संन्यास
है : मैं से
मुक्ति—(प्रवचन—दसवां)
दिनांक 10
दिसम्बर 1979;
श्री
रजनीश आश्रमश्
पूना।
प्रश्नसार:
प्रश्न–01
भगवान:
एक
गीत और मुझे
गाना है
गीत
तो वही है जो हुलस—हुलस
अपने
ही कण्ठों
ने गाये हों
भाव
तो वही है जो
उमग—उमग
अपने
ही प्राणों से
आये हों
क्या
होगा पर के सुरतालों
मुझको
निज सरगम पर
आना है
प्यारे
हैं—'गीत
बहुत प्यारे
हैं
रसभीगे
गीत ये
तुम्हारे हैं
इन
पर मैं
न्यौछावर
होता हूं
पर
मेरे गीत अभी
क्वारे हैं
इनका
भी ब्याह अब
रचाना है
प्राणों
का साज ही
बजाना है .......
प्रश्न—02
भगवान, मैं
अपनी जिंदगी
राजनीति में
ही गंवाया हूं
और अब जब कि
मंत्री बनने
का अवसर आया
है तब आपका संन्यास
आकर्षित कर रहा
है। मैं क्या
करूं? बडी दुनिधा
में हूं।


