रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
नौवां प्रवचन
मन के मंदिर में ध्यान का दीया
आज अंतिम चर्चा है। बहुत से प्रश्न मेरे पास इकट्ठे रह गए हैं। बहुत
से आज व्यक्तिगत मिलन में पूछे गए हैं। उन सभी प्रश्नों के उत्तर देना संभव नहीं
होगा और जरूरी भी नहीं है। जरूरी इसलिए नहीं है कि मैंने इन तीन दिनों में जो थोड़ी
सी बातें आपसे की हैं, जिसको वे बातें समझ में पड़ी होंगी, उसे मेरा जीवन को देखने का कोण, जीवन को देखने की
दृष्टि समझ में आ गई होगी। जो प्रश्न नहीं मैं उत्तर दे पाऊंगा समय के अभाव के
कारण, अगर मेरी दृष्टि खयाल में आ गई है, तो उन प्रश्नों के उत्तर खुद भी समझे जा सकते हैं। इसलिए जरूरी नहीं है।
और इसलिए भी सभी प्रश्नों के उत्तर देना जरूरी नहीं है कि प्रश्न है आपका, मेरे उत्तर क्या करेंगे? मेरे उत्तर चिंतन की एक
दिशा की ओर इंगित कर सकते हैं। लेकिन मेरे उत्तर आपके प्रश्नों के उत्तर नहीं बन
सकते। अपना उत्तर तो आपको खोजना पड़ेगा। इसलिए जरूरी नहीं है। किस दिशा में चिंतन
करें? चिंतन की प्रक्रिया क्या हो?


