परम गोपनीय—मौन—(प्रवचन—चौदहवा)
अध्याय—10
सूत्र—
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोउस्थि व्यवसायोउस्मि सत्त्वं सत्ववतामहम्।। 36।।
वृष्णीनां वासुदेवोउस्मि पाण्डवानां धनंजय:।
मुनीनामध्यहं व्यास: कवीनामुशना कवि:।। 37।।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।। 38।।
हे अर्जुन मैं छल करने वालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूं तथा मैं जीतने वालों का विजय हूं और निश्चय करने वालों का निश्चय एवं सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूं।
और वृष्णिवंशियों में वासुदेव अर्थात मैं स्वयं तुम्हारा सखा और पांडवों में धनंजय अर्थात तू एवं मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूं।
और दमन करने वालों का दंड अर्थात दमन करने की शक्ति हूं जीतने की ड़च्छा वालों की नीति हूं और गोपनीयों में अर्थात गुप्त रखने योग्य भावों में मौन हूं तथा ज्ञानवानों का तत्व— ज्ञान मैं ही हूं।
है अर्जुन, मैं छल करने वालों में जुआ, प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव, जीतने वालों का विजय, निश्चय करने वालों का निश्चय, सत्पुरुषों का सात्विक भाव हूं। हैरानी होगी यह सोचकर कि कृष्ण कहते हैं कि मैं छल करने वालों में जुआ हूं।
शायद जीवन में सभी कुछ छल है। और जीवन की जो छल— स्थिति है, वह जैसी जुए में प्रकट होती है, वैसी और कहीं नहीं। जीवन जुआ है और जुए में जीवन का जो मायिक रूप है, जो छल है, वह अपनी श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति को उपलब्ध होता है। इसे थोड़ा हम समझें, तो आसानी हो। और यह कीमती है।
