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बुधवार, 17 मई 2017

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10




पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 20 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-दसवां-(ध्यान का दीया जलाओ)

पहला प्रश्न: भगवान,
कहते हैं कि कामनाएं मूलतः तीन ही हैं--संभोग, संपत्ति और शक्ति की कामनाएं। शेष सब इनकी ही संतान हैं। इनमें भी फ्रायड संभोग को बुनियादी बताते हैं; माक्र्स संपत्ति को; और एडलर शक्ति को। और हालांकि तीनों अपने-अपने ढंग से सही मालूम पड़ते हैं, तो भी उलझन नहीं मिटती।
भगवान, फ्रायड, माक्र्स और एडलर के इस विवाद में--विवादी नहीं रहे, पर विवाद जारी है--मैं आपको पंच चुनता हूं। क्या आप पंचायत करेंगे? यदि हां, तो आपका पंच-फैसला क्या होगा?

अखिलानंद,
माक्र्स, फ्रायड और एडलर तीनों सही भी हैं और तीनों गलत भी। सही इसलिए कि प्रत्येक ने आंशिक सत्य को कहा है। गलत इसलिए कि प्रत्येक ने आंशिक सत्य को ही संपूर्ण सत्य है--ऐसा सिद्ध करने की चेष्टा की है।

वासनाएं तीन हो सकती हैं, तेरह हो सकती हैं, लेकिन उनका मूल उत्स एक है। यूं समझो कि जैसे अस्तित्व के तीन आयाम होते हैं लेकिन अस्तित्व एक है। वैसे ही वासना एक है, उसके ये तीन आयाम हैं, उसके ये तीन पहलू हैं। ये त्रिकोण हैं। और तीनों कोने अपने आप में सही हैं। पर जैसे ही कोई अपने कोने को ही पूरा महल घोषित करता है, झूठ शुरू हो जाता है।
केंद्र क्या है वासना का? मूल उत्स क्या है? मूल उत्स एक ही है और वह है--मनुष्य का स्वयं को न जानना, आत्म-अज्ञान, आत्म-मूर्च्छा। चूंकि मनुष्य स्वयं को नहीं जानता; इसलिए सब तरह की चेष्टाएं करता है इस अज्ञान को किस तरह ढांक ले; इस अज्ञान को किस तरह विस्मृत कर दे; इस अज्ञान को किस भांति स्वयं भी भूल जाए और दूसरों को भी पता न पड़ने दे। इस भुलावे की चेष्टा से ही, इस आत्म-वंचना की चेष्टा से ही ये तीन आयाम पैदा होते हैं।
निश्चित ही अगर तुम्हारे पास संपत्ति हो, तो तुम भुलावा पैदा कर सकते हो; बहुत भुलावा पैदा कर सकते हो। संपत्ति हो तो लोग गधों को भी साष्टांग दंडवत करते हैं। संपत्ति हो तो सम्मान मिलता है। संपत्ति हो, समादर मिलता है, पूजा मिलती है।
हमारा शब्द है ईश्वर, वह बना है ऐश्वर्य से। जिसके पास ऐश्वर्य है, वह अपने को ईश्वर समझने की भ्रांति में पड़ सकता है। ऐश्वर्य ऐसा भ्रमजाल खड़ा कर दे सकता है कि फिर स्वयं को जानने की जरूरत न मालूम पड़े।
हम दूसरों की आंखों में अपनी तस्वीर देखकर जीते हैं। हमारी अपनी तो कोई पहचान नहीं। स्वयं की तो कोई प्रत्यभिज्ञा नहीं। दूसरे क्या कहते हैं, वही हमारी जानकारी है, अपने संबंध में।
अगर लोग कहते हैं--सुंदर हो, तो हम मान लेते हैं कि सुंदर हैं। और लोग कहते हैं कि सुंदर नहीं हो; तो पीड़ा होती है, तो कांटा चुभता है। लोग कहते हैं बुद्धिमान हो, तो फूल बरस जाते हैं। और लोग कहते हैं बुद्धू हो, तो हम गङ्ढे में गिर जाते हैं।
जिसके पास संपत्ति है, वह कुछ भी कहला लेगा। संपत्ति क्या नहीं खरीद सकती है! सम्मान खरीद सकती है। स्तुति खरीद सकती है। प्रशंसा खरीद सकती है।
सम्राटों के दरबारों में भाट हुआ करते थे, जो उस समय महाकवि समझे जाते थे। और उनका कुल काम इतना था कि वे सम्राटों की प्रशंसा और स्तुति में गीत लिखते रहें। ऐसे झूठे गीत; ऐसी व्यर्थ की कल्पनाएं, असंभव कल्पनाएं! लेकिन आदमी का मन उनको भी मान लेता है।
जब तुम्हारी कोई प्रशंसा करता है, तुम्हें अगर समझ में भी आता हो कि यह बात झूठ है, तो भी तुम इनकार नहीं कर पाते। रस मिलता है। गुदगुदी होती है। भीतर हृदय गदगद होता है। किसी मूर्खाधिराज को भी कहो कि आप महापंडित हो, तो वह भी इनकार नहीं करता। क्योंकि चाहा तो उसने यही था सदा कि लोग महापंडित कहें। लेकिन कोई कहने वाला न मिला था।
अरबी कहावत है कि परमात्मा जब लोगों को बनाकर दुनिया में भेजता है, तो सभी के साथ एक मजाक कर देता है। बनाया आदमी को, और इसके पहले कि फेंके दुनिया में, कान में फुसफुसा देता है कि तुझ जैसा सुंदर, तुझ जैसा बुद्धिमान, तुझ जैसा अद्वितीय, प्रतिभाशाली, मेधावी मैंने न कभी बनाया और न कभी मैं फिर बनाऊंगा। तू बेजोड़ है। तू लाखों में एक है। और कंकड़-पत्थर--तू हीरा है। तू कोहिनूर है।
और यही बात हर आदमी अपने मन के भीतर दबाए बैठा है। कहना तो चाहता है, लेकिन कहने के लिए अवसर चाहिए। संपत्ति अवसर दे देती है। न फिर खुद कहना पड़ता है, दूसरे कहने लगते हैं। इसलिए तो तुम नेताओं के पास चमचों को इकट्ठे देखते हो। ये चमचे क्या हैं? ये कुछ नए नहीं हैं। ये बड़े पुराने हैं। ये उतने ही प्राचीन हैं, जितना प्राचीन आदमी है।
और इन्हीं चमचों की भाषा तुम्हारे महात्मा बोलते रहे हैं। वे भी परमात्मा की खुशामद यूं करते हैं, जैसे लखनऊ के किसी नवाब की खुशामद कर रहे हों। को मो सम खल कुटिल कामी, मैं तो नमक हरामी! अपने को ऐसा दीन दिखा रहे हैं! और परमात्मा को बड़ा करके बता रहे हैं। दोनों एक ही चीज के पहलू हैं। अपने को छोटा करके दिखाना; परमात्मा को बड़ा करके दिखाना। कि मैं तो कुछ नहीं; धूल हूं। पापी हूं। और तुम--तुम पावन हो! तुम तीर्थ हो! तुम उद्धारक हो! तुम्हीं पापियों के एकमात्र सहारे हो! और मुझ जैसा कौन महापापी! यूं अपनी लकीर को जितना छोटा किया जा सके, कर रहे हैं; और परमात्मा की लकीर को जितना बड़ा कर सकें, कर रहे हैं।
यह भाषा दरबारियों की भाषा है। सोचते रहे लोग कि जब राजा-महाराजा, धनी-मानी आनंदित होते हैं स्तुति से, खुशामद से, तो परमात्मा भी होगा ही। वही भाषा परमात्मा के लिए बोली जा रही है। और जब कोई महात्मा यह भाषा बोलता है, तो तुम सोचते हो: कितना विनम्र! कितना निरअहंकारी! को मो सम कुटिल खल कामी! अहा, तुम भी गदगद होते हो कि महात्मा भी गजब है! लेकिन अगर गौर से देखो, तो इसमें भी अहंकार है। वह यह कह रहा है कि मुझ जैसा कुटिल खल कामी कोई और नहीं! बस, मैं अद्वितीय हूं! मुझसे नीचे और कोई भी नहीं! तुम सबसे ऊपर--मैं सबसे नीचे। तुम भी अद्वितीय--मैं भी अद्वितीय! और हम दोनों का मिलन हो जाए, तो गजब हो जाए, तो चमत्कार हो जाए!
यह कुछ निर-अहंकार नहीं है। निर-अहंकार ऐसी भाषा बोल ही नहीं सकता। यह तो अहंकार की ही भाषा है। हां, मगर अहंकार शीर्षासन कर रहा है; सिर के बल खड़ा है।
धन खरीद सकता है स्तुति, खुशामद, गीत, काव्य, महाकाव्य। तुम्हारे सारे महाकाव्य स्तुतियां हैं धनपतियों की, साम्राज्यवादियों की। छोटे-मोटे कवियों की तो छोड़ दो, तुम्हारे बड़े-बड़े कवि भी दरबारी ही हैं, भाट ही हैं। धन के लिए गीत लिखे हैं। पद और प्रतिष्ठा के लिए स्तुति की है।
धन खरीद सकता है; लोगों की आंखें खरीद सकता है। लोग तुम्हारी ऐसी तस्वीर दिखाने लगें, जैसी तुम देखना चाहते हो। है वैसी या नहीं--यह और बात।
और वही काम शक्ति से भी होता है। राष्ट्रपति है कोई, सम्राट है कोई, सिकंदर है कोई, प्रधानमंत्री है कोई, तो बस स्तुतियां शुरू हो जाती हैं। जब तक पद पर है, तब तक चारों तरफ से गुणगान होता है।
पद पर बैठे लोगों को बड़ी भ्रांति पैदा हो जाती है कि जब इतने लोग कह रहे हैं तो ठीक ही कहते होंगे। आखिर क्यों इतने लोग झूठ कहेंगे! पद से उतरते ही पता चलता है कि अब कोई पूछता भी नहीं।
मनोवैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जैसे ही कोई व्यक्ति पद से नीचे उतरता है, उसकी उम्र दस साल कम हो जाती है। वह दस साल पहले मर जाता है। अगर पद पर रह जाता तो दस साल और जी जाता।
गर्मी पैदा होती है लोगों की प्रशंसा से; बल आता है। बूढ़े भी जवान मालूम होते हैं। मुर्दा भी जिंदा मालूम होते हैं।
पद की आकांक्षा, शक्ति की आकांक्षा--लेकिन कारण वही है, कि कोई बता दे कि मैं कौन हूं। कोई कह दे, कोई प्रमाण दे दे कि मैं कौन हूं। कोई मुझे बढ़ा-चढ़ाकर गौरीशंकर का शिखर बता दे। मुझे तो पता नहीं कि मैं कौन हूं, औरों पर ही निर्भर रहना होगा।
तुम जरा सोचना कि तुम्हारी अपने संबंध में जो जानकारी है, वह क्या है! वह कतरन है लोगों के विचारों की। चिंदियां इकट्ठी कर रहे हो लोगों के मंतव्यों की। और उन्हीं का ढेर संजोए बैठे हो, और सोचते हो यही मैं हूं। और इसी बीच तुम्हारी विडंबना पैदा होती है। क्योंकि कोई तुम्हें अच्छा कह देता है, कोई तुम्हें बुरा कह देता है। कोई प्यारा कह देता है, कोई दुष्ट कह देता है। कोई महात्मा कह देता है, कोई पापी कह देता है। तुम बड़ी बिबूचन में पड़ जाते हो कि फिर मैं कौन हूं!
तुम्हारे संबंध में मंतव्य लोगों के अलग-अलग हैं। हर दर्पण तुम्हारी अलग तस्वीर बताता है। तुम कभी ऐसे दर्पणगृह में गए हो, जहां बहुत दर्पण लगे हों। कोई दर्पण तुम्हारा लंबा रूप बताता हो। कोई दर्पण तुम्हें बिलकुल ठिगना बनाकर बताता हो। कोई दर्पण मोटा करके बताता हो। कोई बिलकुल सींकिया पहलवान कर देता हो। कोई सुंदर--कोई असुंदर।
इस दर्पणगृह में तुम बड़ी मुश्किल में पड़ जाओगे कि आखिर मैं कौन हूं! दूसरों पर जो निर्भर रहेगा, वह मुश्किल में तो पड़ेगा ही। क्योंकि नौकर तो कहेगा कि मालिक आप जैसा सुंदर कोई भी नहीं। लेकिन तुम्हारा जो मालिक है, वह यह नहीं कहेगा। वह क्यूं कहेगा? वह तो तुमसे कहलवाएगा कि सुंदर मैं हूं। और तुमसे यह भी कहलवाएगा कि तुम कुरूप हो। क्योंकि ये सारी बातें सापेक्ष्य हैं और तुलनात्मक हैं। इसलिए तुम्हारा मन द्वंद्वग्रस्त होता है।
धन कितनी ही स्तुति खरीद ले, लेकिन निर्द्वंद्वता नहीं खरीद सकता, अद्वैत नहीं खरीद सकता। पद कितना ही लोगों का समादर पा ले, लेकिन कहीं न कहीं से कांटे भी उभरते ही रहेंगे। फूलों के बीच कहीं न कहीं कांटे भी उगते रहेंगे। इसलिए पद पर बैठा व्यक्ति कभी निश्चिंत नहीं हो पाता। पद निश्चिंतता नहीं खरीद सकता है।
जो लोग धन और पद की दौड़ में नहीं दौड़ पाते, क्योंकि वह दौड़ बड़ी संघर्ष से भरी हुई है। पद की दौड़ का मतलब होता है: पूरा जीवन जूझते बिताना। यह सबकी कूबत की बात नहीं है। न ही सब इतने मूढ़ होते हैं कि पूरी जिंदगी यूं गंवा दें।
इमरसन का एक बहुत प्रसिद्ध वचन है, कि अमरीकी राष्ट्रपति बनने के लिए व्यक्ति को कम से कम तीस साल मेहनत करनी पड़ती है। और उसने कहा है कि जो व्यक्ति सिर्फ राष्ट्रपति बनने के लिए तीस साल मेहनत करता है, वह तो राष्ट्रपति होने के लिए बिलकुल भी योग्य नहीं। राष्ट्रपति होने के लिए ही जो आदमी तीस साल गंवाने को राजी है--जिंदगी का आधा गंवाने को राजी है--यह तो मूढ़ है ही। यह तो सबूत दे रहा है कि राष्ट्रपति होने के योग्य नहीं है।
पद की इतनी आकांक्षा बताती है कि भीतर हीनता होगी--गहन हीनता होगी। धन के लिए लोग जिंदगीभर दौड़ते हैं। मरते समय कहीं धन इकट्ठा कर पाएंगे। जब धन का कुछ उपयोग कर सकते थे, तब धन के लिए दौड़ते रहे। और जब उपयोग न कर सकेंगे, तब धन हाथ लगेगा। यह विडंबना देखते हो! जब जवानी थी और धन का कुछ उपयोग हो सकता था, तब तो सिर फोड़ते रहे कि किसी तरह धन इकट्ठा हो जाए और जब बुढ़ापा द्वार पर आ गया और किसी तरह थोड़ा-बहुत धन इकट्ठा हुआ, तब इसका करोगे क्या?
अक्सर यह हो जाता है कि जब आदमी धनी हो पाता है, तब तक न तो ठीक से भोजन कर सकता है, न ठीक से सो सकता है। नींद खो जाती है। भोजन करके पचाने की क्षमता खो जाती है। न कुछ भोग सकता है। आशा यही रखी थी जिंदगीभर कि जब धन मिलेगा, तो फिर सब कर लूंगा। मगर करने वाला ही धन कमाने में खोता गया, खोता गया। धन तो मिल जाता है, मगर धनी नहीं बचता। धन का ढेर लग जाता है, उसी के नीचे दब कर मर गया वह, जो धन की तलाश में निकला था।
तो सभी लोग न तो धन की खोज में निकलते हैं और न पद की खोज में निकलते हैं। उन सबके लिए भी प्रकृति ने व्यवस्था की है। जैविकशास्त्र ने व्यवस्था की है कि कम से कम संभोग; कम से कम कोई एक स्त्री तो कह दे कि तुम अद्वितीय हो। कोई पुरुष तो कह दे कि तुझ जैसी सुंदरी कभी भी नहीं हुई; क्लियोपेत्रा भी कुछ न थी! कि एक व्यक्ति भी कह दे, इतना ही बहुत। एक दर्पण भी बता दे कि मेरी तस्वीर क्या है?
और संभोग इस लिहाज से सरलतम है, क्योंकि जितने पुरुष हैं इस पृथ्वी पर उतनी ही स्त्रियां हैं। अनुपात में पैदा होते हैं। लेकिन इस संबंध में भी पुराने जमानों में बड़ी दौड़ चलती थी। कृष्ण की सोलह हजार स्त्रियां? उन दिनों आदमी की ताकत, कूबत, पद-प्रतिष्ठा, कितनी उसकी स्त्रियां हैं, इससे नापी जाती थी। कृष्ण जैसे व्यक्ति की सोलह हजार स्त्रियां होनी ही चाहिए।
पहले तो मैं सोचता था कि यह सिर्फ कपोल-कल्पना ही होगी। मगर यह बात कपोल-कल्पना नहीं है। अभी, पचास साल पहले, सिर्फ पचास साल पहले, उन्नीस सौ तीस में निजाम हैदराबाद की पांच सौ पत्नियां थीं। तो पांच सौ और सोलह हजार में क्या फर्क है! केवल बत्तीस गुना! कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं है। पांच हजार साल पहले मूर्खता भी बत्तीस गुनी रही होगी।
अगर निजाम हैदराबाद इस सदी में पांच सौ स्त्रियां रख सकते हैं तो कृष्ण ने अगर सोलह हजार रखी होंगी, तो कुछ आश्चर्य नहीं। मुझे अब कपोल-कल्पना नहीं मालूम होती। सच ही रहा होगा। आदमी की औकात ही इससे तौली जाती थी। उसका बल ही इससे समझा जाता था, कि कितनी स्त्रियां उसके पास हैं।
चाहे धन हो, चाहे पद हो, चाहे काम हो--इन त्रिकोणों में एक ही अभीप्सा है कि किसी तरह मुझे भरोसा आ जाए कि मैं हूं; और मैं व्यर्थ नहीं हूं। मैं हूं, और सार्थक हूं। मैं हूं, और हीन नहीं हूं। मेरी भी कुछ गरिमा है। मेरा भी कोई गौरव है। कोई सहारा मिल जाए। यह मेरी जो डांवाडोल होती हुई मंजिल है, यह मेरे जो ताश के पत्तों से बनाया गया महल है, यह गिर न जाए, इसके लिए हम सहारे खोजते हैं।
भीतर रिक्तता है। भीतर खालीपन है और अंधेरा है। इस अंधेरे को हम बाहर की रोशनी से भुला देना चाहते हैं, दबा देना चाहते हैं। इस भीतर की रिक्तता को हम बाहर के धन से, पद से, भोग से भर लेना चाहते हैं। मगर यह रिक्तता ऐसे भरती नहीं। सौभाग्य है कि नहीं भरती। अगर भर जाती होती, तो धर्म की कोई संभावना ही न थी।
अगर फ्रायड सही होता या माक्र्स सही होते या एडलर सही होता, तो धर्म की कोई संभावना नहीं थी। एडलर कहता है, शक्ति मिल गई, बस यही अभीप्सा है। तो फिर सिकंदर महान को वही तृप्ति मिलनी चाहिए थी, जो हमने बुद्ध की आंखों में देखी--वही शांति, वही आनंद; वह तो नहीं मिला।
एडलर के लिए इससे बड़ी और क्या गवाही चाहिए कि सिकंदर दुखी मरा। सारी दुनिया को जीत लिया; अकेला आदमी है, जो विश्वविजेता था। उस समय जितनी दुनिया जानी-मानी थी, उसको जीत लिया था। लेकिन मरा तो दुखी। मरा तो बेचैन। कहा था एक नंगे फकीर डायोजनीज से उसने कि अगर दुबारा मैं पैदा हुआ तो ईश्वर से कहूंगा, अब की बार सिकंदर न बनाना; डायोजनीज बना देना। नंगे फकीर से! क्योंकि डायोजनीज में उसने वह मस्ती देखी, जो सारी दुनिया जीतकर उसे नहीं मिली और डायोजनीज के पास कुछ भी न था; बिलकुल कुछ भी न था। बुद्ध तो कम से कम भिक्षा का पात्र भी रखते थे। पहले डायोजनीज भी भिक्षा का पात्र रखता था, लेकिन एक दिन एक कुत्ते को पानी पीते देखकर उसे खूब हंसी आई और उसने कहा, जब कुत्ता बिना भिक्षापात्र के काम चला लेता है, तो क्या मैं कुत्ते से गया-बीता हूं! उसने भिक्षापात्र नदी में फेंक दिया। उस दिन से उसके पास कुछ भी न था।
सिकंदर भी मिलने गया था तो वह नग्न लेटा था रेत पर। सुबह की धूप ले रहा था। उठकर भी नहीं बैठा। सिकंदर को तो सम्राट भी खड़े होकर स्वागत करते थे। खड़े होना तो दूर, डायोजनीज उठा भी नहीं। हिला भी नहीं। जैसा लेटा था, लेटा ही रहा। सिकंदर को कुछ थोड़ी सी बेचैनी भी हुई कि बात कहां से शुरू करे।
सिकंदर ने कहा कि मैं आया हूं बहुत दूर से। तुम्हारी बड़ी प्रशंसा सुनी थी और तुम्हें देखकर लगता है कि जो सुना था, वैसे ही तुम आदमी हो। तुम पहले आदमी हो, जो मुझसे डरा नहीं, जो मुझसे भयभीत नहीं। जो मेरी स्तुति में खड़ा नहीं हो गया। मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं। मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूं।
डायोजनीज ने कहा कि छोड़ो, बकवास छोड़ो। तुम गरीब आदमी, तुम मेरे लिए क्या करोगे? तुम मुझसे पूछो कि मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं। तुम कुछ मुझसे मांगो। यह भ्रांति छोड़ दो कि तुम मुझे कुछ दे सकते हो। तुम मुझे क्या दोगे? तुम्हारे पास क्या है? मैंने बहुत लोग देखे हैं, डायोजनीज ने कहा, तुम सबसे बड़े गरीब हो। तुम भिखमंगे हो!
सिकंदर को एक-एक बात हथौड़े की चोट की तरह पड़ी। मगर थी तो सच। इनकार भी न कर सका। सिर झुकाकर खड़ा रहा। और कहा, फिर भी मैं विश्वविजेता हूं। तुम पर कोई अनुग्रह करने के लिए मैंने नहीं कहा कि क्या करूं; सिर्फ सम्मान प्रगट करने के लिए कहा है। कुछ कर सकूं तो मुझे कह दो। जरूर करूंगा।
डायोजनीज ने कहा, अगर कुछ करना ही चाहते हो, तो जरा हटकर खड़े हो जाओ। क्योंकि तुम्हारे कारण सूरज की रोशनी मुझ तक पहुंचने से रुक गई है। इससे ज्यादा तो कुछ तुम कर नहीं सकते। इससे ज्यादा मैं कुछ मांग नहीं सकता। न मुझे जरूरत है, न तुम्हारे पास है।
सिकंदर जब मरा, तो उसने अपने वजीरों से कहा, मेरे हाथ मेरे ताबूत के बाहर लटके रहने देना।
वजीरों ने कहा, आप कैसी बातें करते हैं--बहकी-बहकी! हाथ हमेशा ताबूत के भीतर होते हैं? कोई नया रिवाज चलाना चाहते हैं! हाथ ताबूत के बाहर लटके हुए क्या अच्छे लगेंगे! ऐसा न कभी हुआ; न देखा, न सुना!
सिकंदर ने कहा, हुआ हो या न हुआ हो, तुम मेरे हाथ लटके रहने देना। लेकिन, उन वजीरों ने पूछा, क्यों?
तो सिकंदर ने कहा कि मैं यह दिखाना चाहता हूं लोगों को कि इतना दौड़ा, इतना धापा, इतनी आपाधापी, मगर खाली हाथ जा रहा हूं। खाली हाथ जीया, खाली हाथ मर रहा हूं। ये मेरे खाली हाथ लोग देख लें--कि मेरे हाथ भरे नहीं हैं। मैं भर कर नहीं जा रहा हूं।
एडलर के लिए और क्या गवाही होगी इससे बड़ी? इस दुनिया में बहुत लोगों ने पद पाए; बहुत लोग महाशक्तिशाली हो गए, लेकिन क्या मिला?
नहीं, एडलर एक बहुत आंशिक सत्य को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बता रहा है। और उस आंशिक सत्य में भी जो असली बात है, उससे चूक गया है।
माक्र्स कहता है: धन, संपत्ति--बस, यही आदमी की कामना है। यह बात भी उतनी ही गलत है। क्योंकि इस जमीन ने कितने संपत्तिशाली लोग देखे!
बुद्ध वैशाली आए। और वैशाली का जो नगरसेठ था, उस जमाने में कहते हैं उतना बड़ा संपत्तिशाली व्यक्ति भारत में कोई दूसरा न था। सैकड़ों सम्राट उससे कर्ज लेते थे। सैकड़ों सम्राट उसके कर्जदार थे। जिसको जरूरत होती, जितनी जरूरत होती, उतना देता था। लेकिन वह भी बुद्ध के चरणों में आया। और उसने कहा कि मुझे कोई राह बताएं। अशांत हूं। बेचैन हूं। और जिंदगी रोज हाथों से बही जाती है। धन मेरे पास बहुत है, लेकिन क्या करूं इस धन का? भीतर तो निर्धन का निर्धन रह गया हूं।
और धन सच में ही उसके पास बहुत था। क्योंकि बुद्ध जिस बगीचे में ठहरे थे...। बुद्ध के एक भिक्षु ने उस नगरसेठ को कहा कि यह बगीचा प्यारा है। सैकड़ों एकड़ जमीन वाला बगीचा था। और बुद्ध अक्सर वैशाली आते हैं, उनके ठहरने के लिए यह जगह ठीक होगी। तुम इसे खरीद लो।
तो उस नगरसेठ ने कहा, खरीद देता हूं। और बुद्धसंघ को दान कर देता हूं। लेकिन जिसका बगीचा था, वह भी जिद्दी आदमी था। उसने कहा, बेचूंगा जरूर, लेकिन मेरी कीमत तुम शायद न चुका सको?
नगरसेठ के अहंकार को चोट लगी। उसने कहा, कीमत! जो तुम्हारा मुंहमांगा दाम, वही चुकाऊंगा। उसमें एक पैसा कम न करूंगा। बोलो!
उस आदमी ने जो मांगा, वह ऐसा था कि शायद कोई भी देने को राजी नहीं हो सकता था। उसने भी नहीं सोचा था कि कोई देने को राजी होगा। उसने कहा, स्वर्ण अशर्फियां बिछाओ। जितनी जमीन पर बिछा दो, उतनी जमीन तुम्हारी। बिछाते चलो, जितनी जमीन ढंक लोगे स्वर्ण-अशर्फियों से, वह तुम्हारी।
उसने पूरी सौ एकड़ जमीन पर स्वर्ण-अशर्फियां बिछवा दीं और पूरा बगीचा खरीद कर बुद्ध के संघ को दान कर दिया। निश्चित उसके पास अपार संपदा थी। लेकिन संपदा से क्या होगा? जमीन खरीदी जा सकती है; राज्य खरीदे जा सकते हैं। लेकिन एक और भी साम्राज्य है भीतर का, वह तो नहीं खरीदा जा सकता।
संभोग! सुंदर से सुंदर स्त्रियां लोगों को मिली हैं, सुंदर से सुंदर पुरुष लोगों को मिले हैं। लेकिन दो दिन में सब सौंदर्य समाप्त हो जाता है। सब सौंदर्य दूरी में है। निकटता में बात सब बिगड़ जाती है। दूर के ढोल सुहावने!
उस जमाने में, बुद्ध के जमाने में आम्रपाली बहुत सुंदर स्त्री थी। कहते हैं, अति सुंदर स्त्री थी। लेकिन बुद्ध के चरणों में आ गई थी। सम्राट उसके द्वार पर कतारबद्ध खड़े रहते थे। पंक्ति लगाकर खड़े रहते थे। सम्राटों को भी उसके दर्शन मिलने दुर्लभ थे। उसकी कीमत चुकानी मुश्किल थी। आम्रपाली भी एक दिन पीतवस्त्र पहनकर बुद्ध के चरणों में आ गई। और उसने कहा, मुझे दीक्षा दे दें।
बुद्ध ने कहा, तू इतनी सुंदर है। तेरे पीछे सम्राट दीवाने हैं। तुझे क्या कमी है!
उसने कहा, रहें दीवाने। मैंने सब देख लिया। कुछ सार नहीं है। सब खेल हैं; बच्चों के खिलौने हैं।
संभोग से कोई कभी तृप्त हुआ है! न संपत्ति से तृप्त हुआ है, न शक्ति से कोई तृप्त हुआ है। हां, भ्रांति, आशा, सपना...। मिलते हैं, बहुत मिलते हैं, लेकिन पूरा तो कोई सपना नहीं होता, सब आशाएं निराशाएं हो जाती हैं और आज नहीं कल सब भ्रम भंग हो जाते हैं।
ये तीनों बात से चूक गए हैं। अगर ये तीनों में से कोई भी सही हो, तो धर्म का कोई स्थान नहीं रह जाता। अगर तीनों पूरे-पूरे सही हों, तो धर्म का कोई स्थान नहीं रह जाता। धर्म का इसीलिए स्थान है, कि इन तीनों में कुछ बुनियादी भूल है। लक्षण को इन्होंने मूल समझ लिया है। जैसे किसी को बुखार चढ़ा हो, और उसका शरीर गरम हो रहा हो। एक सौ पांच डिग्री, एक सौ छह डिग्री गर्मी बढ़ रही हो। और तुम समझो कि इस आदमी को गर्म होने की बीमारी हो गई। और तुम बर्फ का ठंडा पानी उसके ऊपर ढालो। कि डुबकी लगवाओ उसको जाकर ठंडे पानी में। कि किसी तरह इसकी गर्मी कम करो। यह लक्षण का इलाज होगा! इस इलाज में बुखार तो शायद ही जाए, बीमार जरूर मर जाएगा।
लक्षण दिखाई पड़ते हैं ऊपर से। ये सिर्फ लक्षण हैं--संपत्ति, शक्ति, संभोग। ये बीमारियां नहीं हैं। बीमारी तो एक है कि आदमी भीतर खाली है, रिक्त है; अंधेरे से भरा है। और इलाज भी एक है कि भीतर रोशनी चाहिए। इलाज भी एक है कि भीतर आनंद का भराव चाहिए।
अगर तुम मुझसे पूछो, जैसा तुमने पूछा है, तो यह मेरा पंच-फैसला है कि बीमारी है--ध्यान का अभाव। रोग है--ध्यान का अभाव। और औषधि है ध्यान। अमृत है ध्यान।
जो व्यक्ति अपने भीतर शांत और मौन, थिर हो जाता है; जो अपने को पहचान लेता है; खुद सीधा-सीधा अपनी आंख से ही अपने को देख लेता है; अपनी भीतर की आंख से अपने को गुन लेता है; और अपने भीतर के शून्य को आलोकित कर लेता है; अपने भीतर के दीए को जला लेता है--वह व्यक्ति तृप्त हो जाता है; परम तृप्त हो जाता है; मुक्त हो जाता है।
उसी की तलाश है। वही एक असली सवाल है। ये तीन कोने आदमी की चेष्टाएं हैं--उस असली सवाल से बचने की। मगर कोई कभी बच नहीं पाया। और कोई कभी बचेगा भी नहीं।
ध्यान का अभाव; अपने को न जानना; आत्म मूर्च्छा है। एक गङ्ढा है हमारे भीतर और वह तब तक रहेगा, जब तक हम भीतर बैठ न जाएं; हम बैठ गए कि गङ्ढा भरा। हम ठहरे कि गङ्ढा भरा। और ये तीनों हमें दौड़ाते रहते हैं। धन है, पद है, काम हैं--ये दौड़ाते रहते हैं, दौड़ाते रहते हैं। ये रुकने ही नहीं देते। ये इलाज नहीं हैं, ये बीमारी को बढ़ाने वाले कारण हैं। बीमारी को कई गुना बढ़ा देते हैं; गुणनफलन कर देते हैं। बीमारी तो अपनी जगह रहती है, और हम बीमारी से बहुत दूर निकल जाते हैं। फिर अपने तक लौटना मुश्किल होता जाता है।
जो जितना पद की यात्रा में निकल गया है, राजनीति में, उसको फिर अपने पर लौटना उतना ही मुश्किल हो जाता है। और अपने पर लौटने में ही समाधान है। इसीलिए तो हमने स्वयं को जानने के लिए नाम दिया--समाधि। समाधि बनता है समाधान से। जहां सब आधियां-व्याधियां समाप्त हो गईं। जहां कोई बीमारी न रही।
ऐसे ही हमारा प्यारा शब्द है--स्वास्थ्य। जो स्वयं में स्थित हो गया वह स्वस्थ। और जो स्वयं में स्थित हो गया, वही समाधिस्थ।
अखिलानंद, यह मेरा फैसला है। और यही सदियों-सदियों से समस्त बुद्धों का फैसला है। और इस फैसले में कभी कोई अंतर नहीं पड़ेगा। यह फैसला शाश्वत है। एस धम्मो सनंतनो।

दूसरा प्रश्न: भगवान,
कोई हजार वर्ष पूर्व आद्य शंकराचार्य ने कुछ प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार दिए थे:
ज्ञातुं न शक्यं च किमस्ति सर्वेर्योषिन्मनो यच्चरित्रं तदीयम्।
का दुस्त्यजा सर्वजनर्दुराशा विद्याविहीनं पशुरस्ति को वा।।
"अर्थात सब लोगों के लिए क्या जानना असंभव है?--स्त्री का मन और उसका चरित्र।
सब लोगों के लिए क्या छोड़ना अत्यंत कठिन है?--दुष्ट वासना।
पशु कौन है?--जो विद्याविहीन है।'
भगवान, यदि ये प्रश्न आज आपसे पूछे जाएं, तो आप क्या उत्तर देंगे?

सहजानंद,
शंकराचार्य ने प्रश्नों का तो उत्तर नहीं दिया, अपनी मनोदशा जरूर जाहिर की है।
प्रश्न तो था: "सब लोगों के लिए क्या जानना असंभव है?' और उत्तर! उत्तर दो कौड़ी का है। स्त्री का मन और उसका चरित्र! जैसे शंकराचार्य इसी को जानने में लगे रहे हों! स्त्री का मन और उसका चरित्र--क्या खाक करोगे जानकर। जानने को कुछ और नहीं? क्यों स्त्री के पीछे पड़े हो? क्या अड़चन है?
इसीलिए मैं निरंतर कहता हूं: दमित चित्त--जिसने किसी तरह अपने को दबा लिया है; जिसने किसी तरह अपनी वासनाओं को नियंत्रण में कर लिया है...। व्यायाम, प्राणायाम, आसन...! किसी तरह मार-पीटकर, उठा-पटक करके, उलटे खड़े होऱ्होकर; ठंड में, गर्मी में, धूप में, ताप में अपने को गला-गलाकर; भूखा-प्यासा रह-रहकर जिसने किसी तरह अपने को सम्हाल रखा है--बस, किसी तरह।
यह वैज्ञानिक तथ्य है कि तीन सप्ताह तक आदमी को भोजन न दिया जाए तो उसकी कामवासना क्षीण हो जाती है। क्योंकि कामवासना के लिए शरीर के पास अतिरिक्त शक्ति होनी चाहिए। शरीर को जितनी शक्ति की जरूरत होती है अपनी दैनिकचर्या को निभाने के लिए--सांस लेना है, खून का चलाना है, उठना है, बैठना है, सोना है, नहाना है--ये जो दैनिक जरूरतें हैं, इन सब के करने के बाद भी शक्ति बचती हो, तो आदमी में उस शक्ति के द्वारा वीर्य ऊर्जा का निर्माण होता है। अगर आदमी को भोजन ही न दिया जाए तो थोड़े दिन में उसकी इकट्ठी की हुई शक्ति पच जाती है। और तब उस भूखे आदमी में अगर वासना क्षीण हो जाए तो कुछ आश्चर्य नहीं। इस पर बहुत प्रयोग किए गए हैं।
तीन सप्ताह तक अगर आदमी को भूखा रखा जाए, फिर उसके सामने तुम सुंदर से सुंदर नग्न स्त्रियों के चित्र रख दो, वह फिक्र ही नहीं करता। उसे कोई रस ही नहीं। कोई प्रयोजन ही नहीं। पड़े रहें चित्र, उठाकर भी नहीं देखता। चित्रों को उठाने के लिए भी तो थोड़ा बल चाहिए! और क्या खाक करना इन चित्रों को उठाकर। अभी तो उसके मन में सबसे बड़ा सवाल भोजन है। अगर इस आदमी से तुम पूछो कि सब लोगों के लिए क्या पाना असंभव है? तो वह कहेगा--भोजन! इससे तुम कुछ भी कहो, इसके उत्तर में रोटी आएगी।
एक कवि जंगल में खो गया। तीन दिन तक भूखा रहा। फिर पूर्णिमा का चांद निकला और वह चकित हुआ! सदा उसे पूर्णिमा के चांद में प्रेयसी का चेहरा दिखाई पड़ता था; सुंदर-सुंदर चेहरे! इस बार दिखी एक रोटी। बड़ा चौंका। आंखें मलकर देखा कि बात क्या हो गई। कहां गईं सुंदर स्त्रियां? रोटी तैर रही है आकाश में! चमकदार रोटी! और उसके मुंह में पानी आ गया कि काश, एक रोटी मिल जाती!
अभी जब पेट भूखा हो...। तुमने तो कहावत सुनी है न: भूखे भजन न होहिं गुपाला! जब गोपाल का भजन भी भूखे नहीं होता, तो क्या तुम सोचते हो--फिल्मी गाना निकलेगा? गोपाल तक का भजन बंद हो जाता है, जब पेट भूखा होता है, तो फिल्मी गाना तो संभव नहीं है; बिलकुल संभव नहीं है।
शंकराचार्य ने प्रश्न का उत्तर नहीं दिया; अपनी मनोदशा जाहिर की है। मैं सोच ही नहीं सकता था! अगर कोई मुझसे पूछता कि सब लोगों के लिए क्या जानना असंभव है? तो इतने बड़े जगत में जहां पशु हैं, पक्षी हैं, पौधे हैं, पहाड़ हैं, चांदत्तारे हैं--क्या-क्या नहीं है! इसमें कुल-जमा एकदम से खयाल उनको आया--स्त्री का मन और उसका चरित्र!
यह खयाल बड़ा सूचक है। यह आद्य शंकराचार्य की चित्तदशा के संबंध में सूचना दे रहा है। जो दबाया था, वही प्रगट हो आया है।
ज्ञातुं न शक्यं च किमस्ति सर्वेर्योषिन्मनो यच्चरित्रं तदीयम्।
मगर स्त्री के मन में ऐसा क्या है? कोई पुरुष के मन से कुछ भिन्न नहीं है। उसका ही दूसरा पहलू है। स्त्री और पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर पुरुष का मन आक्रामक है, तो स्त्री का मन ग्राहक है। इसमें कुछ समझने जैसी बड़ी बात नहीं है; कुछ बड़े रहस्य की बात नहीं है।
और पुरुष और स्त्री के चरित्र में कौन सा भेद है? पुरुष अगर धोखेबाज है, तो स्त्री धोखेबाज है। पुरुष अगर पाखंडी है, तो स्त्री पाखंडी है। पुरुष अगर मुखौटे लगाकर घूमता है, तो स्त्री भी मुखौटे लगाकर घूमती है। दोनों के चरित्र और मन में ऐसा कुछ अंतर नहीं है। एक सिक्के का एक तरफ का हिस्सा है; दूसरा दूसरे तरफ का। जिसने अपने को समझ लिया, उसने सबको समझ लिया। उसने स्त्री को भी समझ लिया, पुरुष को भी समझ लिया।
सहजानंद, मैं यह उत्तर न दे सकूंगा। मैं तो एक ही चीज को जानता हूं जो जाननी असंभव है, और वह है स्वयं को। और स्वयं को जानना इसलिए असंभव है कि वहां ज्ञाता और ज्ञेय का भेद गिर जाता है।
दुनिया में ज्ञान के लिए तीन चीजें जरूरी हैं: ज्ञाता होना चाहिए; ज्ञेय होना चाहिए; और दोनों के बीच में जो संबंध बनता है उसका नाम ज्ञान है। लेकिन जहां स्वयं का जगत शुरू होता है वहां तो एक ही बचा। ज्ञाता भी वही, ज्ञेय भी वही, ज्ञान भी वही। इसलिए यह सर्वाधिक कठिन मामला है। यह सर्वाधिक असंभव मामला है। असंभव से ऐसा मत समझना कि घटता नहीं। घटता है। लेकिन मूलतः असंभव है। फिर भी घटता है! इसलिए आत्मज्ञान चमत्कार है, करिश्मा है। पानी पर चलना कोई करिश्मा नहीं, कोई तरकीब निकाली जा सकती है। और हवा में उड़ना भी कोई करिश्मा नहीं, कोई तरकीब निकाली जा सकती है। आखिर पक्षी उड़ ही रहे हैं। मछलियां तैर ही रही हैं। कोई तरकीब निकाली जा सकती है। जल्दी ही आदमी कोई तरकीब निकाल लेगा। इनमें कुछ चमत्कार नहीं है। विज्ञान इन कामों को हल कर देगा।
चमत्कार तो है स्वयं को जानना, क्योंकि वह असंभव घटना है। जहां एक ही बचता है--कैसे जानो? किसके द्वारा जानो? कौन जाने? किसको जाने? इसलिए तो बोधिधर्म का प्रसिद्ध उत्तर मुझे बहुत प्यारा है।
जब बोधिधर्म चीन पहुंचा और सम्राट वू ने उसका स्वागत किया, और सम्राट वू ने कुछ प्रश्न उससे किए। प्रश्न ऐसे थे कि बिलकुल संगत थे; सारगर्भित थे। लेकिन बोधिधर्म ने जो उत्तर दिए, बड़े अटपटे थे।
असली फकीर अटपटे उत्तर देते हैं। यह आद्य शंकराचार्य का उत्तर तो बहुत साधारण है; सड़क-छाप है! यह तो कोई भी पान की दुकान पर बैठे हुए लोग उत्तर दे देंगे। कि भैया, स्त्री का मन जानना बड़ा कठिन! और स्त्री का चरित्र पहचानना बड़ा कठिन! हालांकि स्त्रियां हंसती हैं कि हद हो गई ये बुद्धुओं को, इन बुद्धुओं को तो देखो! स्त्रियों का मन नहीं समझ पा रहे! स्त्रियों का चरित्र नहीं समझ पा रहे! इसमें मामला क्या है? इसमें इतना क्या गुह्य, इतना क्या रहस्यपूर्ण है?
बात सब सीधी-सादी है। उलझा ली है खुद ही। स्त्री से बचना चाहा है, तो समझोगे कैसे? स्त्री से भागे हो, तो समझोगे कैसे? स्त्री से मुंह चुरा लिया है, तो भागोगे कैसे? हो गए रणछोड़दासजी, अब स्त्री को समझोगे कैसे?
यह तो कोई उत्तर नहीं है। यह उत्तर तो दो कौड़ी का है। किसी ने दिया हो--आद्य शंकराचार्य ने दिया हो या किसी ने दिया हो--मैं आदमियों की फिक्र नहीं करता। यह उत्तर दो कौड़ी का है; मैं करूं क्या?
यह उत्तर बहुत साधारण है। अति साधारण है। ग्रामीण है। यह गांव का कोई गंवार ही दे सकता है यह उत्तर तो। इसमें क्या बात है? लेकिन बोधिधर्म ने जो उत्तर दिया, वह सोचने जैसा है।
वू ने उससे पूछा कि मैंने बहुत से विहार बनवाए, मंदिर बनवाए; बुद्ध की लाखों प्रतिमाएं बनवाईं। लाखों भिक्षुओं को मैं रोज भोजन देता हूं। अनाथालय खुलवाए, चिकित्सालय खुलवाए। वृक्ष लगवाए रास्तों पर कि राहगीरों को छाया मिले। प्याउएं खुलवाईं कि प्यासों को पानी मिले। विधवा आश्रम खुलवाए, वृद्धाश्रम खुलवाए। इस सबका मुझे क्या पुण्य मिलेगा?
बोधिधर्म ने कहा, कुछ भी नहीं। पुण्य की तो तू बात ही छोड़। तू सातवें नर्क में पड़ेगा।
यह बोधिधर्म मेरे जैसा आदमी रहा होगा--सीधा-साफ; दो टूक। उठाया लट्ठ और दे मारा। सम्राट वू बहुत चौंका। क्योंकि इसके पहले बहुत और संत-महात्माओं से मिला था और उन सबने कहा था कि सातवां स्वर्ग निश्चित है! इतना पुण्य--किसने किया है! कभी किसी ने नहीं किया।
वू ने ही बुद्ध-धर्म को चीन में स्थापित किया। सारे चीन को बौद्ध बनाया वू ने। तो बौद्ध भिखारी, बौद्ध भिक्षु, बौद्ध महात्मा, बौद्ध संत कैसे इसकी प्रशंसा न करते! उसी की रोटी पर तो जीते थे। उसी की धर्मशालाओं में तो रहते थे। उसी के मंदिरों में तो पुजारी थे। वही तो उनका जीवन-आधार था। तो उसकी प्रशंसा करते थे; खुशामद करते थे।
लेकिन बोधिधर्म जैसे लोग सीधी-सीधी बात कहते हैं। जैसी होती है, वैसी ही कहते हैं। सम्राट बहुत सुसंस्कृत आदमी था। छिपा गया अपनी चोट को। उसने फिर पूछा कि खैर, कोई बात नहीं। लेकिन धार्मिक आचरण--सुबह उठकर बुद्ध की पूजा; दिन में शास्त्र का अध्ययन-मनन; इस सब में कुछ तो पवित्रता होगी?
बोधिधर्म ने कहा, पवित्रता? दुनिया में पवित्रता-अपवित्रता जैसी कोई चीज है ही नहीं। सब समान है। न कुछ पवित्र है--न कुछ अपवित्र। न कोई संत है--न कोई पापी।
अब जरा बात चोट कर गई, और गहरी हो गई। वू ने पूछा, तो फिर मैं एक बात पूछना चाहता हूं। तुम कौन हो? नाराज हो गया होगा। उतारकर रख दी होगी खोल जो पहन रखी थी--सुसंस्कृति की, संस्कार की, श्रेष्ठता की, सम्राट होने की। भूल गया होगा। क्योंकि बोधिधर्म करता गया चोट पर चोट--कि नर्क में पड़ोगे; कुछ पवित्र नहीं है; कुछ पुण्य नहीं है। ये सब तुमने जो किया--व्यर्थ है; सब बकवास है। यह कहां का शास्त्र; कहां का अध्ययन; कहां का मनन? कैसा निदिध्यासन? यह चोट इतनी हो गई कि वह भूल गए एक क्षण को। गुस्से में पूछा, तो यह बताओ कि तुम कौन हो?
बोधिधर्म हंसा और कहा कि मुझे कुछ भी पता नहीं। मैं नहीं जानता हूं।
सुकरात कहता है कि मैं इतना ही जानता हूं कि मैं कुछ भी नहीं जानता।
उपनिषद कहते हैं, जो कहता है कि मैं जानता हूं, जानना कि नहीं जानता और जो कहे कि मैं नहीं जानता हूं, जानना कि जानता है।
बोधिधर्म के इस छोटे से उत्तर में--कि मैं नहीं जानता; मुझे कुछ पता नहीं--अज्ञान नहीं है; परम ज्ञान है। उपनिषद का सारा सार आ गया। सारे सुकरातों का सार आ गया। लेकिन वू नहीं समझा। कौन समझेगा ऐसी बात को!
तो वू ने कहा, जब तुम अपने को ही नहीं जानते, तो मैंने नाहक मेहनत की जो वर्षों तुम्हारी प्रतीक्षा की।
बोधिधर्म यह सुनते ही लौट पड़ा। बाद में वू बहुत पछताया। जब उसने और बौद्ध भिक्षुओं से पूछा तो उन्होंने कहा, आप समझे नहीं। उसने बात बड़ी गहरी कही, बड़े पते की कही। क्योंकि जब भीतर कोई पहुंचता है तो वहां जानने वाला ही नहीं बचता। तो कैसे कहो कि मैंने जाना! कौन कहे? दावा नहीं हो सकता।
उसने इतना ही कहा कि मैं वहां पहुंच गया हूं, जहां दावे खो जाते हैं। मैं वहां बैठा हूं, जहां न जानने वाला है, न जानने को कुछ है; जहां सब सन्नाटा है; जहां परम शून्य है। उसने निर्वाण की घोषणा कर दी, आप समझे नहीं।
फिर तो वू बहुत पछताया। उसने बार-बार संदेश भेजे। लेकिन बोधिधर्म ने कहा, तुम चूक गए। जिस तरफ से मैं लौट पड़ा, लौट पड़ा। अब वापस नहीं आऊंगा। तुम्हें आना हो, तो तुम कभी भी आ सकते हो।
वह सम्राट वू की जो सीमा थी उसके पार ही एक पहाड़ी पर रहा। सम्राट वू को ही उसके दर्शन को जाना पड़ा। और उसने कहा कि मुझे भी उस जगह ले चलो, जहां तुम हो।
तो उसने कहा कि कल सुबह जल्दी आ जाना। तीन बजे रात आ जाना। अकेले आना। खयाल रहे, अकेले आना!
जब सीढ़ियां उतर रहा था उस पहाड़ी की, तब उसने फिर चिल्लाकर कहा, कि ध्यान रहे, अकेले आना। अपने मन को भी साथ मत लाना! बिलकुल अकेले आना!
वू ने कहा, यह आदमी तो पागल मालूम होता है। अब अपने मन को साथ मत लाना--यह मैं कैसे करूंगा! और अब बिलकुल अकेले आना...।
वह कभी अकेला कहीं गया नहीं था। उसका पहरेदार, तलवार नंगी लिए उसके पास होता था। और यह आदमी खतरनाक दिखता है। और हाथ में डंडा भी रखता है। अरे, खोपड़ी में मार दे! तीन बजे रात; इस पहाड़ी पर कोई भी नहीं! कई दफा सोचा--जाऊं; कई दफा सोचा--नहीं जाऊं। रातभर सो भी नहीं सका। फिर यह भी लगा कि कहीं चूक न जाऊं। अरे, मारेगा ही बहुत से बहुत! एकाध डंडा ही खा लूंगा, और क्या!
मगर रस ऐसा जगा था कि गया। बैठा बोधिधर्म के सामने। बोधिधर्म ने कहा, आंख बंद कर और भीतर खोज। और जैसे ही तुझे मिल जाए कि यह रहा "मैं', मुझे खबर कर देना। उसी वक्त उसका फैसला कर दूंगा। वहीं खतम कर दूंगा। तू पकड़ ले और मैं उसका खातमा कर दूं। यह मैं डंडा लिए तेरे सामने बैठा हूं।
वू ने आंख बंद कीं। पहले तो डरा भी कि यह डंडा लिए सामने बैठा है। सो भी न सका डर के कारण, झपकी भी न खा सका। झपकी भी आ रही थी। रातभर सोया नहीं था। मगर यह डंडा मार देगा। तो सजग बैठा रहा। रीढ़ सीधी किए। सजग। भीतर बहुत तलाश की। कहीं कोई "मैं' मिले ही न! सुबह हो गई। सूरज निकल आया। सूरज की किरणें जब उसके चेहरे पर पड़ने लगीं, उसका चेहरा ऐसा आह्लादित था, जैसे भीतर से भी किरणें उग आईं, भीतर भी सूरज उग आया!
बोधिधर्म ने उसे हिलाया और कहा कि अब उठो। नहीं मिला न! मैं तुम्हारे चेहरे से ही देख रहा हूं कि नहीं मिला।
वू ने कहा, मत छेड़ो। बाधा मत डालो। मैं उस सन्नाटे में हूं, उस शांति में हूं, जो मैंने कभी नहीं जानी। "मैं' तो नहीं मिला, लेकिन जो मिला है, उसको कोई शब्द में बांध नहीं सकता।
झुका और बोधिधर्म के चरण छुए और कहा कि अब मैं समझा तुम्हारा मतलब। अब समझा तुम्हारा राज, जो तुमने कहा कि मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूं। मैं भी नहीं जानता। मगर इस न जानने में सारा जानना छिपा हुआ है।
तो अगर तुम मुझसे पूछो सहजानंद, तो मैं कहूंगा: स्वयं को जानना सर्वाधिक असंभव है। क्या स्त्री का मन जान कर करोगे? स्त्रियों को जानने दो। यह शंकराचार्य को क्या पड़ी! ये अपना ही मन जानें! ये अपना ही चरित्र समझ लें! इनको स्त्री के चरित्र से क्या लेना-देना है?
यह स्त्रियों में अतिशय उत्सुकता, रुग्ण-चित्त का लक्षण है।
किसी स्त्री से पूछो, तो वह कहेगी, पुरुष का मन जानना असंभव। और उसका चरित्र जानना असंभव! बकरे से पूछो; वह कहेगा--बकरी का! बकरी से पूछो; वह कहेगी--बकरे का! गौ-माता से पूछो; वह कहेगी--सांड का मन और चरित्र जानना बड़ा मुश्किल! नंदी बाबा से पूछो; वे कहेंगे कि और सब तो ठीक है, मगर गौ-माता का चरित्र और मन बिलकुल समझ में नहीं आता!
यह भी कोई उत्तर हुआ! यह थोथी सी बात उत्तर नहीं है।
और उन्होंने कहा कि "सब लोगों के लिए क्या छोड़ना अत्यंत कठिन है?' वही बात फिर आ गई!--"दुष्ट वासना!' वही घाव है। हर प्रश्न के उत्तर में वही निकलेगा। मवाद जो भरी है।
"दुष्ट वासना...!'
नहीं; वासना में क्या रखा है। वासना तो यूं चली जाती है, जैसे अंधेरा चला जाता है। दीया जलाना आना चाहिए। दीया जलाओ--अंधेरा गया। हां, अंधेरे से लड़ोगे, तो नहीं जाएगा। बहुत कठिन हो जाएगा। फिर कहोगे--दुष्ट अंधेरा! हटता ही नहीं। मैं कितनी पहलवानी कर रहा हूं। डंड-बैठक लगाता हूं; घूंसाबाजी करता हूं--मगर सब बेकार। अंधेरा हटता ही नहीं। तिलभर नहीं सरकता। तलवार ले आओ; तलवारें चलाओ। अंधेरा कटता नहीं तलवारों से।
लेकिन एक छोटा सा दीया जलाओ--और वह शक्तिशाली अंधेरा कहां गया, पता नहीं चलता। खोजे से नहीं मिलता। हटाना तो दूर, तुम अगर उसे खोजना भी चाहो, तो न खोज पाओगे।
"दुष्ट वासना...!'
इसको दुष्ट कहने में सिर्फ अपनी पीड़ा छिपी हुई है। हटती नहीं है, इसलिए दुष्ट कह रहे हैं। हम गाली तभी देते हैं, जब हम हारे हुए होते हैं। हम गाली उसको देते हैं, जिससे हम हारे हुए होते हैं। हम नाराज उस पर होते हैं, जिससे हम परेशान होते हैं।
अब ये वासना से परेशान रहे होंगे, पीड़ित रहे होंगे। धक्का मारते होंगे, हटती न होगी; लौट-लौट आती होगी। इधर से हटाते होंगे, इधर से आती होगी। सामने के दरवाजे से निकलते होंगे, पीछे के दरवाजे से आती होगी। मगर आती होगी। तो कहते हैं--दुष्ट!
मगर इसमें वासना का कोई कसूर नहीं है। अंधेरे का क्या कसूर है, अगर तुम दीया न जलाओ? वासना तो केवल अभाव है--ध्यान का अभाव, होश का अभाव, जागरण का अभाव। वासना यानी मूर्च्छा। वासना यानी नींद। जाग जाओ; फिर कहां है नींद? जागकर कभी नींद पाई है? दीया जलाकर कभी अंधेरा पाया है? प्रकाश का अभाव मात्र है और दीया जलाना एकमात्र उपाय है। फिर तुम गाली न दोगे वासना को।
तो मैं यह न कहूंगा कि क्या छोड़ना अत्यंत कठिन है?--दुष्ट वासना तो नहीं! वासना में क्या दुष्टता है?--कुछ भी नहीं और वासना में तो कोई बल ही नहीं है; उसको छोड़ना असंभव कैसे हो सकता है? हां, अगर लड़ोगे तो तुम्हारी गलती है।
फिर छोड़ना क्या कठिन है?--मूर्च्छा, बेहोशी। वह जो हम जीए जा रहे हैं। यंत्रवत, वह जो हम प्रमाद से भरे जीए जा रहे हैं, उसे छोड़ना कठिन है। जागरण को लाना कठिन है। दीए को जलाना कठिन है।
महावीर से किसी ने पूछा, मुनि कौन? अमुनि कौन?
महावीर ने बड़े प्यारे उत्तर दिए। महावीर ने कहा, असुत्ता मुनि--जो सोया नहीं है, वह मुनि। सुत्ता अमुनि--और जो सोया है, वह अमुनि।
बस, सारे धर्म की बात हो गई। हजारों गुलाबों का इत्र जैसे निचोड़ दिया एक बूंद में! सारी सुगंध आ गई।
छोड़ना कठिन है--मूर्च्छा। और छोड़ने का एक ही उपाय है--ध्यान।
पहले प्रश्न के उत्तर में मैंने तुमसे कहा, वही मैं दूसरे प्रश्न के उत्तर में तुमसे कह रहा हूं। और ध्यान रखना: शंकराचार्य ने भी पहले प्रश्न के उत्तर में वही कहा, जो वे दूसरे प्रश्न के उत्तर में कह रहे हैं। वही स्त्री--अब कामवासना बन गई, अब दुष्ट वासना बन गई।
मैं तो एक ही उपाय जानता हूं जीवन रूपांतरण का और वह ध्यान है। ध्यान आ जाए, तो जो नहीं जाना जा सकता, वह जान लिया जाता है; और जो नहीं हटाया जा सकता, वह हट जाता है।
और तीसरा उन्होंने पूछा, "पशु कौन है!--जो विद्या-विहीन है।'
वह बात भी बहुत साधारण हो गई।
पशु शब्द को समझो, तो खयाल में आ जाएगा। मेरा तो उत्तर वही होगा। प्रश्न तुम लाख करो--उत्तर तो एक ही है। पशु का अर्थ होता है--पाश में बंधा। जो मूर्च्छित है, वह पशु है। वह पाश में बंधा है। हजार तरह के जंजालों में बंधा है। जालों में बंधा है। लोभ है, मोह है, क्रोध है, काम है। पाश पर पाश; पर्त पर पर्त। जंजीरों पर जंजीरें पड़ी हैं। और तुम लाख विद्या इकट्ठी कर लो; सारे वेद कंठस्थ कर लो; महापंडित हो जाओ--क्या होगा?
महापंडित ढब्बूजी नदी के किनारे रेत में बैठे शराब पी रहे थे। वहां से एक साधु निकला। रहे होंगे--आद्य शंकराचार्य! उसने ढब्बूजी को दूर से ही देखकर कहा, बच्चा, मदिरापान नहीं करते! मदिरापान न कर। राम-राम भज। भज गोविंदम् मूढ़मते!
ढब्बूजी ने साधु को नमस्कार किया, किंतु पीना जारी रखा। पंडित तो ऐसा ही होता है। पांडित्य की बातें करता जाता है और वही मूर्च्छित ढंग जीने का! वही शराब, वही जुआ। इधर वेद भी दोहराए चला जाता है, भीतर वासना को भी जीए चला जाता है। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। वेद क्या वासना को थोड़े ही काट सकते हैं?
साधु बोला, सुनता नहीं बच्चा! कहा न मैंने, इस बोतल को फेंक नदी में। ईश्वर का स्मरण कर। कसम खा ले कि अब कभी न पीऊंगा।
ढब्बूजी ने बोतल उठाई; उसकी सारी शराब गिलास में उंड़ेल दी; बोतल को जोर से नदी में फेंककर पुनः शराब पीने लगे।
पंडित तो ऐसा ही होता है। वह तरकीबें निकाल लेता है!
विद्या से क्या होगा? गीता रट लोगे; तोतों की तरह दोहराने लगोगे। इससे कुछ जीवन में क्रांति होने वाली है?
साधु से न रहा गया। वह फिर बोला, मदिरापान त्याग दे प्राणी! राम-राम कह। उसी से तुझे कल्याण मिलेगा। कम से कम मुझे यह तो बता कि यह गंदी आदत तुझे कैसे लग गई?
ढब्बूजी ने कहा कि मेरे चचेरे भाई के मामा के दोस्त के पड़ोसी की सुंदर युवा लड़की एक कार दुर्घटना में मर गई, इसलिए मैं शराब पी रहा हूं।
साधु बोले, वाह, वाह! क्या बात कही! चचेरे भाई के मामा के दोस्त के पड़ोसी की कन्या की मृत्यु से तुम्हारा क्या संबंध? राम-राम, राम-राम!
ढब्बूजी ने जवाब दिया, चचेरे भाई के मामा के दोस्त के पड़ोसी की लड़की से तो मेरा कुछ संबंध हो भी सकता है। मगर आप तो बिलकुल अजनबी हैं। दूर की जान-पहचान वाले भी नहीं हैं। आपके द्वारा मुझे शराब पीने से रोके जाने का क्या संबंध है? फिर बोतल को नदी में फेंकने से मदिरापान का क्या संबंध है? यह तो देख ही चुके कि बोतल फेंक दी। इससे कोई मदिरापान रुक जाएगा? और यह भी ठीक।
...मगर मेरे कल्याण और राम-राम, राम-राम में कैसे कोई संबंध हो सकता है? राम-राम कहने से मुझे कल्याण कैसे मिलेगा? अरे, मेरे दोस्त, कल्याण को मरे तो चार वर्ष से अधिक हो चुके! अधिक शराब पीने के कारण उसकी मृत्यु हो चुकी है।
पंडित पढ़ता कुछ, कहता कुछ, जीता कुछ! पंडित तो एक धोखे में होता है।
विद्याविहीन--पशु! तो तुम अगर विद्या से अपने को भर लोगे, तो विद्या भरे पशु हो जाओगे--और क्या होगा? विद्या से लदे पशु हो जाओगे--और क्या होगा? जैसे गधे पर गीता रखी! मगर इससे क्या गधे में कोई फर्क पड़ने वाला है? जरा डंडा मारो--पता चल जाएगा। वही ढेंचू-ढेंचू! सब गीता के मंत्र वगैरह नहीं कुछ याद आएंगे। लाद दो गीता, कि कुरान शरीफ, कि बाइबिल, कि तालमुद--सबको लाद लेगा। अरे, गधा ही है, वह क्या इनकार करेगा? मगर विद्या से लदा हुआ गधा भी गधा ही होगा।
प्रदर्शनी में रखे एक ऐसे कंप्यूटर की खबर सुनकर जो तीनों कालों की जानकारी रखता है, महापंडित ढब्बूजी भी उसे देखने गए और परीक्षण के लिहाज से उन्होंने अपने स्वर्गीय पिता के संबंध में सवाल पूछा कि इस समय मेरे पिता किस स्थान में हैं और वे क्या कर रहे हैं?
जवाब मिला, आपके पिता गंगा के तट पर ऋषिकेश में पद्मासन लगाए बैठे हैं और अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य की दीक्षा देते हुए गायत्री-मंत्र का जाप कर रहे हैं।
ढब्बूजी ने प्रदर्शनी के मैनेजर से कहा, बिलकुल गलत। मेरे पिता का स्वर्गवास तो आज से आठ वर्ष पूर्व हो चुका है। सरासर धोखा-धड़ी हो रही है! आपका कंप्यूटर त्रिकालज्ञ नहीं है।
मैनेजर बोला, नाराज मत होइए। सवाल को दूसरे ढंग से पूछकर देखिए। हो सकता है, आपको सही जवाब मिल जाए।
ढब्बूजी ने प्रश्न को दूसरे ढंग से इस तरह पूछा, मेरे मां के पति इस समय कहां हैं और वे क्या कर रहे हैं?
कंप्यूटर ने उत्तर दिया, आपके मां के पति की मृत्यु को तो आठ साल हो चुके! वे तो स्वर्गवासी हो गए हैं!
प्रदर्शनी के मैनेजर ने मुस्कुराकर कहा, कुछ समझने की कोशिश करिए! महोदय, सरासर धोखा-धड़ी मैं क्यों करूंगा! और मैं क्या करूंगा? वह तो पहले ही आपके पिता के साथ कोई कर चुका है!
ढब्बूजी क्रोध में आकर गरजे, बकवास बंद करो। मुझे उल्लू मत बनाओ।
मैनेजर की जगह इस बार त्रिकालज्ञ कंप्यूटर ने जवाब दिया, अजी, हम भला क्यों आपको उल्लू बनाएंगे! वह काम तो ईश्वर ही पहले कर चुका है।
विद्या से क्या होगा? जान लो सारे शास्त्र; तो भी तुम पशु ही रहोगे। पशु से तो तुम तभी मुक्त हो पाओगे, पशुता से तुम तभी मुक्त हो पाओगे, जब तुम्हारे सारे बंधन गिर जाएं और बंधन सब मूर्च्छा के हैं।
ध्यान के अतिरिक्त कोई उत्तर नहीं है। तुम हजार सवाल करो सहजानंद, मेरा उत्तर तो एक ही है--ध्यान। ध्यान के बिना तुम पशु हो। ध्यान के बिना तुम कभी मनुष्य न हो पाओगे और ध्यान आया तो सब आया। क्योंकि ध्यान तुम्हारे भीतर छिपे हुए जीवन-अमृत के झरनों को फोड़ देता है।
तो मेरा तो एक ही उत्तर है। सबसे कठिन बात यही है--ध्यान। सबसे अत्यंत कठिन बात यही है--गैर-ध्यान को छोड़ना। और पशु कौन है?--जो ध्यान-विहीन है।
विद्या पर मेरा जोर नहीं है। विद्या तो जानकारी है--जानना नहीं, ज्ञान नहीं। ध्यान ही एकमात्र वास्तविक ज्ञान है--और वही मुक्ति है।

आज इतना ही।


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