अध्याय—18
सूत्र—
न द्वेञ्चकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय:।। 10।।
न हि देहभृता शाक्यं त्यक्तुं कर्माण्यझेश्त:।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीक्ते।। 11।।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्यासिनां क्वचित्।। 12।।
और हे अर्जुन, जो पुरुष अकल्याणकारक कर्म से तो द्वेष नहीं करता है और कल्याणकारक कर्म में आस्क्त नहीं होता है, वह शुद्ध सत्वगुण से युक्त हुआ पुरुष संशयरहित मेधावी अर्थात ज्ञानवान और त्यागी है।
क्योंकि देहधारी पुरुष के द्वारा संपूर्णता से सब कर्म त्यागे जाना शक्य नहीं है। इससे जो पुरूष कर्मो के फल का त्यागी है, क ही त्यागी है, ऐसा कहा जाता है।
तथा सकामी पुरूषों के कर्म का ही अच्छा बुरा और मिश्रित, ऐसे तीन प्रकार का कल मरने के पश्चात भी होता है और त्यागी पुरुषों के क्रमों का फल किसी काल में भी नहीं होता है।






