिर भारत-भूमि वंचित रह जाएगी? क्या आगे भी ऐसे ही महान पुरुषों का अवतार भारत-भूमि पर होता रहेगा?

*तथागत बुद्ध के अनुसार जन्म दुख है, मरण दुख है, जीवन दुख है।
आपके अनुसार जन्म क्या है, मृत्यु क्या है, जीवन क्या है?
और उपनिषदों की इस प्रार्थना "मृत्योर्मा अमृतं गमय' का क्या आशय है? यह किस मृत्यु से किस अमृत की ओर जाना है?

*प्रार्थना क्या है?