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बुधवार, 7 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-09



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—नौवां  
दिनांक 04 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—मैं ध्यान करूं या भक्ति?
और चूंकि कुछ तय ही नहीं हो पाता है, इसलिए प्रारंभ भी करूं तो कैसे करूं?
2—आपने एक प्रवचन में कहा था कि पुरुष के लिए "मैं-भाव' और स्त्री के लिए "मेरा-भाव' अर्थात ममता बाधा है। क्या ममता प्रेम का ही दूसरा रूप नहीं है? क्या इतने प्रेमपूर्ण गुण को छोड़ना ही पड़ेगा रूखा-सूखा होकर रहना पड़ेगा?
3—जीवेषणा है क्या? जीवन में इतना दुख हम देखते हैं, कुछ-कुछ समझ में भी आता है,
फिर भी जीए जाने का मन क्यों होता है?
4—मैं आपको सुनता हूं तो चकित हो रह जाता हूं। अवाक होता हूं, आश्चर्यविमुग्ध होता हूं, लेकिन संन्यास में छलांग नहीं लगा पाता हूं। क्या करूं?


पहला प्रश्न: मैं ध्यान करूं या भक्ति? वर्षों से यही सोच रहा हूं। और चूंकि कुछ तय ही नहीं हो पाता है, इसलिए प्रारंभ भी करूं तो कैसे करूं?

कृष्णदास! मन के खेल बहुत सूक्ष्म हैं। मन की राजनीति बड़ी गहरी है। मन एक कुशल कूटनीतिज्ञ है। और उसकी सबसे बड़ी कूटनीति यह है कि तुम्हें कभी तय ही न करने दे। तुम्हें कभी निर्णय ही न लेने दे। तुम्हें कभी किसी निष्पत्ति पर न पहुंचने दे। क्योंकि न होगा बांस, न बजेगी बांसुरी। निष्पत्ति ही न ले सकोगे तो कृत्य का जन्म ही नहीं होगा।
तो मन सदा डांवाडोल रखता है। मन कहता है: यह या वह। और मन अनंत काल तक ऐसे ही डांवाडोल रख सकता है, रखा है। कृष्णदास, तुम कुछ इस जन्म में ही ऐसा सोच रहे, ऐसा नहीं, न मालूम कितने जन्मों से ऐसे ही सोच रहे होओगे। और तब मन का तर्क ठीक भी है कि जब तय ही न हो पाए, तो कुछ करूं तो कैसे करूं? पहले तय तो हो जाने दो! और मन तय होने न देगा। क्योंकि तय करने की क्षमता ही मन की नहीं है। निष्कर्ष मन की संभावना नहीं है। निष्कर्ष लिए जाते हैं हृदय से, भाव से, श्रद्धा से।
मन तो केवल संदेह करना जानता है। मन बहुत कुशल है संदेह करने में, बहुत प्रवीण है। संदेह को उसने खूब निखारा है। उस पर खूब धार धरी है। संदेह की छुरी उसके हाथ में है। और जो भी सामने पड़ जाए, वह छुरी टुकड़े-टुकड़े कर देती है। मन तोड़ना जानता है, जोड़ना नहीं जानता।
शेख फरीद, एक मुसलमान फकीर के पास एक सम्राट मिलने आया। उसके पास एक बहुमूल्य कैंची थी। सोने की थी, उस पर हीरे-जवाहरात जड़े थे। लाखों रुपए उसकी कीमत थी। किसी सम्राट ने उसे भेंट दी थी। क्या ले चलूं फकीर के पास? फरीद के प्रति उसकी बड़ी भावना थी। तो जो बहुमूल्यतम उसके पास चीज थी, वही कैंची ले आया। फरीद को कैंची दी।
कैंची लेकर फरीद हंसने लगा और उसने कहा: गलत जगह ले आए। मैं इस कैंची का क्या करूंगा? क्योंकि काटने का धंधा ही मैंने बंद कर दिया। मैं चीजों को तोड़ता नहीं। मैं तो चीजों को जोड़ता हूं। अच्छा हो तुम कैंची तो ले जाओ, एक सुई-धागा मेरे लिए ला देना। क्योंकि सुई-धागे से जोड़ना हो सकेगा। कैंची से काटना होता है।
फरीद ने बड़े ही प्यारे ढंग से बड़ी अनूठी बात कह दी। मस्तिष्क तो कैंची है, काटता है। हृदय सुई-धागा है, जोड़ता है। श्रद्धा जोड़ती है, संदेह खंड-खंड करता है। श्रद्धा अखंड करती है।
तुम सोचते ही रहोगे तो कभी निर्णय न कर पाओगे कि भक्ति करूं या ध्यान। और मजा यह है कि दोनों में क्या तुम सोचते हो बहुत भेद है? दोनों मार्ग हैं उसी एक मंजिल के। कोई पूरब से चले कि कोई पश्चिम से, पहुंच जाना है वहीं। सभी नदियां सागर में पहुंच जाती हैं। रास्ते अलग हैं, दिशाएं अलग हैं। और सभी श्रद्धाएं परमात्मा में पहुंच जाती हैं, फिर श्रद्धा भक्ति की हो कि श्रद्धा ध्यान की। श्रद्धा पहुंचाती है, न तो भक्ति पहुंचाती है और न ध्यान पहुंचाता है। ध्यान और भक्ति तो केवल निमित्त हैं, जो चीज पहुंचाती है वह श्रद्धा है।
और तुम संदेह में पड़े हो। तो तुम डूबते रहोगे, उबरते रहोगे, डूबते रहोगे, उबरते रहोगे। तुम कभी न घर के होओगे न घाट के, तुम धोबी के गधे रहोगे। तुम्हारी जिंदगी में कभी फूल न खिलेंगे। क्योंकि कभी तुम इतनी श्रद्धा ही न कर पाओगे कि जड़ें जमने का समय मिल सके।
फिर ध्यान और भक्ति में भेद क्या है, जिसके लिए तुम इतना चिंतन कर रहे हो?
ध्यान है आत्म-स्मरण और भक्ति है परमात्म-स्मरण। ध्यान है इस बात के प्रति बोध कि मैं परमात्मा हूं और भक्ति है इस बात का बोध कि शेष सब परमात्मा है। जो जान लेता है कि मैं परमात्मा हूं, वह निश्चित ही जान लेता है कि शेष सब भी परमात्मा है। क्योंकि जो मेरे भीतर जीवित है, वही शेष सबके भीतर जीवित है। जो मेरे भीतर श्वास ले रहा है, वही सबके भीतर श्वास ले रहा है। तो ध्यानी अंततः भक्ति पर पहुंच ही जाता है।
और जो सोचता है कि सबके भीतर परमात्मा विराजमान है, क्या वह अपने को अपवाद कर लेगा? क्या वह अपने को छोड़ कर सब में परमात्मा देखेगा? सिर्फ अपने में नहीं देखेगा? जिसे सब में दिखाई पड़ेगा, उसे स्वयं में भी दिखाई पड़ेगा। भक्ति से जो चलेगा, ध्यान उसके पीछे अपने आप छाया की भांति चला आता है।
भक्ति और ध्यान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं--तुम क्या सोचने बैठे हो? करना ही न हो तो बात अलग, तो खूब सोचो! जिसे न करना हो, उसके लिए श्रेष्ठतम विधि है, सोचना। जिसे कभी जीवन को रूपांतरित न करना हो, उसके लिए सबसे बड़ी सुरक्षा है, सोचना। यह बचाव है। इस आड़ में तुम छुपे रह सकते हो। मगर किसको धोखा दोगे? यह आत्मवंचना है। अपने को ही धोखा दोगे।
कृष्णदास, अब कुछ करो। कुछ भी सही। निर्णय न कर सको, तो एक रुपया हाथ में लेकर उसे फेंक कर चित-पट कर लो! और तुमसे मैं कहता हूं, चित भी उसकी, पट भी उसकी।

फिर चिरागों से धुआं उठने लगा, कुछ कीजिए।
अब तो इस घर में भी दम घुटने लगा, कुछ कीजिए।
आज अपनी खिड़कियां खोलें तो खोलें किस तरह,
इन उजालों का भरम खुलने लगा, कुछ कीजिए।
रात का आलम अगर होता तो कोई बात थी,
दिन निकलते आदमी लुटने लगा, कुछ कीजिए।
दोस्तो फिर इस शहर पर गिद्ध मंडराने लगे,
मौत का सामान फिर जुटने लगा, कुछ कीजिए।
एक जंगल फिर कहीं तारी न हो इस दौर में,
जिंदगी का हरापन बुझने लगा, कुछ कीजिए।

जरा देखो तो, जिंदगी का हरापन बुझने लगा। दिन बीते जाते हैं। दिन रीते जाते हैं।
मौत का सामान फिर जुटने लगा, कुछ कीजिए।
और मौत कब पकड़ लेगी और तुम यही बैठे सोचते रहोगे कि ध्यान करें कि भक्ति? और मौत तुमसे यह न पूछेगी कि मरना है कि नहीं? मौत बस आकर दबोच लेगी। सोचने-विचारने का मौका न देगी। कुछ करो!
लेकिन करना तभी संभव हो पाता है, जब व्यक्ति विचार के व्यर्थ ऊहापोह से मुक्त हो। जिंदगी कुछ करने से बदलती है, बैठे-बैठे सिर के भीतर खुजलाहट को चलाते रहने से नहीं। और विचार खुजलाहट से ज्यादा नहीं है, खुजली का खुजलाना है। उससे कुछ राहत नहीं मिलती। भला शुरू-शुरू में थोड़ी मिठास का अनुभव होता हो, फिर पीछे बहुत पीड़ा होती है।
जगाओ अपने को! ध्यान तो ध्यान, भक्ति तो भक्ति। मरता हुआ आदमी यह नहीं पूछता कि जल सरोवर का है, कि कुएं का है, कि नदी से लाए। मरता हुआ आदमी जल को देख कर एकदम अंजुलि भर कर पीने में लग जाता है।
तुम्हें भ्रांति है। तुम सोच रहे हो, सदा जीना है; कि बहुत समय तुम्हारे पास है; कि गंवाओ जितना चाहो उतना!
कहते हो: "वर्षों से सोच रहा हूं, कुछ तय नहीं हो पाता।'
जन्मों तक सोचो, तब भी तय नहीं होगा। तय करना मन की क्षमता नहीं है। इस सत्य को देखो--मन कभी तय नहीं कर पाता। और जो भी तुमने कभी तय किया है, जरा अपने भीतर छानना, खोदना और तुम पाओगे: निर्णय सदा हृदय से आते हैं।
तुम एक स्त्री के प्रेम में पड़ गए। मन तो सोचता ही रहता है। लेकिन हृदय है कि प्रेम में पड़ गया। इसीलिए तो मन कहता है कि हृदय अंधा है, कि प्रेम अंधा है। अगर मन की आंख से कोई प्रेम करने चले, तो प्रेम कभी होगा ही नहीं। तुम सोचने-विचारने में ही समय गंवा दोगे।
तुम्हारे जीवन में जो भी हुआ है...कोई संगीतज्ञ हो गया है; देखे जरा गौर से। अगर मन से सोचता कि संगीतज्ञ हो जाऊं, कि डाक्टर हो जाऊं, कि चिकित्सक हो जाऊं, कि इंजीनियर हो जाऊं, कि यह हो जाऊं, वह हो जाऊं, तो दुनिया में हजार विकल्प थे। लेकिन उसके हृदय को संगीत ने पकड़ लिया। सब छोड़-छाड़ कर वह संगीत में डूब गया। तो संगीतज्ञ हो पाया है।
तुमने भी जिंदगी में कुछ किया होगा। अच्छे काम न किए होंगे तो कम से कम बुरे काम तो किए ही होंगे। पाठ तो एक ही है, अच्छे काम हों कि बुरे काम हों। किसी ने गाली दी। तुम जरा सोचो बैठ कर कि उत्तर दें कि न दें? सोचो बैठ कर कि उत्तर किस भाषा में दें? गालियां कौन सी ठीक और मौजूं और न्यायसंगत होंगी? सोचो बैठ कर, इसने जो गाली दी है कहीं सच्ची ही न हो! जैसे किसी ने तुमसे कह दिया: उल्लू का पट्ठा। हो सकता है कि तुम उल्लू के पट्ठे ही हो। तो इसमें फिर गाली क्या रही? हो सकता है इसने ठीक ही कहा हो। या यह भी हो सकता है कि इसने बिलकुल झूठ कहा है। तो झूठ से क्या परेशान होना!
इसीलिए तो बुद्धों ने कहा है कि बुरा काम करने के पहले सोचना; जितना सोच सको सोचना। बुद्धों ने कुंजी दी है तुम्हें, कि अगर तुमने बुरे काम करने के पहले सोचा, तो बुरे काम कर न सकोगे। कुंजी वही है! जिस काम के संबंध में सोचोगे, उसे कर न सकोगे। बुद्धों ने कहा है: शुभ काम करना हो तो तत्क्षण कर लेना, सोचना मत। और बुरा काम करना हो तो जल्दी क्या है? टालना। कल करेंगे, परसों करेंगे, थोड़ा सोच लें, फिर करेंगे।
तुम उलटा करते हो। बुरा काम तो तत्क्षण कर लेते हो, बिना सोचे कर लेते हो। जब कोई गाली देता है, उस समय तुम फिर नहीं सोचते कि भई आना कल, जरा मैं सोच लूं! उसी क्षण जूझ जाते हो। और जब कोई शुभ काम करना हो--कि भक्ति, कि ध्यान--तो तुम वर्षों से सोच रहे हो!
बुद्धों में और तुम में इतना ही फर्क है। बुद्धिमानों में और गैर-बुद्धिमानों में इतना ही फर्क है। ज्यादा फर्क नहीं है। गैर-बुद्धिमान बुरे को बिना सोचे करते हैं, बुद्धिमान भले को बिना सोचे करते हैं। बस इतना छोटा सा फर्क, लेकिन जमीन-आसमान का फर्क हो जाता है।
जगाओ थोड़ा अपने हृदय को। तुम्हारा हृदय सोया पड़ा है। बुद्धि शोरगुल मचा रही है और हृदय बिलकुल बेहोश है।

बन न जाए यह शहर की जिंदगी जैसी कहीं,
जोर से पत्थर उछालो, झील को सोने न दो।

वर्जनाएं जिस कथा का शीर्षक था
देर से आई समझ में आ गई है
चापलूसी में किनारों की लगे जो
यह नदी सी जिंदगी पथरा गई है

गड़ गई जब पांव में, इसको हिलाते ही रहो,
दर्द जितना हो मगर इस कील को सोने न दो।
हो रहे आबाद बाहर से, सही है
सिर्फ भीतर से उजड़ते जा रहे हैं
और समझौता सभी ने कर लिया है
शब्द ही बस युद्ध लड़ते जा रहे हैं

बैठना इसका अशुभ है, यह उड़े, उड़ती रहे,
कंकड़ें मारो, समय की चील को सोने न दो।

आंसुओं को हम पिरोने में लगे थे
दर्द की जब राजधानी लुट रही थी
हम विधायक की तरह थे स्नानघर में
रोशनी की जब जवानी लुट रही थी

गांव ही बस रह गया है रोशनी के नाम पर,
कुछ करो इस आखिरी कंदील को सोने न दो।

तुम्हारे भीतर ज्योति का स्रोत हृदय है। तुम्हारे भीतर जलती हुई कंदील हृदय है। बुद्धि तो बहुत जागी है और हृदय की कंदील बहुत सोई है। उसे जगाओ थोड़ा।
और जगाने का उपाय क्या है?
छोटे-छोटे श्रद्धा के कृत्यों में उतरो। छोटे-छोटे निर्णय लो। बड़े निर्णय की भी मैं नहीं कह रहा हूं। तैरने जाते हो तो उथले में तैरना सीखते हो, फिर गहरे की यात्रा करते हो। चलो, उथले में ही थोड़े-थोड़े निर्णय लो। और फिर करके देखो, तब तो कुछ निर्णय हो। भक्ति भी करके देखो, ध्यान भी करके देखो। दोनों का स्वाद लेकर देखो। कौन जाने कौन रुच जाए! किसी को भक्ति रुच जाती है, किसी को ध्यान रुच जाता है। लेकिन स्वाद के बिना रुचे तो कैसे रुचे?
दुनिया में दो तरह के लोग हैं। कुछ लोग जो भक्ति से पहुंचते, कुछ लोग जो ध्यान से पहुंचते। कौन जाने, कृष्णदास, तुम उन दो में से किसमें होओ? मगर एक बात पक्की है कि दो में से एक में जरूर तुम होओगे। चलो, दोनों का ही स्वाद ले लें। फिर जो पट जाए, जो भा जाए, जो रुच जाए; जो पच जाए, जो तुम्हारी मांस-मज्जा बन जाए। फिर उसी को चुन लेना।

अपनी-अपनी मंजिल सबकी अपनी-अपनी चाल,
रुकता कोई तोड़ निकलता है कांटों का जाल।

बैसाखी के बल पर कोई चूमे गिरि का भाल,
तू अपना हौसला न कम कर अपने पांव सम्हाल।

तू जंगल का फूल खिला है पतझड़ के भी बीच,
कागज के नकली फूलों का लेकिन कौन कमाल।

कुछ ऐसे कोमल तन अतिशय सुख भी जिनको भार,
कुछ ऐसे दुखते मन जिनके मुख पर नहीं मलाल।

प्रश्नों की तो भीड़ बड़ी है, उत्तर देगा कौन,
पर कुछ ऐसे उत्तर जिनका कोई नहीं सवाल।

मुसकानों पर ताला छोटी खुशियों पर भी रोक,
आंसू कुंठा दर्द वेदना का अब नहीं अकाल।

उनका क्या कहना जिनके सोने-चांदी के पंख,
पिंजरे के पंछी कैसे उड़ बैठें अपनी डाल।

कुछ क्षण को सहला तो लें युग-युग के दुखते घाव,
पंछी ले उड़ जाएंगे फिर आखेटक का जाल।

अपनी-अपनी मंजिल सबकी अपनी-अपनी चाल,
रुकता कोई तोड़ निकलता है कांटों का जाल।

तुम्हारी भी अपनी कोई चाल है। मगर चलो तो पहचान में आए। ऐसे भी चलो, वैसे भी चलो।
इसीलिए तो मेरे इस बुद्धक्षेत्र में ध्यान भी चल रहे हैं, भक्ति भी चल रही है। प्रेमी नाच रहे हैं मस्ती में और ध्यानी ध्यान कर रहे हैं। दोनों साथ-साथ चल रहा है। ऐसा कभी भी नहीं हुआ था। बुद्ध के पास जो लोग इकट्ठे हुए, वे ध्यान किए। मीरा के पास जो लोग इकट्ठे हुए, उन्होंने भक्ति की। यह पृथ्वी पर पहली बार हो रहा है, जहां सूफी मस्ती और सूफी नृत्य और जहां भक्तों का आनंद और भक्तों की गागर छलक रही, और जहां साथ-साथ विपस्सना ध्यान और झाझेन और गहन-गहन ध्यान की प्रक्रियाएं भी साथ-साथ चल रही हैं। दोनों अवसर तुम्हें दे रहा हूं। तुम मालिक हो। दोनों का स्वाद ले लो। फिर निर्णय अपने से हो जाएगा।
मगर तुम बैठे बाहर। न तुम करते ध्यान, न तुम करते भजन, तुम बैठे दूर प्रेक्षक की तरह, दर्शक की तरह विचार कर रहे--क्या करूं, क्या न करूं? ऐसा तो नहीं है कि कहीं बहुत आलस्य है मन में, बहुत तमस है मन में?
दो आलसी एक वृक्ष के नीचे पड़े थे...सत्यप्रिया ने मुझे एक छोटा सा चुटकुला भेजा है... जामुन का वृक्ष। एक जामुन गिरी। एक आदमी ने दूसरे से कहा कि हद्द हो गई अलाली की भी! जामुन गिरी और तू इतना भी न कर सका--और जिंदगी की मैत्री, और लोग कहते हैं कि मित्र वही जो वक्त पर काम आए--जामुन पड़ी है और तू उठा कर मेरे मुंह में भी नहीं दे सकता! यह कैसी मैत्री? उस दूसरे आदमी ने कहा, और अपनी तो सोचो! अभी कुत्ता मेरे कान में मूत रहा था, जीवन-जल बरसा रहा था, और तुमने देख भी लिया तो भी आंख बंद किए पड़े रहे! कुत्ते को भगा भी न सके!
एक आदमी राह से गुजर रहा था, उसने दोनों की बात सुनी। सोचा होगा, हद्द हो गई अलाली की भी! लेकिन फिर भी दया तो आई। अब यह तो सीमा के बाहर हो गई बात कि कुत्ता जीवन-जल बरसाए, तो भी दूसरा भगाए, खुद न भगाया। तो वह पास आया और उसने दो जामुनें उठा कर दोनों के मुंह में डाल दीं और कहा, भाई, अब तो प्रसन्न हो? और जाने लगा। उन्होंने कहा, रुको! गुठलियां कौन निकालेगा?
कहीं ऐसा तो नहीं है कि यह सब सोच-विचार सिर्फ आलस्य को सुंदर परिधान पहनाना है? कुछ करना नहीं चाहते--न ध्यान, न भक्ति--सो सुगम उपाय खोज लिया है: सोचते रहेंगे, विचार करते रहेंगे।
जिंदगी में और चीजों के संबंध में तो कृष्णदास, ऐसा नहीं करते। पानी पीएं या न पीएं? भोजन करें या न करें? आज रात सोएं या न सोएं? जिंदगी के और सब काम तो तुम मजे से किए जा रहे हो, सिर्फ भक्ति में और ध्यान में ही सारा सोच-विचार लगा दिया? शायद कारण यह हो कि जिन चीजों का तुम्हारी आंखों में मूल्य है, उनको तो तुम कर लेते हो; और जिनका मूल्य नहीं है, उनको सोचते हो।
या तो भूल ही जाओ। क्यों व्यर्थ समय गंवाना? ध्यान, भक्ति, दोनों भूल जाओ। या तो भूल ही जाओ, झंझट छोड़ो, जिंदगी में और हजार काम हैं! कुछ थोड़ा और कमा लो, कुछ थोड़ा और बड़ा मकान बना लो, थोड़ा और बैंक में धन इकट्ठा कर लो। कहां की व्यर्थ की बातों में पड़े हो! या तो छोड़ ही दो! और अगर न छोड़ सकते होओ, अगर यह धुन उठ ही रही हो, तो फिर दोनों करके देख लो। निर्णय आएगा अनुभव से। श्रद्धा जगेगी अनुभव से। प्रीति उमगेगी अनुभव से।


दूसरा प्रश्न: आपने एक प्रवचन में कहा था कि पुरुष के लिए "मैं-भाव' और स्त्री के लिए "मेरा-भाव' अर्थात ममता बाधा है। क्या ममता प्रेम का ही दूसरा रूप नहीं है? क्या इतने प्रेमपूर्ण गुण को, जो कि मेरे जीवन पर छा गया है, उसे छोड़ना ही पड़ेगा? और रूखा-सूखा होकर रहना पड़ेगा? कृपया मार्गदर्शन दें।

कश्मीरा! मैं और मेरा, दोनों प्रेम के दुश्मन हैं। दोनों प्रेम को नष्ट करते हैं। दोनों प्रेम के लिए कैंसर हैं। और तू समझ रही है कि मैं और मेरा ही प्रेम है! और तू समझ रही है कि मैं और मेरा चला गया, तो जीवन रूखा-सूखा हो जाएगा! जीवन रूखा-सूखा है--मैं और मेरे के कारण। और अगर थोड़ी-बहुत हरियाली कहीं जीवन में हो भी, कहीं एकाध-दो पत्ते कभी निकल भी आते हों, तो यही समझना कि मैं और मेरे के बावजूद निकल आते हैं; मैं और मेरे के कारण नहीं। कुछ हिस्सा होगा तेरे भीतर जो मैं और मेरे से खाली है, वहीं थोड़ी हरियाली होगी, वहीं थोड़ा मरूद्यान होगा। नहीं तो मरुस्थल ही मरुस्थल होगा।
मैं यानी अहंकार। अहंकार और प्रेम का क्या संबंध हो सकता है? प्रेम तो अहंकार का विसर्जन है। जब भी किसी के प्रति प्रेम उमगता है, तो उसके प्रति हम अपना अहंकार छोड़ देते हैं, उसके प्रति हम अपने मैं को समर्पित कर देते हैं। फिर चाहे साधारण जगत का प्रेम हो और चाहे भगवान का प्रेम हो, मौलिक प्रक्रिया तो एक ही है। जिस स्त्री को तुमने प्रेम किया, या जिस पुरुष को तुमने प्रेम किया, उस प्रेम में तुम्हें परित्याग क्या करना पड़ता है? प्रेम मांगता क्या है?
एक ही चीज मांगता है कि मैं को समर्पित करो। और जब भी कोई स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के प्रति अपने मैं को समर्पित कर पाते हैं, तो उनके जीवन में बड़ी हरियाली होती है, बड़े फूल खिलते हैं, बड़ी सुवास उठती है। मगर यह बहुत मुश्किल से होता है। क्योंकि आखिर स्त्री स्त्री है, पुरुष पुरुष है। इनके प्रति मैं को पूरी तरह समर्पित करना करीब-करीब असंभव है। और अगर कभी-कभी समर्पित हो भी जाए, तो वह क्षणभंगुर ही होता है। उस क्षण में थोड़ी झलक मिलती है रस की, थोड़ा मन विमुग्ध होता है, थोड़े प्राण आनंदित होते हैं, मगर क्षण को! और फिर अंधेरी रात। फिर गहन अंधेरी रात। एक क्षण को जैसे कौंध गई बिजली और फिर अमावस की रात। जो पहले से भी ज्यादा अंधेरा कर देती है।
इसलिए प्रेम में थोड़ा सुख भी है और बहुत ज्यादा दुख भी है। जिन्होंने प्रेम किया है उन्होंने सुख ही नहीं जाना, उन्होंने सुख से भी ज्यादा गहन दुख जाना है। इसलिए बहुत से लोग तो प्रेम में पड़ते ही नहीं। छोटे से सुख से वे वंचित रह जाएंगे, मगर बहुत बड़े दुख से भी वंचित रह जाएंगे। इसीलिए तो बहुत से लोग सदियों-सदियों तक जंगल में भाग गए हैं। उन स्थानों से भाग गए हैं जहां प्रेम हो सकता था। संसार का अर्थ क्या होता है? जहां प्रेम होने की संभावना है। जहां प्रेम का अवसर है। जहां दूसरे मौजूद हैं। जहां कौन जाने कब किसी से मन का मेल बैठ जाए! कौन जाने कब किसी से राग जुड़ जाए! कौन जाने कब किसी की वीणा के साथ वीणा बज उठे! कौन जाने कब और किसके साथ!
भाग जाओ! सदियों-सदियों से साधु-संत भागते रहे जंगलों में, पहाड़ों में। किससे भाग रहे हैं? वे कहते हैं, हम संसार से भाग रहे हैं। लेकिन अगर तुम उनके मनोविज्ञान को समझो, तो इस बात में ज्यादा अड़चन न होगी समझने में कि वे प्रेम से भाग रहे हैं, संसार से नहीं। प्रेम की जहां संभावना है, चुनौती है, वहां से भाग रहे हैं। संसार प्रेम का ही दूसरा नाम है।
प्रेम से तो भाग जाते हैं, क्योंकि प्रेम से डर लगता है--थोड़ा सा सुख लाता है और बहुत दुख लाता है। एकाध तो गुलाब का फूल खिलता है, जरूर खिलता है, मगर हजार-हजार कांटे ले आता है, सारी छाती कांटों से छिद जाती है। हां, आती है कभी-कभी एक सुवास भी, एक सुगंध की लहर भी, और फिर बहुत दुर्गंध भर जाती है। थोड़ा सा सुख और परिणाम में बहुत दुख। तो लोगों ने सीधा गणित बिठा लिया कि भाग ही जाओ ऐसी जगह से, जहां दुख-सुख का इतना उपद्रव है।
लेकिन ऐसे भागे हुए लोग महा अहंकारी हो जाते हैं। इसलिए तुम अपने साधु-संतों में जिस तरह का अहंकार देखोगे, वैसा अहंकार कहीं और न देखोगे। उनका अहंकार बहुत प्रकट होगा, बहुत प्रगाढ़ होगा, बहुत सूक्ष्म होगा और बहुत गहरा होगा। क्योंकि प्रेम ही मिटा सकता था अहंकार को। वे तो प्रेम को ही छोड़ कर चले गए। अब तो अहंकार को मिटाने वाला कोई भी न रहा। अब तो बीमारी ही रही, औषधि न रही। और उनके जीवन में तुम्हें रेगिस्तान मिलेगा, वहां कोई हरियाली नहीं होगी।
कश्मीरा, तू ठीक कहती है। अगर मैं पुराने ढंग के साधु-संन्यासी पैदा कर रहा होता तो तेरा वक्तव्य बिलकुल ठीक था--कि फिर तो जीवन रूखा-सूखा हो जाएगा। लेकिन मैं तो किसी और ही संन्यास की बात कर रहा हूं। ऐसे संन्यास की जो प्रेम से भागता नहीं, वरन प्रेम के सत्य में जागता है। ऐसे संन्यास की जो प्रेम को क्षणभंगुर ही नहीं स्वीकार करता, बल्कि अपनी शाश्वत सचाई की तरह अंगीकार करता है। जो संसार से नहीं भागता और प्रेम से नहीं भागता, बल्कि अहंकार को त्यागता है। क्योंकि दुख प्रेम से नहीं आता, प्रेम से तो सुख ही आता है, क्षणभंगुर ही सही। हां, जब प्रेम चला जाता है और अहंकार मजबूत हो जाता है, तब दुख आता है।
यह जरा सूक्ष्म प्रक्रिया है, इसलिए ठीक से देखोगे तो ही समझ पाओगे।
दुख प्रेम से कभी नहीं आता। दुख अहंकार से आता है, मोह से आता है, ममता से आता है, मैं-भाव से आता है। इसलिए शुरू-शुरू में प्रेम के संबंध बड़े सुखद और प्रीतिकर होते हैं। हनीमून के दिन बड़े सुखद होते हैं, बड़े प्रीतिकर होते हैं। क्योंकि अभी मैं नहीं आया। अब आएगा। जल्दी ही विवाह होगा, घर-गृहस्थी बसेगी, और मैं लौटेगा अपने पूरे फौज-फांटे के साथ, अपने पूरे हमले के साथ। पति पैदा होगा, प्रेमी विदा हो जाएगा। पत्नी पैदा होगी, प्रेयसी विदा हो जाएगी। प्रेयसी मर जाएगी, उसकी लाश पर पत्नी खड़ी होगी। प्रेमी राख हो जाएगा, उसकी राख पर पति अकड़ आएगा, अकड़ कर खड़ा होगा। जहां पति और पत्नी आ गए, वहां दुख आ गया। जब तक प्रेमी थे और प्रेयसी थी, कुछ बात और थी, गुण और था। अभी मैं नहीं था। अभी दावा नहीं था। अभी दावेदारी नहीं थी।
अहंकार के कारण आता है दुख। ममता अहंकार का रूप है। मेरा, यह दावा ही अहंकार है। जिस दिन तुमने कहा, यह मेरी पत्नी है, उसी दिन तुमने उस स्त्री के प्राणों की आहुति चढ़ा दी। तुमने उसकी स्वतंत्रता मार डाली। तुमने उसकी गर्दन दबा डाली। अब तक जीवित थी, आकाश में उड़ता हुआ पक्षी थी, अब पिंजड़े में बंद पत्नी है। हां, तुमने आभूषण दे दिए हैं, सुंदर साड़ियां ले आए हो, वह सब तुमने पिंजड़े को खूब सजा दिया है। लेकिन अब रस नहीं बहेगा। और जिसको तुमने पिंजड़े में बंद किया है, वह बदला लेगी। आखिर कौन परतंत्र होना चाहता है? वह भी मालिक होना चाहेगी। वह भी तुम पर कब्जा करना चाहेगी। उसमें भी हजारर् ईष्याएं पैदा होंगी, हजार जलनें पैदा होंगी, हजार महत्वाकांक्षाएं पैदा होंगी। पति सोचता है: मैं मालिक। पत्नी सोचती है: मैं मालिक। दोनों एक-दूसरे पर कब्जा करने की चेष्टा में लगे होते हैं।
यह है ममता का जाल। इस ममता के जाल में, कश्मीरा, कहां हरियाली? धोखा है। या कि दूर का ढोल है सुहावना।
तू पूछती है: "आपने एक प्रवचन में कहा था कि पुरुष के लिए मैं-भाव और स्त्री के लिए मेरा-भाव अर्थात ममता बाधा है। क्या ममता प्रेम का ही दूसरा रूप नहीं है?'
नहीं, जरा भी नहीं। ममता प्रेम की लाश है। प्रेम की सड़ांध है। ममता प्रेम की समाप्ति की घोषणा है। जब तक प्रेम है, तब तक ममता नहीं होती, मोह भी नहीं होता। तब तक एक निश्छलता होती है, एक स्वतंत्रता होती है। जब तक प्रेम है, तब तक प्रेमी एक-दूसरे को मुक्त करते हैं। प्रेम मुक्ति लाता है, ममता बंधन लाती है। दोनों एक कैसे हो सकते हैं?
मगर तेरी बात मैं समझता हूं। शब्दकोश में यही अर्थ लिखा है। और जीवन के सामान्य शिक्षण क्रम में भी यही समझाया जा रहा है कि ममता यानी प्रेम। मगर अस्तित्व के जगत में ममता प्रेम नहीं है, प्रेम का ठीक विपरीत है। अगर प्रेम अमृत है तो ममता जहर है।
तू कहती है: "क्या ममता प्रेम का ही दूसरा रूप नहीं है?'
जरा भी नहीं! जहां से उड़ चुका प्रेम वहां पड़ी रह जाती है एक मुर्दा लाश, उसको तुम ममता कहते हो। फिर पूजो उस लाश को। चढ़ाओ फूल उस पर। लेकिन जीवन उस घर से उड़ चुका। खाली पिंजड़ा रह गया है, हंसा जा चुका।
तूने पूछा: "क्या इतने प्रेमपूर्ण गुण को...'
ममता को मैं प्रेमपूर्ण गुण कहता ही नहीं। ममता अगर ठीक से पहचानी जाए तो घृणा तो हो सकती है, प्रेम नहीं हो सकती। जरा जटिल होगी बात समझनी, क्योंकि सदियों-सदियों का संस्कार हमारा ऐसा है कि ममता यानी प्रेम। और मैं तुमसे कह रहा हूं: ममता का अर्थ ही यह होता है कि प्रेम नहीं है, अब हम चाहते हैं कि कब्जा हो दूसरे पर। ममता राजनीति है, प्रेम धर्म है। ममता मालकियत है, प्रेम मुक्तिदायी है। ममता कहती है कि मुझे कभी मत छोड़ना। ममता कहती है कि मैंने यह लक्ष्मण-रेखा खींची, इसके बाहर मत जाना। ममता कहती है, तुम मेरे हो, और किसी के भी नहीं। ममता बड़ीर् ईष्यालु है। औरर् ईष्या घृणा का हिस्सा है, घृणा की छाया है। ममता ने रूप ले लिया है प्रेम का, मुखौटा ओढ़ लिया है प्रेम का, और इसलिए खूब धोखा दे रही है।
लेकिन सच्चा प्रेम दूसरे पर दावा नहीं करता।
खलील जिब्रान ने ठीक कहा है: तुम अपने बच्चों को प्रेम तो करना, लेकिन अपने विचार मत देना। तुम अपने बच्चों को प्रेम तो करना, लेकिन उन पर अपना अधिकार मत जतलाना। क्योंकि अधिकार जतलाया, अपने विचार दिए--तुमने उनकी गर्दन पर फांसी लगा दी। उन्हें तुमने अपने सांचे में ढाला--कि यह घृणा हो गई, प्रेम न रहा।
दो प्रेमी एक-दूसरे के मालिक नहीं होते, एक-दूसरे के संगी-साथी होते हैं। दो प्रेमी एक-दूसरे से अपेक्षाएं नहीं रखते, मांगें नहीं रखते, शर्तें नहीं रखते। उनका दान बेशर्त होता है। प्रेमी देना चाहता है और ममता लेना चाहती है। ममता छीन-झपट है--ज्यादा! और ज्यादा! और ज्यादा! और ममता का यह भिक्षापात्र कभी भरता नहीं। प्रेम कहता है: ले लो। मैं बांट रहा हूं। मैं धन्यभागी हूं कि तुमने स्वीकार किया। लेकिन प्रत्युत्तर नहीं मांगता प्रेम। ममता देना तो चाहती नहीं, और प्रत्युत्तर मांगती है--दो! ममता का स्वर है--दो! और दो! इतना काफी नहीं है।
कौन पत्नी राजी है अपने पति के प्रेम से? सोचती है: और मिलना चाहिए। कौन पति राजी है अपनी पत्नी के प्रेम से? सोचता है: और मिलना चाहिए। बच्चे प्रसन्न हैं अपने माता-पिताओं से? सोचते हैं: और मिलना चाहिए। और माता-पिता प्रसन्न हैं अपने बच्चों से? सोचते हैं: और मिलना चाहिए। कितना ही मिले, ममता का भिक्षापात्र भरता नहीं। और प्रेम भिक्षापात्र है ही नहीं। प्रेम तो बादशाहत है। प्रेम तो दान है। प्रेम तो देना है। प्रेम तो बांटना है।
ये दोनों बड़ी अलग बातें हैं, कश्मीरा! ममता को प्रेमपूर्ण गुण मत समझ लेना, अन्यथा प्रेम से तू वंचित ही रह जाएगी। कूड़े-कंकड़ बीनती रहेगी, जब कि पास ही हीरों की खदानें थीं। कूड़े-कंकड़ भी कभी-कभी बड़े चमकीले होते हैं और हीरों का धोखा दे सकते हैं। पारखी चाहिए। और प्रेम की परख गहरी परख है। क्योंकि उससे बड़ा कोई हीरा नहीं है। प्रेम तो कोहिनूर है। सभी उसको नहीं समझ पाएंगे।
तूने पूछा: "...प्रेमपूर्ण गुण को, जो कि मेरे जीवन पर छा गया है...'
छा गया होगा तेरे जीवन पर, मगर वह प्रेमपूर्ण गुण नहीं है। फिर से तलाशना। फिर से टटोलना। किसी सस्ती चीज से राजी मत हो जाना। मैं तो चाहता हूं कि सच्चा प्रेम तुम्हें उपलब्ध हो। क्योंकि सच्चा प्रेम एक दिन प्रार्थना बन जाता है। और ममता संसार में भटकाती रहती है। ममता एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे पर भिखारी की तरह भटकाती रहती है। और प्रेम एक दिन तुम्हें परमात्मा के महल में प्रवेश दिला देता है। प्रेम एक दिन तुम्हें परमात्मा का प्यारा बना देता है।
लेकिन प्रेम के पहले पाठ तो यहीं सीखने होंगे मानवीय जीवन में। बच्चों से, पति से, पत्नी से, मित्रों से--इनसे ही पहले-पहले प्रेम के पाठ सीखो! ममता को जाने दो और प्रेम को जगाओ। मांगो मत, दो। दावा मत करो। अधिकार मत जतलाओ। और जिससे भी प्रेम करो, स्मरण रखना कि भूल-चूक से भी उसके आस-पास लक्ष्मण-रेखा न खींची जाए। ध्यान रखना, जिसको भी प्रेम करो, वह तुम्हारे प्रेम के बोझ से दबे न। तुम्हारा प्रेम उसे निर्भार करे, पंख दे, उड़ने की क्षमता दे। तुम्हारा प्रेम उसे और-और लोगों को प्रेम करने के योग्य बनाए।
ममता क्या कहती है? ममता कहती है, बस मुझे प्रेम करना, किसी और को नहीं। ममता ऐसी है, जैसे पति घर से बाहर निकला, पत्नी कहे कि देखो, चौबीस घंटे और कहीं सांस मत लेना। जब लौट कर आओ तो मेरे पास ही सांस लेना। क्योंकि मुझसे विवाह किया है न! मैं तुम्हारा जीवन हूं न! तो हर कहीं सांस लेने में शर्म नहीं आती? जब मैं तुम्हारा जीवन हूं, तो जब मेरे पास बैठो तब मजे से सांस लेना, जी भर कर सांस लेना, खूब ले लेना, ताकि चौबीस घंटे काम आए। ममता ऐसी ही मांग करती है--कि मुझे प्रेम करना, किसी और को नहीं।
ममता तो इतनीर् ईष्यालु है कि जब एक बहुत बड़े संगीतज्ञ बीथोवन से पूछा गया कि तूने विवाह क्यों न किया? तो बीथोवन ने कहा, संगीत से विवाह हो गया, तो मैंने और एक दूसरा प्रतियोगी घर में न लाना चाहा। क्योंकि मेरी पत्नी और मेरे संगीत के बीच संघर्ष होना सुनिश्चित था।
अगर पति अपनी वीणा बजा रहा है तल्लीन होकर और पत्नी मौजूद है, तो उसे क्रोध आता है। मेरे रहते और तुम वीणा में तल्लीन हो? मैं हूं वीणा या वीणा है तुम्हारी पत्नी? कौन है, यह निर्णय होना चाहिए। पत्नियां पतियों के हाथ से किताबें छीन कर फेंक देती हैं--कि मेरे रहते और तुम किताब पढ़ रहे हो, शर्म नहीं आती? पत्नियां बर्दाश्त नहीं कर सकतीं पतियों का संगीत-प्रेम। कठिन हो जाता है। दूसरी स्त्री की तो बात छोड़ दो, संगीत जो कि स्त्री नहीं है, उससे भी इतना प्रेम कठिन हो जाता है।
दुनिया के बड़े कवि, बड़े संगीतज्ञ, बड़े कलाकार, मूर्तिकार, चित्रकार अक्सर अविवाहित रहे। उसका कारण यह नहीं था कि वे कोई पुराने ढब के संन्यासी थे। उसका कुल कारण इतना था कि दो-दो पत्नियों को एक साथ चलाना जरा मुश्किल मामला! झगड़ा-झंझट!
सुकरात की पत्नी इतनीर् ईष्या से भर जाती थी सुकरात से जब वह अपने विद्यार्थियों से बात करता था और अपने मित्रों से दर्शन की चर्चा छेड़ता था...क्योंकि वह ऐसा तल्लीन हो जाता था कि भूल ही जाता था कि पत्नी भी है। एक दिन तो वह इतने क्रोध में आ गई कि उसने उबलती हुई केतली उसके सिर पर से उड़ेल दी। उसका आधा चेहरा सदा के लिए जल गया। उसके शिष्य तो भौचक्के रह गए! एक शिष्य ने पूछा कि आपका इस संबंध में क्या कहना है?
सुकरात ने कहा, कुछ भी कहना नहीं है, मैं उसकी तकलीफ समझता हूं। मैं तुमसे विचार में, चर्चा में ऐसा लीन हो जाता हूं कि उसेर् ईष्या जगती है।
जरा सोचने जैसा है। पत्नी की तो ममता रही होगी, मोह रहा होगा, सुकरात का जरूर प्रेम रहा होगा। सुकरात ने एक क्रोध का शब्द नहीं कहा। सुकरात ने सिर्फ इतना कहा कि मैं उसकी पीड़ा समझता हूं। मुझे उसकी वेदना का अनुभव है। बस इतना। और जहां बात टूट गई थी, वहीं बात शुरू कर दी। यह प्रेम है, जो दूसरे की पीड़ा भी अनुभव करता है। खुद को दी गई पीड़ा से भी ज्यादा जो दूसरे की पीड?ा अनुभव करता है।
लेकिन सुकरात की पत्नी ने जो किया, वह ममता थी, मोह था। वह चाहती थी, सुकरात बस मेरा हो। कि मेरे कान में फुसफुसाए, मुझसे बातें करे। इतने रस से औरों से बातें करे?
कश्मीरा, ममता को प्रेमपूर्ण गुण मत समझो। अधिक स्त्रियों ने यही समझ रखा है। वही स्त्रियों का रोग है। ममता स्त्रियों का रोग है और अहंकार पुरुषों का रोग है। मैं-भाव पुरुषों का रोग है और मेरी चीजें स्त्रियों का रोग है--मेरी साड़ियां, मेरा मकान, मेरा धन, मेरी दौलत, मेरी यह, मेरी वह। इसलिए तुम देखते हो न, हिंदुस्तान में तो हम स्त्री को घरवाली कहते हैं, पुरुष को घरवाला नहीं कहते। बेचारा कमाए वह, ठोकरें खाए वह; सुबह से सांझ तक टूटे, मरे, ढोए बोझ जीवन का; लेकिन घरवाली कहते हैं स्त्री को। उसके पीछे कारण है। क्योंकि ममता, मेरा, वह दावा स्त्री का है। जैसे घर की और सब चीजें उसकी हैं, उन्हीं चीजों में एक चीज पति भी है। उन्हीं चीजों में उसके बच्चे भी हैं।
पुरुष को अहंकार, मैं-भाव भारी होता है। उसके मैं पर चोट नहीं लगनी चाहिए। स्त्री की मेरी चीजों पर चोट नहीं लगनी चाहिए। मगर ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक पुरुष रूप है, एक स्त्रैण रूप है। दोनों से मुक्त होना है, तभी प्रेम का जन्म होता है। अहंकार अपनी समस्त अभिव्यक्तियों में विदा हो, तो प्रेम के मंदिर के द्वार खुलते हैं। और तब प्रेम का मंदिर जल्दी ही धर्म का मंदिर बन जाता है। जहां प्रेम है, वहां धर्म है।
कश्मीरा, तुझे रूखा-सूखा नहीं होना पड़ेगा। मैं लोगों को रूखा-सूखा बनाने में भरोसा नहीं करता। मैं तो उनके विरोध में हूं। इसीलिए तो सारे रूखे-सूखे लोग मेरे विरोध में हैं। मैं तो चाहता हूं लोगों का जीवन हरा हो, खूब हरा हो। खूब उनमें फूल खिलें। खूब पत्तियों से लोग लदें।
लेकिन सपने छोड़ने बड़े मुश्किल होते हैं। ममता तेरा सपना है।

सपना सपना ही रहने दो।

सपना ही लेकर मैं, अपना
यह लघु संसार बसा लूंगी!
मन बहलाने को मैं, अपना
तुमसे स्वर ले कुछ गा लूंगी!
चिर मौन रहे तुमको प्यारा,
मुझको तो अपनी कहने दो!
सपना सपना ही रहने दो!

यह छलना ही संबल मेरा,
यह सपना भी विश्वास भरा!
तुमको पाकर हो जाएगा,
जड़ जीवन भी उल्लास भरा!
विश्वास-लहर पर छहर-छहर,
यह जीवन तरणी बहने दो!
सपना सपना ही रहने दो!

मैं तुमको अपना बना सकूं,
इतना मुझको अधिकार कहां!
फिर भी रोके से रुकता है,
आकुल अंतर का प्यार कहां!
मैं तुमको प्यार करूं जी भर,
इतना सा सुख तो रहने दो!
सपना सपना ही रहने दो!

सपना सपना भी मालूम हो जाए, तो भी व्यक्ति चाहता है कि बना रहे, बना रहे; टूट न जाए, छूट न जाए। लेकिन सपना अगर सपना है तो कितना ही प्यारा हो और कितना ही माधुर्यपूर्ण हो और कितना ही सुखद लगे, सपना ही है--तो व्यर्थ है।
जागो, ममता के सपने से जागो, तो प्रेम का सत्य-संसार शुरू होता है। नींद तोड़ो। अहंकार निद्रा है और निरहंकारिता जागरण है। और तब तुम्हारे जीवन में सच में ही पहली बार उल्लास आएगा, उत्सव आएगा। तुम्हारी जिंदगी मैं बनाना चाहता हूं सतरंगी, इंद्रधनुषी। तुम्हारी जिंदगी मैं बनाना चाहता हूं सातों स्वरों वाली। पूरा सरगम तुम्हारा हो। मगर तुम छोटी-छोटी चीजों से राजी हो--यह मेरा मकान, यह मेरी दुकान, यह मेरा पति, यह मेरा बेटा--तुम छोटी-छोटी चीजों से राजी हो। यह सारा अस्तित्व तुम्हारा हो सकता है! जरा मेरा-भाव छोड़ो।
रामतीर्थ ने कहा है: जिस दिन मैंने अपना छोटा सा आंगन छोड़ दिया, सारा आकाश मेरा आंगन हो गया। और जिस दिन मैंने अपने छोटे से दीये फूंक कर बुझा दिए, सारे आकाश के तारे मेरे दीये हो गए। और जिस दिन मैंने एक घर क्या छोड़ा, सारा अस्तित्व मेरा घर हो गया।
वह ठीक कहा है। मैं कोई शब्दशः नहीं कह रहा हूं कि तुम अपना घर छोड़ दो, अपना आंगन छोड़ दो। सिर्फ ममता छोड़ दो आंगनों से, ताकि सारा आकाश तुम्हारा हो सके--तुम्हारा है। और जब छोटे-छोटे आंगन तुम्हें इतनी हरियाली देते हैं, तो जरा सोचो तो, गणित को फैलाओ तो, सारा आकाश कितनी हरियाली न देगा! जब छोटे-छोटे प्रेम की बूंदाबांदी तुम्हें इतना हरा कर जाती है, तो जब सावन के मेघ बरसेंगे और परमात्मा बरसेगा--अमी बरसे, बिगसत कंवल--तब कितनी हरियाली, कितना उत्सव, कितना शाश्वत जीवन!
मैं तुम्हारी जिंदगी को रोज होली, रोज दीवाली बना देना चाहता हूं। मगर सपने तो छोड़ने होंगे। सत्य के प्रति जागना जरूरी है।

तीसरा प्रश्न: जीवेषणा है क्या? जीवन में इतना दुख हम देखते हैं, कुछ-कुछ समझ में भी आता है, फिर भी जीए जाने का मन क्यों होता है?

जीवेषणा अपने शुद्धतम रूप में परमात्मा है। जीवेषणा अपने शुद्धतम रूप में जीवन की शुद्ध ऊर्जा है। और शाश्वत है। न उसका कोई प्रारंभ है, न उसका कोई अंत है। परमात्मा जीवन है। परमात्मा और जीवन मेरे लिए पर्यायवाची हैं। परमात्मा कोई अलग-थलग बैठा हुआ व्यक्ति नहीं है। यह जीवन का जो अनंत-अनंत विस्तार है, इसका ही एक प्रीतिपूर्ण नाम है परमात्मा। तुम्हारे भीतर जो जीवन की अनंत अभीप्सा है, वह परमात्मा का ही रूप है।
तो एक बात तो जो सबसे पहले कह देना चाहूं वह यह कि जीवेषणा शुभ है, जीवेषणा सत्य है। उससे बचने का न कोई उपाय है, न कोई आवश्यकता है। उससे भागने की कोई जरूरत भी नहीं है। उसे जीने की जरूरत है। उसे भोगो! परम भोगी बनो!
लेकिन तुम्हारा प्रश्न कुछ और है। तुम्हारा जीवेषणा से कुछ और अर्थ है। तुम्हारा अर्थ है: यह शरीर सदा बना रहे। तुम जीवेषणा के अशुद्ध रूपों के संबंध में पूछ रहे हो--कि मैं बड़े पद पर पहुंच जाऊं, कि बहुत धन मेरे पास हो, कि बड़ी प्रतिष्ठा हो, कि बड़ा नाम हो, कि बड़ा यश हो, कि मैं कभी मिटूं न, यह देह बनी ही रहे, बनी ही रहे, यह जीवन कभी हाथ से मेरे छूटे न।
ये जीवेषणा के अशुद्ध रूप हैं। जैसे हीरा कीचड़ में गिर गया हो। और जैसे हीरे पर कीचड़ की पर्तें जम गई हों। ये पर्तें तो धोनी होंगी।
और तुम कहते हो कि समझ में भी आता है कि जीवन में बड़ा दुख है।
नहीं; समझ में अभी आता नहीं, विश्वनाथ भारती! सुनते हो, तर्कयुक्त लगता है, मगर समझ में नहीं आता। सुनते हो, विचारशील हो, तो विचार में संगति देखते हो, मगर हृदय में नहीं उतरती। ऊपर-ऊपर रह जाती है, तिरती-तिरती रह जाती है। एक कान से प्रवेश करती है, दूसरे कान से निकल जाती है। लगती है आई-आई, और आते-आते छूट जाती है, छिटक जाती है हाथ से। पकड़ नहीं बैठ पाती। क्योंकि पकड़ बैठ जाए तो क्रांति हो जाए।
और मन इस संबंध में भी बड़ी होशियारी करता है। मन कहता है, देखो विश्वनाथ, सब तो समझ में आ गया, कि जीवन में दुख ही दुख है। अब क्या जीवन में और मांग करनी, और अपेक्षा करनी, और आकांक्षा करनी?
मन की जो बात समझ में आ गई है, उतने भर से काफी नहीं है। तुम्हारे समग्र तलों पर बात समझ में आनी चाहिए। मन को ही समझ में नहीं, हृदय को भी। हृदय को ही नहीं, तुम्हारी अंतरात्मा को भी। जब तुम्हारे तीनों आयाम, जब तुम्हारी त्रिपुटी, जब तुम्हारी त्रिमूर्ति एक ही समझ में पिरो जाती है जैसे कि कोई माली फूलों को एक ही धागे में पिरो देता है, जिस दिन तुम्हारी समझ तुम्हारी समग्रता की समझ होती है, तुम्हारा रोआं-रोआं जिसके लिए गवाही बन जाता है, उस दिन क्रांति घटित होती है। उस दिन फिर पूछना नहीं पड़ता कि कैसे छोड़ें? नहीं, उतनी गहरी समझ का सहज परिणाम होता है कि जो व्यर्थ है वह छूट जाता है।
तुम कहते हो: "कुछ-कुछ समझ में आता है।'
तो ध्यान रखना, दूसरी बात, समझ या तो पूरी होती है या नहीं होती। कुछ-कुछ, ऐसी समझ होती ही नहीं। वह फिर धोखा है। कुछ-कुछ समझ का कोई मतलब ही नहीं होता। जैसे तुम किसी से कहो कि मुझे तुमसे कुछ-कुछ प्यार हो गया है। तो वह भी थोड़ा चौंकेगा, कुछ-कुछ? मतलब क्या हुआ कुछ-कुछ का? या तो आदमी जिंदा होता है या मरा होता है। कुछ-कुछ जिंदा? या तो आदमी जागा होता है या सोया होता है। कुछ-कुछ जागा? ऐसी बात बनती नहीं। जीवन के सत्य या तो पूरे होते हैं या नहीं होते। जैसे वर्तुल पूरा होता है। तुम यह नहीं कह सकते कि यह वर्तुल थोड़ा अधूरा है। अधूरा वर्तुल वर्तुल ही नहीं होता। पूरा होता है तो ही वर्तुल होता है। तुम यह नहीं कह सकते कि कोई चीज थोड़ी-थोड़ी सत्य है। असंभव! सत्य के खंड नहीं होते। समझ के भी खंड नहीं होते। जब सत्य के ही खंड नहीं होते, तो समझ के खंड कैसे हो सकते हैं?
तो तुम कहते हो: "कुछ-कुछ समझ में आता है।'
वह मन तुम्हें धोखा दे रहा है। वह कह रहा है, देखो, बौद्धिक रूप से समझ में आ रहा है। मगर बौद्धिक समझ कोई समझ नहीं है। सब समझ लोगे और जैसे हो वैसे ही रहे आओगे।
एक आदमी को हम कहें कि यह रहा दरवाजा, निकलना तो इससे निकलना, दीवाल से निकलोगे तो सिर टूट जाएगा। और जब हम दुबारा देखें, वह आदमी फिर दीवाल से निकल कर सिर टकरा रहा है। और हम उससे पूछें कि क्यों भाई, क्या हुआ? तो वह कहे, कुछ-कुछ तो समझ में आता है कि दरवाजा वह है। मगर क्या करूं, आप ही बताएं, कैसे दीवाल से निकलना छोडूं?
अगर समझ में आ गया है कि यह दरवाजा है, तो दीवाल से निकलना छूट ही गया। और अगर समझ में नहीं आया और अभी भी दीवाल से निकलने का मोह लगा है, तो बात साफ है कि अभी भी तुम्हें दीवाल में दरवाजा दिखाई पड़ता है। और वह जो दरवाजा दिखाया गया है, जिसको तुम कहते हो--कुछ-कुछ दिखाई पड़ता है--वह सिर्फ औपचारिक शिष्टाचार निभा रहे हो। तुम यह कह रहे हो कि आपने इतनी मेहनत की, और मैं कुछ-कुछ भी न समझूं, तो बड़ा अन्याय हो जाएगा आप पर। बुद्धों पर कृपा कर रहे हो तुम! कि इतनी मेहनत की बेचारों ने, सदियों-सदियों से समझाते रहे हैं--तो कुछ-कुछ समझ में आता है।
मगर मैं तुम्हें पहली बात ही साफ कर दूं, कुछ-कुछ का कोई मूल्य नहीं है। कुछ-कुछ को मूल्य देना ही मत, अन्यथा धोखे में अटके रहोगे। समझ में आता हो तो दरवाजे से निकलो। समझ का एक ही प्रमाण है: दरवाजे से निकलना। और समझ में न आता हो, तो कृपा करके साफ कहो कि मुझे वह दरवाजा दिखाई नहीं पड़ता। मुझे तो दीवाल में दरवाजा दिखाई पड़ता है। मैं दीवाल से ही निकलता रहूंगा। इसमें कम से कम ईमानदारी होगी। और जहां ईमानदारी है, वहां से सत्य बहुत ज्यादा दूर नहीं होता। इसमें प्रामाणिकता होगी। नहीं तो तुम दोहरी झंझट में पड़ गए। निकलोगे दीवाल से और बातें दरवाजे की करोगे।
यही लोग कर रहे हैं। धर्म की बातें करते हैं और जीते कीचड़ में हैं। कमल की प्रशंसा के गीत गाते हैं और कीचड़ ढोते हैं। बातें स्वर्ग की करते हैं, पृथ्वी पर सरकना भी नहीं आता, रेंगना भी नहीं आता। मुंह में राम-राम, बगल में छुरी। करते कुछ हैं, कहते कुछ हैं। पढ़ते गीता हैं, मगर जीवन में कोई गीत नहीं। भगवद्गीता तो बहुत दूर, गीत भी कोई नहीं जीवन में, गुनगुनाहट भी कोई नहीं। ऐसे तो कुरान पढ़ते हैं, लेकिन आंखों में कोई झलक नहीं है, प्राणों में कोई संगीत नहीं है। यह धोखा पैदा हुआ है। यह कुछ-कुछ समझने के कारण धोखा पैदा हुआ है।
मैं तुमसे दो-टूक बात कहना चाहता हूं। मेरे संन्यासी हो, तो मैं दो-टूक बात ही करना चाहता हूं। कोई गैर-संन्यासी मुझसे पूछता है तो मैं थोड़ा शिष्टाचार भी बरतता हूं। मगर विश्वनाथ, तुम तो मेरे संन्यासी हो। तुमसे कोई शिष्टाचार का नाता नहीं है। तुमसे तो आत्मिक नाता है। मौका लगे तो तुम्हारी पूरी गर्दन काट दूंगा। कुछ-कुछ से नहीं चलेगा।
तुम पूछते हो: "कुछ-कुछ समझ में भी आता है, फिर भी जीए जाने का मन क्यों होता है?'
समझ में नहीं आता, इसलिए जीए जाने का मन होता है। वह समझ सिर्फ होशियारी है। और चूंकि समझ कुछ-कुछ है, बस ऊपर-ऊपर है, थोथी है, छिछली है, मन निश्चिंत अपने दांव खेले चला जाता है। मन कहता है, आज नहीं हुआ, मगर कल नहीं होगा, इसका क्या पक्का है? आज सुख नहीं मिला, कल मिले! जीवन का रस आज नहीं पा सके, लेकिन कल पा लो! इस स्त्री से नहीं मिला, किसी और स्त्री से मिल जाए--कौन जाने! इस पद पर नहीं मिला, किसी और पद पर मिल जाए! तो थोड़ा और तलाश लो। अभी जल्दी क्या है? अभी निर्वाण की इतनी उत्सुकता क्या है? निर्वाण तो होना ही है आखिर में! इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में हो जाएगा!
इसलिए भारतीयों ने तो बड़ी सुगम तरकीब खोज ली--अनंत जन्मों का सिद्धांत खोज लिया। इससे आलस्य को बड़ी सुविधा मिल गई। करने की कोई जल्दी न रही। आदमी ऐसा बेईमान है कि श्रेष्ठ से श्रेष्ठ बात में से कुछ ऐसी तरकीब निकाल लेता है। आदमी ऐसा वकील है, ऐसा कानूनविद है, हर चीज में से तरकीब निकाल लेता है।
पूरब का एक अपूर्व सिद्धांत कि जीवन बार-बार होता है, अनंत बार होता है, पुनर्जन्म होता है, जिन्होंने कहा था, उनका प्रयोजन कुछ और था। बुद्ध ने कहा, महावीर ने कहा, कृष्ण ने कहा, सबने कहा। भारत में एक ही सिद्धांत है जिस पर भारत के सारे धर्म राजी हैं। बाकी किसी सिद्धांत पर राजी नहीं हैं। इसलिए यह सिद्धांत साधारण नहीं हो सकता। महावीर कहते हैं, कोई परमात्मा नहीं है। आत्मा और संसार काफी हैं। और बुद्ध तो कहते हैं कि न कोई परमात्मा है, न कोई आत्मा है, और न कोई संसार है। यह सब सपना है। और हिंदू तीनों मानते हैं--संसार को भी मानते हैं, आत्मा को भी मानते हैं, परमात्मा को भी मानते हैं। बड़े विरोध हैं। मगर एक संबंध में तीनों राजी हैं। और कभी-कभी बहुत आश्चर्य होता है कि इस एक सिद्धांत पर तीनों क्यों राजी हैं कि पुनर्जन्म होता है?
उनके इशारे, उनके इरादे कुछ और थे। उनका इरादा यह था कि तुम्हें यह बात समझ में आ जाए कि यही गोरखधंधा तुम पहले करते रहे न मालूम कितनी बार, अब भी कर रहे हो, आगे भी करते रहो--ऊबना है या नहीं ऊबना है?
तुम जानते हो, मनुष्य अकेला प्राणी है जो ऊब सकता है, जिसकी क्षमता ऊबने की है। दुनिया का कोई और जानवर ऊबता नहीं। तुमने किसी भैंस को ऊबे देखा? कि बैठी हो ऊबी हुई, बिलकुल उदास, बोर्ड। कभी नहीं। तुमने किसी गधे को ऊबे देखा? भैंस वही घास रोज चरती रहती है, वही-वही घास, कभी नहीं ऊबती। गधा वही-वही रेंकना रोज करता रहता है, वही संगीत, वही स्वर, अपना एकतारा बजाता रहता है, कभी नहीं ऊबता। मनुष्य को छोड़ कर पृथ्वी पर कोई प्राणी ऊबने की क्षमता नहीं रखता। यह बात महावीर, बुद्ध और कृष्ण, सबको दिखाई पड़ गई कि मनुष्य के भीतर अगर कोई एक अदभुत क्षमता है, तो वह ऊब जाने की क्षमता है। इसका उन्होंने उपयोग करना चाहा। इसकी विधि बनाई। इसका उपाय खोजा।
तो मनुष्य को उबाने के लिए सबसे बड़ी बात क्या हो सकती है? ऊब किस बात से पैदा होती है? पुनरुक्ति से ऊब पैदा होती है। अगर तुम्हें वही-वही बात रोज-रोज सुननी पड़े, अगर वही-वही कहानी रोज-रोज पढ़नी पड़े, अगर वही-वही फिल्म रोज-रोज देखनी पड़े, तो तुम ऊब जाओगे। और ऊब जाओगे तो तुम छुटकारा पाना चाहोगे--कि कैसे छुटकारा हो?
भारतीय सारे धर्म कहते हैं कि अनंत बार तुम यही गोरखधंधा कर चुके हो, जो तुम कर रहे हो--ममता के जाल, और धन-पद-प्रतिष्ठा के फैलाव, मेरात्तेरा, झगड़े-झांसे, अदालतें-मुकदमे, सब कर चुके हो। अनंत बार। अभी भी कर रहे हो। और आगे भी अनंत बार करते रहने का इरादा है? ऊबोगे नहीं? कब तक ऊबना है? जिस दिन ऊबोगे इस सब से, उसी दिन तुम्हारे भीतर मनुष्य अपनी गरिमा को उपलब्ध होगा।
यह तो उनकी नजर, यह तो उनका इरादा था। मगर हमने इसमें से क्या तरकीब निकाली? हम भी कुछ दांव में उनसे पीछे नहीं रहते! बुद्ध अपने पासे फेंकते हैं, हम भी कुछ कम नहीं हैं, हम भी शकुनि की चालें चलते हैं। हम भी तरकीबें निकालते हैं। तुम डाल-डाल, तो हम पात-पात! हम भी कहते हैं कि तुम हमें उबाना चाहते हो? इतना आसान नहीं! हम कहते हैं, जब अनंत जन्म हैं तो जल्दी क्या? हमारी कानूनी तरकीब देख रहे हो? हम कहते हैं, तो फिर जल्दी क्या है? तो फिर थोड़े दिन और जरा देख लें। थोड़े दिन खेल और देख लें। अगले जन्म में निपट लेंगे--ध्यान, भक्ति अगले जन्म में कर लेंगे। अभी तो थोड़े दिन और...एक चुनाव और लड़ लें! यह बयासी करीब आया जा रहा है! इस बार और दांव लगा लें! एक बार और लाटरी का टिकट खरीद लें! यह धंधा बिलकुल हाथ में है, इसको तो न छोड़ें! इसको तो पूरा कर लें! यह ग्राहक आ ही गया दुकान पर, इसको तो लूट ही लें! फिर अगले जन्म में देख लेंगे। फिर थोड़ा ध्यान ज्यादा करना पड़ेगा तो थोड़ा ज्यादा कर लेंगे। और अगला जन्म कोई अभी तो आया नहीं जाता। अभी देर है काफी। आगे टालते रहो!
हमने तरकीब निकाल ली। बुद्धों ने चाहा था कि हम ऊब जाएंगे और ऊब से हमारे जीवन में क्रांति पैदा हो जाएगी। हम ऊबे तो नहीं, हम आलसी हो गए, महाआलसी हो गए। भारत से ज्यादा आलसी देश पृथ्वी पर कोई भी नहीं है। और इसके आलस्य के पीछे पुनर्जन्म के सिद्धांत की पृष्ठभूमि है।
भारत की यह दुर्दशा देख कर, पश्चिम में जो धर्म पैदा हुए--यहूदी, ईसाई और इसलाम--उन तीनों ने पुनर्जन्म का सिद्धांत नहीं माना। भारत की दुर्दशा देख कर। भारत की दुर्दशा पुरानी है। यह तो सबसे पुरानी भूमि है जगत में। यह तो सबसे पुरानी सभ्यता और संस्कृति है। इसकी भूलों से उन्होंने पाठ लिए। वे तो तीनों धर्म बाद के धर्म हैं। उन्होंने तीनों ने इनकार कर दिया पुनर्जन्म के सिद्धांत से, क्योंकि उसमें से हमने चालबाजी निकाल ली थी।
इसका यह अर्थ नहीं है कि मोज़ेज़ को, मोहम्मद को, जीसस को पता नहीं है पुनर्जन्म का। उनको उतना ही पता है जितना बुद्ध को, महावीर को, कृष्ण को। मगर उन्होंने इसकी बात नहीं की, क्योंकि इसका दुष्परिणाम देखा जा चुका था। सिद्धांत सच था, लेकिन लोग बेईमान हैं। सिद्धांत क्या करेगा? दरवाजा तो सच था, लेकिन लोग दीवाल से ही निकलते जा रहे हैं। तो उन्होंने तीनों ने एक बात स्वीकार की कि एक ही जन्म है, और जो कुछ करना है इसी जन्म में करना है।
उनकी नजर भी बड़ी महत्वपूर्ण थी। उनके इरादे भी उतने ही शुभ थे। वे चाहते थे--ताकि तुम्हारे जीवन में त्वरा आ जाए, तीव्रता आ जाए। एक ही जन्म है! तुम चौंक जाओ, अवाक हो जाओ। और तुम कहो, जो भी करना हो, जल्दी कर लूं। कहीं ऐसा न हो कि यह जीवन हाथ से निकल जाए; और फिर दुबारा तो अवसर मिलेगा नहीं। एक ही अवसर है। तो ध्यान करना है तो ध्यान, भक्ति करनी है तो भक्ति, जीवन को अगर परमात्मा में समर्पित करना है तो कर ही लूं, कल पर छोड़ना ठीक नहीं। यह तो इरादा था मोज़ेज़ का, मोहम्मद का, जीसस का।
लेकिन आदमी तो बेईमान का बेईमान है, वह पूरब का हो कि पश्चिम का, कोई फर्क नहीं पड़ता। पश्चिम के आदमी ने इससे क्या बेईमानी निकाली? उसने निकाला: एक ही जीवन है, भाई, भोग ही लो। फिर मिलेगा नहीं। फिर दुबारा तो मिलना नहीं है, इसलिए जितना लूट सको, लूट लो। जितना चूस सको, चूस लो। खाओ, पीओ, मौज करो। एक ही जीवन है। चार दिन की चांदनी है, फिर अंधेरी रात। तो गा लो, नाच लो, मस्त हो लो। भोग लो, कमा लो। जो भी महत्वाकांक्षाएं पूरी करनी हैं, कर लो।
और चूंकि एक ही जीवन है, तो पश्चिम में बड़ी आपाधापी पैदा हो गई, बड़ी भाग-दौड़ पैदा हो गई। इसलिए पश्चिम में स्पीड पैदा हुई। हर चीज में, जल्दी करो! इसकी बहुत फिकर नहीं है कि समय बचा कर क्या करोगे? समय बचना चाहिए। जहां एक घंटे में पहुंच सकते हो, वहां एक मिनट में पहुंच जाओ। फिर चाहे बाकी जो उनसठ मिनट बचे, ताश खेलो--क्योंकि समय कैसे कटे? बड़ी भाग-दौड़ पैदा हुई! पश्चिम में जो इतनी त्वरा आई, गति आई, उसके पीछे सिद्धांत है एक जन्म का।
मगर उसके दुष्परिणाम हुए। जैसे हम आलसी हो गए, पश्चिम तनावग्रस्त हो गया। जब इतनी भाग-दौड़ होगी तो चित्त तनावग्रस्त होगा। पश्चिम विक्षिप्त हो गया। भागो! कहीं ठहरना नहीं है, रुकना नहीं है, समय हाथ से जा रहा है। इसलिए जल्दी करो। तो हर काम जल्दी किया जा रहा है।
किसी चीज को विश्राम से, शांति से भोगने की क्षमता पश्चिम की समाप्त हो गई है। भोजन है, तो जल्दी अंदर फेंक दो। लोग घूमने जाते हैं तो कार में जाते हैं। कार जा रही है साठ-सत्तर-अस्सी मील की रफ्तार से। न झाड़ दिखाई पड़ते हैं, न फूल दिखाई पड़ते हैं, न पक्षियों की आवाज सुनाई पड़ती है--घूमने गए थे!
कल मैं एक अंग्रेज लेखक की डायरी पढ़ रहा था। उसने लिखा है कि मेरे पास कार है, मैं दो सौ मील का चक्कर लगा आता हूं, फिर भी मुझे उतना आनंद नहीं आता, जितना मेरे पिता को पांच मील का चक्कर लगाने में आता था। क्योंकि पक्षी, और पौधे, और वृक्ष, और सूरज, और सूरज की छनती हुई किरणें वृक्षों से! हाईवे पर भागती हुई कारों को ये सब कहां?
लोग तेजी से यात्रा कर रहे हैं, सारी दुनिया का चक्कर लगा रहे हैं। पर्यटक सारी दुनिया में घूमते फिर रहे हैं। कहीं कुछ सुख नहीं दिखाई पड़ता, आनंद नहीं दिखाई पड़ता। पश्चिम में एक तीव्रता आ गई, जल्दी करो! इसलिए पश्चिम एक ही शादी से राजी नहीं हो सकता। दस-पांच बार स्त्रियां बदल लो, एक ही जिंदगी है। पता नहीं किस स्त्री से सुख मिल जाए, किस पुरुष से सुख मिल जाए! नौकरियां बदल लो। तीन साल से ज्यादा अमरीका में कोई आदमी एक धंधे में नहीं रहता। और तीन साल से ज्यादा एक गांव में भी नहीं रहता। और तीन साल से ज्यादा एक शादी में भी नहीं रहता। यह तीन का आंकड़ा बड़ा आध्यात्मिक आंकड़ा है। यह पुराने दिनों से ही चला आ रहा है--त्रिमूर्ति, त्रिवेणी, त्रिपुटी। अब यह नई त्रिवेणी, यह नई त्रिपुटी, यह नई त्रिमूर्ति। तीन साल में जल्दी झटपट करो! जिंदगी हाथ से भागी जा रही है! कहीं विराम मत लगाओ!
तो पश्चिम विक्षिप्त हो रहा है। चाहा था कुछ और--कि तुम परमात्मा को याद करना, क्योंकि जिंदगी जल्दी हाथ से चली जाएगी, कल पर मत टालना। और पूरब ने चाहा था कुछ और--कि तुम ऊब जाना, कि यही गोरखधंधा बहुत बार कर चुके, अब तो प्रार्थना करो कि छुटकारा दिला दो इस आवागमन से। मगर लोग आलसी हो गए। लोग बेईमान हैं। बड़े से बड़े सत्यों का भी ऐसा अनुवाद करते हैं कि सत्य का ठीक विपरीत हो जाता है।
तुम पूछते हो: "फिर भी जीने का मन क्यों होता है?'
विश्वनाथ, मन तुम्हें समझाए जाता है कि अभी तक जो हुआ, माना दुख है, मगर कल का क्या! कल की क्या गारंटी है! जो आज तक नहीं हुआ, वह कल हो सकता है।

हर अंधेरा या उजाला वक्त
यों तो बीत जाता है,
कुछ खुशी के, कुछ गमों के रंग भरने
रोज आता है,
न्याय के, अन्याय के सिक्के चला कर
मूल्यमानों को कहीं सूली चढ़ा कर
नित नये कल की उमंगों को सजा कर
डूब जाता है।

वक्त कितना सख्त लेकिन पारदर्शी है!
वक्त लेकिन, हार जाने को
कभी कहता नहीं है,
वक्त पाकिट या तिजोरी में
छुपा रहता नहीं है।
वक्त कहता है, खिलेंगे फूल कल
कुछ और प्यारे
वक्त कहता है, रहेंगे
अब नहीं सपने कुंआरे।
वक्त कहता है--
गलत होना, बहुत ज्यादा गलत है।
वक्त कलियों की दुआ है,
वक्त किरणों की शपथ है।
वक्त कहता है--
सभी का कल बड़ा मोहक सुखी है,
किसलिए अंतर्मुखी हो?
किसलिए यह बेरुखी है?
वक्त युग के अश्रु चुनता है
वक्त सबका दर्द सुनता है
वक्त सचमुच क्रांतदर्शी मर्मस्पर्शी है
वक्त कितना सख्त लेकिन पारदर्शी है!

समझ तो पक्की नहीं है, तो समय धोखा देगा।
वक्त लेकिन, हार जाने को
कभी कहता नहीं है,
वक्त कहता है, खिलेंगे फूल कल
कुछ और प्यारे
वक्त कहता है, रहेंगे
अब नहीं सपने कुंआरे।
वक्त कहता है--
गलत होना, बहुत ज्यादा गलत है।
वक्त कलियों की दुआ है,
वक्त किरणों की शपथ है।
वक्त कहता है--
सभी का कल बड़ा मोहक सुखी है,
किसलिए अंतर्मुखी हो?
किसलिए यह बेरुखी है?
वक्त युग के अश्रु चुनता है
वक्त सब का दर्द सुनता है
वक्त सचमुच क्रांतदर्शी मर्मस्पर्शी है
वक्त कितना सख्त लेकिन पारदर्शी है!
समय धोखा देता है अगर समझ न हो। समय बड़ा मनमोहक है। समय कहे ही चला जाता है: जरा और, जरा और, थोड़ी प्रतीक्षा और। अब आई मंजिल, अब आई मंजिल, सपने पूरे होने के करीब हैं, अभी तो अंतर्मुखी मत हो जाओ--अभी यह कैसी बेरुखी है? अभी उदासीन मत हो जाओ, अभी संन्यासी मत हो जाओ। कौन जाने कल सब हो जाए जो सदा से चाहा था और अब तक नहीं हुआ है!
समझ नहीं है तो समय का तुम पर प्रभाव होगा।
यह जान कर तुम थोड़े हैरान होओगे कि मन और समय एक ही घटना के दो नाम हैं। बोध और समय से मुक्ति एक साथ घटती है। बोध कालातीत है। इसलिए जैसे ही ध्यान में प्रवेश करोगे या भक्ति में, वैसे ही तुम पाओगे--समय मिट गया, तुम समय के बाहर हो गए। जहां विचार नहीं, वहां समय नहीं। और जहां विचार हैं, वहां समय है।
जिंदगी के भबकते हुए मैखाने से,
बादा-एत्तल्खी-ए-अय्याम अभी पीना है।
समय समझाए चला जाता है। नये प्रलोभन दिए जाता है। वह कहता है, अभी तो जिंदगी की शराब पीने को बाकी है।

जिंदगी के भबकते हुए मैखाने से,
बादा-एत्तल्खी-ए-अय्याम अभी पीना है।
साजगारी नहीं करती है हवा-ए-इमरोज,
फिर भी उम्मीद पे फर्दा के हमें जीना है।

नारसाबख्त जमाने का बहीमाना चलन,
कितनी उफ्तादें हैं दुनिया में मोहब्बत के लिए।
और बेरूह रवायत का फसूर्दा निजाम
ये भी मिनजुमला-ए-आफात है उल्फत के लिए।

दर्द के बोझ से एहसास दबा जाता है,
हौसले पस्त हुए जाते हैं तदबीरे-शल।
तीरा-ओत्तार है दुनिया-एत्तमन्ना की फिजा,
छा रहे हैं गमो-आलाम के गहरे बादल।

टिमटिमाता हुआ उम्मीद का नन्हा सा चिराग,
किसी मायूस के सीने का महकता हुआ दाग।
अब भी जलता है मगर गम के शबिस्तानों में।

दुख भरी रातें हैं, मगर एक उम्मीद का चिराग जलता रहता है, एक आशा का चिराग जलता रहता है।
टिमटिमाता हुआ उम्मीद का नन्हा सा चिराग,
किसी मायूस के सीने का महकता हुआ दाग।
अब भी जलता है मगर गम के शबिस्तानों में।
जिंदगी के भबकते हुए मैखाने से,
बादा-एत्तल्खी-ए-अय्याम अभी पीना है।
साजगारी नहीं करती है हवा-ए-इमरोज,
फिर भी उम्मीद पे फर्दा के हमें जीना है।
समय धोखा देगा। मन धोखा देगा। और तब तक आशा बनी रहेगी। हर निराशा के बावजूद भी आशा बनी रहेगी। और हर उम्मीद के मर जाने के बाद भी भीतर एक उम्मीद का दीया टिमटिमाता रहेगा। इसी को तुम जीवेषणा कह रहे हो।
यह जीवेषणा नहीं है। यह जीवेषणा का विकृत रूप है, विक्षिप्त रूप है। इसे शुद्ध करो। कल जीना है, तो जीवेषणा विकृत। अभी जीना है, तो जीवेषणा शुद्ध होने लगती है। वर्तमान में जीओ, जीवेषणा शुद्ध होने लगती है। वर्तमान के अतिरिक्त न कोई अतीत बचे, न कोई भविष्य; यह क्षण बस तुम्हें समग्रीभूत रूप से घेर ले, सब तरफ से घेर ले; इस क्षण के अतिरिक्त और कोई क्षण न हो, तो उस क्षण की शुद्धि में समय विलीन होगा, मन दूर छूट जाएगा, आशा-निराशा के जाल समाप्त हो जाएंगे। और उस क्षण की शुद्धि में तुम जीवेषणा को किसी और ही रंग और रूप में पाओगे। तुम जीवेषणा को परमात्मा के रूप में पाओगे। और तब उसे जीवेषणा कहना ठीक नहीं है। एषणा का अर्थ होता है वासना। तब तो उसे जीवन कहना ही ठीक है।
परमात्मा जीवन है। परमात्मा शाश्वत जीवन है। लेकिन हमारी उससे पहचान नहीं। और चूंकि हमारी उससे पहचान नहीं और हम सोचते हैं, शरीर ही हमारा जीवन है, इसलिए मन में आकांक्षा उठती है कि बचा लें, थोड़ी देर और ज्यादा जी लें। अभी कुछ भी तो भोगा नहीं, थोड़ा और जी लें।
उपनिषदों में ययाति की कथा है।
ययाति की मौत आई। वह सौ साल का हो गया था। सम्राट था। उसकी सौ रानियां थीं, उसके सौ बेटे थे। जब मौत आई, ययाति थर्रा गया। कौन न थर्रा जाए! यद्यपि सौ साल जी लिया था, सौ रानियां थीं, सौ बेटे थे, बड़ा साम्राज्य था, मगर कब कभी कुछ पूरा होता है! कब तृप्ति होती है! कितना ही हो, अतृप्ति तो अतृप्ति ही बनी रहती है। गिड़गिड़ाने लगा, मौत के सामने हाथ जोड़ने लगा, कहा, यह तो बहुत जल्दी हो गई; कुछ खबर तो करनी थी! कुछ वर्ष दो वर्ष पहले मुझे खबर कर दी होती, तो जो मंशाएं मेरी अधूरी रह गई हैं, वे मैं पूरी कर लेता। मैं तो कुछ पूरा कर ही नहीं पाया और तू द्वार पर आ गई, बिना खबर दिए! दया कर, थोड़ा समय और दे दे, तो अधूरे सपने पूरे कर लूं। सदा-सदा इच्छाएं पलती रही हैं, उनको भर लूं। अतृप्त, भूखा मुझे मत मार।
मृत्यु ने कहा, मुझे ले जाना तो पड़ेगा। तो एक काम करो--उस बूढ़े पर दया आ गई--तुम्हारा बेटा अगर कोई जाने को राजी हो तुम्हारी जगह, तो मैं उसको ले जाऊं। मगर ले जाना तो मुझे पड़ेगा ही।
ययाति अपने बेटों के सामने गिड़गिड़ाने लगा। जरा सोचो, सौ साल का बूढ़ा, अपने जवान बेटों के सामने गिड़गिड़ाने लगा कि कोई भी राजी हो जाओ।
जो बुजुर्ग बेटे थे--कोई सत्तर साल का था, कोई अस्सी साल का भी था, कोई साठ का था, कोई पचास का था--वे तो कन्नी काट गए, वे तो यहां-वहां देखने लगे। और स्वाभाविक। जब सौ साल में तुम्हारी इच्छाएं पूरी नहीं हुईं, तो पचास साल के बेटे की इच्छा कहां से पूरी हो गई होगी? वह क्यों मरे? क्यों किसी के लिए मरे?
हम कहते हैं लोगों से कि मैं तुम्हारे लिए मर जाऊंगा, लेकिन अगर यह मौका आ जाए, तो हम कहेंगे--अरे, वह तो बात की बात थी। कहने की बात थी। पति कहता है पत्नी से कि मैं मर जाऊंगा तेरे बिना। कोई मरता-करता नहीं। पत्नियां कहती हैं कि मर जाएंगे तुम्हारे बिना। लेकिन अंग्रेजों को सतियों की प्रथा बंद करनी पड़ी, क्योंकि पत्नियां जबर्दस्ती जलाई जा रही थीं। और अगर मरना ही होता तो कानून तो नहीं रोक सकता था। पहले कितनी सतियां होती थीं! अब तो कोई सती होती दिखाई पड़ती नहीं। वे सतियां जरूर जबर्दस्ती करवाई जा रही थीं। पूरा इंतजाम किया गया था उनको जबर्दस्ती जला देने का। कौन मरना चाहता है!
बेटे इधर-उधर देखने लगे। सिर्फ एक छोटा बेटा, सबसे जवान बेटा, जिसने अभी जिंदगी का कुछ भी नहीं देखा था, जिसकी उम्र बीस साल से ज्यादा नहीं थी, वह खड़ा हो गया; उसने कहा कि मैं तैयार हूं, मैं जाता हूं।
बाप खुश हो गया। बाप ने बड़े आशीष दिए। जरा सोचो! बाप ने बड़े आशीष दिए कि बेटे, तू ही मेरा असली बेटा है। तुझे मेरे आशीर्वाद! तुझे बहुत पुण्य होगा! तू अपने बाप को बचा रहा है।
लेकिन मौत को बहुत दया आई इस बेटे पर, कि यह बूढ़ा खुद तो बच रहा है और बीस साल के जवान को भेज रहा है, जिसने अभी कुछ भी नहीं देखा, अभी जीवन के न कोई कड़वे-मीठे अनुभव हुए। मौत ने उस बेटे से कहा कि तू सोच ले एक बार! तू नासमझ मालूम होता है! तू यह नहीं देखता कि तेरा बाप सौ साल का होकर भी मरना नहीं चाहता है! तेरे भाई सब बैठे हैं। तेरे निन्यानबे भाई चुप बैठे हैं, नीची नजरें किए, कोई नहीं मरना चाहता। तू क्यों मरना चाहता है?
उस बेटे ने बड़ी बहुमूल्य बात कही। उसने कहा कि मैं यही सोच कर मरना चाहता हूं कि सौ साल के मेरे पिता हो गए, इनकी इच्छाएं पूरी नहीं हुईं, तो अब अस्सी साल मैं क्यों घिट्टे खाऊं? ये सौ साल के होकर भी गिड़गिड़ा रहे हैं, सौ साल का होकर मैं भी गिड़गिड़ाऊंगा। ये मेरे भाई कोई अस्सी साल के हैं, कोई सत्तर साल के, कोई साठ साल के, ये सिर झुकाए बैठे हैं। अगर ये सत्तर-अस्सी साल के होकर भी जीवन की इच्छाएं पूरी नहीं कर पाए, तो मैं कैसे कर पाऊंगा? इन सबको देख कर ही मैं राजी हो गया हूं कि यह बात ही फिजूल है! यह मामला कुछ उलझने जैसा नहीं है। तू मुझे ले चल।
फिर भी बाप को होश न आया, बेटे ने जब ऐसी अदभुत बात कहीं। तब भी किसी और भाई को होश न आया, लोग बैठे ही रहे। लोग ऐसा पकड़ते हैं जिंदगी को!
कहानी बड़ी प्रीतिकर है। सौ साल बीत गए, बेटे की उम्र बाप को लगी। सौ साल के बाद फिर मौत आई, और बाप फिर गिड़गिड़ाने लगा। और उसने कहा कि अभी तो कुछ भी पूरा नहीं हुआ। ये सौ साल ऐसे बीत गए कि पता ही नहीं चला। पल में बीत गए। तब तक उसके सौ बेटे और पैदा हो चुके थे। नई-नई शादियां कर ली थीं उसने। मौत ने कहा, तो फिर किसी बेटे को भेज दे।
और ऐसा चलता रहा। ऐसा, कहते हैं, दस बार हुआ। कहानी बड़ी प्रीतिकर है! हजार साल का हो गया बूढ़ा, तब भी...मौत आई और मौत ने कहा, अब क्या इरादे हैं?
ययाति हंसने लगा। उसने कहा, अब मैं चलने को तैयार हूं। नहीं कि मेरी इच्छाएं पूरी हो गईं--इच्छाएं वैसी की वैसी अधूरी हैं--मगर एक बात साफ हो गई कि कोई इच्छा कभी पूरी हो ही नहीं सकती। मुझे ले चलो! मैं ऊब गया। यह भिक्षापात्र भरेगा नहीं। इसमें तलहटी नहीं है। इसमें कुछ भी डालो, यह खाली का खाली रह जाता है।
जीवेषणा शरीर से बंधी हो, इच्छाओं से बंधी हो, मन से बंधी हो, तो संसार। और जीवेषणा सबसे मुक्त हो जाए--न संसार, न शरीर, न मन--तो एषणा नहीं रह जाती, जीवन ही रह जाता है। शुद्ध जीवन। खालिस जीवन। शुद्ध कुंदन। वही निर्वाण है। वही मोक्ष है।


आखिरी सवाल: मैं आपको सुनता हूं तो चकित हो रह जाता हूं! अवाक होता हूं, आश्चर्यविमुग्ध होता हूं, लेकिन संन्यास में छलांग नहीं लगा पाता हूं। क्या करूं?

राधारमण! अवाक होते हो? सच, अवाक होते हो? सच, विस्मयविमुग्ध होते हो? आश्चर्यचकित होते हो? तब तो छलांग लग ही जाएगी। फिर होश किसको रहेगा छलांग से रुकने का? मदमस्त होते हो? तो पता ही नहीं चलेगा कब छलांग लग गई। छलांग लग जाएगी तभी पता चलेगा कि अरे, छलांग लग गई!
मगर तुम कंजूसी कर रहे हो। थोड़े-थोड़े अवाक होते होओगे--मात्रा में, होम्योपैथी की मात्रा में! बच-बच कर! ज्यादा बरसने लगता होऊंगा तो छाता लगा लेते होओगे। ऐसे दूर-दूर खड़े रहते होओगे, द्रष्टा की तरह। अभी तुम्हारा-मेरा संबंध भोक्ता की तरह नहीं जुड़ा। अभी तुम्हारा संबंध सुनने वाले की तरह है, एक श्रावक की तरह। अभी तुम्हारा संबंध एक भक्त की तरह नहीं जुड़ा। और भक्त का ही संबंध होता है। श्रावक का कोई संबंध होता है! सुन लिया, बात अच्छी लगती है, थोड़ा इकट्ठा कर ली, थोड़ा ज्ञान बढ़ गया, थोड़ी ज्ञान की संपदा बढ़ गई, थोड़ा अहंकार को और आभूषण मिल गए, थोड़ा बात करने को बात मिल गई, थोड़ा औरों के सामने ज्ञान बघारने की सुविधा मिल गई।
मगर अगर सच ही तुम कहते हो कि अवाक हो रहे हो, चकित हो रहे हो, विस्मयविमुग्ध हो रहे हो, तो फिर पूछना क्या है? और छलांग भी कोई पूछ-पूछ कर लगानी होती है? छलांग तो वही जो बिना पूछे लगानी। पूछ-पूछ कर लगानी तो वह तो सीढ़ियां चढ़ना है। वह तो हिसाब-किताब बिठालना है। कि क्या मिलेगा, क्या नहीं मिलेगा? क्या फायदा, क्या हानि? कितना जाऊं, कितना न जाऊं? इतना जाऊं कि अगर जरूरत पड़े तो वापस लौट सकूं।
छलांग का मतलब होता है: दीवानगी। छलांग का अर्थ होता है: पागल प्रेम।
चूक मत जाना! सुनते-सुनते ही मत रह जाना!

जब वक्त का अनोखा रथ चमकदार
रुक गया अकस्मात आकर तुम्हारे द्वार
तुम रह गए अवाक
अविश्वास भरी आंखों से देखते रहे चकाचौंध
सुनते रहे जयकार,
समय की मुड़ती हिलोर पर,
बह कर आया हुआ
निर्णय का स्वर्ण-मुकुट
अनायास
चकरा कर घूम गई धरती
तुम्हारे आस-पास,
मुग्ध देखते ही रहे
ज्वार की अपार फेन-चूड़ा पर उठा हुआ
अमृत-घट
वक्त का रथ जो तुम्हारे लिए लाया था
तुमने उसे लिया नहीं!
बांट कर पीया नहीं!

जब एक अकल्पित अनहोनी दिशा से
सन्नाटा फैलाता तूफान आया था
दमघोंट अंधकार चारों तरफ छाया था,
तुम्हारी अलग-अलग नावें
लोप हुई थीं झपट उड़ते कुहासों में
लोगों ने तब एक बड़ा दीपक जलाया था
तूफान चीरता, पथ को दिखाता जो
किनारे तुम्हें लाया था,
भूल कर भूमिका
तुम वह अजूबा सबको दिखाने लगे
इस हाथ उस हाथ
आपस में दीपक फूंकने, बुझाने लगे
और गहरे अंधकार गर्त में
लोग समाने लगे
वह चिराग चौमुख कर
लोगों को तुमने दिया नहीं!
रोशनी पर धूल पड़ी
चांदना हुआ नहीं!

देखो, वह ताजी खुली गंध-हवा
बही थी जो इस विशाल वृक्ष पर
होने लगी है मंद
उलटी बयार में
एक-एक गलत कदम
घनघनोर चक्रमित बगूला बना जाता है
उलझ रहीं
जूझ रहीं आपस में डालियां
झौरों से झौंरे
पत्तों से पत्ते
तिनकों से क्षुद्र तिनके
जल रहे असहाय नीड़
फट रहे चिंदियों से फल-फूल
फूट रहे भरे-भरे मधुकोष
वृक्ष का शरीर
जिंदा लोथड़ों में कट कर
उछल-उछल जाता है
धूल और धक्कड़ में
भन्नाती निकल पड़ीं रक्त-सोख मक्खियां
निर्द्वंद्व घूमते हैं सीना तान हिंस्र जंतु
घात लगा खड़े हर तरफ क्रूर बटमार
कांपते हैं निर्दोष
दमखुश्क हर द्वार
अडिग महावृक्ष अभी करता है इंतजार,
माथे पर अनुभव की तेजस्वी रेखाएं
देख रहीं धारावाही त्रिकाल
देख रहीं
इस अखंड वृक्ष का किसे है खयाल,
शीश जिसका खुद ही है आकाश
जड़ों में जमी बैठी हैं
अनगिन शताब्दियां
मनवंतर बन गए जिसके रस की सुवास
छाया के छत्रक में
संस्कृति की जगमग नक्षत्र माल
ममता बनी गंगा
तप जिसका बन गया दिपनार हिमवान
मोर पंख मैदान
विंध्या लालिम हिरण्य
धीरज का अलख ध्यान
रांगोली वन प्रांतर, गांव, खेत, खलिहान
सतिए पर अक्षत सी संतान
उठ रही इस औघड़ तरु से
मौन काल की पुकार
छाया भोगने वालो होशियार
यह सब तुम पर निछावर किया
हर बार
किंतु वक्त करता नहीं
किसी का भी इंतजार
समय का रथ ज्यादा रुक नहीं पाता है
रखा-रखा अमृत भी विष बन जाता है
चूका हुआ क्षण कभी वापस नहीं आता है।

अवाक हो? आश्चर्यविमुग्ध हो? चकित हो? छलांग का भाव उठा? फिर पूछो मत। फिर लगने दो छलांग!
मुग्ध देखते ही रहे
ज्वार की अपार फेन-चूड़ा पर उठा हुआ
अमृत-घट
वक्त का जो रथ तुम्हारे लिए लाया था
तुमने उसे लिया नहीं!
बांट कर पीया नहीं!
वह चिराग चौमुख कर
लोगों को तुमने दिया नहीं!
रोशनी पर धूल पड़ी
चांदना हुआ नहीं!
उठ रही इस औघड़ तरु से
मौन काल की पुकार
छाया भोगने वालो होशियार
यह सब तुम पर निछावर किया
हर बार
किंतु वक्त करता नहीं
किसी का भी इंतजार
समय का रथ ज्यादा रुक नहीं पाता है
रखा-रखा अमृत भी विष बन जाता है
चूका हुआ क्षण कभी वापस नहीं आता है।

आज इतना ही।


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