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रविवार, 28 मई 2017

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-09



प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

ध्यान का दीया—(नौवां प्रवचन)
दिनांक १९ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—अज्ञेयवाद (एग्नास्टिसिज्म) क्या है, जिसकी सराहना आप अक्सर करते हैं?
2—कई महात्मागण, साधु और मुनि आपकी बातें चुरा कर इस भांति बोलते हैं कि जैसे उन्हीं की हों। क्या इन्हें समय रहते रोकना आवश्यक नहीं है?

3—प्रायः सभी तथाकथित धर्मों में, खासकर ईसाइयत में प्रायश्चित्त को बड़ा धार्मिक गुण माना जाता है किंतु कल आपने बताया कि प्रायश्चित्त क्रोध का ही शीर्षासन करता हुआ रूप है। कृपा करके इस संदर्भ में आगे कुछ कहें।


पहला प्रश्न: भगवान,
अज्ञेयवाद, एग्नास्टिसिज्म, क्या है, जिसकी सराहना आप अक्सर करते हैं?

आनंद मैत्रेय,
मन जीता है द्वंद्व में। फिर द्वंद्व चाहे प्रेम का हो या घृणा का, श्रद्धा का या अश्रद्धा का, शत्रुता का या मित्रता का--द्वंद्व द्वंद्व है। नास्तिक भी द्वंद्व में होता है और आस्तिक भी, क्योंकि नास्तिक आधा स्वीकार करता है--नकार। और आस्तिक भी आधा स्वीकार करता है--स्वीकार। हां और नहीं--यह भी द्वंद्व है। इस द्वंद्व में से तुमने एक को चुना तो दूसरे से तुम बच न सकोगे।
द्वंद्व का यह मौलिक सिद्धांत है: एक को चुनो कि दूसरा भी चुन लिया गया--अनिवार्यरूपेण। यदि तुम प्रेम करोगे तो घृणा भी करोगे; घृणा से नहीं बच सकते। प्रकाश होगा तो अंधेरा भी होगा। फूल होंगे तो कांटे भी होंगे। अगर एक को चुना तो दूसरा पीछे से आ ही जाएगा।
अज्ञेयवाद का अर्थ होता है: द्वंद्व में से किसी को भी न चुनना--न हां को न न को। अज्ञेयवाद धर्म की पराकाष्ठा है। बुद्ध अज्ञेयवादी हैं, और बुद्ध परमपुरुष हैं। जिस ऊंचाई से बुद्ध बोले हैं, उस ऊंचाई से कोई और नहीं बोला। और सभी ने कोई न कोई द्वंद्व चुन लिया। नास्तिक कहता है: ईश्वर नहीं है। आस्तिक कहता है: ईश्वर है। लेकिन दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं। अगर दुनिया में कोई नास्तिक न हो तो क्या कोई आस्तिक हो सकेगा? कैसे होगा? नास्तिक बिलकुल जरूरी है--आस्तिक होने के लिए। और यह कैसी आस्तिकता हुई, जिसके होने के लिए नास्तिक की जरूरत पड़ती हो। और अगर सभी नास्तिक हों, कोई आस्तिक न हो, तो नास्तिक भी मिट जाएगी, बच न सकेगी। यह अदभुत नास्तिकता हुई, जिसकी आधारशिला के लिए आस्तिकता चाहिए!
आस्तिक और नास्तिक साथ-साथ जीते हैं; एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। धार्मिक व्यक्ति न तो आस्तिक होता है, न नास्तिक। धार्मिक व्यक्ति कहता है: हां और न के ऊपर उठना है, द्वंद्व के पार जाना है, द्वंद्वातीत होना है। तो मैं चुनूंगा नहीं। मैं चुनावरहित चेतना में जागूंगा। मैं हां को भी वरण नहीं करूंगा, न को भी वरण नहीं करूंगा; मैं किसी पक्षपात तो ओढूंगा नहीं, मैं निष्पक्ष रहूंगा। मैं मन के किसी जाल में पड़ने को नहीं हूं। मैं मन के किसी भुलावे में अब न आऊंगा।
नास्तिक और आस्तिक विवादग्रस्त रहते हैं, लड़ते-जूझते रहते हैं। उनके तर्क भी भिन्न नहीं होते। अगर तुम नास्तिकों आस्तिकों का पूरा इतिहास देखो तो चकित होओगे, उन के तर्क बिलकुल एक जैसे हैं। निष्पत्तियां भिन्न मालूम होती हैं; मगर अगर तर्क एक जैसे हैं तो निष्पत्तियां भी बहुत भिन्न नहीं हो सकतीं।
आस्तिक कहता है कि संसार है, तो उसका बनाने वाला होना ही चाहिए, बिना बनाए कोई चीज कैसे हो सकती है? इसलिए ईश्वर है।
नास्तिक कहता है: अगर प्रत्येक वस्तु के लिए बनाने वाला चाहिए, तो फिर ईश्वर को किसने बनाया? वही तर्क उसका है, कुछ भेद नहीं है। आस्तिक के पास उत्तर नहीं रह जाता, या कि वह क्रोध से भुनभुना जाता है।
याज्ञवल्क्य से जनक की धर्म सभा में गार्गी नाम की एक अदभुत महिला ने यही पूछा था कि सबका आधार परमात्मा है, तो फिर परमात्मा का आधार कौन है? याज्ञवल्क्य क्रुद्ध हो गया। उसकी आंख से अंगारे टपकने लगे। उसने कहा, स्त्री, अपना मुंह बंद रख! यह अतिप्रश्न है। ज्यादा बोलेगी, सिर गिर जाएगा। यह कोई उत्तर हुआ? यह धमकी हुई, कि सिर काट दिया जाएगा! यह उत्तर तो हुआ ही नहीं, यह सज्जनता भी न हुई। एक स्त्री के साथ सदव्यवहार भी न हुआ। और तर्क वही था, जो याज्ञवल्क्य दे रहा था। वह कह रहा था कि संसार के लिए कोई आधार चाहिए, बिना आधार के संसार कैसे हो सकता है? परमात्मा इसका आधार है। तो गार्गी ने कौन सी भूल की! अगर संसार बिना आधार के नहीं हो सकता, तो परमात्मा बिना आधार के कैसे हो सकता है? उसी तर्क को जरा और आगे खींचा। उसी तर्क को थोड़ा और आगे धकाया। उसी तर्क को उसकी निष्पत्ति पर पहुंचाया। लेकिन घबड़ाया याज्ञवल्क्य, क्योंकि अब परमात्मा को भी आधार अगर देना पड़े, तो मुश्किल में पड़ेगा। मुश्किल में इसलिए पड़ेगा कि तुम जो भी उत्तर दोगे, सवाल फिर भी खड़ा रहेगा कि फिर उसका आधार क्या है? तुम कहो परमात्मा का आधार अ, अ का आधार ब, ब का आधार स--प्रश्न वहीं का वहीं रहेगा कि स का आधार कौन? समझ गया याज्ञवल्क्य कि अब चर्चा को आगे खींचना झंझट में पड़ना है। और जहां चर्चा को आगे खींचना मुश्किल हो जाता है वहां तलवारें खिंच जाती हैं। आखिर हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे पर तलवारें क्यों खींचे रहे--चर्चा को खींचना मुश्किल हो गया। ईसाई और मुसलमान क्यों लड़ते रहे सदियों तक? चर्चा को खींचना मुश्किल हो गया। एक जगह आ जाती है जहां चर्चा आगे नहीं बढ़ती। और मजा यह है कि दोनों के तर्कों में कुछ भी भेद नहीं है, जरा भी भेद नहीं। अगर सबको बनाने वाले की जरूरत है तो फिर तो बनाने वाले को भी कोई चाहना पड़ेगा, जिसने बनाया हो। अगर तुम बिना पिता के पैदा नहीं हो सकते तो तुम्हारे पिता को भी पिता की जरूरत पड़ेगी, और उनके पिता को भी, और उनके पिता को भी। इस सिलसिले का अंत कहां होगा? क्या तुम कभी ऐसी जगह पहुंच सकोगे जहां तुम कह सको कि इस आदमी को पिता की जरूरत नहीं थी, ये यह बिना पिता के पैदा हुआ? यही तो ईसाई कहते हैं जीसस के संबंध में कि वे बिना पिता के पैदा हुए। क्यों? इसीलिए कि अगर यह बात मान ली जा सके कि जीसस बिना पिता के पैदा हो सकते हैं, कुंआरी मां से, तो फिर परमात्मा को भी बनाने वाले की कोई जरूरत नहीं रह जाती। अगर तुम यह छोटी सी बात पी गए तो फिर बड़ी बात भी पी जाओगे। अगर यह छोटी सी बात तुमने गले के नीचे उतार ली और ना-नुच न किया और कहा कि यह कैसे हो सकता है, सवाल न उठाया--डर के मारे, लोभ के मारे, किसी कारण से गटक गए...यद्यपि सवाल सीधा-साफ है कि जीसस भी बिना पिता के पैदा नहीं हो सकते। असंभव है यह बात। यह हो नहीं सकता।
लेकिन तुम्हारी तथाकथित आस्तिकता असंभव बातों पर खड़ी है, मूढ़तापूर्ण बातों पर खड़ी है। और उन्हीं मूढ़तापूर्ण बातों का खंडन करके नास्तिकता खड़ी है। दोनों की मूढ़ता में कोई भी भेद नहीं है।
अज्ञेयवादी की यह घोषणा है कि हम कोई पक्ष नहीं लेते--इधर है खाई, इधर है खड्ड। हां और न दोनों खाई-खड्ड हैं। बीच में जो चले, समतुल, सम्यक, न इधर झुके न उधर, जो चुनाव न करे, जो कहे कि मैं न तो हां के साथ राजी होऊंगा न न के--मैं तो सिर्फ जाग्रत रहूंगा, होश सम्हालूंगा! मुझे क्या पड़ी है कि ईश्वर है या नहीं? इससे मेरी क्या समस्या है? इससे मुझे क्या अड़चन है? यह सवाल ही असली धार्मिक आदमी का नहीं है।
असली धार्मिक आदमी यह पूछता है: मैं कौन हूं? नकली धार्मिक आदमी पूछता है: ईश्वर है या नहीं? यह टालना है सवालों को।
एक मित्र ने पूछा है कि जिस व्यक्ति ने ईश्वर को जान लिया उसकी पहचान क्या है? तुम्हें क्या करना है? तुम्हें ईश्वर जानना है या जिन्होंने ईश्वर को जान लिया है उन्हें जानना है? तुम नहीं पूछते यह कि जिस आदमी ने मिठाई का स्वाद लिया, उसकी पहचान क्या है? कोई पहचान होगी? तुम मिठाई को चखना चाहो, यह उत्सुकता तो समझ में आती है; मगर जिसने मिठाई चखी उसकी पहचान क्या है? क्या पहचान हो सकती है? एक आदमी ने मिठाई चखी और एक आदमी ने मिठाई नहीं चखी, दोनों सामने खड़े हैं, कुछ भेद होगा? क्या भेद होगा? भेद होगा तो भीतरी होगा, जो ऊपर दिखाई नहीं पड़ सकता। जिसने मिठाई चखी है वह जानता है कि मिठास भी है और जिसने नहीं चखी, उसे पता नहीं। मगर ऐसे कैसे पता लगाओगे? ऊपर से क्या तौलोगे? कोई नाप-जोख कर सकते हो? कोई तराजू पर तौल सकते हो? कोई उपाय नहीं है बाहर से।
मगर इस तरह के प्रश्न लोग पूछते हैं और सोचते हैं कि धार्मिक प्रश्न पूछ रहे हैं। तुम्हें क्या पड़ी है? ईश्वर को जानना है, यह तक बात धार्मिक व्यक्ति की नहीं है। तो यह बात कि जिसने ईश्वर को जाना है, उसकी क्या पहचान है--यह तो हद हो गई! यह तो तुम दूर से भी दूर निकल गए। यह तो उधार से भी उधार हो गए। यह तो छाया की भी छाया हो गई। मूल की बात करो। पूछो कि मैं कौन हूं। जानो कि मैं कौन हूं। और उसी जानने में सब जान लिया जाता है।
बुद्ध इस जगत के परम अज्ञेयवादी हैं। इसलिए बुद्ध को न तुम आस्तिक कह सकते हो, न नास्तिक। वे न तो ईश्वर के संबंध में हां भरते हैं न ना। लेकिन मूढ़ उन्हें समझ न सके। इसलिए इस देश से बुद्ध का नाम मिट गया। इस देश में मूढ़ों की जमात है। बड़ी जमात है! अगर बुद्ध नास्तिक होते तो भी कुछ मूढ़ उनके पीछे चलने को राजी हो जाते। अगर आस्तिक होते, तब तो कहना ही क्या था! तब तो पूरा कुंभ मेला उनके पीछे लग जाता। लेकिन बुद्ध ने कहा कि न मैं आस्तिक न नास्तिक, यह बात ही अप्रासंगिक। ईश्वर है या नहीं, यह विचारणीय भी नहीं।
बुद्ध कहा करते थे: जैसे एक आदमी को तीर लग गया हो और वह मर रहा है। और तुम उसके पास बैठे हो और तुम कहते हो, मैं यह तीर खींच लूं तो तू बच जाए। पर वह आदमी दार्शनिक है, वह कहता है, इसके पहले कि तुम तीर खींचो, मुझे कुछ प्रश्नों के जवाब दो। पहले तो यह कि तीर सच है कि झूठ, माया है या यथार्थ? अगर माया है तो क्या खींचना! किसको खींचना, कौन खींचने वाला है! यदि यथार्थ है, यह तय हो जाए तो फिर खींचो। मैं यह भी जानना चाहता हूं कि जिसने मारा है यह तीर, वह कौन है? मित्र है शत्रु? अपना है कि पराया? यह तीर जान-बूझ कर मारा गया है कि दुर्घटना है? इसके पीछे कोई प्रयोजन है या निष्प्रयोजन? यह तीर विषबुझा है या नहीं?
ऐसे वह हजार प्रश्न उठाता है। लेकिन तुम क्या करोगे? तुम उससे कहोगे न कि यह प्रश्न तू बाद में पूछ लेना, पहले तीर खींच लेने दे; कहीं ऐसा न हो कि हम तेरे प्रश्नों में उलझें, तेरे लिए उत्तर तलाशें और इस बीच तेरे प्राण निकल जाएं। क्योंकि तीर तेरी छाती में चुभा है, वह तेरे प्राण लिए ले रहा है। यह दार्शनिक ऊहापोह पीछे कर लेना। पहले तीर को खींच लेने दे।
बुद्ध कहते थे: ऐसा ही है। जो व्यक्ति सच में ही जीवन-क्रांति में उत्सुक है, वह पहले जीवन से अज्ञान के तीर को खींचने में लगता है। वह व्यर्थ की बातें नहीं पूछता कि ईश्वर है या नहीं, है तो कैसा है, कितने मुख हैं, कितने हाथ हैं, कहां रहता है? जिन्होंने उसको जान लिया है, उनकी पहचान क्या है? उनका लक्षण क्या है?
सच्चा खोजी एक ही सवाल पूछता है कि मेरे भीतर अंधकार छाया हुआ है, मैं दीया कैसे जलाऊं? मेरे भीतर रोशनी कैसे हो सके? सच्चा व्यक्ति आस्तिक-नास्तिक इस झमेले में नहीं पड़ता। और यह झमेला बड़ा है। इसमें जो पड़ा, उसमें से निकलना बहुत मुश्किल है। यह बहुत लंबा झमेला है। और मजा यह है कि जिनको कुछ भी पता नहीं वे इस झमेले में पड़ जाते हैं।
पहली तो बात यह है, तुम्हें पता नहीं, तुम कैसे कहोगे कि ईश्वर है? लेकिन करोड़ों लोग कह रहे हैं कि है और उनको कुछ भी पता नहीं। जाना नहीं, जीया नहीं, पहचाना नहीं, साक्षात्कार नहीं हुआ, अनुभव नहीं हुआ, कोई स्वाद नहीं मिला--और कह रहे हैं कि है। इससे बड़ा झूठ और क्या होगा? और ये सब धार्मिक लोग हैं। मेरे देखे धार्मिक लोग जितने पाखंडी होते हैं, उतना कोई और नहीं होता। इस देश में इतना जो पाखंड है, उसका कारण यही है कि यहां बड़े धार्मिक लोग बैठे हुए हैं। भयंकर पाखंड है, क्योंकि धर्म की तुम्हारी बुनियाद ही झूठ पर खड़ी है। पहली तो बात यही कि तुम्हें पता नहीं और तुमने मान लिया। यह तो बेईमानी है। यह तो अप्रामाणिकता है। इतना तो कहते कि अभी मैं कैसे मानूं! अभी मुझे पता नहीं तो मैं कैसे हां भरूं! लेकिन डर के कारण, लोभ के कारण हां भर दी या और लोग कह रहे थे, सभी लोग कह रहे थे कि ईश्वर है, तो कौन झंझट मोल ले! इतने लोगों से कौन उलझे! फिर इन्हीं से काम-धाम है, इन्हीं से रोज का व्यवहार है, लेन-देन है, तो हां भर दी।
औपचारिक है तुम्हारी हां और धीरे-धीरे जो तुमने औपचारिक रूप से हां भरी थी, उसको तुम्हीं सत्य मानने लगते हो। एक मजा है दुनिया में। दूसरे को धोखा देना सोच-समझ कर, क्योंकि धोखा देते-देते आदमी उसी धोखे में खुद ही विश्वास करने लगता है। अगर कुछ लोगों को धोखा देने में समर्थ हो गया है, तो वह सोचता है जरूर इसमें कोई सचाई होगी, तभी तो मैं इतने लोगों को धोखा दे पाया। फिर आदमी सोचता ही नहीं। फिर उसी धोखे के सहारे जीए जाता है। यह कैसा धर्म है!
विश्वास से कोई धर्म नहीं होता, अनुभव से होता है। लेकिन तुम्हारे सब धर्म विश्वास के हैं, फिर चाहे तुम हिंदू होओ, चाहे यहूदी, चाहे ईसाई, चाहे जैन, चाहे कोई भी हो। तुम्हारा धर्म विश्वास का है, अनुभव का नहीं। और विश्वास का है तो दो कौड़ी का है। अनुभव का है तो उसका कोई मूल्य नहीं आंका जा सकता अकूत है।
मैं तुमसे कहता हूं: विश्वास न करना। अगर जानना हो तो विश्वास करना ही मत। इस दुनिया में सब से ज्यादा सावधान रहने की अगर कहीं कोई जरूरत है तो वह विश्वास से सावधान रहने की जरूरत है। क्योंकि विश्वास ही लोगों को खाए जा रहा है। पहले ही मान लिया, चलने के पहले ही मान लिया, खोजने के पहले ही मान लिया। अगर वैज्ञानिक भी ऐसा ही करने लगे तो विज्ञान भी इसी तरह दो कौड़ी का हो जाएगा, जैसे तुम्हारा धर्म हो गया है। लेकिन विज्ञान ऐसा नहीं करता; पहले प्रयोग। और एक बार भी नहीं, हजार बार प्रयोग। जब हजारों बार कोई बात निरपवाद रूप से सत्य हो जाती है सिद्ध, तब स्वीकार करता है। तब भी स्वीकृति आत्यंतिक नहीं होती, सामयिक होती है, सशर्त होती है। इतना ही वैज्ञानिक कहता है कि अभी तक जो हम जानते हैं, उसके आधार पर कहते हैं कि ऐसा है; कल और जानकारी बढ़ेगी तो शायद हमें अपनी पूरी धारणा बदलनी पड़ेगी।
वैज्ञानिक कहीं ज्यादा नीति-निष्ठ है, कहीं ज्यादा ईमानदार है, कहीं ज्यादा धार्मिक है--बजाय तुम्हारे तथाकथित धार्मिक लोगों के। और तुम जब एक चीज मान लेते हो तो फिर तुम कुछ भी मान लेते हो। कुछ भी मानने में अड़चन नहीं रह जाती। एक गलत कदम उठाया तो फिर गलत कदम उठते चले जाते हैं, क्योंकि दिशा गलत हो गई। और छोटे-मोटे लोगों की बात छोड़ दो, जिनको हम बड़े-बड़े विचारशील लोग कहते हैं, उनकी भी हालत यही है।
यूनान का बहुत बड़ा तर्कशास्त्री हुआ अरस्तू। यूनान में धारणा थी कि स्त्रियों के दांत पुरुषों से कम होते हैं। पुरुषों ने फैला दी होगी। पुरुष तो इस तरह की बातें फैलाने में बड़े कुशल हैं। स्त्रियों के दांत पुरुषों के बराबर हो ही कैसे सकते हैं! सवाल यह है कि स्त्रियों में सब चीजें कम होनी ही चाहिए! कहां पुरुष और कहां स्त्री! चरणों की दासी! बराबर दांत होने का दावा करें, यह हो ही कैसे सकता है! तो किसी ने सवाल भी नहीं उठाया। यह बात चल पड़ी और चल पड़ी। चलती रही हजारों साल तक। और स्त्रियों की कोई कमी है! सच तो यह है कि पुरुषों से थोड़ी ज्यादा ही हैं स्त्रियां, क्योंकि पुरुष कई तरह की बेवकूफियां करते हैं--युद्ध लड़ते हैं, और न मालूम क्या-क्या करते रहते हैं, उसमें उनका खातमा होता रहा है। स्त्रियां हमेशा ही थोड़ी ज्यादा होती हैं पुरुषों से। और पुरुष आपाधापी भी बहुत करते हैं, भागा-भागी भी बहुत करते हैं। तो कोई हार्ट-अटैक में मरेगा, कोई पागल हो जाएगा, कोई छज्जे पर से कूद कर आत्महत्या कर लेगा। स्त्रियां सिर्फ कहती हैं आत्महत्या की, करतीं वगैरह नहीं। बातचीत है, कोई इसमें ज्यादा अर्थ नहीं है। पुरुष आत्महत्याएं भी दोगुनी करते हैं स्त्रियों से और पागल भी दो गुने होते हैं। और होना भी चाहिए, क्योंकि कितने तरह के पागलपन में तो लगे रहते हैं। धन इकट्ठा करना है, पदों पर चढ़ना है। सीढ़ियों पर सीढ़ियां लगाई हुई हैं, वहां से गिरते हैं, फिर चारों खाने चित नीचे पड़े हैं। और जनता तालियां बजा रही है!
चालीस साल के बाद अक्सर लोगों को हृदय का दौरा पड़ना शुरू होता है, क्योंकि चालीस साल तक तो किसी तरह शरीर सह लेता है। ताकत होती है, सामर्थ्य होती है, शरीर युवा होता है; किसी तरह सह जाता है। बस चालीस और बयालीस के करीब खतरे की घंटी बजनी शुरू हो जाती है; रक्तचाप बढ़ जाएगा, हृदय का दौरा पड़ने लगेगा, कोई झंझट आने के करीब है। और युद्ध कहीं न कहीं चलने ही चाहिए, वियतनाम में न चले तो इजराइल में चले, इजराइल में न चले तो अफगानिस्तान में चले, कहीं न कहीं चलना चाहिए, नहीं तो पुरुष को चैन नहीं। खाली समय में भी वह बैठा हुआ तलवार पर धार रखता रहता है। खाली समय में जब कहीं युद्ध नहीं हो रहा होता, उसको कहते हैं--ठंडा युद्ध! ठंडा युद्ध का मतलब यह कि तैयारी चल रही है, अरे कब युद्ध हो जाए! और कभी-कभी तो ऐसा होता है कि तैयारी होने के कारण ही हो जाता है, क्योंकि तुम अपनी तलवार पर धार रख रहे हो, पाकिस्तान भी अपनी तलवार पर धार रख रहा है। तुमको गुस्सा आता है देख कर कि यह तलवार पर धार रख रहा है, खतरनाक मामला है, तुम और जोर से रखने लगे। उसने देखा तुम जोर से रख रहे हो, वह और जोर से रखने लगा। बात बढ़ गई। बात में से बात निकल गई। तुमने चिल्ला दिया कि अगर इससे ज्यादा धार रखी तो ठीक नहीं होगा!
देरी कहां लगती है झगड़े में! तलवारें खींच जाती हैं। असली चीजों की तो बात छोड़ दो, पुरुष कुछ ऐसा पागल है कि शतरंजों के खेलों में तलवारें खिंच गई हैं और गर्दनें कट गई हैं। अब शतरंज में सब नकली मामला है, हाथी-घोड़े सब नकली, राजा-वजीर सब नकली। गरीब के हुए तो लकड़ी के, अमीर के हुए तो समझो कि हाथी-दांत के; मगर नकली तो नकली हैं, चाहे लकड़ी के हों चाहे हाथी-दांत के हों, चाहे सोने के हों और चाहे हीरे-जवाहरात जड़े हों। इससे क्या फर्क पड़ता है! मगर तलवारें खिंच जाती हैं। इस मूढ़ता को कोई देखता नहीं। और पुरुष लड़ता रहता है, काटता रहता है, मारता रहता है। तो हमेशा कम रहा है। इतना कम हो गया है कभी-कभी कि मोहम्मद को तो कहना पड़ा कि प्रत्येक पुरुष अगर चार विवाह करे तो ठीक, क्योंकि स्त्रियां चौगुनी ज्यादा थीं मोहम्मद के समय में। इसलिए मजबूरी में कहना पड़ा, नहीं तो बहुत उपद्रव मच जाएगा, बड़ी खींचात्तान हो जाएगी। अगर चार गुनी स्त्रियां हों और एक ही का विवाह हो सके और तीन अविवाहित रह जाएं, तो अविवाहित कुछ ऐसे ही थोड़े ही छोड़ देंगी, कुछ न कुछ उपद्रव होने ही वाला है। भारी उपद्रव मचेगा! इससे बेहतर है कि विवाहित ही कर दो। खुद मोहम्मद ने नौ विवाह किए। करना ही चाहिए; जब तुम चार की शिक्षा दोगे तो कम से कम नौ करके दिखलाना तो चाहिए। नहीं तो लोग कहेंगे कि वाह, खुद तो बालब्रह्मचारी और हमें फंसा रहे हैं! तो बेचारे खुद फंसे। अब एक पत्नी का जिनको अनुभव है वे जानते हैं कि नौ पत्नियों का परिणाम क्या होगा! मोहम्मद भी हिम्मत के आदमी रहे होंगे। महावीर वगैरह तो एक से ही भाग गए थे। मोहम्मद बलशाली आदमी मालूम पड़ते हैं। हिम्मत से लगे रहे होंगे।
पुरुष कम संख्या में रहा, स्त्रियां ज्यादा रहीं, इसलिए कोई अड़चन नहीं थी। अरस्तू को या अरस्तू के जमाने के लोगों को, कि सौ-पचास स्त्रियों को इकट्ठा कर लेते और दांत गिन लेते, देर कितनी लगनी थी! खुद अरस्तू की दो औरतें थीं, कभी भी कह देता कि जरा बैठ जाओ लल्लू की मां, मुन्नू की मां, जरा तुम्हारे दांत गिन लें! और कम से कम उतनी देर तो घर में शांति रहती जब तक दांत गिनता, कम से कम उतनी देर तो स्त्रियां चुप रहतीं। मगर नहीं गिने उसने दांत। उसने भी अपनी किताबों में लिखा है। इतना बड़ा विचारक और किताबों में लिख गया कि स्त्रियों के दांत पुरुषों से कम होते हैं। दो-दो पत्नियां होकर इतनी अकल न आई कि जरा गिनती कर लें।
प्रयोग पर भरोसा ही नहीं रहा हमारा, अनुभव पर हमारा भरोसा ही नहीं रहा। हम तो मान लेते हैं चलती हुई बात, कुछ भी चल रही है बात, बस मान लेते हैं। और लोग मान रहे हैं तो ठीक ही मान रहे होंगे, किसी ने गिना ही होगा। और ऐसे ही सब सोच रहे हैं कि किसी न किसी ने गिना ही होगा। ऐसे ही चिंदी से सांप बन जाते हैं, कोई देखता ही नहीं कि सांप है कहां! कभी-कभी तो चिंदी भी नहीं होती, चिंदी भी हो तो भी ठीक है।
मनुष्य सदियों से विश्वासों से जी रहा है। और जीवन की छोटी-छोटी चीजों के संबंध में ही विश्वास कर लिए हैं, ऐसा नहीं; जीवन के परम सत्य के संबंध में भी बस विश्वास कर लिया है। तो अनुभव कौन करेगा? ईश्वर को मान लिया। यह एक विश्वास हुआ। यह आस्तिक का विश्वास है। और जब मान लिया तो अब खोजना क्या है! अब तो बात खतम हो गई, यात्रा पूरी हो गई, मंजिल आ गई। अब तो बैठ कर घंटी बजाते रहो, पूजा कर दो थोड़ी-बहुत, कभी सिर झुका लो, कभी प्रसाद चढ़ा दो, बांट दो मुहल्ले में। बस अब कुछ खास करने को बचा नहीं। ईश्वर है! और कुछ है जिन्होंने मान लिया कि ईश्वर नहीं है। न उन्होंने खोजा, न उन्होंने ध्यान किया, न साधना की, न अंतर के जगत में प्रवेश किया। उन्होंने इन्हीं आस्तिकों को देख कर, इनकी धारणाओं को देख कर इनकी धारणाओं को खंडन कर दिया और मान लिया कि ईश्वर नहीं है! जैसे इन आस्तिकों की धारणाओं के ऊपर ईश्वर का होना या न होना निर्भर है। जितने नास्तिक हुए पृथ्वी पर, उन सबका कुल काम इतना रहा कि आस्तिक जो कहते हैं वह गलत है। और आस्तिक जो कहते हैं उसको गलत सिद्ध किया जा सकता है, क्योंकि आस्तिक ने भी बेचारे ने माना हुआ है, जाना तो नहीं है। जानने वाले तो बहुत थोड़े से लोग हुए हैं। और जानने वाले लोगों ने आस्तिकता और नास्तिकता के उलझाव में अपने को नहीं उलझाया। खोज में लगे, अन्वेषण में लगे।
और अन्वेषण का पहला सूत्र है: निष्पक्ष होना। पहले से ही अगर निष्कर्ष ले लिया तो अन्वेषण कैसे हो पाएगा? निष्पक्ष। अज्ञेयवाद का यही अर्थ है: न मेरा यह पक्ष है न वह पक्ष। मुझे पता नहीं है कि सत्य क्या है। मैं खोजने को तत्पर हूं। मैं जानने को राजी हूं।
अज्ञेयवाद का बड़ा माधुर्य है। उसका अर्थ है कि मैं अज्ञानी हूं। और सत्य अज्ञेय है। मगर मैं उत्सुक हूं, आतुर हूं, जिज्ञासु हूं, मुमुक्षु हूं। जानने के लिए सब कुछ दांव पर लगाने को तत्पर हूं। लेकिन जानूंगा तो मानूंगा। बिना जाने नहीं मानूंगा। और मजे की बात यह है कि जब जान लिया तो मानने का सवाल ही नहीं उठता। मानना दोनों हालत में व्यर्थ होता है। जब तक नहीं जाना, मानना गलत है, झूठ है। और जब जान ही लिया तो मानना क्या! जब जान ही लिया तो अब मानने जैसी बात ही न रही। अब मानने न मानने का सवाल कहां!
इसलिए बुद्ध से लोग पूछते हैं: क्या आप ईश्वर को मानते हैं? वे मुस्कुरा कर चुप रह जाते हैं। जानने वाला नहीं हां भरेगा कि मैं मानता हूं, क्योंकि मानना तो न जानने वालों का धंधा है। इसलिए बुद्ध मुस्कुरा कर चुप रह जाते हैं। बुद्ध से लोग पूछते हैं: ईश्वर है? तो वे कुछ नहीं कहते। बुद्ध से लोग पूछते हैं: ईश्वर नहीं है? तो वे कुछ नहीं कहते। और लोग ऐसे मूढ़ हैं कि कुछ मान लेते हैं कि बुद्ध के चुप रहने का अर्थ है: मौनं सम्मति लक्षणम्! हमने पूछा कि ईश्वर है, वे चुप रहे, इसका मतलब है कि है। अब जो मानने को ही बैठे हैं, वे इसमें से यह अर्थ निकाल लेंगे। इसलिए बुद्ध के मर जाने के बाद हजारों अर्थ हो गए बुद्ध के मौन के भी!
यह जगत बड़ा अजीब है; यहां बोलो तो मुश्किल, यहां न बोलो तो मुश्किल है। यहां बोलो तो तुम्हारी गलत व्याख्या होने वाली है और न बोलो तो तुम्हारी गलत व्याख्या होने वाली है। बुद्ध ने कुछ भी नहीं कहा और कितने अर्थ निकले! बुद्ध के मरने के बाद छत्तीस संप्रदाय हो गए बौद्धों के। मूढ़ संप्रदाय बनाने में इतने उत्सुक होते हैं! कुछ ने कहा कि ईश्वर है, इसलिए बुद्ध चुप रहे, क्योंकि उस अनिर्वचनीय को कहा नहीं जा सकता। वह अवर्णनीय है, अव्याख्य है, इसलिए चुप रहे। कुछ ने कहा कि चुप रहे, साफ है कि तुम्हारे दिल को चोट नहीं पहुंचाना चाहते थे, ईश्वर है नहीं। लेकिन क्यों तुम्हें दुख देना! अहिंसक थे। नहीं किसी की धारणा को दुख देना। क्यों किसी के सांत्वना के आधार छीनना! लोगों को तिनके के सहारे हैं, उनके क्यों तिनके छीनना! वैसे ही तो डूब रहे हैं, तिनका भी छूट जाएगा तो और मुश्किल होगी। चलो पकड़े रहो अपने विश्वासों को। बुद्ध ने दया के कारण कहा नहीं कि ईश्वर नहीं है, हालांकि उन्हें पता है कि ईश्वर नहीं है। नहीं तो वे जरूर कहते। वे कह नहीं सकते थे--अव्याख्य है, अनिर्वचनीय है; है, लेकिन उसके संबंध में कुछ कहा नहीं जा सकता। जैसा उपनिषद के ऋषियों ने कहा, वे भी कह देते।
तो कुछ ने कहा कि ईश्वर नहीं है, यह उनके मौन से सिद्ध होता है। और चर्चा चलती रही, सदियां बीत गईं, कोई निर्णय नहीं हो सकता है। लेकिन बुद्ध इसलिए चुप हैं कि हां और न में बांटना द्वंद्व को खड़ा करना है। और जहां द्वंद्व खड़ा हुआ वहां मन पुनरुज्जीवित हो जाता है। बुद्ध के चुप होने का राज यह है कि बुद्ध कह रहे हैं: मन के पार जाओ। बस मन के पार जाओ तो तुम भी जान लोगे, जो है। फिर तुम्हारी जो मर्जी, उसे नाम ईश्वर देना हो तो दे देना, मोक्ष देना हो तो दे देना, निर्वाण देना हो तो दे देना, कोई नाम न देना हो तो मत देना, क्योंकि वैसे उसका कोई नाम नहीं है।
अज्ञेयवाद की मौलिक आधारशिला है कि जब तक मैं नहीं जानता हूं, तब तक कुछ भी मानूंगा नहीं और जब जान लिया है लोगों ने, तब तो मानने का सवाल ही नहीं उठा। तब तो जान लिया, फिर जीया।
एच.जी.वेल्स ने बुद्ध के संबंध में बहुत महत्वपूर्ण बात लिखी है। लिखा है कि इस पृथ्वी पर बुद्ध से ज्यादा ईश्वर-रहित और ईश्वर-जैसा व्यक्ति दूसरा नहीं हुआ। ईश्वर-रहित इस अर्थों में कि वह आस्तिक नहीं है और ईश्वर-जैसा, क्योंकि मान्यता नहीं है उनकी ईश्वर की, लेकिन उनका जीवन तो ईश्वरीय है, भागवत है। इसलिए तो हमने बुद्ध को भगवान कहा, यद्यपि भगवान के संबंध में उन्होंने कोई वक्तव्य नहीं दिया। हां और न की कोई बात नहीं की। फिर भी हमने भगवान कहा। क्योंकि भगवत्ता जैसी उनमें खिली, जैसा कमल उनका खिला चैतन्य का, कब खिलता है, कहां खिलता है! बहुत विरल है घटना।
अज्ञेयवाद एक बहुमूल्य विधि है। अगर तुम्हें सच में ही सत्य की तलाश करनी है तो अज्ञेयवाद तुम्हारी भूमिका होनी चाहिए। मेरे संन्यासी की भूमिका अज्ञेयवादी होनी चाहिए--न आस्तिक की न नास्तिक की। एक दिन तुम जरूर जान पाओगे कि सत्य क्या है। और जब जानोगे तब तुम भी मुस्कुराओगे, तब तुम भी हंसोगे कि बातें सब व्यर्थ थीं--आस्तिक की भी व्यर्थ थीं, नास्तिक की भी व्यर्थ थीं। उसके संबंध में न तो हां कहना उचित है, न न कहना उचित है। उसे बांटना ही उचित नहीं है। वह अविभाज्य है।
वह जो परम सत्य है, वह जो परम अनुभव है, उसके संबंध में मन कुछ भी निर्णय नहीं ले सकता; वह मन के पार है। मन के ऊपर जो उठ जाता है वही उसे जान पाता है।

दूसरा प्रश्न: भगवान,
कई महात्मागण, साधु और मुनि आपकी बातें चुरा कर इस भांति बोलते हैं कि जैसे उन्हीं की हों। क्या इन्हें समय रहते रोकना आवश्यक नहीं है?

सहजानंद,
महात्मागण, साधु और मुनिगण सदा से यही कार्य करते रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। अपना अनुभव न हो तो बेचारे कहीं से तो चुराएंगे! फिर उपनिषदों से चुराएं, कि गीता से चुराएं, कि कुरान से चुराएं, कि समयसार से चुराएं, इससे क्या फर्क पड़ता है! जिनके पास अपना नहीं है और जिन्हें इस अहंकार का पोषण करना है कि हम जानते हैं, वे कहीं से तो चुराएंगे ही। और अगर मुझसे भी चुराने लगे तो यह समादर की बात है, इसमें कुछ परेशान होने की बात नहीं है। वे मेरी गिनती भी उपनिषद, कुरान और बाइबिल के साथ करने लगे! हालांकि उपनिषद और कुरान और बाइबिल से जब वे चुराते हैं तो उन्हें कोई डर नहीं होता कहने में कि वे कुरान का उल्लेख कर रहे हैं या बाइबिल का। मेरी बात जब चुराते हैं तो कहने में उन्हें डर लगता है। मेरी किताबें पढ़ते हैं। शायद ही ऐसा कोई महात्मा इस देश में हो, जो किताब न पढ़ता हो; लेकिन चोरी से पढ़ते हैं, छिपा कर पढ़ते हैं। कोई गीता में छिपा कर पढ़ता है, कोई बाइबिल में छिपा कर पढ़ता है, क्योंकि कोई देख न ले कि मेरी किताब पढ़ रहे हैं! डर है। मेरे नाम के साथ जुड़ने में घबराहट है। इसलिए बेचारे नाम लेना भी चाहते हों तो भी ले नहीं सकते, उतनी हिम्मत भी नहीं है। उतनी ही हिम्मत होती तो भगोड़े बनते? उतना ही साहस होता तो पलायनवादी होते?
तुम जिनको महात्मा कहते हो, मुनि कहते हो, साधु कहते हो, वे वस्तुतः हैं क्या? आध्यात्मिक रूप से कायर लोग हैं, जो जीवन के संघर्ष में खड़े नहीं रह सके; जीवन के संघर्ष में जिन्होंने सब जगह मात खाई, हार खाई। तो कहने लगे कि अंगूर खट्टे हैं, कि संसार में कुछ भी नहीं है, संसार छोड़ कर भाग गए। अगर संसार में कुछ भी नहीं है तो इतनी भागदौड़ भी किसलिए! जहां कुछ है नहीं वहां से भागना क्या! और अंगूर खट्टे हों तो रहने दो; जिनको खट्टे अंगूर अच्छे लगते हैं, उनको चखने दो। छोटे बच्चों को तो कम से कम अच्छे लगते ही हैं। तुम क्यों अंगूरों को इतनी गालियां देने में लगे हो? तुम्हारी गालियां बताती हैं कि अंगूरों में तुम्हें रस है; रस अभी गया नहीं, गालियों में प्रकट हो रहा है। वह जो असफलता है, उसका कांटा अभी भी चुभा हुआ है।
यहां हारे हुए लोग जिंदगी से भाग जाते हैं। जिंदगी संघर्ष है और वहां टिकना सामर्थ्य की बात है। भागने में कौन सी सामर्थ्य की जरूरत है? जीवन में टिकना हो तो थोड़ी बुद्धि भी चाहिए; भागने में कौन सी सामर्थ्य की जरूरत है? पूंछ दबा लेने में कोई बहुत बड़ी प्रतिभा तो नहीं चाहिए होती।
ये प्रतिभाहीन लोग हैं। इनके पास अपना तो कुछ है नहीं। अपना कुछ हो भी नहीं सकता। क्योंकि जो ये कर रहे हैं, उससे अनुभव को पाने की तरफ कोई रास्ता जाता ही नहीं। कोई भूखा मर रहा है, उपवासा बैठा हुआ है; जैसे कि भूखे मरने से कोई सत्य का अनुभव होता है! भूखे मरने से, उपवास करने से क्या सत्य का अनुभव होता है? अगर ऐसा होता होता तो हमारे जैसे देश में तो सत्य के जानने वाले बहुत होते--जहां भुखमरी इतनी है; जहां कि परमात्मा सभी को उपवास करवा रहा है; कम से कम एकासन तो करवा ही रहा है! जहां सभी जरूरत से कम भोजन पा रहे हैं; जहां चार में से तीन आदमी भूखे हैं। शायद इसीलिए लोग कहते हैं कि पुण्य-भूमि है, यहां पैदा होने को देवता तरसते हैं। मगर देवता भूखे वगैरह नहीं मरते। छप्पन प्रकार के भोजन देवताओं के जगत में चलते हैं! कल्पवृक्ष के नीचे बैठे हैं और बस जो आकांक्षा की, वह हाजिर हुआ। जो मांगा उसी वक्त प्रकट हुआ। देवताओं की किसी कहानी में यह नहीं आता कि वहां अकाल पड़ गया कभी, कि बरसा कम हुई, कि संख्या ज्यादा बढ़ गई, कि लोग भूखे मर रहे हैं, कि सहायता की जरूरत है--और तरसते हैं यहां पैदा होने को! तो शायद इसीलिए तरसते होंगे कि वहां तो उपवास की कोई सुविधा है नहीं, यहां उपवास करना ही पड़ेगा। और उपवास करने से पुण्य होता है!
जब तुम भूखे मरते हो, उपवास करते हो, तो क्या होता है तुम्हारे भीतर? तुम अपना ही मांसाहार कर रहे हो, और कुछ भी नहीं।
उपवास अधार्मिक कृत्य है। वह स्वयं का मांसाहार है। नरभक्षी हो तुम, और कुछ भी नहीं। इसीलिए तो उपवास करोगे, तो पहले दिन दो पौंड वजन नदारद हो जाएगा, दूसरे दिन डेढ़ पौंड, फिर एक पौंड, फिर धीरे-धीरे नदारद होने लगेगा। यह वजन कहां जा रहा है? इस पर कभी तुमने सोचा कि जब एक दिन उपवास करते हो तो दो पौंड वजन एकदम कहां चला जाता है? पचा गए, अपना ही मांस पचा गए!
और बड़ा मजा यह है कि शाकाहारी उपवास करने में बड़ा रस लेते हैं। जैन मुनि को तो उपवास करना ही नहीं चाहिए, क्योंकि वह मांसाहार है। लेकिन उपवास की बड़ी महिमा हम गाते हैं। इस उपवास से कुछ अध्यात्म का संबंध नहीं है। लेकिन इसको इतना समादर क्यों मिल गया? जो भी प्रकृति के उलटे कामों में लग जाता है, उसी को हम समादर देते हैं। क्योंकि लगता है हम नहीं कर सकते और यह कर रहा है। कोई भी आदमी उलटे-सीधे काम करने लगे तो हमें समादर पैदा होता है; लगता है कि भई कुछ खूबी की बात कर रहा है। कोई उपवास कर रहा है, कोई सिर के बल खड़ा है, कोई शरीर को तोड़ रहा है, मरोड़ रहा है--उलटे-सीधे कामों में लोग लगे हुए हैं। और आशा रखते हैं कि इससे सत्य का अनुभव हो जाएगा। सत्य के अनुभव का इस तरह की व्यर्थ बातों से कोई संबंध नहीं है। और फिर इनके पास लोग पूछने जाते हैं कि महात्मा जी, उपदेश दो! उपदेश क्या खाक दें! तो कहीं न कहीं से चुराएंगे।
तुम कहते हो: कई महात्मागण, साधु और मुनिगण आपकी बातें चुरा कर इस भांति बोलते हैं जैसे उन्हीं की हों।
कोई हर्जा नहीं बोलने भी दो! चलो इस भांति प्रचार ही होता है। बातें तो पहुंचती हैं लोगों तक। किसकी हैं, इससे क्या लेना-देना है? बातें पहुंच जाएं, यही बात असली बात है। और फिर बातें किसकी हैं? मैं जो कह रहा हूं, क्या उन पर मेरा कुछ ठेका है? वही तो सदा जानने वालों ने कहा है। वही तो आने वाले जानने वाले भी कहेंगे। उन पर कोई व्यक्तिगत दावा थोड़े ही हो सकता है। बातें सत्य हों तो व्यक्तिगत नहीं होतीं, झूठ हों तो ही व्यक्तिगत होती हैं। झूठ व्यक्तिगत होता है, सत्य सार्वलौकिक होता है। तो जितना तुम्हारा है, समझना झूठ; और जितना सार्वलौकिक है, समझना सत्य। तो सत्य पर क्या दावा?
अगर मेरी कोई बात सत्य है तो मेरी नहीं है, मजे से उन्हें दोहराने दो, क्या हर्जा है? समझो लाउडस्पीकर के चोंगे हुए, कोई हर्जा तो नहीं है। चोंगा जी महाराज! ऐसे बेचारे मेहनत करके पढ़ते हैं, छिपा-छिपा कर, कोई देख न ले! उनका श्रम तो देखो, उनकी तपश्चर्या तो देखो। फिर नाम को बचाते हैं, फिर शब्दों को भी हेर-फेर करना पड़ता है, क्योंकि नहीं तो लोग पकड़ लेते हैं। लोग खड़े होकर कहने लगते हैं कि यह तो आप कहां से कह रहे हैं! मेरे पास खबरें आई हैं कि लोग खड़े हो जाते हैं कि यह बात तो आप उधार कह रहे हैं। तो शब्द भी बदलने पड़ते हैं और भाषा भी थोड़ी हेर-फेर करनी पड़ती है। उनकी मेहनत तो देखो। उनके श्रम का तो सत्कार करो।
और फिर बात अगर काम की है तो पहुंच जानी चाहिए लोगों तक। और इससे क्या फर्क पड़ता है कि वे इस तरह बोलते हैं जैसे उन्हीं की हों? क्या हर्जा है? तुम्हें क्यों पीड़ा होती है सहजानंद? बोलने दो। चलो उन्हीं की सही। इससे क्या बनता-बिगड़ता है?
और तुम कहते हो: क्या इन्हें समय रहते रोकना आवश्यक नहीं है?
नहीं, बिलकुल आवश्यक नहीं है। और रोका भी नहीं जा सकता। रोकने का कोई उपाय भी नहीं है। कैसे रोकोगे?
एक कवि-सम्मेलन हो रहा था।

संयोजक जी ने ठहाका लगाते हुए कहा--
अभी आप सुन रहे थे मोर बनारसी को,
अब सुनिए चोर इटारसी को।
चोर कवि मंच पर आया और उन्होंने सुनाया--
मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...
पब्लिक में से आवाज आई--
कविता बंद करो भाई, यह तो सूरदास की है।
कवि बोलो--आप ठीक कह रहे हैं,
सूरदास तो देख नहीं पाते थे,
हमारे परदादा के परदादा
उनकी कविताएं डायरी में चढ़ाते थे
उनकी रचनाएं सुनाने का मुझे पुश्तैनी हक है।
जनता बोली--इसमें क्या शक है?
कवि ने कहा--कई महाकवि तो दूसरों की
पूरी की पूरी रचना पेल देते हैं
और आप लोग झेल लेते हैं।
हम तो अपना उपनाम सार्थक कर रहे हैं
चोरी की नहीं सुनाएंगे,
तो चोर इटारसी कैसे कहलाएंगे?
उनकी हर रात गुजरती है दीवाली की तरह
हमने एक बल्ब चुराया तो बुरा मान गए।
श्रोता बोले--और सुनाइए।
चोर जी ने गीत प्रारंभ किया,
पंडित जी मेरे मरने के बाद
इतना फर्ज निभा देना...
आवाज आई--यह तो धर्मा खलिक का है।
कवि बोला--उन्होंने भी दिल्ली के
एक पंजाबी कवि का चुराया है
वो अलग बात है कि गीत
उनके नाम से फिल्म में आया है।
चोर के घर चोरी करने में
अपन बिलकुल नहीं शर्माता है
जो माल जैसे आता है, वैसे ही जाता है
और रही हमारी बात
हम तो जनरल स्टोर वाले हैं,
सब सामान दूकान में सजाते हैं
खुद थोड़े ही बनाते हैं।
कोई, किसी कंपनी का लाते हैं
कोई, किसी कंपनी का लाते हैं
वो अलग बात है कि
लेबिल अपने नाम का लगाते हैं।
जब हम निर्भय होकर सुना रहे हैं
तो आप क्यों घबरा रहे हैं?
चोरी का माल खरीद सकते हैं,
चोरी की कविता नहीं सुन सकते!
भाइयो! हिंदुस्तान बहुत बड़ा है
जिसकी कविता है, वह कहां-कहां गाएगा!
किस-किस शहर में जाएगा
आदमी है हवाई जहाज तो नहीं हो जाएगा
हम तो उनकी रचनाएं
आप तक पहुंचाने का कष्ट उठा रहे हैं
संन्यासी होकर भी आपकी खुशी के लिए
दो हजार ले कर जा रहे हैं
कैसा बुरा जमाना आ गया है कि एक
ईमानदार डिस्ट्रीब्यूटर को
आप चोर बता रहे हैं!
कोई फिक्र न करो, सहजानंद। महात्मागण, साधुगण, मुनिगण, अच्छे काम में लगे हैं, वितरण कर रहे हैं। करने दो। और धोखा चलेगा नहीं। लोग भी सजग होते जा रहे हैं। मेरी बातें कुछ ऐसी हैं, कुछ उलटी हैं कि कोई लाख छिपाए, छिपा नहीं सकता; पकड़ में आ ही जाएंगे। और उनकी जीवन-व्यवस्था से उनका तालमेल भी नहीं हो सकता। इसलिए कोई भी तत्क्षण पहचान जाएगा कि यह बात इनकी नहीं है।
अब समझो कि मैंने कहा कि उपवास मांसाहार है। कहे कोई साधु-महात्मा! चुराए कोई साधु-महात्मा! उनके भक्त ही उनकी पिटाई कर देंगे। नहीं चुरा सकते। असंभव है। जैसे मैंने कहा कि दुग्धाहार तो मांसाहार जैसा ही है, रक्त पीने जैसा है। चुराए कोई महात्मा! जैसे मैंने कहा ईश्वर पर विश्वास करना बेईमानी है, यह तो अधार्मिक कृत्य है। चुराए कोई महात्मा! फौरन पकड़ा जाएगा।
मैं जो कह रहा हूं वह इतना भिन्न है कि उससे कोई तालमेल उनका बैठेगा नहीं; उनकी सारी जीवन-चर्या और मेरे वक्तव्य में विरोध आ जाएगा। अगर मेरी बात के अनुसार चलना है, अगर मेरी बात को कहना है, तो धीरे-धीरे उन्हें मेरे ही संन्यासी हो जाना पड़ेगा। और आहिस्ता-आहिस्ता अंगुली पकड़ता हूं, फिर पहुंचा पकड़ता हूं, फिर धीरे-धीरे भागना मुश्किल हो जाता है।
मेरी बात जब कोई सुना रहा है तो उसे जंची तो है, उसे कहीं भीतर अंतरतम में चुभी तो है, लगी तो है, तभी तो सुना रहा है। उसे समझ में तो आई है, भला उसके न्यस्त स्वार्थ ऐसे हैं आज कि स्पष्ट घोषणा नहीं कर सकता।
मेरे पास न मालूम कितने साधुओं के पत्र आते हैं कि हम सब छोड़-छाड़ कर आपके संन्यास में सम्मिलित होना चाहते हैं, लेकिन फिर हमारी व्यवस्था क्या होगी? आपके आश्रम में हमारे रहने की व्यवस्था होनी चाहिए। अभी तो हम सब तरह से पूज्य हैं, लोग हमारी सब व्यवस्था करते हैं, सुरक्षा करते हैं। पुराने ढब का संन्यास छोड़ कर हम मुश्किल में पड़ जाएंगे।
और मेरे आश्रम में सृजनात्मक अगर नहीं है कोई तो उसके लिए कोई जगह नहीं है। और तुम्हारे तथाकथित महात्मा और मुनिगण, उनमें क्या सृजन है? उनको मैं कहता हूं कि जरूर यहां जगह बन सकती है, मगर यहां कुछ करना होगा। यहां बैठ कर सेवा नहीं ली जा सकती। कुछ संन्यासी कपड़े बनाते हैं, कुछ संन्यासी फर्नीचर बनाते हैं, कुछ संन्यासी जूते बनाते हैं, कुछ संन्यासी कुछ और बनाते हैं। आप क्या कर सकते हैं?
वे बेचारे कहते हैं, हम कर तो कुछ भी नहीं सकते, क्योंकि हम तो तीस साल से संन्यासी हैं, चालीस साल से संन्यासी हैं, हमने कुछ किया ही नहीं। हम तो एक ही काम जानते हैं--सेवा लेना।
तो उनको लेकर मैं यहां क्या करूंगा?
वे कहते हैं, हम तो बैठेंगे, ध्यान करेंगे, भजन-कीर्तन करेंगे।
सिर्फ बैठने और भजन-कीर्तन से कुछ भी नहीं होगा। यहां तो जीवन जीना पड़ेगा।
जैन मुनियों के पत्र आते हैं, खबरें आती हैं कि हम आ सकते हैं सब छोड़ कर। और थोड़े-बहुत नहीं, बड़ी संख्या में आ सकते हैं छोड़कर। क्योंकि ऊब गए हैं, परेशान हैं। लेकिन फिर हम जाएं कहां? क्योंकि हम कुछ कर तो सकते नहीं। और आज जो हमारे पैर छू रहे हैं, यही श्रावक अगर हमने यह पुराने ढंग का मुनित्व छोड़ा तो हमें चपरासी की भी नौकरी देने को राजी नहीं होंगे।
और यही मजा है। तुम जरा खयाल करना कि जिस महात्मा के तुम चरण दबाते हो, अगर वह कल महात्मापन छोड़ कर और तुम्हारे घर आ जाए और कहे कि चपरासी की जगह दे दो या बर्तन मलने की जगह दे दो, तो तुम कहोगे कि नहीं भाई, आगे देखो। तुम हजार बातें पूछोगे कि तुम्हारी पात्रता क्या है, योग्यता क्या है, प्रमाणपत्र लाओ। किस-किस के यहां पहले काम किया है? वहां से निकाले क्यों गए? कहां तक शिक्षा है?
और वह कहे कि हमें गीता कंठस्थ है, तो तुम कहोगे, गीता का हम क्या करेंगे? बर्तन मलोगे कि गीता कंठस्थ से उसका क्या संबंध है? वह कहे कि हम भजन-कीर्तन करना जानते हैं। तुम कहोगे, ठीक है, मगर तुम्हें चपरासी का काम करना है कि भजन-कीर्तन करोगे? कौन काम देगा तुम्हारे तथाकथित महात्माओं को, मुनियों को? क्या है उनकी सामर्थ्य और योग्यता, पात्रता? अपाहिज हो गए हैं। सब अंग रहते हुए अपाहिज हैं। आंखें होते हुए अंधे हैं। हाथ होते हुए, पैर होते हुए लंगड़े-लूले हैं। यह लंगड़े-लूलों की जमात है। इसलिए बेचारे छोड़ भी नहीं सकते, अब तुम पर निर्भर हो गए हैं। तुम जैसा कहो वैसा गुजारते हैं। तुम्हारे गुलाम हैं। और बड़ा मजे का खेल चल रहा है: जो तुम्हारे गुलाम हैं, उनसे तुम सदुपदेश ग्रहण कर रहे हो।
जरा सोचो तो! सदगुरु तुम्हारा गुलाम होगा? सदगुरु किसी का गुलाम नहीं होता। न सदगुरु किसी को गुलाम बनाता है न किसी का गुलाम होता है। सदगुरु अपना मालिक होता है और दूसरों को भी अपने मालिक होने की शिक्षा देता है। मगर ये तुम्हारे गुरु, इनकी हैसियत क्या है? इनकी गुणवत्ता क्या है? सृजन-शून्य। अपाहिज, अपंग, लूले-लंगड़े हैं सब भांति। मगर तुम पूजा-पाठ में लगे हो इनकी, क्योंकि एक परंपरा है लकीर की। लकीर को पीटे चले जा रहे हो।
सहजानंद, कहने दो बेचारों को, कोई रोकने की आवश्यकता नहीं है। पीड़ा होती है। तुम्हारा ही सवाल नहीं है यह, और भी संन्यासियों ने कई दफा आकर कहा है। जगह-जगह से संन्यासी आ कर कहते हैं कि इस पर कुछ किया जाना चाहिए। करने की कोई जरूरत भी नहीं है। मेरा कोई आग्रह भी नहीं है, कि मेरी कोई सील है विचारों पर। बोल दिए, हवा के हो गए। अब जिसकी मर्जी हो, ले जाए। एक दफा बोल दिए, फिर विचारों पर तुम्हारी कोई मालकियत नहीं रज जाती। रह भी नहीं जानी चाहिए। बोलते ही इसलिए हैं कि सबके हो जाएं, बंट जाएं।
मैं अपना आनंद बांट रहा हूं, मैं अपना बोध बांट रहा हूं। जिससे जैसा बन सके, जो जैसा ले सके, ले ले। नासमझ हैं बेचारे। बजाय इसके कि मेरे शब्दों को समझ कर अपने जीवन को बदले, वे केवल उन शब्दों का उपयोग तुम्हें समझाने के लिए कर रहे हैं। वे खुद भी नहीं समझ सके हैं, खुद भी पूरा नहीं समझ सकते; क्योंकि जब तक जीएंगे नहीं, मेरी बात समझ में आ सकती नहीं। यह तो पूरी बात ही जीवंत धर्म की बात है, नगद धर्म की बात है। मगर उनको यह लगता है कि मेरी बातों से इतने लोग प्रभावित होते हैं तो शायद इन बातों को दोहराने से कुछ लोग प्रभावित हो जाएंगे। अच्छा ही है, कुछ लोग अगर उनसे भी मेरी बातें सुन कर प्रभावित हो जाएं, तो उन्होंने कुछ लोगों का मुख मेरी तरफ अनजाने मोड़ दिया। वे आज नहीं कल मुझे खोजते हुए चले आएंगे। उन्हें गंध भर मिल जाए, फिर उन्हें आना ही पड़ेगा, और कोई उपाय न रह जाएगा। इसलिए वे अनजाने, परोक्ष रूप से मेरे ही कार्य में लगे हैं।
तुम्हें ऐसे महात्मा, मुनि, साधुगण मिलें, उन्हें धन्यवाद देना, नाराज होने की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं है।

तीसरा प्रश्न: भगवान,
प्रायः सभी तथाकथित धर्मों में, खासकर ईसाइयत में, प्रायश्चित्त को बड़ा धार्मिक गुण माना जाता है! किंतु कल आपने बताया कि प्रायश्चित्त क्रोध का ही शीर्षासन करता हुआ रूप है। कृपा करके इस संदर्भ में आगे कुछ और कहें!

शैलेंद्र,
प्रायश्चित्त का मनोविज्ञान समझने जैसा है। प्रत्येक व्यक्ति ने कभी न कभी प्रायश्चित्त किया है, पश्चात्ताप किया है--वह ईसाई हो या न हो, कैथोलिक हो या न हो। किसी और के सामने पश्चात्ताप किया हो या न किया हो, अपने ही सामने किया है। प्रत्येक व्यक्ति ने। और एक बार नहीं, अनेकों बार किया है।
क्रोधित हुए तुम और फिर घड़ी भर बाद पीड़ा होती है कि यह मैंने क्या किया, फिर वही अज्ञान, फिर वही मूढ़ता, फिर वही मूर्च्छा मुझे पकड़ ली! और मैंने तय किया था कि अब क्रोध नहीं करूंगा। अभी दो दिन पहले ही तो तय किया था कि अब क्रोध नहीं करूंगा और यह फिर हो गया! ग्लानि होती है। लेकिन अगर ठीक से समझो, इसका अगर ठीक विश्लेषण करो, तो यह ग्लानि इसलिए हो रही है कि तुम्हारे अहंकार की प्रतिमा खंडित हो गई। तुमने दो दिन पहले अपने अहंकार को खूब सजाया था कि अब क्रोध नहीं करूंगा। निर्णय लेता हूं कि अब क्रोध नहीं करूंगा। अब क्रोध से मेरा छुटकारा हो गया। तुम्हारा अहंकार बहुत आनंदित हुआ था कि मैं अक्रोधी हो गया हूं। और वह दो दिन में ही अहंकार की प्रतिमा खंड-खंड हो गई, फिर क्रोध हो गया। अब तुम्हारा अहंकार पीड़ित हो रहा है। यह कोई आत्मा की पीड़ा नहीं है, हालांकि तुम कहोगे यही कि मेरी आत्मा की पीड़ा हो रही है, कि मुझे बड़ी अंतर-ग्लानि हो रही है। ये सब अच्छे-अच्छे शब्द हैं, जिनमें एक सचाई को छिपाया जा रहा है। सिर्फ तुम्हारा अहंकार कष्ट पा रहा है। तुम्हारी प्रतिमा अपनी ही आंखों के सामने गिर गई। वह जो तुमने संकल्पवान हूं मैं और अब निर्णय लिया और महान निर्णय लिया और अब कभी क्रोध नहीं करूंगा--वे सब बातें हवा हो गईं, क्षण भर में हवा हो गईं। जरा सा किसी ने बटन दबा दिया कि बात खतम हो गई। दो शब्द किसी ने कह दिए कि बस भूल गए सब, आ गए असलियत में; गई सारी धार्मिकता, पवित्रता, महात्मापन, सब विदा हो गया। मरने-मारने पर उतारू हो गए।
जापान का एक सम्राट एक फकीर को मिलने गया। उस फकीर की बड़ी ख्याति आनी शुरू हुई थी कि वह बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया है। सम्राट जाकर फकीर के सामने झुका और फकीर से कहा कि आया हूं पूछने--क्या स्वर्ग है, क्या नरक है? ये प्रश्न मेरे मन में हमेशा उठते रहते हैं। कोई अब तक मुझे संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया।
उस फकीर ने सम्राट को नीचे से ऊपर तक देखा, जैसे कोई पुलिसवाला किसी चोर को देखता हो! सम्राट थोड़ा तिलमिलाया भी, थोड़ी देर सन्नाटा भी रहा। फकीर के शिष्य भी बैठे थे, वे भी थोड़े हैरान हुए कि बात क्या है। और फकीर देखे ही गया, जैसे आरपार देख रहा हो, जैसे एक्सरे की आंखें हों उसके पास। सम्राट, सुबह-सुबह थी अभी, सर्द हवा चल रही थी, मगर पसीना आ गया उसके माथे पर। और फकीर ने कहा कि शक्ल तो देखो अपनी, मक्खियां उड़ रही हैं! स्वर्ग-नर्क की पूछने आए हो, अकल नाममात्र को नहीं है! भोंदू कहीं के!
सम्राट को तो हल हो गई, पूछने आया है एक आध्यात्मिक सवाल और यह आदमी और इसको लोग कहते हैं यह बुद्धत्व को उपलब्ध हो रहा है! वह तो भूल ही भाल गया, उसने तो तलवार खींच ली। एकदम तलवार मारने को ही था, गर्दन उतार देने को, फकीर ने कहा, ठहर, यह नरक का द्वार खोल रहा है। यह रहा नर्क। एक चोट लगी, एक बात समझ में आई। एक क्षण ठहरा। तलवार वापस म्यान में रख ली। फकीर ने कहा, यह स्वर्ग का द्वार खुल गया। अपने घर जा, बात खतम हो गई। उत्तर मिल गया? तू जब क्रोध में है तो नरक में है। और जब तू अक्रोध में है तो स्वर्ग में है। और बाकी सब नरक और स्वर्ग काल्पनिक हैं। कोई भूगोल में नहीं हैं नरक और स्वर्ग; तुम्हारा मनोविज्ञान है।
तो तुम जब निर्णय लेते हो कि अब क्रोध नहीं करूंगा, अब कामवासना में नहीं उतरूंगा, अब किसी का अपमान नहीं करूंगा, अब कठोरता-क्रूरता का व्यवहार नहीं करूंगा--तब एक क्षण को स्वर्ग की ठंडी हवाएं तुम्हारे ऊपर बह जाती हैं। तुम्हारे अहंकार को बड़ी तृप्ति मालूम होती है, बड़ा अच्छा लगता है, बड़ा मीठा लगता है--स्वादिष्ट, कि तुम भी क्या अदभुत व्यक्ति हो! जहां सारी दुनिया सड़ रही है कामवासना में, क्रोध में, लोभ में, मोह में, वहां तुम अतिक्रमण कर गए। मगर कोई बटन दबा ही देगा। और यहां इतने लोग हैं, कोई न कोई बटन दबा देगा। और बटन दबाने वालों को शायद पता भी न हो कि किसने तुम्हारे बटन दबा दी, चाहे उन्होंने बटन दबाई जान कर भी न हो, तुम्हारी दब जाएगी। जो आदमी रोज तुम्हें नमस्कार करता था रास्ते पर, आज अपनी धुन में चला गया, तुम्हें नमस्कार करना भूल गया--बस, उसने कुछ किया नहीं, तुम्हारे भीतर आग जल गई कि अच्छा, यह बच्चू अपने को क्या समझता है! इसको ठिकाने लगा कर रहूंगा! तुम्हारे भीतर अंगारे धधकने लगे कि यह ऐरा-गैरा-नत्थू-खैरा आज बिना नमस्कार किए चला गया, मुझे बिना नमस्कार किए चला गया!
राजस्थानी मैंने कहानी सुनी है। राजस्थान के गांव में एक सरदार था। राजस्थानी सरदार! गांव में उसने आज्ञा कर रखी थी कि कोई आदमी मेरे घर के सामने से मूंछ पर ताव देकर नहीं निकल सकता, सिर्फ मैं ही मूंछ पर ताव दे सकता हूं। तो जो भी निकले मेरे घर के समाने से, मूंछ नीची कर ले। और वह था आदमी उपद्रवी, दुष्ट था। और लोग जानते थे कि झंझट कौन करे! तो लोग मूंछ नीचे करके निकलते थे। कुछ लोगों ने तो डर के मारे मूंछें ही कटा ली थीं; कभी भूल-चूक से, खयाल न रहे और निकल गए और यह दुष्ट ऐसा है कि फिर आव देखेगा न ताव, वहीं पिटाई करवा देगा।
गांव में एक नया-नया बनिया आया। जवान था। सुंदर मूछें थीं उसकी। बड?ा ताव देकर पगड़ी-वगड़ी बांध कर चलता था। लोगों ने कहा कि भैया, मूंछें कटा लो पहले! इस गांव में अगर रहना है, मूंछें कटा लो। सरदार बिलकुल पागल है। अगर उसने देख लीं तुम्हारी मूंछें, गर्दन उतर जाएगी--या तो मूंछें या गर्दन! जो तुम्हारा दिल हो।
बनिए ने कहा, देख लिए ऐसे सरदार! अभी वह भी जवानी में था और उसे कुछ पता भी नहीं था इस गांव का, कि मामला ऐसा बिगड़ जाएगा। जोश-खरोश में बात आ गई। उसने कहा कि आज ही जाता हूं। निकल गया सरदार के समाने से मूंछ पर ताव देता हुआ। सरदार ने कहा, ठहर बनिए के बच्चे! कहां जा रहा है? सरदार तो तलवार लेकर बाहर आ गया। बनिए ने भी सोचा कि यह झंझट बढ़ गई। इतना मैंने नहीं सोचा था कि मामला ऐसा होगा। मैं समझा गांव वाले यूं ही मजाक कर रहे हैं।
बनिए ने कहा, तो ठीक है। अब यही होना है तो हो जाए। तो मैं भी तलवार ले आऊं।
सरदार ने कहा, यह बात ठीक है। और बनिए ने कहा कि एक काम और कर आऊं, जरा थोड़ी देर लगेगी, आप घबड़ाना मत, भागूंगा नहीं। अपने पत्नी-बच्चों को सफा कर आऊं, क्योंकि पता नहीं हो सकता है मैं कट जाऊं, तो मेरे पत्नी-बच्चे क्यों दुखी हों! और मैं तो तुमसे भी कहूंगा कि तुम भी सफा कर आओ, क्योंकि पता नहीं तुम कट जाओ। अरे पत्नी-बच्चे क्यों भोगें?
सरदार तो सरदार, बात उसको भी जंची। आधा घंटे बाद बनिया आ गया मूंछें कटा कर। सरदार ने पूछा, तेरी मूंछें क्या हुईं? उसने कहा, मैंने सोचा क्या झंझट करनी! पत्नी-बच्चों को मारो, तुमको मारो, क्या फायदा, चार मूंछ के बाल काट दिए, झंझट खतम हो गई। छोड़ो भी जी! जयराम जी!
सरदार ने कहा, अरे! और मैं अपने पत्नी-बच्चे खतम ही कर आया।
वह तुम्हारी मर्जी!
लोग तो जरा सी बात से आगबबूला हो जाएं। जब तुमने तय किया हो अब नहीं करूंगा और फिर जरा सा कोई मामला बिगड़ जाएगा--और बिगड़ ही जाएगा। इतनी भीड़-भाड़ है इस दुनिया में, किसी का पैर पर पैर पड़ गया, किसी का धक्का लग गया।
मेरे एक मित्र ने मुझे एक कार भेंट दी, बहुत वर्ष पहले। एक साल बाद वे मुझे मिलने आए। उन्होंने कहा कि मैं एक बात देखने आया हूं, आप मुझे गाड़ी में बिठाएं और पूरे गांव का चक्कर लगवा दें। मैंने कहा, ठीक। मैंने उन्हें पूरे गांव का चक्कर लगवा दिया। बस उन्होंने कहा कि मैं निश्चिंत हुआ। आपने जो काम कोई नहीं कर सकता वह करके दिखा दिया। मैंने कहा, वह कौन सा काम है? आप क्या समझते हैं कि गाड़ी ड्राइव करना कोई भारी काम है?
उन्होंने कहा, नहीं, यह सवाल नहीं है। मेरी पत्नी मुझसे सदा कहती कि देखो, तुम गाड़ी क्या चलाते हो, गालियां बकते हो। और मेरा मानना यह है कि कोई आदमी ड्राइवर हो ही नहीं सकता बिना गाली बके, क्योंकि ऐसे-ऐसे दुष्ट सड़कों पर चल रहे हैं कि तुम भोंपू बजा रहे हो, वे हट ही नहीं रहे। अब गाली न बकोगे तो क्या करोगे? ऐसे-ऐसे ट्रक वाले कि तुम बजाए जाओ भोंपू पर भोंपू, वे हटने वाले नहीं। सरदार जी अपना ट्रक चला रहे हैं तो चला ही रहे हैं। वे सुनते ही नहीं। उन्होंने साफा भी ऐसा बांधा हुआ है कि कान वगैरह सब बंद! और भीतर-भीतर मंत्र पढ़ रहे हैं--वाह गुरु जी का खालसा, वाह गुरु जी की फतह! तो कहां सुनने वाले हैं! सत सिरी अकाल! फुरसत कहां है! तो गाली न दोगे तो क्या होगा? मैं यही देखने आया था कि आप ड्राइव करते हैं, गाली देना सीखे कि नहीं! आप नहीं सीखे, आपने गजब कर दिया!
इस भरी दुनिया में चारों तरफ हजारों लोगों की भीड़-भाड़ है, बचना बहुत मुश्किल है। किसी तरह बच-खच कर निकल भी आए इधर-उधर से, घर आओगे, पत्नी कुछ कह देगी, पति कुछ कह देगा--बस बात में से बात निकल जाती है। बातों में से ऐसी बातें निकलती हैं कि पीछे लौट कर सोचो तो यही समझ में नहीं आता कि यह किस बात में से इतना बतंगड़ हो गया! पीछे कोई पूछे भी तो संकोच होता है बताने में कि भई क्या बताना!
मुल्ला नसरुद्दीन और उनकी पत्नी लड़ रहे थे। कोई तीन घंटे से चल रही थी बकवास। मुहल्ले के लोग थक गए। आखिर कुछ लोग आए और उन्होंने कहा कि भई अब बंद भी करो, अब जो कुछ हो गया हो गया। क्या हम पूछ सकते हैं कि यह इतना झगड़ा किसलिए चल रहा है?
नसरुद्दीन ने कहा कि अब फजलू की मां से ही पूछ लो। फजलू की मां ने कहा कि नहीं, तुम्हीं बताओ। नसरुद्दीन ने कहा, तू ही बता दे। फजलू की मां ने कहा, क्या खाक बता दूं, तीन घंटे हो गए, मुझे क्या अब खयाल रहा कि किस बात से बात शुरू हुई थी! कोई नोट बुक लेकर बैठी हूं? बात में से बात निकलती गई, निकलती गई, अब कहां के कहां आ गए, अब उसका क्या!
यह जो पश्चात्ताप होता है, यह अहंकार को पुनर्स्थापित करना है। गिर गया अहंकार, फिर वही भूल कर दी जो नहीं करने का तय किया था। अब इस प्रतिमा को कैसे विराजमान करें? तो पश्चात्ताप कला है प्रतिमा को वापस विराजमान करने की, कि लो भई पश्चात्ताप किए लेते हैं, प्रायश्चित्त किए लेते हैं। हम दुखी हैं, बहुत दुखी हैं। मगर उस दुख में भी जाल अहंकार का है।
सभी धर्मों ने ये तरकीबें खोजीं। हिंदू धर्म में गंगा-स्नान कर आओ। यह ज्यादा सुविधापूर्ण तरकीब है। रोज-रोज क्या पश्चात्ताप करना, दो-चार साल में या बारह साल में जब कुंभ भरे, तो एक डुबकी मार आए। बारह साल का मामला खतम, फिर स्लेट खाली; अब दिल खोल कर फिर लिखो--जो लिखना हो, गाली-गलौज, जो-जो मरजी आए। श्री गणेशायः नमः फिर से करो! और डर क्या है, गंगा मैया कोई सूख तो जाने वाली नहीं, फिर चले जाना बारह साल में एक दहा और डुबकी मार आना। और जो होशियार हैं, वे तो कहते हैं, मन चंगा तो कठौती में गंगा! वे कहते हैं, अरे कहां जा रहे हो गंगा में, अरे कठौती में, यहीं दिल खोल कर रगड़ कर नहा लिया, मामला खतम हो गया। यहीं घर ही धो लो, कहां जाते हो! और वे जमाने गए जब लोग गंगा जाते थे, अब तो नल के पानी में गंगा आ रही है, घर-घर; बस नल की टोंटी के नीचे बैठ गए, सब साफ! फिर तुम वही करोगे।
कैथोलिक कहते हैं कि जाकर पादरी के सामने प्रायश्चित्त कर आओ। मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन कैथोलिक चर्च में चला गया। पादरी लोगों के प्रायश्चित्त सुन रहा था, वह भी कतार में खड़ा हो गया। अंदर चला गया। पादरी ने पूछा कि तुमने क्या पाप किया? पादरी ऐसा परदे की ओट में रहता है, ताकि प्रायश्चित्त करने वाले को लाज-लज्जा न आए, सच्चा-सच्चा कह दे।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, अब आपसे क्या बताऊं, रात बहुत पाप हो गया। छोटा भी नहीं हुआ, बहुत पाप हो गया। एक स्त्री से नहीं तीनत्तीन स्त्रियों से पाप किया कल रात। हे पिता, क्षमा करो!
पादरी ने कहा, तीनत्तीन स्त्रियों से! यह तो बात ठीक नहीं। तुम्हें इसका दंड भुगतना पड़ेगा। तुम कसम खाओ कि रोज सुबह उठ कर बाइबिल का पाठ करोगे।
नसरुद्दीन ने कहा कि अब आप बात ही छेड़ दिए तो मैं आपको बता दूं कि मैं कोई ईसाई नहीं हूं, न मैं कोई कैथोलिक हूं। तो पादरी ने कहा, फिर तुम यहां किसलिए आए पश्चात्ताप करने? नसरुद्दीन ने कहा, अरे भई किसी को तो कहना ही था। दिल में एकदम कहने की चल रही थी। बिना कहे मन नहीं मान रहा था। किसी और कहो, झंझट हो जाए; सो मैंने सोचा यह जगह अच्छी है। तुम परदे के पीछे, न तुम मुझे देख रहे, न मैं तुम्हें देख रहा हूं। हूं तो मैं मुसलमान। बाइबिल माइबिल मुझे पढ़नी नहीं। यह तो जो पाप किया है, वह बिना कहे नहीं रहा जाता।
मैंने सुना है एक और स्त्री के बाबत कि वह हर सप्ताह आती, हर रविवार और पाप का वर्णन करती। पादरी भी थक गया, क्योंकि वह वही पाप, एक पाप जो उसने कई साल पहले किया था, एक सप्ताह, दो सप्ताह, साल दो साल...आखिर पादरी ने कहा कि बाई, तू और भी कुछ करेगी कि वही एक पाप! और उसको कब तक...बार-बार पश्चात्ताप करती है!
वह महिला बोली कि मुझे उसकी याद भी करने में बड़ा मजा आता है। जब भी किसी को सुनाती हूं, अहा! एकदम गदगद हो जाती हूं! सो मैं तो आऊंगी। मैं तो हर रविवार को ही आऊंगी। मैं तो पश्चात्ताप करूंगी।
पश्चात्ताप करने वाले भी अजीब-अजीब लोग हैं! किस-किस कारण कर रहे हैं, यह कहना कठिन है। कोई इसलिए कर रहा है कि उसका अहंकार प्रतिष्ठित हो जाए। कोई इसलिए कर रहा है कि पश्चात्ताप करने में भी मजा आता है, क्योंकि वह वापस उसी बात को लौटा-लौटा कर दोहराना है, देखना है। जैसे कोई खाज को खुजलाए। जानता है कि दुख होगा, मगर खुजलाने में मिठास भी मालूम होती है, बड़ा मीठा-मीठा लगता है दर्द।
एक दुकान के कारिंदे से किसी बड़े ग्राहक से कहा-सुनी हो गई। दुकानदार ने कारिंदे को मजबूर किया कि वह ग्राहक से माफी मांगे। कारिंदे ने मुश्किल से मंजूर किया। नौकरी बचानी थी, सो मंजूर करना पड़ा। और उसे पता भी नहीं था कि ग्राहक इतना धनवान है कि मालिक मजबूर ही कर देगा कि क्षमा मांगनी पड़ेगी। सो उसने ग्राहक को फोन किया। कहा, क्या खान साहब घर पर हैं? खान साहब ने कहा, हां मैं बोल रहा हूं। तो उसने कहा, मैं हीरा होजरी का मैनेजर हूं। कहिए--खान साहब बोले।
आज सुबह मैंने आपसे कह दिया था न कि जाओ जहन्नुम में?
हां, तो?
तो मत जाना भाई। कोई जाने की जरूरत नहीं है।
पश्चात्ताप कर रहे हैं लोग! पश्चात्ताप भी पोता-पोती है। अपने को पोत-पात कर फिर रंग-रोगन करके खड़ा कर लिया। कहने को हो गया कि पश्चात्ताप कर लिया, कि देखो हम कोई साधारण आदमी नहीं हैं कि हमने गलती की और भूल को स्वीकार न किया! भूल स्वीकार कर ली, पश्चात्ताप भी कर लिया, फिर वापस अपने स्थान पर खड़े हो गए। फिर जहां के तहां सिंहासन पर विराजमान हो गए।
इसलिए मैं कहता हूं कि प्रायश्चित्त कोई वास्तविक धार्मिक बात नहीं है। यह तुम्हारी कामवासना, तुम्हारी क्रोध-वासना, तुम्हारा लोभ, मोह, उनका ही शीर्षासन करता हुआ रूप है।
सच्चा धार्मिक व्यक्ति पश्चात्ताप नहीं करता है। फिर सच्चा धार्मिक व्यक्ति क्या करता है? सच्चा धार्मिक व्यक्ति अपने क्रोध को देखता है, समग्रता से देखता है, साक्षी-भाव से देखता है। और उस देखने में ही मुक्त हो जाता है। पश्चात्ताप नहीं करता कि मुझसे बुरा हुआ, अब जो हुआ हुआ, बुरे और भले का क्या प्रयोजन है अब! अब जो हुआ, उसे मिटाया नहीं जा सकता, पोंछा नहीं जा सकता। किए को अनकिया नहीं किया जा सकता। तो जो हुआ है, उसे गौर से देखता है। और कसमें नहीं खाता कि अब न करूंगा; सिर्फ गौर से देखता है; देख कर छोड़ देता है बात वहीं के वहीं। कसमें खाईं कि तुम फिर करोगे, क्योंकि कसमें भी तुम पहले से खाते रहे हो।
एक आदमी ने मुझसे आकर कहा कि मैं महाक्रोधी हूं, बहुत बार कसमें खा चुका, छूटता ही नहीं। कसमें खा-खा कर थक गया, फिर-फिर हो जाता है। आप मुझे कुछ रास्ता बताओ।
मैंने कहा, तुम एक काम करो, पहले कसमें खाना छोड़ दो।
उसने कहा, इससे क्या होगा? कसमें खा-खा कर क्रोध नहीं छूटा, तो कसमें छोड़ने से क्या होगा?
मैंने कहा, तुम इतना तो करके दिखाओ। तीन महीने बाद आना। तीन महीने तक कसम मत खाना।
वह तीन ही दिन बाद आ गया। उसने कहा, यह बहुत मुश्किल है। मैं कसमें खाना भी नहीं छोड़ सकता। जैसे ही गलती होती है, फौरन कसम भी आती है।
तो मैंने कहा, तुम समझे, दोनों ही गलतियां हैं, जुड़ी हैं साथ ही साथ, अलग-अलग नहीं हैं। तुम अब तक यही सोचते रहे कि कसमें खाने से क्रोध चला जाएगा, तुम गलती में थे। कसम क्रोध का ही हिस्सा है; वह उसी के पीछे-पीछे आई, उसकी ही छाया है। वह छूट कैसे जाएगा? तुम कसमें तक नहीं छोड़ सकते, और क्या छोड़ोगे?
एक मित्र यहां आते हैं। उनकी पत्नी मेरे पास बार-बार आकर कहती थी इनकी शराब छुड़वा दो। मैंने कहा, ये आदमी भले हैं। और अगर थोड़ी-बहुत पी-पा लेते हैं, तो तुझे क्या परेशानी है? मगर पता नहीं स्त्रियों को क्या खयाल है कि उनका जन्म पतियों के सुधार के लिए हुआ है! उनका जीवन ही इस पर निछावर है! अपनी तो फिक्र ही नहीं, बस पति को ठीक करना है! फिर मैंने कहा कि ठीक हो गए पति तो पति स्वर्ग जाएंगे, तू कहां जाएगी? भटकोगी नरक में। तू अपनी फिक्र कर, इनको अपनी फिक्र करने दे। और मैंने कहा कि तुझे मालूम है कि स्वर्ग में शराब के चश्मे बहते हैं? ये थोड़ा सा अभ्यास रखेंगे तो अच्छा ही रहेगा।
उसने कहा, आप भी क्या बातें कर रहे हैं! और मेरे पति के सामने ऐसी बातें कर रहे हैं! वे वैसे ही मेरी जान खाते हैं और अब और मेरी जान खाएंगे कि आपने भी उनका समर्थन कर दिया।
मैंने कहा, तू एक काम कर। कितने दिन से तू छुड़ा रही है? उसने कहा, तीस साल हो गए। जब से विवाह हुआ है, बस यही किलकिल-दांती। एक क्षण सुख से नहीं बीत पाया। और जब से ये आपको सुनने लगे हैं, और मुश्किल हो गई है। रात को पीकर आते हैं तो आपका पूरा प्रवचन दोहराते हैं। दिन भर टेप सुनते हैं, रात को पीकर आते हैं तो, तीनत्तीन बजे उठा-उठा कर कि सुन! और वही टेप कई दफा सुना चुके, टेप भी सुन चुकी, वही आपका व्याख्यान और गजब के हैं, जब पी जाते हैं तो बिलकुल शब्द-शब्द दोहराते हैं! मुझे किसी तरह से छुड़वा दो, मेरी जिंदगी खराब हो गई।
मैंने कहा, तू एक काम कर, तू इनसे कहना छोड़ दे। तीस साल से तू कह रही है, नहीं छुड़ा पाई। तू इनसे कहना छोड़ दे।
पांच-सात दिन बाद उस ही महिला ने आकर कहा कि नहीं छोड़ सकती। मैंने कहा, अब तू जरा सोच। तू अपने पति की हालत सोच। जो आदमी तीस साल से और उससे भी ज्यादा समय से शराब पी रहा है, तू आई उससे पहले से पी रहा होगा, उससे तू छुड़वाने की कोशिश कर रही है और तू इतना भी नहीं कर सकती कि कहना छोड़ दे! तो मेरा पति शराब पी रहा है और तू यह कहने का मजा ले रही है। तू भी शराब पी रही है! तू यह मजा नहीं छोड़ सकती कि मैं पति से ऊपर। तू इनको रोज चारों खाने चित करने का मजा लेती है। चार आदमियों के समाने तू उनको नीचा दिखाने का मजा लेती है। हर कहीं ले जाती है। कितने साधु-संन्यासियों के पास ले गई?
उसने कहा, आपको यह कैसे पता चला?
पता चलेगा क्यों नहीं, क्योंकि यह स्त्रियों का गुणधर्म है पतियों को जहां पकड़ो वहां ले जाओ। चलो, महाराज आए हैं, मुनि महाराज आए हैं, महात्मा जी आए हैं, चलो! तुम्हें वहां ठीक करवाएं। इसी आशा में इनको मेरे पास लाई थी, तू गलत जगह आ गई। मैं इनसे नहीं कह सकता कि छोड़ो। जब तू नहीं छोड़ सकती कहना, कहने में क्या रखा है, तो ये तो बेचारे तीस साल के अभ्यासी हैं, इनका योगाभ्यास तो देख! और इनका संकल्प तो देख कि तू पीछे पड़ी है...। (और महिला मजबूत है और पति बेचारे दुबले-पतले हैं।) इनका संकल्प तो देख, इनकी हिम्मत तो देख! इनकी बहादुरी तो देख! कोई और होता तो अभी तक जैन मुनि हो गया होता, कभी का भाग गया होता। यह तो स्त्री-जाति ऐसा भगाती है उनको कि वे बेचारे एकदम महात्मा हो जाते हैं, उनको कोई रास्ता ही नहीं मिलता और बचने का।
तलाक की इस देश में सुविधा नहीं थी। अगर तलाक की सुविधा होती तो इतने महात्मा नहीं होते। इसीलिए पश्चिम में इतने महात्मा नहीं हैं। स्वभावतः और भी उपाय है बचने का; यहां तो एक ही उपाय था बचने का कि महात्मा हो जाओ, अगर छूटना है।
तो मैंने कहा, यह इनकी हिम्मत तो देख! और हो सकता है, तू इतना पीछे पड़ी है, इसलिए ये पीए जाते हैं। शायद उसी पीने की वजह से ये टिके भी हैं, नहीं तो ये टिकते भी नहीं। तू मजबूत दिखती है। तू कहना छोड़ दे।
वह बोली, यह मुझसे नहीं हो सकता।
मैंने कहा, तब तू फिर यह समझ ले कि जब तुझसे कहना नहीं छूटता तो इनसे पीना कैसे छूटेगा? इनकी लत तो गहरी है। असंभव है। तू जब इनसे कहना छोड़ देगी तो मैं इनसे कहूंगा कि पीना छोड़ दो। तू अगर कहना नहीं छोड़ोगी तो मैं इनसे कहने वाला नहीं हूं।
न उसने अब तक कहना छोड़ा है--तीन साल हो गए इस बात को हुए भी--न मुझे कहने की नौबत आई। और मैं नहीं सोचता कि आने वाली है नौबत। वह कहना नहीं छोड़ सकती। वह कहती है, बस के बाहर हो जाता है, इनको देखते से ही इनको सुधारने का भाव उठता है। ऐसे चेहरे से वे भोले-भाले आदमी हैं। उठता होगा भाव। भोले-भाले आदमियों को देख कर एकदम कई लोगों के मन में भाव उठता है कि इनको और ठीक करो।
पश्चात्ताप सिखाया है पंडितों-पुरोहितों ने। यह तुम्हें ठीक करने का मजा लेने वाले लोगों की तरकीब है। जानते हैं वे भी कि पश्चात्ताप से तुम ठीक होओगे नहीं। इसलिए कोई फिक्र भी नहीं है। हालांकि पश्चात्ताप करवा-करवा कर तुम्हें दीनऱ्हीन कर देते हैं, तुम्हारे मन में हीनता का भाव पैदा कर देते हैं। और हीनता का भाव पैदा हो गया कि बस तुम्हारे जीवन में आत्मा के जन्मने की संभावना ही समाप्त हो गई।
तुम्हारे धर्मगुरुओं ने तुम्हें एकदम हीन बना दिया है और हर छोटी-बड़ी चीज से हीन बना दिया है। सिगरेट पीओ तो पाप। पान खाओ तो पाप। तंबाकू चबाओ तो पाप। अच्छे कपड़े पहन लो तो पाप। तेल-फुलेल लगा लो तो पाप। पाप ही पाप! उनका कुल काम इतना है कि वे तुम्हारी हर चीज को पाप बना दें। बस तुम किसी तरह हीन बने रहो, तुम्हारी हीनता में उनका महात्मापन है। तुम जितने हीन, वे उतने बड़े महात्मा।
मैं तुम्हें हीनता नहीं सिखाता। मैं कहता हूं, तुम जैसे हो शुभ हो। अपने को स्वीकार करो। पश्चात्ताप नहीं। पश्चात्ताप क्या करोगे? पश्चात्ताप से कब कौन बदला है! तुम जैसे हो, अपने को स्वीकार करो। हां, अपने प्रति जागो।
जागरण सिखाता हूं--प्रायश्चित्त नहीं। होश से भरो। अपने प्रति, ध्यानपूर्वक, क्या कर रहे हो, क्या सोच रहे हो, क्या बोल रहे हो--इस सबके साक्षी बनो। उस साक्षी बनने में क्रांति घटित हो जाती है। न कुछ छोड़ना पड़ता है, न कुछ पकड़ना पड़ता है। जो व्यर्थ है वह छूट जाता है। जो सार्थक है, वह शेष रह जाता है।
साक्षी के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।
एक युवक कैथोलिक पादरी के सामने प्रायश्चित्त कर रहा था। कहा, बहुत पाप हो गया। एक परायी स्त्री के साथ संबंध हो गया है। पादरी ने पूछा, उसका नाम? युवक ने कहा कि आप नाम न पूछें, नाम मैं न बता सकूंगा। एक तो वह दूसरे की स्त्री, और दूसरे मैं उसे वचन दे चुका हूं। सिर्फ मुझे क्षमा करें और परमात्मा से मेरे लिए प्रार्थना करें कि मुझे क्षमा मिले। नाम मैं न बता सकूंगा।
पादरी ने कहा, चंदूलाल की प्रेयसी?
उस युवक ने कहा, नहीं।
पादरी ने कहा, ढब्बू जी की पत्नी?
उसने कहा कि नहीं, बिलकुल नहीं।
पादरी ने कहा, मटकानाथ ब्रह्मचारी की रखैल?
नहीं, बिलकुल नहीं।
तो फिर कौन--पादरी ने कहा।
उस युवक ने कहा, वह मैं बता ही नहीं सकता।
तो पादरी ने कहा, फिर मैं भी क्षमा नहीं कर सकता।
युवक ने कहा, जैसी मरजी!
मगर वह बड़ा प्रसन्न बाहर निकला। बाहर दूसरा युवक खड़ा था, उसका साथी, उसने कहा, बड़े प्रसन्न नजर आ रहे हो! क्या बात है? प्रायश्चित्त हो गया? प्रार्थना स्वीकार हो गई?
उसने कहा, प्रायश्चित्त वगैरह तो नहीं हो पाया, प्रार्थना स्वीकार भी नहीं हुई। मगर तीन औरतों के नये पते मिल गए। अब प्रायश्चित्त फिर करेंगे। अभी पहले इन तीन औरतों को निपटाएं। अरे यह चर्च कोई जाता थोड़े ही है। यह पादरी कोई मरा थोड़े ही जाता है! मर जाए तो दूसरा पादरी। मगर ये तीन औरतें...अब मैं जा रहा हूं। और जब उसने तीन का नाम लिया तो इसका मतलब साफ है कि और लोग भी इन तीन के संबंध में पश्चात्ताप कर चुके हैं। सो रास्ता साफ है, बात बन सकती है। जरा उपाय करने की जरूरत है।
आदमी जब तक मूर्च्छा में है, तब तक क्या प्रायश्चित्त करो, क्या प्रायश्चित्त करवाओगे! वह प्रायश्चित्त में से भी तरकीबें निकाल लेगा। वह पुण्य करने जाएगा और पाप के इंतजाम करके आ जाएगा। मूर्च्छा टूटनी चाहिए।
इसलिए मेरा जोर सिर्फ एक बात पर है: मूर्च्छा छोड़ो! बाकी उलझनों में मत पड़ो। ध्यान को जगाओ। ध्यान का दीया जलने दो, अंधेरा अपने से कट जाता है।
आज इतना ही।


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