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रविवार, 12 मार्च 2017

कानो सुनी सो झूठ सब-(संत दरिया)-प्रवचन-08

कानो सुनी सो झूठ सब-(संत दरिया)

निहकपटी निरसंक रहि
प्रवचन:आठवां
दिनांक: १८.७.१९७७
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्न-सार:
1--अगर कान से सुना सब झूठ है तो फिर सदगुरु के उपदेश का प्रयोजन क्या?
2--समझ जीवन में प्रामाणिकता कैसे लाए?
3--आपसे मुलाकात होने का अनुभव--सपना है या सच?


पहला प्रश्न: अगर कान से सुना सब झूठ है तो फिर सदगुरु के उपदेश का महत्व क्या रह जाता है?
तुम पर निर्भर है। अगर कान से ही सुना, बस कान से ही सुना तो कोई भी अर्थ नहीं है लेकिन आंख से भी सुनने का ढंग है। सदगुरु को सुनो ही मत, देखो।

सत्संग का अर्थ होता है, सदगुरु की सन्निधि अनुभव करो। सदगुरु का स्वाद लो। जो कहा जाता है वह तो कुछ भी नहीं। सागर की सतह पर उठी लहरों की भांति है। जो नहीं कहा जाता, जो नहीं कहा जा सकता है वही असली मोती है सागर की गहराई में। शब्द  ही सुने तो चूक गए। शब्द के पीछे मौजूद है उसे देखो तो पा लिया। शब्द जहां से आते हैं वहां सीढ़ी लगाओ। सदगुरु के शून्य में उतरो। उसकी वाणी से खेलो। प्रारंभ ठीक है, खिलौनों की तरह है। फिर धीरे-धीरे खिलौने छोड़ो। असली बात...असली बात तो सदगुरु की उपस्थिति है। असली बात तो उसका अस्तित्व है उसकी सत्ता है। उसकी सत्ता के रंग में रंगो। असली बात तो संगीत है उसका। जैसे बोला जाता वह तो बड़े दूर की खबर है, प्रतिबिंबों का प्रतिबिंब है। जो नहीं बोला जाता, सत्य वहां विराजमान है।
सत्संग का अर्थ सुनना नहीं होता, सत्संग का अर्थ होता है साथ होना; संग होना। सदगुरु के साथ चलो। सदगुरु के साथ डोलो। सदगुरु के लिए हृदय खोलो कि उसकी किरणें तुम्हारे अंधकार में प्रवेश कर जाएं।
यही मेरा अर्थ है, जब मैं कहता हूं आंखों से सुनो। बेबूझ लगेगी बात। आंखों से कहीं सुना जाता है? आंखों से सुना जाता है, सुना जा सकता है। सदगुरु को पीयो। उसके अरूप को उतरने दो तुम्हारे भीतर। उसके निराकार को झनकार लेने दो तुम्हारे भीतर। अवसर दो कि उसका हाथ तुम्हारी वीणा पर पड़े। संकोच न करो, संदेह न करो, झिझको मत, सुरक्षा मत करो। हम सब सुरक्षा में लगे रहते हैं। और मजा है कि बचाने को कुछ भी नहीं और बड़ी सुरक्षा में लगे रहते हैं।
कल दरिया ने कहा कि हाथी तोड़ देता किले के द्वार को। जैसा किले का द्वार है, ऐसा ही आदमी भी है। जैसे किले के द्वार पर भाले लगे होते हैं, बरछे लगे होते हैं कि कोई तोड़ न सके। तोड़ना दूर, द्वार के पास भी न आ सके। ऐसे ही आदमी ने भी बड़े अदृश्य बरछे अपने चारों तरफ लगा रखे हैं। कोई तुम्हारे पास न आ सके। कोई तुम्हारा द्वार-दरवाजा न खोल ले। तुम बड़े भयभीत हो। तुम चौबीस घंटे अपनी सुरक्षा में लगे हो। यही सुरक्षा छोड़ दो सदगुरु के पास, तो क्रांति घट जाए।
सदगुरु का अर्थ है, किसी व्यक्ति में तुमने ऐसा कुछ देखा कि वहां तुम अपने को बचाना न चाहोगे। किसी व्यक्ति के पास तुमने ऐसा कुछ देखा कि वहां तुम अपने को लुटाना चाहोगे। किसी व्यक्ति के पास ऐसा कुछ देखा कि अगर वह लूट ले तो तुम्हारा धन्यभाग; अगर तुम बचा लो तो तुम अभागे।
प्रश्न सार्थक है, कई के मन में उठा होगा। दरिया कहते हैं, कानों सुनी सो झूठ सब, आंखों देखी सांच। तो फिर सदगुरु के उपदेश का क्या अर्थ? फिर तो दरिया के इस वचन का भी क्या अर्थ है? यह भी तो सुना ही होगा किसी दिन। नहीं, अर्थ है। यह तुम्हें चेताने की बात है। सच और झूठ में बहुत फासला नहीं है। फासला बहुत हो भी नहीं सकता।
किसी ने इमरसन को पूछा कि सच और झूठ में कितना फासला है? तो उसने कहा, चार अंगुल का--आंख और कान के बीच जितना फासला है। बस चार अंगुल का फासला है। कान लो लेता है, जो ग्रहण करता है, वह प्रतिबिंब होता है। आंख जो देखती है और लेती और ग्रहण करती है, वह साक्षात्कार होता है।
सत्य और झूठ में बहुत फर्क नहीं है, इसलिए तो झूठ धोखा दे पाता है। अगर बहुत फर्क होता तो सभी लोग चौक जाते। फर्क चार अंगुल का है। झूठ सच के बहुत करीब है। ऐसे ही, जैसे जब तुम धूप में चलते हो तो तुम्हारी छाया तुम्हारे बहुत करीब होती है। ऐसा थोड़ी है कि तुम्हारी छाया मीलों दूर चल रही है, तुम कहीं चल रहे हो, तुम्हारी छाया कहीं चल रही है। तुम्हारी छाया बिलकुल झूठ है। छाया ही है, होना क्या है वहां? कोई अस्तित्व नहीं है छाया का। लेकिन तुम्हारे पैरों से सटी-सटी चलती है। एक इंच का भी फासला नहीं छोड़ती। ऐसा ही सच के साथ झूठ चलता है।
झूठ सच की छाया है। अगर तुम ठीक समझ पाओ तो झूठ सच की छाया है। इसलिए तो धोखा दे पाता है नहीं तो धोखा भी कैसे देगा? अगर झूठ बिलकुल ही सच जैसा न हो, जरा भी सच जैसा भी न हो तो कौन धोखे में पड़ेगा? झूठे सिक्के से तुम धोखे में आ जाते हो क्योंकि वह सच्चे सिक्के जैसा लगता है कम से कम; हो या न हो, लगता तो है। बिलकुल सच्चे सिक्के जैसा लगता है। झूठ सच जैसा लगता है, बस लगता है। रूपरेखा बिलकुल सच की ही होती है झूठ में भी। एक ही बात की कमी होती है, सच में प्राण होते हैं, झूठ में प्राण नहीं होते। तुम्हारी छाया का ढंग तुम्हारे जैसा ही होता है। रूपरेखा तुम्हारे जैसे ही होती है। तुम्हारी तस्वीर इसीलिए तो तुम्हारी कहलाती है। सब ढंग तुम जैसा होता है। लेकिन तस्वीर तस्वीर है, तुम तुम हो। फर्क क्या है? फर्क इतना ही है कि तुम्हारे भीतर प्राण हैं और तस्वीर के भीतर प्राण नहीं हैं। तस्वीर तुम्हारे जैसी लगती है लेकिन कैसे तुम्हारे जैसी हो सकती है?
झूठ सच की तस्वीर है। तुमने अकसर ऐसा ही सोचा होगा कि झूठ सच से बिलकुल विपरीत है। बिलकुल विपरीत होता तो झूठ धोखा ही न दे पाता। झूठ सच से विपरीत नहीं है, तस्वीर है। आकृति बिलकुल सच जैसी है। सच से बिलकुल ताल-मेल खाती है। ऐसा ही समझो कि रात चांद को देखा झील में; वह जो झील का चांद है, झूठ है। असली चांद जैसा है। और कभी-कभी तो असली चांद से भी ज्यादा सुंदर मालूम होता है। झूठ खूब अपने को सजाता है। झूठ खूब आभूषण पहनता है। झूठ हीरे-जवाहरातों में अपने को छिपाता है। झूठ अपने आसपास प्रमाण जुटाता है। झूठ सब उपाय करता है कि पता न चल जाए कि मैं झूठ हूं। आकाश में चांद है वह तो सच है। झील में जो प्रतिबिंब बन रहा है वह झूठ है। लेकिन है वह सच का ही प्रतिबिंब।
जो तुमने कान से सुना है वह भी सच का ही प्रतिबिंब है। किसी ने देखा, कोई जागा, किसी ने अनुभव किया, अपने अनुभव को वाणी में गुनगुनाया। तुमने वाणी कान से सुनी। यह चांद का प्रतिबिंब बना। तुमने किसी संत में सीधा देखा। उसके शब्दों के माध्यम से नहीं, तुमने शब्द हटाकर देखा। तुमने अपने और संत के बीच में शब्दों की दीवार न रखी, आड़ न रखी; तुमने शब्दों को सेतु न बनाया; तुमने शब्द हटा ही दिए; तुमने सीधा देखा, निशब्द में देखा; तब तुम चांद को देख पाओगे।
इसलिए मैं कहता हूं, सच कहते हैं दरिया--
कानों सुनी सो झूठ सब आंखों देखी सांच--
आंख से सुनने का ढंग है; उसी को हम सत्संग कहते हैं।
तुम इधर मेरे पास बैठे, कुछ हैं जो मेरे शब्द को ले जाएंगे, संभालकर ले जाएंगे। कोई-कोई कभी आ जाता है वह अपनी किताब भी ले आता है, उसमें लिखता जाता है। उसका जोर शब्द पर है। वह विद्यार्थी है, शिष्य नहीं। वह अभी स्कूली दुनिया में है। जैसे कहीं कोई परीक्षा होनेवाली हो। जिंदगी को कहीं कोई परीक्षा होती है? जिंदगी तो पूरी परीक्षा है। यहां शिक्षण और परीक्षा अलग-अलग नहीं होते। यहां तो हर घड़ी परीक्षा है। हर घड़ी शिक्षण है। हर शिक्षण में परीक्षा है, हर परीक्षा में शिक्षण है। यहां तो सब मिला-जुला है। ऐसा थोड़े ही है कि एक दिन जब तुम अस्सी साल के हो जाओगे तो कोई परीक्षा में बैठोगे कि अब जीवन की परीक्षा हो रही है; कि वहां उत्तर देने पड़ेंगे, रटे-रटाए उत्तर काम आ जाएंगे; कि बाजार में छुपी हुई कुंजियां खरीद लोगे। ये कुरान और वेद और गुरुग्रंथ और बाइबल कुंजियां हैं, इनसे काम न चलेगा। तुमने अगर नानक के शब्द दोहराए तो तुम झूठ हो गए। तुम अगर नानक हो गए तो सच हो गए। तुमने अगर कबीर के शब्द दोहराए, बिलकुल अक्षरशः दोहराए तो झूठ हो गए। तुम कबीर हो गए तो सच हो गए। फिर तुमसे भी वैसे ही शब्द निकलने लगेंगे जैसे कबीर से निकले। मगर फर्क बड़ा होगा। अब यह तुम्हारे अपने अनुभव से निकलते होंगे। अब तुम्हारा अपना झरना खुल गया है। अब ये तुम्हारे होंगे। प्रामाणिक रूप से तुम्हारा प्राण इनके भीतर धड़कता होगा। ये मुर्दा नहीं होंगे।
तो कोई यहां आता है विद्यार्थी की तरह, वह शब्द संभालकर ले जाता है। उसकी स्मृति में थोड़ी बढ़ती हो जाती है। उसकी जानकारी थोड़ी बढ़ जाती है। वह थोड़ी और इन्फर्मेशन इकट्ठी कर लेता है। वह थोड़ा और पंडित हो जाता है। वह दूसरों को समझाने में थोड़ा और कुशल हो जाएगा। दूसरों को समझाने में--याद रखना। खुद तो चूक ही गया।
और अकसर ऐसा होता है कि जब तुम दूसरे को समझाने में कुशल हो जाते हो तो तुम समझते हो कि मैं समझ गया। बात ठीक उलटी है। दूसरों को समझाने में कुशल हो जाने से तुम्हारे समझने का कोई संबंध नहीं है। तुम्हारी समझ और ही बात है। तुम्हें अगर समझना है तो शिष्य की तरह, विद्यार्थी तरह नहीं। कोई नाटस नहीं लेने है। मेरे शब्द को कोई कंठस्थ नहीं कर लेना है। मेरे शब्द तो याद रहें न रहें, उसका कोई प्रयोजन ही नहीं है। शब्दों के भीतर जो रस डाल रहा हूं उस रस की बूंद तुम्हारे कंठ में उतर जाए, शब्द तो भूल जाएं। शब्द तो ऐसा समझो, खोल है। असली बात भीतर है। खोल को तो फेंक देना। असली को आत्मसात कर लेना।
भोजन करते हैं ना! तो जो सार-सार है, वह तुम पचा लेते हो और जो असार है वह मलमूत्र में बाहर निकल जाता है। शब्द तो असार हैं; उनका कोई मूल्य नहीं है। जब तुम दूसरे को समझाने में उसे निकाल देते हो तब बस मलमूत्र की तरह बाहर निकल गया, उससे तुम हल्के ही जाओगे।
इसे समझो। मुझे सुनकर तुमने शब्द इकट्ठे किए, मन भारी हो गया क्योंकि वे शब्द इकट्ठे हो गए। अब तुम जल्दी तलाश में रहोगे कि कोई मिल जाए अज्ञानी तो उसमें उंडेल दूं। अब तुम जल्दी खोज करोगे। कोई भी बहाना मिल जाए। कोई किसी बात को कहीं उठा दे, कि तुम जल्दी तत्पर होकर जो तुम बोझ ले आए हो, उसमें उंडेल दोगे। उड़ेलकर तुम्हें अच्छा भी लगेगा लेकिन अच्छा इसलिए नहीं लग रहा है कि तुम दूसरे को समझाने में सफल हो गए। समझे तो तुम खुद ही नहीं हो, तो दूसरे को क्या समझाओगे! जो स्वयं समझ गए हैं वे भी बड़ी मुश्किल पाते हैं दूसरे को समझाने में, तो तुम तो समझाओगे कैसे? तुम तो अभी खुद भी नहीं समझे हो। मगर अच्छा लगेगा।
अच्छा दो कारण से लगेगा--एक तो बोझ हल्का हुआ। इसीलिए तो लोग किसी बात को गुप्त नहीं रख पाते। गुप्त रखने में बड़ा बोझ हो जाता है। किसी ने तुमसे कह दिया, यह कह तो रहे हैं आपसे, कृपा करके किसी और को मत कहना। तब बड़ी मुश्किल हो जाती है। वह निकल निकल आती है, जबान पर आ-आ जाती है बात। अब उसे संभालो, फिर संभालकर भीतर रखो, उसका बोझ बढ़ता जाता है। इसलिए लोग बात को गुप्त नहीं रख पाते। बड़ा मुश्किल है बात को गुप्त रखना। मन उसे फेंक देना चाहता है। ये फेंकने की तरकीबें हैं। अब तुम दूसरे से बात करते हो, इससे हल्कापन आता है; इससे मन का कचरा थोड़ा कम हुआ। दूसरे का बढ़ा, वह जाने। वह किसी और पर फेंकेगा। तुम्हारा तो कम हुआ। तुम तो निर्भार हुए।
तो एक तो अच्छा लगता है निर्भार होना; और दूसरा अच्छा लगता है ज्ञानी होने का अहंकार कि देखो, मैं जानता, तुम नहीं जानते। मैं ज्ञानी, तुम अज्ञानी। जब भी तुम किसी आदमी को अज्ञानी सिद्ध कर पाते हो किसी भी  कुशलता से, तब तुम्हारे अहंकार को बड़ी तृप्ति मिलती है। तो कोई भी बात के द्वारा तुम सदा सिद्ध करने की कोशिश में लगे रहते हो--मैं ज्ञानी, दूसरा अज्ञानी। इन दो बातों के कारण मजा आ जाता है। उस मजे को तुम समझ मत समझ लेना। और उसे मजे से तुम्हारे जीवन में कोई क्रांति घटित न होगी, आनंद के द्वार न खुलेंगे।
विद्यार्थी होकर जो आया है, वह कचरा बीनकर ले जाएगा। सार-सार छोड़ देगा, असार-असार पकड़ लेगा। शब्द असार है, निशब्द सार है। शून्य सार है, मौन सार है। नहीं बोला गया, नहीं बोला जा सकता जो, उसमें सार है। विराट को बांधोगे भी कैसे शब्दों में? शब्द बड़े छोटे हैं। यह तो चमचों में सागर को समाने की कोशिश है। सागर चम्मचों में नहीं समाता। और जो चम्मच में समा जाता है उसका स्वाद अगर सागर का भी हो, नमकीन भी हो, तो भी वह सागर नहीं है। उसमें तूफान नहीं उठा। उसमें बड़ी तरंगें नहीं आएंगी। उसमें जहाज नहीं चलेंगे। उसमें मछलियां नहीं उठेंगी। उसमें तुम डूब न सकोगे। तो माना कि चम्मच में जो भर आया है--दो चार दस बूंद सागर की, उनका स्वाद तो नमक का है, स्वाद से धोखा मत खा जाना। सागर के और भी गुण हैं स्वाद के अतिरिक्त, वे कोई भी वहां नहीं हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि जिसमें तुम डूब जाओ वही सत्य है, वही सागर है।
शब्द में कैसे डूबोगे? वह तो चुल्लूभर पानी में डूब मरने जैसा है। शब्द में कभी कोई डूबा है? शब्द इतना छोटा है, उसमें तुम लाख उपाय करो तो न डूब सकोगे। निशब्द में डूबता है कोई।
तो एक तो है जो अपनी स्मृति को थोड़ा सा बढ़ाकर, अपने ज्ञान को थोड़ा बढ़ाकर, पांडित्य के तराजू पर थोड़ी और गरिमा रखकर चला जाएगा; वह चूक गया। जो यहां से पंडित होकर गया वह चूक गया। लाभ की जगह हानि हो गई। उसने और थोड़ा उपद्रव अपने जीवन में बढ़ा लिया, कम न किया।
जो यहां शिष्य की तरह आया है, जिसे शब्दों में अब कोई रस नहीं है, जो देखने आया है, जो अनुभव करने आया है, जो मेरे साथ अज्ञान की यात्रा पर जाने को तैयार है, जो कानों से मुझसे नहीं जुड़ रहा है, आंखों से जुड़ रहा है, वही कुछ पा सकेगा--केवल वही।
इसके लिए कहता हूं कान से सुनना बस सुनना मात्र है। आंख से सुनना असली बात है। गुरु को पीओ। गुरु पर आंखें टिकाओ। गुरु की रोशनी तुम्हारी आंख की रोशनी बने। गुरु का प्रेम तुम्हारी आंख से उतरे और तुम्हारे हृदय को भरे। तो दरिया ठीक ही कहते हैं; कानों सुनी सो झूठ सब आंखों देखी सांच।
जिस दिन तुम गुरु को ठीक से देखने लगोगे उस दिन तुम दो बातें जानोगे:
जीना भी आ गया मुझे और मरना भी आ गया
पहचानने लगा हूं अब तुम्हारी नजर को मैं
गुरु के साथ होने का अर्थ है, जीना भी आ गया और मरना भी। अहंकार के तल पर मिटने की कला आ गई और आत्मा के तल पर जीने की कला आ गई। असली में जीने का सूत्र पकड़ में आ गया और नकलो में मरने का सूत्र पकड़ में आ गया। नकली की तो चिता बना ली। नकली को तो जला दिया, राख कर डाला। नकली को तो सूली पर चढ़ा दिया। असली को सिंहासन पर बिठा दिया।
जीवन भी आ गया मुझे और मरना भी आ गया
पहचानने लगा हूं अब तुम्हारी नजर को मैं
नजर को पहचानो। आंख को पहचानो। गुरु के अस्तित्व से जुड़ो। गुरु की सन्निधि में डूबो।

दूसरा प्रश्न: आपको प्रेमपूर्वक समझ पाता हूं, औरों को समझ भी पाता हूं, फिर वही समझ जीवन में प्रामाणिकता आथेन्टीसिटी लाने में सहायक क्यों नहीं हो पाती है? कि जिसके न होने की वजह से सतत अंदर और बाहर विघटन बना रहता है। कहां भूल हुई जा रही है? कृपा कर दृष्टि दें।

पहली तो बात दूसरों को समझा पाते हो, इसे समझने का सूत्र मत समझ लेना। यह काफी नहीं है। इससे तृप्त मन को जाना। यह दूसरों को समझाना तो ऐसे ही है जैसे कि पोस्टमैन लाकर चिट्ठियां दे जाता है।  मुझे सुना, तुम पोस्टमैन बन गए। चिट्ठियां संभालीं और दे आए दूसरों को। पोस्टमैन के हाथ तो कुछ भी नहीं पड़ता। पोस्टमैन को यहां से वहां चिट्ठियां ले जाता रहता है। इन चिट्ठियों में कई बहुमूल्य होती हैं। इसमें मनीआर्डर भी होते हैं, इनमें धन भी छिपा होता है, इसमें प्रेम भी छिपा होता है। मगर पोस्टमैन तो लादता अपने बस्ते में, अपने झोले में। एक जगह से लाद लेता है, दूसरी जगह जाकर उतार देता है, बांट आता है। पोस्टमैन के हाथ कुछ भी नहीं पड़ता। न तो प्रेम पत्रों का प्रेम पड़ता है, न धन का एक कण पड़ता है; कुछ भी नहीं पड़ता।
तो पोस्टमैन बनो कि प्रोफेसर, फर्क नहीं है बहुत। मुझे सुनकर तुम दूसरे को समझा पाओगे इससे कुछ हल न होगा। तुम नाहक ही पोस्टमैन बन गए। इसे तो भूल ही जाओ। असली बात तो स्वयं समझना है। और स्वयं समझने का प्रमाण क्या है। प्रामाणिकता का पैदा हो जाना ही प्रमाण है। अगर तुमने मुझे ठीक से सुना तो सुनते-सुनते ही तुम्हारे भीतर क्रांति हो जाएगी। इसे अलग से करने की जरूरत पड़े तो समझना कि सुना नहीं, चूक गए। सत्य की यही तो गरिमा है कि अगर तुम समझ लो तो समझते ही मुक्त हो जाते हो। जीसस ने कहा है, सत्य मुक्त करता है। सत्य को सुन लेने से ही मुक्ति हो जाती है।
तुम दो और दो पांच जोड़ रहे थे अब तक, फिर मैंने तुम्हें कहा, दो और दो पांच नहीं होते, दो और दो चार होते हैं। तुमने सुना। क्या तुम अब यह पूछोगे कि अभी मैं क्या करूं कि दो और दो चार हो जाएं? क्योंकि मैं तो दो और दो पांच जोड़ता रहा हूं। तुम यह पूछोगे ही नहीं। तुमने सुना, समझा कि दो और दो चार होते हैं, बस दो और दो चार हो गए। दो और दो चार होते ही थे। तुम जब दो और दो पांच कर रहे थे तब भी दो और दो चार ही होते थे। तुम्हारे किए से पांच नहीं हो रहे थे। इसलिए अब कुछ करना थोड़े ही है! वह तो चार थे ही, सिर्फ तुम्हारी भूल थी।
संसार मात्र गणित की भूल है, समझ की भूल है। ऐसा समझो, तुम जिसको पत्नी कह रहे हो, सदगुरु को सुनकर तुमने समझा कि कौन पत्नी, कौन पति? यहां कौन किसका? फिर तुम थोड़ी पूछने आते हो कि अब मैं कैसे पत्नी को छोडूं? अगर पूछने आओगे कि कैसे पत्नी को छोडूं और कैसे इसे जीवन में लाऊं तो तुम समझे ही नहीं। सदगुरु ने तो सिर्फ इतना कहा था, दो और दो चार होते हैं, दो और दो पांच नहीं होते। तुम लाख मानो कि यह तुम्हारी पत्नी है, तुम्हारा पति है, इससे कुछ फर्क पड़ता नहीं। तुम्हारे मानने से कुछ फर्क नहीं पड़ता। न कोई पति है, न कोई पत्नी है। सुनते ही समझ में नहीं आती बात कि कौन पत्नी कौन पति? धारणा है। सात फेरे लगा लिए तो पति पत्नी हो गए? एक दिन तो पति पत्नी नहीं थे, आज हो गए? कल तलाक ले सकते हैं, फिर नहीं हो सकते हैं। तो यह होना तो केवल एक तरह का एग्रीमेंट, एक तरह का कान्ट्रक्ट, एक तरह का समझौता है, एक तरह की कानूनी बात है। अस्तित्व में इसका कोई अर्थ नहीं है। अस्तित्व में न कोई पति है, न कोई पत्नी है।
अब अगर इसको समझकर तुम आए और बोले कि समझ में तो आ गया, अब कैसे पत्नी से छुटकारा हो? तो समझ में आया ही नहीं। क्योंकि अब किससे छुटकारा मांग रहे हो? जो तुम्हारी कभी थी ही नहीं उससे छुटकारा कैसे मांगोगे? जानने में छुटकारा हो गया। अब भागना थोड़े ही पड़ेगा कि यह मेरी पत्नी नहीं है तो भागूं!
सुना है मैंने, स्वामी रामतीर्थ अमरीका से लौटे। उनके शिष्य थे सरदार पूर्णसिंह। तो दोनों हिमालय में कुछ दिन के लिए रहने के लिए गए। टिहरी गढ़वाल का नरेश उनका भक्त था और उसने उनके लिए दूर पहाड़ पर इंतजाम कर दिया। सरदार पूर्णसिंह उनके सचिव का काम भी कर देते थे। कोई आता तो मिला-जुला देते, चिट्ठी-पत्री लिख देते। अनेक लोग आते। पुरुष भी आते, स्त्रियां भी आतीं। एक दिन रामतीर्थ की पत्नी मिलने आ गई दूर पंजाब से। वर्षों उसे छोड़े हो गए। रामतीर्थ छोड़कर चले गए तो पत्नी को बड़ी तकलीफ थी। बच्चे, बेपढ़ी-लिखी स्त्री! किसी तरफ चक्की चलाकर, आटा पीसकर लोगों के बर्तन मांजकर बच्चों का पालन-पोषण कर रही थी। सुना कि रामतीर्थ वापिस लौट आए है तो दर्शन करने आई। लोग बड़ी प्रशंसा करते हैं, लोग बड़ी खबर लाते हैं। अमरीका में बड़ा प्रभाव पड़ा है, ऐसी खबरें उसके गांव तक आती होगी तो वह उनका दर्शन करने आई। दर्शन करने आने के लिए पैसा भी नहीं था, वह भी उसने आसपास के लोगों से उधार मांगा कि चुका दूंगी धीरे-धीरे करके। जब वह मिलने आई और रामतीर्थ ने देखा कि पत्नी आ रही है अपनी कोठी पर से, तो उन्होंने सरदार पूर्णसिंह को कहा कि मेरी पत्नी आ रही है, दरवाजा बंद कर दो। और इसको किसी तरह समझा-बुझाकर भेज देना। मैं मिलना नहीं चाहता।
सरदार पूर्णसिंह को तो बड़ी चोट लगी। उन्होंने तो कहा तो फिर निर्णय हो जाए। अगर आप अपनी पत्नी से नहीं मिलना चाहते तो मुझे भी छुट्टी दें। मैं भी चला। बात ही खतम हो गई। इतनी स्त्रियां आती हैं, इतने पुरुष आते हैं, किसी से आपने कभी नहीं मिलना चाहता हूं ऐसा नहीं कहा। आपकी पत्नी का क्या कसूर है? क्या आप उसे अब भी अपनी पत्नी मानते हैं?
तब रामतीर्थ को समझ आई। तो गणित के प्रोफेसर थे रामतीर्थ, उनको बात समझ में आ गई कि दो और दो जब चार हो गए तो अब मैं पांच किस हिसाब से मान रहा हूं? जब एक दफा समझ लिया कि कोई पत्नी नहीं, कोई पति नहीं, कोई बेटा नहीं, कोई मां नहीं। यहां सब संबंध नदी-नाव संयोग हैं। रास्ते पर मिल गए हैं, फिर बिछड़ जाएंगे। अलग-अलग रास्ते आ जाएंगे, अपनी अपनी यात्रा पर फिर निकल जाएंगे। दो घड़ी के लिए साथ हो लिए हैं। दो घड़ी के लिए संगी हो गए हैं। दो घड़ी सुख-दुख में मैत्री बना ली है। लेकिन भूल जाने की कोई जरूरत नहीं है कि जल्दी ही रास्ते अलग हो जाएंगे। पत्नी मरेगी तो पति नहीं मरेगा। पति मरेगा तो पत्नी नहीं मरेगी। जल्दी से रास्ते अलग हो जाएंगे। तो हमारी यात्रा तो व्यक्तिगत है, निजी है। दूसरे से संग-साथ तो रास्ते पर मिल गए। तुम घर से निकले, पड़ोसी भी निकला, दोनों रास्ते पर मिल गए। पड़ोसी को बाजार जाना है, तुम्हें स्टेशन जाना है। थोड़ी दूर तक साथ रहा। चौराहा आया, नमस्कार हो गई। कोई स्टेशन चला गया, कोई बाजार चला गया। बात खतम हो गई। बस ऐसा ही है जीवन की इस अनंत यात्रा पर।
जब सरदार पूर्णसिंह ने यह कह कहा तो रामतीर्थ को बड़ी चोट लगी और होश भी आया कि बात तो सच है। जब मैंने यह समझ ही लिया कि मेरी कोई पत्नी नहीं तो आज मैं उसे रोककर जो...रोकने की चेष्टा कर रहा हूं वह तो बड़ी भ्रांति की है। इसका अर्थ है मैं अभी तक समझा नहीं। उन्हें इतनी पीड़ा हुई, इतनी पीड़ा हुई, कि सरदार पूर्णसिंह ने लिखा है कि वे बहुत रोए। पत्नी को बुलाया, मिले। बड़े भाव से मिले। और उसी दिन से उन्होंने गैरिक वस्त्र छोड़ दिए। सरदार पूर्णसिंह ने पूछा, यह आपने क्या किया? आप सफेद कपड़े क्यों पहनने लगे? तो उन्होंने कहा, शायद अभी मैं असली संन्यासी नहीं। शायद मैं अभी योग्य पात्र नहीं गैरिक वस्त्रों का। तुमने मुझे चेताया। तुमने मुझे ठीक चेताया। अच्छा किया तुमने चोट की। तुमने मेरे दंभ को खूब गिराया, मैं तो यही समझ बैठा था कि सब पा लिया। इस छोटी-सी घटना ने सब उघाड़ दिया।
वे आदमी बड़े सरल थे। दंभी होते तो सरदार पूर्णसिंह को निकालकर बाहर करते कि तू शिष्य होकर गुरु को चेताने चला? पहले खुद तो चेत! दंभी होते तो जो कर रहे थे उसको सिद्ध करने के लिए सब तरह का तर्कजाल खड़ा करते। नहीं, स्वीकार कर लिया। न केवल स्वीकार कर लिया, उस दिन से गैरिक वस्त्र न पहने। उस दिन से सफेद वस्त्र ही पहनने लगे। क्यों? कि मैं इनके शायद अभी योग्य नहीं। ये वस्त्र तो अग्नि के रंग के वस्त्र हैं। ये वस्त्र तो जब सारी नासमझी चली जाए, तभी सार्थक हैं। ऐसी विनम्रता साधु का लक्षण है।
तो सवाल यह नहीं है कि तुम दूसरे को समझा सको। सवाल यह है कि तुम स्वयं समझ सको। और स्वयं अगर समझ लो तो फिर यह प्रश्न नहीं उठता कि अब मैं प्रामाणिक कैसे होऊं? समझ अगर ठीक-ठीक बैठ गई तो प्रामाणिक तुम हो गए। प्रामाणिक होना परिणाम में हो जाएगा।
पूछा तुमने, आपको-प्रेमपूर्वक समझा पाता हूं। अब दो बातें हैं। कुछ लोग हैं जो यहां आते हैं, उनका मुझसे कोई प्रेम नहीं है। समझदार लोग हैं। समझने की चेष्टा करते हैं लेकिन प्रेम न होने की वजह से चूक जाते हैं। ये बातें ऐसी हैं कि प्रेम में पगे होकर सुनोगे तो ही समझ में आएंगी, नहीं तो नहीं समझ आएंगी। इन बातें को समझने के लिए बड़ी सहानुभूति, बड़ी श्रद्धा चाहिए। अपूर्व श्रद्धा हो तो ही यह संपदा तुम्हारी हो सकेगी।
तो कुछ लोग हैं जो बुद्धि से सुनते हैं, जिनके हृदय में कोई प्रेम की तरंग नहीं। वे चूक जाते हैं। फिर कुछ लोग हैं जो प्रेम से सुनते हैं लेकिन समझ का अभाव है। बोध नहीं है। मगन हारक सुनते हैं, डूब जाते हैं मगर जिसमें डूब रहे हैं वह क्या है, इसका साक्षीभाव नहीं है। तो उनके जीवन में क्रांति तो हो जाएगी डूबने से लेकिन वे किसी दूसरे को समझाने में कभी सफल नहीं हो पाएंगे। उनके भीतर रूपांतरण तो हो जाएगा। वे परम शिष्य तो बन जाएंगे लेकिन कभी गुरु न बन पाएंगे।
गुरु होने के लिए दो बातें जरूरी हैं। शिष्य जब तुम थे तब प्रेम से सुना हो और समझ और साक्षी से भी। इधर हृदयपूर्वक सुना हो और उधर पूरी प्रतिभा को, बुद्धि को जगाकर रखा हो तो जो तुम्हारे हृदय में घटता हो वह सिर्फ हृदय में ही न घटे, उसकी झनक, उसकी भनक अंकित होती चली जाए तुम्हारी बुद्धि में भी। तो ही तुम दूसरे को समझाने में सफल हो पाओगे। इसलिए बहुत लोग ज्ञान को उपलब्ध हो जाते हैं लेकिन सभी लोग सदगुरु नहीं हो पाते हैं। ज्ञान को उपलब्ध हो जाना एक बात है। तुमने जान लिया, तुमने अनुभव कर लिया तुम डुबकी मार गए। मगर तुम चुप हो जाओगे। तुम मौन हो जाओगे। तुम बोल भी न पाओगे क्योंकि जब तुमने डुबकी मारी तब तुमने सिर्फ हृदय से मार ली। और हृदय बोलता नहीं। हृदय तो चुप है। हृदय समझा नहीं सकता। हृदय समझ तो लेता है लेकिन समझाने में असमर्थ है।
अब एक फर्क को खयाल में लेना। बुद्धि न भी समझे तो भी समझाने में समर्थ है और हृदय समझ भी ले तो समझाने में समर्थ नहीं है। और सदगुरु तो वही बन सकता है जिसका हृदय और जिसकी बुद्धि एक संतुलन में आ जाए। जिसके भीतर यह परम समन्वय घटित हो, यह सिन्यीसिस घटित हो। जिसकी प्रतिभा और जिसका प्रेम समतोल हो।
तुम कहते हो, आपको प्रेमपूर्वक समझ पाता हूं। तुम्हारी समझ तुम्हारे काम नहीं आ रही,इसलिए समझ नहीं हो सकती। और तुम्हारा प्रेम भी तुम्हारी धारणा है। अगर यह प्रेम वस्तुतः हो तो कम से कम तुम्हारे काम आ जाए। अभी तुम्हारे काम बात नहीं आ रही तुम दूसरों को समझा पाते हो। तुम कुशल हो गणित में, तर्क में। तुम निष्णात हो भाषा में। तो तुम दूसरे को समझा पाते हो। मगर दूसरे को समझाने से क्या होगा? और कैसे तुम दूसरे को समझाओगे जो तुम्हारे जीवन में नहीं जला, जो तुम्हारे जीवन में नहीं उमगा? जो फूल तुम्हारे जीवन में नहीं खिला उसकी सुगंध की चर्चा करके किसको समझाओगे? बात में से बात निकलती जाएगी। न सुगंध तुम्हारे पास थी, न सुननेवाले को मिलेगी। और सुननेवाला किसी और को समझाएगा। ऐसे सदियों तक रोग के कीटाणु फैलते चले जाते हैं। इसे रोको। दूसरे को समझाने की तब तक चेष्टा ही मत करना, जब तक तुम्हें समझ में नहीं आ गया।
और तुम्हें समझ आने का प्रमाण क्या है? तुम्हें समझ में आने का प्रमाण यही है कि जब तुम मुझे सुन रहे हो, सुनते ही तत्क्षण कोई बात की चोट पड़ें और तुम्हें दिख जाए। बिजली कौंधे और तुम्हें दिख जाए कि हां, ऐसा है। ऐसा ही है। और उस ऐसे ही है के अनुभव में तुम्हारा जीवन कल से दूसरा हो जाएगा। फिर कल से दो और दो चार होने लगे। कल से क्यों, अभी से, इसी क्षण से दो और दो चार होने लगे। फिर दो और दो पांच दुबारा न होंगे।
आपको प्रेमपूर्वक समझ पाता हूं, औरों को समझा पाता हूं, फिर वही समझ जीवन में प्रामाणिकता लाने में सहायक क्यों नहीं हो पाती है?
यह समझ समझ नहीं है। यह समझ का धोखा है। यह समझदारी है, समझ नहीं। यह जानकारी है, ज्ञान नहीं। इसमें बोध नहीं है। बुद्धि होगी बहुत, विद्वता होगी, लेकिन बोध नहीं है, बुद्धत्व नहीं है।
तुम्हें मेरी बातें चोट करेंगी। तुम थोड़े बेचैन होओगे। क्योंकि मैं यह कह रहा हूं कि तुम्हारे भीतर अभी जो प्रेम है वह भी मन की धारणा है। और तुम जिसे समझ समझ रहे हो वह केवल शब्दों का खेल है। निश्चित तुम्हारा मन बड़ा उदास होगा, बड़ा हताश होगा। लेकिन मैं जाकर ही ये बातें कह रहा हूं। तुम्हें हताश और उदास करना जरूरी है ताकि तुम्हें झटका लगे। नहीं तो तुम इसी रों में बहते चले गए तो तुम मुझसे चूक ही जाओगे। तुम पहले इस हीरे को अपने भीतर डुबा लो। तुम पहले इस किरण को अपने भीतर उतार लो। जल्दी न करो। किसको समझाना है? किससे क्या लेना-देना है? जब तुम्हारे फूल खिलेंगे तो सुगंध दूसरों तक पहुंच जाएगी। पहुंची तो ठीक, न पहुंची तो ठीक। यह तुम्हारा कुछ कर्तव्य नहीं है कि पहुंचनी ही चाहिए।
सुना नहीं? दरिया कहते हैं कि इस पागल संसार को समझाने से क्या होगा? यह तो कितना ही समझाओ, समझ समझकर और उलझ जाता है। जितना सुलझाओ उतना सुलझ जाता है। यह संसार पागल है। तुम पागलों को समझाने में सिर न फोड़ो। तुम इतना ही करो कि अपने पागलपन के बाहर आ जाओ। तुम्हारा पागलपन के बाहर आ जाना ही तुम्हारे द्वारा होनेवाली बड़ी से बड़ी सेवा है। फिर जो भी तुम्हारे पास पड़ जाएगा, जो भी कभी जाने-अनजाने तुम्हारे पास से गुजर जाएगा उसको तुम्हारी सुगंध मिलेगी, तुम्हारा संगीत मिलेगा। उसके भीतर की वीणा कंपित होगी। उसके नासापुट भी किसी अनिर्वचनीय सुगंध से भरेंगे। वह भी शायद अनंत की यात्रा पर निकलने को जिज्ञासु हो जाए।
पर समझाने का गोरखधंधा मत करो। तुम पहले खुद ही पा लो। उस पाने से अगर कुछ किसी को समझाना निकलता हो, ठीक। लेकिन पहले पक्का पता कर लो कि मुझे मिला। अपनी सारी शक्ति नियोजित कर दो समझने में।
प्रामाणिकता सुनकर पैदा नहीं होती। कान से सुनकर पैदा नहीं होती। प्रामाणिकता का अर्थ होता है, बाहर-भीतर एक। जैसा दरिया ने कहा, साधु का लक्षण बताया कि बाहर-भीतर एक। जैसा भीतर, वैसा बाहर। जिसके भीतर बहुत-बहुत परत नहीं, जिसके भीतर बहुत मन नहीं, जिसके भीतर एक ही धारा है, अनेक-अनेक खंडों में बंटी हुई धारा नहीं है, जिसके भीतर बहुत स्वर नहीं है, भीड़ नहीं है, और जिसके चेहरे पर कोई मुखौटे नहीं हैं, जिसके पास मौलिक चेहरा है--वही जो परमात्मा ने उसे दिया, वही जो उसका अपना है। बस, निज पर ही जिसका भरोसा है। यह प्रामाणिकता है।
लेकिन यह प्रामाणिकता कैसे पैदा हो? तुमने अगर इसको कैसे से जोड़ा तो अड़चन में पड़ जाओगे। क्योंकि प्रामाणिकता तुम्हारे पैदा करने की बात ही नहीं। तुम जो भी पैदा करोगे वह अप्रामाणिक होगा। अब इसे खूब संभालकर हृदय में रख लो। तुम जो भी पैदा करोगे वह अप्रामाणिक होगा। तुम पैदा करोगे वह प्रामाणिक कैसे हो सकता है? प्रामाणिक तो परमात्मा पैदा कर चुका है। तुम पूछते हो, मैं असली चेहरा कैसे लगाऊं? असली चेहरा लगाया नहीं जाता। असली चेहरा तो है ही। नकली चेहरे लगाए जाते हैं। तो तुम जो भी लगाओगे वह नकली होगा। जो लगाया जा सकता है वह नकली होगा। तो यह तो पूछो मत कि ठीक, अब नकली चेहरा लगाऊंगा नहीं; तो असली कैसे लगाऊं! मगर तुम लगाने की बात पकड़े ही हुए हो। तुम कहते हो लगाऊंगा तो ही। चलो, नकली न लगाएंगे, असली लगाएंगे। मगर असली लगाया जाता है? असली तो वही है जो तुम्हारे बिना लगाए लगा हुआ है। तुम जिसे निकालना भी चाहो, अलग भी करना चाहो तो न अलग कर सकोगे वही असली है। जिसको हम कभी नहीं चूकते और जिसको हम कभी नहीं खोते और जिससे हम कभी नहीं अलग होते वही असली है; वही प्रामाणिक है। तो करना क्या है? सिर्फ नकली को देख लेना है कि नकली है। बस, फिर हाथ रुक जाएंगे नकली को लगाने से।
कृष्णमूर्ति कहते हैं, जिसने नकली को नकली की तरह देख लिया उनको असली उपलब्ध हो जाता है। असार को असार की तरह देख लेना सार को पा लेना है। अंधेरे को अंधेरे की तरह पहचान लेना बस पर्याप्त है रोशनी की तरफ जाने के लिए।
तो तुम प्रामाणिक होने की चेष्टा मत करना, चेष्टा मात्र अप्रामाणिकता में ले जाती है। प्रामाणिकता साधी नहीं जाती। प्रामाणिकता तो तुम जब सब साधना छोड़ देते हो तब जो बच रहती है, वहीं हैं। प्रामाणिकता घटती है, घटाई नहीं जाती। उसकी काई व्यवस्था नहीं होती, कोई विधि-विधान नहीं होता। वह तो हो ही चुका है। वह तो तुम लेकर ही आए हो। असली चेहरा तो तुम मां के पेट से लेकर आए थे। उसके लिए किसी स्कूल किसी विद्यालय, किसी विद्यापीठ की कोई जरूरत नहीं है। तुमने जो सीख लिया उसे अनसीखा हो जाने दो। और तुम अचानक पाओगे, जो तुम्हारा है वह उभरकर ऊपर आ गया। नकली की...नकली के साथ तुम्हारी जो आसक्ति है वह टूट जाए। और कैसे नकली के साथ आसक्ति टूटेगी? आसक्ति है वह टूट जाए। और कैसे नकली के साथ आसक्ति टूटेगी? आसक्ति क्यों है? क्योंकि तुम नकली को असली मानते हो।  जिस दिन नकली नकली दिख जाए उसी दिन आसक्ति टूट जाती है।
तुम एक पत्थर का टुकड़ा हीरा मानकर अपनी तिजोरी में संभालकर रखे थे। सोचते थे हीरा है। परख तो थी नहीं हीरे ही। पारखी तो तुम थे नहीं, जौहरी तो तुम थे नहीं। रास्ते पर पड़ा मिल गया था; चमकता था तो तुमने सोचा हीरा है। तो तुमने संभालकर रख लिया। डर के मारे किसी को बताया भी नहीं कि कहीं पता चल जाए, कि चोरी इत्यादि की झंझट खड़ी हो कि कहां से लाए, किसका है, कैसे मिला? तो किसी को बताया भी नहीं। जल्दी से तिजोड़ी में संभालकर रख दिए। अब तुमने इसकी फिक्र करनी शुरू की कि असली है या नकली। तुम किसी जौहरी से दोस्ती कर लिए। सत्संग कर लगे। जौहरी के दुकान पर बैठने लगे। देखने लगे, कैसे परखता है हीरे को! असली हीरे की परख क्या है! धीरे-धीरे जौहरी की दुकान पर बैठते-बैठते तुमको भी समझ में आने लगा कि असली क्या, नकली क्या, कांच के टुकड़े क्या हैं। तुमको भी समझ में आने लगा। जो दरिया कहते हैं कांच-कांच सो कांच, सांच सांच सो सांच, तो तुम पहचानने लगे कि कांच क्या है, सांच क्या है। फिर एक दिन आए, अपनी तिजोड़ी खोली, देखा उठाकर वह कांच का टुकड़ा था।
अब इसका त्याग करने के लिए कुछ आयोजन करना होगा? इसको छोड़ने के लिए कोई जलसा, गांव को निमंत्रण करना होगा? इसके त्याग के लिए कोई जुलूस, कोई शोभायात्रा निकालनी पड़ेगी? डुंडी पिटवाओगे, अखबार में खबरें छपवाओगे कि एक हीरे का त्याग कर रहे हैं? यह कांच का टुकड़ा है, बात खतम हो गई। अब तुम किससे पूछने जाओगे कि हीरे को कैसे छोड़ें? अगर तुम पूछते हो हीरे को कैसे छोड़ें तो अभी तिजोड़ी में संभालकर रख लो। अभी हीरा है, छोड़ोगे कैसे? अगर कांच का टुकड़ा दिखाई पड़ गया तो बात खतम हो गई। अब पूछना क्या है? किससे पूछना है? तुम एक क्षण भी यहां वहां न जाओगे। बच्चों को दे दोगे कि खेलो। तिजोड़ी बंद करके सोचोगे, कहां इतने दिन तक कचरे को तिजोड़ी में रखें रहें! बात खतम हो ही गई। जिस दिन तुम्हें कांच-कांच कि तरह दिख गया उस दिन बात खतम हो गई।
मेरी बातें सुनते-सुनते, तुम ऐसे प्रश्न अपने मन में कभी मत उठाओ कि कैसे इन्हें साधें? बस, वहां चूक हो रही है। तुम मेरी बातों को ठीक से सुन लो। आंख से सुन लो। ठीक से परख लो, क्या कहा जा रहा है, क्यों कहा जा रहा है। उसकी सब भाव-भंगिमाएं पहचान लो। यह तो जौहरी की दुकान है। इस पर बैठे-बैठे, आते-जाते, सत्संग करते-करते तुम्हें समझ आ जाएगी कि असली हीरा क्या, नकली हीरा क्या, फिर नकली हीरा तुम फेंक दोगे। और जब सब नकली हीरे फेंक दिए जाते हैं तब तुम्हारे भीतर जो असली है ही, वह प्रगट हो जाता है। नकली के ढेर में खो गया है असली। असली लाना नहीं है। असली लाया नहीं जा सकता। असली तो तुम हो। असली हीरा तो तुम हो। तुम ही हो, जिसकी तुम तलाश कर रहे हो। खोजनेवाले में ही खोज का अंतिम लक्ष्य छिपा है। साधक में ही सिद्ध बैठा है। तुम्हारे भीतर परमात्मा का वास है। पर तुमने अपनी तिजोड़ी में इतना कूड़ा-करकट इकट्ठा कर लिया है। जो मिला सो उठा लाए, जो मिला सो उठा लाए, जहां मिला सो उठा लाए।
मैं एक सज्जन के घर में कुछ वर्षों तक रहा। उनका ढंग यह था कि उनको कोई भी चीज कहीं पड़ी मिल जाए तो उठा लाएं। नया-नया था तब तो मैं देखता रहा कि बात क्या है। वह थोड़ा संकोच भी करते थे फिर जब मैं कई महीने वहां रहा तो उन्होंने फिर संकोच भी छोड़ दिया। फिर तो वे बेधड़क मेरे सामने उठाकर ले आते थे सड़क पर। पैसेवाले आदमी थे, बड़ा उनका बंगला था, मगर कोई भी चीज उठा लाते।
एक दिन मैंने देखा कि साइकिल का टूटा हुआ हैंडल कचरेघर में किसी ने फेंक दिया होगा, वह उठाकर उसको साफ करते चले आ रहे हैं। मैंने उनसे पूछा कि मुझे पूछना तो नहीं चाहिए, मगर अब जरा हट हो गई। यह साइकिल का हैंडल क्या करोगे? उन्होंने कहा, अरे कुछ मत पूछो। पैडल में पहले ही रखे हूं और हैंडल भी आ गया। इसी तरह धीरे-धीरे करके पूरी साइकिल आ जाएगी। पैडल वे पहले ही कभी के उठा लाए हैं, कह रहे हैं। आज हैंडल भी हाथ आ गया। किसी दिन फ्रेम भी मिल जाएगा, फिर किसी दिन कैरियर मिल जाएगा। ऐसी आशा में इकट्ठा करते जा रहे हैं। धीरे-धीरे जब उनसे मेरी पहचान भी बढ़ गई, ऐसे तो मैं उनका किरायेदार था लेकिन वह कभी मुझे घर में नहीं बुलाते थे। घर में वे किसी को नहीं बुलाते थे। जब पहचान बढ़ गई तो कभी उन्होंने मुझे घर में बुलाया। घर में देखा तो मैं हैरान हो गया। वह तो कबाड़खाना था। वहां तो ऐसी-ऐसी चीजें देखी जिनका कोई भरोसा ही नहीं करे कि किसलिए आदमी रखे होगा। घर में जगह ही नहीं थी। सब तरह का कूड़ा-करकट भरा हुआ था। अब अगर तुम सड़कों से उठा-उठा लाओगे इस तरह की चीजें--इस आशा में कि पैडल भी मिल गया, अब हैंडल भी मिल गया, अब इसी तरह एक दिन साइकिल भी बन जाएगी। इस आशा में साइकिल बनाओगे तो तुम्हारे घर की हालत तुम समझ सकते हो।
मैंने उनसे पूछा कि इस कूड़े-कबाड़ में रह रहे हो, इस शानदार बंगले में रह सकते थे। इस कचरे में रह रहे हो। वे हंसे। वे इस तरह हंसे जैसे समझदार नासमझों की बातों पर हंसा है। उसने कहा, आप क्या समझो! अव्यावहारिक आदमी हो आप, यह व्यवहार की बात है। आप देखना धीरे-धीरे, इनमें एक-एक चीज काम में आ जाएगी। वे उसी कचरे में रहते-रहते मर गए। उनके मरने के बाद जब उनकी पत्नी ने सफाई की उस घर की तो उसमें कुछ भी बचाने योग्य नहीं था। वह भी मैंने अपनी आंख से देखा कि एक ठेला भरके कूड़ा-कबाड़ सब तरह का निकालना पड़ा। उसमें कुछ भी बचाने योग्य न था।
तुम अगर अपनी जिंदगी में गौर से देखोगे तो तुमने बहुत सा कूड़ा-करकट इकट्ठा कर लिया है। भीतर तुम कचरा ही कचरा इकट्ठा किए बैठे हो। इस कचरे के कारण जो असली है वह दिखाई नहीं पड़ रहा। असली दब गया कचरे में। असली को पाना नहीं है, असली तो मिला ही हुआ है। सिर्फ नकली से छूट जाना है। अब नकली से छूटने के लिए क्या करना होता है? नकली नकली है ऐसी समझ भर आ जाए, पर्याप्त। इतनी ही समझ सदगुरु के पास आ जाती है। सत्संग का इतना ही सार है।
तुम यह तो पूछो मत कि प्रामाणिकता कैसे लाऊं? अगर तुम्हें अप्रामाणिकता की बात समझ में आ गई कि अप्रामाणिक होने में दुख है, तुम्हें समझ में आ गया कि अप्रामाणिकता आदमी को विक्षिप्तता की तरफ ले जाती है; बाहर कुछ, भीतर कुछ--तो तुम दो आदमी हो गए। और इन दोनों आदमियों में निरंतर संघर्ष होगा, निरंतर कलह होगी, निरंतर झंझट होगी। कुछ कहोगे, कुछ करोगे। तुम्हारा सारा जीवन झूठ का एक व्यवसाय हो जाएगा। फिर तुम्हें याद रखनी पड़ेगी कि किससे क्या कहा।
सत्य के साथ एक सुविधा है, सत्य को याद नहीं रखना पड़ता। कह दिया, बात खतम हो गई। फिर अगर कोई दस वर्ष बाद भी पूछेगा तो भी तुम सत्य ही तो कहे हो तो फिर सत्य कह दोगे। लेकिन अगर झूठ कहा तो याद रखना पड़ता है। कहीं भूल न जाओ। झूठ बोलनेवाले को याद रखना पड़ता है कि यह झूठ बोला। फिर एक झूठ बोलने के लिए दस झूठ बोलने पड़ते हैं। क्योंकि उसे छिपाने के लिए दस का इंतजाम करना पड़ता है। दस के लिए सौ बोलने पड़ते हैं, सौ के लिए हजार। और ऐसे झूठ की भीड़ बढ?ती चली जाती है। और फिर सब याददाश्त...।
रूस में एक कहावत है कि झूठ बोलनेवाले की स्मृति बहुत अच्छी होती है। होनी ही चाहिए। सच बोलनेवाले को स्मृति से क्या लेना-देना! न भी हुई तो चलेगा। झूठ बोलनेवाले के पास तो अच्छी याददाश्त चाहिए ही। पत्नी से कुछ बोले, बेटे से कुछ बोले, नौकर से कुछ बोले, दफ्तर में कुछ बोले, बाजार में रास्ते पर कोई मिल गया उससे कुछ बोले। अब सब हिसाब रखो। शताबधनी होना चाहिए। सबका हिसाब रखो, किससे क्या बोले। और फिर किस-किससे क्या-क्या झूठ और बोलनी है आगे और। एक की झूठ दूसरे से पकड़ में न आ जाए। और दूसरा तीसरे से न कह दे। और कोई जाल न खड़ा हो जाए। तो आदमी इस जाल से बचने के लिए जाल को बड़ा करता चला जाता है। धीरे-धीरे तुम झूठ के पहाड़ में दब जाते हो।
तुम्हारी छाती पर मैं झूठ का हिमालय रखा हुआ देखता हूं। उस हिमालय के नीचे तुम्हारी छोटी सी जो धारा थी कल-कल झरने की, वह जो तुम्हारी जीवंत धारा थी चेतना की, वह दब गई है, अवरुद्ध हो गई है।
प्रामाणिक होने का अर्थ है, अप्रामाणिक होने में दुख दिखाई पड़ जाए। अप्रामाणिक होने में कष्ट, उलझन, दुविधा, बेचैनी, तनाव, विक्षिप्तता दिखाई पड़ जाए। अप्रामाणिक होने में नर्क बन रहा है यह दिखाई पड़ जाए। बस, बात खतम हो गई। फिर तुम क्यों नर्क बनाओगे? तुम तो इसी आशा में बना रहे हो कि यह स्वर्ग है। दिखाई पड़ जाए कि नर्क है, तुम बनाना बंद कर दोगे। दिखाई पड़ जाए कि नर्क है, तुम तत्क्षण इसके बाहर आ जाओगे। इसको ही मैं संन्यास कहता हूं।
मेरे संन्यास की परिभाषा इतनी ही है कि तुम्हें दिखाई पड़ गया कि कैसे तुम नर्क बनाते हो। अब नर्क नहीं बनाएंगे। और जो बना लिया है उसकी घोषणा कर देंगे कि भई अब उससे हमें क्षमा कर दो। जो कहा-सुना था, सब झूठा था। अब हम उस झंझट में नहीं रहे, बाहर हो गए। अब आज से हम सीधा और सरल रखा बुद्ध जीवन जीएंगे। आज से हम वही कहेंगे जो सच है। और वही जीएंगे जो सच है--चाहे जो परिणाम हो। क्योंकि झूठ का परिणाम देख लिया।
झूठ बड़ी आशाएं दिलाता है। झूठ बड़ा अदभुत सेल्समैन है। वह बड़ी आशाएं दिलाता है। झूठ बड़ा राजनीतिज्ञ है। वह बड़े भरोसे दिलाता है कि यह करेंगे, वह करेंगे, ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे। एक बार मुझे वोट भर दे दो। एक बार मेरे साथ खड़े हो जाओ। झूठ बड़े आश्वासन देता है लेकिन कभी पूरे नहीं करता। एक भी आश्वासन झूठ पूरा नहीं कर सकता। झूठ ने कभी कोई आश्वासन पूरा नहीं किया है। सिर्फ लटकाए रहता है आश्वासनों के आधार पर। झूठ तो ऐसा है जैसे मछली को पकड़ते हैं कांटे पर आटा लगाकर। तो झूठ तो कांटा है और आश्वासन आटा है। झूठ कहता है, ऐसे-ऐसे सुख के सब्ज-बाग दिखाता है। स्वर्ग बनाएंगे, बहिश्त बनाएंगे तेरे लिए। इतना ऊंचा जीवन ला देंगे। जरा हमारे साथ चल। वह स्वर्ग कभी आता नहीं, आता नर्क है। आता दुख है। आता विषाद, संताप है। इसमें जागकर जो देख लिया...इतना ही यहां तुम्हें घट जाए कि इतना ही तुम्हें दिखाई पड़ने लगे कि अब और झूठ के घर नहीं बनाने हैं।
बुद्ध को जब पहली दफा ध्यान हुआ, समाधि पहली दफा लगी तो उन्होंने जो पहले वचन बोले वे बड़े बहुमूल्य हैं। उन्होंने आकाश की तरफ मुंह उठाकर कहा कि हे मेरे गृह कारक! मेरे घर बनानेवाले! अब तुझे मेरे लिए और घर न बनाने पड़ेंगे। अब मैं मुक्त हो गया। किससे कह रहे हैं वे कि हे गृह कारक, हे मेरे घर बनानेवाले, अब तुझे मेरे लिए और घर न बनाने पड़ेंगे? अब मैं मुक्त हो गया। अब मैं स्वतंत्र हो गया। अब मेरे लिए और देह न बनानी पड़ेगी। और मेरे लिए नर्क न बनाने पड़ेंगे। और मेरे लिए कारागृह न बनाने पड़ेंगे और मेरे लिए जन्म नहीं है अब। अब बात खतम हो गई। मैंने देख लिया। जैसा है, उसे देख लिया। अब मैं तेरे आश्वासनों में,तेरी आशाओं में न पडूंगा।
बुद्ध ने कहा, धन्यभागी हैं वे, जिनकी आशा मर जाती है। बड़ी अजीब सी बात है। धन्यभागी है जो परिपूर्ण रूप से निराश हो जाते हैं। क्यों? निराशा में धन्यभाग? समझोगे तो बड़ी बहुमूल्य बात है। क्योंकि जो बिलकुल निराश हो गया, जिसने देख लिया कि आशा यहां पूरी होती ही नहीं, उसको फिर झूठ धोखा नहीं दे पाएगा। फिर कोई आश्वासन झूठ देकर उसे फुसला न पाएगा। फिर झूठ कोई बिक्री न कर पाएगा, कुछ बेच न पाएगा उसे। उसकी आशा ही छूट गई। आशा को ही हम फासला लेते हैं। आशा के ही साथ झूठ का संबंध जुड़ जाता है। जो परम निराश हो गया--चाहे इसे तुम विराग कहो, चाहे नैराश्य कहो, चाहे उदासीनता कहो, कुछ फर्क नहीं पड़ता। बात एक ही है। जिसने देख लिया कि यहां कुछ भी मिलता नहीं। बस बातें हैं।
मैंने सुनी है एक कहानी। एक आदमी ने बहुत दिन तक शिव की भक्ति की। वर्षों की तपश्चर्या के बाद शिव प्रगट हुए और पूछा, तू चाहता क्या है? वह आदमी अपना शंख बाजा रहा था। वर्षों से बजा रहा था भगवान के समाने बैठ-बैठकर। तू चाहता क्या है? तो उसने कहा कि मुझे कोई वरदान दे दें। क्या वरदान चाहता है? तो उसने कहा कि यह मेरा शंख रहा, यही मुझे वरदान दे दें कि शंख से जो भी मैं मांगूं वह मुझे मिल जाए। शिव ने कहा, तथास्तु। वे तो तिरोहित हो गए।
वह आदमी अपने शंख से जो भी मांगता उसे मिल जाता। लाख रुपए चाहिए और छप्पर फूटता और लाख रुपए गिर जाते। बड़ा मकान चाहिए और सुबह आंख खोलता और मकान खड़ा हुआ। वह बड़ा प्रसन्न रहने लगा।उसकी बड़ी कीर्ति फैल गई दूर-दूर तक। दूर-दूर से लोग उसके दर्शन करने आने लगे कि यह बड़ा चमत्कारी पुरुष है। कैसा यह घट रहा है? इसको कौन सा अटूट खजाना मिल गया है।
एक संन्यासी भी आया। संन्यासी रात रुका। रात जब संन्यासी अपने कमरे में अकेला था, उसने अपने झोले से एक शंख निकाला-बड़ा शंका। वह गृहस्थी भी बगल के कमरे में था, उसके पास छोटा शंख था। उस संन्यासी ने अपने शंख से कहा, लाख रुपए चाहिए। उसके शंख ने कहा, लाख में क्या होगा, दो लाख ला दूं? गृहस्थ चौंका कि यह तो गजब हो गया। मैं मांगता हूं, लाख ही देता है मेरा शंख। यह असली चीज तो इसके पास है। लाख मांगो, दो लाख बताता है। कहता है, दो लाख ला दूं? उसने सुबह संन्यासी के चरण छुए। कहा महाराज, आप संन्यासी, वीतरागी पुरुष! आप यह किसलिए रखे हुए हैं? मुझ गरीब को दे दें। हम तो लोभी, कामी। और ऐसा भी नहीं कि मैं आपको कुछ न दूंगा। मैं आपको  अपना शंख दे देता हूं। यह मेरा शंख है। मगर आपके पास महाशंख है, बदल लें। संन्यासी ने कहा, जैसी तुम्हारी मर्जी। हम तो संन्यासी आदमी। चलो छोटा ही शंख ले लेंगे।
छोटा शंख लेकर संन्यासी नदारद हो गए। रात हुई, गृहस्थ ने अपना महाशंख निकाला, उससे कहा कि लाख रुपए। महाशंख बोला लाख में क्या होता, दो लाख ले ले। उसने कहा चलो दो लाख। महाशंख बोला, चार ले लेना। उसने कहा, चलो चार। उसने कहा, अरे आठ! मगर वह शंख आगे ही बढ़ता जाए, दे  इत्यादि कुछ भी नहीं। तब वह घबड़ाया। उसने कहा, भई कुछ देगा भी? उसने कहा लेना-देना किसकी? तू जितना मांगेगा, दुगुना हम देंगे। लेना-देना बिलकुल नहीं, बस दुगुना हम देंगे। तू मांग, जितना तुझे मांगना हो। तब उसने छाती पीट ली।
झूठ महाशंख है। झूठ बड़े आश्वासन देता है। अप्रामाणिकता के बड़े आश्वासन हैं। तुम्हें यह समझ में आ जाए तुम अप्रामाणिकता से निराश हो जाओ, बस पर्याप्त। कुछ करने का नहीं है। धीरे-धीरे अप्रामाणिकता तुम्हारे हाथ से छूटकर गिर जाएगी। वह जाल फिर सक्रिय न रह जाएगा। फिर जो बचेगी जीवंत धारा वही प्रामाणिकता है।

तीसरा प्रश्न: कभी-कभी रात में आपसे मुलाकात हो जाती है। क्या यह सपना है? और कभी-कभी ऐसा स्वाद अनुभव होता है जैसा कभी नहीं जाना था। तो यह क्या है?

पहली बात, जीवन जितना तुम जानते हो उससे बहुत ज्यादा है। जीवन जितना तुम पहचानते हो, उससे बहुत बड़ा है। इसलिए अगर इसी जीवन को तुमने सच मान लिया तो फिर और कोई भी नई घटना घटेगी तो तुम्हें लगेगी सपना है। तुमने बड़ी सीमित परिभाषा कर ली जीवन की। तुमने अगर यह मान लिया कि जीवन में बस कंकड़-पत्थर ही होते हैं तो किसी दिन अगर कोहिनूर मिल जाएगा तो तुम कहोगे, सपना है। हो कैसे सकता है? तुमने अगर दुख ही दुख को जीवन मान लिया तो सुख ही किरण उतरेगी तो तुम्हें लगेगा सपना है। हो कैसे सकता है?
ऐसा रोज घटता है यहां। लोग दुख पर तो बड़ा भरोसा करते हैं, सुख पर उनका बिलकुल भरोसा नहीं रहा। और बात भी साफ है। सुख जाना ही नहीं कभी, तो भरोसा कैसे हो? जब यहां किसी को ध्यान करते-करते, पकते-पकते स्वाद आना शुरू होता हैं तो उसे बड़ी ....प्रश्नों के जाल उठने लगते हैं उसके भीतर। मेरे पास लोग आकर पूछते हैं, बड़ा सुख मिल रहा है। क्या सह सपना है? ये वे ही लोग हैं जिन्होंने बड़ा दुख पाया और कभी नहीं पूछा था कि बड़ा दुख मिल रहा है, क्या यह सपना है?
दुख पर तुम्हारी बड़ी आस्था है। दुख पर तुम जरा भी संदेह नहीं करते। सुख पर तुम्हारी जरा भी आस्था नहीं है। स्वभावतः जिस पर तुम्हारी आस्था है उसी से तुम्हारा मिलना हो जाता है, बार-बार आस्था के कारण ही। वही मेहमान तुम्हारे घर आता है, वही अतिथि तुम्हारे घर आता है, जिसको तुम पुकारते हो। सुख आ भी जाए तो तुम दरवाजा बंद कर लेते हो। तुम कहते हो, कहीं यह सपना तो नहीं है? सुख और मेरे घर? पूछा है पुष्पा ने। क्या, सुख को स्वीकार करने में ऐसी क्या अड़चन है?
मैंने सुना है एक मनोरोगी अपने मनोचिकित्सक के पास वर्षों से विश्लेषण करवा रहा था। और रोज-रोज नए-नए दुख लाता था कि ऐसा दुख हो रहा है, वैसा दुख हो रहा है। आज यह दुख, कल वह दुख। मनोविश्लेषक भी थक गया था, ऊब गया था इनकी बकवास सुनते-सुनते। और इसका कोई अंत ही नहीं था। पागलपन का कभी कोई अंत ही होता नहीं। पागलपन बड़ा ही अन्वेषक है। वह रोज-रोज नई चीजें खोज लेता है। बड़ा आविष्कारक है पागलपन। थकता नहीं। मनोवैज्ञानिक थक गया, बीमार नहीं थका था। आखिर मनोवैज्ञानिक ने उससे पिंड छुड़ाने के लिए कहा कि भई, तू एक दोत्तीन सप्ताह के लिए पहाड़ चला जा; उससे बड़ा लाभ होगा। इसको होगा कि नहीं होगा इससे मतलब नहीं था, लेकिन दोत्तीन सप्ताह के लिए इससे छुटकारा हो, तो मनोवैज्ञानिक को कुछ लाभ हो। समझा-बुझाकर उसको किसी तरह पहाड़ भेजा। चला गया स्विटझरलेंड। पैसे वाला आदमी! आखिर पैसे वाला होना ही चाहिए नहीं तो आदमी इतना पागलपन कैसे चलाएं? सुविधा तो होनी ही चाहिए, संपदा तो होनी ही चाहिए। गरीब तो पागल नहीं हो सकते। अमीर ही पागल हो सकते हैं।
इसलिए जो देश जितना अमीर हो जाता है उतना पागलपन से ग्रस्त हो जाता है। अब मनोवैज्ञानिक गरीब को तो मिल ही नहीं सकता विश्लेषण करने को। महंगा काम है। पश्चिम में तो लोग अकड़ बताते हैं कि हम फलां मनोवैज्ञानिक के पास जाते हैं। तुम किसके पास जाते हो? गरीब आदमी तो मनोवैज्ञानिक के पास जा ही नहीं सकता। उसकी बड़ी महंगी फीस है। तो यह भी एक आभूषण है।
वह स्विटझरलेंड चला गया। दूसरे दिन ही उसका तार आया मनोवैज्ञानिक के पास। मनोवैज्ञानिक तो निश्चिंत हो रहा था कि अब झंझट नहीं। आज ये सज्जन न आएंगे। मगर तार आ गया उनका। तार में उसने लिखा था: फीलिंग वेरी हेप्पी, व्हाय? बड़ी  खुशी मालूम पड़ती है। क्यों? जवाब चाहिए। तुरंत जवाब दो।
अगर जीवन में सुख मिल रहा है तो क्यों पूछते हो क्यों? दुख को तो कभी नहीं पूछते। क्रोध आता है तो क्यों नहीं पूछते, यह सपना तो नहीं है? कभी पूछा? मैंने अब तक आदमी नहीं पाया जिसने पूछा हो कि यह क्रोध उठता है, यह कहीं सपना तो नहीं है? यह मेरे भीतर घृणा उठती है, यह सपना तो नहीं है? यह किसी आदमी को मार डालने का भाव आता है, यह सपना तो नहीं है? यह सब सच है। इसमें तुम कभी शक ही नहीं करते। तुम्हारी श्रद्धा भी बड़ी अजीब है। उलटी खोपड़ी मालूम होती है तुम्हारी। जब सुख की किरण आती है, तत्काल संदेह खड़ा हो जाता है। सुख की किरण को अंगीकार करो। तुम जिसे अंगीकार करोगे वह बढ़ेगा। तुम जिसे स्वीकार करोगे वह रोज-रोज आएगा। तुम जिसे श्रद्धा से हृदय खोलकर अतिथि की तरह अभिनंदन करोगे, उसके आने की संभावना बढ़ती जाएगी।
दुख पर संदेह करो। संसार सपना है, परमात्मा नहीं। मगर लोग संसार को सच मानते हैं और परमात्मा को सपना मानते हैं। परमात्मा परम आनंद है; आनंद ही आनंद है, सच्चिदानंद है। इसलिए तो लोग कहते हैं, परमात्मा कहां? आनंद ही नहीं जाना। आनंद दूर, सुख नहीं जाना। सुख दूर, शांति नहीं जानी। कैसे परमात्मा को मान लें? पत्थरों को मान सकते हैं, परमात्मा को नहीं मान सकते। पत्थर सच मालूम पड़ते हैं।
इसको बदलो। इस बदलाहट की बड़ी जरूरत है। जब सुख की किरण आए तक भरोसा करो। जब प्यार उमगे, भरोसा करो। जब शांति लहराए, भरोसा करो। यही श्रद्धा है। श्रद्धा का अर्थ यह नहीं होता कि हिंदू हो जाओ, मुसलमान हो जाओ। श्रद्धा का यह अर्थ नहीं होता कि मंदिर में जाकर सिर पटक आए कि मस्जिद में जाकर कुरान की आयतें दोहरा लीं। श्रद्धा का अर्थ होता है, जब परमात्मा द्वार खटखटाए, स्वीकार करो। अनूठे ढंग से आता है परमात्मा; तुम्हारी बंधी-बंधाई लकीरों से नहीं आता। परमात्मा के आने के ढंग बड़े रहस्यपूर्ण हैं।
अब यह पुष्पा ने पूछा है, कभी-कभी रात में आप से मुलाकात हो जाती है। तो ही जाने दो। कुछ बुरा नहीं हो रहा। अच्छा ही हो रहा है। रात में क्यों हो रही है? दिन में तुम्हारा संदेह से भरा हुआ मन बहुत ज्यादा मौजूद है। दिन में तुम मुझे मौका न दोगे। रात में ही चोरी-छिपे तुममें प्रवेश हो सकता है।  दिन में तो तुम बड़े सजग रहते हो पहरा देते। दिन में तो तुम बंदूक लिए खड़े रहते। दूसरों की तो बात छोड़ो, तुम मुझे भी दिन में अपने भीतर प्रवेश नहीं होने दोगे। तुम कहते, कहां चले। भीतर मत जाइए, बाहर ही बैठिए। यह बैठकखाना रहा। सबने बैठकखाने बना लिए हैं, वहां से अंदर नहीं जाने देते। बैठकखाने से भीतर प्रवेश नहीं करने देते। खोपड़ी तुम्हारा बैठकखाना है। बस वह बैठने के लिए है; वह ठहरने के लिए नहीं है ध्यान रखना। वह जिनको दो मिनट में बिठाकर और विदा कर देना है...।
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक दिन अपने घर का दरवाजा खोला। सज्जन एक प्रवेश किए--मित्र थे, बड़े दिनों बाद आए थे--तो जल्दी से वह मुड़ा। मित्र ने पूछा कि कहीं जा रहे थे? वह हाथ में छड़ी लिए, टोपी लगाए। उसने कहा कि नहीं यह मेरी तरकीब है। उसने कहा, क्या मतलब? मुल्ला ने कहा, यह मेरी तरकीब है। जब भी कोई आता है, मैं जल्दी से टोपी लगाकर छड़ी हाथ लेकर दरवाजा खोलता हूं। उसने कहा, मैं समझा नहीं। बात का मतलब क्या है? उसने कहा कि मतलब यह है कि अगर देखा कि इन सज्जन से नहीं मिलना है तो मैं कहता हूं, मैं बाहर जा रहा हूं। और अगर इनसे मिलना है तो मैं कहता हूं, मैं बाहर से आ रहा हूं। और वह छड़ी और टोपी इसका सबूत होती है। दोनों हालत में काम आती है।
फिर जिनको सदा के लिए नहीं ठहरा लेना है उनको हम बैठकखाने में बिठाते हैं। बैठकखाने का मतलब यह होता है कि आए, बड़ी कृपा की। अब जल्दी  कृपा करो और जाओ भी। बड़ी खुशी हुई, आए। इससे भी ज्यादा खुशी होगी, जाओ। बैठकखाने का का मतलब ही होता है सिर्फ बैठो। बैठ भी न पाओ ठीक से, बस।
सिर तुम्हारा बैठकखाना है। दिन में तो तुम मुझे सिर से ज्यादा गहरे नहीं जाने देते। रात कभी-कभी जब तुम बेहोश हो जाते हो, जब तुम्हारा पहरेदार खो जाता है, जब तुम्हारी सजगता, सावधानी, सावचेत काम नहीं करती, तब कभी तुम्हारे हृदय के करीब आने का मौका मिलता है।
इसलिए पुष्पा, रात में मुलाकात होती होगी। अगर होती रही रात में भी होनी शुरू हो जाएगी। मगर अभी रात में हो रही है, यह भी सौभाग्य। रात में तुम ज्यादा सरल होते हो।
इसलिए तो मनोवैज्ञानिक के पास अगर तुम जाओगे तो वह तुम्हारे सपनों की पूछता है, तुम्हारे दिन की नहीं पूछता। वह यह नहीं कहता कि दिन में तुमने क्या किया, क्या सोचा। दिन में तो तुम इतने झूठे हो, दिन में तो तुम इतने पाखंडी हो कि तुम्हारी दिन की बातों का कोई हिसाब रखने की जरूरत ही नहीं है। मनोवैज्ञानिक पूछता है, रात सपने क्या देखे?
क्यों? मनोवैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचा है कि तुम्हारे सपने तुम्हारे जागने से ज्यादा सच होते हैं। क्यों? क्योंकि सपनों में तुम धोखा नहीं देते। सपनों में तुम धोखा दे नहीं सकते। सपने में कैसे धोखा दोगे? तुम तो सो गए होते, तब सपना होता है। सपना तुम्हारी असलियत को ज्यादा जाहिर करता है। अब यह हो सकता है दिन में तुम बड़े साधु हो और सपने में चोर। सपना ज्यादा असली है। दिन में तुम बड़े त्यागी और सपने में बड़े भोगी। और दिन में किया था उपवास और सपने में बैठे गए होटल में जाकर और जो-जो खाना था वर्षों से, खा रहे हैं। और खाते ही चले जा रहे हैं। दिन का उपवास झूठा था, रात का सपना सच। रात का सपना तुम्हारी असली स्थिति की खबर देता है। तुम्हारी वास्तविकता की खबर देता है। असलियत तो यह है कि तुम्हें भूख लगी है। और नकलीपन यह है कि तुम उपवास कर रहे हो क्योंकि पर्युषण आ गया है और अब सभी कर रहे हैं, पड़ोसी कर रहे हैं। और अब धार्मिक दिन आ गया, अब न करो तो भी बेइज्जती होती है। और करने से प्रतिष्ठा भी मिलती है, सम्मान भी मिलता है, आदर भी मिलता है, अहंकार भी पुजता है कि इन सज्जन ने देखो, उपवास किया। तो कर रहे हो, मगर करना नहीं चाहते हो।
सपना ज्यादा सत्य की झंकार देता है। इसलिए मनोवैज्ञानिक तुमसे यह नहीं पूछता है कि दिन में क्या सोचा? तुम्हारा सोचना इतना झूठा है कि उसकी कोई जरूरत नहीं। वह पूछता है, तुमने रात सपने क्या देखे? सपने की डायरी बनवाता है। धीरे-धीरे सपनों में झांक-झांककर तुम्हारी बीमारी खोजता है। सपने में उतर-उतर कर, सपनों की व्याख्या कर-करके सपने के प्रतीकों को खोल-खोलकर देखता है, और तुम्हारे हृदय की खबर लाता है। तुम्हारे अचेतन में पड़े हुए विचारों की खबर लाता है, जो कि तुम्हारी वास्तविकता है।
ठीक वैसी ही घटना यहां भी घटती है। पहले तो तुम्हारा और मेरा संबंध रात में ही होगा। पहले तो तुम्हारा मेरा संबंध तुम्हारे सपने में ही होगा। क्योंकि तुम्हारे सपने तुम्हारी सचाई से ज्यादा सच हैं। और तुम्हारे सपनों में तुम ज्यादा भोले-भोले हो, तुम ज्यादा निर्दोष हो। तो घबड़ाओ मत। और सपना कहकर इसका तिरस्कार मत करना। संसार सपना है, परमात्मा सत्य है। लेकिन परमात्मा अभी सपना मालूम हो रहा है और संसार सत्य मालूम हो रहा है। तुम शीर्षासन कर रहे हो।
मैंने सुना है, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे तो एक गधा उनसे मिलने पहुंच गया। ऐसे तो गधे ही प्रधानमंत्रियों से मिलने जाते हैं और कोई जाता भी नहीं। एक गधा मिलने पहुंच गया। संतरी झपकी खा रहा था। सुबह-सुबह का वक्त। रात भर का थका-मांदा था, डयूटी बदलने की राह देख रहा था। और फिर आदमी होता तो रोकता भी। गधे को क्या रोकना! गधा क्या बिगाड़ लेगा? न तो गधे हथियार लेकर चलते हैं, न बंदूक तलवार लेकर चलते हैं। न गोली मार सकते हैं। और गधों को क्या लेना-देना! जाने भी दो। वह झपकी मारता रहा, गधा अंदर प्रवेश कर गया। पंडित नेहरू सुबह-सुबह शीर्षासन कर रहे हैं अपने बगीचे में। उस गधे को देखकर उन्होंने कहा भाई, गधे तो बहुत देखे हैं लेकिन तू उलटा क्यों खड़ा है? उस गधे ने कहा महाराज, आप शीर्षासन कर रहे हैं। मैं उलटा नहीं खड़ा हूं। मैं तो बिलकुल सीधा ही खड़ा हूं।
आदमी शीर्षासन कर रहा है। तुमने सारी चीजें उलटी कर ली हैं। तो सपना सच मालूम होता है और सच सपना मालूम होता है। तुम जरा इन मधुर सपनों को मौका देना। अभी सपने ही मालूम हों, चलो सपने ही सही। मगर ये सपने तुम्हारी सचाइयों से ज्यादा मूल्यवान हैं और अंततः बड़ी सचाई की तरफ तुम्हें ले जाएंगे।
और कभी-कभी ऐसा स्वाद अनुभव होता है ऐसा कभी नहीं जाना था।
फिर भी मुझसे पूछते हो? जब स्वाद भी अनुभव होता है तो फिर उतरो, डुबकी लो। फिर छोड़ो यह फिकर, कि क्या है! फिर यह विश्लेषण करने की बात छोड़ो। फिर यह लेबल मत लगाओ कि सपना है कि सच है कि झूठ है कि रात है कि दिन है। छोड़ो। स्वाद...स्वाद को निर्णय लेने दो। स्वाद को ही निर्णायक होने दो।
और कभी-कभी ऐसा स्वाद अनुभव होता है जैसा कभी नहीं जाना था तो यह क्या है?
बुद्धि करे बीच में मत लाओ। क्या है पूछा कि बुद्धि बीच में आई। और बुद्धि अड़ंगे डालेगी। जो बुद्धि की समझ में नहीं आता उसमें बुद्धि बड़े अड़ंगे डालती है। स्वाभाविक! जो उसकी समझ में नहीं आता, बुद्धि कहती है यह हो ही नहीं सकता। बुद्धि कहती है जो मेरे समझ में आता है वही सच है। और बुद्धि की सीमा को सत्य की सीमा मत समझ लेना। यही बहुत लोगों ने किया है। यही उनकी जिंदगी का सब से बड़ा दुर्भाग्य है। बुद्धि की बड़ी छोटी सीमा है।
यह तो ऐसा ही है जैसा टार्च लेकर अंधेरी रात में तुम चले आर टार्च की छोटी सी रोशनी...जरा सा एक रोशनी का चकता पड़ता है। बस, उतना ही सत्य नहीं है। सत्य बहुत विराट है। यह तुम्हारी बुद्धि की टार्च की रोशनी कितनी है? टिम-टिमाती रोशनी, यह छोटा सा चकता, इसमें कुछ चीजें दिखाई पड़ती है। सब कुछ थोड़े ही इसमें समाता है! सब कुछ को जानता हो तो बुद्धि से नहीं जाना जाता है। सब कुछ को जानना हो तो बुद्धि के अतीत होकर जाना जाता है। सब कुछ को जानना हो, विराट को पहचानना हो तो क्षुद्र-क्षुद्र चश्मे उतार देने होते हैं।
तो तुम यह पूछो ही मत कि यह क्या है? स्वाद मिल रहा है तो तुमने और स्वादों के संबंध में तो कभी नहीं पूछा। तुम बैठे किसी फल का रस पी रहे हो, स्वादिष्ट है, तब तुम नहीं पूछते यह क्या है? पूछा कभी? मुझसे तो अभी तक किसी ने नहीं पूछा। और मुझसे जितने प्रश्न लोगों ने पूछे हैं, दुनिया में शायद ही किसी से पूछे हो। तुम आइस्क्रीम खा रहे हो, बड़ा स्वाद आ रहा है। पूछा कभी कि यह क्या है? स्वाद को जरूरत ही नहीं है प्रश्न की। स्वाद पर्याप्त है। स्वाद अपना प्रमाण है, स्वाद काफी है। लेकिन परमात्मा के स्वाद को ही क्यों पूछते हो?
कारण है। वहां तुम्हें डर लगता है। वहां लगता है कि तुम सीमा के बाहर चले। यह कुछ बेबूझ होने लगा। यह अपनी पकड़ के भीतर नहीं हो रहा है। यह अपने नियंत्रण के बाहर होने लगी बात। इसमें अपनी मालकियत चली जाएगी। यह स्वाद तुमसे बड़ा है, यही खतरा है। तुम छोटे हो। आइस्क्रीम के हल का रस, कि मिठाइयां, कि शराब, वे सब स्वाद तुम्हारे हाथ के भीतर हैं, तुम्हारी मुट्ठी में हैं। यह स्वाद तुमसे बड़ा है। इस स्वाद में तुम डूब जाओगे, खो जाओगे। उन स्वादों में तुम डूबते नहीं, खोते नहीं। क्षण भर को आते, चले जाते हैं। तुम्हारी मालकियत कायम रहती है। तुम्हारा अहंकार डगमगाता नहीं। तुम्हारा अहंकार सिंहासन पर आरूढ़ रहता है। तुम्हारे अहंकार को उससे कोई चोट नहीं लगतीं। यह स्वाद अहंकार से बड़ा है इसलिए सवाल उठता है, क्या है? सूझ-बूझ कर लो, हिसाब-किताब लगा लो, पक्का पता कर लो, फिर ही इसमें उतरो। और तुमने अगर पक्का पता लगाने की कोशिश की तो तुम उतर न सकोगे। और बिना उतरे किसी को पक्का पता लगा नहीं है।
तो अब तुम सोच लो। अगर पक्का पता लगाना हो तो उतर जाओ, पूछो मत। पूछना हो, ज्यादा पूछताछ करनी हो तो फिर एक बात पक्की है कि कभी पक्का पता न लगेगा। क्योंकि तुम उतर ही न पाओगे। बुद्धि बड़ी अटकाती है। जहां-जहां परमात्मा से मेल का मौका आता है, बुद्धि अटकाती है। जहां-जहां क्षुद्र से मेल का मौका आता है, बुद्धि बड़ी सहायता करती है। बुद्धि क्षुद्र की सेवक है, क्षुद्र की दासी है। इस सत्य को पहचानो।
ध्यान में रस आता है...लोग मेरे पास आ जाते हैं, वे कहते हैं, क्या हो रहा? घबड़ाए आ जाते हैं, आनंदित नहीं आते। रस मिल रहा है लेकिन उनके चेहरे पर चिंता मालूम पड़ती है। कौन सी चिंता इन्हें पकड़ ली? क्या बात है जिससे यह परेशान हो गए हैं? और ध्यान के लिए आए थे, ध्यान में रस लेने के लिए आए थे। इसीलिए आए थे मेरे पास; और जब आना शुरू हो जाता है तो बड़े बेचैन हो जाते हैं। बेचैनी का कारण है। यह इतना अनजाना रस है कि यह तुम्हारी पुरानी जानकारी से मेल नहीं खाता। यह इतना अभिनव है, यह इतना अज्ञान है कि तुम्हारे पास न कोई तराजू है तौलने को, न कोई कसौटी है कसने को, तुम्हारा सारा अब तक का जाना हुआ एकदम असंगत हो जाता है। और उसी से तुम नाप करते हो, उसी से तुम परख करते हो। तुमने जो अब तक जाना है। बहुत स्वाद तुमने जाने हैं लेकिन ध्यान का स्वाद तो जाना नहीं। अब यह स्वाद आया तो तुम्हारे पास न कोई तराजू है, न कोई भाषा है। कहां इसे रखो? किस कोटि में रखो? कौन सा लेबल लगाओ? किस डब्बे में बिठाओ? तुम्हारी सब कोटियां छोटी पड़ जाती है। तुम्हारे सब डब्बे ओछे पड़ जाते हैं। और इससे एक बेचैनी खड़ी होती है।
आदमी को बड़ी बेचैनी होती है जब वह लेबल नहीं लगा पाता। बड़ी बेचैनी होती है। जैसे ही उसने लेबल लगा दिया, निश्चिंत हो जाता है। लेबल लगाने से लगता है जान लिया। फूल तुमने देखा, बड़ी बेचैनी होने लगती है। किसी न कह दिया गुलाब है, चंपा है, चमेली है, तुम निश्चिंत हो गए, जैसे कि जान लिया। गुलाब शब्द से क्या खाक जान लिया! कि चंपा किसी ने कह दिया तो जान लिया।
ट्रेन में तुम सफर करते हो, पास में पड़ोस में बैठा एक आदमी अजनबी है। तुम जल्दी बेचैनी अनुभव करने लगते हो। उसको अजनबी रहने देना खतरे से खाली नहीं है। चोर हो, लफंगा हो, पता नहीं किस तरह का आदमी हो। तुम पूछते हो भई, कहां जा रहे? तुमने सिलसिला शुरू किया। वह भी राह देखता था कि तुमसे पूछे कि भई कहां जा रहे? कहां से आ रहे? क्या काम करते हो? क्या नाम है? इस तरह से तुम बारीकी से अब पता लगाने लगे कि कैसा आदमी है, क्या करता है। अगर वह आदमी कह देता है कि भई दुकानदार हूं, तुम जरा निश्चिंत हुए। वह आदमी  कह दे चोर हूं, तुम जरा सरक के बैठ गए। हालांकि शब्द ही बोल रहा है। और पता नहीं, चोर बता सकता है कि मैं दुकानदार हूं; अक्सर बताएगा। उसने कह दिया कि ब्राह्मण हूं तो तुम और पास आ गए। तुम भी ब्राह्मण हो। और उसने कह दिया शूद्र हूं तो बस संबंध टूट गया। बात खतम हो गई। एक लेबल लग गया। अब तुमने जान लिया कि बात खतम हो गई।
ऐसा हुआ, एक दफा मैं बंबई ट्रेन में चढ़ा। बहुत मित्र छोड़ने आए थे। तो जिस एअरकंडिशंड डब्बे में मैं था, एक सज्जन और थे। उन्होंने देखा इतने लोग छोड़ने आए तो समझा होगा, कोई महात्मा है। जैसे ही मैं डब्बे में अंदर गया, वे एकदम साष्टांग दंडवत लेटकर उन्होंने मेरे पैर छुए। मैंने कहा भई, आप बड़ी गलती कर रहे हैं। पहले पूछ तो लें कि मैं कौन हूं? उन्होंने कहा वे थोड़े बेचैन हुए, क्योंकि ऐसा कोई पूछता है? ऐसा कोई कहता है? उन्होंने कहा, आप कौन है? मैंने कहा, मैं मुसलमान हूं। मेरी दाढ़ी से उनको थोड़ा भरोसा भी आया। यह तो बड़ा बुरा हो गया। मुसलमान के पैर छू लिए। ब्राह्मण थे वे। मगर उनको...।
बैठ गए, थोड़े उदास भी हो गए। फिर मुझसे पूछे कि नहीं-नहीं आप मजाक कर रहे हैं। अब अपने को समझाने का कोशिश करने लगे कि नहीं कहीं, आप मजाक कर रहे हैं। आप मुसलमान नहीं हो सकते। और जो लोग आपको छोड़ने आए थे उनमें कोई मुसलमान नहीं मालूम हो रहा। नहीं-नहीं आप मजाक कर रहे हैं। तो मैंने उनसे कहा कि मजाक ही कर रहा हूं। जल्दी से मेरे पास आकर बैठ गए। ज्ञान की बातें पूछने लगे। थोड़ी देर बाद मैंने उनसे कहा कि कुछ शराब इत्यादि पीएंगे? उन्होंने कहा, क्या मतलब? महात्मा होकर...। मैंने कहा, अब यहां कौन देखता है? पी भी लो। वह मेरी...आकर सीट पर बैठ गए थे, जल्दी से उठकर अपनी सीट पर चले गए और कहने लगे, आप आदमी किस तरह के हैं? वह ब्रह्मज्ञान की चर्चा उन्होंने बंद कर दी, अपना अखबार पढ़ने लगे। अखबार वे कई दफा पढ़ चुके थे। वह अखबार तो सिर्फ मुझे बचाने को कि मैं दिखाई न पडूं। मैंने उनसे कहा अरे भाई, छोड़ो भी। मैं सिर्फ मजाक कर रहा हूं। कैसी शराब! मैं तो परमात्मा के रस की बात कर रहा था। मैं तो यह कह रहा था कि कुछ परमात्मा का रस पीयोगे? उन्होंने कहा, अब मैं समझा। आप भी खूब धक्का मार देते हैं और घबड़ा देते हैं। वे फिर मेरे पास आकर बैठ गए।
ऐसा आदमी लेबल से जीता है। जैसे शब्द सब है! सब कुछ शब्दों में भरा है। बस एक दफे लेबल लगा दिया, बात खतम हो गई। तुम निश्चिंत हो जाते हो कि चलो।
जब मैंने उनसे फिर मजाक की तो वह घबड़ा गए। इगतपुरी पर जब टिकट कलेक्टर आया, उससे बाहर जाकर उन्होंने कहा, मुझे दूसरे कमरे में। यह आदमी कुछ अजीब सा मालूम होता है क्योंकि बदल-बदल जाता है। और मैं रात यहां नहीं सो सकता। मुझे थोड़ी बेचैनी होती है। वे बदल लिए कमरा।
तब से तो तुझे तरकीब हाथ मिल गई। जब भी मैं अकेला होना चाहता...क्योंकि काफी सफर करता था। महीने में कोई बीस दिन सफर करता था। भीड़भाड़ से छूटकर बस ट्रेन में ही मुझे सुविधा थी अकेले होने की। तो यह तरकीब मुझे मिल गई। फिर तो किसी को भी डिब्बे से हटाना हो, बड़ा आसान हो गया। वे अपने आप हट जाते। उनको कुछ कहना न पड़ता।
तुम्हारा एक अतीत है। तुम्हारी अतीत की जानकारियां हैं। तुम्हारे पास शब्दों की एक शृंखला है। जब भी कोई नई चीज घटती है, तुम अपने अतीत ज्ञान में उसको कोई जगह बिठाना चाहते हो। बैठ जाए तो तुम निश्चित हो जाते हो, बेचैनी नहीं होती। न बैठे तो मुश्किल होती है।
तो जब ध्यान का स्वाद आएगा तब तुम मुश्किल में पड़ोगे। यह आइस्क्रीम का स्वाद नहीं है; न यह शराब का स्वाद है, न यह प्रेम का स्वाद है, न यह सौंदर्य का स्वाद है। यह वह स्वाद ही नहीं है जो तुमने जाने हैं। यह कुछ बड़ा अनूठा स्वाद है। और यह तुम्हारी जीभ पर नहीं घटता, यह तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व में घटता है। सिर से लेकर पैर के अंगूठे तक इसका कंपन होता है। यह कुछ बात ही और है। यह तुम्हें पागल कर देनेवाली बात है। तुम बड़े घबड़ाओगे।
यह दर्शन, यह अनुभूति, यह भावदशा इतनी नई है कि तुम्हारा मन हजार  तरह के प्रश्न उठाने लगता है। मन कहता है संदेह करो, शंका करो, प्रश्नचिह्न लगाओ। इसमें आगे मत जाना। पागल तो नहीं हुए जा रहे? सपना तो नहीं देख रहे? कोई धोखा तो नहीं खा रहे? किसी ने सम्मोहित तो नहीं कर लिया है? लौट चलो अपनी पुरानी दुनिया में। जानी-मानी थी। दुख था, ठीक था। लेकिन कम से कम जाना पहचाना था। आदमी जाने पहचाने की सीमा के बाहर नहीं जाना चाहता।
तो पुष्पा, अगर स्वाद मिलता, जैसा तूने कभी नहीं जाना था तो अब प्रश्न मत उठा। अब निष्प्रश्न भाव से इस भोग को ले। छोड़ अतीत को। भविष्य को गह। भूल जाने को, अनजान का हाथ पकड़। अपरिचित मार्ग पर जाना ही पड़ता है खोजी को। जीवन कोई रेल की पटरियां नहीं है कि बंधे-बंधाए दौड़ते रहे एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन और शंटिंग करवाते रहे। जीवन बड़ी अज्ञात की खोज है। जीवन तो ऐसा है जैसे हिमालय से निकली कोई सरिता। पता नहीं कहां जाएगी? कौन सा मार्ग लेगी? किन खाई-खड्डों में गिरेगी? किन मैदानों से गुजरेगी? किन नदियों से मिलेगी? किन झरनों को आत्मसात करेगी? किन घाटों को पार करेंगी? किन लोगों के बीच से गुजरेगी? किस सागर में गिरेगी? कुछ भी पता नहीं। कोई रेल की पटरी थोड़े ही है कि बंधी-बंधाई, टाइम टेबल के साथ घूमती रहेगी। अज्ञान है। जीवन की खोज, जीवन का विकास अज्ञात है। तुम ज्ञात को छोड़ते चलो, अज्ञात में उतरते चलो।

आखिरी प्रश्न: जो है, है। वही सत्य है; फिर झूठ कहां से आया, जो नहीं है? प्रकाश है, अंधेरा नहीं है। अंधेरा कहां से आया? अंधेरा आ ही नहीं सकता क्योंकि अंधेरा है नहीं। आने के लिए तो होना चाहिए। अंधेरा न आता, न जाता। अंधेरा होता भी नहीं। अंधेरा सिर्फ प्रकाश का अभाव है। अंधेरे का होना न होना प्रकाश के होने न होने पर निर्भर है।

जब तुम अंधेरा कहते हो, तो असल में तुम यह थोड़े ही कहते हो कि कोई अंधेरे जैसी चीज है! तुम इतना ही कहते हो कि प्रकाश नहीं है। इसको ठीक से समझो। भाषा से अड़चन आ जाती है। भाषा बड़ी भ्रांतियां खड़ी कर देती है। तुम कहते हो अंधेरा है; इससे ऐसा लगता है कुर्सी है, मकान है, मंदिर है, ऐसे ही अंधेरा है। भाषा तो वही है--कुर्सी है, मकान है, मंदिर है, अंधेरा है। तो तुम पूछते हो कहां है अंधेरा? कैसा है अंधेरा? कितना बजन होता है अंधेरे का? कहां से आता है, कहां जाता है? भाषा ने सब झंझट खड़ी कर दी।
जब तुम कहते हो अंधेरा है तो उसका केवल इतना ही मतलब होता, प्रकाश नहीं है; और कुछ मतलब नहीं होता। और मतलब होता ही नहीं। अंधेरे में कुछ सार होता ही नहीं, कोई सत्ता होती ही नहीं। अंधेरे का कोई अस्तित्व होता ही नहीं। इसीलिए तो तुम अंधेरे को निकाल नहीं सकते। तुम्हारे कमरे में अंधेरा भरा है, ले आओ तलवार और टूट पड़ो अंधेरे पर--वाह गुरुजी का खालसा। और काटने लगो अंधेरे को और देने लगो धक्का कि निकाल बाहर करेंगे। कुछ कर न पाओगे तुम। अंधेरा अपनी जगह रहेगा तुम इसे धक्के मारकर निकाल न पाओगे, न तलवार से काट सकोगे। यह है ही नहीं। इसको तलवार से काटोगे कैसे? इसको धक्के मारोगे कैसे? तुम चाहे दारासिंह को बुला लो और चाहे मोहम्मद अली को। इसमें धक्के से काम नहीं चलेगा। जो धक्का मारेगा वह हारेगा। जो धक्का मारेगा वह टूटेगा। जो धक्का मारेगा वह शिथिल होगा, थकेगा, गिरेगा। और जब दारासिंह मार-मार धक्के गिर जाएगा तो वह भी सोचेगा कि बड़ा मजबूत अंधेरा है। मार डाला मुझे। निकलता नहीं। मुझसे ज्यादा ताकतवर है।
नहीं, अंधेरे में न ताकत है, न अंधेरे में कोई बल है। अंधेरा से ज्यादा कोई नपुंसक स्थिति नहीं है। अंधेरा है ही नहीं। तो करो क्या? सिर्फ दिया ले आओ, प्रकाश ले आओ, और अंधेरा चला जाता है। अंधेरे को निकाला नहीं जा सकता। या तुम समझो कि दुश्मन के घर पर अंधेरा लाकर डालना हो तो डाल ही नहीं सकते। कि टोकरी में भर लाए अंधेरा और डाल दिया पड़ोसी के घर में कि ले बेटा, अब भोग! तुम टोकरी में भरकर अंधेरा ला भी नहीं सकते, डाल भी नहीं सकते किसी के घर में।
अगर तुम्हें अंधेरे के साथ कुछ भी करना हो तो प्रकाश के साथ कुछ करना पड़ेगा। इस बात को खयाल में रखो। अंधेरे के साथ सीधा कुछ किया ही नहीं जा सकता, अगर अंधेरा लाना है तो प्रकाश बुझाओ। अगर अंधेरा हटाना है, प्रकाश जलाओ। प्रकाश है, अंधेरा नहीं है। अंधेरा केवल अभाव है।
ठीक वैसी ही बात सत्य और असत्य की है। सत्य है, असत्य अभाव है। असत्य होता नहीं। इसीलिए तो उसको असत्य कहते हैं क्योंकि वह होता नहीं--असत, असत्य। इसलिए तो असत्य कहते हैं कि वह है नहीं। वैसा है ही नहीं, सिर्फ सत्य का अभाव है। इसलिए असत्य से जो लड़ते हैं वे हारेंगे; वे बुरी तरह हारेंगे। असत्य से लड़ो मत, सत्य का दिया जलाओ। बुराई से लड़ो मत, भलाई का दिया जलाओ। पाप से लड़ो मत, पुण्य का दीया जलाओ। संसार रे लड़ो मत, परमात्मा को पुकारो।
यह मेरा मौलिक आधार है। संसार से लड़ो ही मत क्योंकि संसार है ही नहीं केवल परमात्मा का अभाव है। दुकान से मत लड़ो, मंदिर को खोजो। पत्नी से मत लड़ो, बच्चों से मत लड़ो, ध्यान को खोजो। संसार से मत भागो, संन्यास को खोजो। संन्यास आ जाए, संसार नहीं है। और तुम दुकान में ही रहो, घर में ही रहो, कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए तो दरिया ने कहा कि गृही हो कि संन्यासी हो, इससे कुछ भेद नहीं पड़ता। दीया भीतर का जल जाए।
विधायक बनो। नकारात्मक से मत जूझते रहो। वह जूझना गलत है; उसमें सिर्फ हार होती है, पराजय होता है। विजेता तो बनना है आदमी विधायक के साथ।
जो है है। वही सत्य है। फिर झूठ कहां से आया, जो नहीं है?
झूठ आया भी नहीं, गया भी नहीं। झूठ है भी नहीं। जब सत्य छिपा होता है तो झूठ होता है। जब सत्य प्रगट हो जाता है, झूठ नहीं हो जाता।

आज इतना ही।




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