कुल पेज दृश्य

शनिवार, 6 मई 2017

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-10



ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
बुद्धत्व और पांडित्य-(प्रवचन-दसवां)

दसवां प्रवचन; दिनांक २० सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
किसी को चैन से देखा न दुनिया में कभी मैंने।
इसी हसरत में कर दी खतम सारी जिंदगी मैंने।।
कहते हैं लोग मौत से भी बदतर हैं इंतिजार।
बस राह देखते ही गुजारी जिंदगी मैंने।।
उठाए क्यों लिए जाते हो मुझको बागे-दुनिया से।
नहीं देखी है दिल भर के बहारे जिंदगी मैंने।।
लोग घबरा कर यूं ही कह देते हैं कि मर जाएं।
मर के भी लेकिन सुकूं पाते नहीं देखा मैंने।।
जब ये आसी उठाएंगे फिरदौस में जाम।
मय बदल जाएगी पानी में सुना है मैंने।।
आग दोजख की भी अर्क ए शर्म से बुझ जाएगी।
परेशां आदमी को देख ये न सोचा मैंने।।
सब तरफ कब्रें तमन्नाओं की बनी हैं यहां।
एक बस्ती को भी बसते नहीं देखा मैंने।।
इस जहां में तू कैसे बेपिए मदहोश रहता है?
ऐ साकी! आज तक देखा न तुझसा आदमी मैंने।।
बता तू कौन है इंसान या कोई फरिश्ता है?
या देखा है खुदा को ख्वाब में बना आदमी मैंने।।

अमृत प्रिया!

जन्म के साथ जीवन नहीं मिलता; जन्म के साथ जीवन की केवल संभावना मिलती है। उस संभावना को वास्तविक बनाए बिना न कोई आनंद है, न कोई सुगंध है; न फूल खिलते हैं, न वसंत आता है, न पक्षी गीत गाते हैं; न सुबह होती है, न आत्मा के आकाश में तारों की चमक! कुछ भी नहीं! अंधेरा ही अंधेरा उदासी ही उदासी।
लेकिन हम इस भ्रांति में ही जीते हैं कि जन्म पा लिया, तो जीवन पा लिया। जैसे कोई बीज को लिए बैठा रहे--बैठा रहे--बैठा रहे--तो बीज में न तो सुगंध होगी, न फूल खिलेंगे। और उदास होगा वैसा आदमी। हालांकि बीज में फूल भी छिपे हैं, सुगंध भी छिपी है। मगर जो छिपा है, उसे प्रकट करना होगा। जो अव्यक्त है, उसे व्यक्त करना होगा। जो संभावित है, उसे वास्तविक करना होगा। जो स्वप्न है, उसे सत्य करना होगा।
इतने लोग हैं पृथ्वी पर और इतनी गहन उदासी है। कारण एक है, छोटा-सा है: जन्म को जीवन का पर्याय समझ लिया है। जन्म के साथ तो अवसर मिलता है जीवित होने का; जीवन नहीं मिलता। इसलिए इस देश में हम उस व्यक्ति को ब्राह्मण कहते थे, जो द्विज है। द्विज का अर्थ है, जिसने दुबारा जन्म पा लिया।
एक जन्म तो मिलता है मां-बाप से। उसका कोई बहुत मूल्य नहीं है। तुम बीज की तरह पैदा होते हो और बीज की तरह ही मर जाओगे--तो जिंदगी में कैसे गीत! कैसी बहार! कुछ भी नहीं। खाली के खाली आए, खाली के खाली गए! रिक्त हाथ आए, रिक्त हाथ गए। पीड़ा होगी। संताप होगा। तनाव होगा। बेचैनी होगी। लेकिन कोई उत्सव नहीं होगा। उत्सव असंभव है।
द्विज होना होगा। दुबारा जन्म लेना होगा। एक जन्म मां-बाप ने दिया, एक तुम्हें स्वयं लेना होगा। स्वयं जन्म लेने की प्रक्रिया का नाम ही संन्यास है। संन्यस्त हुए बिना कोई ब्राह्मण नहीं होता।
जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता। जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं। फिर क्या करते हैं अपनी जीवन ऊर्जा के साथ--इस पर निर्भर करता है। सौ में से निन्यानबे प्रतिशत लोग तो शूद्र की ही भांति मर जाते हैं; उनका दूसरा जन्म नहीं हो पाता।
और ध्यान रख लेना--ब्राह्मण घर में पैदा होने से कोई ब्रह्म नहीं होता। जब तक भीतर ब्रह्म का जन्म न हो जाए, तब तक कोई न ब्रह्म है, न ब्राह्मण है। बुद्ध ब्राह्मण हैं। जीसस ब्राह्मण हैं। मोहम्मद ब्राह्मण हैं। लेकिन ब्राह्मण घर में पैदा होने से कोई ब्राह्मण नहीं होता।
बुद्ध ने कहा है, जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण है। और ब्रह्म कहीं बाहर तो नहीं। ब्रह्म तुम में छिपा बैठा है।
बहुत पुरानी कहानी है। ईश्वर ने पृथ्वी बनाई, संसार रचा, तब वह बीच बाजार में ही रहता था संसार के। कुछ अनुभव न था संसार का। स्वाभाविक था कि उसने जो रचा था, उसके बीच में रहा। लेकिन लोग उसे परेशान करते। शिकायतों पर शिकायतें! अभी भी लोग वही करते हैं मंदिरों में, मस्जिदों में, गुरुद्वारों में, गिरजों में। कहते हैं, प्रार्थना; करते हैं शिकायत! हजार शिकवे ले कर जाते हैं--ऐसा होना; ऐसा नहीं होना चाहिए; ईश्वर को सलाह देने जाते हैं कि कैसा होना चाहिए!
और जो सलाह देते हैं, अगर गौर से सुनें, तो बड़ी अदभुत सलाह देते हैं।
इमरसन कहा करता था, मैंने बहुत लोगों की प्रार्थनाएं सुनीं और यही पाया कि सब परमात्मा से कहते हैं कि हे प्रभु, दो और दो मिल कर चार न हों। दो और दो मिल कर पांच हो जाएं!
दुनिया में सब मरते हैं और आदमी प्रार्थना करता है, हे प्रभु, मैं कभी न मरूं। यह दो और दो को पांच करने की कोशिश है।
जिंदगी में चीजें आती हैं और जाती हैं। और लोग प्रार्थना करते हैं कि जो मुझे मिला है, सदा मेरा रहे; थिर रहे। जवानी है, तो जवानी। बुढ़ापा न आए। स्वास्थ्य है, तो बीमारी न आए। धन है, तो निर्धनता न आए। जीत रहा हूं, तो हार न जाऊं। और जानते हैं सब कि सभी को हारना है। और सभी की मौत आज नहीं कल आने ही वाली है। फिर भी दो और दो पांच हो जाएं...!
जो नहीं हो सकता है--वही हम मांगते फिरते हैं। जो हो सकता है, वह तो हो ही रहा है। उसको मांगने की जरूरत नहीं है।
अभी भी लोग वही कर रहे हैं, तो जब परमात्मा बाजार में ही रहता रहा होगा, लोगों ने उसका जीना हराम कर दिया होगा! अभी भी भक्तों ने उसका जीना हराम किया हुआ होगा। इनकी सबकी अगर वह प्रार्थनाएं सुनता होगा, तो तुम सोचो, पगला गया होगा! आत्महत्या कर ली होगी! कभी का समाप्त हो गया होगा।
लोग दिन-रात चौबीस घंटे उसके द्वार पर खड़े रहते। और ऐसी-ऐसी प्रार्थनाएं, जो एक दूसरे के विपरीत पड़तीं! पूरी भी करे, तो कैसे करे! कोई चाहता है कि आज वर्षा हो, क्योंकि उसने बीज बोए हैं। और कोई चाहता है: आज वर्षा न हो, क्योंकि उसने कपड़े रंगे हैं और कपड़े सुखाने हैं। कोई चाहता है, आज धूप निकले। और कोई चाहता है, आज धूप न निकले। किस-किस की चाहें पूरी हों। कैसे पूरी हों? चाहें विरोधाभासी हैं।
इस पृथ्वी पर चार अरब आदमी हैं, चार अरब चाहें हैं--सबके विरोध में। सत्तर करोड़ लोग इस देश में हैं। प्रत्येक व्यक्ति प्रधानमंत्री होना चाहता है; राष्ट्रपति होना चाहता है! यह कैसे होगा? आपाधापी होगी। दौड़धूप होगी। खींचतान होगी। उपद्रव होगा। इसलिए तो राजनीति उपद्रव बन जाती है। राजनीति संघर्ष हो जाती है। क्योंकि सारे महत्वाकांक्षी एक दूसरे की गर्दन पर सवार है; एक दूसरे के सिर पर पैर रख कर चढ़ जाना चाहते हैं पदों पर! खींचातानी होगी। उठा पटक होगी।
परमात्मा घबड़ा गया। कहानी कहती है--बहुत घबड़ा गया! उसने अपने संगी-साथियों को बुलाया। पूछा कि क्या करूं? ऐसी कोई जगह बताओ, जहां छिप रहूं।
किसी ने कहा, आप हिमालय पर छिप जाओ--गौरीशंकर पर!
परमात्मा ने कहा, तुम्हें पता नहीं, अभी थोड़ी-ही देर में हिलेरी और तेनसिंग पैदा होंगे और वे गौरीशंकर पर पहुंच जाएंगे। और एक दहा एक आदमी पहुंचा कि फिर कतार लग जाएगी। यह कुछ स्थायी हल न हुआ। और एक दफा पता चल गया कि मैं गौरीशंकर पर हूं कि बसें पहुंच जाएंगी, होटलें खुल जाएंगी, ट्रेनें चलने लगेंगी। हेलीकाप्टर उतरने लगेंगे। वही उपद्रव हो जाएगी। वही बाजार भर जाएगा। कुछ और सोचो!
किसी ने कहा, चांद पर क्यों नहीं चले जाते? ईश्वर ने कहा कि वह और समझो कि थोड़ी देर और बच रहूंगा। लेकिन कितनी देर! अनंत काल ईश्वर के सामने है। दिन दो दिन के बचने का सवाल नहीं।
तब एक बूढ़े सलाहकार ने ईश्वर के कान में सलाह दी। और ईश्वर ने कहा, ठीक। यह बात ठीक।
उस बूढ़े ने क्या सलाह दी? उसने कहा, आप आदमी के भीतर छिप रहो। वहां आदमी कभी न जाएगा। सब जगह जाएगा--गौरीशंकर चढ़ेगा, चांद पर पहुंचेगा, मंगल पर पहुंचेगा, तारों पर पहुंचेगा--ऐसी कोई जगह नहीं छोड़ेगा; जहां-जहां तक संभावना है वहां-वहां तक जाएगा। सिर्फ एक जगह नहीं जाएगा--अपने भीतर नहीं जाएगा। ईश्वर ने कहा, यह बात जंचती है।
और अगर कभी कोई अपने भीतर जाएगा भी, तो अपने भीतर जाते-जाते इतना निर्मल और शांत हो जाएगा कि तुम्हें परेशान नहीं करेगा। कोई बुद्ध जाएगा; कोई महावीर, कोई लाओत्सू, कोई कन्फ्यूशियस, कोई जरथुस्त्र--इनसे तो कुछ पीड़ा न होगी। इनका तो आना आनंद ही होगा। ये अपने साथ नृत्य लाएंगे। ये अपने साथ गीत लाएंगे।
कृष्ण की बांसुरी बजे भीतर, तो ईश्वर को कोई अड़चन नहीं हो सकती। बुद्ध की वाणी झरे भीतर, तो ईश्वर को क्या अड़चन हो सकती है! ये कुछ मांगेंगे नहीं। ये आएंगे, तो कुछ चढ़ाएंगे। ये आएंगे, तो अपने को चढ़ाएंगे। और ये आएंगे, तो खिले फूलों की भांति आएंगे। जुही खिले, बेला खिले, गुलाब खिले, तो भीतर की बगिया और प्यारी हो उठेगी। नए-नए रंग लाएंगे ये लोग। नए-नए ढंग लाएंगे। जीने की नई कला लाएंगे। नए-नए उपहार चढ़ाएंगे।
अगर कोई आया भीतर, तो आते-आते रूपांतरित हो जाएगा।
भीतर आने में व्यक्ति द्विज होता है, ब्राह्मण बनता है। ब्राह्मण बनता है, तो ब्रह्म के योग्य बनता है। और जैसे-जैसे योग्य बनता है, वैसे-वैसे ब्रह्म के साथ एक होता चला जाता है।
जब तक कोई द्विज नहीं होता, तब तक जीवन में ऐसा ही होगा।
अमृत प्रिया, तू कहती है:
किसी को चैन से न देखा दुनिया में कभी मैंने।
इसी हसरत में कर दी खतम सारी जिंदगी मैंने।।
औरों की तरफ देखो ही मत। पागल है तू। आंख बंद कर। अपनी तरफ देख।
लोग औरों को देखने में कितना समय गंवा रहे हैं! इतनी देर में तो अपने से पहचान हो जाए। इतनी ही आंख अपने पर गड़ा लें, तो खुद से मुलाकात हो जाए; क्रांति हो जाए; रोशनी फूट पड़े। झरने अवरुद्ध हैं--बहने लगें।
मुल्ला नसरुद्दीन--एक आदमी वंशी लटकाए मछली मारने बैठा है--उसके पीछे खड़ा देख रहा है। लाठी टेके खड़ा हुआ है। तीन घंटे हो गए। चार घंटे हो गए! मछली कुछ पकड़ी नहीं गई। आखिर मुल्ला के भी बर्दाश्त के बाहर हो गया। मुल्ला ने उससे कहा कि मेरे भाई, तुम भी क्या मछलीमार हो! अरे, क्यों सिर खपा रहे हो, चार घंटे से बेकार समय खराब कर रहे हो। एक मछली पकड़ी नहीं!
उस आदमी ने कहा, बड़े मियां, मैं तो कम से कम पकड़ने की कोशिश कर रहा हूं। तुम यहां क्या कर रहे हो! तुम सिर्फ मुझे देख रहे हो। मैं तो शायद कभी मछली पकड़ भी लूंगा। तुम्हें क्या मिलेगा? तुम जो लाठी टेक कर यहां खड़े हो चार घंटे से। तुम सिर्फ यह देख रहे हो कि मैं मछली पकड़ पाता हूं कि नहीं। तुम्हें क्या लेना-देना है? न मछली से तुम्हें कुछ लेना, न मुझसे कुछ लेना। तुम तो रास्ता लगो!
लोग एक-दूसरे को देख रहे हैं और सोच रहे हैं कि कैसी उदासी हैं! सब की नजरें दूसरों पर गड़ी हैं। इतने में तो अपने से पहचान हो जाए।
अमृत प्रिया! औरों को मत देख। औरों को जिसने देखा, वह भटका। अपने को जिसने देखा, वह पहुंचा! इतनी ऊर्जा तो अपने को देखने में लगा।
क्या प्रयोजन है किसी और को देखने से? यह उनकी जिंदगी है। अगर उन्हें उदास ही रहना है, तो कोई लाख उपाय करे, तो भी उन्हें प्रसन्न नहीं कर सकता। अगर उन्होंने यही तय लिया है, अगर दुखी रहना ही उनका निर्णय है, तो उनकी मर्जी। उनकी स्वतंत्रता है। वे मालिक हैं अपने।
मगर तू क्यों परेशान है! और उनको उदास देख-देख कर तू उदास हो जाएगी। हारे हुए लोगों को देखोगे, पराजित लोगों को देखोगे, तो मन में यह निराशा सघन होने लगेगी कि यही जिंदगी है! यही मुझे होने वाला है!
बुद्धों को देखो। और बुद्ध न मिलें, तो अपने को देखो। क्योंकि वहां बुद्धत्व छिपा है। वह भी बुद्ध को ही देखना है। बाहर के बुद्ध को देखकर भी भीतर के ही बुद्ध की याद आती है। भीतर के बुद्ध को देख कर बाहर के बुद्धों को समझने की सूझ आती है। ये कुछ अलग-अलग बातें नहीं हैं। जैसे कोई आईने में देखता है, तो अपनी ही तसवीर दिखाई पड़ती है। ऐसे ही बुद्धों में जब कोई झांकता है, तो अपने को ही पाता है।
तू कहती है: इस जहां में तू कैसे बेपीए मदहोश रहता है! भीतर की एक मस्ती है, उसके लिए पीना नहीं पड़ता। भीतर भी छनती है।
कल ही किसी ने पूछा था कि भगवान, क्या आप रोज सुबह भांग छान लेते हैं! आपकी बातें बड़ी प्यारी लगती है!
भांग छानने की जरूरत नहीं; भगवान छान लेता हूं। भांग क्या पीनी, जब भगवान को पीयो। फिर अंगूर की ढली क्या पीनी--जब आत्मा की ढली पीना आ जाए। सुबह ही नहीं छानता, हर पल छानता हूं। जाग कर छानता हूं, सो कर छानता हूं। छानता ही रहता हूं।
एक ऐसा भी रस है, जो भीतर मौजूद है। जरा तलाश करना है। उस रस को ही हमने परमात्मा कहा है--रसो वै सः। वह भीतर का जो अमृत है, उसको पीयो। तो तू भी ऐसी ही हो जाए। तुझे पूछना न पड़े कि
इस जहां में तू कैसे बेपीए मदहोश रहता है?
ऐ साकी! आज तक देखा न तुझ सा आदमी मैंने।।
बता तू कौन है इंसान या कोई फरिश्ता है?
या देखा है खुदा को ख्वाब में बना आदमी मैंने।।
नहीं, कुछ भी नहीं। सिर्फ दर्पण में तुमने अपनी तसवीर देखी। मैं दर्पण हूं--इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।
मैं तुम्हें तुम्हारा चेहरा दिखा हूं, तो काम पूरा हो गया। मैंने अपना देख लिया। मेरा काम पूरा हो गया है। अब जितनी देर यहां हूं, जिनको भी अपना चेहरा देखना हो, वे देख लें। लेकिन दर्पण में जब तुम चेहरा देखते हो, तो दर्पण में अपनी तलाश करने नहीं निकल जाते। और दर्पण को छाती से भी नहीं लगा लेते। और दर्पण को लिए भी नहीं फिरने लगते हो।
दर्पण में चेहरा देख लिया; पहचान अपनी हुई; दर्पण से कुछ लेना-देना नहीं है।
सदगुरु को दर्पण ही समझो। न उसको पकड़ना है, न उसका अनुकरण करना है। न उसके रंग-रूप में ढलना है। बस, अपना चेहरा देखो। और अपने चेहरे की पहचान आ जाए, तो भीतर उतरो। खोजो वहां। जो दिखाई पड़ा था सदगुरु में, उसको खोजो भीतर। सदगुरु की नकल मत करा। यही भूल हो गई।
ईसाई हैं दुनिया में, मगर ईसा कहां? बौद्ध हैं दुनिया में, मगर बुद्ध कहां? जैन हैं दुनिया में, जिन कहां? क्या हो गया? कहां चूक हुई? कहां पैर गलत पड़ गए?
इतने ईसाई और एक भी ईसा नहीं! और जिस दिन एक भी ईसाई न था, उस दिन ईसा था।
इतने बौद्ध हैं और एक भी बुद्ध नहीं; मामला क्या है? लोग नकल में पड़ गए। लोगों ने दर्पण में तो देखा, फिर दर्पण में ही खोजने लगे। देखा था अपने को; खोजना था भीतर; लौटना था अपने पर।
मुल्ला नसरुद्दीन एक रात बहुत पी लिया। घर आया। पीया हुआ आदमी घर लौटता है, तो पत्नी से डरता है। यूं तो बिना पीए भी डरता है, मगर पी कर तो बहुत ही डरता है। ऐसे जब तक दरवाजे तक नहीं आया था, बड़ा डोल कर चल रहा था। पत्नियों को देखते ही नशा तक उतर जाता है!
दरवाजे को जैसे ही खटखटाया, याद आई कि अब पत्नी दुरुस्त करेगी। रात के तीन बज रहे हैं! लेकिन सौभाग्य कि बेटे ने उठ कर दरवाजा खोल दिया।
धन्यवाद दिया परमात्मा को। दरवाजा बंद करके आहिस्ता से अंदर गया। लेकिन रास्ते में कोई जगह गिरा था। याद आया। कहीं कोई खरोंच लग गई हो चेहरे पर; कोई लहू वगैरह निकल आया हो। घंटों नाली में पड़ा रहा था। वह तो एक कुत्ते ने कृपा की कि जीवन-जल छिड़क दिया उस पर, सो थोड़ा उसे होश आया। तब घर की तरफ चल पड़ा।
सोचा कि दर्पण में देख लूं। नहीं तो सुबह पत्नी देखते ही से कहेगी कि खरोंच कैसे लगी? यह चोट कहां आई?
तो जा कर दर्पण में देखा। कई जगह चेहरे पर खरोंच थी। चोट थी। तो सोचा कि मलहम पट्टी लगा लूं। तो मलहम पट्टी लगा ली। मलहम पट्टी लगा कर बड़ा निश्चिंत सो रहा।
सुबह पत्नी उठी। स्नानगृह में गई और वहां से एकदम चिल्लाती हुई आई। झकझोर कर मुल्ला को उठाया कि तुमने पूरा आईना खराब किया है! मुल्ला ने कहा, क्या हुआ? उसने कहा, चलो भीतर। आईने पर उसने जगह-जगह मलहम लगा रखी थी। पट्टी चिपका दी थी। क्योंकि बेचारे को बेहोशी में अपना चेहरा आईने में दिखाई पड़ा था। तो जहां-जहां खरोंच थी, वहां-वहां उसने बेलाडोना चिपका दिया होगा। मलहम लगा दी होगी।
तुमने सारा आईना खराब किया। तुम रात पी कर आए थे!
पीया हुआ आदमी कैसे बचे! कुछ न कुछ भूल कर ही लेगा। कुछ न कुछ चूक हो ही जाएगी। बेहोशी में चूक होनी निश्चित है।
बेहोशी में यह हुआ कि लोग ईसाई हो गए। ईसा होना था--ईसाई हो गए! ईसाई होने का अर्थ है: नकल में पड़ गए। ईसा जैसे होने की नकल में पड़ गए। और नकल का कोई मूल्य नहीं है। झूठे सिक्के हैं। इनकी कितनी ही कतार लग जाए!
आधी पृथ्वी ईसाई है। करोड़ों लोग ईसाई! करोड़ों लोग हिंदू! करोड़ों लोग मुसलमान। करोड़ों लोग बौद्ध--और जिंदगी बेरौनक; और जिंदगी एक बोझ। ऐसे ढो रहे हैं लोग, जैसे पहाड़ सिर पर रखे हों। मरे जा रहे, दबे जा रहे!
मैं दर्पण हूं, इससे ज्यादा नहीं। और जो तुम्हें मुझ में दिखाई पड़े, भूल कर मत सोचना कि दर्पण का है। तुम्हें अपनी तसवीर दिखाई पड़ रही है। इसकी तलाश में भीतर जाना। अगर इसकी तलाश में बाहर निकल गए, तो जो भूल चल रही थी, चलती रहेगी।
ये बाहर तो ही दौड़ रहे हैं सारे लोग। कोई धन के लिए दौड़ रहा है। कोई पद के लिए दौड़ रहा है। तुम परमात्मा के लिए दौड़ने लगोगे। मगर दौड़ बाहर है। और जब तक दौड़ बाहर है, तब तक गलत है। किस चीज के लिए दौड़ते हो, इससे भेद नहीं पड़ता। जब तक बाहर दौड़ते हो--गलत दौड़ते हो। फिर सौ साल जीयो कि हजार साल जीयो, फर्क नहीं पड़ता।
उपनिषदों में ययाति की कथा है। ययाति सौ वर्ष का हुआ। मौत आ गई। ययाति घबड़ा गया। उसने तो सोचा ही नहीं था कि कभी मरना है। मौन सोचता है कि कभी मरना है! मरण-शय्या पर पड़ा हुआ आदमी भी नहीं सोचता कि मरना है। वह भी कल की योजना बनाता रहता है। कल के विचार करता रहता है। कल क्या करना है! मरते-मरते दम तक भी, आखिरी क्षण तक भी मौत को हम स्वीकार नहीं करते।
जीने की अभीप्सा इतनी प्रबल है कि ययाति की जब सौ वर्ष में मौत आई, तो वह बहुत चौंक गया। गिड़गिड़ाने लगा। बड़ा सम्राट था, चक्रवर्ती था; मौत के चरणों में गिर पड़ा और कहा कि अभी मत ले जा। अभी मत ले जा। अभी तो मेरी जिंदगी की कोई भी तमन्ना पूरी नहीं हुई। जैसा तू कहती है।
उठाए क्यों लिए जाते हो मुझको बागे-दुनिया से।
नहीं देखी है दिल भर के बहारे जिंदगी मैंने।।
ऐसा ही उसने कहा। इतनी जल्दी! कम से कम सौ साल मुझे और दे दो। दया करो। अभी तो कुछ भी पूरा नहीं हुआ। कोई वासना पूरी नहीं हुई।
मौत को भी कहते हैं, दया आ गई। मौत ने कहा, मुझे किसी को तो ले जाना ही पड़ेगा। खानापूरी तो करनी ही पड़ेगी फाइल में। तुम्हारा बेटा अगर कोई जाने को राजी हो...।
उसके सौ बेटे थे। ययाति की सौ पत्नियां थीं। उसने कहा कि कोई अड़चन नहीं। मेरे बेटे मेरा बड़ा आदर करते हैं, बड़ा सम्मान करते हैं।
उसने सौ ही बेटे इकट्ठे कर लिए। उनमें कोई बेटा अस्सी साल का था। कोई अठहत्तर साल का था। कोई पचहत्तर साल का था। कोई सत्तर साल का था। बूढ़े थे। खुद भी बूढ़े हो रहे थे।
उसने सारे बेटों से कहा कि बेटा, मौत मेरे द्वार पर खड़ी है। यह है मौका परीक्षा का। आज देखूं कि कौन मुझे प्रेम करता है। तुम कहते तो बहुत थे कि पिताजी, तुम्हारे लिए हम मर सकते हैं। आज समय आ गया। देखें, कौन चुनौती स्वीकार करता है! मौत कहती है कि मैं जी सकता हूं सौ साल और। तुम में से कोई जाने को राजी हो, हाथ उठा दे।
सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे! कौन जाने को राजी! ये बातें करने की हैं।
पति पत्नियों से कहते हैं कि मर जाऊंगा तेरे बिना। पत्नियां पतियों से कहती हैं, मर जाऊंगी तुम्हारे बिना! प्रेमी प्रेयसियों से कहते हैं कि मर जाऊंगा। जी न सकूंगा। एक पल न जी सकूंगा! ये सब बातें हैं। न कोई मरता है, न कुछ होता है!
यह आदमी जो इस स्त्री से कह रहा है कि तेरे बिना मर जाऊंगा, न मालूम कितनी स्त्रियों से कह चुका है! और अभी तक मरा नहीं! असल में यह इसकी आदत ही हो गई। यह इसकी शैली ही हो गई!
बेटे इधर-उधर देखने लगे। सिर्फ एक बेटा जिसकी उम्र अभी केवल सोलह ही वर्ष थी, खड़ा हो गया। उसने कहा, मैं तैयार हूं।
मौत को तो बहुत दया आ गई उस बेटे पर। सोचा कि भोला-भाला है। अभी छोरा ही है। इसे कुछ अनुभव नहीं है। अनुभवी जो हैं, वे तो इधर-उधर देख रहे हैं कि कौन जाता है, देखें! एक दूसरे की तरफ देख रहे हैं कि तुम बड़ी ऊंची बातें करते थे, अब देखें! एक दूसरे की तरफ देख रहे हैं कि उठो भाई, हाथ उठाओ। कहते तो तुम यह थे; कहते तो तुम ऐसा थे। बड़े चरण छूते थे। बड़ी पूजा करते थे? अब मौका आ गया। अब दिखा दो अपनी मर्दानगी; अपना जोश-खरोश! यह अवसर न चूको। कोई अपनी तरफ नहीं देख रहा था!
यह बेटा उठ कर खड़ा हो गया। इसने कहा, मैं राजी हूं!
मौत ने कहा, सुन नासमझ! तेरे और कोई निन्यानबे भाई राजी नहीं हैं। तू क्यों राजी हो रहा है? पूछ पहले इन दूसरे भाइयों से, ये क्यों राजी नहीं हैं!
तो उनमें से एक बूढ़े भाई ने कहा, जब हमारे पिता राजी नहीं हैं, सौ साल हो गए उनको, मेरी तो अभी उम्र केवल सत्तर ही साल है! जब वे सौ साल में जाने को राजी नहीं हैं, तो मैं सत्तर साल में कैसे राजी हो जाऊं! अभी मेरी कौन-सी इच्छाएं पूरी हो गईं! उनकी सौ में नहीं हुईं, तो मेरी सत्तर में कैसे हो जाएंगी! मैं भी अधूरा हूं। मेरी भी तृष्णा खाली है। मेरा भी भिक्षापात्र अभी भरा नहीं। मेरा भी मन अभी जाने को राजी नहीं। जब उनका नहीं, तो मेरा कैसे हो?
सभी भाइयों ने इसमें सहमति भरी कि बात ठीक है। हमारा कैसे हो! हम भी अपनी इच्छाएं पूरी करना चाहते हैं। हम आदमी अपनी इच्छाएं पूरी करना चाहता है। और जब पिता को इतनी दया नहीं है, अपने बेटों की बलि चढ़ाने को राजी हैं, तो हमको किसलिए दया हो! अपना-अपना स्वार्थ। वे अपना देख रहे हैं, हम अपना देख रहे हैं। यह मामला स्वार्थ का है; पिता-पुत्र का है ही नहीं। इसमें पिता-पुत्र का संबंध कहां आता है!
तो मौत ने कहा, सुन अपने भाइयों की बात। तू तो अभी सोलह साल का है। तूने तो कुछ भी नहीं देखा। जिंदगी का क ख ग भी नहीं देखा। वापस ले ले अपना वचन!
लेकिन वह बेटा हंसने लगा। उसने कहा, मैं इसीलिए तो राजी हूं कि मेरे भाई--कोई सत्तर के हैं, कोई पचहत्तर के हैं, कोई अस्सी तक के हैं--इनको जिंदगी में कुछ नहीं मिला; मेरे पिता सौ साल के हैं, इनको जिंदगी में कुछ नहीं मिला। ये सौ आदमी मेरे सामने मौजूद हैं। निन्यानबे मेरे भाई, सौवां मेरा पिता--इनको जिंदगी भर जी कर कुछ नहीं मिला, तो मैं इस नाहक जिंदगी में किसलिए जीऊं! मुझे क्या खाक मिल जाएगा। इन सब को देखकर ही तो मैं राजी हो गया कि मुझे ले चलो। क्या सार है इस अजिंदगी में!
फिर भी उस बूढ़े ययाति को बोध न आया।
अकसर ऐसा हो जाता है कि छोटे बच्चे बूढ़ों से ज्यादा स्पष्ट होते हैं, साफ होते हैं, स्वच्छ होते हैं। उनकी दृष्टि अभी ताजी होती है। उनकी दृष्टि पर अभी धूल नहीं जमी होती अनुभव की।
उसने जिद्द की तो मौत उसे ले गई। सौ साल बाद मौत फिर आई। सौ साल कब गुजर गए--पता नहीं चला! और ययाति फिर गिड़गिड़ाने लगा। इस सौ साल में उसने फिर शादियां कर ली थीं। पुराने बेटे तो मर चुके थे। पुरानी पत्नियां मर चुकी थीं। नए बेटे थे, नई पत्नियां थीं। फिर वही सवाल उठा। फिर एक बेटे को मौत ले गई।
ऐसी कहानी कहती है कि हजार साल तक ययाति जिंदा रहा। मौत आती रही और हर बार वह सौ साल और मांगता रहा। जब हजारवें साल मौत आई, तो उसने कहा, अब बहुत हो चुका। अब और तो नहीं मांगोगे?
ययाति ने कहा, नहीं, मैं मांगने वाला भी नहीं था। इतना ही कह जाना चाहता हूं उन मनुष्यों के लिए, जो मेरे पीछे आएंगे--कि सौ साल जीयो कि हजार साल जीयो, कुछ हाथ नहीं लगता। हाथ खाली के खाली रह जाते हैं।
बाहर की दौड़ से कभी किसी के हाथ नहीं भरे। फिर चाहे धन के लिए दौड़ो, चाहे पद के लिए, चाहे परमात्मा के लिए! और जो भीतर गया है, एकदम भर गया है। पूछो बुद्धों से, पूछो जाग्रत पुरुषों से! जो भीतर गया मालिक हो गया। जो बाहर रहा--भिखमंगा रहा।
हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।।
निकलना खुल्द से आदम का सुतने आए थे लेकिन।
बहुत बेआबरू होकर तेरे कूच से हम निकले।।
मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का।
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले।।
खुदा के वास्ते पर्दा न काबे का उठा जालिम।
कहीं ऐसा न हो यहां भी वही काफिर सनम निकले।।
कहां मयखाने का दरवाजा और कहां वाइज।
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले।।
फर्क नहीं है यहां कुछ--तुम्हारे तथाकथित धार्मिकों में और अधार्मिकों में, पापियों में और पुण्यात्माओं में--बहुत फर्क नहीं है। एक जैसे ही लोग हैं। कहां मयखाने का दरवाजा और कहां वाइज। कहां वह धर्मोपदेशक धर्मगुरु...!
कहां मयखाने का दरवाजा और कहां वाइज।
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले।।
सब एक ही तरह के उपद्रव में उलझे हैं।
हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।।
जिंदगी भर दौड़ कर भी कोई अरमान पूरा नहीं होता।
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन।
बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।।
पर सभी बेआबरू होकर निकले हैं। यहां से आबरू पाकर तो वही निकलता है, जो अपने को जान कर निकलता है। यह कूचा उन थोड़े से लोगों के लिए सार्थक हो जाता है, जो खुद को पहचान लेते हैं।
अमृत प्रिया, अपने को पहचान। समय मत गंवाओ।
मैं तुम से कहता हूं कि जीवन महाआनंद है, महाउत्सव है। जीवन शाश्वत गीत है, जिसका न कोई प्रारंभ है, न कोई अंत। मगर तुम्हारा जीवन तो बीज है अभी। इसे ध्यान की भूमि दो। इस पर प्रेम का पानी बरसाओ। इस पर श्रम भी किरणें पड़ने दो। जागरूक होकर इसकी रक्षा करो। और देर नहीं लगेगी, जल्दी ही अंकुर निकलेंगे। जल्दी ही वसंत आ जाएगा, मधुमास आ जाएगा। एक क्षण में भी यह बात हो सकती है, त्वरा चाहिए, सघन अभीप्सा चाहिए।
अभीप्सा और आकांक्षा का भेद खयाल में रखना। आकांक्षा होती है बाहर की; अभीप्सा होती है भीतर की। जो व्यक्ति समग्ररूपेण स्वयं को खोजने में लग जाए; रत्ती भी बचा कर न रखे; आधा-आधा नहीं--पूरा पूरा लग जाए; निन्यानबे प्रतिशत भी नहीं, सौ प्रतिशत लग जाए--तो एक क्षण में क्रांति घट सकती है। एक क्षण में तुम्हारे जीवन में सुगंध आ सकती है; सूरज निकल सकता है। यह जो अंधेरी रात चल रही है जन्मों-जन्मों से, इसकी सुबह हो सकती है। नहीं तो यह उदासी चलती रहेगी--चलती रहेगी--चलती रहेगी।
न किसी की आंख का नूर हूं, न किसी के दिल का करार हूं।
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्ते-गुबार हूं।
मेरा रंग रूप बिगड़ गया, मेरा यार मुझसे बिछुड़ गया।
जो चमन खिजां से उजड़ गया मैं उसी की फस्ले-बहार हूं।।
पए-फातेहा कोई आए क्यों, कोई चार फूल चढ़ाए क्यों।
कोई आ के शम्मा जलाए क्यों, मैं वो बेकसी का मजार हूं।।
मैं नहीं हूं नग्मा-ए-जांफिजा, मुझे सुन के कोई करेगा क्या।
मैं बड़े बिरोग की हूं सदा, मैं बड़े दुखों की पुकार हूं।।जिंदगी की दोनों संभावनाएं हैं: अंधेरी रात भी हो सकते हो तुम--आलोकित दिवस भी।
न किसी की आंख का नूर हूं, न किसी के दिल का करार हूं।
जो किसी के काम न आ सके, मैं वो एक मुश्ते-गुबार हूं।।
यूं तो मिट्टी हो। अगर अपने को न पहचानो तो एक मुट्ठी भर मिट्टी हो। इससे ज्यादा तो कुछ भी नहीं। और मिट्टी मिट्टी में गिर जाएगी। मिट्टी मिट्टी में गिरनी ही है; कब गिर जाएगी, कहा नहीं जा सकता। इसलिए देर न करो। जागने में देर न करो। जागने को स्थगित न करो। जागने को कल पर न टालो। जिसने कल पर टाला, उसने सदा के लिए टाला।
मुट्ठियों में खाक लेकर दोस्त आए बादे-दफ्न
मुट्ठियों में खाक लेकर...
और करें भी क्या! जब कोई मर जाए, तो दोस्त और करें भी क्या! अब खाक पर खाक ही डाली जा सकती है।
मुट्ठियों में खाक ले कर दोस्त आए बादे-दफ्न
जिंदगी भर की मुहब्बत का सिला देने लगे!
क्या सिला दिया--खूब सिला दिया! जिंदगी भर की मुहब्बत का सिला देने लगे! कैसा सिला--कि मुट्ठियां भर-भर के खाक डालने लगे!
और किसी के मुंह से न निकला
मेरे दफ्न के वख्त
कि इन पर खाक न डालो
इन्होंने आज ही बदले हैं कपड़े
और आज ही हैं ये नहाए हुए
मुट्ठियों में खाक ले कर दोस्त आए बादे-दफ्न
जिंदगी भर की मुहब्बत का सिला देने लगे!
पर करें भी क्या! करने को कुछ बचता भी नहीं। इधर सांस उखड़ी--उधर लोगों ने अर्थी सजाई। क्षण भर में क्या हो जाता है!
जरा सी देर में क्या हो गया जमाने को
अभी जो अपने थे पराए हो गए!
जरा सी देर में क्या हो गया जमाने को! लेकिन जमाना भी क्या करे! तुम मिट्टी ही रहे; मिट्टी में ही गिर गए। तो अब मिट्टी में ही पूर कर लोग चले गए। सब दबा कर चल दिए--मिट्टी में दबा कर चल दिए! कोई दुआ-सलाम भी नहीं करता।
सब दबा के चल दिए, न कोई दुआ न सलाम! क्या हो गया जमाने को! जरा सी देर में क्या हो गया जमाने को! लौट कर भी कोई नहीं देखता। कैसा सिला दिया! जिंदगी भर की मुहब्बत का सिला देने लगे!
यह कभी भी होगा। यह अभी हो सकता है। आज हो सकता है। इसके पहले कि यह हो--भीतर के चैतन्य को पहचान लो। इसके पहले कि मौत आए, अपने भीतर के अमृत को जान लो, ताकि मरो, तो भी तुम्हारे भीतर नृत्य रहे; मरो, तो भी तुम्हारे भीतर आनंद रहे। मरो, तो भी जानते हुए कि मैं नहीं मर रहा हूं। जो मर रहा है, वह मैं नहीं हूं। देह मरती है, मैं नहीं मरता हूं।
जब तक इस अमृतत्तत्व को कोई नहीं जान लेता, तब तक जीवन में न कोई रस है, न कोई आनंद है, न कोई उत्सव है।

दूसरा प्रश्न: भगवान, आपका और हमारे संभावित कच्छ के आश्रम का विरोध करने वाले श्री शंभू महाराज को दिनांक ३१-८-८० के रोज बीस-पच्चीस संन्यासी और संन्यासिनियों के साथ हम मिलने गए। बड़ौदा में उनकी भागवत सप्ताह थी। उस मौके पर मिलने का आयोजन किया। बहुत-सी बातें हुई, जिनमें निम्न बातें खास रहीं। श्री शंभू महाराज ने बताया:
पहला--भगवान रजनीश का विरोध करने का कारण, मेरे गुरु शंकराचार्य के खिलाफ बोलते हैं, इसलिए करता हूं।

मैं जो बोला हूं, उसका खंडन करो, उसको जवाब दो। मेरे कच्छ आने का विरोध करने से उसका कोई जवाब होगा? मैं कच्छ आऊं या न आऊं, मैंने जो शंकराचार्य के संबंध में कहा है, उसका जवाब ऐसे दिया जाएगा?
मैंने कहा क्या है शंकराचार्य के विरोध में! स्मृति के लिए--शंभू महाराज की--दोहरा देता हूं। मैंने यही कहा है कि शंकराचार्य के इस कथन से मैं राजी नहीं हूं कि ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है। और तो मैंने कुछ भी नहीं कहा।
सिद्ध करो कि जगत मिथ्या है। मेरा कच्छ आने का विरोध करते हो, इससे तो सिद्ध होता है--जगत सत्य है। कच्छ सत्य है? और जगत असत्य हो जाएगा? मेरा आना सत्य है! तुम्हारा विरोध सत्य है! तो जगत कैसे असत्य हो जाएगा?
जगत असत्य है और ब्रह्म सत्य है--इस बात का मैंने निश्चित विरोध किया है। अब भी विरोध करूंगा, क्योंकि मेरी दृष्टि में यह सूत्र भारत की दरिद्रता, दीनता, हीनता, गुलामी--सब का आधार है। इस सूत्र को जब तक हम उखाड़ न फेंकेगे, तब तक भारत के जीवन में सौभाग्य का उदय नहीं हो सकता।
भारत क्यों विज्ञान को जन्म नहीं दे पाया?--जगत असत्य है--इसलिए। विज्ञान कैसे जन्मे? जब जगत है ही नहीं, तो विज्ञान कैसा? जगत का यथार्थ मानो, तो विज्ञान का जन्म हो सकता है। और भारत में सबसे पहले विज्ञान का जन्म हो सकता था। क्योंकि हम पांच हजार वर्षों से ऐसे महत चिंतकों को जन्म दिए हैं कि विज्ञान का जन्म न हो, यह बात समझ में नहीं आती।
जब पश्चिम बिलकुल जंगली अवस्था में था, तब हमने सभ्यता के स्वर्ण शिखर छुए हैं। और हम विज्ञान को जन्म न दे सके! कारण है--इस भ्रांत उपदेश में कि जगत मिथ्या है; जगत माया है।
और ऐसा नहीं कि मैं ही विरोध कर रहा हूं; महावीर ने भी विरोध किया है। असल में जिसके पास भी थोड़ी स्पष्ट दृष्टि है, वह यह कहेगा कि जगत को कैसे असत्य कह सकते हो। और अगर जगत असत्य है, तो हम सब असत्य हो गए। फिर हमारी धारणाएं और हमारे ध्यान भी असत्य हो गए। और हमारी समाधियां और समाधि के अनुभव भी असत्य हो गए! और फिर हमारा ब्रह्म कैसे सत्य होगा, जब हम ही सत्य नहीं हैं; जब हम ही झूठ हैं, तो झूठे लोगों का अनुभव कैसे सत्य होगा?
मैं कहता हूं: जगत भी सत्य है, ब्रह्म भी सत्य है। जगत और ब्रह्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जगत बाहर--ब्रह्म भीतर। मगर अगर बाहर असत्य है, तो भीतर भी सत्य नहीं हो सकता। जरा सोचो।
अगर बाहर तुम्हारे घर का सारा जगत असत्य है, तो तुम्हारे घर का भीतर कैसे सत्य हो सकता है? तुम्हारा घर ही नहीं टिक सकेगा; उसके लिए जमीन चाहिए, जिस पर टिके। वह जमीन बाहर होनी चाहिए। नहीं तो तुम्हारा घर अतल खड्ड में गिर जाएगा।
पदार्थ उतना ही सत्य है जितना परमात्मा।
शंकराचार्य की यह दृष्टि घातक सिद्ध हुई, भयानक अभिशाप सिद्ध हुई। इसका परिणाम यह हुआ, हमने जगत में उत्सुकता छोड़ दी। फिर हम रोते फिरते हैं, भीख मांगते फिरते हैं। कोई कारण न था भीख मांगने का, अगर हमने जगत की थोड़ी चिंता की होती। मगर चिंता क्यों करें, जब असत्य ही है तो!
और बड़ा मजा यह है, शंकराचार्य भी भोजन करते हैं। शंकराचार्य भी लोगों को समझाने जाते हैं--जो कि असत्य हैं! शंकराचार्य विवाद के लिए सारे देश में घूमते हैं। किससे विवाद कर रहे हो? किस कारण विवाद कर रहे हो? वहां कोई है ही नहीं! नाहक अपने से ही बातचीत कर रहे हो! अपने को ही हरा रहे हो।
यह शंकर-दिग्विजय की जो चर्चा करते हैं शंकर के मानने वाले, यह दिग्विजय किसकी? यह विजय-यात्रा किस पर? कोई दूसरा तो है नहीं, दूसरा तो असत्य है। फिर विवाद किससे है? मंडन मिश्र नहीं हैं, तो विवाद किससे कर रहे हो? जीत किसको रहे हो? हार कौन रहा है?
शंकराचार्य का पूरा जीवन तो कुछ और कह रहा है।
शंकराचार्य ने जगत का त्याग किया; जो है ही नहीं, उसका त्याग किया जा सकता है? मैं पूछता यह हूं--जो है ही नहीं, उसका त्याग कैसे करोगे? कम से कम त्याग के लिए तो होना चाहिए! जैसे एक भिखमंगा कहे कि मैंने राजपाट स त्याग, कर दिया! तुम हंसोगे! तुम कहोगे: राजपाट था कहां?
दो अफीमची एक झाड़ के नीचे लेटे थे। पूर्णिमा की रात। और एक अफीमची ने कहा, अहा, क्या प्यारा चांद निकला! करोड़ों रुपए में भी खरीद सकता हूं!
दूसरा अफीमची हंसने लगा। उसने कहा, चुप रह। बकवास न कर! अरे क्या तू खरीदेगा! हिम्मत है तेरी खरीदने की? करोड़ से काम नहीं चलेगा।
उसने कहा, दस करोड़ में खरीद सकता हूं। पचास करोड़ में खरीद सकता हूं। एक अरब में खरीद सकता हूं।
दूसरे अफीमची ने कहा, बकवास बंद कर। हमें बेचना ही नहीं! तू लाख सिर मारे, जब हम बेचेंगे ही नहीं, तू खरीदेगा कैसे?
चांद की खरीद-फरोख्त हो रही है! जैसे इनके बाप का हो! जो है ही नहीं, वह खरीदा जा रहा है! जो है ही नहीं, वह बेचा जा रहा है--जो अपना है ही नहीं...। इनको तुम अफीमची कहते हो। और इसी तरह की पीनक की बातों को तुम वेदांत कहते हो? मैं नहीं कहता।
मैं तो मानता हूं, विज्ञान उतना ही सत्य है, जितना धर्म।
दुनिया में दो तरह की भ्रांतियां हुईं--एक भ्रांति शंकराचार्य जैसे लोगों ने फैलाई, जिन्होंने कहा--जगत असत्य है और ब्रह्म सत्य है। अर्थ हुआ--विज्ञान असत्य है, धर्म सत्य है। और दूसरी तरह की भ्रांति कार्ल माक्र्स जैसे लोगों ने फैलाई, जिन्होंने कहा, जगत सत्य है, ब्रह्म असत्य है। विज्ञान सत्य है, धर्म अफीम का नशा है।
मैं कहता हूं: ये दोनों गलत हैं। और एक मजे की बात है, दोनों एक बात से राजी हैं; दोनों अद्वैतवादी हैं--कार्ल माक्र्स भी और शंकराचार्य भी। क्योंकि दोनों एक में मानते हैं, दो में नहीं मानते। हालांकि उनका एक अलग-अलग है। कार्ल माक्र्स कहता है: जगत सत्य है, और ब्रह्म असत्य है। मगर है अद्वैतवादी, यह खयाल रखना। और शंकराचार्य कहते हैं: ब्रह्म सत्य है, जगत असत्य है। वे भी अद्वैतवादी हैं।
मैं कार्ल माक्र्स और शंकराचार्य को एक-सी ही भ्रांतियों का शिकार मानता हूं। मेरी दृष्टि में दोनों ही सत्य हैं और दोनों अलग भी नहीं हैं। मैं भी अद्वैतवादी हूं। लेकिन मैं मानता हूं--एक सिक्के के दो पहलू होते हैं। इससे मैं द्वैतवादी नहीं हो जाता। सिक्का एक है, पहलू दो हैं। और सिक्का एक पहलू का कोई बनाकर दिखा दे, तो मैं मान लूंगा कि कार्ल माक्र्स भी सच्चा है और शंकराचार्य भी सच्चे हैं। एक पहलू का कोई सिक्का बना कर बता दे। कैसे बनाओगे एक पहलू का सिक्का? सिक्के के दो पहलू होते हैं।
प्रकाश नहीं हो सकता है, अगर अंधकार न हो और अंधकार नहीं हो सकता, अगर प्रकाश न हो। पुरुष नहीं हो सकता, अगर स्त्री न हो; स्त्री नहीं हो सकती, अगर पुरुष न हो। जन्म नहीं हो सकता अगर मौत न हो; मौत नहीं हो सकती, अगर जन्म न हो। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
ठंडा और गर्म--एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सुख और दुख--एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। विज्ञान और धर्म--एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पूरब और पश्चिम--एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
मैंने शंकराचार्य का जो विरोध किया है, उस विरोध में कार्ल माक्र्स का विरोध भी सम्मिलित है। मैं यह कह रहा हूं सिर्फ कि क्यों एक सिक्के के पहलू को स्वीकार करते हो और दूसरे पहलू को इनकार करते हो? और दूसरे को इनकार करने में कोई वैज्ञानिकता नहीं है, कोई तर्क नहीं है। और उसके दुष्परिणाम दोनों ने भोगे हैं। पश्चिम दुष्परिणाम भोग रहा है कि धर्म खो गया है पश्चिम में। पदार्थ ही पदार्थ रह गया है। तो विज्ञान बहुत बढ़ा। विज्ञान ने तो अंबार लगा दिया खोजों का। और आदमी की आत्मा बिलकुल खो गई! वस्तुएं इकट्ठी हो गईं; आदमी खो गया!
यहां हमने उलटा काम किया। आत्मा तो बच गई, मगर रोटी खो गई, छप्पर खो गया, कपड़े खो गए। यह आत्मा भी बड़ी दीन-हीन हो गई, बड़ी दरिद्र हो गई, बड़ी पाखंडी हो गई। हो ही जाएगी।
पश्चिम में विक्षिप्तता पैदा हो रही है, क्योंकि आत्मा न हो तो संतुलन खो जाता है। शरीर ही शरीर बचा। और पूरब भी आत्मघात की कगार पर खड़ा हुआ है। देखे हो रोज-रोज क्या होता जा रहा है! लोगों की भीड़ बढ़ती जाती है--भोजन रोज कम होता जाता है। वस्त्र कम होते जाते हैं। जमीन कम होती जाती है। लोगों की भीड़ बढ़ती जाती है।
अगर रोका न गया भावों का चढ़ाव
तो एक दिन अखबारों में छपेंगे ये भाव
गेहूं दस पैसे जोड़ी
चावल पचास पैसे कौड़ी
चना एक रुपए में पचास
पांच रुपए में किलो घास
दूध एक रुपए बूंद
घी एक रुपया दस पैसे सूंघ
एक रुपया तोला आम कच्चे
और दस रुपए में तीन बच्चे!
इस सबका जिम्मा किस पर होगा? शंकराचार्य इसमें जिम्मेवार हैं।
मैं जो कह रहा हूं, शंभू महाराज को कहना चंद्रकांत भारती, मेरी बातों का उत्तर दें। मेरे कच्छ आने का विरोध करने से मेरी बातों का उत्तर नहीं होता। इससे सिर्फ भय मालूम होता है, कायरता मालूम होती है, नपुंसकता मालूम होती है। और मुझे जो कहना है, वह मैं कच्छ में रहूं कि पूना में, मैं कहूंगा; कुछ फर्क पड़ता नहीं। कहां रहूंगा, इससे क्या फर्क पड़ता है? जो मुझे कहना है, वह कहूंगा, जब तक कि तुम उसे गलत सिद्ध न कर दो।
लेकिन जवाब इनमें से कोई भी देने को नहीं हैं। और ये गौ-भक्त हैं! और संसार माया है। तो यह गऊ माया नहीं है? गौ-भक्त चल रही है--और संसार माया है! सिर्फ गौ को छोड़ कर, बाकी संसार माया है?
दूसरा शंभू महाराज ने कहा कि रजनीश जी की इंदिरा गांधी तक बड़ी पहुंच है। अगर रजनीश जी उनको कह कर गौ-हत्या बंद करवा दें, तो मैं उनका शिष्य हो जाऊंगा।
मेरी किसी तक कोई पहुंच नहीं है। मैं अपने कमरे के बाहर नहीं निकलता, पहुंच हो कैसे सकती है? और अगर मेरी पहुंच हो भी, तो मैं इस तरह की मूर्खतापूर्ण बातों में पड़ता नहीं कि गौ-हत्या बंद करवा दो; कि शराब बंद करवा दो! ये सब बेवकूफी की बातें हैं। ये सब देहाती-बुद्धि ही बातें हैं।
जरूर गौ-रक्षा होनी चाहिए। मगर गौ-रक्षा और गौ-हत्या बंद करवाना दो अलग बातें हैं। सच तो यह है--अगर गौ-हत्या जारी रहे, तो ही गौ-रक्षा हो सकती है। तुम चौंकोगे थोड़ा और शंभू महाराज तो बहुत तिलमिला जाएंगे। मगर मैं भी क्या करूं, मुझे जैसा दिखाई पड़ता है, वही कहूंगा। मैं रत्ती भर अन्यथा नहीं कह सकता--बुरा लगे भला लगे। गौ-रक्षा हो सकती है, अगर गौ-हत्या जारी रहे। अगर गौ-हत्या बंद हुई, तो गौ-रक्षा नहीं हो सकती।
और मेरी बात गणित की तरह साफ है। दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है, जहां गऊओं की इतनी दुर्दशा हो, जितनी भारत में है। क्यों? वहां कहीं गौ-हत्या बंद नहीं हुई है, मगर गौ-रक्षा हो रही है। यहां की चालीस गायें उतना दूध नहीं देतीं, जितना स्वीडन की एक गाय दूध देती है। यह गौ-रक्षा है!
भारत में आदमियों को खाने के लिए तो भोजन नहीं है, तुम गऊओं को बचा-बचा कर करोगे क्या? भूखा मारोगे, और क्या करोगे? भूखा मार रहे हो! हड्डी-हड्डी हो रही हैं भारत की गायें। भूखी मर रही हैं। तुम भूखे हो, तो तुम्हारी गायों को कौन भोजन देने वाला है? आदमी को नहीं मिल रहा खाने को, घास नहीं मिल रही आदमी को खाने को, गऊओं को कौन खिलाएगा; कैसे खिलाएगा?
भारत के पास जितने पशु हैं, गायें-भैंसें, उतने दुनिया के किसी देश के पास नहीं हैं। आदमियों से ज्यादा संख्या हुई जा रही है! मगर उनको खिलाओगे-विलाओगे कैसे? बचाते जाओ, तो बस हड्डी-हड्डी होंगी। उनको जबर्दस्ती जिला कर रखना है, सड़ाना है, मारना है? इससे ज्यादा दयापूर्ण होगा कि जो गाय, जितनी गाएं तुम बचा सकते हो, उतनी गायें तुम बचाओ। उनको स्वास्थ्य दो। उनको ठीक सम्यक भोजन दो। उनकी ठीक चिकित्सा की व्यवस्था करो।
गौ-रक्षा अगर करनी है, तो गौ-हत्या नहीं रोकी जा सकती। मजबूरी है। अभी तो नहीं रोकी जा सकती। अभी तो आदमी की हत्या के दिन करीब आ गए। आदमी इतना हुआ जा रहा है, इतनी संख्या बढ़ी जा रही है कि हमको बच्चे रोकने पड़ रहे हैं। संतति-निरोध--वह हत्या ही है। उसको तुम हत्या न कहो, संतति-निरोध कहो, अच्छे शब्द में छिपाओ, मगर है तो हत्या ही। भ्रूण-हत्या है। बच्चा मां के पेट में नहीं आने देंगे, यह भी हत्या है। गर्भपात के लिए हमें कानूनी व्यवस्था करनी ही पड़ेगी। करनी पड़ रही है। वह भी हत्या है।
हमें बूढ़ों को आज नहीं कल मरने की स्वतंत्रता देनी ही पड़ेगी। वह भी हत्या है। लेकिन मजबूरी है, कोई और उपाय नहीं है। और मजबूरी के लिए जिम्मेवार शंकराचार्य हैं और ये शंभू महाराज जैसे लोग हैं। नहीं तो इतनी मजबूरी की कोई जरूरत न थी।
हमने भी अगर विज्ञान के जगत में थोड़ी गति की होती, अगर हमने भी उत्पादन के ज्यादा वैज्ञानिक ढंग खोजे होते, अगर हमने भी उद्योग में नए-नए तकनीक ईजाद किए होते, तो यह हालत न आती। हम सिर्फ बच्चे पैदा करते हैं, और हमसे कुछ भी नहीं होता। और संसार माया है! बड़ा मजेदार काम चल रहा है! बच्चे पैदा करने भर में माया नहीं है!
मैंने कल तुमसे कहा कि चंदूलाल ने अपने गुरु स्वामी मटकानाथ ब्रह्मचारी को अपनी पत्नी के साथ रासलीला करते हुए पकड़ लिया, तो बड़े गुस्से में आ गया चंदूलाल। स्वाभाविक है। पत्नी को तो उसने कहा कि मैं तेरी हत्या ही कर दूंगा, तलाक तो निश्चित है। और ब्रह्मचारी को, जो उसके गुरु थे, उनको कहा कि अरे ब्रह्मचारी के बच्चे, अरे लंगोट के कच्चे! अरे उल्ले के पट्ठे! कम से कम जब मैं अपनी पत्नी से बात कर रहा हूं, तब तो तू छेड़छाड़ बंद कर दे! उठ, अपने तीन कपड़े पहन!
ब्रह्मचारी को तीन कपड़े रखने की सुविधा है। वे तीनों टेबिल पर रखे हैं। और ब्रह्मचारी ने क्या कहा? ब्रह्मचारी ने कहा, वत्स, क्यों नाराज हो रहा है? अरे यह जगत तो माया है! सब सपना है--कह गए शंकराचार्य! क्यों भ्रम में पड़ रहा है? क्यों सपने में उलझ रहा है, अरे, क्या माया-मोह में उलझा है?
ये तुम्हारे तथाकथित साधु-संत-महात्मा, इनके बड़े अजीब काम हैं। एक तरफ जगत को माया कहेंगे, दूसरी तरफ जगत को छोड़ो इसका उपदेश देंगे। जो है ही नहीं, उसको छोड़ना क्या? एक तरफ कहेंगे कि धन माया है, और दूसरी तरफ कहेंगे कि दान धर्म है।
बड़े मजे की बातें हैं। कुछ गणित होता, कोई तर्क होता, कोई हिसाब होता, कोई बुद्धि की बात होती! धन माया है झूठ है--और धन का दान? स्वर्ग में उसका फल मिलेगा। झूठ का दान करोगे? जो है ही नहीं उसका दान करोगे? ईश्वर तक को धोखा दोगे! और फिर स्वर्ग में उसका करोड़-गुना फल पाओगे। यह ही महात्मा समझा रहे हैं। क्या मजा चल रहा है!
असत्य को त्याग कर दिया और एक करोड़-गुना फायदा! यह तो कुछ लाटरी जैसा मामला हुआ! लाटरी में भी कम से कम असली दाम लगाना पड़ता है। यह तो लाटरी से भी बढ़िया लाटरी हुई। कुछ लगाना ही नहीं पड़ा। हल्दी लगे न फिटकरी रंग चोखा हो जाए!
और परमात्मा के दरवाजे पर दानियों की बड़ी इज्जत होती है। और दान भी किसको देना! ब्राह्मण समझाता है, ब्राह्मण को देना। क्योंकि ब्राह्मण को दान देने का लाभ बहुत है। और जैन क्या समझाता है? जैन समझाता है, जैन मुनि को देना; ब्राह्मण को नहीं, जैन मुनि को देने का बड़ा लाभ है। और बौद्ध क्या समझाता है, कि बौद्ध भिक्षु को देना--जैन मुनि को नहीं; क्योंकि बौद्ध भिक्षु को देने का बड़ा लाभ है! तुम जरा गणित देख रहे हो? साफ है। दान हमको दो!
पहले समझाते हैं कि धन माया है, ताकि जरा तुम्हारी मुट्ठी ढीली हो; फिर कहते हैं--अब दान करो--और दान हमको करना! ब्राह्मण कहता है मुझको; जैन मुनि कहता है मुझको; बौद्ध भिक्षु कहता है मुझको--दान मुझको करना, तो ही लाभ पाओगे, तो ही पुरस्कार मिलेगा स्वर्ग में! किसी और को मत दे देना, नहीं तो भटकोगे। बेकार गया।
गौ-हत्या बंद करवाना घातक होगा। और ऐसा नहीं है कि मैं कोई गऊओं का दुश्मन हूं। लेकिन मैं पूछना चाहता हूं कि ये सज्जन अपने को कहते हैं मैं गौ-भक्त हूं, यह भक्ति कैसी, किसलिए भक्त हो गऊ के? इसीलिए न कि उससे दूध मिलता है! यह भक्त है या स्वार्थ?
और दूध तुम्हारे लिए शंभू महाराज, गौ में पैदा होता है कि गौ के बछड़े के लिए पैदा होता है? यह गौ के बछड़े से छीनना और दूध शंभू महाराज पीएं, यह तो शोषण है, बलात्कार है।
अगर असली गौ-भक्त हो, तो दूध पीना बंद कर दो, पहली तो बात। गौ-भक्त दूध नहीं पी सकता। कैसे पीएगा? गौ-भक्त को तो यह करना चाहिए कि अपनी पत्नी का दूध बछड़ों को पिलवाए! यह सीधी बात होगी, अगर भक्ति है।
यह कैसी भक्ति है कि बछड़ों को अलग हटा कर उनका दूध खुद पी रहे हो!
और दूध को कहते हैं कि बड़ा शुद्ध आहार है, सात्विक आहार है! छीन रहे हो, हिंसा है यह। और गौ के बछड़ों को बांध देते हैं पास। सच तो यह है कि मुर्दा बछड़ों को बांध देते हैं, मरे-मराए बछड़ों में भुस भर कर रख देते हैं, ताकि गौ को धोखा रहे कि बछड़ा पास है, तो उसके स्तन से दूध बहने लगे। अगर अपनी पत्नियों का दूध पिलाओ बछड़ों को, सांडों को, नंदियों को! यह भक्ति होगी!
जो आदमी गौ का मांस खा रहा है, वह भी भक्त नहीं है। और जो गौ का दूध पी रहा है, वह भी भक्त नहीं है; क्योंकि दोनों शोषण कर रहे हैं गौ का। और ये गौ-भक्त तो गजब का शोषण करते हैं! ये तो पंचामृत पीते हैं। ये दूध ही नहीं पीते; गौ-मूत्र, गोबर, दूध, दही, घी--इन पांच चीजों का नाम पंचामृत! इससे तो मोरारजी भाई देसाई बेहतर, कम से कम अपना तो पीते हैं--स्वदेशी! स्वावलंबी! क्या गौ का पी रहे हो!
अरे, ऋषि-मुनि पहले ही कह गए कि अमृत-घट भीतर है! मगर मोरारजी देसाई के पहले कोई नहीं खोज पाया था--अमृत-घट कहां है! अमृत घट यानी ब्लैडर! वहां अमृत भरा हुआ है। और टोंटी भी परमात्मा ने दी हुई है, जब चाहो तब निकालो और पीओ!
मैं तो मोरारजी भाई को कहूंगा: थोड़े और आगे बढ़ो--पंचामृत बनाओ। क्या जीवन-जल ही पी रहे हो! पंचामृत पीओ, तो अमर हो जाओगे। जब स्वमूत्र पीने से पचासी साल जी गए और प्रधानमंत्री बन गए, अगर पंचामृत पीओ, अपना ही पंचामृत होना चाहिए, फिर तो मौत असंभव है। और पक्का समझो कि तुम सारी दुनिया के राष्ट्र जब इकट्ठे हो जाएंगे, तुम्हें पहले उसके प्रधान बनोगे--बड़ा प्रधान! असली बड़ा प्रधान!
गौ-भक्ति क्या है यह? किसलिए है? और अगर दूध के कारण ही गौ-भक्ति है, तो फिर भैंस की भक्ति क्यों नहीं करते? आखिर भैंस का क्या कसूर है बेचारी का!
न तो मेरी किसी तक कोई पहुंच है, न मुझे किसी तक पहुंच की कोई जरूरत है। मैं अपने कमरे के बाहर नहीं जाता, पहुंचूंगा कैसे! और अगर मेरी पहुंच होती भी तो मैं इस तरह की मूर्खतापूर्ण बातों में रस नहीं लेता।
जिंदगी में बड़े सवाल हैं और तुम कहां गौ-हत्या की बातों में पड़े हो! ये ही मूढ़ जन, ये ही देहाती किस्म के साधु-संत, गंवार जिनको कहना चाहिए--गंवार का मतलब समझ लेना, गांव के, और कुछ मतलब नहीं है। गंवार यानी गांव के--ये ही भारत को बीसवीं सदी में नहीं आने दे रहे हैं। इन्हीं दुष्टों के कारण भारत पिछड़ा हुआ है। यह कोई हजार साल पीछे जिंदा है।
दुनिया कहां से कहां पहुंच गई! आदमी जमीन से चांद तक पहुंच गया। ये गऊ के थन से अटके हुए हैं! और थन में से कुछ निकलता भी नहीं। कुछ निकले तो भी ठीक, मगर थन ही खींच रहे हैं! और गौ-भक्ति चल रही है!
मगर ये सब राजनीतिक दांव-पेंच हैं। यह हिंदू-मन का शोषण है। हिंदू की धारणा है गौ-भक्ति की। तो बस हिंदू-मन को शोषण करना हो, तो गौ-भक्ति की बात करो।
और वे कहते हैं कि अगर मैं इतना कर दूं, तो वे मेरे शिष्य हो जाएंगे। तुम तो हो जाओगे, मगर मैं तुम्हें शिष्य स्वीकार करूंगा? कभी नहीं! ऐसे दकियानूसी लोगों को मैं शिष्य स्वीकार नहीं करता।
और पहली तो बात यह कि शिष्य होने की शर्त नहीं होती। और तुम शर्त लगा रहे हो। सशर्त कोई शिष्य होता है? शिष्य का अर्थ ही होता: बेशर्त समर्पण।
वे शर्त लगा रहे हैं कि गौ-हत्या बंद करवा दूं, तो मेरे शिष्य हो जाएंगे! जैसे मुझे प्रलोभन दे रहे हों; जैसे मुझे कुछ रस हो इनके शिष्य होने में! इनका क्या करूंगा? और एक बांझ गाय बांध ली घर में! इनका करना क्या है! कोई यहां श्रीमदभागवत सप्ताह करवाना है?
और श्रीमदभागवत में है भी क्या? जो हिंदू नहीं है, अगर वह पढ़ेगा श्रीमदभागवत तो हैरान होगा कि कृष्ण की जिन लीलाओं का वर्णन है, अगर ये लीलाएं हर-एक करने लगे तो हर-एक आदमी जेल में हो। फिर हमें जेल बड़े करना पड़ें। सच तो यह है कि हमें सबको जेल में कर देना पड़े, कुछ थोड़े-से लोग जो श्रीमदभागवत को मान कर न चलते हों, उनको बाहर। या यूं समझो कि अभी जो जेल हैं, उनको बाहर बना देना पड़े और अभी जो बाहर है उसको जेल बना देना पड़े।
श्रीमद भागवत में है क्या? जरा सोचो, जरा विचारो। तुम्हारी स्त्रियों के जरा कोई कपड़े चुरा कर झाड़ पर चढ़ जाए, तो क्या करोगे? पुलिस में खबर करोगे कि इनकी पूजा करोगे? पूजा ही के अर्थों में पूजा करनी पड़ेगी फिर; ठीक से पूजा करनी पड़ेगी! जिसको मराठी में शिक्षा कहते हैं, वैसी शिक्षा देनी पड़ेगी।
और कृष्ण की सोलह हजार स्त्रियां थीं, जिनमें दूसरों की स्त्रियां थीं भगाई हुई! दूसरों की विवाहित स्त्रियां थीं भगाई हुई! सब चोरी-चपाटी थी।
और बड़ा मजा यह है कि कृष्ण की लोग प्रशंसा किए चले जाते हैं ये भक्तगण, क्योंकि उन्होंने द्रौपदी की लाज बचाई। और सोलह हजार स्त्रियों की लाज लूटी, उसका कुछ हिसाब नहीं! दूसरों की स्त्रियों की लाज लूटी, उसका कुछ हिसाब नहीं। और द्रौपदी इनकी बहन थी, उसकी लाज बचाई तो कोई खास बात हुई? अरे, अपनी बहन की तो कोई भी लाज बचाता है! इसीलिए तो जब किसी को तुम गाली देते हो, तो उसको बहन की गाली देते हो। कभी सोचा तुमने, क्यों देते हो? बहन का कोई हाथ ही नहीं है! बहन की गाली देकर तुम उसको उकसाते हो कि बचाओ लाज!
एक बड़े मजे की बात है कि आदमी कसूर करे, उसकी बहन को गाली पड़ती है! और किसी की बहन को गाली दो, फौरन लट्ठ लेकर खड़ा हो जाता है। लाज बचाएगा ही। सभी कृष्ण हैं इस अर्थों में तो!
और ये दूसरों की स्त्रियां भगा लाए! और इसका भक्त गण बड़ी प्रशंसा से--क्या रस ले-लेकर वर्णन करते हैं! आह! वाह-वाह! सुभान अल्लाह!
कोई यहां श्रीमदभागवत सप्ताह करवाना है? मैं ऐसे लोगों को शिष्य वगैरह नहीं लेता। मेरा रस इन दकियानूसी मुर्दों में नहीं है; वे होना भी चाहें, तो भी दरवाजे के बाहर से संत महाराज ही उन्हें लौटा देंगे कि रास्ते पर लग जाओ! आगे बढ़ो!
और तीसरी बात, उन्होंने कहा कि रजनीश जी को भगवान कहने में मुझे तकलीफ नहीं है। तकलीफ नहीं है, तो कहा किसलिए? तकलीफ होगी, नहीं तो बात ही कहने की नहीं है कुछ।
भगवान कहने में तकलीफ नहीं है और भगवान को कच्छ आने देने में तकलीफ है? क्या मजे की बात हो रही है!
और कहा कि मैं उन्हें बड़े पवित्र, प्रज्ञावान और विद्वान समझता हूं। अगर बड़े पवित्र, प्रज्ञावान और पवित्र समझते हो, तो जो मैं कह रहा हूं, उस पर थोड़ा ध्यान दो। उस पर तो कुछ ध्यान देते नहीं।
यह कहा होगा कि डर के मारे, क्योंकि मेरे संन्यासियों ने उनको ऐसी दिक्कत में डाल दिया कि उनको किसी तरह समझाने-बुझाने के लिए कहा होगा कि चलो, भगवान भी माने लेता हूं, प्रज्ञावान भी माने लेता हूं।
प्रज्ञावान हम उसको कहते हैं, जिसको बुद्धत्व उपलब्ध हुआ, प्रज्ञा उपलब्ध हुई। अब जिसको बुद्धत्व उपलब्ध हुआ, उसकी बात सुनो, समझो, अगर मानते हो तो। या फिर इस तरह की झूठी बातें न कहो। ये खुशामदी बातें हैं। मगर तथाकथित भक्त बस, खुशामद ही सीखे हैं।
इस देश में चमचे बहुत पुराने हैं। यह कोई नई बात नहीं है कि आज दिल्ली में चमचे इकट्ठे हो गए हैं। चमचा इस मुल्क में बड़ा धार्मिक व्यक्ति रहा है--सदा से। इसलिए तो हम परमात्मा की स्तुति करते हैं; वह चमचागिरी है, और कुछ भी नहीं है--कि हम पापी और तुम महाकरुणावान, कि हम दीन-हीन और तुम दीन-हीनों को बचाने वाले! यह तुम स्तुति कर रहे हो या खुशामद? स्तुति का मतलब भी खुशामद ही होता है।
और खुशामद से तुम सोचते हो तुम परमात्मा को प्रसन्न कर लोगे! राजनेताओं को कर लो भला, क्योंकि ये तुम जैसे ही मूढ़ हैं। इनमें और तुममें कुछ भेद नहीं है। इनको तुम जो कहो खुशामद में, उसको जान लेंगे।
निपट भोंदुओं को कहो कि आप जैसा बुद्धिमान कोई भी नहीं है; जिनकी शक्ल देख कर बच्चे डर जाएं, उनको कहो कि अहा, आपका सौंदर्य! नहीं पृथ्वी पर ऐसे कोई सौंदर्य का धनी हुआ कभी! और ये बड़े प्रसन्न होंगे, बड़े आनंदित होंगे। ये तुम्हारी बात स्वीकार कर लेंगे। इसी स्तुति को तुम परमात्मा के लिए कर रहे हो।
परमात्मा को भी लोग रिश्वत दे रहे हैं इस देश में। इसलिए तो रिश्वत इस देश से हटाना बहुत मुश्किल है। नारियल चढ़ा आते हैं हनुमान जी को। नारियल क्या है? रिश्वत है--कि बेटा नहीं हो रहा, बेटा पैदा हो जाए, तो एक नारियल और चढ़ाऊंगा; कि पांच आने का प्रसाद बांट दूंगा! कि हे गणेश जी, अगर इस बार लाटरी मेरे नाम खुल जाए, तो पक्का समझो, सत्यनारायण की कथा करवा दूंगा; गणेश उत्सव में गणेश की मूर्ति बनवा दूंगा, कि झांकी सजवा दूंगा!
तुमने क्या समझा है परमात्मा को? मगर लोग ऐसे ही मूढ़ हैं।
मेरे गांव में, जब मैं छोटा था, मेरे गांव में मुहर्रम बड़े उत्सव से मनाया जाता है। और हिंदू-मुसलिम दंगा मेरे गांव में कभी हुआ नहीं। तो हिंदू-मुसलमान दोनों ही सम्मिलित होते हैं। और मुहर्रम के समय वली उठते हैं, वली की सवारियां उठती हैं। और जो आदमी सवारी ले कर कूदता-फांदता है, उछलता है, उसके सामने लोग मनौतियां मनाते हैं। और जो जितना उछलता-कूदता है, उतना ही बड़ा वली समझा जाता है।
मुझे बचपन से ही शक रहा कि यह उछल-कूद सब झूठ है। तो मैं बामुश्किल कोशिश करके एक सवारी की डोर पकड़ने को किसी तरह से मौका पा गया। पीछे ही पड़ा रहा लोगों के, तो उन्होंने कहा कि अच्छा भई, इस छोकरे को रस्सी पकड़ा दो; यह पीछे ही पड़ा है। बड़ा धार्मिक भाव वाला है!
मैं साथ में एक सुई भी ले गया था, क्योंकि मैंने सुन रखा था कि जब वली आ जाते हैं, तो फिर उसको पता ही नहीं चलता; गर्दन भी काट दो, तो पता नहीं चलता। तो मैं सुई चुभोऊं कि पता चलता है कि नहीं। और जब मैं सुई चुभोऊं, तो वे और उछलें-कूदें। पता उसे ठीक से चल रहा है कि जब भी सुई चुभाऊं, तब वह और उछले-कूदे, और शोरगुल मचाए!
हालत यह हो गई कि मैं जिसकी डोर पकड़ लूं, वह वली सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हो जाए गांव में, उसको ज्यादा चढ़ोतरी चढ़े; और लोग कहने लगे, इस छोकरे में भी कुछ गुण है, जिसकी डोर पकड़ लेता है...। मगर जो वली बनें, वे मेरे हाथ-पैर जोड़ें बाद में कि भैया, तू किसी और की डोर पकड़ना। अब तुझसे क्या छिपाना! और हम वैसे ही कूदेंगे, तू सुई मत चुभाया कर!
यह प्राइवेट, अकेले में मुझसे कह दें कि देख, सुई मत चुभाना। डोर तू भला पकड़, क्योंकि फायदा हमें भी है, चढ़ोतरी होती है। कोई बेटा नहीं हो रहा, किसी को बेटी नहीं हो रही, किसी की सगाई नहीं हो रही। तो लोग चढ़ोतरी चढ़ाते हैं, रेवड़ियां बंटवाते हैं, मिठाइयां लाते हैं। तेरी वजह से हमको कम से कम चार-पांच गुना ज्यादा मिलता है। मगर तू हमारी जान ले लेता है। हम वैसे ही उचकेंगे। तू सिर्फ हाथ से इशारा कर दिया कर। सुई चुभाने की कोई जरूरत नहीं है।
तो मैं उनसे कहता कि आधा मेरा! तो आधा मुझे मिलता। और मैंने करीब-करीब सारे वलियों की रस्सियां पकड़ कर देखीं, वे सब सुई चुभाने से खूब उछलते-कूदते। और बाद में मुझसे हाथ जोड़ कर कहते कि भैया, तू हमारी बदनामी न करवा। क्रोध तो हमें इतना आता है एक झापड़, तेरे को एक चपत मार दें, मगर अगर मारें, तो हमारी भद्द खुल जाए। सो हम कुछ कह भी नहीं सकते, उछलना ही कूदना पड़ता है।
मगर लोग चढ़ा रहे हैं...। तब से मैंने देखा कि क्या धोखाधड़ी चल रही है! गणेश जी की मूर्ति के सामने चढ़ा रहे हो, हनुमान जी की मूर्ति के सामने चढ़ा रहे हो! किसी को गौ-भक्ति की पड़ी है, किसी को बंदर-भक्ति की पड़ी है! कोई हाथियों की पूजा कर रहा है! इस देश की बुद्धि तो देखो थोड़ी।
अब वे खुशामद के लिए कह रहे हैं। यह स्तुति है झूठी। वे मेरे संन्यासी...। और मेरे संन्यासी तो तर्क करने में कुशल हो जाते हैं। वे तो चोट करने में कुशल हो जाते हैं। उनके पास तो तलवार में धार आ जाती है। तो बीस-पच्चीस संन्यासी गए, उन्होंने उनको ठिकाने लगा दिया होगा। उस भय से कह रहे हैं। नहीं तो यह विरोधाभास कैसा?
चौथी बात उन्होंने कही कि अखबारों में मेरा जो निवेदन अन्य चौदह साधु-महंत-मंडलेश्व आदि के साथ आया है, उसमें जो शब्द और भाषा छापी गई है, ऐसा मैंने कभी कहा ही नहीं है; जो भी छपा है वह प्रेस की विकृति मात्र है।
अगर ऐसा है शंभू महाराज, तो उसका खंडन करना चाहिए अखबारों में। यह मेरे शिष्यों को कहने से कुछ सार नहीं है। अखबारों में खंडन करो कि तुम्हारे वचन गलत छापे गए हैं। वह तो तुमने खंडन नहीं किया। यह झूठ बात है।
सचाई यह है कि शंभू महाराज ने पच्चीस हजार रुपया दे कर अखबारों में वे वक्तव्य छपवाए। अखबारों में कोई वक्तव्य छापने को राजी भी नहीं था। और ये कौन हैं चौदह साधु-महंत-मंडलेश्वर? ये वे ही लोग हैं, जिनके निहित स्वार्थों पर मुझसे चोट हो रही है। ये वे ही लोग हैं, जो कह रहे हैं--जगत माया है और ब्रह्म सत्य है। ये वे ही लोग हैं, जो लोगों का शोषण कर रहे हैं और इस देश की प्रज्ञा को आगे नहीं बढ़ने दे रहे। ये वे लोग हैं, जो जंजीरें हैं, जिनको तोड़े बिना हम आगे बढ़ नहीं सकेंगे। ये हमारे फांसी के फंदे हैं।
अगर यह सच है, तो मेरे संन्यासियों से कहने से कोई प्रयोजन नहीं। अखबारों में वक्तव्य दो कि तुम्हारा वक्तव्य गलत छापा गया है, विकृत किया गया है। और अखबारों में स्वीकार करो कि तुम मुझे भगवान स्वीकार करते हो, प्रज्ञावान स्वीकार करते हो, विद्वान स्वीकार करते हो।
ये स्वीकार नहीं कर सकेंगे अखबारों में वे। क्योंकि ये स्वीकार करेंगे, तो फिर मेरा कच्छ आने में विरोध कैसे करेंगे? विरोध तो वे यह कर रहे हैं कि मेरे कच्छ आने से कच्छ की संस्कृति नष्ट हो जाएगी, कच्छ की सभ्यता नष्ट हो जाएगी, कच्छ तो पाताल में चला जाएगा--मेरे आने से!
इनमें से किसी को कच्छ की अभी तक कोई सुध न थी। मैंने कच्छ जाने की बात की, तो इनको कच्छ की बड़ी प्रीति जगी है! सबको कच्छ की प्रीति जगी है। कच्छ को बचाना है!
और मैं जो दे रहा हूं, वह संस्कृति नहीं तो क्या है? निश्चित ही वह बीसवीं सदी की संस्कृति है। बीसवीं की ही नहीं, इक्कीसवीं सदी की संस्कृति है। मैं जो दे रहा हूं, वह भविष्य की सभ्यता है। और तुम जो बचा रहे हो, वे अतीत की मुर्दा लाशें हैं, जिनको कभी का दफना दिया जाना चाहिए था।
इसलिए वक्तव्य वे दे भी नहीं सकते, क्योंकि अगर कहें कि यह भगवान है व्यक्ति, प्रज्ञावान है, तो फिर इससे कैसे संस्कृति नष्ट हो जाएगी और सभ्यता नष्ट हो जाएगी? और जब मेरे शिष्य होने को तैयार हैं...। और मुद्दा क्या है कि गौ-हत्या बंद हो जाए, तो वे मेरे शिष्य होने को तैयार हैं!
शंकराचार्य को छोड़ने को इतनी जल्दी तैयार! फिर मेरी सब गलत बातें मानने को तैयार! फिर मैं तुम्हारी संस्कृति नष्ट नहीं कर दूंगा? फिर तुम्हारी सभ्यता का क्या होगा, तुम्हारे धर्म का क्या होगा? कच्छ को डुबा रहा हूं, तुमको भी डूबा दूंगा! तुम कैसे बचोगे मेरे शिष्य हो कर? गौ बच जाएगी मान लो, मगर तुम कैसे बचोगे?
यह जरा सोचो। इस तरह के व्यर्थ के लोग हमारी छाती पर सवार हैं।
और पांचवी बात उन्होंने कही कि अब भगवान रजनीश अच्छे ढंग से बोल रहे हैं; पहले जैसे नहीं रहे हैं, कुछ सुधर गए हैं!
बिलकुल गलत! मैं और बिगड़ रहा हूं। सुधरने का सवाल ही नहीं उठता। मुझे जैसे-जैसे अनुभव होता जा रहा है इन सारे नासमझों का, उतनी-उतनी मैं धार रख रहा हूं। इनकी गर्दनें काटनी हैं। मैं चोट और गहरी कर रहा हूं। मेरी चोट रोज गहरी होती जाएगी। इस गलती में न रहे कोई। मगर यह फिर वे मेरे शिष्यों को समझा रहे हैं।
अब यह बड़े मजे की बात है कि एक तरफ कहते हैं मुझे भगवान रजनीश, और दूसरी तरफ यह भी कहते हैं कि सुधर रहे हैं! भगवान में भी कुछ सुधरने को बचता है? मतलब यह हुआ कि भगवान हो कर भी कुछ सुधरने को रह जाता है शेष! बिगड़ने को ही बचता है, सुधरने को कुछ नहीं बचता। अब भगवान ही हो गए तो अब बिगड़ने का डर भी नहीं रहता। अब तो तुम मुझे नर्क में भी भेज दो, तो कोई फर्क नहीं पड़ता। वहीं उत्सव मनाऊंगा। वहीं तुम पाओगे कि शैतान को मैंने संन्यासी बना लिया है!
अब मुझे कोई न सुधरना है, न बिगड़ने का कोई डर है। मगर ये देखते हो मूढ़ता-पूर्ण बातें कि भगवान रजनीश अच्छे ढंग से बोल रहे हैं; पहले जैसे नहीं रहे हैं, कुछ सुधर गए हैं!
कुछ! उसमें भी कंजूसी है। पूरा कैसे कहें, क्योंकि भीतर तो कुछ और भरा है। भीतर तो यह भरा है कि मैं उनकी जड़ें काटे डाल रहा हूं। इसलिए कुछ अपने लिए बचाव भी तो रखना पड़ेगा। अगर कह दें कि बिलकुल सुधर गए हैं, तो फिर विरोध कैसे करेंगे? तो कुछ सुधर गए हैं! सो मेरे संन्यासियों को भी राजी कर लें और महंत-मंडलेश्वर और महात्माओं को भी राजी कर लें कि कुछ ही कहा है मैंने, कुछ पूरा तो कहा नहीं।
भगवान का अर्थ ही होता है कि जिसने सब पा लिया; जिसने अपने को पा लिया; जो अपने घर आ गया; जिसने अपने स्वभाव में थिरता पा ली। ज्यूं था त्यूं ठहराया!
और आखिरी छठवीं बात उन्होंने कही कि मैं अखिल भारत सनातन धर्म परिषद का उप-प्रमुख हूं। और गुजरात में रहने के कारण कच्छ के आरम का विरोध संगठन की ओर से करना पड़ रहा है।
क्या बेईमानी है! तो छोड़ो ऐसा संगठन जिसके कारण झूठ काम करने पड़ रहे हैं!
इस वक्तव्य का तो मतलब यह हुआ कि वे विरोध नहीं करना चाहते, लेकिन चूंकि सनातन धर्म परिषद के उप-प्रमुख हैं, इसलिए संगठन के कारण विरोध करना पड़ रहा है। तो छोड़ो संगठन सत्य के लिए। सत्य बड़ा है कि संगठन बड़ा है?
लेकिन सब तरफ राजनीति है। उप-प्रमुख हैं, कैसे छोड़ दें! पद पर हैं। पद बड़ी चीज है, सत्य वगैरह की किसको फिक्र है! सत्य का विरोध किया जा सकता है, मगर पद थोड़े ही छोड़ा जा सकता है! पद के लिए समझौता किया जा सकता है।
ये कैसे धार्मिक लोग हैं, जो खुद कह रहे हैं अपने मुंह से कि संगठन के कारण विरोध करना पड़ रहा है; मैं विरोध नहीं करना चाहता! यह तो मजबूरी है, चूंकि में उप-प्रमुख हूं।
तो इस्तीफा क्यों नहीं देते? कौन तुम्हें रोक रहा है इस्तीफा देने से? इस्तीफा दे दो। ऐसे संगठन में क्या रहना जो गलत काम करता हो, गलत काम करवाता हो? और ऐसे संगठन को सनातन धर्म कैसे कहना?
सनातन-धर्म किसी की बपौती नहीं है। हिंदुओं की कोई बपौती नहीं है। सनातन-धर्म और हिंदू-धर्म पर्यायवाची नहीं हैं। सनातन-धर्म पर किसी को ठेका नहीं है।
सनातन-धर्म का अर्थ होता है: धर्म की वह अनंत धारा, जिसमें सब बुद्ध हुए--लाओत्सू हुए, जरथुस्त्र हुए, कृष्ण हुए, महावीर हुए, जीसस हुए, कबीर हुए, नानक हुए, रैदास हुए, रज्जब हुए। यह अनंत धारा!
सनातन-धर्म का अर्थ हिंदू नहीं है। सनातन-धर्म का अर्थ तो समस्त धर्मों का जो सार है, निचोड़ है--बाइबिल, कुरान, वेद, धम्मपद, अवेस्ता--इन सबका जो निचोड़ है, जो सारसूत्र हैं। एक धम्मो सनंतनो बुद्ध ने कहा है। वह है सनातन-धर्म, जो सारे धर्मों का निचोड़ है।
धर्म आते हैं और जाते हैं, सनातन-धर्म न आता है न जाता है। सनातन-धर्म तो सत्य का पर्यायवाची है। हिंदू रहें दुनिया में न रहें, कोई फर्क नहीं पड़ता--सनातन-धर्म रहेगा! किसी और रंग-ढंग में रहेगा, किसी और वेश में रहेगा, किसी और शास्त्र से प्रकट होगा, किसी और बुद्ध के वचनों में झलकेगा। हिंदुओं के होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता।
लेकिन हिंदुओं को यह भ्रांति है कि उनका धर्म सनातन है। जैनों को यह भ्रांति है कि उनका धर्म सनातन है। जैन दवा करते हैं कि वेद से भी पुराना है उनका धर्म, क्योंकि वेद में, ऋग्वेद में जैनों के पहले तीर्थंकर के नाम का उल्लेख है। इससे बात तो यह सिद्ध होती है कि ऋग्वेद बाद में लिखा गया होगा। जैनों के पहले तीर्थंकर, पहले हो चुके होंगे। और सम्मानपूर्वक उल्लेख है; जीवित अगर होते तो सम्मान तो हो ही नहीं सकता था। जीवित बुद्ध का तो हमेशा अपमान होगा है! कम से कम मरे हुए तीन सौ साल तो हो ही गए होंगे, कम से कम, ज्यादा हो गए होंगे, मगर कम से कम तीन सौ साल का फासला तो चाहिए, तब तक सम्मान मिल पाता है।
जीवित बुद्धों को तो सूली लगती है, पत्थर मारे जाते हैं, कानों में खीले ठोंके जाते हैं। मुर्दा बुद्धों की पूजा की जाती है!
इतने सम्मान से उल्लेख है आदिनाथ का, इससे सबूत मिलता है कि देर हो गई होगी, काफी समय हो गया होगा आदिनाथ को हुए। अगर जीवित होते तो वेद उनका सम्मानपूर्वक उल्लेख नहीं कर सकते थे, क्योंकि आदिनाथ और वेद में क्या तालमेल? कोई तालमेल नहीं।
वेद बहुत ही मौलिक है, बहुत ही सांसारिक है, बहुत पदार्थवादी है। वेद में कुछ सूत्र हैं जो अध्यात्म के हैं। निन्यानबे प्रतिशत सूत्र तो बिलकुल ही भौतिकवादी हैं--इतने भौतिकवादी कि भौतिकवादी भी शरमा जाए। गौ-भक्तों की ऐसी-ऐसी प्रार्थनाएं वेदों में हैं कि मेरी गऊ के थनों में दूध बढ़ जाए और दुश्मन की गऊ के थनों का दूध सूख जाए। क्या धार्मिक बातें हो रही हैं!
और वेद के समय में गौ-हत्या जारी थी, अश्वमेध यज्ञ होते थे, गौमेध यज्ञ होते थे, नरमेध यज्ञ भी होते थे, जिनमें आदमियों की बलि दी जाती थी। गऊओं की बलि दी जाती थी, घोड़ों की बलि दी जाती थी। और ये वेद को मानने वाले लोग शोरगुल मचाए फिरते हैं--गौ-हत्या बंद होनी चाहिए! वेदों में कहीं कोई गौ-हत्या बंद करने का उल्लेख नहीं है।
आदिनाथ बिलकुल विरोध में थे--किसी भी तरह की हिंसा के। जैन धर्म का तो मूल ही--अहिंसा परम धर्म है।
आदिनाथ का सम्मान से उल्लेख इस बात का सूचक है कि काफी समय हो चुका होगा आदिनाथ को मरे। तो जैनों के पास तर्क तो है कि उनका धर्म इनसे भी ज्यादा पुराना है। लेकिन पुराने होने से कोई सनातन नहीं होता।
जैनों के पहले और संस्कृतियां हो गईं, और धर्म हो गए। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो में खुदाई जो हुई है, वे सात हजार साल पुरानी सभ्यता के अवशेष हैं। हड़प्पा में एक मूर्ति मिली है--पद्मासन में बैठे हुए व्यक्ति की। निश्चित ही योग, पतंजलि के योग-सूत्र से ज्यादा पुराना है। महावीर बैठे पद्मासन में, इससे पांच हजार साल पहले कोई बैठ चुका है। हड़प्पा में उसकी मूर्ति मिली है।
और हड़प्पा और मोहनजोदड़ो दोनों ही आर्यों के भारत आने के पहले की सभ्यताएं हैं, आर्यों का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। और आर्यों ने कहीं हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता का उल्लेख नहीं किया है। वेदों में कोई उल्लेख नहीं है। वेद बाद में रचे गए हैं।
तो हड़प्पा, मोहनजोदड़ो में कोई धर्म रहा होगा, तब तो पद्मासन लगाए बैठा है कोई आदमी, ध्यान कर रहा है। एक आदमी की आंख बंद किए हुए खड़ी हुई मूर्ति मिली है। कोई आंख बंद करके खड़ा होकर ध्यान कर रहा है।
ध्यान भी था, योग भी था, धर्म भी था--हिंदुओं के बहुत पहले, जैनों के बहुत पहले, बुद्धों के बहुत पहले। मगर कहां गया वह धर्म जो हड़प्पा, मोहनजोदड़ो में था? न उसके मानने वाले रहे, न वह धर्म रहा।
मगर धर्म किसी के साथ नष्ट नहीं होता। सवारियां बदल जाती हैं, मगर धर्म की यात्रा जारी रहती है। पश्चिम में बहुत-से धर्म रहे। समाप्त हो गए। मगर धर्मों के समाप्त होने से धर्म समाप्त नहीं होता। धर्म सनातन है।
धर्म का अर्थ समझो। धर्म का अर्थ है: जगत का स्वभाव; जगत का नियंत्रण करने वाला सूत्र, जगत को जो अपने में बांधे हुए है। जगत को जो धारण किए हुए है--वह धर्म। एस धम्मो सनंतनो! उसी धर्म को हम सनातन कह सकते हैं। उसका हिंदू, ईसाई, मुसलमान से कुछ लेना-देना नहीं; जैन-बौद्ध से कुछ लेना-देना नहीं। ये सब उसी धर्म की छायाएं हैं।
जैसे चांद निकलता है, तो नदी में भी प्रतिबिंब बनता है, तालाब में भी, झील में भी, पोखरों में भी, डबरों में भी--जिसकी जितनी हैसियत, वैसा प्रतिबिंब बन जाता है। गंदा डबरा होगा, तो उस में भी प्रतिबिंब बनता है। तुम एक थाली रख दोगे पानी भर कर, तो उसमें भी प्रतिबिंब बनेगा। करोड़ों प्रतिबिंब बनेंगे, चांद एक है। क्या तुम सोचते हो, तुम्हारी थाली टूट जाएगी, पानी बिखर जाएगा, तो चांद टूट जाएगा और बिखर जाएगा? क्या तुम सोचते हो, तुम्हारी तलैया सूख जाएगी, तो चांद सूख जाएगा? क्या तुम सोचते हो, तुम्हारी नदी आंधीत्तूफान से भर जाएगी और लहरें उठ आएंगी तो प्रतिबिंब छितर-बितर हो जाएगा, मगर चांद थोड़े ही छितर-बितर हो जाएगा।
एस धम्मो सनंतनो! वह धर्मसनातन है, जिसकी छायाएं तो बनती हैं, मिटती हैं, मगर जो स्वयं न बनता है न मिटता है, जो सदा से है। सभी बुद्धों ने उसकी तरफ इशारा किया है। सबकी अंगुलियां उसी चांद की तरफ उठी हैं। अंगुलियां अलग-अलग हैं, चांद एक है। अंगुलियां मत पकड़ लेना।
जो हिंदू होकर बैठ गया, उसने एक अंगुली पकड़ ली। जो जैन होकर बैठ गया, उसने दूसरी अंगुली पकड़ ली। जो ईसाई होकर बैठ गया, उसने तीसरी अंगुली पकड़ ली। ये तीनों अंगुलियां अलग-अलग हैं। निश्चित जीसस की अंगुली अलग होगी। महावीर की अंगुली अलग होगी; बुद्ध की अंगुली अलग होगी; कृष्ण की अंगुली अलग होगी; अंगुलियां अलग-अलग होंगी। इनकी देहें अलग-अलग हैं, इनके रंग-रूप अलग-अलग हैं, इनकी भाषा अलग-अलग हैं; मगर जिस चांद की तरफ इशारा है, न ईसाई देखता उस चांद को, न हिंदू देखता, न बौद्ध देखता; किसी को उस चांद से मतलब नहीं, सबको अपनी-अपनी अंगुली की पड़ी है। अंगुली की पूजा चल रही है। बड़ी अजीब यह दुनिया है!
मैंने सुना है, एक महात्मा के दो शिष्य थे। एक दोपहर महात्मा, गर्मी थी, लेटा। दोनों शिष्यों में झगड़ा हो रहा था, प्रतिस्पर्धा हो रही थी--कौन सेवा करे। महात्मा ने कहा, ऐसा करो, तुम मुझे बांट लो। यह झगड़ा बंद करो। बायां पैर एक का, दायां पैर एक का।
महात्मा लेट गया। एक बायां पैर दबाने लगा; जिसका बायां पैर था, वह बायां दबाने लगा। जिसका दायां था, वह दायां दबाने लगा। नींद में महात्मा ने करवट बदली; बाएं पर दायां पैर पड़ गया। तो जिसका बायां था, उसने कहा, हटा ले अपने पैर को! मेरे पैर पर पड़ रहा है।
उसने कहा, अरे देख लिए तेरे जैसे बहुत! कौन है, जो मुझसे कहे कि हटा ले! है कोई माई का लाल, जो मुझसे कह दे कि मेरा पैर हट जाए? नहीं हटेगा। कर ले जो तुझे करना है!
उसने कहा, देख हटा ले! नहीं तो कुटाई कर दूंगा तेरे पैर की!
उसने कहा, देखूं तो तू कर कुटाई मेरे पैर की। अगर तेरे पैर को काट कर दो टुकड़े न कर दूं, तो मेरा नाम नहीं; मेरे बाप का नाम बदल देना!
इनकी बातचीत सुनकर महात्मा की नींद खुल गई। आंखें बंद की हुईं उसने बात सुनी। उसने कहा, भाइयो, रुको, दोनों पैर मेरे हैं। न तेरा बायां है, न उसका दायां है! अब मेरे पैर की कुटाई और काटपीट मत कर देना!
मगर यही हो रहा है। सत्य की काटपीट हो रही है, क्योंकि मेरा, तेरा! सत्य किसी का भी नहीं है। हम सत्य को हो सकते हैं, सत्य हमारा नहीं होता। और दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं--एक वे, जो चाहते हैं, सत्य हमारा हो, हमारे अनुकूल हो, हमारे ढांचे में ढले; और एक वे, जो कहते हैं, हम सत्य के होने को राजी हैं; सत्य का जो रंग हो, जो ढंग हो, सत्य जहां ले जाए, हम उसके साथ जाने को राजी हैं; हम सत्य की छाया बनने को राजी हैं।
ये दूसरे लोग ही केवल सत्य को खोज पाते हैं। पहले तरह के लोग तो हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन, पारसी, सिक्ख होकर समाप्त हो जाते हैं। ये कभी सत्य को नहीं पा सकते हैं।
यह कैसा सनातन धर्म है?
शंभू महाराज कहते हैं, मैं अखिल भारतीय सनातन धर्म परिषद का उप-प्रमुख हूं। और गुजरात में रहने के कारण कच्छ के आश्रम का विरोध संगठन की ओर से करना पड़ रहा है।
यह तो बड़ी राजनीति हो गई। यह तो कुछ सनातन धर्म न रहा। यह तो धर्म भी न रहा, सनातन की तो बात ही छोड़ दो। इसमें तो कुछ धार्मिकता भी न रही; यह तो पद का मोह रहा।
छोड़ो ऐसा पद जिसके कारण गलत काम करना पड़ रहा है। इतनी धार्मिकता का सबूत तो दो। छोड़ो ऐसा संगठन, जिसके कारण विरोध करना पड़ रहा है। उप-प्रमुख बने रहने के लिए इतना रस है!
अजीब लोग हैं और अजीब झूठों में पड़े हैं। अजीब बेईमानियां में उलझे हुए हैं। और बेईमानियों को बड़े अच्छे-अच्छे शब्दों में ढाल रहे हैं, ढांक रहे हैं। फिर इनके झूठों के पर्दे के बीच से ये जो भी देखते हैं, वह भी विकृत हो जाता है। ये मुझे समझ नहीं पाते। कैसे समझ पाएंगे? इनके आग्रह ही, इनके पक्षपात ही, इनके पूर्वाग्रह ही बाधाएं बन जाते हैं।
सुना है मैंने, ढब्बू जी किसी सरकारी कार्यवश एक सप्ताह के लिए दिल्ली गए थे। दूसरे ही दिन वापस लौट आए। मैंने पूछा, आश्चर्य है कि आप तो सात दिन के लिए जरूरी काम के लिए दिल्ली गए थे, दो ही दिन में कैसे लौट आए! बोले, क्या बताएं, साले दिल्ली के लोगों को मेरे आने की खबर पहले से ही हो गई थी। अतः उन्होंने मेरी बेइज्जती करने के लिए जगह-जगह स्टेशन पर ही मेरे विरोध में पोस्टर चिपका दिए थे। इसलिए तो मैं स्टेशन से ही वापस लेकर टिकट, तुरंत लौट आया।
मेरा आश्चर्य और बढ़ा। मैंने कहा, मैं कुछ समझा नहीं। मामला जरा विस्तार से बतलाइए! मेरे बार-बार पूछने पर उन्होंने बामुश्किल सकुचाते हुए कहा, दिल्ली के कुछ गुंडों, लफंगों और असामाजिक तत्वों ने पोस्टर चिपकाए थे, जिन पर लिखा था--आज ही देखिए, चूकिए नहीं। आ गया, आ गया आपके शहर में--जोरू का गुलाम!
वे तो बेचारे किसी फिल्म का पोस्टर चिपकाए थे, मगर ये जोरू के गुलाम हैं ढब्बू जी। ये समझे कि मेरे लिए पोस्टर चिपकाए गए हैं--आ गया, आ गया! आज ही आपके शहर में, जोरू का गुलाम! स्टेशन से ही लौट आए!
लोग अपने ही पक्षों से, अपने पक्षपातों से, अपनी धारणाओं से देखते हैं, इसलिए सत्य से चूक जाते हैं। मैं सीधी-साफ बात कह रहा हूं--बिना लाग-लगाव के। सिर्फ वे ही समझ सकते हैं। जिनमें इतना साहस हो कि अपने पक्षपात और पूर्वाग्रहों को एक तरफ हटा कर रख दें। और मजा तो यह है, इन्हीं पक्षपातों के कारण लोग दुखी हैं। मगर फिर भी अपने दुख को भी लोग पकड़ लेते हैं। अपना दुख! अपना है, तो उससे भी मोह बना लेते हैं।
दो मित्र सड़क पर जा रहे थे। एक मित्र चलता और बीच-बीच में रुक जाता। दूसरे मित्र ने पूछा, क्या आपा जूता तंग है, कि आप ठीक से चल नहीं पा रहे?
पहला बोला, हां, वाकई जूता तंग है।
दूसरे मित्र ने कहा, तब तो बड़ा कष्ट हो रहा होगा?
पहला बोला, हां, थोड़ा तो है ही, पर इससे लाभ भी बहुत है।
दूसरा मित्र बोला, लाभ! वह क्या है?
पहला मित्र बोला, तंग जूता पहनने से जो कष्ट होता है, उससे दूसरे सभी कष्ट भूल जाते हैं!
एक से एक मजेदार लोग हैं। एक से एक उनकी तरकीबें हैं! तंग जूता पहने हुए हैं, और कष्ट भूल ही जाएंगे। तंग जूते का कष्ट इतना है कि अब और कष्ट क्या याद रहेंगे! चल रहे हैं घसिट कर, लंगड़ रहे हैं!
लोग दुखों को भी पकड़े बैठे हैं, झूठों को भी पकड़े बैठे हैं! और इतनी बातें उन्होंने कहीं और उन्हें जरा भी संकोच न आया कि क्या वे कह रहे हैं! शायद सोच-विचार भी न उठा होगा।
चंद्रकांत भारती ने ठीक किया कि मुझे ये सारी बातें लिख कर भेज दीं।
ये सारे लोग झूठों में पले हैं। इनके पास अपना कोई जीवंत अनुभव नहीं है; सब उधार है, सब बासा है। तोतों की तरह हैं ये लोग। ये दोहरा रहे हैं गीता, कुरान, बाइबिल। मगर अपना कोई अनुभव नहीं है। और जब तक सत्य स्वयं का अनुभव नहीं हो, तब तक सत्य सत्य नहीं होता।
मगर अपने झूठ पर भी अहंकार आरोपित हो जाता है। हमारे झूठ को भी कोई तोड़ दे, तो हमें पीड़ा होती है--हमारा जो था! और हमारे सारे चारों तरफ के वातावरण से हमें झूठ ही सिखाया जाता है।
एक वकील साहब ने अपने पुत्र को काबिल वकील बनाने का निश्चय किया था, इसलिए उसे बचपन से ही झूठ बोलना सिखा रहे थे। एक दिन पुत्र की परीक्षा लेने के लिए वकील साहब ने कहा, बेटा, अगर तुम मेरी बात खतम होते ही फौरन कोई शानदार झूठ बोलकर दिखाओ, तो मैं तुम्हें दस रुपए दूंगा।
अभी तो आप पंद्रह रुपया इनाम देने को कह रहे थे--पुत्र तुरंत बोला। देखा, सीख गया!
मुल्ला नसरुद्दीन अपने बेटे को राजनीति का पाठ पढ़ा रहा था, उससे कहा, बेटा, सीढ़ी पर चढ़ जा। बेटा सीढ़ी पर चढ़ गया--आज्ञाकारी बेटा! और मुल्ला ने कहा, अब तू बेटा, कूद पड़। मैं तुझे सम्हाल लूंगा।
बेटा थोड़ा डरा कि कहीं चूक जाए। ऊंची सीढ़ी। कहीं बाप के हाथ से नीचे गिर जाएं, हाथ-पैर टूट जाएं! मुल्ला ने कहा, बेफिक्र रह। अरे, अपने बाप पर भरोसा नहीं? कूद पड़!
थोड़ा झिझका, सकुचाया। मुल्ला ने फिर उसे उत्साह दिलाया, सो वह कूद पड़ा। और जब वह कूदा, तो मुल्ला दो कदम पीछे हट कर खड़ा हो गया! धड़ाम से नीचे गिरा। सिर फूट गया दीवाल से; पैर छिल गया; रोने लगा। मुल्ला ने कहा, चुप!
उसने कहा, आप हट क्यों गए?
मुल्ला ने कहा कि अब तू याद रख--इस जिंदगी में अपने बाप का भी भरोसा ठीक नहीं। यह पाठ तुझे पढ़ाया है बेटा!
मुल्ला राजनीतिज्ञ है, अपने बेटे को राजनीति सिखा रहा है--यहां अपने बाप का भी भरोसा ठीक नहीं! ऐसा उसने नगद पाठ पढ़ाया।
यहां हम झूठों में पाले जा रहे हैं; उधार धारणाएं हम पर थोपी जा रही हैं और हम उनको ही ढो रहे हैं। आंखें अंधी हो गई हैं धारणाओं में। हृदय बंद हो गए हैं। कुछ सूझ-बूझ नहीं। कुछ होश-हवास नहीं।
इन छह ही बातों में इतनी विपरीतताएं हैं, इतने विरोधाभास हैं कि कोई एक व्यक्ति इतनी बातों एक साथ कह सकता है, तो निश्चित ही विक्षिप्त होने का प्रमाण देता है।
मैं तो इतना ही चाहता हूं तुमसे कि तुम सारे पक्षपातों से मुक्त हो जाना। मेरी बातें को भी मत पकड़ना, क्योंकि मेरी बातें पकड़ोगे, तो वे पक्षपात बन जाएंगी। बातें ही मत पकड़ना।
तुम्हें निर्विचार होना है। तुम्हें मौन होना है। तुम्हें शून्य होना है। तभी तुम्हारे भीतर ध्यान का फूल खिलेगा। और ध्यान का फूल खिल जाए तो अमृत तुम्हारा है, परमात्मा तुम्हारा है। एस धम्मो सनंतनो!
और ध्यान का फूल खिल जाए, तो रज्जब की बात तुम्हें समझ में आ जाएगी: ज्यूं था त्यूं ठहराया! तुम वहीं ठहर जाओगे, तो तुम्हारा स्वभाव है। स्वभाव में थिर हो जाना इस जगत में सबसे बड़ी उपलब्धि है।

आज इतना ही।
दसवां प्रवचन; दिनांक २० सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें