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रविवार, 3 जून 2018

कहे होत अधीर--(प्रवचन--16)

एस धम्मो सनंतनो—(प्रवचन—सोलहवां)

प्रश्न-सार :

1—मैं निपट अज्ञानी! जब भी आंख बंद की, महा-अंधकार ही दिखता है। क्या कभी प्रकाश की किरण भी पा सकूंगा?

2—आप कहते हैं कि कवि ऋषि के निकट है, लेकिन बड़ा आश्चर्य होता है कि इतने संवेदनशील हृदय वाले कवि-कलाकार भी, जो कि जीवन में सत्यम् शिवम् सुंदरम् की तलाश में निकले हैं, वे भी यहां आने से कतराते हैं! आप कहते हैं कि ध्यान संवेदनशीलता को और गहरा करता है। फिर इन कवि-कलाकारों का भय क्या है? क्या ध्यान और सृजन साथ-साथ संभव नहीं हैं?

3—मैं जब भी पूना आता था, पूज्य दद्दाजी का अनंत स्नेह मुझ पर बरसता था। वे चले गए। और आप भी जब प्रवचन और दर्शन से उठ कर वापस जाते हैं तो हृदय में टीस सी उठती है कि कहीं अगर इस सदगुरु का साथ छूट गया तो फिर हमारा क्या होगा? ऐसे बुद्ध सदगुरु तो सदियों में मिलते हैं। हम संन्यासियों पर फिर यह अमृत-वर्षा कौन करेगा?

कहे होत अधीर--(प्रवचन--15)


मूरख अबहूं चेत—(प्रवचन—पंद्रहवां)
सारसूत्र :

संत संत सब बड़े हैं, पलटू कोउ न छोट।
आतम दरसी मिहीं है, और चाउर सब मोट।।
पलटू ऐना संत है, सब देखैं तेहि माहिं।
टेढ़ सोझ मुंह आपना, ऐना टेढ़ा नाहिं।।
पलटू यहि संसार में, कोऊ नाहीं हीत।
सोऊ बैरी होत है, जाकौ दीजै प्रीत।।
जो दिन गया सो जान दे, मूरख अबहूं चेत।
कहता पलटूदास है, करिले हरि से हेत।।
पलटू नरत्तन जातु है, सुंदर सुभग सरीर।
सेवा कीजै साध की, भजि लीजै रघुवीर।।
पलटू ऐसी प्रीति करूं, ज्यों मजीठ को रंग।

कहे होत अधीर--(प्रवचन--14)

अपना है क्या—लुटाओ—(प्रवचन—चौदहवां)

प्रश्न-सार :

1—संसार में संसार का न होकर रहना ही संन्यास है। मुझे यह असंभव सा क्यों लगता है?

2--पूज्य दद्दाजी मुझे बचपन से ही अपना जान कर, उन्मुक्त स्नेह और प्रेरणा देते रहे हैं। ढेर सारी स्मृतियों के बीच उनका सबके प्रति अपनापन, बालवत प्रेम, सब कुछ लुटा देने की तत्परता और सारे वातावरण को आनंद से भर देने वाला रूप मेरे भीतर भरता गया, भरता गया। वे मुझसे रोज किसी न किसी बहाने कहते थे: अपना है क्या--लुटाओ! अपना है क्या--लुटाओ!
उनके इस प्यारे वचन का आशय कृपा करके हमें कहें।

3—आप अक्सर कहा करते हैं कि अस्तित्व को जो दोगे वही तुम पर वापस लौटेगा; प्रेम दोगे, प्रेम लौटेगा; घृणा दोगे, घृणा मिलेगी।
आप तो प्रेम की मूर्ति हैं, आप प्रेम ही हैं, प्रेम ही बांट रहे हैं; फिर भी आपको इतनी गालियां क्यों मिलती हैं? क्या उपरोक्त नियम सच नहीं है?

कहे होत अधीर--(प्रवचन--13)

ध्यान है मार्ग—(प्रवचन—तेरहवां)

सारसूत्र :


माया तू जगत पियारी, वे हमरे काम की नाहिं।
द्वारे से दूर हो लंडी रे, पइठु न घर के माहिं।।
माया आपु खड़ी भई आगे, नैनन काजर लाए।
नाचै गावै भाव बतावै, मोतिन मांग भराए।।
रोवै माया खाय पछारा, तनिक न गाफिल पाऊं।
जब देखौं तब ज्ञान ध्यान में, कैसे मारि गिराऊं।।
रिद्धि-सिद्धि दोई कनक समानी, बिस्तु डिगन को भेजा।
तीन लोक में अमल तुम्हारा, यह घर लगै न तेजा।।
तू क्या माया मोहिं नचावै, मैं हौं बड़ा नचनिया।
इहवां बानिक लगै न तेरी, मैं हौं पलटू बनिया।।

कहे होत अधीर--(प्रवचन--12)

खाओ, पीओ और आनंद से रहो—(प्रवचन—बारहवां)

 प्रश्न—सार:

1—महाप्रयाण के कुछ दिनों पूर्व पूज्य दद्दाजी ने एक रात चर्चा करते हुए बताया कि वही है, और उसके अलावा कुछ और नहीं।
यह पूछने पर कि संसार को चलाने वाला कौन है? वे बोले, कोई नहीं। सब अपने आप चल रहा है। जो हो रहा है वह हो रहा है। कोई कुछ कर नहीं रहा है; सब हो रहा है।
कर्म के सिद्धांत से संबंधित प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा, वह सब बकवास है।
हमने पूछा, फिर हम क्या करें? वे बोले—खाओ, पीओ और आनंद से रहो। बस, इसके सिवाय संसार में कुछ और नहीं है।
कृपया उनकी इन उपदेशनाओं पर कुछ कहें।

2—धन और पद के संबंध में आपके क्या विचार हैं?


3—मैं एक ज्योतिषी के पास गया था। उसने मेरा हाथ देख कर कहा कि तुम सत्य के खोजी हो और तुम्हें सदगुरु भी मिल गया है। साधना जारी रखो, एक दिन श्रेय को भी अवश्य उपलब्ध होओगे।
मैं ज्योतिषी या ज्योतिष पर विश्वास नहीं करता, लेकिन उसकी बातें तो सभी सत्य थीं। इसका रहस्य क्या है? आप कुछ कहें।

कहे होत अधीर--(प्रवचन--11)

मन बनिया बान न छोड़ै—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

सारसूत्र:

मन बनिया बान न छोड़ै।।
पूरा बांट तरे खिसकावै, घटिया को टकटोलै।
पसंगा मांहै करि चतुराई, पूरा कबहुं न तौले।। 
घर में वाके कुमति बनियाइन, सबहिन को झकझोलै।
लड़िका वाका महाहरामी, इमरित में विष घोलै।।
पांचतत्त का जामा पहिरे, एंठा-गुइंठा डोलै।
जनम-जनम का है अपराधी, कबहूं सांच न बोलै।।
जल में बनिया थल में बनिया, घट-घट बनिया बोलै।
पलटू के गुरु समरथ साईं, कपट गांठि जो खोलै।।

जहां कुमति कै बासा है, सुख सपनेहुं नाहीं।।
फोरि देति घर मोर तोर करि, देखै आपु तमासा है।।
कलह काल दिन रात लगावै, करै जगत उपहासा है।।
निर्धन करै खाए बिनु मारै, अछत अन्न उपवासा है।।
पलटूदास कुमति है भोंड़ी, लोक परलोक दोउ नासा है।।

कहे होत अधीर--(प्रवचन--10)

प्रेम तुम्हारा धर्म हो—(प्रवचन—दसवां)

प्रश्न-सार:

1—प्रार्थना क्या है?

2—आदरणीय दद्दाजी की मृत्यु पर आपने अपने संन्यासियों को कहा कि वे उत्सव मनाएं, नाचें। लेकिन इस उत्सव और नृत्य के होते हुए भी रह-रह कर आंसू पलकों को भिगोए दे रहे थे। दद्दाजी के चले जाने के बाद हृदय को अभी भी विश्वास नहीं कि वे चले गए हैं। लगता है कि वे यहीं हैं। उन्होंने हमें जो प्रेम दिया वह अकथ्य है।

3—देश की स्थिति रोज-रोज बिगड़ती जाती है। आप इस संबंध में कुछ क्यों नहीं कहते हैं?

4—मैं विवाह करूं या नहीं? और स्वयं की पसंदगी से करूं या कि घरवालों की इच्छा से?

कहे होत अधीर--(प्रवचन--09)

चलहु सखि वहि देस—(प्रवचन—नौवां)

सारसूत्र:

चलहु सखी वहि देस, जहवां दिवस न रजनी।।
पाप पुन्न नहिं चांद सुरज नहिं, नहीं सजन नहीं सजनी।।
धरती आग पवन नहिं पानी, नहिं सूतै नहिं जगनी।।
लोक बेद जंगल नहिं बस्ती, नहिं संग्रह नहिं त्यगनी।।
पलटूदास गुरु नहिं चेला, एक राम रम रमनी।।


चित मोरा अलसाना, अब मोसे बोलि न जाई।।
देहरी लागै परबत मोको, आंगन भया है बिदेस।
पलक उघारत जुग सम बीते, बिसरि गया संदेस।।
विष के मुए सेती मनि जागी, बिल में सांप समाना।
जरि गया छाछ भया घिव निरमल, आपुई से चुपियाना।।
अब न चलै जोर कछु मोरा, आन के हाथ बिकानी।
लोन की डरी परी जल भीतर, गलिके होई गई पानी।।
सात महल के ऊपर अठएं, सबद में सुरति समाई।
पलटूदास कहौं मैं कैसे, ज्यों गूंगे गुड़ खाई।।

कहे होत अधीर--(प्रवचन--08)

प्रेम एकमात्र नाव है—(प्रवचन—आठवां)

प्रश्न-सार :

1—आपने कहा कि गणित या ज्ञान से उपजा वैराग्य झूठा है; प्रेमजनित वैराग्य ही वैराग्य है। लेकिन प्रेम तो राग लाता है; उससे वैराग्य कैसे फलित होगा?
2—आप कहते हैं कि जीवित बुद्ध ही तारते हैं। तब यह कैसी विडंबना है कि बुद्धों को जीते जी निंदा मिलती है और मरने पर पूजा? यह कैसा विधान है?
3—मैं परम आलसी हूं। क्या मैं भी परमात्मा को पा सकता हूं?



पहला प्रश्न:

भगवान! आपने कहा कि गणित या ज्ञान से उपजा वैराग्य झूठा है; प्रेमजनित वैराग्य ही वैराग्य है। लेकिन प्रेम तो राग लाता है; उससे वैराग्य कैसे फलित होगा?