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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-06



अंतर की खोज-(विविध)

ओशो
छठा-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी घटना से मैं अपनी चर्चा शुरू करना चाहूंगा।
एक राजा शिकार को निकला था। जंगल में रास्ता भटक गया, रात हो गई, अपने साथियों से बिछुड़ गया। दूर थोड़ा सा प्रकाश दिखाई पड़ा, उस ओर गया, पाया कि जंगल के बीच ही एक छोटी सी सराय थी। वह उसमें ठहरा। सुबह उसने उस सराय के मालिक को कहा, क्या कुछ अंडे मिल सकेंगे? अंडे उपलब्ध थे। उसने सुबह अंडे लिए, दूध लिया और पीछे पूछा कि क्या दाम हुआ? उस सराय के बूढ़े मालिक ने कहा, सौ रुपये। वह राजा हैरान हो गया। उसने बड़ी महंगी चीजें जीवन में खरीदी थीं लेकिन दो अंडों के दाम सौ रुपये होंगे इसकी उसे कल्पना भी नहीं थी। उसने उस सराय के मालिक को कहा, आर एग्स सो रेयर हियर? क्या अंडे इतनी मुश्किल से यहां मिलते हैं कि सौ रुपये उनके दाम हो जाएं? वह बूढ़ा मालिक हंसा और उसने कहा, एग्स आर नॉट रेयर सर, बट किंग्स आर। उसने कहा, अंडे तो मुश्किल से नहीं मिलते, लेकिन राजा बड़ी मुश्किल से मिलते हैं।
उस राजा ने सौ रुपये निकाले और दे दिए। उस बूढ़े सराय के मालिक की पत्नी बहुत हैरान हुई। राजा के जाते ही उसने पूछा कि हद हो गई, तुम सौ रुपये निकाल सके उस राजा के खीसे से दो अंडों के लिए? कौनसी तरकीब उपयोग में लाई? कौनसा रहस्य है इसका?
वह बूढ़ा आदमी बोला, मैं आदमी की कमजोरी जानता हूं।
उसकी औरत ने पूछा, यह आदमी की कमजोरी क्या है? क्या है यह आदमी की कमजोरी?
वह बूढ़ा बोला, तुझे मैं एक और घटना सुनाता हूं, उससे शायद तुझे आदमी की कमजोरी समझ में आ जाए।
मैं जवान था और मैं एक बहुत बड़े सम्राट के दरबार में गया। मैंने एक पांच रुपये में सस्ती सी पगड़ी खरीदी थी। लेकिन उसे बहुत अच्छे ढंग से रंगवाया था, बड़े चमकदार उसके रंग थे। मैं वह पगड़ी बांध कर दरबार में पहुंचा। अजनबी था उस देश में। राजा ने दरबार में मेरी पगड़ी देखते ही पूछा, इस पगड़ी के क्या दाम हैं? मैंने कहा, एक हजार स्वर्णमुद्राएं। वह राजा हंसा और बोला क्या कहते हो, एक हजार स्वर्णमुद्राएं? और तभी उसके वजीर ने राजा के कान में कहा, महाराज, सावधान रहें, यह आदमी बड़ा चालाक मालूम पड़ता है। दो-चार रुपये की पगड़ी है और हजार स्वर्णमुद्राएं दाम बता रहा है। लुटेरा मालूम होता है।
उस बूढ़े आदमी ने कहा, मैं समझ गया कि वजीर क्या कह रहा है। क्योंकि वजीर राजा को लूटता रहा होगा। वह दूसरे लुटेरे को पसंद नहीं करेगा। लेकिन, मैंने तभी कहा कि मैं जाता हूं फिर। राजा ने पूछा, कैसे आए और कैसे चले? तो मैंने कहा, मैंने जिस आदमी से यह पगड़ी खरीदी थी, मैं भी डरा था और मैंने कहा, एक हजार स्वर्णमुद्राएं? तो वह आदमी मुझसे बोला था, इस जमीन पर एक ऐसा सम्राट भी है जो इसके पांच हजार स्वर्णमुद्राएं भी दे सकता है। तो मैं जाऊं? यह वह दरबार नहीं है, यह वह सम्राट नहीं है जिसको मैं खोज रहा हूं। मुझे कोई और दरबार में जाना पड़ेगा, कोई और सम्राट खोजना पड़ेगा। तो मैं जाऊं? उस सम्राट ने कहा, दस हजार स्वर्णमुद्राएं इसे दे दी जाएं और पगड़ी खरीद ली जाए।
दस हजार स्वर्णमुद्राओं में मेरी पगड़ी बिक गई। वजीर बहुत हैरान हुआ। और जब मैं दरबार से रुपये लेकर बाहर निकल रहा था, तो वजीर ने मुझसे पूछा कि मेरे मित्र, थोड़ा मुझे समझाओ तो कि राज क्या है इस बात का? यह पगड़ी पांच रुपये से ज्यादा की नहीं है। तो मैंने उस वजीर के कान में कहा, मेरे मित्र, तुम्हें पगड़ियों के दाम मालूम होंगे मुझे आदमियों की कमजोरियां मालूम हैं।
यह आदमी की कमजोरी क्या है? इस पर ही आज सुबह मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं। और आदमी की जो कमजोरी है वही परमात्मा के मार्ग पर रुकावट है। और आदमी की जो कमजोरी है वही उसके जीवन में प्रकाश आने में बाधा है। और आदमी की जो कमजोरी है वही दीवाल है जो द्वार को नहीं खुलने देती और जीवन दुख और पीड़ा से भर जाता है, अंधकार से भर जाता है।
क्या है आदमी की कमजोरी? यह क्या है ह्यूमन वीकनेस?
अहंकार आदमी की कमजोरी है। दंभ, ईगो आदमी की कमजोरी है। मैं कुछ हूं, यह आदमी की कमजोरी है। और जब तक कोई इस कमजोरी से घिरा है, तब तक वह किन्हीं मंदिरों की तलाश करे और किन्हीं शास्त्रों को पढ़े और कैसी ही पूजाएं करे और कैसे ही त्याग और उपवास करे, संन्यासी हो जाए और जंगलों में चला जाए, कोई फर्क न पड़ेगा, बल्कि यह कमजोरी इतनी अदभुत है कि वे सब चीजें भी इसी कमजोरी को और मजबूत करने में कारण बन जाएंगी।
एक आदमी के पास लाखों रुपये हों, वह उनका त्याग कर दे, तो हम कहेंगे, यह परमात्मा के रास्ते पर चला गया। लेकिन इतनी आसान बात नहीं है परमात्मा के रास्ते पर जाना। रुपयों से परमात्मा को खरीदना आसान नहीं है कि कोई रुपये छोड़ दे और परमात्मा को खरीद ले। बल्कि यह भी हो सकता है और यही होता है कि वह आदमी रुपये छोड़ कर भी उसी कमजोरी से भरा रह जाएगा जो कमजोरी रुपयों के होते हुए थी।
एक संन्यासी ने मुझसे कहा, मैंने लाखों रुपयों पर लात मार दी। एक बार कहा, दो बार कहा, तीन बार कहा। मेहमान था मैं उनके आश्रम में। फिर चलते वक्त मैंने उनसे पूछा, यह लात आपने कब मारी थी? उन्होंने कहा, कोई तीस वर्ष हुए। मैंने उनसे कहा, अगर बुरा न माने तो मैं निवेदन कर दूं, लात ठीक से लग नहीं पाई, अन्यथा तीस वर्षों के बाद भी उसकी याद कैसे हो सकती थी?
लाखों रुपये आपके पास रहे होंगे तब यह अहंकार रहा होगा कि मेरे पास लाखों रुपये हैं, मैं कुछ हूं, उस समबडी होने का खयाल रहा होगा। फिर लाखों रुपये छोड़ दिए, तब से यह खयाल है कि मैंने लाखों रुपये छोड़े हैं, मैं कुछ हूं। मैंने लाखों रुपये छोड़े हैं! वह जो अहंकार लाखों रुपये के होने से भरता था वह अहंकार अब लाखों रुपये के छोड़ने से भी भर रहा है। कमजोरी वहीं की वहीं है। बात वहीं अटकी है उसमें कोई फर्क नहीं आया।
धन वाले का अहंकार होता है, धन छोड़ने वाले का अहंकार होता है। अच्छे वस्त्र पहनने वाले का अहंकार होता है, सादे वस्त्र पहनने वाले का अहंकार होता है। बड़े मकान बनाने वाले का अहंकार होता है, झोपड़ियों में रहने वाले का अहंकार होता है। अहंकार के बड़े सूक्ष्म रास्ते हैं। वह न मालूम किन-किन रूपों से अपनी तृप्ति कर लेता है। न मालूम किन-किन रूपों से यह खयाल पैदा हो जाता है मैं कुछ हूं।
एक आदमी सारे वस्त्र छोड़ कर नग्न खड़ा हो जाए उसका अहंकार होता है कि मैं कुछ हूं। तुम, तुम जो कपड़े पहने हुए हो तुम क्या हो, ना-कुछ, मैं हूं कुछ, जिसने सब वस्त्र भी छोड़ दिए और नग्न हो गया हूं।
इसीलिए तो संन्यासियों के अहंकार को छूना गृहस्थियों के हाथ की बात नहीं। त्याग करने वाले का अहंकार इसलिए बड़ा हो जाता है कि भोग तो छीना जा सकता है त्याग छीना भी नहीं जा सकता। मेरे पास कपड़े हैं और उनका अहंकार है, तो कपड़े तो छीने भी जा सकते हैं लेकिन अगर मैं नंगा खड़ा हो गया, तो मेरी नग्नता कैसे छीनी जा सकती है। वह संपत्ति ऐसी है जिसे मुझसे कोई नहीं छीन सकता। अगर मेरे पास करोड़ों रुपये हैं तो कल नष्ट भी हो सकते हैं, खो भी सकते हैं, चोरी भी जा सकते हैं, मेरा अहंकार टूट भी सकता है, लेकिन अगर मैंने लाखों रुपये छोड़ दिए, तो मैंने छोड़ दिए हैं लाखों रुपये, इससे छूटने का अब कोई उपाय नहीं है, इससे मुक्त होने का कोई उपाय नहीं है।
यह अहंकार, यह मैं कुछ हूं, सबसे बड़ी भ्रांति है जो मनुष्य को पकड़ लेती है। कोई कारण नहीं है इस भ्रांति के पकड़ लेने का। कोई बुनियाद नहीं है। यह अहंकार का भवन बिलकुल बेबुनियाद है, इसका कोई आधार नहीं है, इसकी कोई नींव नहीं है, यह मकान बिलकुल ताश के पत्तों का है। लेकिन जैसे ताश के पत्तों का महल बनाने में एक सुख मालूम होता है, वैसे ही इस अहंकार को खड़े होने में भी एक सुख मालूम होता है।
क्यों मनुष्य अपने अहंकार को खड़ा करना चाहता है? कौन से कारण हैं उसके अहंकार को खड़ा करने के? पहला कारण तो यह है कि कोई भी मनुष्य यह नहीं जानता कि वह कौन है? यह बात इतनी घबड़ाने वाली है, यह अज्ञान इतना पीड़ा देने वाला है, इतनी एंज़ायटी पैदा करने वाला है कि मुझे पता भी नहीं कि मैं कौन हूं? इस अज्ञान को ढांकने के लिए मैं कोई उपाय कर लेता हूं, कहने लगता हूं, मैं यह हूं, मैं वह हूं, मैं धनपति हूं, मैं त्यागी हूं, मैं ज्ञानी हूं, मैं यह हूं, मैं वह हूं।
जरूरी है, यह इतनी घबड़ाने वाली बात है कि मैं अपने को नहीं जानता। यह इतनी ज्यादा ह्यूमिलिएटिंग है, यह इतनी ज्यादा अपमानजनक है कि मैं अपने को नहीं जानता। तो मैं किसी भांति अपना एक रूप खड़ा कर लेता हूं, कहने लगता हूं, मैं यह हूं, कौन कहता है कि मैं अपने को नहीं जानता?
इस भांति एक सेल्फ डिसेप्शन, एक आत्मवंचना देकर हम अपनी तृप्ति खोज लेते हैं कि मैं कुछ हूं। लेकिन क्या इस भांति हम अपने को जान पाते हैं? क्या आप जानते हैं कि आप कौन हैं? क्या आपको पता है कि क्या है वह जो आपके भीतर जीवंत है? वह जो लीविंग कांशसनेस है, वह जो चेतना है आपके भीतर, जो जीवन है वह क्या है? कुछ पता है उसका? झूठी बातें न दोहरा लें अपने मन में कि मैं आत्मा हूं। किताब में पढ़ लिया होगा इससे कुछ पता नहीं होता है। यह मत कह लें अपने मन में कि मैं ईश्वर का अंश हूं। पढ़ लिया होगा कहीं इससे काई फर्क नहीं पड़ता है।
सचाई यह है कि पता नहीं भीतर क्या है? तथ्य यह है कि नहीं मालूम कौन भीतर बैठा है? और उस व्यक्ति को जिसे यह भी पता न हो कि मैं कौन हूं, क्या उसके जीवन में सत्य का कोई अवतरण हो सकता है? जिसे यह भी पता न हो कि मैं कौन हूं वह भी अगर ईश्वर की खोज में निकल पड़े तो पागल है।
एक संन्यासी पश्चिम की यात्रा करके भारत वापस लौटा था। वह एक राजा के महल में मेहमान हुआ। वह राजा बूढ़ा हो गया था और वर्षों से लोगों से पूछता था, जो भी संन्यासी, ज्ञानी उसके गांव में आ जाते थे उनसे पूछता था, क्या मुझे ईश्वर से मिला दे सकते हो? वे ज्ञानी और त्यागी और संन्यासी--गीता की, उपनिषदों की और सारे ज्ञान की बातें करते थे, लेकिन वह राजा रोक देता था कि नहीं, बातचीत मत करो, मैं तो मिलना चाहता हूं ईश्वर से, मिला सकते हो तो बोलो? हां कहो या न कहो। निश्चित ही कौन हां कहता उससे? राजा जीत जाता था और वे संन्यासी हार जाते थे और चुप रह जाते थे।
यह संन्यासी भी, नया संन्यासी भी उसके घर मेहमान हुआ। वह सुबह ही उसके पास पहुंचा और उसने कहा, एक मेरा प्रश्न है और एक ही मेरा प्रश्न है दूसरा मेरा प्रश्न नहीं है। और यह आपको जता दूं कि यह प्रश्न मैं सैकड़ों लोगों से पूछ चूका हूं और आज तक कोई उत्तर नहीं दे सका, और यह भी मैं आपको बता दूं कि मैं बातचीत नहीं चाहता हूं, मैं ठोस, ठोस उत्तर चाहता हूं।
संन्यासी ने कहा, पहले प्रश्न पूछें।
उस राजा ने कहा, मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं, मिला सकते हैं? सीधा उत्तर दें, बातचीत और सिद्धांत नहीं चाहिए। सोचा था जैसे और संन्यासी निरुत्तर रह गए थे, वह भी रह जाएगा। लेकिन वह बड़ा अजीब संन्यासी रहा होगा।
उसने कहा, मेरे मित्र, अभी मिलना चाहते हैं या थोड़ी देर ठहर सकते हैं?
राजा थोड़ा चिंतित हुआ। उसकी यह आशा न थी, अपेक्षा न थी। सोचा कि शायद कोई भूल हो गई है। शायद वह कोई ईश्वर नाम वाले आदमी की बात समझ गया है।
तो राजा ने कहा, माफ करें, सोचता हूं कोई भूल हो गई है, मैं परमात्मा की बात कर रहा हूं, परमात्मा से मिलने की बात कर रहा हूं, मुझसे मिला सकते हैं?
उस संन्यासी ने कहा, आप अब बातचीत न करें। ठोस उतर आएं मैदान में। अभी मिलना चाहते हैं या थोड़ी देर रुक सकते हैं? बातचीत मुझे भी पसंद नहीं है। अब बकवास मैं नहीं सुनूंगा।
राजा थोड़ा हैरान हुआ। इतनी तैयारी उसकी भी न थी। अगर आपको भी मैं पकड़ लूं गर्दन से और कहूं, अभी मिलना है ईश्वर से? तो आप कहेंगे, मैं थोड़ा घर पूछ आऊं, अपने गार्जियन की सलाह ले आऊं, अपनी पत्नी से या अपने पति से पूछ आऊं या थोड़े अपने बच्चों से पूछ लूं, या इतनी जल्दी क्या है? फिर थोड़े दिन बाद भी हो सकता है मिलना। वह राजा थोड़ा मुश्किल में पड़ गया। जिस मुश्किल में वह दूसरे लोगों को डालता रहा था वह मुश्किल आज उसके ऊपर ही गिर गई थी। आज मस्जिद मुल्ला के ऊपर गिर गई थी।
वह बोला कि क्या मतलब है आपका? संन्यासी ने कहा, मतलब साफ है। बातचीत क्यों कर रहे हैं? आपका क्या मतलब था, ईश्वर से मिलना है न? राजा ने कहा, हां, मिलना तो है।
थोड़ा डरा हुआ था। ईश्वर से मिलने में कोई भी डर जाएगा। क्योंकि ईश्वर के सामने खुद को खड़े करने की सामर्थ्य तभी हो सकती है जब आप खुद अपने सामने खड़े हो गए हों। नहीं तो बड़ा भय मालूम होगा कि मेरे जैसा आदमी ईश्वर के सामने खड़ा होगा तो क्या स्थिति बनेगी? कैसा दीन-हीन हूं? इस शक्ल को लेकर, इस आदमी को लेकर ईश्वर के सामने कैसे जाऊं? उसकी किरणें तो छेद देंगी और पार कर देंगी। और मेरे भीतर जो सारी कुरूपता है, जो अग्लीनेस है वह उभर कर बाहर आ जाएगी। तो क्या मैं इस योग्य हूं कि उसके सामने खड़ा हो जाऊं? आंखें मजबूत चाहिए सूरज की तरफ देखने के लिए, नहीं तो आंखें झप जाएंगी। और प्राण भी मजबूत चाहिए परमात्मा के समक्ष खड़े होने को, नहीं तो अंधापन पैदा हो जाएगा।
वह घबड़ा आया था, लेकिन खुद ही प्रश्न पूछा था इसलिए मजबूरी थी। उसने कहा कि हां, अब आप कहते हैं तो अभी ही मिला दें। ऐसे वह बहुत सुस्त हो गया था और घबड़ा गया था। और डरा हुआ था कि अब क्या होने वाला है? यह आदमी बहुत गड़बड़ मालूम होता है।
उस संन्यासी ने कहा, इतने भयभीत न हों, क्योंकि ईश्वर मिलने को राजी भी हो जाए तो शायद आप खुद अभी राजी नहीं हैं। एक छोटा सा कागज ले लें और उस पर लिख दें कि आप कौन हैं, ताकि मैं पहुंचा दूं ईश्वर के पास।
राजा ने कहा, यह तो ठीक है, मुझसे भी कोई मिलने आता है तो मैं पूछ लेता हूं नाम, ठिकाना, पता, कौन हो? क्या हो? हर किसी से तो मैं भी नहीं मिलता हूं। राजा ने लिखा उस कागज पर अपना नाम, लिखा कि मैं फलां राज्य का मालिक हूं, फलां महल में रहता हूं, यह, वह, सब बातें लिखीं। बड़ी उपाधियां थीं उसकी, बड़ी पदवियां थीं, वे सब लिखीं, और वह कागज संन्यासी के हाथ में दिया।
वह संन्यासी हंसने लगा। और उसने कहा, बड़े झूठे हैं आप। अपना पता लिखें, यह सब क्या लिखा हुआ है?
राजा ने कहा, शक मुझे पहले ही हो गया था कि मैं किसी पागल से मिल रहा हूं। जब तुमने कहा कि अभी मिलना चाहते हो या थोड़ी देर ठहर सकते हो तभी संदेह उठा था। अब संदेह मजबूत हो गया। यह मेरा पता है, यह मैं हूं। मैं हूं राजा इस नगर का, यह तुम्हें पता नहीं? मेरे महल में ठहरे हो और कहते हो मैं झूठ बोल रहा हूं? सारे नगर की गवाही खड़ी कर सकता हूं कि मैं राजा हूं।
संन्यासी ने कहा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ सकता। हो सकता है तुम्हारा पूरा नगर झूठ बोलने वालों का नगर हो। और हो सकता है तुम सबसे बड़े झूठ बोलने वाले हो इसलिए छोटे झूठ बोलने वाले तुम्हारे पक्ष में खड़े हो जाएं। इससे फर्क नहीं पड़ता। यह सवाल नहीं है, किसी की गवाही और विटनेस लाने की जरूरत नहीं है। मैं तुमसे यह पूछता हूं, तुम आज राजा हो, कल अगर राजा न रह जाओ, कल अगर भिखारी हो जाओ, तो तुम्हारे भीतर कुछ बदल जाएगा या तुम तुम ही रहोगे?
उस राजा ने कहा, इससे क्या फर्क पड़ता है, मेरा राज्य चला जाए और मैं भिखारी भी हो जाऊं, तो भी मैं तो मैं ही रहूंगा। राज्य न रहेगा, संपत्ति न रहेगी, लेकिन मैं, मैं तो मैं ही रहूंगा।
तो संन्यासी ने कहा, एक बात तय हो गई कि राजा होना तुम्हारा अनिवार्य परिचय नहीं, एसेंशियल परिचय नहीं है। राजा तुम न रह जाओ तो भी तुम रहते हो और बदलते नहीं, तो फिर तुम कुछ और हो राजा होने से। राजा होने में ही तुम समाप्त नहीं हो जाते।
संन्यासी ने पूछा, यह तुम्हारा जो नाम है अगर दूसरा नाम रख दिया जाए तुम्हारा तो तुम बदल जाओगे?
राजा ने कहा, नाम के बदलने से क्या होता है, नाम कोई भी हो मैं तो मैं ही रहूंगा।
उस संन्यासी ने कहा, तब यह भी तय हो गया कि नाम भी तुम्हारी सत्ता का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, एसेंशियल पार्ट नहीं है, नॉन-एसेंशियल है। सारभूत नहीं, आवश्यक नहीं, नाम कुछ और भी हो सकता है। अ से ब हो सकता है, ब से स हो सकता है। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, तुम तुम रहते हो। इसलिए नाम भी तुम्हारा परिचय न रहा। फिर तुम्हारा परिचय क्या है? अब मैं दुबारा पूछ लूं।
उस राजा ने कहा, तब तो मैं मुश्किल में पड़ गया। जरूर इन चीजों से अलग मैं हूं, लेकिन फिर मैं क्या हूं, मुझे कुछ भी पता नहीं।
उस संन्यासी ने कहा, तो जाओ लौट जाओ। जिस दिन यह जान सको कि तुम कौन हो उस दिन आ जाना। उस दिन मैं खबर कर दूंगा। अभी मैं क्या कहूं कि कौन मिलने को आया है? आखिर परमात्मा से मैं क्या कहूं कि कौन मिलने को आया है? किसकी खबर करूं? तो जिस दिन तुम्हें पता चल जाए कि तुम कौन हो लौट आना और मैं तुम्हें परमात्मा से मिला दूंगा।
संन्यासी की बात तो यहीं खत्म हो गई थी। लेकिन अगर वह राजा मुझे मिल जाए तो उससे मैं यह कह दूं कि जिस दिन तुम जान लोगे कि तुम कौन हो उस दिन तुम्हें किसी के पास जाने की जरूरत नहीं रह जाएगी। क्योंकि वह जो तुम्हारे भीतर बैठा है वही परमात्मा है। जिस दिन उसे जान लोगे उस दिन और कोई परमात्मा की खोज की जरूरत नहीं है। और जिस दिन अपने भीतर जो है वह दिखाई पड़ जाएगा उसी दिन वह भी दिखाई पड़ जाएगा जो सबके भीतर है।
समुद्र की एक बूंद को हम जान लें तो पूरा समुद्र जान लिया जाता है। सूरज की एक किरण को हम पहचान लें तो प्रकाश के अनंत-अनंत स्रोत भी पहचान लिए गए। और अपने भीतर चेतना का एक दीया भी समझ में आ जाए तो वह सबके भीतर जो व्याप्त है--मनुष्यों में, पक्षियों में, पौधों में, पत्थरों में, सब तरफ जो जीवन व्याप्त है वह जीवन भी पहचान लिया गया। उसका एक अणु पहचान लिया गया वह सारा जीवन पहचान लिया गया। इसलिए जो खुद को जान ले उसे खुदा को जानने के लिए कुछ भी बाकी नहीं रह जाता है।
वह राजा और उसकी बात मैंने आपसे कही। क्या वही बात आपकी भी अपनी नहीं है? और क्या अच्छा न होगा कि उस राजा को छोड़ दूं और आपको पकड़ लूं? और चर्चा राजा की हट जाए और आपकी आ जाए? क्या आप भी अपने को जानते हैं? नाम जानते होंगे, घर जानते होंगे, पिता का नाम जानते होंगे, पदवियां, उपाधियां जानते होंगे, डिग्रियां जानते होंगे, यह हूं, वह हूं जानते होंगे। यह सारा परिचय वस्त्रों से ज्यादा गहरा नहीं है, कपड़ों से ज्यादा गहरा नहीं है। कपड़ों के भीतर कौन छिपा है? नहीं, कपड़ों से ज्यादा हमारी कोई पहचान नहीं है।
एक महाकवि को एक सम्राट ने आमंत्रित किया था भोजन के लिए। गरीब था वह कवि, बहुत फटे-पुराने उसके वस्त्र थे। उसके मित्रों ने कहा, इन वस्त्रों में मत जाओ, वहां कोई न पहचानेगा, क्योंकि दुनिया में वस्त्रों के सिवाय और कोई पहचान नहीं। लेकिन वह कवि न माना, उन्हीं फटे-पुराने वस्त्रों में राजा के महल चला गया। द्वारपाल ने धक्के देकर बाहर निकाल दिया। उसने बहुत कहा कि मैं राजा का मित्र हूं और आमंत्रित हूं। द्वारपाल ने कहा, भाग जाओ, नहीं तो पागलखाने का रास्ता दिखाना पड़ेगा। तुम और राजा के मित्र! थोड़ी शर्म भी नहीं आती। जरा अपनी शक्ल किसी दर्पण में देखो जाकर। मजबूरी, उसे वापस लौट आना पड़ा।
मित्रों ने कहा, तुम गलती में हो। वस्त्र पहचाने जाते हैं। वस्त्रों के सिवाय आदमी की कोई पहचान नहीं। तो हम तुम्हारे लिए वस्त्र ले आते हैं। वे वस्त्र ले आए कहीं से मांग कर। सुंदर, बहुमूल्य, उस कवि ने उन्हें पहना और वह वापस पहुंचा। वही द्वारपाल जिसने धक्के दिए थे, पैरों तक झुक कर उसने प्रणाम किया और कहा, आएं, भीतर आएं। भागा हुआ राजा को खबर दी। राजा गले मिला। भोजन पर बिठाया। तो उस कवि ने भोजन का पहला कौर लिया और अपने वस्त्रों को खिलाने लगा, अपनी पगड़ी को, अपने कोट को, और कहने लगा, पगड़ी खाओ, कोट खाओ। राजा ने कहा, बड़ी अजीब आदतें हैं आपके भोजन की। ऐसी आदतें तो कभी देखी नहीं। उस कवि ने कहा, मैं तो पहले भी आया था इस द्वार पर लेकिन वापस लौटा दिया गया। अब जो आए हैं वे वस्त्र हैं। जिनके कारण मैं भीतर आया हूं उनको भूल जाऊं और भोजन न कराऊं तो बड़ी अकृतज्ञता होगी। ये वस्त्र ही आए हैं मैं तो पहले भी आया था लौटा दिया गया। इसलिए अब मेरे आने न आने का कोई मतलब नहीं है। इन वस्त्रों को खिलाना जरूरी है। वस्त्र नाराज हो जाएं तो बड़ी कठिनाई हो जाएगी।
हमारी सारी पहचान वस्त्रों की है, अपने संबंध में भी, दूसरों के संबंध में भी। और इन वस्त्रों की पहचान का जो केंद्र है वही अहंकार है, वही ईगो है। हमारा पद, हमारा घर, हमारा नाम, हमारा वंश, हमारा परिवार, हमारा देश, हमारा धर्म, इन सबके वस्त्रों के बीच का जो केंद्र है, मैं, इन सबसे जो भरता है और परिपूरित होता है, मैं। मैं कुछ होता चला जाता हूं। छोटी कुर्सी से बड़ी कुर्सी पर बैठता हूं, तो मैं और बड़ा हो आता हूं। थोड़े धन से बड़ा धन मेरे पास होता है, तो मैं और बड़ा हो आता हूं। छोटे नेता से मैं बड़ा नेता होता हूं, तो मैं और बड़ा हो आता हूं। थोड़े अनुयायियों की जगह ज्यादा अनुयायी मुझे मिल जाते हैं, ज्यादा शिष्य मिल जाते हैं, तो मैं और बड़ा हो आता हूं। बड़ा गुरु हो आता हूं।
ऐसे मैं बढ़ता चला जाता है और इकट्ठा होता चला जाता है। और यह मैं, इतना बड़ा भ्रम, इतना बड़ा इल्युजन, यही भ्रम रोक लेता है सत्य को जानने से और परमात्मा को जानने से। यही मैं का खयाल रोक देता है उसको जानने से जो मैं हूं, जो कि सच में मैं हूं, जो कि असलियत में मैं हूं। तो इस मैं के साथ क्या करें? कैसे इस मैं को हटा दें? कैसे यह मैं मिट जाए? कैसे यह मैं न हो जाए? तो शायद द्वार खुल जाएं, दीवाल टूट जाए, रोशनी प्रकट हो जाए प्रकाश में मैं खड़ा हो जाऊं।
यह मैं की दीवाल है जो मुझे चारों तरफ से घेरे हुए है और बांधे हुए है। इसके भीतर मैं बंद हूं। और जब तक इसके भीतर बंद हूं परमात्मा से तो मिलना दूर अपने पड़ोसी से भी नहीं मिल सकता। पड़ोसी से मिलना तो दूर पति अपनी पत्नी से नहीं मिल सकता, पिता अपने पुत्र से नहीं मिल सकता, मित्र अपने मित्र से नहीं मिल सकता। जहां अहंकार है वहां दूसरे से अलगाव हो गया, दूसरे से भेद हो गया, पृथकता हो गई, दीवाल खड़ी हो गई।
जहां मैं है वहां प्रेम नहीं। क्योंकि प्रेम वहीं हो सकता है जहां मैं न हो। और जहां मैं है वहां कोई प्रार्थना नहीं। क्योंकि प्रार्थना भी वहीं हो सकती है जहां मैं न हो। मैं का न हो जाना ही प्रेम है। और मैं का न हो जाना ही प्रार्थना है। और मैं का न हो जाना ही परमात्मा का अनुभव है। लेकिन यह मैं न कैसे हो जाए?
पहले दिन की चर्चा में मैंने आपसे कहा, विश्वास छोड़ दें और विचार को जन्माएं। संध्या की चर्चा में मैंने कहा, भय छोड़ दें और अभय को पैदा करें। और अब तीसरी और अंतिम चर्चा में आपसे मैं कहता हूं, मैं को छोड़ दें, तब जो शेष रह जाएगा वही वास्तविक होना है, वही सत्य है, वही ईश्वर है, उसे कोई और नाम दे दें, उससे कोई भेद नहीं पड़ता।
यह कैसे मैं न हो जाए? क्या करें? बड़ी कठिनाई यही है कि आप जो भी करेंगे उससे मैं नहीं मिटेगा। क्योंकि करने वाला मैं ही हूं। तो मैं जो भी करूंगा उससे मैं नहीं मिटेगा। मैं जो भी करूंगा उससे मैं भरेगा, मजबूत होगा। इसलिए विनम्र आदमी जो कहता है कि मैं ना-कुछ हूं, मैं तो कुछ भी नहीं आपके पैर की धूल हूं, उसकी आंखों में झांक कर देखें, वह कह रहा है कि मैं कुछ हूं।
विनम्र आदमी की अपनी अहमता है, अपनी ईगो है, अपना अहंकार है। अगर उससे आप कह दें कि तुमसे भी बड़ा एक विनम्र आदमी है हमारे गांव में। तो आपको पता चल जाएगा। वह कहेगा, ऐसा नहीं हो सकता कि मुझसे भी बड़ा और कोई विनम्र हो। मैं ही सबसे ज्यादा विनम्र हूं, और मैं खड़ा हो जाएगा। एक महात्मा से कह दें, तुमसे बड़ा महात्मा भी मौजूद है, और कठिनाई शुरू हो जाएगी।
गांधी इंग्लैंड गए। गांधी के एक मित्र ने जाकर बर्नार्ड शॉ को कहा कि आप गांधी को महात्मा मानते हैं या नहीं? जैसी बर्नार्ड शॉ की हमेशा की आदत थी, उसने कहा, मानता हूं, जरूर मानता हूं, लेकिन नंबर दो, नंबर एक मैं हूं। दो महात्मा हैं दुनिया में, एक यह मोहनदास करमचंद गांधी और एक बर्नार्ड शॉ, लेकिन बर्नार्ड शॉ नंबर एक और मोहनदास करमचंद गांधी नंबर दो। नंबर दो है तुम्हारा महात्मा, थोड़ा छोटा है, ऐसे दो ही महात्मा हैं, लेकिन मैं नंबर एक हूं।
जिन्होंने कहा था वे बहुत हैरान हो गए। उन्होंने जाकर गांधी को वापस कहा कि बर्नार्ड शॉ तो बड़ा अहंकारी मालूम होता है, अपने ही मुंह से कहता है कि मैं नंबर एक महात्मा हूं। गांधी ने कहा, वह आदमी बड़ा सच्चा है। मन में तो सभी के यह होता है कि मैं नंबर एक हूं, लेकिन लोग छिपाए बैठे रहते हैं। वह सीधा और साफ है। जो सीधी बात थी उसने कह दी।
हर आदमी के मन में यह होता है कि मैं नंबर एक हूं। छिपाए बैठा रहता है। उसे किसी से कहता नहीं। असल में एक बड़ा मजाक है--जैसे अरब में एक मजाक है कि भगवान जब लोगों को बना कर दुनिया में भेजता है तो एक बड़ा मजाक कर देता है हर आदमी के साथ। जब उसे बना कर दुनिया में धक्के देने लगता है तो उसके कान में कह देता है, मेरे मित्र, तुमसे अच्छा आदमी मैंने कभी नहीं बनाया। और वह हरेक से कह देता है, यही मुश्किल है। और हरेक आदमी को यही खयाल पैदा हो जाता है।
यह जो हमारे भीतर मैं है, यह जो खयाल है कि मैं ही हूं कुछ। यह खयाल, अगर हम इसको मिटाना चाहें, तोड़ना चाहें, तो भी टूटेगा नहीं। तब यह खयाल पैदा हो जाएगा कि मैं विनम्र हूं। मैं अहंकारी नहीं हूं। लेकिन मैं मौजूद रहेगा। दो रास्ते हैं आदमी के सामने, या तो इसको भरे, दौड़े, राज्य जीते, धन जीते, यश जीते और इस मैं को भरे। तो भी यह कभी भर नहीं पाता। यह थोड़ा समझ लेने जैसा है। यह कभी भर नहीं पाता। सिकंदर सारी दुनिया जीत ले तो भी नहीं भर पाता।
सिकंदर जिस दिन मरा, जिस नगर में मरा, उस नगर के लोग हैरान हो गए। सिकंदर की अरथी बड़ी अजीब थी। ऐसी अरथी कभी भी दुनिया में किसी गांव में कभी न निकली थी। उसकी अरथी के बाहर दोनों हाथ लटके हुए थे नीचे। लोग बड़े हैरान हो गए कि यह क्या कुछ भूल हो गई है? लेकिन भूल कैसे हो सकती थी? और सिकंदर की अरथी थी, किसी सामान्य भिखमंगे की, सामान्य आदमी की तो नहीं। और हाथ दोनों बाहर लटके हुए थे, सबको दिखाई पड़ते थे। भूल कैसे हो सकती थी? तो लोग पूछने लगे, क्या है, ये हाथ बाहर क्यों हैं? सभी अरथियों के हाथ तो भीतर बंद होते हैं। तो पता चला कि सिकंदर ने मरने के पहले कहा था कि मैं जब मर जाऊं तो अरथी के बाहर मेरे दोनों हाथ रखना ताकि दुनिया ठीक से देख ले कि मेरी मुट्ठियां भी खाली हैं, मैं भी भर नहीं पाया। दौड़ा बहुत, बहुत कोशिश की मैंने कि भर लूं। जो मेरे भीतर उठा था मेरा अहंकार पूरा हो जाए, लेकिन नहीं पूरा हो सका है।
सिकंदर का नहीं हुआ, किसी का कभी नहीं हुआ। अहंकार पूरा नहीं होता, क्यों? कुछ कारण हैं।
एक फकीर के पास एक युवक पहुंचा और उसने कहा कि मैं चाहता हूं कि या तो मेरा अहंकार पूरा हो जाए, तो छुटकारा मिले और या फिर अहंकार से ही छुटकारा हो जाए? दो में से कोई भी रास्ता बता दें, या तो अहंकार से मुक्त हो जाऊं तो ठीक, यह पीड़ा छूटे, यह दुख लाने वाला बिंदु, यह वेदना का केंद्र, यह कष्ट का मध्य-बिंदु अलग हो जाए। यही तो पीड़ा लाता है चौबीस घंटे। संघर्ष लाता है, हिंसा लाता है, कांफ्लिक्ट लाता है। तो या तो इससे छूट जाऊं और या फिर यह पूरा ही भर जाए। यह जो चाहता है वह पूरा हो जाए। दो में से कोई भी रास्ता बता दें?
उस फकीर ने कहा, आओ, आज रास्ता बता ही दूंगा। लेकिन देखने के लिए आंखें चाहिए। और वह अपने के पास के झोपड़े के कुएं पर गया। वह युवक उसके साथ गया। और उसने कहा, देखने के लिए आंख चाहिए, तो वह गौर से देखता रहा।
उसने एक बहुत बड़ा ढोल उठाया, कुएं के किनारे रखा और बालटी कुएं में डाली, बालटी भरी और ढोल में डाली। दूसरी बालटी भरी ढोल में डाली, तीसरी भरी ढोल में डाली, लेकिन ढोल नीचे से बेपेंदी का था, बॉटमलेस, उसमें कोई नीचे पेंदी नहीं थी। वह पानी नीचे से निकलता गया। वह लड़का खड़ा देखता था। दो-चार बालटी तक तो उसने बरदाश्त किया और उसने कहा, ठहरिए, आप पागल तो नहीं हैं? जिस ढोल को आप भर रहे हैं उसमें नीचे कोई पेंदी नहीं, वह दोनों तरफ से खुला हुआ है। आप भर-भर कर हैरान हो जाएंगे, वह न भरेगा। तो उस फकीर ने कहा, बस लौट जाओ, अगर दिखाई पड़ गया हो तो देख लेना।
अहंकार खाली शून्य है, उसमें कितना ही भरो कुछ भी नहीं भरेगा, उसमें कोई पेंदी नहीं है। अहंकार एंप्टीनेस, अहंकार है नथिंगनेस, ना-कुछ, हवा, खाली जगह, उसमें भरो, कुछ भी न भरेगा, कितना ही भरो, सारी दुनिया डाल दो, उसमें भर कर पाओगे वह खाली है।
उस फकीर ने कहा, तुझे यह तो दिखाई पड़ गया कि यह पागलपन है। जिस चीज में मैं पानी भर रहा हूं अगर उसमें पेंदी नहीं है तो यह पागलपन है तुझे दिखाई पड़ गया, लेकिन क्या तूने कभी खोजा कि अहंकार में कोई पेंदी है? क्या कभी तूने खोजा कि अहंकार में कुछ भरा जा सकता है? जा और अब खोज, खोज अपने भीतर कि अहंकार क्या है?
दो तरह की गलतियां हैं, अहंकार अगर कुछ भी नहीं है तो न तो उसे भरा जा सकता और न उसे खाली किया जा सकता। क्योंकि खाली भी उसे किया जा सकता है जो भरा जा सकता हो। इस बात को मैं फिर से दोहराता हूं, खाली वही चीज की जा सकती है जो भरी जा सकती हो। जब अहंकार भरा ही नहीं जा सकता तो उसको खाली भी नहीं किया जा सकता।
दो तरह की नासमझियां हैं, जो दुनिया में चलती हैं। अहंकार भरने की नासमझी है और अहंकार खाली करने की नासमझी है। एक का नाम भोग है, एक का नाम त्याग है। दोनों नासमझियां हैं। फिर अहंकार के साथ क्या किया जा सकता है? जो पहली चीज की जा सकती है वह यह कि उसे खोजा जा सकता है कि वह है भी या नहीं? पहली चीज है, जाना जा सकता है कि अहंकार क्या है?
और बड़े आश्चर्यों का आश्चर्य है कि जो उसे जानने जाता है वह पाता है कि वह है ही नहीं। जो उसे भीतर खोजने जाता है वह पाता है कि वह है ही नहीं। और जिस क्षण यह पा लिया जाता है कि अहंकार नहीं है उस क्षण जो शेष रह जाता है वही परमात्मा है। उस क्षण जो शेष रह जाता है वही आत्मा है। उस क्षण जो शेष रह जाता है असीम और अनंत वही सत्य है।
अहंकार को न तो भरना है, न छोड़ना है। अहंकार को जानना है, देखना है, पहचानना है। क्या है? है भी या नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैं किसी छाया से लड़ रहा हूं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैं किसी छाया का पीछा कर रहा हूं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैं कोई सपने में हूं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैं नींद में हूं? और जिस चीज को भरने या निकालने की कोशिश में लग गया हूं, वह है ही नहीं। ऐसा ही है। लेकिन मेरे कहने से नहीं। तो भीतर जाकर देखने की बात है। खोजने की बात है कि यह अहंकार कहां है?
कभी खोजा आपने? कभी दो क्षण एकांत में बैठ कर भीतर जाकर खोज की कि यह अहंकार क्या है? जो मुझे पागल किए हुए है, दौड़ा रहा है, दौड़ा रहा है, दौड़ा रहा है और एक सीमा पर जब मैं थक जाता हूं, परेशान हो जाता हूं, तो उलटी दौड़ शुरू होती है, छोड़ने की दौड़ शुरू होती है, छोड़ने की दौड़ शुरू होती है, लेकिन यह है क्या? कौनसी है जगह यह अहंकार?
एक संन्यासी भारत से चीन गया था कोई चौदह सौ वर्ष पहले। बोधिधर्म था उसका नाम, चीन का सम्राट उसका स्वागत करने राज्य की सीमा तक आया। सुना था उसका बहुत नाम। उसकी अदभुत बातों की खबर उससे पहले पहुंच गई थी। उस सम्राट वू ने बोधिधर्म का स्वागत किया। स्वागत के बाद उसे महल में ले गया, विश्राम के बाद सम्राट वू ने बोधिधर्म को पूछा, एक ही बात मुझे पूछनी है, कहते हैं सभी धर्म, कहते हैं सभी शास्त्र, कहते हैं सभी उपदेष्टा, अहंकार छोड़ो। कैसे छोडूं इस अहंकार को?
भरने की कोशिश करके देख ली है, सारे चीन का मालिक हो गया हूं, लेकिन पाता हूं कि कुछ भी भरा नहीं, वही खाली का खाली हूं। सोचता था पहले पूरे साम्राज्य को पा लूंगा चीन के, तृप्ति हो जाएगी, लेकिन तृप्ति नहीं हुई। अब मन कहता है, पूरी दुनिया को पा लो, लेकिन जो मन कहता था, पूरे चीन को पा लो, तृप्ति हो जाएगी। पूरे चीन को पाकर तृप्ति नहीं हुई, अब उस मन की कैसे मानूं? वह कहता है, पूरी पृथ्वी को पा लो। कैसे मानूं कि फिर तृप्ति हो जाएगी? रोज-रोज धोखा खाया, मन ने जो भी कहा कि यह पा लो, तृप्ति हो जाएगी, वह पा लिया और पाते ही पाया हाथ खाली के खाली हैं। अब कैसे मानूं? अब क्या करूं? बूढ़ा हो गया हूं, अब दुनिया जीतने को जाऊं? लेकिन डर लगता है, इतना सब पाया और तृप्ति न हुई, और हर चीज के लिए मन ने कहा था तृप्ति हो जाएगी। तो अब आगे के लिए कैसे मानूं? वह तो रास्ता दिखाई नहीं पड़ता। तो भिक्षुओं की शरण में जाता हूं, संन्यासियों की, उनसे पूछता हूं, वे कहते हैं, छोड़ो इसको। अहंकार छोड़ो। वे कह देते हैं, समझ भी लेता हूं, लेकिन कैसे छोडूं? कहां है यह जिसे मैं छोड़ूं? कहां फेंकूं इसे? कोई वस्त्र छोड़ने को कहे, छोड़ दूं; कोई चमड़ी निकालने को कहे, निकाल कर फेंक दूं; कोई गर्दन काटने को कहे, गर्दन काट दूं, लेकिन यह अहंकार कहां है जिसे छोड़ दूं? कहां है यह? उस बोधिधर्म ने कहा, कल सुबह चार बजे आ जाओ और तुम्हारा अहंकार छुड़ा ही देंगे।
वह सम्राट वू लौटा, सोचने लगा, कैसे छुड़ा देगा यह? सीढ़ियां उतरता था तब बोधिधर्म ने कहा, लेकिन खयाल रहे, अकेले मत आ जाना, अहंकार को भी साथ ले आना। यही कठिनाई तो उसकी भी थी वही बात फिर खड़ी हो गई। कहां है यह अहंकार? रात भर जागता रहा, सोचता रहा। क्यों कहा है इस भिक्षु ने कि अकेले मत आना अहंकार को भी साथ ले आना? सुबह चार बजे आया। आते ही बोधिधर्म ने पूछा, आ गए, लेकिन अकेले मालूम पड़ते हो, कहां है वह? अहंकार कहां है? उस वू ने कहा, यही तो मेरी परेशानी है, रात भर खोजता रहा मिलता नहीं। बोधिधर्म ने कहा, बैठो मेरे सामने, आंख बंद करो और खोज लो। एक भी कोना-कांतर न रह जाए मन के भीतर, एक भी कार्नर न रह जाए जो अनखोजा रह जाए। खोज लो पूरे मन के कोने-कोने में और कहीं न पाओ, तो बात खत्म हो गई, फिर क्या छोड़ना है? हां, एक भी कोना अनजाना न रह जाए, अननोन न रह जाए, नहीं तो शक बना रहेगा कि शायद वहां बैठा हो। तो बैठो और जाओ भीतर और खोजो और खोजो और मैं डंडा लिए तुम्हारे सामने बैठा हूं, मिल जाए तो खबर कर देना, वहीं उसकी हत्या कर दूंगा।
उस अंधेरी रात उस सुबह की पहाड़ी झील पर अकेला वह राजा उस पागल बोधिधर्म के सामने बैठ गया। डर तो उसे लगने लगा कि कहीं यह डंडा, यह डंडा किसलिए लिए हुए है? और यह क्या करेगा? उसने आंखें भीतर बंद कीं।
छोड़ दें उस राजा वू को, देखें, खुद अपने भीतर ही समझ लें कि आप भी बैठ गए और आंख बंद कर ली है और मैं डंडा लिए आपके सामने बैठा हुआ हूं, और आप खोज रहे हैं भीतर इस अहंकार को कि यह कहां है। खोजें, जितना खोजेंगे उतना ही पाएंगे कि वह नहीं है। जितना खोजेंगे उतना ही पाएंगे वह इवोपरेट हो गया, वाष्पीभूत हो गया, वह कहीं मिलता नहीं। वह है ही नहीं, मिलेगा कैसे? वह होता तो मिल सकता था।
इस भीतर खोजने की जो प्रक्रिया है उसी का नाम ध्यान है। परमात्मा को नहीं खोजा जाता है। परमात्मा की कोई खोज नहीं हो सकती, खोजा जाता है अहंकार को। जागरूक होकर, अवेयरनेस से, होश से भर कर भीतर कोने-कोने में देखना है कहां है यह? वहां मिलेंगे विचार, वहां मिलेंगी वासनाएं, वहां मिलेंगी कल्पनाएं, स्मृतियां, लेकिन अहंकार नहीं मिलेगा।
और तब यह दिखाई पड़ेगा कि जैसे कोई आदमी एक हाथ में मशाल ले ले और जोर से घुमाए, तो एक अग्निवृत्त, एक फायर सर्किल दिखाई पड़ने लगता है। जो होता नहीं, सिर्फ दिखाई पड़ता है। मशाल हाथ में लेकर कोई घुमाता है जोर से, तो एक अग्नि का वृत्त दिखाई पड़ता है, गोल अग्नि का सर्किल दिखाई पड़ता है। वह कहीं है नहीं, लेकिन मशाल इतनी तेजी से घूमती है कि एक गोल वृत्त का भ्रम पैदा कर देती है। हाथ धीमे घुमाएं, हाथ रोक लें, तो दिखाई पड़ जाता है अग्निवृत्त कहीं भी नहीं था। थी सिर्फ मशाल, तेजी से घूमने से मालूम होता था वृत्त है।
मन के भीतर विचार, कल्पनाएं, कामनाएं, इच्छाएं इतनी तेजी से घूमती हैं, इतनी तेजी से घूमती हैं कि उनके तेजी के घूमने की वजह से एक सर्किल मालूम पड़ता है और वह सर्किल ही मालूम पड़ता है, मैं हूं अहंकार। लेकिन जब भीतर जाकर देखना शुरू करेंगे, शांत भीतर खोजना शुरू करेंगे, तो टुकड़े-टुकड़े विचार दिखाई पड़ेंगे, कहीं कोई सर्किल दिखाई नहीं पड़ेगा। तो पता चलेगा विचार हैं, इच्छाएं हैं, कामनाएं हैं, लेकिन मैं कहां हूं। मैं तो नहीं हूं। और बड़े मजे की बात है, बहुत गहरे अर्थ की कि जैसे ही यह दिखाई पड़ जाए कि मैं नहीं हूं, केंद्र टूट गया, केंद्र बिखर गया। बदली की भांति धुआं फैल गया।
जीवन जिस पर हम चलाते थे, बांधते थे, वह बिखर गया। तब उस बिखरे हुए धुएं के नीचे ही वह भूमि मिल जाएगी जो आत्मा की है। इस धुएं में जब तक जो घिरा है, इस झूठे वृत्त में जब तक जो बंधा है, नीचे आंख नहीं जाती, नीचे दृष्टि नहीं जाती, यह उखड़ जाए, विलीन हो जाए और यह दिखाई पड़ जाए कि मैं तो नहीं हूं, तब इतनी गहन शांति उत्पन्न होती है, इतनी टोटल साइलेंस। क्योंकि सारा उपद्रव, सारी अशांति मैं की है। वह दिखाई पड़ जाए मैं नहीं हूं, तो एकदम सब शांत हो जाता भीतर, सब मौन, सब चुप। उस मौन में, उस चुप्पी में, उस शांति में, उस साइलेंस में, उसका अनुभव होना शुरू होता है जो अज्ञात है, अननोन है। वही परमात्मा है। उस शांति में ही वह जाना और पहचाना जाता है।
अहंकार अशांति है। अहंकार अज्ञान है। नहीं है जहां अहंकार, वहां वह है जो है, जो वस्तुतः है। तो न तो छोड़ना है, न भरना है, न बनाना है, न मिटाना है, बल्कि जानना है। धर्म है जानना, ज्ञान, चेतना। जितनी, जितनी तीव्र रूप से मेरी कांशसनेस, मेरी अवेयरनेस, मेरी चेतना जागती है और खोज करती है, जितने जोर से मैं बोध के दीये को लेकर मैं भीतर जाता हूं और खोजता हूं, उतना ही नहीं पाया जाता वह जो मेरी पीड़ा थी, जो मेरा बंधन था, जो मेरी दीवाल थी।
एक अंतिम छोटी बात और चर्चा मैं पूरी करूंगा।
गिर जाती है जहां यह दीवाल वहीं हम सबसे जुड़ जाते हैं। गिर जाता है जहां यह भ्रम मेरे अलग और पृथक होने का, वहीं सागर से बूंद का मिलन है, वहीं व्यक्ति से समष्टि का मिलन है।
एक छोटी सी कहानी अंत में कहूं।
एक सम्राट का जन्म-दिन था और उसने अपने राज्य के सौ बड़े ब्राह्मणों को आमंत्रित किया। उन्हें भोजन कराया, उनकी सेवा की और पीछे उसने घोषणा की उन ब्राह्मणों को कि मैं कुछ दान देना चाहता हूं। लेकिन मैं अपनी मर्जी से दान दूंगा तो छोटा होगा इसलिए तुम्हारे ऊपर छोड़ देता हूं। राजधानी के बाहर झील के पार मेरा जो बहुत बड़ा उपवन है, श्रेष्ठतम भूमि है उस उपवन की इस पूरे राज्य में, मैं तुमसे कहूंगा कि तुम जाओ और उस जमीन में जितनी जमीन तुम्हें घेरना हो घेर लो, जो जितनी जमीन घेर लेगा वह उसकी हो जाएगी। जो जितनी बड़ी जमीन पर दीवाल बना लेगा और घेरा बना लेगा वह उसकी हो जाएगी। जितनी पर बना लेगा, कोई मेरी तरफ से सीमा नहीं, जितनी तुम्हारी सामर्थ्य हो सीमा बनाने की तुम बना लो। और अंत में उसने यह और कह कर पागलपन बढ़ा दिया, उसने कहा, और जो सबसे ज्यादा जमीन घेर लेगा उसे मैं राजगुरु के पद पर भी बिठा दूंगा।
ब्राह्मण पागल हो गए थे। वे भागे गए और उन्होंने अपने मकान, जमीन, जायदाद, जो कुछ था, सब बेच दिया। सारी संपत्ति इकट्ठी करके, मित्रों से जो उधार ले सकते थे लेकर, क्योंकि यह मौका हमेशा के लिए चूके जाने वाला था। मुफ्त जमीन मिलती थी सिर्फ घेरने के मूल्य पर। जितनी बड़ी दीवाल बना लेंगे वह जमीन को घेर लेंगे वह उनकी हो जाएगी।
पागल हो गए वे, बहुमूल्य जमीन थी और मुफ्त मिलती थी। उन सबको छह महीने का वक्त मिला था। उन्होंने अपने कपड़े-लत्ते तक बेच कर एक-एक लंगोटी रख ली। एक दफा जमीन मिल जाए फिर उसको बेच कर तो करोड़ों रुपये मिल सकते थे। उन्होंने जमीन पर बड़े-बड़े घेरे बना लिए। जिसकी जितनी पहुंच थी उतना पैसा ले आया। घेरे बन गए, अंतिम दिन आ गया और सम्राट देखने आया।
उन सौ ब्राह्मणों में एक ही ब्राह्मण था जिसको बाकी निन्यानबे नासमझ और पागल और जड़बुद्धि समझते थे। क्योंकि उसने जरा सी जमीन का टुकड़ा घेरा था। बहुत जरा सी जमीन का टुकड़ा। और वे हैरान थे कि इतना जरा सा टुकड़ा उसने क्यों घेरा है? और वह भी उसने कोई पक्की दीवाल न बनाई थी बल्कि लकड़ियां लाकर लगा दी थीं और घास-फूस बांध दिया था। वे हैरान थे कि उस नासमझ को इतना भी खयाल नहीं है कि कितना बड़ा अवसर चूका जाता है। स्वर्ण बटोरने का अवसर था और वह चूक गया था।
सौ ही ब्राह्मण इकट्ठे हुए और राजा ने कहा, मैं पूछना चाहता हूं, सर्वाधिक जमीन किसने घेरी है? वह खड़े होकर कह दे। सबके हैरानी का ठिकाना न रहा, वह गरीब ब्राह्मण जिसने सबसे थोड़ी जमीन घेरी थी खड़ा हो गया और उसने कहा कि मैं राजगुरु के पद पर अपने को घोषित करता हूं, मैंने सर्वाधिक जमीन घेरी है। सारे लोग हंसने लगे कि इसका दिमाग मालूम होता है खराब हो गया है। लेकिन दावा किया गया था तो राजा को देखने जाना पड़ा। राजा भी चिंतित तो हुआ क्योंकि उसे पता चल चुका था कि वही सबसे कम घेरा है। और उसकी जमीन पर पहुंच कर और सारे लोग हंसने लगे। कल तक तो वहां उसने जो घास-फूस की बागुड़ लगाई थी, रात उसमें भी आग लगा दी थी। अब वहां कोई भी घेरा नहीं था।
उस ब्राह्मण से राजा ने कहा, कहां है तुम्हारा घेरा? उस ब्राह्मण ने कहा, मैं कितना ही घेरता तो घेरा छोटा होता। मन कहता, और बड़ा घेरो। छोटा ही होता वह घेरा। आखिर जो भी घिरा होगा वह छोटा ही होगा, उसका घेरा होगा। तो फिर मैंने सोचा कि मैं घेरा तोड़ दूं, तो फिर मेरा घेरा सबसे बड़ा हो जाएगा। तो रात मैंने आग लगा दी घेरे में। और अब मैं दावा करता हूं कि मेरी ही जमीन सबसे बड़ी है क्योंकि उस पर कोई घेरा नहीं है।
राजा उसके पैरों पर गिर पड़ा और उसने कहा, ये निन्यानबे व्यवसायी हैं, ब्राह्मण तू अकेला है। क्योंकि जो घेरों में आग लगा देता है उसका संबंध असीम से हो जाता है। और जो सीमा बांधता है वह सीमित से बंध जाता है। एक ही सीमा है अहंकार की, चाहे किसी ने थोड़ा बनाया हो, किसी ने थोड़ा बड़ा, किसी ने और थोड़ा बड़ा।
अहंकार की भूमि पर सीमाएं हैं। एक दरिद्र की छोटी झोपड़ी है और एक सम्राट का बहुत बड़ा महल है। और एक दरिद्र के पास छोटी सी जमीन का टुकड़ा है और एक सम्राट के पास सारी पृथ्वी हो सकती है। लेकिन जहां घेरा है वहीं सीमा है और जहां सीमा है वहां असीम से पृथक्करण है। क्या खयाल में यह बात आ जाए तो उस घेरे में आग लगा दी जा सकती है? और उस घेरे में आग लगा कर कोई हारता नहीं, खोता नहीं, बल्कि असीम का मालिक हो जाता है।
जो सीमित को छोड़ने का साहस करते हैं, वे असीम के पाने के अधिकारी और मालिक हो जाते हैं। जो तुच्छ को छोड़ने की हिम्मत करते हैं, वे विराट की संपदा के प्रभु हो जाते हैं। जो अपने को खोने को तैयार हैं, वे परमात्मा को पाने के अधिकारी हैं।
आज की इस अंतिम चर्चा में मैंने एक ऐसी चीज को खोने के लिए आपको कहा है जो वस्तुतः नहीं है। उस नहीं को जो खो देता है वह उसको पा लेता है जो वस्तुतः है और जो उस नहीं के साथ बंधा रहता है वह वस्तुतः जो है, जिसका वस्तुतः अस्तित्व है, जिसका आथेंटिक एक्झिस्टेंस है, वही जिसे हम परमात्मा कहते हैं, उसे पाने से सदा के लिए वंचित हो जाता है। उसके द्वार खुले हैं, हमारे द्वार बंद हैं। उसका सागर मौजूद है, हमारी बूंद खोने को तैयार नहीं। लेकिन स्मरण रखें, जब बूंद सागर में अपने को खोती है तो कुछ खोती नहीं है सिर्फ बूंद होना खो जाता है और पूरे सागर को पा लेती है।
तो अंतिम रूप से यह निमंत्रण देता हूं, बूंद को खो जाने दें ताकि सागर के मालिक हो जाएं। वही सागर प्रभु है।

मेरी बातों को इतनी शांति और प्रेम से सुना, उससे बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्वीकार करें।


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