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शुक्रवार, 23 मार्च 2018

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुुंदर दास)--प्रवचन-10


जागो--नाचते हुएदसवां प्रवचन

: दिनांक १० जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना.
प्रश्नसार:
1—जब से तुझे पाया, तेरी महफिल में दौड़ा आया।
तू ही जाने तू क्या पिलाता, हम तो जानें
तेरी महफिल में सबको मधु पिलाता,
जहां पक्षी भी गीत गाएं और पौधे भी लहराएं।
हम न जानें प्रभु-प्रार्थना, नहीं समझें स्वर्ग-नर्क की भाषा
अब हमें न कहीं जाना, न कुछ पाना,
हमें तो लगे यही संसार प्यारा!...
2—प्यार पर तो बस नहीं है मेरा, लेकिन फिर भी तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं?
3—आप प्रेम करने को कहते हैं। प्रेम मैंने भी किया था। हार खायी और घाव अभी भी भरे नहीं हैं। समाज को वह प्रेम भाया नहीं। और मेरी प्रेयसी कमजोर थी; वह समाज के सामने झुक गयी। मैं उसे क्षमा नहीं कर पाता हूं।...और फिर भी आप प्रेम करने को कहते हैं?
4सैद्धांतिक रूप से सब कुछ समझ आते हुए भी चीजें व्यवहार में क्या नहीं आ पातीं? कृपया समझाएं।

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुुंदर दास)--प्रवचन-09


सदगुरु की महिमा—नौवां प्रवचन

: दिनांक ९ जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:
धीरजवंत अडिंग जितेंद्रिय निर्मल ज्ञान गहयौ दृढ़ आदू।
शील संतोष क्षमा जिनके घट लगी रहयौ सु अनाहद नादू।।
मेष न पक्ष निरंतर लक्ष जु और नहीं कछु वाद-विवादू।
ये सब लक्षन हैं जिन मांहि सु सुंदर कै उर है गुरु दादू।।
कोउक गौरव कौं गुरु थापत, कोउक दत्त दिगंबर आदू।
कोउक कंथर कोउ भरथथर कोउ कबीर जाऊ राखत नादू।
कोई कहे हरिदास हमारे जु यों करि ठानत वाद-विवादू।
और तौ संत सबै सिरि ऊपर, सुंदर कै उर है गुरु हादू।।
गोविंद के किए जीव जात है रसातल कौं
गुरु उपदेशे सु तो छुटें जमफ्रद तें।
गोविंद के किए जीव बस परे कर्मनि कै
गुरु के निवाजे सो फिरत हैं स्वच्छंद तै।।
गोविंद के किए जीव बूड़त भौसागर में,
सुंदर कहत गुरु काढें दुखद्वंद्व तै।
औरउ कहांलौ कछु मुख तै कहै बताइ,
गुरु की तो महिमा अधिक है गोविंद तै।

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुुंदर दास)--प्रवचन-08


पुकारो--और द्वार खुल जाएंगे—आठवां प्रवचन

: दिनांक ८ जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:
1—भगवान! गत एक महीने से कुछ विचित्र घट रहा है, ध्यान-मंदिर में आपके चित्र के नीचे आपको नमन व स्मरण करे ध्यान प्रारंभ करता हूं तो कुछ क्षणों में ही त्वचा शून्य हो जाती है, रक्त-संचालन बंद हो जाता है, श्वास रुक सी जाती है, घटे-डेढ़ घंटे पश्चात पूर्व-स्थिति आने में आधा घंटा लग जाता है। परंतु पूरे समय अद्वितीय आनंद और स्फूर्ति अनुभव होती है। कृपा करके करके मार्गदर्शन करें।
2—मेरे ख्वाबों के झरोखों को फूलों से सजानेवाले
तेरे ख्वाबों मेरा कहीं गुजारा है कि नहीं
पूछकर अपनी निगाहों से तू बता दे मुझको
मेरी रातों के मुकद्दर में कहीं सुबह है कि नहीं?
3—कब तक प्रतीक्षा? प्रभु! कब तक प्रतीक्षा?
4—मैं अंध-श्रद्धालु नहीं हूं। पिछले पांच वर्षों से प्रवचन एवं साहित्य के माध्यम से आपे सान्निध्य में हूं, परंतु अभी कुछ घटित नहीं हुआ है। संन्यास लेने की इच्छा से यहां आया हूं। क्या ऐसी दशा में संन्यास लेना आत्मवंचना नहीं होगी। कृपया योग्य मार्गदर्शन करें।
5--आंखिन में तिमिर अमावस की रैन जिमि।
जम्बुनद-बूंद जमुना कल तरंग में।।
यों ही मेरा मन मेरो काम को न रह्यो माई।
रजनीश रंग है करि समानो रजनीश रंग में।।

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुुंदर दास)--प्रवचन-07


हरि बोलौ हरि बोल—सातवां प्रवचन

: दिनांक ७ जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:
बांकि बुराई छाड़ि सब, गांठि हृदै की खोल।
बेगि विलंब क्यों बनत है हरि बोलौ हरि बोल।।
हिरदै भीतर पैंठि करि अंतःकरण विरोल।
को तेरौ तू कौन को हरि बोलौ हरि बोल।।
तेरौ तेरे पास है अपनैं मांहि टटोल।
राई घटै न तिल बढ़ैं हरि बोलौ हरि बोल।।
सुंदरदास पुकारिकै कहत बजाए ढोल।
चेती सकै तौ चेतिले हरि बोलौ हरि बोल।।
पिय कै विरह वियोग भई हूं बावरी।
शीतल मंद सुगंध सुहात न बावरी।।
अब मुहि दोष न कोई परौंगी बावरी।
परिहां सुंदर चहुं विश विरह सुघेरि बावरी।।
पिय नैननि की बोर बैन मुहि देहरी।
फेरि न आए द्वार न मेरी देह री।
विरह सु अंदर पैठि जरावत देहरी।
सुंदर विरहिणी दुखित सीख दे देहरी।।
दूभर रैनि बिहाय अकेली सेज री।
जिनकै संगि न पीव बिरहनी से जरी।
विरह सकल वाहि बिचारी सेजरी।
सुंदर दुख अपार न पाऊं से जरी।।

बुधवार, 21 मार्च 2018

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुुंदर दास)--प्रवचन-06


जो है, परमात्मा है—छठवां प्रवचन

: दिनांक ६ जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:
1—परमात्मा कहां है?
2—हम तो खुदा के कभी कायल ही न थे, तुमको देखा खुदा याद आया।
3—ऐसा लगता है कि कुछ अंदर ही अंदर खाए जा रहा है, जिसकी वजह से उदासी और निराशा महसूस होती है।
4—संसार से रस तो कम हो रहा है और एक उदासी आ गयी है। जीवन में भी लगता है कि यह किनारा छूटता जा रहा है और उस किनारे की झलक भी नहीं मिली। और अकेलेपन से घबड़ाहट भी बहुत होती है और इस किनारे को पकड़ लेती हूं। प्रभु, मैं क्या करूं? कैसे यहां तक पहुंचूं?
5—क्या आप मुझे पागल बना कर ही छोड़ेंगे?
चूक-चूक मेरी, ठीक-ठीक तेरा!

पहला: परमात्मा कहां है?
परमात्मा कहां है, ऐसा पूछने में ही भूल हो जाती है। और प्रश्न गलत हो तो ठीक उत्तर देना असंभव हो जाता है। पूछो, परमात्मा कहां नहीं है? क्योंकि केवल वही है। ज्यादा ठीक होगा कहना कि जो है उसका ही दूसरा नाम परमात्मा है। परमात्मा शब्द छोड़ दो तो भी चलेगा। जो है, यह सारी समग्रता, यह छोटे से कण से लेकर विराट आकाश, यह जीवन का सारा विस्तार--इस सबका इकट्ठा नाम परमात्मा है।

मंगलवार, 20 मार्च 2018

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुुंदर दास)--प्रवचन-05


सुंदर सहजै चीन्हियां—पांचवां प्रवचन
: दिनांक ४ जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:
हिंदू की हदि छाड़िकै, तजी तुरक की राह।
सुंदर सहजै चीन्हियां, एकै राम अलाह।।
मेरी मेरी करते हैं, देखहु नर की भोल।
फिरि पीछे पछिताहुगे (सु) हरि बोलौ हरि बोल।।
किए रुपइया इकठे, चौकूंटे अरु गोल।
रीते हाथिन वै गए (सु) हरि बोलौ हरि बोल।।
चहल-पहल सी देखिकै, मान्यौ बहुत अंदोल।
काल अचानक लै गयौ (सु) हरि बालौ हरि बोल।
सुकृत कोऊ न कियौ, राच्यौ झंझट झोल।
अंति चल्यौ सब छाड़िकै (सु) हरि बोलौ हरि बोल।।
पैंडो ताक्यौ नरक कौ, सुनि-सुनि कथा कपोल।
बूड़े काली घार में (सु) हरि बालौ हरि बोल।
माल मुलक हय गय घने, कामिनी करत कलोल।
करहुं गए बिलाइकै, (सु) हरि बालौ हरि बालै।।
मोटे मीर कहावते, करते बहुत डफोल।
मरद गरद में मिलि गए, (सु) हरि बोलौ हरि बोल।।
ऐसी गति संसार की, अजहूं राखत जोल।
आपु मुए ही जानिहै, (सु) हरि बोलौ हरि बोल।।

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुुंदर दास)--प्रवचन-04

वन समस्या नहीं--वरदान है—प्रवचन-चौथा
: दिनांक 4 जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:
पहला प्रश्न: मनुष्य की वस्तुतः अंतिम खोज क्या है?

अपनी ही खोज, अपने से ही पहचान। मनुष्य अकेला है सृष्टि में जिसे स्व-बोध है, जिसे इस बात का होश है कि मैं हूं। पशु हैं, पक्षी हैं, वृक्ष हैं--हैं तो जरूर, लेकिन अपने होने का उन्हें कोई बोध नहीं। होने का बोध नहीं है, इसलिए दूसरा प्रश्न असंभव है उठना कि मैं कौन हूं! हूं सच, पर कौन हूं? और जिसके जीवन में यह दूसरा प्रश्न नहीं उठा, वह पशु तो नहीं है, मनुष्य भी नहीं है। कहीं बीच में अटका रह गया--घर का न घाट का। उसके जीवन में पशु की शांति भी नहीं होगी और उसके जीवन में परमात्मा की शांति भी नहीं होगी। वैसा आदमी बीच में त्रिशुंक की तरह अटका, सदा अशांत होगा।
पशु शांत हैं, चिंतित नहीं हैं, बैचेन नहीं हैं। चिन्ता और बेचैनी के लिए जितना बोध चाहिए, उतना बोध नहीं है। मूर्च्छा में जिये जाते हैं, बेहोशी में जिये जाते हैं। एक तरह की शांति है, एक तरह का सन्नाटा है। एक तरह की मस्ती है--मूर्च्छित है; सुंदर है फिर भी।

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुुंदर दास)--प्रवचन-03

तुम सदा एकरस, राम जी, राज जीतीसरा प्रवचन
: दिनांक ३ जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र:
तो पंडित आये, वेद भुलाये, षट करमाये, तृपताये।
जी संध्या गाये, पढ़ि उरझाये, रानाराये, ठगि खाये।।
अरु बड़े कहाये, गर्व न जाये, राम न पाये थाधेला।
दादू का चेला, भरम पछेला, सुंदर न्यारा ह्वै खेला।।
तौ ए मत हेरे, सब हिन केरे, गहिगहि गेरे बहुतेरे।
तब सतगुरु टेरे, कानन मेरे, जाते फेरे आ घेरे।।
उन सूर सबेरे, उदै किये रे, सबै अंधेरे नाशेला।
दादू का चेला, भरम पछेला, सुंदर न्यारा ह्वै खेला।।
आदि तुम ही हुए अवर नहिं कोई जी।
अहक अति अगह अति बर्न नहिं होइ जी।।
रूप नहिं रेख नहिं, श्वेत नहीं श्याम जी।
तुम सदा एकरस, राम जी, राम जी।।
प्रथम ही आज तैं मूल माया करी।
बहुरि वह कुघब्ब करि त्रिगुन ह्वै बिस्तरी।।

सोमवार, 19 मार्च 2018

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुुंदर दास)--प्रवचन-02

संसार अर्थात मूर्च्छा—दूसरा प्रवचन
दिनांक २ जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:
1—ज्ञानी परमात्मा को परम नियम कहते हैं, और कहते हैं कि यह नियम अत्यंत न्यायपूर्ण और कठोर है। दूसरी ओर भक्त परमात्मा को परम प्रेम कहते हैं और परम कृपालु। इस बुनियादी दृष्टि-भेद पर कुछ कहने की कृपा करें।
2—कहते हैं कि खेल के भी नियम होते हैं। फिर यह कैसा कि प्रेम में कोई नियम न हो?
3--भगवान, प्रेम स्वीकार न हो तो...?
4—संसार में असफलता अनिवार्य क्यों है?
5--मैं महापापी हूं मुझे उबारें!

पहला प्रश्न--
ज्ञानी परमात्मा को परम नियम कहते हैं, और कहते हैं कि यह ऋत, यह नियम अत्यंत न्यायपूर्ण और कठोर है। दूसरी ओर भक्त परमात्मा को परम प्रेम कहते हैं, और परम कृपालु। इस बुनियादी दृष्टि-भेद पर कुछ कहने की कृपा करें।

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुंदर दास)-प्रवचन-01

नीर बिनु मीन दुखी-प्रहला प्रवचन
दिनांक १ जून, १९७८; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र:
नीर बिनु मीन दुखी, छीर बिनु शिशु जैसे,
पीर जाके औषधि बिनु कैसे रहयो जात है।
चातक ज्यों स्वाति बूंद, चंद कौ चकोर जैसे,
चंदन की चाह करि सर्प अकुलात है।
निर्धन ज्यौं धन चाहे कामिनी को कंत चाहै,
ऐसी जाको चाह ताको कछु न सुहात है।
प्रेम कौ प्रभाव ऐसो, प्रेम तहां नेम कैसो,
सुंदर कहत यह प्रेम ही की बात है।
प्रेम भक्ति यह मैं कही, जानै बिरला कोइ।
हृदय कलुषता क्यों रहै, जा घट ऐसी होइ।।
सत्य सु दोइ प्रकार, एक सत्य जो बोलिये।
मिथ्या सब संसार, दूसर सत्य सुब्रह्म है।।
सुंदर देखा सोधिकै, सब काहू का ज्ञान।
कोई मन मानै नहीं, बिना निरंजन ध्यान।।
षट दरसन हम खोजिया, योगी जंगम शेख।
संन्यासी अरु सेवड़ा, पंडित भक्ता भेख।।
तो भक्त न भावैं, दूरि बतावैं, तीरथ जावैं, फिरि आवैं।
ली कृत्रिम गावैं, पूजा लावैं, झूठ दिढ़ावैं, बहिकावैं।।
अरुमाला नांवैं, तिलक बनावैं, क्यों पावैं गुरु बिन गैला।
दादू का चेला, भरम पछेला, सुंदर न्यारा ह्वै खेला।।

रविवार, 18 मार्च 2018

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुंदर दास)-ओशो

हरि बोलौ हरि बोल (संत सुंदर दास)-ओशो
सुंदरदास के पदों पर दिनांक 1 जून से 10 जून, 1979 तक हुए
भगवान श्री रजनीश आश्रम पूना में।
दस अमृत प्रवचनों की प्रथम प्रवचनमाला।

आमुख
संत सुंदरदास दादू कि शिष्य थे। भगवान श्री का कहना है कि दादू ने बहुत लोग चेताये। दादू महागुरुओं में एक हैं। जिसने व्यक्ति दादू से जागे उतने भारतीय संतों में किसी ने नहीं जागे।
सुंदरदास पर उनके बालपन में ही दादू की कृपा हुई। दादू का सुंदरदास के गांव धौंसा में आना हुआ। सुंदरदास ने उस अपूर्व क्षण का जिक्र इन शब्दों में किया है--
दादू जी जब धौंसा आये
बालपन हम दरसन पाये।
तिनके चरननि नायौ माथा
उन दीयो मेरे सिर हाथा।