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शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--202

सदगुरू की खोज—(प्रवचन—चौथा)

अध्‍याय—18
सूत्र—

न द्वेञ्चकुशलं कर्म कुशले नानुषज्‍जते।
त्यागी सत्‍वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय:।। 10।।
न हि देहभृता शाक्‍यं त्यक्तुं कर्माण्यझेश्त:।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्‍यभिधीक्ते।। 11।।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम्।
भवत्‍यत्‍यागिनां प्रेत्य न तु सन्यासिनां क्वचित्।। 12।।  

और हे अर्जुन, जो पुरुष अकल्‍याणकारक कर्म से तो द्वेष नहीं करता है और कल्याणकारक कर्म में आस्क्‍त नहीं होता है, वह शुद्ध सत्वगुण से युक्‍त हुआ पुरुष संशयरहित मेधावी अर्थात ज्ञानवान और त्यागी है।
क्योंकि देहधारी पुरुष के द्वारा संपूर्णता से सब कर्म त्यागे जाना शक्य नहीं है। इससे जो पुरूष कर्मो के फल का त्यागी है, क ही त्यागी है, ऐसा कहा जाता है।
तथा सकामी पुरूषों के कर्म का ही अच्‍छा बुरा और मिश्रित, ऐसे तीन प्रकार का कल मरने के पश्‍चात भी होता है और त्यागी पुरुषों के क्रमों का फल किसी काल में भी नहीं होता है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--201

फलाकांक्षा का त्‍याग—(प्रवचन—तीसरा)

अध्‍याय—18
सूत्र—

            नियतस्य तु संन्यास: कर्मणो नोययद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामम: यरिकीर्तित:।। 7।।
दु:खमित्येव यत्कर्म कायक्लेशमयाल्यजेत्।
स कृत्या राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ।। 8।।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्‍वा फलं चैव स त्याग: सास्थ्यिाए मत:।। 9।।

और हे अर्जुन, नियत कर्म का त्याग करना योग्य नही है, इसलिए मोह से उसका त्याग करना तामस त्याग कहा गया है।
और यदि कोई मनुष्य, जो कुछ कर्म है वह सब ही दुखरूप है, ऐसा समझकर शाशीरिक क्लेश के भय से कर्मों का त्याग कर दे, तो वह पुरूष उस राजस त्याग को करके भी त्याग के फल को प्राप्त नहीं होता है।
और हे अर्जुन, करना कर्तव्य है, ऐसा समझकर ही जो शास्त्र— विधि से नियत किया हुआ कर्तव्य कर्म आसक्‍ति को और फल को त्याग कर किया जाता है, वह ही सात्‍विक कहा जाते है।

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-39



अध्‍याय—39 (मेरा घर आना)

गह मैंने पहचान ली थी। धूंधली यादे जो गहरे में कहीं दबी पड़ी थी या कहीं सो गई थी। वह अब धीरे—धीरे जग रही थी। जैसे जैसे मन शांत ओर खुशी से भर रहा था सब बहुत अच्‍छा लग रहा था। लग रहा था वहीं सब फिर से लोट आयेगा ओर सच कहूं तो वहीं नहीं होगा उससे कहीं अधिक किमती होगा। क्योकि खोने के बाद अगर आप उस वस्‍तु या समय की किमत नहीं जान पाते तो आप जी नहीं रहे आप केवल अपने को ढो रहे हो। सब साफ दिखाई देने का मतलब यह नहीं है कि आपने उसे पा लिया। अभी भी एक लंबी दूरी ओर बाधाये थी जो मुझे पार करनी थी। कितने ही मेरे साथी कुत्‍ते मेरा मार्ग रोकेगें ओर मुझे उनसे अपने आप को बचाते हुए घर जाना होगा। ओर इस हालत में देख कर पता नहीं घर के प्राणी मुझे पहचानेगे या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं की वह मुझे घर से ही निकाल दे। कि अब तुम्‍हारी जरूरत नही है। क्‍योंकि में कितनी ही बार उन लोगो को परेशान कर चूका हूं परंतु मन में भगवान से दूआ कर रहा हूं कि एक बार—बस एक बार इस बास मुझे उस घर में जाने दे फिर देखना में कितने अच्‍छे बच्‍चे की तरह रहूगा। कोई शरारत नहीं करूंगा। अगर वह जंगल न भी ले जायेगे तो में घर पर ही रह लूंगा।

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--200

सात्‍विक, राजस और तामस त्‍याग—

(प्रवचन—दूसरा)

अध्‍याय—18
सूत्र—
निश्चय श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरूषव्‍याघ्र त्रिविध: संप्रकीर्तित: ।। 4।।
यज्ञदानतय:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।। 5।।
एतान्ययि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्वा फलानि च ।
कर्तथ्यानीति मे पार्थ निशिचतं मतमुत्तमम्।। 6।।

परंतु हे अर्जुन, उस त्याग के विषय में तू मेरे निश्चय को सुन। हे पुरूषश्रेष्ठ, वह त्याग सात्‍विक राजस और तामस, ऐसे तीनों प्रकार का ही कहा गया है।
तथा यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने के योग्य नही है, किंतु वह निःसंदेह करना कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ दान और तप, ये तीनों ही बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं। इसलिए हे पार्थ, यह यज्ञ, दान और तपरूप कर्म तथा और भी संपूर्ण श्रेष्ठ कर्म आसक्‍ति को और फलों को त्याग कर अवश्य करने चाहिए, ऐसा मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--199

अंतिम जिज्ञासा: क्‍या है मोक्ष, क्‍या है संन्‍यास—

(प्रवचन—पहला)


अध्‍याय—18
सूत्र—

श्री मद्भगवद्गीता (अथ अष्‍टादशोउध्‍ण्‍याय)

अर्जुन उवाच:

            संन्यामस्य महाबाहो तत्त्वीमच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।। 1।।
भगवानवाच:
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्व कर्मफलत्यागं प्राहुस्मागं विचक्षणा:।। 2।।
त्याज्यं दोश्वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण:।
यज्ञदानतयकर्म न त्याज्यमिति चापरे ।। 3।।

अर्जुन बोला, हे महाबाहो, हे हषीकेश, हे वासुदेव, मैं संन्यास और त्याग के तत्‍व को पृथक— पृथक जानना चाहता हूं।
इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्री भगवान बोले, हे अर्जुन, कितने ही पंडितजन तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्याम जानते हैं और कितने ही विचक्षण अर्थात विचार कुशल पुरुष सब क्रमों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।
तथा कई एक मनीषी ऐसा कहते हैं कि कर्म सभी दोषयुक्त है, इसलिए त्यागने के योग्य हैं। और दूसरे विद्वन ऐसा कहते हैं कई यज्ञ, दान और तप लय कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--198

मन का महाभारत—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

अध्‍याय—17
सूत्र: 198

            सद्भावे साधुभावे च सदित्येतगयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्‍छब्द: पार्थ युज्यते।। 26।।
यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सीदति चौच्‍यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिप्रीयते ।। 27।।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्‍प्रेत्य नौ इह ।। 28।।

और सत्— ऐसे यह परमात्मा का नाम सत्य— भाव में और श्रेष्ठ— भाव में प्रयोग किया जाता है। तथा हे पार्थ, उत्तम कर्म में भी सत् शब्द प्रयोग किया जाता है।
तथा यज्ञ तय और दान में जो स्थिति है, वह भी सत् है, ऐसे कही जाती है। और उस परमात्मा के अर्थ किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत् है, ऐसे कहा जाता है।
और हे अर्जुन, बिना श्रद्धा के होम। हुआ हवन तथा दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ कर्म है वह समस्त असत् है ऐसे कहा जाता है। इसीलिए वह न तो हम लोक में लाभदायक है और न मरने के पीछे ही।

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-38



अध्‍याय—38 (लोट के बुद्धु घर को आये)

मैं कितनी देर सोता रहा...परंतु ये तो पक्‍का था कि नींद बहुत गहरी आयी। ओर गहरी नींद में कुदरत हमारी बिगडी संरचना को ठीक करने अति उत्तम समझती है। आप का विरोध खत्म हो गया ओर कुदरत आप पर अपना अप्रेशन कर सकती है। शायद इस लिए हजारों रोगो का एक राम बाण है गहरी नींद।  उठा तो सर का भार कुछ कम महसूस हो रहा था। अंदर से लगा की उठ कर चलदूं। रात कितनी बिती थी इस बात का भी मुझे कुछ पता नहीं था। चांद अभी आमान में काफी उपर है। परंतु कभी कभी उसे बादल आकर ढक लेते है। फिर भी काफी रोशनी थी। चारों ओर कोई नहीं था। दूर कहीं पर उल्‍लु के बोलने की कर्क नाद सुनाई दे रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि किधर चलू कहां चलू......चलने में मुझे कमजोरी महसूस हो रही थी। मैं याद करने की कोशिश कर रहा था कि मैं कौन हूं? धीरे—धीरे अच्‍छा लग रहा था। लग रहा था मैं चल पडू रास्‍ते का मुझे  कोई भान नहीं था कि किधर जाना है। एक अंजान शक्‍ति मुझे चलने के लिए मजबूर कर रही थी। सो मैं चल दिया। चाँद की शितलता मस्‍तिष्‍क में एक ठंड़ा पर भर रही थी। दूर दराज तक फैला पहाड़ी जंगल। कहीं कहीं अधिक गहराई थी सो जरा सम्‍हल कर चलना पड़ रहा था।

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-37



अध्‍याय—37 (मेरा जीवन संघर्ष)

ता नहीं मैं वहां कितनी देर तक में पड़ा रहा या सोता रहा या केवल स्वास चलती रही ये जीवन है तो मैं जीवित था...मैं कोन हुं कहां इस बात का मुझे कुछ भी भान नहीं था। मेरी आंखें खूली तो मैंने इधर उधर देखने कि कोशिश की तो चारों ओर चहल पहल थी। कूछ लोग हाथों में थालियां लिय इधर उधर जा रहे थे....मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब क्‍या है.....ओर ये कौन है.....तभी जोर से मंदिर का घंटा बजा ओर एक कोलाहल सा सुनाई देने लगा....एक तारबंद की तरह.....एक लयवदता चारों ओर फैल गई। हवा अभी चल रही थी। पहले तो मैं सोचने लगा की मैं कहां हूं......एक पेड़ के नीचे एक उंचे से चबुतरे पर मैं लेटा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं यहां कब आया। मैं कौन हूं......ये सब क्‍या है.....एक ना समझे से दृष्‍य मेरी आंखों के सामने तैरने लगे। लेकिन इतना सब होने पर भी किस  तरह से शरीर अपना काम करता है। उसने निर्देश दिया कि उसे प्‍यास लगी है। तब मुझे लगा की मुझे खड़ा होना चाहिए.....ओर मैं किचड़ में सने शरीर को उठाने कि कोशिश करने लगा.....बडी मुश्‍किल से मैंने अपने शरीर उठाया.....पूरा बदन पीड़ा से करहा रहा था। शरीर पर किचड़ सूख कर झड गई थी। लगा की अभी अगर उठ कर खड़ा हुआ तो गिर जाऊंगा। फिर कुछ देर शरीर को अपनी अवस्‍था में आने का इंतजार करने लगा। तब उठा तो देखता क्‍या हूं कि में तो एक उंचे चबुतरे पर एक पेड़ के नीचे लेटा हूं....मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं यहां पर कब आया?.....ओर कैसे आया?.....परंतु कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस समझ आ रहा था तो इतना की पानी पीना है।

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--197

क्रांति की कीमिया: स्‍वीकार—(प्रवचन—दसवां)

अध्‍याय—17
सूत्र—

            ओंम तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत:।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता: पुरा ।। 23।।
तस्मादोमित्युदह्रत्य यज्ञदानतप:क्रिया:।
प्रवर्तन्ते विधानोक्‍ता: सततं ब्रह्मवादिनाम् ।। 24।।
तदित्यनीभसंधाय फलं यज्ञतप:क्रिया:।
दानक्रियाश्च विविधा: क्रियन्तेमोक्षकांक्षिभि:।। 25।।

और हे अर्जुन, ओम तत् सत— ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानंदघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदि काल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादिक रचे गए हैं। इसलिए ब्रह्मवादिन पुरुषों की शास्त्र— विधि से नियत की हुई यज्ञ, दान और तय— रूप क्रियाएं सदा ओम, ऐसे हम
परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरंभ होती हैं। और तत् अर्थात तत् नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है, इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार की यज्ञ तय— रूप क्रियाएं तथा दान—रूप क्रियाएं मोक्ष की इच्‍छा वाले पुरूषों द्वारा की जाती हैं।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--196

दान—सात्‍विक, राजस, तामस—(प्रवचन—नौवां)

अध्‍याय—17
सूत्र-

दातव्‍यमिप्ति यद्दानं दींयतेउनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्‍विक स्मृतम्।। 20।।
यत्तु प्रत्यक्कारार्थं फलमुद्दिश्‍य वा पन:।
दीयते च परिक्‍लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।। 21।।
अदेशकाले यद्दानमयात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्‍कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदष्ठतम्।। 22।।

है अर्जुन, दान देना ही कर्तव्य है, ऐसे भाव से जो दान देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर प्रत्युपकार न करने वाले के लिए दिया जाता है, वह दान तो सात्‍विक कहा गया है। और जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को उद्देश्य रखकर फिर हिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।
और जो दान बिना सत्कार किए अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश—काल में कुपात्रों के लिए दिया जाता है वह दान तामस कहा गया है।

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-36



अध्‍याय—36 (मेरा दवा की गोलियां खाना)

कुछ भय ओर अभय हमारे शरीर में किस तरह से जमा रहे है। जैसे—जैसे हम बड़े होते जाते है हमारे चेतन या अचेतन में जमा सब भाव हमारे मन पर प्रकट होने लग जाते है। इसी तरह से अचानक मुझे बीमार आदमी से अधिक भय लगने लगा था। जब भी कोई बीमार होता तो मैं उसके पास जाने से कतरता था। जिसका कारण में खुद भी नहीं जातना था हां इतना जानता था कि जब मैं बिमार होता थोड़ा या अधिक तो मुझे लगता मैं मर जाऊंगा। पहले इस बात का मुझे कोई भय नहीं था। ये अभी कुछ ही दिनों से ऐसा हुआ है। किसी—किसी ध्‍यान का संगीत सूननें पर भी मेरे अंदर तक प्राण कांप जाते ओर में डर कर सुबकने लग जाता था। वह संगीत ऐसा मेरे अंदर घंसता चला जाता की जैसे वह मुझे चीर रहा है। ओर मैं दो टुकडो में विभाजन हो रहा हूं। मैं चाह कर भी उस समय अपने शरीर को हिला नहीं सकता था। परंतु एक जागरण अंदर होता जो मुझे ये सब महसुस करा रहा था। मैं डर रहा हूं ओर मैं हिल नहीं सकता। जैसे मुझे कोई जोर से दबा रहा है एक पतली सुरंग की भांति ओर मुझे डर लगता की में इसमें फंस गया तो कैसे निकलुंगा। तब अकसर या तो मम्मी या पापा अपना ध्यान छोड कर मुझे सहलाते ओर आवाज देते.....तब मैं धीरे-धीर शरीर पर आता। वहां आने का मन नही था वह भय भी कितना शांति दाई था.....उसे शब्द नहीं दिये जा सकते।

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-35

अध्‍याय—35-(मां के अवशेष)
आज मैं दिन भर खुब सोता रहा....परंतु पापा जी का काम तो अधिक बढ़ गया था। उन्हें तो वरूण भैया को जाकर स्‍कूल से भी लाना और दूकान के लिए दूध भी लाना होता था। परंतु पापाजी मेहनत से कभी नहीं डरते थे। रात को जब पापा जी दूकान से आये तो आप शनिवार था और कल बच्‍चों के स्‍कूल की छूट्टी थी। इसलिए आज वह रात का ध्‍यान भी नहीं कर सकते थे....आज दिन का ध्‍यान मैंने खराब कर दिया और अब रात के ध्‍यान को बच्‍चे नहीं करने देंगे क्‍योंकि वह कहानी सुनाने की जिद्द कर रहे है। इतने बड़े हो गये है फिर भी कहानी बच्‍चों की तरह से सुनने की जिद्द करते है। सच पापा जी कहानी बहुत मजेदार सुनाते है....मैं भी उस संगत का आनंद मैं भी लेता था। पापा जी शब्‍दों के साथ जो भाव और उतेजना भरते है उस सब को केवल पीता हूं....ओर सब के बीच अपना अधिकार समझ कर घुस जाता हूं। एक बात और है अगर अपनी कहानी का आनंद लेना है तो आपको उसमें डुबना ही होगा। तब आपको पानी के बहार अपनी गर्दन नहीं निकालनी अपनी बुद्धि को एक तरफ ताक पर रखना होगा...एक सरलता एक सहजता ही आपको उसमें डुबो सकती है। तब आपको बच्‍चा बनना ही होगा।

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-34

अध्‍याय34 (गिदड़ो से मुठभेड़ )

 ल के जंगल के आनंद को मैं रात भर भूल नहीं पाया और उसको अपनी सूंदर स्‍मृतियों में सजो रखना चाहता था। परंतु मुझे क्‍या मालूम था हम आज भी जंगल में जायेंगे। क्‍योंकि अभी राम रतन अंकल तो आये नहीं थे इस लिए पापा जी दूकान से जल्‍दी आ जाते और हम नियम से जंगल में जाने लगे। जब हम दूकान के पास जा रहे होते तो मम्‍मी जी मुझे अपने पास बुलाना चाहती परंतु में कन्‍नी काट जाता की अब दौस्‍ती ठीक नहीं है....जंगल में जाने के दाव को में किसी पनीर या किसी दोस्‍ती की कीमत पर छोड़ना नहीं चाहता था। और मेरी इस हरकत से मम्‍मी बहुत जोर से हंसती और मेरे पास आकर मुझे प्‍यार करती और एक पनीर का टूगडा जबरदस्‍ती मेरे मुंह में ठस देती और में डर सहमा सा वहां से जल्‍दी जंगल की और जाने के छटपटता। बीच—बीच में गली के चम्‍मच कुत्‍ते भी पास आकर मुह चाटते और समर्पण कर के लेट जाते तब भी मुझे गुस्‍सा आता की नाहक टाईम खराबकर रहा है।
सुबह का घूमना कितना अनमोल है यह मैंने पहली बार जाना था। वैसे हम अकसर तो दिन में 10—11 बजे ही जाते थे या श्‍याम 4—5 बजे परंतु अब हम सुबह सात बजे जा रहे थे कई दिन से। पहले जब घूमने जाते तो जिस दिन घूमने जाते उस दिन तो बहुत अच्‍छा लगता परंतु अगले दिन बदन बहुत दुखता था। परंतु रोज—रोज जाने से थकावट महसूस नहीं होती। अभी प्रकृति पूरी तरह से जगी नहीं होती......दूर सूर्य की किरणें वक्षों के कोमल पत्‍तो को छूकर सहला रही होती और उन पर जमी ओस के लिबास को छिन रही होती।

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-33



अध्‍याय33 (जंगल का आनंद)

      क दिन मन को ने जाने क्‍यों बेचैनी ने घेर लिया। कहीं बैठना या कुछ भी करना अच्‍छा नहीं लग रहा था। शरीर एक कैद महसूस कर रहा था और मन एक घुटन। लगता था किसी खूले आकाश में चला जाऊं। बच्‍चे तो आज स्‍कूल गये हुऐ थे। पापाजी अभी दूकान से अभी आकर बैठे ही थे। शायद अब नाह धो कर ध्‍यान की तैयारी करेंगे। मैं उठा और उसके सामने जाकर बैठ गया। मुझे इस तरह से अपने पास बैठा देख कर वह समझ गये कि मुझे कुछ कहना है। पापा जी न जाने क्‍यों मन की बात बहुत जल्‍दी ही जान लेते थे। जैसे सब कुछ मेरी आंखों में लिखा मिल जाता है। मुझे और पास बुला कर मेरी गर्दन और सर पर हाथ फेरने लगे। मेरे दोनों कानों को उन्‍होंने अपने हाथ से पकड़ लिया। शायद वह गर्म थे। तभी वह कहने लगे तुझे क्‍या तनाव है कान इतने गर्म क्‍यों कर रखे है। वह मेरे कानों को प्‍यार से सहलाने लगे। मैंने उनकी गोद में सर रख दिया। कुछ देर इसी तरह से बैठे रहकर अचानक में उठा और अंदर कोठे से जाकर उनकी पुराने जूते जो वह अकसर जंगल में पहन कर जाते थे। उन्‍हें मुंह से पकड़ कर ले आया ओर लाकर उनके सामने खड़ा हो गया। ये सब देख कर तो उन्‍हें बड़ा अचरज हुआ। अरे पागल अब इतनी दोपहरी में जंगल....अभी तो मैं दुकान से आय हूं....

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--195

पूरब और पश्‍चिम का अभिनव संतुलन—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—17
सूत्र:

श्रद्धया परया तप्तं तयस्तन्त्रिविधं नरै ।
अफलाकंक्षिभिर्युक्तै: सात्त्विकं पश्चिक्षते।। 17।।
सत्कारमानपूजार्थ तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमब्रुवम्।। 18।।
मूढग्राहेणात्मनार्थं यत्पीडया क्रियते तय: ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदहतम्।। 19।।

है अर्जुन, कल को न चाहने वाले निष्कामी योगी परूषों द्वारा परम आ से किए हुए उस पूर्वोक्‍त तीन प्रकार के तय को तो सात्‍विक कहते हैं।
और जो तय सत्कार, मान और पूजा के लिए अथवा केवल पाखंड से ही किया जाता है वह अनिशचय और क्षणिक कल वाला तय का राजस कहा गया है।
और जो तय मूढतापूर्वक हठ से मन, वाणी और शरीर की बढ़ी के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है वह तय तामस कहा गया है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--194

शरीर, वाणी और मन के तप—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—7
सूत्र:--

देवद्धिजगुरूप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्‍यते।। 14।।
अनुद्वेगकरं वाक्‍यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्‍यमनं चैव वाङ्मय तय उच्यते।। 15।।
मन:प्रमाद सौम्यत्‍वं मौनमात्मीवनिग्रह:।
भावसंशुद्धिरित्‍येतत्तपो मानसमुच्‍यते।। 16।।

तथा हे अर्जुन, देवता, द्विज अर्थात ब्रह्मण, गुरू और ज्ञानीजनों का पूजन एवं पवित्रता, सरलता, ब्राह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर संबंधी तय कहा जाता है।
तथा जो उद्वेग को न करने वाला प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है और जो स्वाध्याय का अभ्यास है, वह नि:संदेह वाणी संबंधी तय कहा जाता है।
तथा मन की प्रसन्नता, शांत भाव, मौन, मन का निष्ठ और भाव की पवित्रता, ऐसे यह मन संबंधीं तय कहा जाता है।