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शनिवार, 31 मार्च 2018

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-15

कवियों की बात—(पंद्रहवां—प्रवचन)  


प्‍यारे ओशो,  

'जब से मैने शब्रेँ को बेहतर रूप से जाना है ' जरथुस्‍त्र ने अपने एक शिष्य से कहा 'आत्मा मेरे लिए केवल अलंकारिक रूप से आत्मा रही है; और वह सब कुछ जो ''नित्यं'' है — वह भी केवल एक ''बिंब'' भर रहा है '
'मैने एक बार पहले भी आपको यह कहते सुना है ' शिष्य ने जवाब दिया; 'और तब आपने आगे कहा था : ''लेकिन कवि लोग बहुत ज्यादा झूठ बोलते हैं''। आपने क्यों ऐसा कहा कि कवि लोग बहुत ज्यादा झूठ बोलते हैं?'

'तथापि जरथुस्‍त्र ने एक बार तुमसे क्या कहा? कि कवि लोग बहुत ज्यादा झूठ बोलते हैं?   लेकिन जरथुस्‍त्र भी एक कवि है।

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-14

विद्वानों की बात—(चौदहवां—प्रवचन)


प्यारे ओशो,  

मैं विद्वानों के घर से बाहर निकल आया हूं और अपने पीछे जोर से दरवाजा बंद कर दिया हूं। मेरी आत्मा उनकी भोजन— मेज पर बहुत काल तक भूखी बैठी रही; मैं उस तरह शिक्षित नहीं हुआ हूं जैसे वे हुए हैं ज्ञान फोड़ने के लिए जैसे कोई काष्ठफल (नट) फोड़ता है
मैं स्वतंत्रता को और ताजी मिट्टी की हवाओं को प्रेम करता है उनकी प्रतिष्ठाओं और
सम्माननीयताओं पर सोने के बजाय मैं वृषचर्मों पर सोऊंगा।
मैं अपने ही विचार से बहुत ज्यादा उत्तप्त हूं और झूलस गया हूं : वह बहुधा मुझे निःश्वास कर देने के करीब होता है। तब मुझे खुली हवा में और सब भूल— धवांस भरे कमरों से दूर निकल जाना होता है।

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-13

आत्‍म—विजय की बात—(तैरहवां—प्रवचन)


प्यारे ओशो,  

(इस हेतु) कि तुम सद् और असद् (अच्छाई और बुराई) के संबंध में मेरी शिक्षाओं को समझ सको मुझे तुम्हें जीवन के संबंध में और समस्त जीवित प्राणियों के स्वभाव के संबंध में मेरी शिक्षाएं कहनी होगी
मैं जीवित प्राणी के पीछे चला हूं मैं महानतम और छुद्रतम मार्गों पर चला हूं ताकि मैं उसके स्वभाव को समझ सकूं।
मैने उसकी निगाह सौ गुना करनेवाले दर्पण में पकड़ी जब उसका मुंह बंद शु ताकि उसकी आंख मुझसे बोल सके। और उसकी आंख बोली मुझसे।
लेकिन जहां कहीं भी मुझे जीवित प्राणी मिले वहीं मैने आज्ञाकारिता की भाषा भी सुनी।
समस्त जीवित प्राणी आज्ञाकारी प्राणी हैं।
और यह है दूसरी बात : जो स्वयं की आज्ञा का पालन नहीं कर सकता उसे आशा दी जाएगी वह जीवित प्राणियों का स्वभाव है।

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-12

प्रसिद्ध दार्शनिकों की बात—( बारहवां—प्रवचन)


प्यारे ओशो,

तुमने लोगों की और लोगों के अंधविश्वासों की सेवा की है तुम सारे प्रसिद्ध दार्शनिको! — तुमने सत्य की सेवा च्छीं की है! और ठीक उसी कारण से उन्होने तुम्हें सम्मान दिया।....

तुम गरुड़ नहीं हो : तो न ही तुम आतंक में पड़े प्राण का आनंद जानते हो। और जो एक पक्षी न हो उसे अपना घर अतल गर्तों के ऊपर नहीं बनाना चाहिए।
तुम कुनकुने हो : लेकिन समस्त गहन ज्ञान का प्रवाह शीतल है! प्राण के अंतरतम कुएं बर्फ जैसे शीतल हैं : गर्म हाथों और हाथ में लेनेवालों के लिए एक ताजगी! '

तुम सम्माननीय बने और अकड़े और रीड ताने खड़े रहते हो तुम प्रसिद्ध दार्शनिको! — कोई भी प्रबल हवा या संकल्प तुम्हें आगे की तरफ धक्का नहीं देते।
क्या तुमने कभी भी सागर पर तैरते पाल नहीं देखे हैं गोल हुए और फूलते जा रहे और हवा की तीव्रता के आगे थरथराते?

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-11

सद्गुण संप्रदान करने की बात भाग—1 (ग्‍यारहवां—प्रवचन)


प्‍यारे ओशो,

बताओ मुझे : कैसे स्वर्ण को सर्वोच्च मूल्य उपलब्ध हुआ? क्योकि वह दुर्लभ और निरुपयोगी और चमकदार तथा आभा में स्निग्ध है; वह सदा अपने आपको संप्रदान करता है।
कैवल सर्वोच्च सद्गुण के प्रतीक के रूप में स्वर्ण को सर्वोच्च मूल्य उपलब्ध हुआ देनेवाले की निगाह स्वर्ण सी झलकती है।....
सर्वोच्च सद्गुण दुर्लभ और निरुपयोगी है वह चमकदार और आभा में स्निग्ध है : सर्वोच्च ' सद्गुण संप्रदान किया जाने वाला सद्गुण है।
सच में मैं तुम्हारा ठीक अनुमान लगाता हूं मेरे शिष्यो तुम संप्रदान किये जानेवाले सद्गुण की अभीप्सा करते हो जैसे कि मैं करता हूं।....

तुम स्वयं बलिदान एवम् उपहार बन जाने की प्यास पालते हो; और वही कारण है कि तुम
अपनी आत्मा में समस्त समृद्धियों का ढेर लगा लेने की प्यास से भरते हो।

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-10

सर्जक के ढंग की बात—(दसवां—प्रवचन)


प्यारे ओशो

तुम्हें स्वयं को अपनी ही लपटों में जला देने को तैयार रहना जरूरी है : कैसे तुम नये हो सकते थे यदि प्रथमत: तुम राख न हो गये होते?....
अलग हट जाओ और मेरे आसुओ के साथ अकेले होओ मेरे बंधु। मैं उसे प्रेम करता हूं जो स्वयं के पार सृजन करना चाहता है और इस प्रकार मिट जाता है।

......ऐसा जरथुस्‍त्र ने कहा।

सृजनात्मकता संभवत: एकमात्र अस्तित्वगत धर्म है। सृजन के क्षण वे क्षण हैं जब तुम सृटि के साथ एक हो। एक प्रकार से तुम खो जाते हो, तुम अपना पुराना अहंकार अब और नहीं हो; एक दूसरे प्रकार से तुमने पहली बार अपने आप को पाया है।
केवल सर्जक ही जीवन की गहराइयों और प्रेम की ऊंचाइयों को जानता है। वे लोग जो सृजनात्मकता का आयाम नहीं जानते वे बेखबर रह जाते हैं कि सच्चा धर्म क्या है।

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-09

न्‍याय की बात—(नौवां—प्रवचन)

प्यारे ओशो

जब तुम्हारा कोई शत्रु हो उसे बुराई के बदले भलाई मत दो : क्योकि वह उसे शर्मिंदा करेगा। लेकिन सिद्ध करो कि उसने तुम्हारे प्रति कुछ भला किया है।
क्रोधित होना बेहतर है शर्मिंदा करने के बजाय! और जब तुम्हें शाप दिया गया हो मैं इसे नही पसंद करता कि तब तुम आशीर्वाद देना चाहते हो? बल्कि वापस थोद्यू शाप दो।
और यदि तुम्हारे साथ महो अन्याय किया जाए तो जल्दी से उसके बगल में ही पांच छोटे अन्याय करो। जो अन्याय को अकेले सहन करता है वह देखने में भयावह है।


तुम्हारा भावशून्य न्याय मुझे पसंद नहीं है; और तुम्हारे न्यायाधीशों की ऑख से सदा जल्लाद और उसकी सर्द तलवार ही झांकते हैं।
बताओ मुझे वह न्याय कहां पाया जाने वाला है जो देखती आखों से युक्त प्रेम है?....
कैसे मैं हृदय ही से न्यायपूर्ण हो सकता हूं? कैसे मैं प्रत्येक को वह दे सकता हूं जो उसका है मेरे लिए तो यही पर्याप्त रहने दो : मैं प्रत्येक को वह देता हूं जो मेरा है। 

..........ऐसा जरथुस्त्र ने कहा।

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-08


नये बुतों की बात—(आठवां—प्रवचन)

प्यारे ओशो,  

अभी भी कहीं लोग और सामान्यजन हैं लेकिन हमारे पास नहीं मेरे बंधुओ : यहां तो राज्य है..........
राज्य समस्त क्रूर दानवों में क्रूरतम है।
क्रूरतापूर्वक वह झूठ भी बोलता है; और यह झूठ उसके मुंह से रेगता हुआ बाहर आता है : 'मै  — राज्य — ही लोग हूं।
यह एक झूठ है। ये सर्जक थे जिन्होंने लोगों का सर्जन किया और उनके ऊपर एक भरोसा और एक प्रेम टांगा : इस प्रकार उन्होंने जीवन की सेवा की।
ये विध्वंसक हैं जो बहुतों के लिए जाल बिछाते हैं और उसे राज्य कहते हैं : ये उनके ऊपर तलवार और सैकड़ों इच्छाएं टलते हैं।

.......ऐसा जरूथुस्‍त्र ने कहा।

लोगों की भीड़, यद्यपि उनकी संख्या बहुत है, एक अकेले प्रामाणिक व्यक्ति से बहुत ज्‍यादा कमजोर है। भीड़ों ने अपने आप को बस एक भेड़ मान रखा है, मनुष्य नहीं।

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-07

मित्र की बात—(सातवां—प्रवचन) 


प्यारे ओशो,  

हमारा दूसरों में भरोसा विश्वासघात करता है जहां पर कि हम स्वयं में इतने प्रियरूप से भरोसा रखना चाहेंगे। मित्र के लिए हमारी अभीप्सा ही हमारी विश्वासघातक है।
और प्राय: अपने प्रेम से हम केवल अपनी ईर्ष्या पर छलांग लगाना चाहते हैं। और प्राय: हम आक्रमण करते हैं और शह बना लेते हैं यह छिपाने के लिए कि हम स्वयं पर आक्रमण के लिए असुरक्षित हैं।
'कम से कम मेरे शत्रु होओ!'  ऐसा सच्चा सम्मान बोलता है जो मित्रता मांगने का जोखिम नहीं उठा पाता।
..........ऐसा जरथुस्त्र ने कहा।


मित्रता उन विषयों में से एक है जो लगभग सभी दार्शनिकों द्वारा सर्वाधिक उपेक्षित रहे हैl शायद हम इसे मंजूरशुदा ले लेते है क हहम समण्‍ते ही है कह इसका मतलब होता है, इसलिए हम इसकी गहराइयों के संबंध में, विकास की इसकी संभावनाओं के संबंध में, भिन्न—भिन्न अर्थवत्ताओं सहित इसके भिन्न—भिन्न रंगों के संबंध में अज्ञानी ही रहे आए हैं।

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-06

जीवन और प्रेम की बात—(छठवां—प्रवचन)


प्यारे ओशो,  

हमारे और गुलाब कली के, बीच समान क्या है जो कंपती है क्योंकि ओस की एक बूंद उस पर पड़ी हुई है?
यह सच है : हम जीवन को प्रेम करते हैं इसलिए नहीं क्योंकि हम जीने के आदी हो गये हैं बल्कि इसलिए क्योकि हम प्रेम करने के आदी हो गये हैं प्रेम में हमेशा एक प्रकार का पागलपन है। लेकिन उस पागलपन में हमेशा एक प्रकार की  पद्धति भी है
और मेरे देखेभी जो जीवन को प्रेम करते हैं ऐसा प्रतीत होता है कि तितलियां और पानी के बबूले और मनुष्यों में जो कुछ भी उनके जैसा है आनंद के बारे में सर्वाधिक जानते हैं। इन हल्की— फुल्की नासमझ सुकुमार भावनामय नन्हीं आत्माओं को इधर— उधर पर फड़फडाते देखना — जरथुस्त्र को इतना प्रभावित करता है कि आंसू आ जाते हैं और गीत फूट पड़ते है।  

मैं केवल ऐसे ईश्वर में यकीन कर सकता हूं जिसने समझ लिया हो कि नाचना कैसे।

..........ऐसा जरथुस्त्र ने कहा।  

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-05

शरीर का तिरस्‍कार करने वालों की बातें—(पांचवां—प्रवचन)


प्यारे ओशो,

तुम कहते हो मैं तुम्हें गर्व है इस शब्द पर। लेकिन उससे भी बढ़कर महान — यद्यपि तुम इस बात पर यकीन नहीं करोगे —तुम्हारा शरीर है और उसकी महत बुद्धिमत्ता जो 'मैं कहता नहीं बल्कि 'मैं' का कृत्य करता है।
इंद्रिय जो महसूस करती है मन को जो बोध होता है वह कभी भी अपने आप में लक्ष्य नहीं है। लेकिन इंद्रिय और मन तुम्हें फुसलाना चाहेंगे कि वे ही सब बातों के लक्ष्य हैं : वे इतने ही निरर्थक हैं। इंद्रिय और मन उपकरण और खिलौने हैं : उनके भी पीछे प्रशांत पड़ी आत्मा है। आत्मा इंद्रिय की आखों से खोज करती है वह मन के कानों से सुनती भी है।

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-04

तीन कायापलट की बात—(चौथा प्रवचन)

प्यारे ओशो,  

मैं तुम्हें प्राण के तीन कायापलट के नाम बताता हूं : कैसे प्राण ऊंट बनेगा और ऊंट शेर बनेगा और शेर अंतत: एक शिशु।
बहुत सी भारी वस्तुएं हैं प्राण के लिए मजबूत भारवाही प्राण के लिए जिसमें सम्मान और विस्मयविमुग्धता का वास है : उसकी मजबूती भारी की अभीप्सा करती है सर्वाधिक भारी की। क्या है भारी? इस प्रकार भारवाही प्राण पूछता है इस प्रकार वह ऊंट की तरह घुटने टेकता है और चाहता है भलीभांति लदना

भारवाही प्राण अपने ऊपर ये सर्वाधिक भारी वस्तुएं ले लेता है : जैसे कोई लदा हुआ ऊंट
रेगिस्तान में जल्दी— जल्दी चला जा रहा हो इस प्रकार वह अपने रोगिस्तान में जल्दी— जल्दी चलता लेकिन एकांततम रेगिस्तान में दूसरा कायापलट घटता है : यहां प्राण शेर बन जाता है; वह स्वतंत्रता को वश में करना और अपने ही रेगिस्तान में मालिक बनना चाहता है। यहां वह अपने परम मालिक को खोजता है : यह उसका और अपने ईश्वर का शत्रु होगा यह विजय के लिए महा दैत्य से संघर्ष करेगा।

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-03

पूर्वरंग—भाग-3 (तीसरा—प्रवचन)


प्यारे ओशो

जब जरथुस्‍त्र जंगल के सामने के निकटतम नगर में पहुंचे वहीं पर उन्हें बहुत सारे लोग बाजार के चौराहे पर एकत्र हुई मिल गये : क्योंकि ऐसी घोषणा की गयी थी कि कोई रस्सी पर चलने वाला नट आने वाला था। और जरथुस्‍त्र लोगों से इस प्रकार बोले :
मैं तुम्हें परममानव (सुपरमैन ) सिखाता हूं। मानव कुछ ऐसी चीज है जिससे पार उठना है तुमने उससे पार उठने के लिए क्या किया है?
आज तक के सभी प्राणियों ने कुछ अपने से पार निर्मित किया है : और क्या तुम इस महान ज्वार का उतार बनना चाहते हो और मानव के पार जाने के बजाय पशुओं में लौट जाना चाहते हो?

मनुष्यों के लिए बंदर क्या है? हंसी की सामग्री अथवा एक दुखद शर्मिन्दगी। और ठीक ऐसा ही मानव है परममानव के लिए : हंसी की सामग्री अथवा एक दुखद शर्मिन्दगी।

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-02

पूर्वरंग—भाग-2  (दूसरा प्रवचन)


प्यारे ओशो,

जरथुस्‍त्र पहाड़ से अकेले नीचे उतरे और किसी से उनकी मुलाकात नहीं हुई। लेकिन जब उन्होंने जंगल में प्रवेश किया, एक बूढ़ा व्यक्ति जो जंगल में जड़िया खोजने के लिए अपनी पवित्र कुटिया से बाहर आया था, सहसा उनके समुख था। और वह बूढ़ा व्यक्ति जरथुस्त्र से इस प्रकार बोला :
'यह परिव्राजक मेरे लिए अजनबी नहीं है : बहुत वर्षों पहले वह यहां से गुजरा था। वह जरधुस्त्र कहलाता था; लेकिन वह बदल गया है।
'तब तुम अपनी राख पहाड़ों पर ले गये थे : क्या तुम आज अपनी अग्नि घाटियों में ले
जाओगे? क्या तुम्हें एक आगलगाऊ की सजा का भय नहीं है?

जरथुस्‍थ--नाचता गाता मसीहा--प्रवचन-01

पूर्वरंग—भाग—1 

(पहला प्रवचन)


प्‍यारे ओशो,

जब जरथुस्‍त्र तीस साल के थे, वह अपना घर और उसकी सुखद सुरक्षा छोड़कर पहाड़ों में चले गये। वहां उन्होंने अपने स्व का और अपने एकांत का भरपूर आनंद लिया और दस साल तक उससे थकित नहीं हुए। लेकिन अंतत: उनके हृदय का भाव बदला — और एक प्रात: वह अरुणोदय के साथ उठे चल कर सूर्य के सम्‍मुख आए और उससे इस प्रकार बोले :
महा सितारे! क्या होगा तुम्हारा आनंद यदि वे न हों जिनके लिए तुम चमकते हो!
तुम यहां मेरी गुफा पर दस वर्षों से आते रहे हो : तुम अपने प्रकाश से और इस यात्रा से थक गये होते मेरे बिना मेरे गरुड़ और मेरे सर्प के बिना।

लेकिन हमने हर सुबह तुम्हारा इंतजार किया तुमसे तुम्हारी बहुलता ग्रहण की और उसके लिए तुम्हें धन्यवाद दिया

जरथुस्‍त्र--नाचता गाता मसीहा--ओशो


जरथुस्‍थ-(नांचता  गाता  मसीहां)
ओशो
(फ्रेड्रिक नीत्‍शे की दस स्‍पेश जरथुस्‍त्रा’)
परिचय
जरथुस्त्र अनंतता के इस परम विस्तार में जरूर कहीं हंस रहे होंगे। मनुष्य के बहुत प्रारंभिक इतिहास में ही वह एक, संबुद्ध सद्गुरु थे, और उनके संबंध में अभिलिखित व उपलब्ध कुछ छिट—पुट टुकड़ों से निष्कर्ष निकलता है कि वह बहुत स्वच्छंद व आश्चर्यजनक व्यक्ति थे।
ओशो ने फ्रेड्रिक नीत्शे की प्रतिभा को पहचाना जब पहली बार उन्हें अपने युवा काल में दस स्पेक जरथुस्त्रा (ऐसा जरथुस्त्र बोले ) देखने को मिली। न केवल उन्होंने इसके रचयिता की मेधा को पहचाना, बल्कि यह कृति स्वयं उनके जीवन की मिसाल थी। ओशो मानव मन के पार गये जब  21 मार्च 1953 को उन्हें संबुद्धत्व की घटना घटी। वह स्वयं आज के युग के जरथुस्त्र हैं।
फेड्रिक नीत्शे एक गंभीर व समर्पित दार्शनिक था — गंभीर अपने कार्य के संबंध में, और समर्पित सत्य को। वह विशाल स्वभदर्शी अंतर्दृष्टि का व्यक्ति था — बृहदाकार छलांगें लेने में सक्षम, न केवल अपने समय की स्वीकृत बल्कि स्वीकार्य सीमाओं के भी पार। उसका साहस उसकी बुद्धि के टक्कर का था, और उसने मनुष्य के सैद्धांतिक क्षितिजों को बदल दिया है।

महावीर या महाविनास-प्रवचन-06

 असुत्ता मुनि--प्रवचन-छठवां


हम सब प्यासे हैं आनंद के लिए, शांति के लिए। और सच तो यह है कि जीवन भर जो हम दौड़ते हैं धन के, पद के, प्रतिष्ठा के पीछे, उस दौड़ में भी भाव यही रहता है कि शायद शांति, शायद संतृप्ति मिल जाए। वासनाओं में भी जो हम दौड़ते हैं, उस दौड़ में भी यही पीछे आकांक्षा होती है कि शायद जीवन की संतृप्ति उसमें मिल जाए, शायद जीवन आनंद को उपलब्ध हो जाए, शायद भीतर एक सौंदर्य और शांति और आनंद के लोक का उदघाटन हो जाए।
लेकिन एक ही निरंतर इच्छा में दौड़ने के बाद भी वह गंतव्य दूर रहता है, निरंतर वासनाओं के पीछे चल कर भी वह परम संतृप्ति उपलब्ध नहीं होती है!
लोग हैं, धार्मिक कहे जाने वाले लोग हैं, जो कहेंगे, वासनाएं बुरी हैं; जो कहेंगे, वासनाएं त्याज्य हैं; जो कहेंगे, समस्त वासनाओं को छोड़ देना है; जो कहेंगे, वासनाएं अधार्मिक हैं। मैं आपसे कहूं, कोई वासना अधार्मिक नहीं है, अगर हम उसे देख सकें, समझ सकें। समस्त वासनाओं के भीतर अंततः प्रभु को पाने की वासना छिपी है। एक व्यक्ति को धन देते चले जाएं और उससे कहें कि कितने धन पर वह तृप्त होगा? हम कितना भी धन दें, उसकी आकांक्षा तृप्त न होगी। कितना ही धन दें! सारे जगत का धन उसे दे दें...