कुल पेज दृश्य

एस धम्मो संनतनो-(भाग-10)-ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
एस धम्मो संनतनो-(भाग-10)-ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(ओशो)-प्रवचन-102

जीवन का परम सत्य यही अभी, इसी मेंप्रवचन—102

सूत्र:

अप्‍पमादरता होथ स—चित्‍तमनुरक्‍खथ।
दुग्‍गा उद्धरथत्‍तानं पंके सत्‍तोव कुंचरो ।।269।।

सचे लभेथ निपकं सिद्धिं चरं साधुविहारिधीरं ।
अभिभुय्य सब्‍बानि परिस्‍सयानि चरेय्य तेनत्‍तमनो सतीमा ।।270।।

नौ चे लभथ निपकं सहांय चरं साधुविहारिधीरं।
राजाव रट्ठं विजिंत पहाय एको चरे मातंगरज्‍जेव नागो ।।271।।

एकस्स चरियं सेय्यो नित्‍थ बाले सहायता।
एको चरे न च पापानि कयिरा।
अप्‍पोस्‍सुक्‍को मातंगरज्‍जेव नागो ।।272।।

सुखं याव जरा सीलं सुखा सद्धा पतिट्ठिता।
सुखो पज्‍जाय पटिलाभो पापानं अकरणं सुखं ।।273।।

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-101



हम अनत के यात्री हैं—प्रवचन—101

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

मैं विगत दो —तीन वर्ष से संन्यास लेना चाहता हूं? अब तक नहीं ले पाया। अब जैसी आपकी आज्ञा।

आप तो ऐसे पूछ रहे हैं जैसे मेरी. आज्ञा से रुके हों! और जब तीन—चार वर्ष तक झंझट टाल दी है, तो अब झंझट क्यों लेते हैं! जब इतने दिन निकल गए, लेना चाहा और नहीं लिया, थोड़े दिन और हैं, निकल जाएंगे! हिम्मत रखो! हारिए न हिम्मत बिसारिए न राम।
एक आदमी मुल्ला नसरुद्दीन के कंधे पर हाथ रखा और पूछा, अरे मुल्ला, आप तो गर्मियों में कश्मीर जाने वाले थे, नहीं गए? मुल्ला ने कहा कि कश्मीर! कश्मीर तो हम पिछले साल जाने वाले थे, और उसके भी पहले मनाली जाने वाले थे, इस साल तो हम नैनीताल नहीं गए।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-100



ध्यान का दीप करुणा का प्रकाश—प्रवचन—100

सूत्र:


            अवज्जे वज्जमतिनो वज्‍जे च वज्जदस्सिनो।
मिच्छादिद्विसमादाना सत्ता गच्छति दुग्‍गतिं ।।263।।

वज्‍जन्‍च वज्‍जतो णत्‍वा अवज्‍जण्‍ज अवज्‍जतो।
समादिट्ठिसमादाना सत्‍ता गच्‍छंति सुग्‍गति ।।264।।

अहं नागोव संगामे चापतो पतितं सरं।
अतिवाक्‍यं तितिक्‍खिस्‍सं दुस्‍सीलो हि वहुज्‍जनौ ।।265।।

दंते नयंति समितिं दंतं राजभिरूहति।
दंतो संट्ठो मनुस्‍सेसु योति वाक्‍यं तितिक्‍खति ।।266।।

नहि एतेहि यानेहि गच्‍छेय अगतं दिसं।
यथात्‍तना सुदंतेन दंतो दंतेन गच्‍छंति ।।267।।

इदं पुरे चित्‍तमचरि चारिकं।
येनिच्‍छकं यत्‍थ कामं यथासुखं।
तदत्‍तहं निग्‍गहेस्‍समि योनिसो।
हथिप्‍पभिन्‍नं विय अंकुसग्‍गहो ।।268।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-099



एकमात्र साधना—सहजता—प्रवचन—99

प्रश्‍न सार:


पहला प्रश्‍न:

महावीर और गौतम बुद्ध समकालीन थे। आपके प्रवचनों से एकष्ट हो रहा है कि दोनों बात भी एक ही कहते थे। लेकिन दोनों के शिष्य आपस में विवाद और झगड़े भी करते थे। उनके जाने के बाद उनके अनुयायियों के बीच हिंसा और युद्ध भी हुए। लेकिन यदि महावीर और बुद्ध ने कहा होता कि हम एक ही धर्म की बात करते हैं, भेद सिर्फ पद्धति का है, तो इतनी शत्रुता नहीं बढ़ती और दोनों धर्मों की जो क्षति हुई वह न होती। कृपापूर्वक समझाएं।

पूछा हे अमृत बोधिधर्म ने।
पहली बात,महावीर और बुद्ध के समय में मनुष्य की चेतना ऐसी नहीं थी कि इतने विराट समन्वय को समझ पाए। आज भी चेतना ऐसी हो गयी है, कहना कठिन है। आज लेकिन पहली किरणें मनुष्य की चेतना में उतर रही हैं। आज जो संभव हुआ है, पच्चीस सौ वर्ष पहले संभव नहीं था। आज मैं तुमसे कह सकता हूं कि बाइबिल वही कहती है जो गीता कहती है। आज मैं तुमसे कह सकता हूं कि बुद्ध वही कहते हैं जो महावीर कहते हैं। और कुछ लोग, थोड़े से लोग पृथ्वी पर तैयार भी हो गए हैं इस बात को समझने और सुनने को।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-098



सत्यमेव जयते—प्रवचन—98


सूत्र:

अभूतवादी निरयं उपेति यो चापि।
कत्‍वा न करोमीति चाह।
उभोति ते पोच्‍च समा भवंति।
निहीनकम्‍मा मनुजा परत्‍थ ।।257।।

कुसो यथा दुग्‍गहीतासे हत्‍थमेवानुकंतति।
सामज्‍जं दुप्‍परामट्ठं निरमाय उपकड्ढति ।।258।।

कयिरा च कयिराथेनं दल्‍हमेनं परक्‍कमे।
सिथिलो हि परिब्‍बाजो भिय्यो आकिरते रजं ।।259।।

नगरं यथा पच्‍चंतं गुत्‍तं संतरबाहिरं ।
एवं गोपेथ अत्‍तानं खणो वे मा उपच्‍चगा।
खणातीता हि सोचंति निरयम्‍हि समप्‍पिता ।।260।।

अलज्‍जिता ये लज्‍जंति लज्‍जिता ये न लज्‍जरे।
मिच्‍छादिट्ठिसमादाना सत्‍ता गच्‍छंति दुग्‍गति ।।261।।


अभये व भयदस्सिनो भये व अभयदस्सिनो।
मिच्छादिद्विसमादाना सत्ता गच्छंति दुग्गतिं ।।262।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-097



मृत्युबोध के बाद ही महोत्सव संभव—प्रवचन—97

प्रश्‍न सार:

 पहला प्रश्न

 आपने कहा कि जीवन का सत्य मृत्यु है। फिर मृत्यु का सत्य क्‍या है?

जीवन विरोधाभासों से बना है। जीवन विरोधाभासों के बीच तनाव और संतुलन है। तनाव भी और संतुलन भी। यहां प्रकाश चाहिए हो तो अंधेरे के बिना न हो सकेगा। यहां जीवन चाहिए हो तो मृत्यु के बिना नहीं हो सकेगा। तो एक अर्थ में अंधेरा प्रकाश का विरोधी भी है और एक अर्थ में सहयोगी भी। ये दोनों बातें खयाल में रखना। विरोधी इस अर्थ में कि अंधेरे से ठीक उलटा है। सहयोगी इस अर्थ में कि बिना अंधेरे के प्रकाश हो ही न सकेगा। अंधेरा पृष्ठभूमि भी है प्रकाश की।
और ऐसा ही जीवन—मृत्यु का संबंध है। मृत्यु के बिना जीवन की कोई संभावना नहीं। मृत्यु की भूमि में ही जीवन के फूल खिलते हैं। और मृत्यु में ही टूटते हैं, गिरते हैं, बिखर जाते हैं। जैसे पृथ्वी से ऊगता है पौधा, खिलता है, बड़ा होता है; पृथ्वी के सहारे ही खिलता और बड़ा होता है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-096



लोभ संसार है, गुरु से दूरी है—प्रवचन—96

सूत्र:

दप्‍पव्‍बज्‍जं दुरभरमं दुरवासा घरा दुखा।
दुक्‍खो समानसंवासे दुक्‍खानुपतितद्धगू।
तस्‍सान च अद्धगू सिया न च दुक्‍खानुपतितो सिया ।।253।।

सद्धो सीलेन संपन्‍नो यसोभोगसमप्‍पितो।
यं यं पदेसं भजति तत्‍थ तत्‍थेव पूजितो ।।254।।

दूरे संतो पकासेंति हतवंतो व पब्‍बता ।
असंतेत्‍थ न दिस्‍संति रत्‍तिखित्‍ता यथासरा ।।255।।

एकासनं एकसेय्यं एको चरमतंदितो ।
एकोदममत्‍तानं वनंते रमतो सिया ।।256।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-095



मातरम् पितरम् हंत्‍वा—प्रवचन—95

प्रश्‍न सार:


पहला प्रश्‍न:

 मैं दूसरों को सलाह देने में बडा कुशल हूं, यद्यपि अपनी समझ अपने ही काम नहीं आती है। दूसरों को सलाह देना इतना सरल क्यों होता है?

 महाराज आप सोचते हैं कि आपकी सलाह दूसरों के काम आती है! सलाह किसी के काम नहीं आती। जब आपके ही काम आपकी' सलाह नहीं आती, तो दूसरे के काम कैसे आ जाएगी? जिसको आपने ही इस योग्य नहीं माना कि इसका उपयोग करूं जीवन में, उसका कौन उपयोग करने वाला है?
लुकमान से किसी ने पूछा था, ऐसी कौन सी चीज है दुनिया में जिसे सभी देते हैं और कोई नहीं लेता? लुकमान ने कहा, सलाह। दी खूब जाती है, लेता कोई भी नहीं। तुम खुद ही अपनी सलाह मानने को तैयार नहीं हो, थोड़ा सोचो!

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-094



धर्म के त्रिरत्न—प्रवचन—94

 सूत्र:

सुप्‍पबुद्धं पबुज्‍झंति सदा गोतमसावका।
येसं दिवा च रत्‍तो च निच्‍चं बुद्धगता सति ।।247।।

सुप्‍पबुद्धं पबुज्‍झंति सदा गोतमसावका।
येसं दिवा च रत्‍तो च निच्‍चं धम्‍मगता सति ।।248।।

सुप्‍पबुद्धं पबुज्‍झंति सदा गोतमसावका।
येसं दिवा च रत्‍तो च निच्‍चं संधगता सति ।।249।।

सुप्‍पबुद्धं पबुज्‍झंति सदा गोतमसावका।
येसं दिवा च रत्‍ति च निच्‍चं कामगता सति ।।250।।

सुप्‍पबुद्धं पबुज्‍झंति सदा गोतमसावका।
येसं दिवा च रत्‍तो च अहिंसाय रतो मनो ।।251।।

सुप्‍पबुद्धं पबुज्‍झंति सदा गोतमसावका।
येसं दिवा च रत्‍तो च भावनाय रतो मनो ।।252।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-093



जीने में जीवन—प्रवचन—93

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

 मैं तब तक ध्यान कैसे कर सकता हूं जब तक कि संसार में इतना दुख है, दरिद्रता है, दीनता है? क्या ऐसी स्थिति में ध्यान आदि करना निपट स्वार्थ नहीं है? परमात्मा मुझे यदि मिले, तो उससे अपनी शांति मांगने के बजाय मैं उन लोगों के लिए दंड ही मांगना ज्यादा पसंद करूंगा जिनके कारण संसार में शोषण है, दुख है और अन्याय है।

जैसी आपकी मर्जी! ध्यान न करना हो तो कोई भी बहाना काफी है। ध्यान न करना हो तो किसी भी तरह से अपने को समझा ले सकते हैं कि ध्यान करना ठीक नहीं। लेकिन अभी यह भी नहीं समझे हो कि ध्यान क्या है? यह भी नहीं समझे हो कि दुनिया में इतना दुख, इतनी पीड़ा, इतनी परेशानी ध्यान के न होने के कारण है। दुखी आदमी दूसरे को दुख देता है। और कुछ देना भी चाहे तो नहीं दे सकता। जो तुम्हारे पास है वही तो दोगे। जो तुम्हारे पास नहीं है, वह देना भी चाहो तो कैसे दोगे। दुखी दुख देता है, सुखी सुख देता है। यदि तुम चाहते हो कि दुनिया में सुख हो, तो भीतर की शांति, भीतर का होश अनिवार्य शर्तें हैं।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-092



मृत्यु की महामारी में खड़ा जीवन—प्रवचन—92


मत्‍तासुखपरिच्‍चागा पस्‍से चे विपुलं सुखं।
चजे मत्‍तासुखं धीरो संपस्‍सं विपुलं सुखं ।।241।।

परदुक्‍खूपदानेन यो अत्‍तनो सुखमिच्‍छति।
वेरसंसग्‍गसंसट्ठे वेरा से न परिमुच्‍चति ।।242।।

            यं ही किच्चं तदपविद्धं अकिच्चं पन कयिरति।
            उन्नलानं पमत्तानं तेसं बड्ढंति आसवा ।।243।।

येसज्च सुसमारद्धा निच्चं कायगतासति ।
अकिन्चन्ते न सेवंति किच्चे सातच्‍चकारिनो
सतानं संपजानान हंत्वा गच्छंति आसवा ।।244।।

मातरं पितरं हंत्या राजानो व खत्तियो।
रट्ठं सानुचरं' हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो ।।245।।

 मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च सोत्थिये ।
                  वेय्यग्‍धपज्‍चमं हंत्‍वा अनीधो याति ब्राह्माणो ।।246।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-भाग-10

एस धम्‍मो सनंतनो
                      (भाग—10)
ओशो
  जिसके मन में आज भी बुद्ध के प्रति अपार श्रद्धा है, उसके लिए बुद्ध आज उतने ही प्रत्‍येक्ष है जैसे तब थे। कोई फर्क नहीं पड़ता है। श्रद्धा की आँख हो तो समय और स्‍थान की सारी दूरियां गिर जाती है। आज हमसे बुद्ध की दूरी पच्‍चीस सौ साल की हो गयी है। यह समय की दूरी है। लेकिन प्रेम और ध्‍यान के लिए न कोई समय है और न स्‍थान। दोनों तिरोहित हो जाते है। तब हम जीते है शाश्‍वत में। तब हम जीते है अनंत में। तब हम जीते है उसमें, जो कभी नहीं बदलता; जो सदा है, सदा था, सदा रहेगा। एस धम्‍मो सनंतनो। उसको जान लेना ही शाश्‍वत सनातन धर्म को जान लेना है।

ओशो