कुल पेज दृश्य

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 19 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10



पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 10 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-दसवां-(प्रश्न-सार)

01—पिय को खोजन मैं चली, पिया मिलन कैसे हो?
02—कुछ दिनों से आप आंखों से पिलाते हैं, लेकिन मदहोश आंखें ढल जाती हैं। तत्क्षण अहोभाव में डूब जाता हूं और हृदय से पुकार उठती है:
गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊं,
दीजो ध्यान हरिगुन गाऊं।
मन तड़पत हरि-दर्शन को आज।
03—क्या मारवाड़ियों में कुछ प्रशंसाऱ्योग्य नहीं होता है?

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-09



पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 09 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-नौवां-(प्रश्न-सार)

01—बेइरादा नजर तुमसे टकरा गई,
जिंदगी में अचानक बहार आ गई।
मौत क्या है जमाने को समझाऊं क्या,
एक मुसाफिर को रस्ते में नींद आ गई।
रुख से परदा उठा, चांद शरमा गया,
जुल्फ बिखरी तो काली घटा छा गई।
दिल में पहले सी अब वो हलचल नहीं,
अब मुहब्बत में मिटने की घड़ी आ गई।

02—अगर एक पुरुष अपनी पत्नी से कामत्तुष्टि नहीं पाता है तो वह दूसरी स्त्रियों के पास जाता है। ऐसा करने से वह एक अपराध-भाव अनुभव करता है, क्योंकि उसे पत्नी से और सब सुविधाएं मिलती हैं, और वह उन सब बातों के लिए उसे चाहता है। जब वह अपराध-भाव अनुभव करता है तो उसका मन तनाव से घिर आता है। उसे क्या करना चाहिए कि उसका मन तनावग्रस्त न हो अथवा उसे अपनी कामत्तृप्ति के लिए कहीं जाना बंद कर देना चाहिए?

03—आपके विवाह-संबंधी विचार सुन-समझकर, विवाह करने की इच्छा ही उड़ गई; परंतु ऐसे महत्वपूर्ण अनुभव से गुजरे बगैर रहा भी नहीं जा सकता। मुझ त्रिशंकु का मार्ग-दर्शन करें!

04—आप दलबदल करने वाले राजनीतिज्ञों के संबंध में क्या कहते हैं?

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-08



पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 08 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-आट्ठवां-(प्रश्न-सार)

01—मीरा मेरी प्रेरणा-स्रोत रही है और कृष्ण मेरे इष्टदेव। शांत क्षणों में मैंने भी मीरा जैसे भक्ति-भाव की कल्पना तथा चाह की है और उसी के अनुरूप कुछ प्रयास भी किया। मगर प्राणों में उतनी पुलक नहीं उठी कि मैं नाच सकूं। फिर मैं आपके संपर्क में आया; आपका शिष्य हुआ। मैं तरंगित हुआ; मैं रोया; मैं हंसा। मगर कृष्ण से अब कुछ लगाव नहीं रहा। अब तो उस छवि के पास आते और आंखें मिलाते भी संकोच लगता है, जिसे मैंने वर्षों पूजा, जिसकी अर्चना की। यह क्या है भगवान?
02—उज्जैन के सिंहस्थ मेले में उस स्थान पर काफी भीड़ होती थी जहां नागा साधु लैंगिक प्रदर्शन करते थे। जैसे लिंग से बांध कर जीप गाड़ी को खींचना, आदि। क्यों नग्न प्रदर्शन करने व देखने में लोग उत्सुक होते हैं और उनकी तारीफ करते हैं? और जब आपके आश्रम में ऐसा कोई कृत्य नहीं होता, फिर भी लोग क्यों आप पर और आपके आश्रम पर नाराज हैं?
03—मैं जल्दी से जल्दी दुख से मुक्ति चाहता हूं और मोक्ष का आनंद भी। कोई मार्ग बतावें।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07



पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 07 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-सातवां-(प्रश्न-सार)

1--आप सत्य को जैसा है वैसा ही कह देते हैं--दो टूक। इसीलिए आपके शत्रु पैदा हो जाते हैं। जैसे आपने कल दयानंद के संबंध में कहा। बात सच है पर चुभती है। क्या आप ऐसे संबंधों में चुप ही रहें तो ठीक न हो?
2—आपने कहा कि आप भारत-रत्न होना पसंद नहीं करेंगे। कृपया बताएं कि क्या आप विश्व-रत्न होना पसंद करेंगे?
3—आप किसी प्रश्न का उत्तर लंबा और किसी का अति संक्षिप्त क्यों देते हैं?
4—पंद्रह साल बीत चुके पर आपका कोई शिष्य बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं हुआ। कृपा करके समझाइए।
5—मेरा मन कहता है कि संन्यास मत लो पर भीतर और कुछ कह रहा है--यह मौका बार-बार नहीं आएगा।
6—आपके प्रवचनों से यह लगता है कि आप ब्रह्मचारियों के विरोध में हैं, नीति-नियमों और आदर्शों के विरोध में हैं। ऋषि-मुनियों और साधु-संतों की आलोचना भी आप निरंतर करते रहते हैं। शास्त्रों से भी मुक्त होने को आप कहते हैं। आखिर आपका अभिप्राय क्या है? आपका धर्म क्या है? समाज के लिए कुछ नीति-नियमों का आप विधान करेंगे?

गुरुवार, 18 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06



पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 06 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-छट्ठवां-(प्रश्न-सार)

1--प्रवचन में फल के बारे में आपने कहा कि मैं चुप रह गया और कुछ नहीं बोला। भगवान, इतने सालों से आपने इतने फल खिलाए हैं कि अब न तो कुछ बोलने को रहा है, न कुछ पूछने को। सब कुछ मिल गया है। अब तो बस आपकी अनुकंपा मात्र रह गई है। आपका लाखों, करोड़ों, अरबों बार अनुग्रह, उपकार!

2--मैं नहीं जानता कि यहां क्या पाने आया हूं, लेकिन कुछ पाने की इच्छा है। क्या मिलेगा? कृपया बताएं।

3--मैं ध्यान करने की अथक चेष्टा कर रहा हूं, पर सफलता हाथ नहीं लगती है। क्या करूं?

4--आप कहते हैं कि इस सदी का मनुष्य सबसे ज्यादा प्रौढ़ है। तो यह मनुष्य आपको क्यों नहीं समझ पा रहा है? कृपया समझाने की अनुकंपा करें।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05



पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 05 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पांचवा-(प्रश्नसार)

पहला प्रश्न: भगवान!
आपको सुनते-सुनते रोना आ जाता है। अब सक्रिय ध्यान के उत्सव के समय पर रोना फूट पड़ता है। यह क्या है? ध्यान के बीच-बीच ऐसा भाव जगता है कि यह शरीर अब रुकावट है; यह कैसे छूटे--ऐसा भाव सघन होता जाता है। यह क्यों? समझाने की अनुकंपा करें।

अक्षय विवेक!
मनुष्य को ऐसे गलत संस्कार दिए गए हैं कि न तो वह जी भर कर कभी रोया है, न जी भर कर कभी हंसा है। जी भर कर जीया ही नहीं है। किसी पहलू से, किसी आयाम में, जी भर कर कोई काम किया ही नहीं, सब अधूरा-अधूरा है! और इसलिए भीतर बहुत सी चीजें त्रिशंकु की भांति लटकी रह जाती हैं।
मैं तो कहता हूं ध्यान उत्सव है, लेकिन यह घटना जो तुम्हें घट रही है, औरों को भी घटती है। उत्सव मनाते-मनाते अचानक रोना न मालूम किस कोने से उभर आता है! दबा पड़ा होगा कहीं; जन्मों से दबा पड़ा होगा। विशेषकर पुरुषों को। क्योंकि बचपन से ही हम सिखाते हैं लड़कों को: रोना मत! रोती हैं लड़कियां। तुम हो मर्द बच्चे, रोना तुम्हारा काम नहीं है।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04



पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 04 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-चौथा

प्रश्न-सार:

1—आप मेरी सुहागरातों के मालिक हैं। मुझे कभी वैधव्य का दुख देना ही नहीं। बस इतनी ही चाह है--जीओ हजारों साल!

2—मैं नौ वर्षों से आर्यसमाज में पुरोहित था। पांच वर्षों से आपके संपर्क में हूं। मैं पांच जून को संन्यास लेकर जा रहा हूं। मैं आर्यसमाज से घूमने के बहाने पच्चीस दिन की छुट्टी लेकर यहां आया था। अब मैं माला लेकर जाऊंगा। वे लोग मेरे दुश्मन हो जाएंगे, मुझे धक्के देकर वहां से निकाल देंगे। ऐसी अवस्था में मैं क्या करूं?

3—हम कैसे आपसे जुड़ जाएं? कृपया बतलाएं।

4—आप स्त्रियों के प्रति सामान्यतः अत्यंत करुणा भाव से सराहना करके उनको सम्मान देते हैं। मगर जब स्त्री की बात पत्नी के रूप में करते हैं, तब उसे डांटते हैं और बहुत अलग रूप में चित्रित करते हैं। ऐसा क्यों?

5मेरे पति आपके संन्यासी हैं, मुझे कोई एतराज नहीं। वे मुझे आपके प्रवचनों में, कीर्तन, ध्यान, शिविर और पूना तक के कार्यक्रमों में साथ भी लाते हैं। मैंने आपका संन्यास अभी तक नहीं लिया है, फिर भी वे लेने को मजबूर नहीं करते हैं। मगर मेरी शिकायत सिर्फ इतनी है कि वे न सिनेमा देखने जाते हैं, न साथ घूमने निकलते हैं; घर में ही चुपचाप बैठे रहते हैं; और खुले आकाश को ताकते रहते हैं। बातचीत में कोई उत्सुकता नहीं रखते। ज्यादा समय आपकी बातों में ही पड़े रहने का क्या मतलब? मैं भी उनकी पत्नी हूं, जरा मेरी भी सुनें!

बुधवार, 17 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03



पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 03 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-तीसरा

प्रश्न-सार

01-आपकी हत्या करने के प्रयास की आलोचना किसी भी अखबार वाले ने नहीं की, न ही किसी उच्च दर्जे के व्यक्ति ने कुछ वक्तव्य दिया!
बुद्धिजीवी और साधारणजन, सब के सब उपेक्षा से क्यों भरे हैं?
02-मैं एक ज्योतिषी हूं, किंतु आपके विचार सुन कर ऐसा लगता है कि यह गलत और धोखे का धंधा छोड़ दूं। आपका आशीष चाहिए।

पहला प्रश्न: भगवान!
बाईस मई को सुबह प्रवचन में एक युवक ने छुरा फेंक कर आपकी हत्या करने का प्रयास किया, जो निष्फल रहा। आश्चर्य की बात है कि इस घटना की आलोचना किसी भी अखबार वाले ने नहीं की, न ही किसी उच्च दर्जे के व्यक्ति ने इसके बारे में कुछ वक्तव्य दिया! आश्रमवासियों ने उस व्यक्ति के साथ जो प्रेमपूर्ण व्यवहार किया, उसकी प्रशंसा भी किसी अखबार या पत्रिका में नहीं छपी।
बुद्धिजीवी और साधारणजन, सबके सब उपेक्षा से क्यों भरे हैं?
भगवान, ऐसे मुर्दा देश में आपका प्रमुख आश्रम है, जब कि यहां तो शाखा होना भी बेकाम दिखता है।

कैलाश गोस्वामी!

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02



पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 02 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-दूसरा

प्रश्न-सार

01-आह कितना आनंद! आह कितनी पीड़ा!
02-आप कहते हैं कि दुखी व्यक्ति ज्यादा भोजन करते हैं, इसलिए मोटे हो जाते हैं। फिर महात्मागण मोटे क्यों होते हैं?
03-मैं आपका संन्यास लेने से बहुत ही डरता हूं। कृपया अपनी शराब कुछ ऐसी पिलाएं कि मैं साहस कर सकूं!
04-क्या धर्मगुरु सच ही बुद्धू होते हैं?

पहला प्रश्न: भगवान!
आह कितना आनंद! आह कितनी पीड़ा!

विनोद भारती!
जीवन की झाड़ी में जहां गुलाब के फूल खिलते हैं, वहां कांटे भी खिलते हैं। लेकिन फूल खिलें तो कांटे भी प्रीतिकर हैं, पीड़ा भी मधुर है। कांटे दुखदायी हो जाते हैं जब फूल नहीं खिलते, कांटे ही कांटे बचते हैं। कांटों में दुख नहीं है, फूलों के अभाव में दुख है। फूलों के साथ खिलें--जी भर कर खिलें--तो फूलों के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, फूलों को पृष्ठभूमि देते हैं।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-01



पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक 01 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पहला
प्रश्न-सार
01-नयी प्रवचनमाला का शीर्षक है: पिय को खोजन मैं चली। हमें इसका आशय समझाने की अनुकंपा करें!
 
02-मैं जिंदा हूं या नहीं, कुछ समझ में नहीं आता है!

पहला प्रश्न: भगवान! 
नयी प्रवचनमाला का शीर्षक है: पिय को खोजन मैं चली। हमें इसका आशय समझाने की अनुकंपा करें!

आनंद प्रतिभा!
पलटू का प्रसिद्ध वचन है:
पलटू दिवाल कहकहा, मत कोई झांकन जाय।
पिय को खोजन मैं चली, आपुई गई हिराय।।
यह कहानी तुमने सुनी होगी कि चीन की दीवाल के एक खास स्थल पर एक चमत्कारपूर्ण घटना घटती है। कहानी ही है, लेकिन अर्थपूर्ण है। दीवाल के उस खास स्थल पर जो भी चढ़ कर दूसरी तरफ झांकता है, जोर से हंसता है और कूद पड़ता है, फिर लौटता नहीं। बहुत लोग उस दीवाल पर यह कस्त करके झांकने गए कि न तो हम हंसेंगे, न हम कूदेंगे।