विपन्नता का कारण : हमारी मान्यताएं—प्रवचन—70
पहला
प्रश्न:
जगत
झूठ है और जीवन दुख ही दुख है, ऐसी टेक पर खड़ा होने वाला जीवन
क्या और भी ज्यादा दुखी, उदास और विपन्न न हो जाएगा? क्या पूरब के देशों में यही चीज सामूहिक तल पर नहीं घटित हुई?
जीवन
दुख है, यह कोई दार्शनिक धारणा नहीं। ऐसा बुद्धपुरुष सोचते नहीं हैं कि जीवन दुख
है, ऐसी उनकी मान्यता नहीं है कि जीवन दुख है, जीवन को दुख सिद्ध करने में उनका कोई आग्रह नहीं है, जीवन ऐसा है। यह जीवन का तथ्य है। इसे तुम लाख झुठलाओ, झुठला न पाओगे। इसे तुम लाख दबाओं, दबा न पाओगे। यह
उभर—उभरकर प्रगट होगा। और जब उभरेगा, तब बहुत दुखी कर जाएगा।
क्योंकि तुम तो मानकर जीते हो कि जीवन सुख है, फिर उभरता है
दुख। सुख की धारणा जब—जब टूटेगी, तभी—तभी तुम दुखी हो जाओगे।
