कुल पेज दृश्य

एस धम्मो संनतनो-(भाग-11)-ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
एस धम्मो संनतनो-(भाग-11)-ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनों-(ओशो)-प्रवचन-112



मंजिल है स्वयं में—प्रवचन—112

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

भगवान बुद्ध कहते हैं कि संतों का धर्म कभी जराजीर्ण नहीं होता है; फिर कृष्ण, महावीर, स्वयं बुद्ध और जीसस के धर्म इतने जराजीर्ण कैसे हो चले? इस प्रसंग पर कुछ प्रकाश डालने की अनकंपा करें।
संतो का धर्म निश्चित ही कभी जराजीर्ण नहीं होता है। और जो जराजीर्ण हो जाता है, वह संतों का धर्म नहीं है।
ईसाइयत का कोई संबंध ईसा से नहीं है। और बौद्धों का कोई संबंध बुद्ध से नहीं है। जैनों को महावीर से क्या लेना—देना है?
जो महावीर ने कहा था, वह तो अब भी उतना ही उज्ज्वल है। लेकिन जो सुनने वालों ने सुना था, वह जराजीर्ण हो गया।
जो कहा जाता है, वही थोड़े ही सुना जाता है। जब बुद्ध बोलते हैं, तो बुद्ध तो अपनी ही भावदशा से बोलते हैं। तुम जब सुनते हो, अपनी भावदशा से सुनते हो। इन दोनों के बीच में बड़ा अंतर है। बुद्ध पर्वत के शिखर पर खड़े हैं; तुम अपनी अंधेरी खाइयों में पड़े हो। बुद्ध प्रकाश के उच्चल शिखरों से बोल रहे हैं; तुम अपने गहन अंधेरे में सुन रहे हो।

एस धम्मो सनंतनों-(ओशो)-प्रवचन-111



समाधि के सत्र: एकांत, मौन, ध्यान—प्रवचन—111

सूत्र:

 भिक्‍खुवग्‍गो:

चक्‍खुना संवरो साधु साधु सोतेन संवरो।
घाणेन संवरो साधु साधु जिह्वाय संवरो ।।298।।

            कायेन संवरो सा सा वाचाय संवरो।
मनसा संवरो सा सा सब्बत्थ संवरो।
सबत्थ संवुतो भिक्‍खु सब्‍बदुक्‍खा पमुच्‍चति ।।299।।

हत्‍थसज्‍जतोपादसज्‍जतो वाचाय सज्‍जतो सज्‍जतुत्‍तमो।
अज्‍झत्‍तरतो समाहितो एको संतुसितो तमाहु भिक्‍खुं ।।300।।

यो मुखसज्‍जतो भिक्‍खु मंतभाणी अनुद्धतो।
अत्‍थं धम्‍मज्च दीपेति मधुरं तस्‍स भासितं ।।301।।

धम्‍मारामो धम्‍मरतो धम्‍मं अनुविचिन्‍तयं ।
धम्‍मं अनुस्‍सरं भिक्‍खु सद्धम्‍मा न परिहायति ।।302।।

एस धम्मो सनंतनों-(ओशो)-प्रवचन-110



भीतर डूबो—प्रवचन—110

      प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

हरमन हेस की प्रसिद्ध पुस्तक सिद्धार्थ में एक पात्र है वासुदेव। वासुदेव प्रमुख पात्र सिद्धार्थ से कहता है : मैंने नदी से सीखा है, तुम भी नदी से सीखो। नदी सब: सिखा देती है। वासुदेव का नदी से सीखने का क्या आशय है —कृपा करके हमें कहिए।

दी प्रतीक है, और बुद्ध की परंपरा में महत्वपूर्ण प्रतीक है, क्योंकि बुद्ध ने कहा : संसार एक प्रवाह है। जैसे यूनान में हैराक्लतु ने कहा कि जीवन एक सरिता है और ऐसी सरिता कि इसमें कोई दुबारा नहीं उतर सकता।
एक ही नदी में दुबारा उतरने का उपाय नहीं है। क्योंकि जब तुम दुबारा उतरोगे, तब तक बहुत पानी बह चुका होगा। ऐसा हेराक्लतु ने कहा। बुद्ध एक कदम और आगे गए।
बुद्ध ने कहा. एक ही नदी में दुबारा उतरने का उपाय नहीं है, क्योंकि नदी का बहुत पानी बह चुका होगा और तुम्हारा भी बहुत पानी बह चुका होगा। जब तुम दुबारा उतरने आओगे, तब न तो नदी वह है, जो पहले थी; न तुम वह हो, जो पहले थे। प्रतिपल सब बह रहा है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-109



धर्म का सार—बांटना—प्रवचन—109


 सूत्र:

            हन्‍नति भोगा दुम्‍मेधं नौ चे पारगवेसिनो।
भोगतण्‍हाय दुम्‍मेधो हन्‍ति अज्‍जेव अत्‍तनं ।।293।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि रागदोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि वितरागेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।294।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि दोसदोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि वीतदोसेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।295।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि मोहदोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि वीतमोहेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।296।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि इच्‍दादोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि विगतिच्‍देसु दिन्‍नं महप्फलं ।।297।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-108



दर्पण बनो—प्रवचन—108

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

 भगवान बुद्ध ने ज्ञानोपलब्धि के तुरंत बाद कहा : स्वयं ही जानकर किसको गुरु कहूं और किसको सिखाऊं, किसको शिष्य बनाऊं? और फिर उन्होंने चालीस वर्षों तक लाखों लोगों को दीक्षित भी किया और सिखाया भी। लेकिन महापरिनिर्वाण के पहले उनका अंतिम उपदेश था : आत्म दीपो भव! भगवान इस पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

जिसने भी जाना, सदा स्वयं से जाना।
गुरु हो, तो भी निमित्तमात्र है। गुरु न हो, तो भी चल जाएगा।
असली सवाल— ध्यान रखना—गुरु के होने, न होने का नहीं है। असली सवाल स्वयं में प्रवेश का है। कुछ साहसी लोग अकेले भी स्वयं में प्रविष्ट हो जाते हैं। कुछ को सहारे की जरूरत पड़ती है। जिनको सहारे की जरूरत पड़ती है, वे भी प्रविष्ट तो अकेले ही होते हैं। सहारा निमित्तमात्र है।
सहारा वस्तुत: सत्य के मिलने में सहयोगी नहीं है, सिर्फ तुम्हारी हिम्मत बढ़ाने में सहयोगी है।
जैसे तुम डरते हो गहरे पानी में जाने में। और कोई कहता है घबड़ाओ मत, मैं किनारे पर खड़ा हूं। तुम जाओ। जरूरत होगी, तो मैं हूं। मैं कूद पड़गा। बचा लूंगा। तुम जाते हो।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-107



बोध से मार पर विजय—प्रवचन—107

सूत्र:

वितक्‍कपमथितस्‍स जंतुनो तिब्‍बरागस्‍स सुभानुपास्सिनो।
भिय्यो तण्‍हा पबड्ढति एसो खो दल्‍हं करोति बंधनं ।।287।।

वितक्‍कूपसमें च यो रत्‍तो असुभं भावयति सदा सतो।
एस खो व्‍यन्‍तिकाहिनी एसच्‍छेच्‍छति मारबंधनं ।।288।।

निट्ठंगतो संतासी वीततण्‍हो अनंगणो।
उच्‍छिज्‍ज भवसल्‍लानि अंतिमोंयं समुस्‍सयो ।।289।।

वीततणहो अनादानो निरूत्‍तिपदकोविदो।
अक्‍खरानं सन्‍निपातं जण्‍ण पुब्‍बापरानि च।
स वे अंतिमसारीरो महापज्‍जोति वुच्‍चति ।।290।।

सब्‍बाभिभु सब्‍बविदूहमस्‍मि सब्‍बेसु धम्‍मे अनूलितो।
सब्‍बज्‍जहो तण्‍हक्‍खये विमुत्‍तो सयं अभिज्‍जाय कमुद्दिसेय्यं ।।291।।

सब्‍बादानं धम्‍मदानं जिनाति सबबं रसं धम्‍मरसो जिनाति।
सब्ब्‍ं रति धम्‍मरती जिनाति तण्‍हक्‍खयो सब्‍बदुक्‍खं जिनाति ।।292।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-106



बुद्धत्व का कमल—प्रवचन—106

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

उस सुबह बुद्ध ने मौन की परम संपदा महाकाश्यप को प्रतीक फूल देकर दी। फूल सुबह खिलता है और सांझ मुर्झा जाता है। पर झेन की परंपरा आज तक जीवंत है। फूल की क्षणभंगुरता और झेन की जीवंतता को कृपा करके हमें समझाइए।

ह प्रश्न महत्वपूर्ण है। ठीक से समझना और याद रखना।
बुद्ध ने क्षणभंगुर को ही स्वीकार किया है। जो है, क्षणभंगुर है। क्षणभंगुर से अन्य कुछ भी नहीं है। इसलिए बुद्ध के विचार को क्षणिकवाद का नाम मिला। प्रतिपल बदलाहट हो रही है। फूल ही नहीं बदल रहा है, पहाड़ भी बदल रहे हैं। फूल ही नहीं कुम्हला रहा है, चांद—तारे भी कुम्हला रहे हैं।
बुद्ध ने कहा है : जो जन्मा है, वह मर रहा है। मृत्यु की प्रक्रिया जन्म के साथ ही शुरू हो गयी। कोई दिनभर जीएगा, कोई सौ वर्ष जीएगा, कोई हजार वर्ष, कोई करोड़ वर्ष, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। लेकिन प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण गल रही है, मर रही है, विलीन हो रही है। फूल उसका प्रतीक है, और जीवंत प्रतीक है। सुबह खिलता है, सांझ मुर्झा जाता है। सुबह ऐसे प्रगट होता है, जैसे सदा रहेगा, और सांझ ऐसे खो जाता है, जैसे कभी नहीं था। ऐसा ही तो जीवन है। जब होता है, तो ऐसा भरोसा लगता है कि सदा रहेंगे। प्रत्येक को यही भ्रांति है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-105



तृष्णा को समझो—प्रवचन—105

सूत्र:

तसिणाय पुरक्‍खता पजा परिसप्‍पन्‍ति ससोव बाधितो।
सज्‍जोजनसंगसत्‍ता दुक्‍खमुपेन्‍ति पुनप्‍पुनं चिराय ।।281।।

यो निब्‍बनथो वनाधिमुत्‍तो वनमुत्‍तो बनमेव धावति।
तं पुग्गलमेव पस्‍सथ मुत्‍तो बंधनमेव धावति ।।282।।

न तं दल्‍हं बंधनमाहु धीरा यदायसं दारूजं बब्‍बजज्‍च।
सारत्‍तरत्‍त मणिकुण्‍डलेसु पुत्‍तेसु दारेसु च या अपेक्‍खा ।।283।।

एतं दल्‍हं बंधनमाहु धीरा ओहारिनं सिथिलं दुप्‍पमुज्‍च।
एतप्‍मि छेत्‍वान परिब्‍बजन्‍ति अनपेक्‍खिनो कामसुखं पहाय ।।284।।

ऐ रागरत्‍तानुपतन्‍ति सोतं कतं मक्‍टटक्‍कोव जालं।
एतम्‍पि छेत्‍वान बजन्‍ति धीरा अनपेक्‍खिनो सब्‍बदुक्‍खं पहाय ।।285।।

मुज्‍च पुरे मुज्‍चपच्‍छतो मज्‍झे मुज्‍च भवस्‍स पारगू।
सब्‍बत्‍थ विमुत्‍तमानसो न पुन जतिजरं उपेहिसि ।।286।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-104



धम्मपद का पुनर्जन्म—प्रवचन—104

प्रश्‍न सार:


पहला प्रश्‍न:

भगवान बुद्ध बार—बार कहते हैं कि यही बुद्धों का शासन है। आप भी प्राय: इसी भाषा में बोलते हैं। तो क्या एक बुद्ध सभी बुद्धों की ओर से बोल सकता है? यदि ही, तो अतीत में हुए बुद्धों में मतभेद क्यों रहा?

बुद्धत्‍व का स्वाद एक है; मतभेद दिखता हो, तो तुम्हारे कारण दिखता होगा। तुम्हारी व्याख्या के कारण मतभेद निर्मित होता होगा। तुम्हारी समझ विकृति लाती होगी। अन्यथा बुद्धों ने सदा एक ही बात कही है।
भाषाएं अलग हैं; क्योंकि युग अलग होते हैं, तो भाषा बदल जाती है। शब्द भिन्न हैं, लेकिन भाव भिन्न नहीं हैं। भाव भिन्न हो ही नहीं सकता। इस मनोदशा से खोजने जाओगे, तो अभेद पाओगे।
लेकिन लोगों को सिखाया गया है कि भेद है। भेद ही नहीं, विपरीतता है। जैन घर में पैदा हुए, तो महावीर और बुद्ध में भेद है। महावीर ठीक, बुद्ध गलत। बौद्ध घर में पैदा हुए, तो बुद्ध ठीक, महावीर गलत, कृष्ण गलत। हिंदू घर में पैदा हुए, तो मोहम्मद गलत, क्राइस्ट गलत।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-103




तृष्णा की जड़—प्रवचन—103


 सूत्र:


मनुजस्‍स पमत्‍तचारिनो तण्‍हा बड्ढतिमालुवा विय।
सो पलवती हुराहुरं फलामिच्‍छंव वनस्‍मिं वानरो।।274।।

यं ऐसा सहती जम्‍मी तण्‍हा लोके विसत्‍तिका।
सोका तस्‍स पबड्ढन्‍ति अभीवट्ठंव वीरणं।।275।।

यो चेतं सहती जीम्‍मं तण्‍हं लोके दुरच्‍चयं।
सोका तम्‍हा पपतन्‍ति उदविन्‍दूव पो्क्‍खरा।।276।।

तं वो वदामि भद्दं वो यावन्‍तेत्‍थ समागता।
तण्‍हाय मूलं खणथ उसीरत्‍थोव वीरणं।
मा वो नलं व सोतो व मारो भन्‍जि पुनप्‍पुनं।।277।।

यथापि मूले अनुपद्दवे दल्‍हे छिन्‍नोपि रूक्‍खो पुनरेव रूहति।
एवम्‍पि तण्‍हानुसये अनूहते निब्‍बत्‍तति दुक्‍खमिदं पुनण्‍पुनं।।278।।

यस्‍स छतिंसति सोता मनापस्‍सवना भुसा।
वाहा वहन्‍ति दुद्दिट्ठिं संकप्‍पा रागनिस्‍सितिा।।279।।

सवन्‍ति सब्‍बधि सोता लता उब्‍भिज्‍ज तिट्ठति।
तन्‍च दिस्‍वा लतं जातं मूलं पज्‍जाय छिन्‍दथ।।280।।

एस धम्मो संनतनो-(ओशो)-भाग-11



एस धम्‍मो सनंतनो
(भाग—11)
ओशो

बुद्ध को हुए पच्‍चीस सौ साल हो गए, लेकिन जिसको भी थोड़ी सी समझ है, उन्‍हें आज भी उनकी सुगंध मिल जाती है। जिन्‍हें समझ नहीं थी। उन्‍हें तो उनके साथ मौजुद होकर भी नहीं मिली। जितने थोड़ी संवेदनशीलता है, पच्‍चीस जीवंत हो जाते है। फिर तुम्‍हारे नासापुट उनकी गंध से भर जाते है। फिर तुम उनके साथ आनंदमग्‍न हो सकते हो। समय का अंतराल अंतराल नहीं होता; न बाधा बनती है। सिर्फ संवेदनशीलता चाहिए।
     
          ओशो
     एस धम्‍मो सनंतनो
        भाग—11