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गुरुवार, 10 मई 2018

मा आनंद सीता के गीत-06


06-मेरे प्रभु! मेरे प्रभु!
कण-कण पे तू है छा गया,
मेरे प्रभु! मेरे प्रभु!

खुली दृष्टि में है तू ही तूं,
हे बंद आंखों में भी तू ही तूं
जाती नजर जहां है तूं
अंतर में मेरे रात दिन
आवाज तेरी गूंजती है सदा
स्वांसों में संगीत झनक उठता है
मेरे प्रभु! मेरे प्रभु!

मा आनंद सीता के गीत-05


05-बाहु पसारे प्रभु खड़ा

प्रभु प्रेम में पागल बने ये जीव सब कोई यहां
बह-बह के आता है सभी जल सब ओर से सागर जहां
जब दे रहा सागर निमंत्रण, कैसे कोई रूक सके
तट तोड़कर नदियां बहेंगी, प्रियतम के अंक समा सके
सब देश के व्यक्ति यहां आकर समर्पित हो रहे है
बाहु पसारे प्रभु खड़ा, बाहु पसारे प्रभु खड़ा।
(1975 ओशो युग पूना)

मा आनंद सीता के गीत-04


04-कौतुक घटित हुआ कैसा?

आई तेरे द्वार प्रभु, तुम तो थे ध्यानस्थ
अर्धखुली आंखों से तेरी बरस रहा था अमृत
मंदिर में जो भक्त खड़े थे, नाच रहे थे मस्त
झोली सबकी भरी हुई थी, निधि अमूल्य थी हस्त
मैं अभागी पहुंची देरी से, खाली झोली लिए हुए
कोने में इक खड हुई थी, नैनन अविरल अश्रु बहे

मा आनंद सीता के गीत-03


03-जिनको कभी जाना न था

कैसे थे ये क्षण अनोखे, स्वास्थ सौंदर्य से भरे
ह्रदय में जब थी न हलचल, फिर भी पुलकितताझरे

जीने की जो जिद थी अपनी, जाने कहां वह खो गई
देखते ही देखते, मैं देखती ही रह गई।
आंखें थी फिर भी सब कुछ धुंधला सा दिख रहा था

बुधवार, 9 मई 2018

मा आनंद सीता के गीत-02


02-मंन्जिल तेरी यही

नैनों ने तेरे ढूंढ लिया है, मुझको इस बार
प्राणों ने तेरे पा लिया है, अपना प्राणाधार

अब पूछने की किससे भी, जरूरत तुझे नहीं
सुनने से देखने से तेरी, प्यास जो जगी।

इससे ही तो पहचानेगी, तू अपने को कभी
अंतर द्वधा को छोड दे, मंजिल तेरी यहीं
मंजिल तेरी यहीं।
( 4 दिसंबर 1973 बंबई)

मा आनंद सीता के गीत-01

01-क्या तुम वहीं हो?
जिसकी मुझे तलाश थी क्या तुम वहीं हो?
जिसकी थी प्यास प्राणों में क्या तुम वहीं हो?

व्याकुल हो नैन जब मेरे, उठते थे चाहूं ओर
मुझको खबर न थी किसकी तलाश थी उन्हें
क्या तुम वहीं हो?

झंझावत मेरे प्राणों में उठता था जब कभी
हैरान हो में देखती थी यहां वहां तभी
प्राणों में जिसकी तडप थी
क्या तुम हो वहीं ?

मा आनंद सीता के गीत-(मा आनंद सीता)

क्या तुम वहीं हो? –(मा आनंद सीता)

(ओशो को समर्पित काव्य गीत भाव मंजूषा)

ओशो का मैंने पहली बार जब क्रास मैदान मम्बई में 1973 बोलते हुए सूना तो मेरे पूर्व जन्मों की सारी यादें जीवित हो गई, मानों अंदर कुछ हो गया। कुछ सोया सा था वह जीवित हो गया।
शायद बीज तो थे, पर उन्हें माली की जरूरत थी। नहीं तो बीज में ओर पत्थर में क्या फर्क होगा। मैं इस वृद्धावस्था में भी जैसे पागल हो गई।
ओर यदि कोई कोई बात मेरेीसमण् में नहीं आई तो.......होगा उसमें जरूर कुछ। या कुछ इसमें भी, लेकिन यदि मुझे कुछ नहीं समझ में आता या पता चलता; तो जो समझ में आता है उसे क्यों छोड़ू?
.........देखा, तो मेरा कितना रूपांतरण होता गया है। वह मैं क्यों भूल रही हूं। उनके चरणों में बैठकर, उन्होंने तो इतना कुछ मुझे दिया कि वह कह नहीं सकती।

मा आनंद सीता के गीत-(भाव मंजुषा)

भुुुुमिका-
मा सीता—
मा सीता का जन्म करांची (सिंध) पकिस्तान में 01-नवम्बर सन् 1913 को एक खुशहाल पटनानी परिवार में हुआ। ओशो जी की मां का जन्म भी 1913 में ही हुआ था परंतु उनकी तारिख का किसी को ज्ञात नही है। उस समय बाल विवाह की प्रथा थी। इस लिए उनका विवाह 14 साल कि छोटी उम्र में ही हो गया था। पति का नाम सुंदर दास प्रधाननी था। मा सीता के तीन पुत्र रतन पैदा हुए, बडी लडकी जिसका नाम कृष्णा था। जो 1931 में पैदा हुई, उसके बाद देव प्रधाननी जो 1933 में ओर सबसे छोटे बेटे नवीन प्रधाननी 1936 में पैदा हुए। वैसे तो सभी बच्चे ओशो से जुडे परंतु नवीन जो मा सीता के कहने से अमरिका चले गये थे वह एक मात्र सपुत्र थे जो ओशो मे पूर्णता से डूब गये। विभान से 1936 में प्रधाननी परिवार करांची छोड कर बम्बई आ गऐ थे।
बात उन दिनों की है जब ओशो जी बम्बई के क्रास मैदान पर गीता पर बोल रहे थे। तब मा सीता ने एक बार ओशो को प्रवचन करते हुए सूना ओर देख लिया । ये बात 1973 की है। तब तो मानों उनके अचेतन के पिछले जन्मों के सभी द्वार खुल गये। वह गा उठी क्या तुम हो वहीं...क्या तुम वहीं हो?------.जिस मैं ढूढ रही थी। मानों मीरा को कृष्ण मिल गये।
पैरों में दर्द के बावजुद भी वह दो मंजिल उतर कर किसी भी दर्द की परवाह न करते हुए ओशो जी प्रवचन सुनने आने लगी। रोज रोज वह गहरे से गहरे में डूब रही थी। किसी की भी समझ में नहीं आ रहा था की वह एक नास्तिक सी दिखने वाली महिला को क्या हो गया। परिवार के लोग भी अचरज में थे कि व न तो मंदिर जाती थी ओर न कभी पूजा पाठ करती थी, ओर कितना सहासी महिला थी ओर इस साठ साल की उम्र मे उन्हें क्या हो गया है।