जागो--नाचते हुए—दसवां
प्रवचन
: दिनांक १० जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना.
प्रश्नसार:
1—जब से तुझे पाया, तेरी महफिल में दौड़ा आया।
तू ही जाने तू क्या पिलाता, हम तो जानें
तेरी महफिल में सबको मधु पिलाता,
जहां पक्षी भी गीत गाएं और पौधे भी लहराएं।
हम न जानें प्रभु-प्रार्थना, नहीं समझें स्वर्ग-नर्क की भाषा
अब हमें न कहीं जाना, न कुछ पाना,
हमें तो लगे यही संसार प्यारा!...
2—प्यार पर तो बस नहीं है मेरा, लेकिन फिर भी तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं?
3—आप प्रेम करने को कहते हैं। प्रेम मैंने भी
किया था। हार खायी और घाव अभी भी भरे नहीं हैं। समाज को वह प्रेम भाया नहीं। और
मेरी प्रेयसी कमजोर थी; वह समाज के सामने झुक
गयी। मैं उसे क्षमा नहीं कर पाता हूं।...और फिर भी आप प्रेम करने को कहते हैं?
4—सैद्धांतिक रूप से सब
कुछ समझ आते हुए भी चीजें व्यवहार में क्या नहीं आ पातीं? कृपया
समझाएं।



