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रविवार, 12 नवंबर 2017

गीता दर्शन-(भाग-5)-प्रवचन-127

परम गोपनीय—मौन—(प्रवचन—चौदहवा)

अध्‍याय—10
सूत्र—
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोउस्थि व्यवसायोउस्मि सत्त्वं सत्ववतामहम्।। 36।।
वृष्णीनां वासुदेवोउस्मि पाण्डवानां धनंजय:।
मुनीनामध्यहं व्यास: कवीनामुशना कवि:।। 37।।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।। 38।।

हे अर्जुन मैं छल करने वालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूं तथा मैं जीतने वालों का विजय हूं और निश्चय करने वालों का निश्चय एवं सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूं
और वृष्णिवंशियों में वासुदेव अर्थात मैं स्वयं तुम्हारा सखा और पांडवों में धनंजय अर्थात तू एवं मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूं
और दमन करने वालों का दंड अर्थात दमन करने की शक्ति हूं जीतने की ड़च्छा वालों की नीति हूं और गोपनीयों में अर्थात गुप्त रखने योग्य भावों में मौन हूं तथा ज्ञानवानों का तत्व ज्ञान मैं ही हूं


है अर्जुन, मैं छल करने वालों में जुआ, प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव, जीतने वालों का विजय, निश्चय करने वालों का निश्चय, सत्पुरुषों का सात्विक भाव हूं। हैरानी होगी यह सोचकर कि कृष्‍ण कहते हैं कि मैं छल करने वालों में  जुआ हूं।
शायद जीवन में सभी कुछ छल है। और जीवन की जो छल— स्थिति है, वह जैसी जुए में प्रकट होती है, वैसी और कहीं नहीं। जीवन जुआ है और जुए में जीवन का जो मायिक रूप है, जो छल है, वह अपनी श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति को उपलब्ध होता है। इसे थोड़ा हम समझें, तो आसानी हो। और यह कीमती है।

गीता दर्शन-(भाग-5)-प्रवचन-126

मैं शाश्‍वत समय हूं—(प्रवचन—तेरहवां)

अध्‍याय—10
सूत्र—
अक्षराणामकारोउस्थि द्वन्द्व: सामासिकस्य 
अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख:।। 33।।
मृत्यु: सर्वहरश्चाहमुद्रभवश्च भविष्यताम्
कीर्ति: श्रीर्वाक्य नारीणा क्यृतिर्मेधा धृति: क्षमा।। 34।।
बृहत्साम तथा सामा गायत्री छन्दसामहम्
मासानां मार्गशीर्षोउहमृतूनां कुसुमाकर:।। 35।।

तथा मैं अक्षरों में अकार और समासों में द्वंद्व नामक समास हूं, तथा अक्षय काल और विराट स्वरूप सबका धारण पोषण करने वाला भी मैं ही हूं
और हे अर्जुन मैं सबका नाश करने वाला गुण और आगे होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूं, तथा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूं
तथा मैं गायन करने योग्य श्रुतियों में बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद तथा महीनों में मार्गशीर्ष महीना और ऋतुओं में वसंत ऋतु मैं हूं


मैं अक्षरों में अकार और समासों में द्वंद्व नामक समास हूं तथा अक्षय काल और विराट स्वरूप सब का धारण—पोषण करने वाला भी मैं ही हूं। हे अर्जुन, मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और आगे होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूं।

गीता दर्शन-(भाग-5)-प्रवचन-125

शस्‍त्रधारियों में राम—(प्रवचन—बारहवां)


अध्‍याय—10

सूत्र:
पवन: पवतामस्मि राम: शस्त्रभृतामहम्।

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्थि जाह्नवी।। 3।।

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वाद: प्रवदतामहम्।। 32।।

और मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में राम हूं तथा मछलियों में मगरमच्छ हूं और नदियों में श्री भागीरथी गंगा जाह्नवी हूं।

और हे अर्जुन सृष्टियों का आदि अंत और मध्य भी मैं ही हूं। तथा मैं विद्याओं में अध्यात्म— विद्या अर्थात ब्रह्म— विद्या एवं परस्पर में विवाद करने वालों में तत्व— निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूं।

गीता दर्शन-(भाग-5)-प्रवचन-124

काम का राम में रूपांतरण—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

गीता दर्शन-(भाग-5)-प्रवचन-124

अध्‍याय—10
सूत्र
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामास्‍मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्थि कन्दर्प: सर्याणामस्मि वासुकि:।। 28।।
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्
पितृणामर्यमा चास्मि यम: संयमतामहम्।। 29।।
प्रह्वादश्चास्मि दैत्यानां काल: कलयतामहम्
मृगाणां  मृगेन्द्रोउहं वैनतेयश्ल पक्षिणाम्।। 3।।

और हे अर्जुन मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूं, और संतान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूं, सर्पों में सर्पराज वासुकि हूं
तथा मैं नागों में शेषनाग और जलचरों में उनका अधिपति वरुण देवता हूं और पितरों में अर्यमा नामक पित्रेश्वर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूं

और हे अर्जुन मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गिनती करने वालों में समय हूं, तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरूड़ मैं ही हूं
र हे अर्जुन, शस्त्रों में वज्र, गौओं में कामधेनु, और जीवन की उत्पत्ति का हेतु कामदेव मैं हूं।
परसों रात्रि शिव पर बोलते हुए मैंने आपसे कहा था कि 'ऋ' के वे प्रतीक हैं, विनाश की शक्ति वे हैं। साथ ही प्रेम और काम भी उनके जीवन में उतना ही गहरा है।

गीता दर्शन-भाग-5-प्रवचन-123

आभिजात्‍य का फूल—(प्रवचन—दसवां)

अध्‍याय—10
सूत्र—
अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां  नारद:।
गन्‍धर्वाणां चित्ररथ: सिद्धानां कपिलो मुनि:।। 26।।
उच्चै: श्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोदृभवम्
ऐरावत गजेन्द्राणां नराणां  नराधियम्।। 27।।

और सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष और देवर्षियों में नारद मुनि तथा गंधर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूं और हे अर्जुन तू घोडों में अमृत से उत्पन्‍न होने वाला उच्चै:श्रवा नामक घोड़ा और हाथियों में ऐरावत नामक हाथी तथा मनुष्यों में राजा मेरे को ही जान

र सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि तथा गंधर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल हूं।

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

गीता दर्शन-(भाग-5)-प्रवचन-122

गीता दर्शन-भाग-5-(प्रवचन-122)
अध्‍याय—10  
सूत्र:

रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्
वसूनां पावकश्चास्मि मेरु: शिखरिणामहम्।। 23।।
गुरोधसां मुख्य मां विद्धि पार्थ बृहस्थतिम्
सेनानीनामहं स्कन्द: सरसामस्मि सागर:।। 24।।
महर्षीणां मृगुरहं गिरामस्थ्येकमक्षरम्
यज्ञानां जययज्ञोउस्थि स्थावराणां हिमालय:।। 25।।

और मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूं, और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूं, और मैं आठ वसु देवताओं में अग्नि हूं, तथा शिखर वाले पर्वतों में सुमेरू पर्वत हूं
और पेरोहितो में मुख्य अर्थात देवताओं का पुरोहित बृहस्पति मेरे को जान तथा हे पार्थ मैं सेनापतियों में स्वामी कार्तिक और जलाशयों में समुद्र हूं
और हे अर्जुन मैं महर्षियों में भृगु और वचनों में एक अक्षर अर्थात ओंकार हूं तथा सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूं

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-29


अध्‍याय–29   जीवन कुछ है?

      जीवन इतना सरल नहीं है जितना हम जीते या जानते है। वह अपने में एक अटुट गहराई समटे हुए रहता है। उसकी परत—दर—परत एक—एक नया आयाम लेकर आती है। उपरी सतह पर जिस तरह से धूल खरपतवार जमा होता है, वहीं गहराई में कहीं अधिक चिकनी मिट्टी और अधिक गहराई में गिलापन लिये होती है।
      आने वाला समय तो न जाने कहां पतन की और गिर रहा हो। मनुष्‍य लाख मांसाहारी हो गया है तो क्‍या वह अपने पालतू कुत्‍ते का मांस खा सकता है, नहीं। तो फिर कुत्‍ता इतना गिर सकता है। हां, लेकिन अब सूना है किसी देश में शायद कोरिया में लोग पालतु कुत्‍तो को भी मार कर खा जाते है। शायद वो मनुष्‍य को खा जाते होंगे.....या आने वाले कल जरूर उनका वही कदम होगा। किसी पशु को खुद पाल कर खाना अति कठिन कार्य है। क्‍योंकि उसका भरोसा तो देखो। क्‍या मेरा मालिक मेरी गर्दन पर जब छूरी या चाकू रखेगा तो मैं सोच सकता हूं कि वो में मार कर खा जायेगा। कभी नहीं। उसके इन्‍हीं हाथों ने न जाने कितने ही प्‍यार भरे कोर मुझे खिलाये है। अगर इस तरह से कोई मारता है तो वह उसकी ही चेतना निम्‍मन तल पर चला जाता है। फिर शायद उसमे मनुष्‍यता नाम की कोई चीज नहीं रह जाती। खेर ये तो संसार है नित बदलता ही रहता है। कभी अंधकार तो कभी प्रकाश।