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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-070



विपन्नता का कारण : हमारी मान्यताएंप्रवचन—70


 पहला प्रश्न:


जगत झूठ है और जीवन दुख ही दुख है, ऐसी टेक पर खड़ा होने वाला जीवन क्या और भी ज्यादा दुखी, उदास और विपन्न न हो जाएगा? क्या पूरब के देशों में यही चीज सामूहिक तल पर नहीं घटित हुई?

जीवन दुख है, यह कोई दार्शनिक धारणा नहीं। ऐसा बुद्धपुरुष सोचते नहीं हैं कि जीवन दुख है, ऐसी उनकी मान्यता नहीं है कि जीवन दुख है, जीवन को दुख सिद्ध करने में उनका कोई आग्रह नहीं है, जीवन ऐसा है। यह जीवन का तथ्य है। इसे तुम लाख झुठलाओ, झुठला न पाओगे। इसे तुम लाख दबाओं, दबा न पाओगे। यह उभर—उभरकर प्रगट होगा। और जब उभरेगा, तब बहुत दुखी कर जाएगा। क्योंकि तुम तो मानकर जीते हो कि जीवन सुख है, फिर उभरता है दुख। सुख की धारणा जब—जब टूटेगी, तभी—तभी तुम दुखी हो जाओगे।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-069



मृत्यु तो एक झूठ हैप्रवचन—69

सूत्र:


            सुसुखं वत! जीवाम वेरिनेसु अवेरिनो ।
            वेरिनेसु मनुस्‍सेसु विहराम अवेरिनो ।।173।।

            सुसुखं वत! जीवाम आतुरेसु अनातुरा ।
            आतुरेसु मनुस्‍सेसु विहराम अनातुरा ।।174।।

            सुसुखं वत! जीवाम उस्‍सेकेसु अनुस्‍सुका ।
            उस्‍सेकेसु मनुस्‍सेसु विहराम अनुस्‍ससुका ।।175।।

            सुसखं वत! जीवामयेसं नौ नत्‍थि किज्‍चिना ।
            पीति भक्‍खा भविस्‍साम देवा आभस्‍सरा यथा ।।176।।

            जयं वेरं पसवति दुक्‍खं सेति पराजितो ।
            उपसंतो सुखं सेति हित्‍वा जयपराजयं ।।177।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-068



परम दिशा तुम्हारे भीतर की औरप्रवचन—68 


पहला प्रश्न:


नकारात्मक मन से, आलोचक दृष्टि से और अहंकार से कैसे छुटकारा होगा? बुद्धि जलकर राख कब होगी? ये दुखदायी हैं, तो भीं उनसे लगाव क्यों बना है?

हली बात, नकारात्मक मन से छुटकारे की चेष्टा सफल नहीं हो सकती, क्योंकि विधायक मन को बचाने की चेष्टा साथ में जुड़ी है। और विधायक और नकारात्मक साथ—साथ ही हो सकते हैं। अलग—अलग नहीं। यह तो ऐसे ही है जैसे सिक्के का एक पहलू कोई बचाना चाहे और दूसरा पहलू फेंक देना चाहे। मन या तो पूरा जाता है, या पूरा बचता है, मन को बाट नहीं सकते। नकारात्मक और विधायक जुड़े हैं, संयुक्त हैं, साथ—साथ हैं। एक—दूसरे के विपरीत हैं, इससे यह मत सोचना कि एक—दूसरे से अलग—अलग हैं। एक—दूसरे के विपरीत होकर भी एक—दूसरे के परिपूरक हैं। जैसे रात और दिन जुड़े हैं, ऐसे ही नकारात्मक और विधायक मन जुड़े हैं।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-067



अंतस——केंद्र पर अमृत हैप्रवचन—67

सूत्र:


            दुल्‍लभो पुरिसाजन्‍नो न सो सबत्थ: जायति ।
            यत्थ सो धीरो तं कुलं सुखमेधति ।।169।।

            सुखो बुद्धाने उप्पादो सुखा सद्धम्मदेसना ।
            सुखा संघस्स सामग्री समग्गानं तपो सुखो ।।170।।

            पूजारहे पूजयतो बुद्धे यदि व सावको ।
            पपज्वसमूतिक्कंते तिण्‍णसोकपरिद्दवे ।।171।।

            ते तादिसे पूजयतो निब्‍बुते अकुतोभये ।
            न सक्का पुज्‍जं संखातुं इमेतंपि केतचि ।।172।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-066



शून्य है आवास पूर्ण का—प्रवचन—66


पहला प्रश्न:


कोई व्यक्ति आपके पास किस तरह आए, किस तरह बैठे, सांस की गति कैसी रखे, आंखें खुली रखे या बंद? कभी लगता है कि आपकी ओर से आने वाली अदृश्य तरंगों को ग्रहण करने में कोई बाधा आ जाती है और वे तरंगें बाहर ही रह जाती हैं। उन्हें ग्रहण करने के योग्य कोई स्वयं को कैसे बनाए? कृपापूर्वक इस संबंध में हमें उपदेश दें।

पूछा है समाधि ने। प्रश्न महत्वपूर्ण है। सभी के काम का है।
पहली बात, जो व्यक्ति कुछ लेने की भावना से आएगा वह चूक जाएगा। वहीं सबसे बड़ी कठिनाई है। लोभ बाधा बन जाता है। तो पहली तो आधारभूत बात यह है कि यहां मेरे पास कुछ लेने की भावना से मत आना। लेने की भावना का तनाव भीतर रहा तो वही तनाव तरंगों को प्रविष्ट नहीं होने देता। तब तुम सुनने में कम उत्सुक हो, लेने में ज्यादा उत्सुक हो। तब तुम यहां नहीं हो, तुम्हारा मन भविष्य में चला गया, परिणाम में, कि कितना इकट्ठा कर लूं, कितना पा लूं, कितनी इन तरंगों को समेट लूं, कितना इस प्रसाद को अपने हृदय में भर लूं, चूक जाओगे।

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-065



अमृत से परिचय : मौत के क्षण निस्तरंग चित्त पर—प्रवचन—65


 सूत्र:

      न कहापणवस्‍सेन तित्‍ति कामेसु विज्‍जति।
      अप्‍पस्‍सादा दुखाकामा इति विज्‍जाय पंडितो ।।162।।


      अपि दिब्‍बेसु कामेसु रतिं सो नाधिगच्‍छति।
      तण्‍हक्‍खयरतो होति सम्‍मासंबुद्धसावको ।।163।।

      वहुं वे सरणं यंति पब्‍बतानि वनानि च।
      आरामरूक्‍खचेत्‍यानि मनुस्‍सा भयतज्‍जिता ।।164।।

      नेतं खो सरणं खेमं नेतं सरणमुत्‍तमं।
      नेतं सरणमागम्‍म सब्‍बदुक्‍खा पमुच्‍चति ।।165।।

      यो च बुद्धज्‍च धम्‍मज्‍च संधज्‍च सरणं गत्‍तो।
      चत्‍तारि अरियसच्‍चानि सम्‍मप्‍पज्‍जाय पस्‍सति ।।166।।

      दुक्‍खं दुक्‍खसमुप्‍पादं दुक्‍खस्‍स च अतिक्‍कमं।
      अरियज्‍चट्ठंगिके मग्‍गं दुक्‍खूपसमगामिनं ।।167।।

      एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुतमं ।
      एतं सरणमागम्म सब्‍बदुक्खा पमुच्चति ।।168।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-064



अहंकार की हर जीत हार है—प्रवचन—64


पहला प्रश्न

बुद्ध ने संघं शरणं गच्छामि क्यों कहा? कृपाकर हमें इसका अभिप्राय समझाएं।

मर्पण अनिवार्य है। फिर चाहे मार्ग भक्ति का हो,चाहे ध्यान का। फर्क ही पड़ेगा कि भक्ति के मार्ग पर समर्पण पहले है, पहले चरण में, और ध्यान के मार्ग पर समर्पण है अंतिम चरण में।
भक्ति कहती है, अहंकार को छोड्कर ही मंदिर में प्रवेश करो। क्योंकि जिसे छोड़ना ही है, उसे इतने दूर भी क्यों साथ ढोना? छोड़ ही दो। भक्ति पहले ही क्षण में अहंकार को गिरा देती है। भक्ति को सुविधा है, क्योंकि भगवान की धारणा है। ध्यानी को वैसी सुविधा नहीं है। ध्यानी चलता है बिना किसी धारणा के। तो अहंकार बचा रहेगा। किसके चरणों में रखें अहंकार को? ध्यानी तो अनुभव के बाद ही, गहरे अनुभव में उतरकर ही, आखिरी घड़ी में, जब कुछ और शेष न रह जाएगा, सिर्फ सूक्ष्म अहंकार मात्र शेष रह जाएगा, वही पर्दा रहेगा। बहुत झीना पर्दा, इतना झीना, इतना पारदर्शी कि बहुतो को तो लगेगा कि यह पर्दा है ही नहीं।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-063



सारे अस्तित्व का चौराहा : मनुष्य—प्रवचन—63


सूत्र--

यस्‍स जित नावजीयति जितमस्‍स नौ याति कोचि लोके।
तं बुद्धमनंतगोचरं अपदं केन पदेन नेस्‍सथ ।।155।।


यस्‍स जालिनी विसत्‍तिका तन्‍हा नत्‍थि कुहिज्‍चि नेतवे।
तं बुद्धमनंतगोचरं अपद्रं केन पदेन नेस्‍सथ ।।156।।

ये ज्ञानपसुत्‍ता धीरा नेक्‍खम्‍मूपसमें रता।
देवापि तेसं पिह्मंति संबुद्धानं सतीमतं ।।157।।

किच्‍छोमनुस्‍सपटिलाभो किच्‍छ मच्‍चान जीवितं।
किच्‍छं सद्धम्‍मसवणं किच्‍छो बुद्धानं उप्‍पादो ।।158।।

सब्‍बापापस्‍स अकरणं कुसलस्‍स उपसंपदा।
सच्‍चित्‍तपदरियोदपनं एतं बुद्धान सासनं ।।159।।

खंती परमं तपो तितिक्‍खा निब्‍बानं परमं बदंति बुद्धा।
नहि पब्‍बजितो परूपधाती समणो होति परं विहेठयंतो ।।160।।

अनूपादो अनपधातो पातिमोक्‍खे च संवरो।
मत्‍तज्‍जुता च भत्‍तस्‍मिं पंतज्‍च सयनासनं।
अधिचित्‍ते च आयोगो एतं बुद्धान सासनं ।।161।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-062



ससार: सीढ़ी परमात्मा तक जाने की--प्रवचन—62



पहला प्रश्न :


आपने कल ऐसा आदेश क्यों दिया कि संबोधि—दिवस के नृत्य में केवल संन्यासी ही भाग लेंगे? औरों को भाग लेने से क्यों रोक दिया?

जो मुझमें भाग लेने को तैयार नहीं, उसमें मैं भी भाग लेने को तैयार नहीं। धीरे— धीरे हिम्मत करो। तुम अपने हृदय का द्वार मेरे लिए खोलोगे, तो ही मेरा हृदय का द्वारा तुम्हारे लिए खुल सकता है। नहीं कि तुम्हारे लिए बंद है, लेकिन खुल न सकेगा। मेरे हृदय के खुलने की कुंजी भी तुम्हारे हृदय के खुलने में छिपी है।
तो धीरे— धीरे तो मैं उनके लिए ही रहूंगा, जो डूबे हैं। डूबोगे तो ही मेरे साथ चल सकोगे। भीड़— भाड़ में मुझे रस नहीं है। मैं कोई राजनेता नहीं हूं कि भीड़— भाड़ में मेरी उत्सुकता हो। मेरी उत्सुकता उन थोड़े से लोगों में है जो सच में ही खोजने को तत्पर हैं। और कुछ दाव पर लगाने की भी हिम्मत रखते हैं।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-061



ध्यान आँख है—प्रवचन—61


सूत्र—


यो व पुब्‍बे पमज्जित्वा पच्छा सो नप्पमज्जति।
सो ' मं लोकं पभासेति अब्‍भा मुत्‍तो व चंदिमा।।150।।
यस्स पापं कतं कम्मं कुसलेन पिथीयती।
सो ' मै लोकं पभासेति अब्भा व चंदिमा?।।151।।
अधं भूतो अयं लोको विपस्सति।
सकुंतो जालमुत्‍तो' व अप्पो सग्गाय गच्छति?।।152।।
हंसादिच्चपथे यंति आकासे यंति इद्धिया।
नीयंति धीरा लोकम्हा जेत्वा मारं सवाहिनिं।।153।।
पथव्या एकरज्‍जेन सग्गस्स गमनेन वा।
सब्‍बलोकाधिपच्चेन सोतापत्तिफलं वरं।।154।।

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-61



                    एस धम्मो सनंतनो (भाग—7)
ओशो
  (ओशो द्वारा भगवान बुद्ध की सुललित वाणी धम्मपद पर दिए गए
                        दस अमृत प्रवचनों का संकलन)

तुम जिद्द करते हो कि हम अज्ञानी हैं। और बुद्धों का सारा प्रयास यही है समझाना कि तुम नहीं हो; तुम्हारी भ्रांति तोड़नी है। तुम मालिक हो, तुमने गुलाम समझा हुआ है। तुम विराट हो, तुमने छोटे के साथ अपना संबंध बना लिया। आंखें आकाश की तरफ उठाओ, सारा आकाश तुम्हारा है, तुम आंखें जमीन पर गड़ाए खड़े हो। इससे यह नहीं होता कि आकाश तुम्हारा नहीं रहा, सिर्फ तुम्हारी आंखें छोटे में उलझ गयी हैं। मगर आंखों  की क्षमता आकाश को भी समा लेने की है। कितने ही छोटे में उलझे रहो, जिस दिन आंख उठाओगे र उस दिन पूरा आकाश तुम्हारी आंखों में प्रतिबिंबित हो उठेगा।

ओशो
एस धम्‍मो सनंतनो