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सोमवार, 14 मई 2018

जीवन का खेल—(कविता)


जीवन का खेल—(कविता)
जीवन करता नित-नुतन खेल।
घूप-छांव का अदभुत मेल।।

स्वर्ण चमक सी ये मुस्कार।
सुरमयी कालीमा गाती गान।
जीवन की इस दीप शीखा से
नित-नित घटता जाता तेल...
घूप-घांव का अदभुत मेल...

रविवार, 13 मई 2018

मां (कविता)--मनसा मोहनी

मां (कविता)
मॉं, ये एक शब्‍द ही नहीं, न है ये कोई धर्म हे और न पुराण। ये तो केन्‍द्र है समपूर्ण श्रृष्टि का, गंगा के उद्गगम सा, और समेटे है अपने में सागर कि विशालता को, मां तू ही तो प्रकृति का सौन्दर्य, श्रृष्‍टि में फैला प्‍यार भी तु ही है, जीवन तेरा ही स्पंदन नहीं है क्‍या? चारों ओर फैला ये पूर्णता का विस्तार तेरा ही स्वरूप है तेरी पवित्रता हिमालय से भी ऊंची है, किसी स्‍वेत धवल श्वेतांबर सी तेरे आँचल की छांव, ही तो है समग्रता में फैला ये जीवन

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

10--जिन्दगी –(कविता)-स्वामी आनंद प्रसाद मनसा



10--जिन्दगी –(कविता)


ऐ जिन्‍दगी तुझे हम यूं ही गुजरने नहीं देंगे।
हम तुझे सज़ाऐगें और सवारगें
बनाएगें फिर एक नई दुलहन।
तेरे मासूम उदास चेरहे पर
फिर लोटा लायेंगे नई ताजगी
तेरे सूखे-पथराये होठों पर
लेकर आएँगे एक नई मुस्‍कान,
जीवन के इस वीरान पड़े चमन में
देखना लौटेगें एक दिन नई बहार
चाहें वो हमें लानी ही क्‍यों न पड़े उधार
उन बिखरे-कुचले फूलों से ही
चुन कर लायेगे कुछ कलियां
और तेरे विरान चमन को साज-संवार देंगे हम
तेरे ख़्वाबों में फिर से भर देंगे नये-नये रंग
वो उदास मायुष तेरे माथे का सिंदूर

09-पा लूं गा विस्‍तार आप सा ( कविता ) -स्वामी आनंद प्रसाद मनसा



09--पा लूं गा विस्‍तार आप सा ( कविता ) 


नभ तुन तो देखा होगा, अनन्‍त सृष्‍टियों  का संघ हार।
है धीर-दृष्‍टा तुझे कभी तो आता होगा इस  पर  प्‍यार।

तू कैसे इतना अडिग खड़ा,
थिरता का मंदिर सा बनकर।
मेरे दीपक की क्षणिक ज्‍योति,
कंप जाती है नित रह-रह कर।।
बुझने और मिटने से पहले,
अहसास चाहता विलीन लहर सा।
नहीं चाहता मैं रह जाऊं।
जब तक पूर्णता न पाऊँ।
क्‍या तू परितोषित कर देगा मुझको?
या तू भर देगा अपने से मुझको,
जो मिटा सकूँ मैं आपने अहं को
फैल सकूँ संपूर्ण जगत में
एक प्रीत प्‍यार की सरिता बन कर........
एक साध छलती, नहीं थमती।
सांस-सांस पर आकर कहती।
कैसे मैं तुझ सा हो जाऊँ
या तुझ में ही मैं खो जाऊँ।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

08--मिट्टी और खून –-(कविता)- स्वामी आनंद प्रसाद मनसा





08--मिट्टी और खून –-(एक टीस ) कविता



मिट्टी में मिली खून की बूंद,
      पुकार कर कहती है।
देखो उन भयाक्रांत आंखों को,
      कहना चाह कह कर भी,
वह कुछ भी नहीं कह पा रही है।

फिर वही खून पुकार कर कहता है।
तुम मुझे बांट न सकोगे,
मजहब कि इन दीवारों से।

सोमवार, 10 जुलाई 2017

07--होश के भर दो कदम जब --(कविता)-आनंद प्रसाद मनस


मैं चल बन कर मुसाफिर
बस होश के भ्रर दो कदम जब।
इस तिमिर अंधकार में भी,
बंद आंखों के सहारे,
किस डगर पर,
किस सफर पर,
दौड़ते सब चले जा रहे थे।
किस तरफ ये कौन जाने,
पर समझते थे बेचारे!
पहुंचने को है किनारे।
मैं सिमट कर दूर पथ के,
ताकता रह गया हूं पथ को,
कौन से पथ पर चलू अब,
कितने पथ और कितने पथिक है,

06--मैं अँधेरों को मिटाने आ गया (कविता) -आनंद प्रसाद मनसा



06--मैं अँधेरों को मिटाने आ गया (कविता)


मैं अँधेरों को मिटाने आ गया।
      गीत गा तुमको जगाने आ गया।।
थक गए अब है कदम चलते  नहीं।
बादल दुखों के अब यूहीं छटते नहीं।
फूल जीवन में कहीं खिलते  नहीं।
बीज बंजर  है पड़े   उगते  नहीं।
      शूल पथ के मैं हटाने आ गया।
      गीत गा तुमको जगाने आ गया....

हूं धरा पर पंख नभ के ले लिये।
कल्पनाओं में बहुत हम जी लिये।
कंठ अंगारों से भर-भर पी  लिये।
पैबंद दुखों के दामनों से सी लिये।
      देव धरा को मैं बनाने आ गया।
      गीत गा तुमको जगाने आ गया।

05--जीवन की नाव--(कविता) मनसा आनंद



05--जीवन की नाव (कविता)


कितनी छोटी नाव जीवन की, कितनी  लम्‍बी झील।
कितने सपनों को खोल रही, उलझी जीवन की रील।।

ज़र-ज़र  मिट्टी की  काया  है,   पीछे   रेगि‍स्‍तान।
कोने-कातर  से लटक रहे है,  फटे    पुराने   प्राणा।
क्‍या कर लू और क्‍या न कर लूं, दो दिन का मेहमान।
छिटक रहा नित-नित प्‍याला,  अब खाली इसको जान।
कितना चला जब पीछे देखा, कोस, फरलांग, या मील।।
कितने सपनों को खोल रही उलझी जीवन की रील...

रविवार, 9 जुलाई 2017

04--चाहे कोई साथ चलें न.....(कविता)



04--चाहे कोई साथ चलें न.....(कविता)


चाहें हमदम साथ चलें न,
      हम तो चले उन राहों पे।
जिन राहों पर राहे खुद ही,

      भर  लेती है बाँहों  में।

आनंद बरसे, धरती तरसे,
      फिर भी अंबर  शांत रहे।
पंख लगा कर भी क्‍या उड़ना,
      दूर क्षितिज जब जान रहे।
अपना होना था अपने मैं,
      कैसे  हम  अंजान  रहे।
सब बहता है, पल छलता है,
      थिर जिसको हम मान रहे।
अंबर घटिका बुला रही है, दूर गगन की छांव में।
जिन राहों पर राहें खुद ही भर लेती है बांहों में।।

रविवार, 28 मई 2017

3—जोगी तू क्‍यों आया मेरे द्वार—(कविता)-मनसा आनंद



3—जोगी तू क्‍यों आया मेरे द्वार—(कविता)


जोगी तू क्‍यों आया मेरे द्वार, तेरी आंखों में नहीं दिखता,
सपनों का अब वो संसार।

सपनों के इस इन्‍द्रधनुष से कितने रंग सजाए है।
तेरे इक रंग के आगे जोगी, सब बैरंग हो जाए है।
एक तरफ टूटे छंद मेरे, एक तरफ आशाएं है।
जिसके पीछे दौड़ा रहा था,  पाई वो छायाएं है।
छाया को तू माया कहता भेद बता जा अब कि बार।
जागी तू क्‍यों आया मेरे द्वार………

2—मधुशाला –(ओशो की) -मनसा आंनद



2—मधुशाला –(ओशो की)
प्रियतम  तेरे सपनों की, मधुशाला मैंने देखी है।
होश बढ़ता इक-इक प्‍याला, ऐसी हाला  देखी है।।
      मदिरालय जाने बालों नें,
      भ्रम न जाने क्‍यों पाला।
      हम तो पहुंच गए मंजिल पे,
      पीछे रह गई मधुशाला।।

शब्‍दों कि मधु, शब्‍दों की हाला,
शब्‍दों की ही बनी   मधुशाला।
आँख खोल  कर  देख सामने,
थिरक रही  जीवित की होला।।
      धर्म-ग्रंथ भी नहीं जले जब,
      कहां जली अंतर की ज्‍वाला।
      मन्‍दिर, मस्जिद, गिरिजो मे भी,
      कहां छलक़ती अब हाला।।

1--धूल का कण (कविता)-मनसा आनंद


1--धूल का कण (कविता)
धुल का कण सरक कर परों के तले,
उसका धीरता से यूं सिमटना, सुकड़ना और नाचना।
खिल-खिला कर करना उसका यूं अट्टहास,
क्‍यों नहीं आता उसको अहं से उठना।
क्‍या नहीं जानता वह अपनी ताकत को?
या भूल गया है अपने बल के प्रदर्शन को,
      पर शायद नहीं चाहता वो ये सब करना
      वो कैसा खिलखिलाता सा दिखता है
      हवा के नाजुक पंखों पर बैठ कर,
      बना देता  है  रेत के  ऊंचे-ऊंचे पहाड़।
      गर्म  तपती  हुई  धूप  में,
      रात की सीतलता का करता है इंतजार।।