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शनिवार, 8 जुलाई 2017

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-08



राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

जीवन का शंखनाद—प्रवचन-आठवां
प्रश्न-सार

1—देवता परोक्ष से प्रेम करते हैं, प्रत्यक्ष से द्वेष।
गोपथ ब्राह्मण के इस सूत्र को खोलने की अनुकंपा करें।

2—आपके आश्रम में क्या एक नये प्रकार की वर्ण-व्यवस्था, एक नये प्रकार की आश्रम-व्यवस्था नहीं है? क्या आप महर्षि मनु की वैज्ञानिक व्यवस्था और आश्रम-व्यवस्था को गलत सिद्ध कर सकते हैं?

पहला प्रश्न: भगवान,
परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति, प्रत्यक्ष द्विषः।
देवता परोक्ष से प्रेम करते हैं, प्रत्यक्ष से द्वेष।
भगवान, गोपथ ब्राह्मण के इस सूत्र को खोलने की अनुकंपा करें।
प्रदीप भारती,

द्वेष का दिव्यता से कोई भी संबंध नहीं हो सकता। जहां द्वेष है, वहां दिव्यता नहीं।
राबिया-अल-अदाबिया के जीवन में यह प्यारा उल्लेख है। उसके घर एक फकीर, हसन, मेहमान था। राबिया की कुरान को सुबह-सुबह उठ कर पढ़ रहा था। देख कर चकित हुआ कि राबिया ने कुरान में कुछ वचन काट डाले थे। यह बात कोई मुसलमान कल्पना भी नहीं कर सकता। कुरान में सुधार, कुरान में तरमीम मुसलमान के लिए कल्पनातीत है। क्योंकि कुरान तो अंतिम परमात्मा का संदेश है, अब उसमें कोई सुधार कभी नहीं होगा।
हसन तो बहुत चौंका। सोचा राबिया को शायद पता नहीं कि उसकी कुरान में किसी नासमझ ने, किसी काफिर ने, किसी पापी ने कुछ पंक्तियां काट दी हैं। उसने राबिया को कहा। राबिया कहने लगी, किसी काफिर ने नहीं, किसी पापी ने नहीं, वे पंक्तियां मैंने ही काट दी हैं।
तब तो हसन और चौंका। उसने कहा, यह तो और भी असंभव मालूम होता है। राबिया, तू जो कि ज्ञान को उपलब्ध है, कुरान में पंक्तियां काटने जैसा दुष्कृत्य करेगी! मजाक कर रही होगी मुझसे।
राबिया ने कहा, नहीं। जब से सत्य को जाना, जब से परमात्मा की प्रतीति हुई, तब से जीवन समग्ररूपेण प्रेम हो गया है। इसलिए मजबूरी में ये पंक्तियां काटनी पड़ीं, क्योंकि ये पंक्तियां कहती हैं--शैतान को घृणा करो। और अब घृणा मुझे असंभव हो गई है। अब शैतान भी मेरे सामने खड़ा हो तो भी मैं प्रेम ही कर सकती हूं। प्रेम के अतिरिक्त मेरे पास कुछ बचा नहीं। अब सवाल यह नहीं है कि शैतान सामने है कि परमात्मा सामने है। अब सवाल यह है कि मेरे भीतर घृणा का कोई उपाय नहीं। मेरे भीतर घृणा का कोई बीज भी नहीं। किसी कोने-कातर में छिपा कोई अंधेरा भी नहीं। मैं घृणा करना भी चाहूं तो असंभव है। अब तो प्रेम अपरिहार्य है। मैं शैतान को भी उतना ही प्रेम करूंगी जितना परमात्मा को। इसके सिवाय कोई उपाय नहीं है। अब मैं कुरान की सुनूं कि अपने अनुभव की सुनूं? मजबूरी में मुझे ये पंक्तियां काटनी पड़ी हैं। और ध्यान रहे, यह कुरान की प्रति मेरी है, यह मेरी प्रतीति के अनुकूल होनी चाहिए। और मेरी प्रतीति प्रेम की है। और यह भाषा घृणा की है--शैतान को घृणा करो।
लेकिन घृणा करने के लिए घृणा को बचाना तो होगा ही। घृणा देने के लिए घृणा भीतर तो सम्हाल कर रखनी ही होगी। और ध्यान रहे, घृणा और प्रेम एक साथ भीतर नहीं हो सकते। और जब तक घृणा है तब तक प्रेम नहीं। फिर चाहे घृणा को तुम कोई भी रंग दो, कोई भी रूप दो। और जब प्रेम आता है तो यूं आता है जैसे प्रकाश आता है। प्रकाश के आगमन पर अंधेरा नहीं। अंधेरा है तो प्रकाश का आगमन नहीं। यूं चाहो तो अंधेरे को ही प्रकाश कह लो, यह तुम्हारी मर्जी।
मैं इस सूत्र का समर्थन नहीं कर सकता हूं। गोपथ ब्राह्मण का यह सूत्र बुनियादी रूप से गलत है।
यह सूत्र कहता है: "देवता परोक्ष से प्रेम करते हैं और प्रत्यक्ष से द्वेष।'
द्वेष की भाषा दिव्यता की भाषा नहीं। देवता और द्वेष करे! फिर देवता कैसा? देवता भी द्वेष करे तो फिर द्वेष करने वाले साधारण मनुष्यों में और दिव्यता की अनुभूति में कोई भेद न रहा। द्वेष तो मनुष्यता से भी नीचे की बात है; वह तो पशुता का लक्षण है। और दिव्यता है मनुष्य का अतिक्रमण। वह तो है मनुष्य के भीतर परमात्मा के छिपे हुए रूप का अभिव्यक्त हो जाना।
फिर, यह भी समझना कि परोक्ष और प्रत्यक्ष में भेद क्या है?
जो परोक्ष है वह प्रत्यक्ष हो सकता है। और जो प्रत्यक्ष है वह कभी परोक्ष था। एक बीज है; हाथ में लो। अभी फूल अप्रत्यक्ष हैं, परोक्ष हैं, छुपे हैं, प्रच्छन्न हैं। अभी बीज प्रत्यक्ष है। लेकिन बीज को जमीन में बो दो। बीज मिट जाएगा। जो प्रत्यक्ष था वह खो जाएगा, लीन हो जाएगा। और फूल प्रकट हो जाएंगे। पौधा उगेगा, कलियां आएंगी, फूल खिलेंगे। जो परोक्ष था, अब प्रत्यक्ष हो गया। और फिर फूल बीजों में खो जाएंगे। फिर फूल झर जाएंगे और बीज रह जाएंगे। तो जो प्रत्यक्ष हो गया था वह फिर परोक्ष हो गया।
प्रत्यक्ष और परोक्ष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बुद्धत्व तुम्हारे भीतर परोक्ष है, बुद्ध के भीतर प्रत्यक्ष है। क्या देवता बुद्ध के प्रति द्वेष करेंगे और तुमसे प्रीति करेंगे? परोक्ष से प्रेम और प्रत्यक्ष से द्वेष--यह कैसा गणित है?
लेकिन देवता, दिव्यता से इसका कोई संबंध नहीं। यह गोपथ ब्राह्मण पुरोहित की भाषा बोल रहा है। पुरोहित निश्चित रूप से प्रत्यक्ष से द्वेष सिखाता है। प्रत्यक्ष है जगत और परोक्ष है परमात्मा। सदियों-सदियों से पुरोहित के जीवन का यही आधार रहा है; उसके शोषण की यही प्रक्रिया है कि वह प्रत्यक्ष से, जो आंख के सामने है उससे द्वेष सिखाए, और जो आंख के सामने नहीं है उसके लिए तुमसे हाथ जुड़वाए। गौर से देखोगे तो पुरोहित के व्यवसाय का सूत्र है यह। क्योंकि जो प्रत्यक्ष है उसके लिए तो पुरोहित की कोई जरूरत नहीं, किसी मध्यस्थ की कोई जरूरत नहीं। जो परोक्ष है, जो दिखाई नहीं पड़ता तुम्हें, स्वभावतः तुम्हें किसी का सहारा लेना होगा, जो दावा करता है कि उसे दिखाई पड़ता है। तुम्हें बीच में कोई मध्यस्थ, कोई दलाल स्वीकार करना होगा।
और यही दलाली धर्म के नाम को, धर्म की सारी संभावना को विनष्ट करने का कारण बनी। धर्म की नाव को डुबाया इसी दलाली ने, इन्हीं दलालों ने। ये इस किनारे को नदी के घृणा करना सिखाते हैं, द्वेष करना सिखाते हैं। और नदी के उस किनारे को प्रेम करना सिखाते हैं। और वह दूसरा किनारा तुम्हें दिखाई पड़ता नहीं। स्वभावतः उस दूसरे किनारे के नक्शे ये पुरोहित तुम्हें देते हैं।
इनको भी दिखाई नहीं पड़ता। इनको भी कोई पता नहीं। लेकिन जो नहीं दिखाई पड़ता उसके नाम पर शोषण किया जा सकता है। जो नहीं दिखाई पड़ता उसके संबंध में कुछ भी कहा जा सकता है और मानना पड़ेगा। और नहीं मानोगे तो डर, भय पैदा किया जाएगा कि नर्क में पड़ोगे, नर्क की अग्नि में जलोगे। और मानोगे तो प्रलोभन, पुरस्कार, स्वर्ग के आनंद, इन सबका तुम्हारे भीतर लोभ पैदा किया जाता है, तृष्णा पैदा की जाती है। एक तरफ भय और एक तरफ लोभ, इन दो पाटों के बीच में आदमी को पीसा गया है।
मगर प्रत्यक्ष के संबंध में पुरोहित की कौन सुनेगा? प्रत्यक्ष की खोज तो विज्ञान करता है। प्रत्यक्ष की खोज में तो वैज्ञानिक प्रामाणिक होगा। लेकिन परोक्ष की दुनिया का धंधा धोखेबाज और बेईमान खूब कर सकते हैं।
यह सूत्र देवताओं के संबंध में कुछ भी नहीं कहता। यह सूत्र, पुरोहित की जो आधारशिला है, उसकी घोषणा कर रहा है।
"परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति। देवता परोक्ष से प्रेम करते हैं। प्रत्यक्ष द्विषः। और प्रत्यक्ष से द्वेष।'
लेकिन क्यों देवता प्रत्यक्ष से द्वेष करेंगे? क्योंकि प्रत्यक्ष अंततः परमात्मा की ही तो अभिव्यक्ति है। प्रत्यक्ष भी तो उसी का साकार रूप है, उसी निर्गुण ने गुण लिया, उसी निराकार ने आकार लिया। क्यों घृणा करेंगे? क्यों द्वेष करेंगे?
लेकिन धर्म तुम्हें यही सिखाते रहे: संसार को छोड़ो। संसार प्रत्यक्ष है; इसे त्यागो और परोक्ष की खोज करो। यूं तुम्हें अंधेरे में भटकाया गया है। यूं तुम्हारे हाथ में जो था वह छीन लिया गया और तुम्हें ऐसी चीजें दे दी गईं, जिनको न तुम देख सकते हो, न पहचान सकते हो।
तुमसे कहा जाता है: संसार माया है और ब्रह्म सत्य है। जो है उसे तो माया समझाया जाता है; और जिसका तुम्हें कोई भी पता नहीं, उसके सत्य होने के तर्क दिए जाते हैं। इन तर्कों का खूब फायदा पुरोहितों ने, पंडितों ने, इमामों ने, पोपों ने जी भर कर उठाया है। स्वभावतः जिनको पृथ्वी का नक्शा भी पता नहीं था उन्होंने स्वर्ग के नक्शे बना कर दे दिए। उस पर विवाद भी नहीं हो सकता, विवाद का कोई आधार भी नहीं हो सकता, कोई परीक्षण का उपाय भी नहीं, कोई कसौटी भी नहीं।
इसलिए जैन स्वर्गों का एक नक्शा बनाते हैं, हिंदू दूसरा नक्शा बनाते हैं, मुसलमान तीसरा नक्शा बनाते हैं, ईसाई चौथा नक्शा बनाते हैं। पृथ्वी पर कोई तीन सौ धर्म हैं और तीन सौ धर्मों के कोई तीन हजार उपसंप्रदाय हैं। और इन सबके अपने नक्शे हैं। और सबकी मान्यता है, इनके नक्शे सही हैं। और इनके नक्शों को कोई भी गलत सिद्ध नहीं कर सकता। परोक्ष को गलत सिद्ध करने का भी उपाय नहीं।
प्रत्यक्ष के संबंध में पुरोहित मुश्किल में पड़ जाता है। इसलिए वह प्रत्यक्ष से बचता है; जब कि प्रत्यक्ष ही परमात्मा तक पहुंचने की सीढ़ी है। प्रत्यक्ष को ही समझोगे तो प्रत्यक्ष के भीतर छिपे हुए परोक्ष को भी खोज पाओगे।
लेकिन यह भी खयाल रखो: जब परोक्ष को जान लोगे तो वह भी प्रत्यक्ष हो गया। तब और भी मुश्किल खड़ी होगी। तब इस सूत्र को मानना और भी मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि जिन्होंने परमात्मा का साक्षात्कार किया है, उनके लिए परमात्मा प्रत्यक्ष हो गया। क्या देवता परमात्मा को भी द्वेष करेंगे? जिन्होंने आत्मा को जान लिया उनके लिए आत्मा प्रत्यक्ष हो गई। प्रत्यक्ष का मतलब आंख के सामने हो गई।
कबीर कहते हैं: लिखा-लिखी की है नहीं, देखा-देखी बात।
मगर देखा-देखी बात अगर है, तो प्रत्यक्ष हो गई। जो भी जान लिया, वही देवताओं के लिए द्वेष का कारण हो जाएगा। यह तो बड़ी अजीब बात हुई। इसका तो अर्थ यह हुआ कि अज्ञान को प्रेम करते हैं देवता और ज्ञान को घृणा करते हैं। तो देवता मूढ़ता के समर्थन में हैं और बुद्धत्व के विरोध में।
नहीं, मैं इस सूत्र से राजी नहीं हो सकता हूं। मुझे तो सामवेद का यह सूत्र ज्यादा प्रीतिकर लगता है: देवस्य पश्य काव्यम्। भगवान के मूर्त काव्य प्रकृति को देखो।
यह प्रकृति भगवान का मूर्त काव्य है। यहां अमूर्त मूर्त हुआ है। यहां, जो छिपा था, प्रकट हुआ है। जो गीत हृदय की किन्हीं गहराइयों में दबा था, वह झरना बन कर फूट पड़ा है। ये चांदत्तारे, ये सूरज, ये फूल, ये जीवन की अनंत भंगिमाएं, यह विशाल महोत्सव--यह परमात्मा की अभिव्यक्ति है, यह परमात्मा का काव्य है। यह उसका गीत है। इसको द्वेष करो? इसके प्रेम में डूबो! इसे गले लगाओ! इसके साथ नाचो! इसके साथ प्रीति का संबंध जोड़ो!
अगर तुम फूलों को प्रेम कर पाओ, अगर तुम चांदत्तारों की प्रीति में पड़ जाओ, तो परमात्मा बहुत दूर नहीं है। क्योंकि जब तुम वीणा से उठते हुए संगीत के प्रेम में पड़ जाते हो, तो संगीतज्ञ कितनी दूर है? ये वीणा के स्वर संगीतज्ञ तक पहुंचने के लिए मार्ग बन जाएंगे। जब तुम नृत्य में आनंदमग्न हो जाते हो, तो नर्तक कहीं दूर है? नृत्य में ही तो छिपा है।
इसीलिए तो हमने परमात्मा को नटराज कहा है। बहुत प्यारा प्रतीक दिया है। इससे कोई प्यारा प्रतीक नहीं हो सकता। इसके पीछे बहुत गहरा राज है--परमात्मा को नटराज कहने में, नर्तक कहने में। राज यह है कि यूं तो हम चित्रकार भी कह सकते हैं उसे, जैसे कि सामवेद का यह वचन उसे कवि कह रहा है। यह प्रकृति उसका काव्य है। तो परमात्मा कवि हुआ। उसने गाया यह गीत, परमात्मा गायक हुआ। उसने भरे ये रंग, ये फूल-फूल पर, ये इंद्रधनुषों में, ये तितलियों के पंखों पर, ये सारे रंग उसने भरे--वह चित्रकार हुआ।
मगर चित्रकार, कवि, मूर्तिकार और नर्तक में एक बुनियादी भेद है। जब मूर्ति बन जाती है तो मूर्तिकार और मूर्ति अलग हो जाते हैं। जब गीत पूरा हो जाता है तो गायक और गीत अलग हो जाते हैं। जब काव्य निर्मित हो जाता है तो कवि मर भी जाए तो भी काव्य बना रहेगा। कालीदास को गए बहुत समय बीत गया, मगर कालीदास का काव्य तो अभी भी है। कवि और उसकी कविता दो हो जाते हैं। चित्रकार और उसका चित्र दो हो जाते हैं। यह खूबी केवल नर्तक की है कि उसका नृत्य उससे अलग नहीं होता। नर्तक और नृत्य अटूट रूप से जुड़े हैं, अखंड रूप से जुड़े हैं। उन्हें भिन्न नहीं किया जा सकता, वे अभिन्न हैं। और नर्तक अपनी परिपूर्णता को तभी पहुंचता है जब इतना डूब जाता है अपने नृत्य में कि बचता ही नहीं। नृत्य ही बचता है, नर्तक उसमें लीन हो जाता है।
पश्चिम का एक बहुत बड़ा नर्तक, संभवतः सबसे बड़ा नर्तक था--निजिंस्की। निजिंस्की के जीवन में एक अपूर्व घटना बहुत बार घटी। वह घटना अलौकिक कही जाएगी। नृत्य करते-करते कभी-कभी निजिंस्की ऐसी छलांग लेता था कि जो संभव नहीं है गुरुत्वाकर्षण के नियम के अनुसार। इतनी ऊंची छलांग लेता! और इतनी सरलता से लेता था और उसे देखने वालों को लगता था कि जैसे गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव उस पर काम नहीं कर रहा है। और जब छलांग लेकर वह वापस जमीन की तरफ आता था तो इतने आहिस्ता आता था, जैसा कि कभी नहीं देखा गया। जब भी तुम किसी चीज को ऊपर फेंकते हो, जमीन उसे जोर से नीचे की तरफ खींचती है। एक तो ऊपर जाने में बाधा डालती है। एक सीमा है, तुम छलांग ले सकते हो, उसके पार नहीं। निजिंस्की की छलांग उसके पार चली जाती थी। मगर उससे भी ज्यादा चमत्कार की बात यह थी, जब यह वापस लौटता था तो यूं लौटता था जैसे किसी पक्षी का पंख आहिस्ता-आहिस्ता हवा में डोलता-डोलता नीचे उतरता है। जैसे कोई जल्दी नहीं! जैसे गुरुत्वाकर्षण का कोई प्रयोजन नहीं! जैसे निजिंस्की अपनी मौज से उतर रहा है! अपने ढंग, अपनी शैली से उतर रहा है!
निजिंस्की से बहुत बार पूछा गया, यह तुम कैसे करते हो?
निजिंस्की ने कहा, यह मत पूछो, क्योंकि कई बार मैंने करना चाहा है और जब मैंने करना चाहा है तब नहीं कर पाया। जब भी मैंने करना चाहा है, अपरिहार्य रूप से मैं असफल रहा हूं। और जब भी मैंने करना चाहा है, मेरा नृत्य ही बिगड़ गया, बात ही नहीं बनी। यह तो कभी-कभी होता है। और यह तब होता है जब मैं कर्ता की तरह बिलकुल ही अपने को भूल जाता हूं। जब नृत्य ही बचता है और निजिंस्की नहीं बचता, तब कभी-कभी यह होता है। मैं चाहूं तो कर नहीं सकता। यह मेरी चाह की बात नहीं। यह मेरी चाह की बिसात नहीं। यह तुम्हें ही चमत्कार नहीं है, मैं भी चमत्कृत होता हूं। जब यह हो जाता है, जब छलांग लग जाती है और जब मैं अपने को वापस जमीन की तरफ इतने आहिस्ता से लौटते देखता हूं, तो मुझे ही भरोसा नहीं होता कि क्या हो रहा है।
एक ऐसी घड़ी है नृत्य की जब नर्तक बिलकुल लीन हो जाता है। और तभी नृत्य अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचता है। नर्तक और नृत्य एक अद्वय भावदशा है। इसलिए हमने परमात्मा को नटराज कहा है। मगर अलग-अलग आयामों में हम उसे अलग-अलग नाम दे सकते हैं।
सामवेद ठीक कहता है: देवस्य पश्य काव्यम्। यह प्रकृति उसका काव्य है।
अगर यह उसका काव्य है तो देवता इस प्रत्यक्ष प्रकृति को द्वेष करेंगे? और जो व्यक्ति चित्रों से द्वेष करता है, क्या वह उन चित्रों को बनाने वाले चित्रकार को प्रेम कर सकता है? जो नृत्य से घृणा करता है उसने नर्तक के प्रति अपनी निंदा की घोषणा कर दी।
इसलिए मैं कहता हूं तुमसे कि जिन लोगों ने भी संसार को छोड़ने-त्यागने की बात कही  और जिन्होंने भी संसार से द्वेष पैदा करने की बात कही, वे सभी लोग ईश्वर-विरोधी थे। लाख उन्होंने ईश्वर की पूजा की हो, यज्ञ-हवन किए हों, मंत्रोच्चार किए हों, जीवन भर वेदों को रटा हो, मगर वे ईश्वर-विरोधी थे। उन्होंने ईश्वर के प्रत्यक्ष काव्य को इनकार कर दिया, वे ईश्वर के अप्रत्यक्ष कवि को कैसे स्वीकार कर सकते हैं? इस काव्य का सम्मान ही तो कवि का सम्मान होगा। काव्य को दो गालियां और कवि का सम्मान कर रहे हो! यह कौन सा तर्क है? कौन सा गणित है?
योग प्रीतम का यह गीत खयाल में लेना--
उसकी महफिल में मस्ती का जाम भरता हूं
उसकी मय पीने पिलाने का काम करता हूं
साज मेरे दिल का जो छेड़ दिया है उसने
बस उसके नग्मे गाने का काम करता हूं
गर किसी दिल में तस्वीर बसी हो उसकी
कदमों पे उसी के अपने मुकाम करता हूं
जो इस दीवाने का हाथ पकड़ में आए
थाम कर चूम लेने का काम करता हूं
नूर आता हो नजर उसका आंखों में कहीं
उसके दीदार में उमर तमाम करता हूं
उसके रस में डूबा मिल जाए मस्त कोई
जिंदगी अरे खुद की उसके नाम करता हूं
जो नाचे गाए--भगवान वही है बंदा
सदके जाता हूं मैं उसे सलाम करता हूं
उसकी महफिल में मस्ती का जाम भरता हूं
उसकी मय पीने पिलाने का काम करता हूं
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, जो सामने है और जो छिपा है, एक ही सत्य के दो पहलू हैं। प्रत्यक्ष को प्रेम करो, क्योंकि वही सीढ़ियां बनेगा अप्रत्यक्ष के मंदिर की। प्रत्यक्ष को चाहो, जी भर कर चाहो, क्योंकि पत्थर-पत्थर में वही छिपा है। पानी की लहर-लहर में सागर है। इस अस्तित्व के कण-कण में परमात्मा है।
एतरेय ब्राह्मण में एक प्रीतिकर सूत्र है: यः सर्वः कृत्सनो मन्यते गायति वैव गीते वा रमते। जब कोई अपने को पूर्ण पाता है तब उससे गीत फूट पड़ते हैं। वह संगीतपूर्ण उत्सव बन जाता है।
"जब कोई अपने को पूर्ण पाता है...।'
मगर कोई कैसे अपने को पूर्ण पाता है? यात्रा तो प्रत्यक्ष से करनी होगी। तुम तो शरीर हो, जहां तक तुम्हारी अभी जानकारी है। बहुत आगे बढ़े तो थोड़ी सी पहचान मन की है। थोड़े और आगे बढ़े तो शायद थोड़ी सी झलक हृदय की है। यह प्रत्यक्ष है। शरीर बहुत प्रत्यक्ष है। मन थोड़ा कम प्रत्यक्ष है। हृदय और भी कम प्रत्यक्ष। और इन तीनों के पार छिपा है परोक्ष--चौथा, तुरीय। लेकिन शरीर से ही यात्रा करनी होगी। तुम जहां हो वहीं से यात्रा शुरू हो सकती है। यात्रा वहां से नहीं शुरू हो सकती जहां तुम नहीं हो।
तुम अभी शरीर में हो। शरीर से ही चलना होगा। शरीर की ही नाव बनानी होगी। शरीर को घृणा मत करना। नहीं तो नाव न बना सकोगे। और अगर शरीर ने साथ न दिया तो भीतर न जा सकोगे। शरीर तो निरपेक्ष है, तटस्थ है। बाहर की यात्रा करनी हो तो भी वही वाहन है। और भीतर की यात्रा करनी हो तो भी वही वाहन है।
शरीर तुमसे कहता नहीं कहां चलो। शरीर तो कहता है: जहां चलना हो, मैं तैयार हूं। शरीर तुम्हारा दुश्मन नहीं है, शरीर तो सदा मित्र है।
लेकिन तथाकथित धर्मगुरु तुम्हें उलटे पाठ पढ़ाते हैं--शरीर दुश्मन है। और जिसने यह पाठ पढ़ लिया, उसकी जिंदगी मुश्किल हो जाएगी। फिर वह शरीर से लड़ने लगेगा। जिसको सीढ़ी बनाना था उससे सिर टकराने लगेगा। इससे सीढ़ी नहीं मिटेगी, सिर्फ सिर टूटेगा। शरीर को गलाने में लग जाएगा, सड़ाने में लग जाएगा, शरीर को सताने में लग जाएगा।
शरीर का उपयोग कर लेना था। शरीर भी परमात्मा की भेंट है--अपूर्व भेंट है! अदभुत भेंट है! अद्वितीय है! कृतज्ञ होना चाहिए परमात्मा का। एक अपूर्व शरीर तुम्हें दिया है, जो सत्तर, अस्सी, नब्बे, सौ वर्षों तक तुम्हें साथ देता है--सब तरह से साथ देता है। यह और बात है कि तुम वेश्याघर जाना चाहते हो तो वहां ले जाता है। यह तुम्हारी मर्जी। जिम्मेवार तुम हो। और तुम मंदिर जाना चाहते हो तो मंदिर ले जाता है। यह तुम्हारी मर्जी। वही पैर जो वेश्या के घर ले जाते हैं, वही पैर मंदिर भी ले जाते हैं। वही शरीर जो तुम्हें पापों में ले जाता है, पुण्यों का भी आधार बन जाता है। वही शरीर जो तुम्हें धन की दौड़ में लगा देता है, वही ध्यान के मार्ग पर भी उतना ही साथी है, उतना ही संगी है। सब तुम्हारे निर्णय की बात है। शरीर तो हमेशा राजी है। शरीर तो तुम्हारी सेवा के लिए तत्पर है। अब यह और बात है कि तुम गलत जगह जाना चाहो, तो शरीर का उसमें कोई हाथ नहीं।
मगर लोगों की आदत है: हमेशा उत्तरदायित्व किसी और पर छोड़ना।
यूं हुआ कि एक आदमी पर अदालत में मुकदमा था। उसने हत्या कर दी थी, कुल्हाड़ी उठा कर और एक आदमी की गर्दन काट दी थी। मजिस्ट्रेट ने उसे जीवन भर का कारावास दिया। उस आदमी ने कहा, यह अन्याय है! क्योंकि मेरे दाएं हाथ ने कुल्हाड़ी उठाई और उस आदमी की गर्दन काटी। अब हाथ के कसूर के लिए मेरे पूरे शरीर को, मुझको जीवन भर का कारावास, कैसा न्याय है!
मजिस्ट्रेट को भी मजाक सूझा। उसने कहा, फिर ठीक है, हम तुम्हारे दाएं हाथ को जीवन भर का कारावास देते हैं।
मजिस्ट्रेट ने सोचा कि जब दायां हाथ जेलखाने में रहेगा तो पूरा शरीर भी तो उसके साथ ही रहेगा, जाएगा कहां। वहां जरा चूक हो गई। मजिस्ट्रेट के यह कहने पर उस आदमी ने अपना दायां हाथ निकाल कर और मजिस्ट्रेट की टेबल पर रख दिया। दायां हाथ उसका कृत्रिम था।
आदमी के बड़े चालबाजी के ढंग होते हैं। आदमी हमेशा दोष किसी पर थोप देना चाहता है। हाथ का कसूर है! तुमने सूरदास की कहानी सुनी है। सुंदर स्त्री के प्रति आंखें मोहित हो गईं तो आंखों को फोड़ दिया। अब आंखें कहीं मोहित होती हैं? मोहित मन होता है। मोहित तुम होते हो। आंखों का क्या कसूर है? लेकिन आदमी हमेशा किसी पर दोष को थोप देना चाहता है, अपने को बचा लेना चाहता है।
आंखें तो तुम जो दिखाओ वही देखने को राजी हैं। चाहे सूर्यास्त देखो, चाहे सूर्योदय देखो, चाहे स्त्रियों की नग्न तस्वीरें देखो, जो तुम्हारी मर्जी हो। आंख का कोई भी कसूर नहीं।
मैं तुम्हें यह बात बार-बार समझा देना चाहता हूं, क्योंकि सदियों से तुम्हें गलत ढंग से संस्कारित किया गया है--शरीर को सताओ, शरीर पाप का कारण है। शरीर पाप का कारण बिलकुल भी नहीं है। शरीर सीढ़ी बन जाता है। थोड़े कलात्मक होना सीखो। थोड़े जीवन को जीने का ढंग, जीवन को जीने का विज्ञान समझो।
और यूं ही मन को भी उपयोग में लाया जा सकता है। यूं ही हृदय को भी उपयोग में लाया जा सकता है। ये तुम्हारे तीन चरण हैं, जिनके द्वारा तुम चौथे परोक्ष पर पहुंच सकते हो। ये प्रत्यक्ष हैं। शरीर तो तुम्हें भी दिखाई पड़ता है, दूसरों को भी दिखाई पड़ता है। मन केवल तुम्हीं को दिखाई पड़ेगा, मगर प्रत्यक्ष तो है। अगर आंख बंद करके तुम मन की प्रक्रिया को देखोगे तो देख सकते हो। हजारों-हजारों विचारों का सिलसिला, राह चलती ही रहती है मन की। कभी वासना, कभी विचार, कभी स्मृति, कभी कल्पना, कभी राग, कभी द्वेष, कभी धर्म, कभी अधर्म, सब चलता है। तुम इसे देख सकते हो। तुम इसके साक्षी हो सकते हो। और जैसे ही तुम साक्षी हुए, मन प्रत्यक्ष हो गया, आंख के सामने हो गया।
इसी आंख को हमने तीसरी आंख कहा है। साक्षी-भाव तीसरी आंख है। तीसरी आंख वस्तुतः कोई शरीर का अंग नहीं है, केवल प्रतीक है--देखने की आंतरिक क्षमता। फिर इसी तीसरी आंख को थोड़ा और निखारो तो भावनाओं को देख सकते हो। भावनाएं और भी सूक्ष्म हैं--सूक्ष्म हैं विचारों से। मन में उठी हुई जो विचारों की तरंगें हैं, इनसे भी ज्यादा सूक्ष्मतर तरंगें हृदय में उठती हैं। मगर एक बार देखने की कला आ जाए, साक्षी की प्रक्रिया समझ में आ जाए, तो तुम अपनी सूक्ष्मतम तरंगों को भी देख सकते हो। फिर वे प्रत्यक्ष हो जाएंगी।
और जिस क्षण ये तीनों प्रत्यक्ष हो जाएंगे, उस क्षण चौथी क्रांति घटेगी। तब तुम स्वयं को देख पाओगे। वहां देखने वाला और दिखाई पड़ने वाला दो नहीं होंगे। वहां द्रष्टा और दृश्य एक होगा। वही परमात्म-अनुभूति है। और जो व्यक्ति इस अनुभूति को उपलब्ध हो जाता है--यः सर्वः कृत्सनो मन्यते गायति वैव गीते वा रमते। उससे गीतों के झरने फूट पड़ते हैं।
तुम्हारे संत इतने रूखे-सूखे मालूम पड़ते हैं, इतने मुर्दा मालूम पड़ते हैं, कि यह माना नहीं जा सकता कि उन्होंने अपने को जाना होगा। क्योंकि जिसने अपने को जाना है, उससे गीतों के झरने फूटने ही चाहिए। उसके जीवन में उत्सव होना ही चाहिए। उसके पैरों में घुंघरू बंधेंगे ही। उसके ओंठों पर बांसुरी आएगी ही। उसके शब्द-शब्द में रस होगा। उसके उठने-बैठने में, उसके देखने में, उसके चलने में, उसके बोलने में, न बोलने में, उसके मौन में भी संगीत होगा। उसका सारा जीवन, जीवन के सारे रंग किसी अलौकिक आभा से मंडित होंगे।
तुम्हारे तथाकथित साधु-संन्यासी जैसे रूखे-सूखे मालूम पड़ते हैं, वह काफी प्रमाण है इस बात का कि उनके भीतर गीतों के झरने फूटे नहीं, उनके जीवन में उत्सव नहीं आया। वे किसी स्वर्ग की आकांक्षा कर रहे हैं जो मृत्यु के बाद घटेगा। वस्तुतः जो स्वर्ग है वह अभी घटता है, यहीं घटता है। कोई स्वर्ग मृत्यु के बाद की भौगोलिक चीज नहीं है। स्वर्ग वह अनुभव की दशा है जब तुम्हारे भीतर प्राण नाच उठते हैं। यः सर्वः कृत्सनो मन्यते गायति वैव गीते वा रमते। न केवल गीतों के झरने फूट पड़ते हैं, बल्कि जीवन संगीतपूर्ण हो जाता है, एक उत्सव बन जाता है।
मैं संन्यास की इसी प्रक्रिया को तुम्हें समझा रहा हूं। प्रत्यक्ष को भी उत्सव बनाना है, परोक्ष को भी पाना है। मगर परोक्ष को पाने का मतलब ही यही होता है कि वह भी प्रत्यक्ष हो जाना चाहिए। अप्रत्यक्ष कुछ भी न रह जाए। सब आंखों के सामने खुल जाए, सारा राज खुल जाए। जीवन का रहस्य जी लिया जाए, पहचान लिया जाए। उसकी प्रत्यभिज्ञा हो जाए।
इसलिए मैं गोपथ ब्राह्मण के सूत्र से कतई राजी नहीं हो सकता। वह सूत्र बुनियादी रूप से गलत है।
दूसरा प्रश्न: भगवान,
आपके आश्रम में कई देशों के, कई जातियों के लोग एक ही रंग में रंगे हैं और तरहत्तरह के कामों में लगे हैं। लेकिन क्या यह एक नये प्रकार की वर्ण-व्यवस्था, एक नये प्रकार की आश्रम-व्यवस्था नहीं है?
महर्षि मनु ने हजारों वर्ष पूर्व जो वैज्ञानिक व्यवस्था दी थी, उसके रूप तो बदल सकते हैं, लेकिन आधार कभी नहीं मिट सकते। वर्ण और आश्रम नये-नये रूपों में सदा प्रकट होते रहे हैं। इन अर्थों में आपके संन्यासी नये नहीं हैं और न ही आपकी आश्रम-व्यवस्था नयी है। क्या आप महर्षि मनु की वैज्ञानिक व्यवस्था और आश्रम-व्यवस्था को गलत सिद्ध कर सकते हैं?

पंडित ज्ञानशंकर झा,
उन्होंने प्रश्न के अंत में पुनश्च करके यह भी लिखा है: पिछले माह मेरे भाई पंडित लज्जाशंकर झा यहां आए थे और उन्होंने आपके तर्क-सम्मत ज्ञान की चर्चा की थी।
पंडित लज्जाशंकर झा को घर लौट कर कहना कि वे मुझे समझे नहीं। मेरी बातें और तर्क का क्या लेना-देना? अगर यही वे समझ कर गए कि मेरी बातें तर्क-सम्मत हैं, तो यूं ही आए और यूं ही चले गए, व्यर्थ ही आए और व्यर्थ ही गए। हीरे-जवाहरात ले जा सकते थे, कंकड़-पत्थर लेकर चले गए।
मेरी बातें कितनी ही तर्क-सम्मत हों, लेकिन तर्क मेरा प्रयोजन नहीं है। तर्क तो मेरे लिए केवल खेल है। और कुछ बच्चे यहां आ जाते हैं, उनके लिए खिलौने देने पड़ते हैं। और पंडितों से ज्यादा बचकाने कोई भी नहीं होते। उनको झुनझुना दे दो, घुनघुना दे दो, वे अपना घुनघुना बजाते हुए लौट जाते हैं। उनका मन बहल जाता है।
यहां बातें रहस्य की हो रही हैं, तर्क की नहीं।
पंडित ज्ञानशंकर झा, तुम्हारा प्रश्न जरूर विचारणीय है। पहली तो बात यह कि मनु को मैं महर्षि नहीं कह सकता हूं। मनु ने जितनी हानि इस देश की की है, उतनी किसी और व्यक्ति ने नहीं की। मनुस्मृति इस देश की छाती पर एक भयंकर चट्टान की तरह रखी हुई है। मनुस्मृति कोढ़ है भारत का, जिससे भयंकर दुर्गंध उठ रही है। पांच हजार सालों से मनुस्मृति भारत को सता रही है। अभी भी हरिजन जलाए जा रहे हैं जिंदा। अभी भी उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार किया जा रहा है। सबके पीछे इसी कमबख्त मनु का हाथ है। मनु को मैं कभी भी महर्षि नहीं कह सकता हूं।
तुम कहते हो कि आपके आश्रम में कई देशों के, कई जातियों के लोग एक ही रंग में रंगे हैं और तरहत्तरह के कामों में लगे हैं।
मनु तो इसको बरदाश्त ही नहीं कर सकते थे। यह तो मनु के हिसाब से भ्रष्टता होगी। कई जातियां, कई रंगों के लोग, यहां अपनी जातियां भी भूल गए हैं, अपने रंग भी भूल गए हैं। मनु के लिए तो वर्ण बड़ा महत्वपूर्ण था। वर्ण शब्द का अर्थ होता है: रंग।
जब भारत में आर्य आए तो आर्य गोरे थे और भारत में जो लोग बसे थे वे सांवले थे। दक्षिण भारत में आज भी जो लोग हैं वे भारत के मूलवासियों के वंशज हैं। उन काले लोगों को आर्यों ने अनार्य कहा। आर्य शब्द का अर्थ होता है: श्रेष्ठ। और अनार्य का अर्थ होता है: अश्रेष्ठ। स्वयं को आर्य समझते थे देवताओं के पक्षपाती। और इन दक्षिण के काले लोगों को समझते थे राक्षस। यह पुराना रिवाज रहा। जिसको भी बुरा कहना हो उसको राक्षस कहो। जिसकी भी निंदा करनी हो उसको राक्षस कहो।
ऐसे गौर से देखा जाए तो रावण बहुत अर्थों में राम से कहीं ज्यादा सत्पुरुष मालूम होता है। सीता को बलात्कार तो नहीं किया। सीता को ससम्मान मेहमान की तरह रखा। सुंदर वाटिका में सुंदर व्यवस्था दी। चाहता तो बलात्कार कर सकता था। राक्षस नहीं है। जब कि आर्यों के देवता बलात्कार करने में बड़े कुशल हैं, इनको राक्षस नहीं कहा जाता। ऋषि-मुनि ब्रह्ममुहूर्त में गंगा-स्नान करने जाते हैं और देवतागण आकर उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार कर जाते हैं। ये देवता हैं!
और मजा यह है कि जब ऋषि-मुनि पाते हैं यह बात कि उनकी स्त्री के साथ देवता बलात्कार कर गए, जैसे अहिल्या के साथ देवता ने बलात्कार कर दिया और जब अहिल्या के पति ने पाया तो सजा देनी चाहिए थी देवता को, अभिशाप देना चाहिए था देवता को; लेकिन नहीं, अभिशाप दिया अहिल्या को कि तू पत्थर हो जा! यह कौन सा न्याय हुआ? अहिल्या तो बिलकुल निर्दोष है। अब कोई देवता अगर पति का रंग-ढंग रख कर आ जाए, और देवता क्या नहीं कर सकते, चमत्कार कर सकते हैं! देवताओं का धंधा ही क्या है! वे बिलकुल ऋषि बन कर आ गए। नाटक किया उन्होंने। पत्नी बेचारी समझी कि पतिदेव हैं। उसने तो पति के साथ ही संभोग किया। इसमें इस स्त्री का कोई कसूर ही न था। इस स्त्री को पत्थर हो जाने का अभिशाप देना एकदम अमानवीय है। देवता राक्षस था, यह ऋषि भी राक्षस था। न्याय जैसी कोई चीज नहीं। और फिर मजा यह है कि यह स्त्री भी तब तक पत्थर रहेगी जब तक राम के पैर इस पत्थर पर न पड़ें।
तुम देखते हो पुरुषवाद! एक पुरुष व्यभिचार कर गया, दूसरा पुरुष अभिशाप दे गया, तीसरा पुरुष मुक्ति देगा! कम से कम इतना ही करते कि सीता के पैर पड़ेंगे। लेकिन नहीं, इन दुष्टों को स्त्रियों से कुछ लेना-देना नहीं। स्त्रियों की कोई हैसियत ही नहीं। स्त्रियों का कोई मूल्य ही नहीं।
रावण ने कहीं ज्यादा सम्मान दिया सीता को बजाय राम के। वाल्मीकि रामायण में जब राम लंका को जीत कर और सीता को लेकर वापस लौटते हैं, जब वर्षों के बाद सीता से पहली बार मिलते हैं, तो जो वचन बोलते हैं, एकदम अभद्र हैं। जो वचन हैं वे ये हैं कि ऐ औरत! याद रखना कि मैंने कुछ तेरे लिए युद्ध नहीं किया है! मैं तो रघुकुल की प्रतिष्ठा के लिए युद्ध किया हूं। हम कोई स्त्रियों के लिए लड़ने वाले लोग नहीं हैं।
यह अभद्र बात कहने की क्या जरूरत थी? मगर यह सूचक है। स्त्री की कोई कीमत नहीं है। स्त्री के लिए युद्ध किया भी नहीं गया है; यह तो रघुकुल की प्रतिष्ठा का सवाल है, अहंकार का सवाल है, कुल की मर्यादा का सवाल है, इसलिए युद्ध किया गया है।
वर्षों तक सीता प्रतीक्षा कर रही थी और यह स्वागत हुआ! और तत्क्षण पहला काम यह किया कि अग्नि-परीक्षा दो! भरोसा बिलकुल नहीं है। और राम, जिनको तुम कहते हो वे अंतर्यामी हैं, इन सज्जन को इतना भी पता नहीं है कि स्त्री उनकी सीता निर्दोष है। अग्नि-परीक्षा की जरूरत है, और ये अंतर्यामी हैं! कम से कम सीता का तो हृदय जान लेते। ये सब का अंतर जानते हैं, ये सर्वज्ञ हैं, और सीता की परीक्षा लेनी है! गरीब सीता को अग्नि से गुजरना पड़ा।
अब मैं नहीं मानता हूं कि अग्नि कोई अपने नियम बदलेगी। अगर सच में सीता अग्नि से गुजरी होगी तो जल कर खाक हो गई होगी। और एक इतिहासज्ञ ने यह प्रश्न उठाया है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि यह सीता को खत्म कर देने का उपाय रहा हो! फिर राम किसको लेकर अयोध्या लौटे?
मेरे एक प्रोफेसर मित्र हैं--नावलेकर। उन्होंने राम पर बड़ी शोध की है, बड़ी हिम्मतपूर्ण शोध की है। उन्हें शक है कि सीता को अगर सच में ही अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी, तो दो ही संभावनाएं हैं उनके हिसाब से और विचारणीय हैं: या तो सीता की जगह शबरी को अग्नि में से गुजारा गया और वह जल गई, और ये सीता को लेकर लौट गए; और या दूसरी संभावना है--जो मैंने उन्हें सुझाई कि यह है--कि सीता जल गई और शबरी को लेकर भैया लौट गए, जो कि ज्यादा संभव है।
यह रामलीला वगैरह में जो शबरी दिखाई जाती है, बिलकुल बूढ़ी स्त्री की तरह दिखाई जाती है, वह झूठी बकवास है। नावलेकर ने बहुत शोध करके सिद्ध किया है कि वह जवान सुंदर युवा स्त्री थी। और केवल प्रेमी ही एक-दूसरे के जूठे फल खा सकते हैं, और कोई नहीं खा सकता। प्रेम में ही आदमी ऐसी मूढ़ताएं कर सकता है। हर कोई स्त्री तुम्हें जूठा बेर करके दे, तुम कहोगे, छीः-छीः फेंक! धत्त तेरे की! रख ले अपना बेर! लेकिन तुम्हारी प्रेयसी जब बेर को जूठा कर दे तो अमृत हो गया। यह बुद्धूपन, यह पागलपन प्रेम में ही होता है।
तो दो में से कोई एक बात की संभावना है, क्योंकि दोनों स्त्रियों के साथ कलह खड़ी हो जाएगी, एक को समाप्त करना जरूरी है। अग्नि-परीक्षा ने वह काम किया होगा।
सीता के साथ यह दूसरी अभद्रता कि उसको अग्नि-परीक्षा में से गुजारते हो। और अगर यह मान लिया जाए कि सीता को किसी तरह बचा कर या शबरी को जला कर ले भी आए अयोध्या, तो सिर्फ एक धोबी के कह देने से और उस गर्भवती स्त्री को बिना बताए जंगल में छुड़वा दिया--यह अमानवीयता! मगर राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। स्त्री-जाति का कोई सम्मान नहीं। इससे ज्यादा सम्मान तो रावण ने प्रकट किया।
रावण की बहन शूर्पणखा ने लक्ष्मण से निवेदन किया प्रेम का, जो कि प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है। कोई भी किसी से प्रेम का निवेदन कर सकता है। यह और बात है कि जिससे निवेदन किया जाए, वह धन्यवाद देकर क्षमा मांग ले, कि मैं भई पहले से ही विवाहित हूं, अब क्या कर सकता हूं, क्षमा करो। मगर नाक काटने की क्या जरूरत है? यह तो बात निपट राक्षसी है। और न केवल लक्ष्मण ने नाक काटी, राम का इसमें आदेश ग्रहण किया। राम ने कहा, काट ले रे, काट ले! क्या देख रहा है? क्या देर-दार कर रहा है? कर दे साफ!
इस स्त्री का कसूर क्या था? क्या किसी पर मोहित होना कसूर है? अगर किसी पर मोहित होना कसूर है तो ये राम-लक्ष्मण दोनों ही सीता पर मोहित हो गए थे। और उसका खूब रस ले-लेकर वर्णन किया जाता है कि जनक की बगिया में सीता फूल चुन रही सखियों के साथ और राम की लार टपकने लगी! टपकी तो लक्ष्मण की भी, मगर बड़े भैया की टपक रही थी तो छोटे भैया को जरा सम्हाल कर रखना पड़ा। और जब धनुष-बाण तोड़ने का समय आता है तो लक्ष्मण उठ-उठ कर खड़े हो जाते हैं। वे लंगोट बांध-बांध लेते हैं। वे कहते हैं कि मैं अभी तोड़ता हूं। उनको राम रोकते हैं कि तू रुक, शांति रख, धैर्य रख!
किसी के प्रेम में पड़ जाना कोई अस्वाभाविक तो नहीं। और अगर कोई स्त्री ने निवेदन किया था तो इनकार किया जा सकता था--सज्जनतापूर्वक। नाक काटना तो कुछ समझ के बाहर की बात है, एकदम अशोभन कृत्य।
लेकिन आर्यों ने काले लोगों को अनार्य घोषित किया, राक्षस घोषित किया, उनको मिटाने की हर तरह कोशिश की।
मनु महाराज ने जो वर्ण-व्यवस्था दी है, वह वर्ण-व्यवस्था क्या है? शोषण का एक जाल है। उसमें वैज्ञानिकता क्या है? पुरोहित को सबसे ऊपर रखा है, क्योंकि मनु महाराज खुद पुरोहित हैं। ब्राह्मण सबसे ऊपर, फिर नंबर दो है क्षत्रिय का। क्षत्रिय यानी राजनीति में जो हैं, जिनके हाथ में भौतिक सत्ता है, जिनके हाथ में तलवार है। पुरोहित का और राजनैतिक का पुराना षडयंत्र है, पुरानी सांठ-गांठ है। दोनों ने बंटवारा किया हुआ है। बंटवारा यह है कि भौतिक अर्थों में तुम मालकियत करो--ब्राह्मण ने कहा हुआ है क्षत्रिय से--तुम चूसो लोगों को, और भीतरी अर्थों में हम चूसेंगे। इस लोक में तुम चूसो, परलोक में हम चूसेंगे। इस लोक के नाम पर तुम चूसो, परलोक के नाम पर हम चूसेंगे। प्रत्यक्ष में तुम, परोक्ष में हम। यह सांठ-गांठ है। फिर नंबर तीन पर वैश्यों को रखा, क्योंकि उनके पास धन है। धन की भी अपनी शक्ति है।
और जिनके पास न धन था और न जिनके पास तलवारों की ताकत थी और न जिनके पास पांडित्य का दंभ था, उन सबको शूद्रों में रख दिया। वे छूने योग्य भी न रहे, अछूत हो गए, अंत्यज हो गए। अंत्यज का अर्थ है: उन्हें गांव के बाहर रहना पड़ेगा, गांव के अंत में रहना पड़ेगा, गांव के भीतर भी नहीं रह सकते। और मजे की बात यह है, वे ही सेवा करेंगे, वे ही तुम्हारी गंदगी ढोएंगे, वे ही तुम्हारे मरे जानवरों को घसीटेंगे, वे ही तुम्हारे पाखाने को, मल-मूत्र को उठा कर ले जाएंगे। मगर उनका कोई धन्यवाद नहीं। उनके प्रति सिवाय तिरस्कार के और कुछ भी नहीं।
इस वर्ण-व्यवस्था को, पंडित ज्ञानशंकर झा, तुम वैज्ञानिक कहते हो? और तुम सोचते हो कि यहां भी कोई वर्ण-व्यवस्था मैं निर्मित कर रहा हूं?
यहां वर्ण-व्यवस्था समाप्त की जा रही है। यहां न कोई ब्राह्मण है, न कोई क्षत्रिय है, न कोई वैश्य है, न कोई शूद्र है। यहां मनुष्य होना काफी है। यहां वस्तुतः पूछो तो कोई स्त्री भी नहीं है, कोई पुरुष भी नहीं है। इस सबकी कोई चिंता नहीं है। यहां सबका समान सम्मान है, सबका समान आदर है। इसमें भी तुम्हें वर्ण-व्यवस्था दिखाई पड़ रही है? यह तो हद हो गई।
यह तो यूं हुआ जैसे सावन के अंधे को हरा-हरा सूझता है। सावन में अंधा हुआ न, उस वक्त सब हरा-हरा था, वही उसकी याद में भरा हुआ है। अब तो अंधा हो गया, अब तो कुछ सूझता नहीं। मगर जब अंधा हुआ था तो सब हरा-हरा था। वही हरा-भरा उसके दिमाग में भरा हुआ है।  वही हरा-हरा उसे याद आता है। वही उसकी नजर बन गई है। तुम्हारी आंखों पर चश्मा है। आश्चर्य हुआ मुझे तुम्हारे प्रश्न को देख कर।
तुम कहते हो: "आपके आश्रम में कई देशों के, कई जातियों के लोग एक ही रंग में रंगे हैं।'
मनु महाराज के हिसाब से तो वर्ण-व्यवस्था केवल हिंदुओं के लिए है। इसलिए हिंदू किसी दूसरे धर्म के लोगों को अपने में समाहित करने के लिए कभी राजी नहीं थे। हिंदू धर्म दूसरे लोगों के अपने भीतर प्रवेश का हमेशा विरोधी रहा है। यह तो दयानंद ने ईसाइयों की नकल में आर्य-समाज को खड़ा किया। यह तो दयानंद की करतूत है, अन्यथा हिंदू कभी भी धर्म-परिवर्तन में विश्वास नहीं करते। हिंदुओं का तो हिसाब जन्म से बंधा है। जो हिंदू पैदा हुआ है वही हिंदू है, कोई दूसरा व्यक्ति हिंदू नहीं हो सकता। क्योंकि फिर झंझट खड़ी होगी।
समझो कि एक मुसलमान हिंदू हो जाए, उसको किस वर्ण में रखोगे? वर्ण-व्यवस्था के कारण बड़ी अड़चन है। मुसलमान अगर हिंदू हो जाए, उसको किस वर्ण में रखोगे? हिंदू अगर ईसाई हो जाए तो कोई झंझट नहीं आती, क्योंकि उनके पास कोई वर्ण-व्यवस्था नहीं है। वह सिर्फ ईसाई होगा। अगर हिंदू मुसलमान हो जाए, तो उनके पास कोई वर्ण-व्यवस्था नहीं है, वह सिर्फ मुसलमान होगा। हिंदुओं के सामने बड़ा सवाल था। किसी मुसलमान को हिंदू बना लोगे तो हिंदू ज्यादा से ज्यादा हिम्मत कर सकते हैं वह उसको शूद्र की व्यवस्था में रखने की। और कौन मुसलमान शूद्र बनने को राजी होगा? कौन ईसाई शूद्र बनने को राजी होगा? किसका दिमाग खराब हुआ है? हिंदू उसे ब्राह्मण तो नहीं बना सकते, कोई उपाय नहीं है। मुसलमान के ब्राह्मण होने की तो बात छोड़ो, क्षत्रिय भी ब्राह्मण होना चाहे तो नहीं हो सकता; वैश्य भी ब्राह्मण होना चाहे तो नहीं हो सकता।
महावीर परमज्ञान को उपलब्ध हो गए, लेकिन हिंदू उन्हें ब्राह्मण तो स्वीकार नहीं कर सकते। बुद्ध परमज्ञान को उपलब्ध हो गए, लेकिन उन्हें ब्राह्मण तो नहीं माना जा सकता। ब्रह्म को जान लिया, फिर भी ब्राह्मण नहीं! ब्राह्मण का संबंध जन्म से है। और बुद्ध और महावीर की क्रांति यही थी कि उन्होंने कहा, जन्म से क्या संबंध हो सकता है ब्राह्मण का? बुद्ध ने कहा, ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को जाने। इससे जन्म का कोई संबंध नहीं।
लेकिन हिंदुओं की सारी व्यवस्था जन्मतः है। कर्म से नहीं, बोध से नहीं। आदमी जन्म से ही या तो ब्राह्मण होता है या क्षत्रिय होता है या शूद्र होता है या वैश्य होता है। इसलिए हिंदू धर्म धर्म-परिवर्तन के लिए, किसी के धर्म-परिवर्तन के लिए राजी नहीं है। बड़ा सवाल यह उठेगा, उसको रखोगे कहां? उसको किस खांचे में बिठालोगे? वह जन्म से तो कोई भी नहीं है।
इसलिए ये जो यहां लोग तुम्हें दिखाई पड़ रहे हैं, मनु महाराज यहां आ जाएं तो एकदम विक्षिप्त हो उठेंगे। यहां न तो हिंदू हैं, न मुसलमान हैं, न ईसाई हैं, न जैन हैं, न बौद्ध हैं; न कोई ब्राह्मण है, न कोई क्षत्रिय है, न कोई शूद्र है। मनुष्य होना काफी है। और तुम्हें इसमें भी वर्ण-व्यवस्था दिखाई पड़ रही है? हद हो गई!
और यहां सब वर्णों के लोग हैं, सब रंगों के लोग हैं--वर्ण का जो शाब्दिक अर्थ है। यहां गोरे हैं, यहां काले लोग हैं, यहां नीग्रो हैं, यहां अमरीकन हैं, यहां अंग्रेज हैं, यहां जर्मन हैं। यही नहीं, यहां पीले लोग भी हैं--जापानी हैं, चीनी हैं। यहां सब रंगों के लोग समाहित हो गए हैं, जैसे नदियां सागर में समाहित हो जाती हैं। और सागर में समाहित होते ही सागर के रंग की हो जाती हैं। यहां कौन सी वर्ण-व्यवस्था है? तुमने मुझे चकित किया।
तुम कह रहे हो: "लेकिन क्या यह एक नये प्रकार की वर्ण-व्यवस्था...।'
इसको कैसे वर्ण-व्यवस्था कहोगे? यह तो वर्ण-व्यवस्था से मुक्ति है।
और तुम कहते हो: "एक नये प्रकार की आश्रम-व्यवस्था...।'
आश्रम-व्यवस्था का अर्थ समझते हो? पंडित हो, इतनी तो मैं अपेक्षा कर सकता हूं कि तुम्हें आश्रम-व्यवस्था का कम से कम शाब्दिक अर्थ पता होगा। आश्रम-व्यवस्था हिंदुओं की यह है कि चार आश्रम हैं जीवन के। पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य, गुरुकुलवास, विद्यार्थी जीवन--वह पहला आश्रम, ब्रह्मचर्य आश्रम। दूसरा आश्रम पचास वर्ष तक: गृहस्थ आश्रम, विवाहित जीवन, दुकानदारी, धंधा, व्यवसाय--वर्ण के अनुसार। अगर शूद्र हो तो शूद्र, अगर वैश्य हो तो वैश्य, अगर ब्राह्मण हो तो ब्राह्मण, क्षत्रिय हो तो क्षत्रिय।
सच तो यह है कि वह जो पहला ब्रह्मचर्य आश्रम है, वह केवल ब्राह्मणों और क्षत्रियों को उपलब्ध था, सबको उपलब्ध नहीं था। वही तो सांठ-गांठ है--शस्त्र की और शास्त्र की सांठ-गांठ। क्षत्रिय को तो अपने वश में रखना ही होगा, नहीं तो वह कब तलवार उठा ले पता नहीं। और तलवार उठा ले तो तुम्हारे यज्ञ-हवन कुछ काम न आएंगे। इसलिए उसको तो बांध कर रखना ही होगा। उसको तो कुछ सुविधाएं देनी ही होंगी।
पचास वर्ष की उम्र तक गृहस्थ आश्रम। और फिर पचहत्तर वर्ष की उम्र तक वानप्रस्थ आश्रम। वानप्रस्थ आश्रम का मतलब है: जंगल जाना मत, केवल जंगल की तरफ मुंह रखना। मतलब तैयारी करना, पच्चीस वर्ष जंगल जाने की तैयारी करना। बिस्तर बांधना, खोलना, फिर बांधना, फिर खोलना, सोच-विचार करना। और जो-जो जालसाजियां तुमने जिंदगी भर में सीख ली हों, वे बच्चों को सिखा दो। इसके पहले कि तुम जंगल जाओ, अपनी सब तरकीबें, अपने सब अनुभव, घर-गृहस्थी जमा दो बिलकुल। कच्ची छोड़ कर मत चले जाना। पक्की कर दो, मजबूत कर दो।
जब आदमी पचास वर्ष का होगा, तब उसके बच्चे अपना पहला आश्रम पूरा कर रहे होंगे। वे घर आने के करीब होंगे। अभी उनको जीवन की सारी चालबाजियां सिखानी होंगी, जीवन की कूटनीति सिखानी होगी। इसलिए जंगल जाने की तैयारी करना, मगर अभी चले मत जाना। पच्चीस वर्ष तक इन बच्चों को तैयार कर देना। जब ये बच्चे पचास वर्ष के करीब हो जाएंगे, जब इनके बच्चे गुरुकुल से लौटने लगेंगे, अब तुम जा सकते हो। पचहत्तर वर्ष की उम्र के बाद संन्यास आश्रम शुरू होगा। ये चार आश्रम थे।
तुम यहां कैसा आश्रम देखते हो? यहां तो सब उम्र के संन्यासी तुम्हें दिखाई पड़ेंगे। यहां बच्चे संन्यासी हैं, जवान संन्यासी हैं, वृद्ध संन्यासी हैं, पुरुष संन्यासी हैं, स्त्रियां संन्यासी हैं। यह भी खयाल रखना कि वह सारी वर्ण-व्यवस्था पुरुषों के लिए थी, वह सारी आश्रम-व्यवस्था पुरुषों के लिए थी। स्त्रियों को तो कोई पच्चीस वर्ष तक गुरुकुल में ब्रह्मचर्य का सवाल नहीं था। स्त्रियों के लिए तो वेद पढ़ने का ही अधिकार नहीं था। उनके लिए तो कथा-कहानियां पढ़ने का अधिकार है--रामायण पढ़ो; बाबा तुलसीदास की पोंगापंथी, उसको पढ़ो; कथाएं, पुराण, असली बात नहीं, फिजूल की बातें हैं, इनको पढ़ो। और इनको पढ़-पढ़ कर क्या सीखो?
बाबा तुलसीदास समझाते हैं: ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।
यह समझो! कि जब पति तुम्हें सताए तो समझो कि अच्छा कार्य कर रहा है, करना ही चाहिए। स्त्री तो ताड़न की अधिकारी है ही। अगर पति तुम्हें न ताड़े तो समझना कि कुछ गड़बड़ है। जब तक तुम्हें ढोल की तरह न बजाए तब तक समझना प्रेम में कुछ कमी है। मतलब यह कहीं ढोल और बजा रहा है! साफ है। यह ढोल तो बजाएगा ही! यह कहीं और ताड़ना दे रहा है। सो जब तुम्हें ताड़ना दे तो प्रसन्न होना कि अभी यह किसी और ढोल में उत्सुक नहीं है। अभी तुम्हारे ढोल के आस-पास ही कुटाई-पिटाई करने में लगा है। अभी तुमसे ही बंधा है, तुम्हारे ही खूंटे से बंधा है। और यह तुम्हें पैर की जूती समझे तो सौभाग्य समझना, क्योंकि तुम्हारी स्थिति पशुओं जैसी है। ढोल, गंवार, शूद्र! स्त्री तो सभी शूद्र हैं। स्त्रियों में कोई ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय इत्यादि का सवाल नहीं, उनका तो एक ही वर्ण है--शूद्र।
क्या गजब की बात कही! इसीलिए मैं इस आदमी को कमबख्त कहता हूं। इसको मैं महर्षि नहीं कहता।
यहां तुम्हें कौन सी आश्रम-व्यवस्था दिखाई पड़ रही है? यहां तो आश्रम-व्यवस्था तोड़ी जा रही है। तुम सिर्फ धोखे में आ गए, वह जो दरवाजे पर आश्रम लिखा है उससे। वह बुद्धुओं के लिए लिखा है। वह तो जैसे मछलियों को फांसने के लिए कांटे में थोड़ा आटा लगाना पड़ता है न! कभी-कभी कोई मछली फंस कर आ जाती है। जैसे तुम्हारे भाई पंडित लज्जाशंकर झा आ गए थे। अब पंडित ज्ञानशंकर झा आ गए! अब और तुम्हारे भाई होंगे, वे भी आएंगे। वह आश्रम तो केवल आटा है कांटे पर, क्योंकि कुछ मछलियों को फंसाने का भी मजा है। उनको बंसी में फंसा कर मैं हिलाता हूं।
यह कोई आश्रम नहीं है। यह तो मधुशाला है। मगर यह मामला निजी है। मधुशाला उनको पता चलती है जो इसमें प्रविष्ट हो जाते हैं। जो यहां सिर्फ दर्शक की तरह आते हैं, वे तो बेचारे आश्रम ही समझ कर आएंगे। आश्रम समझ कर भी आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। मधुशाला लिखवा दूं दरवाजे पर, तब तो और मुश्किल हो जाएगी। मगर है यह मधुशाला। अब तुमसे क्या छिपाना, आ ही गए हो। तो जब तुम्हारे तीसरे भाई आने लगें तो उनको समझा देना।
शब्द में मत पड़ो। मेरे लिए तो आश्रम का कुल मतलब विश्राम होता है। यहां तो लोग विश्राम कर रहे हैं। यहां तो लोग, कैसे जीवन को विश्रामपूर्ण ढंग से जीया जाए, उसकी कीमिया सीख रहे हैं। यहां छोटे-छोटे बच्चे संन्यासी हैं। यहां कोई भी संन्यासी हो सकता है। यहां कोई उम्र का हिसाब नहीं है। यहां मैं आश्रम की व्यवस्था तोड़ रहा हूं। और तुम समझ रहे हो कि मैं आश्रम की व्यवस्था को पुनर्स्थापित कर रहा हूं।
तुम पूछते हो: "लेकिन क्या यह एक नये प्रकार की वर्ण-व्यवस्था, एक नये प्रकार की आश्रम-व्यवस्था नहीं है?'
यहां कोई व्यवस्था नहीं है--न वर्ण की, न कोई आश्रम की।
तुम कहते हो: "महर्षि मनु ने हजारों वर्ष पूर्व जो वैज्ञानिक व्यवस्था दी थी...।'
क्या खाक वैज्ञानिक व्यवस्था है उसमें! उससे ज्यादा अवैज्ञानिक कोई बात इस भारत में घटी नहीं। अभी तक हम उसी से सड़े जा रहे हैं, मरे जा रहे हैं। जितनी जल्दी मनु महाराज से छुटकारा हो जाए उतना अच्छा। मनुस्मृति की तो होलियां जलाई जानी चाहिए। वह हमारे सदियों पुराने पापों का भंडार है। और जो भी उसमें कहा गया है, एकदम अवैज्ञानिक ही नहीं, अमानुषिक भी है।
अगर मनुस्मृति को गौर से देखो तो तुम पाओगे ऐसी अमानवीय कोई व्यवस्था कभी नहीं थी। एडोल्फ हिटलर को मनुस्मृति बहुत पसंद थी। एडोल्फ हिटलर अपने को आर्य घोषित करता था, जर्मनों को शुद्ध आर्य मानता था और मनुस्मृति का बहुत समर्थक था। वह भी यही चाहता था कि इसी तरह व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि यह गुलामी की बड़ी सुनियोजित व्यवस्था है। इसमें स्वतंत्रता का उपाय नहीं है; जन्म से ही सब निर्धारण हो जाता है। शूद्र को शिक्षा का उपाय नहीं; इसलिए कभी भूल कर भी वह ब्राह्मण तो हो ही नहीं सकता। और जिनको तुम बड़ा आदर देते हो, मर्यादा पुरुषोत्तम राम, उन्होंने भी एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया, क्योंकि एक ब्राह्मण ने यह खबर दी...।
अब तुम देखते हो, कैसा पाखंड हम जारी रखे हैं! और अब भी राम की पूजा हो रही है! राम की पूजा में ये सारी बातें सम्मिलित हैं। और यही नहीं, महात्मा गांधी जैसे भ्रांत लोग राम-राज्य को फिर से लाना चाहते हैं। राम-राज्य में ये अनिवार्य अंग होंगे, इनके बिना राम-राज्य नहीं हो सकता।
एक ब्राह्मण ने राम को आकर खबर दी कि मेरा जवान बेटा मर गया। और जवान बेटा नहीं मरना चाहिए। यह कैसा कलियुग कि मेरा जवान बेटा मर गया! पहले बूढ़े बाप को मरना चाहिए, फिर जवान बेटे को मरना चाहिए।
तो राम ने पूछा, इसका क्या कारण है?
तो उसने कहा, इसका कारण यह है कि एक शूद्र ने ब्राह्मण के द्वारा पढ़ा जाता हुआ वेद छुप कर सुन लिया है--शंबूक नाम के शूद्र ने।
अब यह भी मजे की बात है कि यह ब्राह्मण का जो बेटा मरा और शंबूक ने जहां छुप कर वेद-मंत्र सुना, उसके बीच एक हजार मील का फासला था। एक हजार मील तक अगर सभी के जवान बेटे मर गए होते तो भी कोई बात सोचने जैसी थी। इस एक बुद्धू का बेटा मरा, वह भी हजार मील दूर, उसका जिम्मा उस शूद्र पर पड़ा जिसने छिप कर वेद-मंत्र सुन लिए थे।
और राम, जिनकी तुम प्रशंसा करते हुए नहीं अघाते हो, उन्होंने बुला कर उस शूद्र के कानों में पिघला हुआ सीसा भरवा दिया।
बहरा हो गया होगा सदा को। जिंदा भी बचा हो, यह भी संभावना कम है। क्योंकि कानों में अगर पिघला हुआ सीसा भरा जाएगा, तो कान तो मस्तिष्क से जुड़े हैं, उसके मस्तिष्क को भी विकृत कर दिया होगा। कान तो आंखों से भी जुड़े हैं। उसकी आंखें भी अंधी हो गई होंगी। कान तो नाक से भी जुड़े हैं। वह आदमी जिंदा भी रहा होगा, इसकी भी संभावना कम है। लेकिन इसने महापाप किया था, वेद सुन लिया था!
तो शूद्र को तो तुमने गुलामी में बांध ही दिया पूरी तरह से! उसे तो कोई उपाय न रहा ऊपर उठने का, मुक्त होने का। तुमने उसके लिए सीढ़ी ही तोड़ दी। और वही तुमने वैश्यों के साथ किया। वैश्य शूद्रों से जरा ऊपर; ज्यादा ऊपर नहीं, बस जरा ऊपर; उनके लिए भी कोई उपाय नहीं। सत्ता का अधिकार तो क्षत्रिय का है और ब्राह्मण का है। वस्तुतः तो ब्राह्मण का है, क्षत्रिय का सहारा लेना पड़ता है क्योंकि उसके हाथ में तलवार है। लेकिन वह दोयम है, नंबर दो है। बड़े से बड़े सम्राट को भी ब्राह्मण के चरण छूने चाहिए, चाहे ब्राह्मण आचरणहीन हो। चाहे शूद्र कितना ही आचरणवान हो तो भी सम्मान के योग्य नहीं है।
मनुस्मृति कहती है: अगर कोई शूद्र किसी ब्राह्मण की स्त्री के प्रेम में पड़ जाए या किसी ब्राह्मण स्त्री से संबंध बना ले, तो उसका दंड हत्या है। और अगर कोई ब्राह्मण किसी शूद्र की स्त्री के साथ व्यभिचार करे, तो भी उसका दंड कुछ रुपया है।
तुम फर्क देखते हो, शूद्र की कीमत, उसके जीवन की कीमत बस कुछ रुपया है! ब्राह्मण चाहे तो किसी से भी विवाह कर सकता है। क्षत्रिय चाहे तो ब्राह्मण को छोड़ कर किसी से भी विवाह कर सकता है। वैश्य चाहे तो ब्राह्मण और क्षत्रिय को छोड़ कर किसी से भी विवाह कर सकता है। लेकिन शूद्र केवल शूद्र में ही विवाह कर सकता है। शूद्र के लिए तुमने कोई उपाय न छोड़ा। न ज्ञान पाकर ऊपर बढ़ सकता है, न किसी अच्छे कुल में विवाह करके ऊपर बढ़ सकता है। तुमने उसके सब आधार तोड़ दिए।
यह शोषण की व्यवस्था है, इसमें विज्ञान क्या है? यह वर्ग-व्यवस्था है। और यह वर्ग-व्यवस्था एकदम अमानवीय है, हिंसक है।
और तुम कह रहे हो कि "महर्षि मनु ने हजारों वर्ष पूर्व जो वैज्ञानिक व्यवस्था दी थी, उसके रूप तो बदल सकते हैं, लेकिन आधार कभी नहीं मिट सकते।'
किस आधार पर तुम यह कह रहे हो कि उसके आधार कभी नहीं मिट सकते? रूस में कोई वर्ण-व्यवस्था नहीं है; आधार कभी के मिट गए। हिंदुस्तान और हिंदुओं को छोड़ कर दुनिया में कहीं कोई वर्ण-व्यवस्था नहीं रही; उसके आधार कभी के मिट गए। और अगर कहीं कुछ भी रूप-रेखाएं रह गई हैं, तो मिटती जा रही हैं। जैसे-जैसे आदमी का बोध, जैसे-जैसे आदमी की समझ बढ़ रही है, मिटती जा रही हैं।
और यहां इस मधुशाला में अगर तुमको कहीं कोई वर्ण-व्यवस्था दिखाई पड़ती हो, तो तुम्हारी आंखों का कसूर है। यहां सुशिक्षित से सुशिक्षित व्यक्ति संडास सफाई करने का काम कर रहे हैं। पीएच.डी. और डी.लिट. जो कहीं यूनिवर्सिटीज में बड़े प्रोफेसर थे, वे यहां सफाई का काम कर रहे हैं, शूद्र का काम कर रहे हैं। मगर वे शूद्र नहीं हैं। उनका सम्मान उतना ही है जितना किसी और का। यहां किसी के सम्मान में कोई कमी और ज्यादा नहीं है; चाहे कोई सफाई करता हो, पाखानों की सफाई करता हो और चाहे कोई ध्यान सिखाता हो, चाहे कोई सूफी नृत्य करवाता हो, चाहे कोई इस विश्वविद्यालय का कुलपति हो, कोई भेद नहीं है। यहां कोई हायरेरकी नहीं है, कोई ऊंचे-नीचे का सवाल नहीं है।
और तुम्हें यहां वर्ण-व्यवस्था दिखाई पड़ती है तो हद हो गई! यहां तो कोई रूप-रेखा ही नहीं है वर्ण-व्यवस्था की। यहां कोई पूछता ही नहीं कि तुम हिंदू हो, कि मुसलमान हो, कि ईसाई हो, कि जैन हो, कि बौद्ध हो, कि ब्राह्मण हो, कि शूद्र हो। यहां कोई पूछता ही नहीं। यह बात पूछने की है? यह अशोभन है। किसी से यह पूछना, उसका अपमान करना है।
पंडित ज्ञानशंकर झा, तुम यहां किसी से पूछना कि तुम ब्राह्मण हो, कि क्षत्रिय, कि वैश्य, कि शूद्र? और तब तुम्हें पता चलेगा। कुछ नहीं कहा जा सकता कि वह किस तरह का तुमसे व्यवहार करेगा। कुश्तमकुश्ती हो जाएगी। क्योंकि यह बात अमानवीय है। यह पूछना ही अमानवीय है।
मगर इस देश में तो यह बिलकुल स्वाभाविक है। यहां तो एक से एक अमानवीय बातें पूछी जाती हैं। किसी से किसी की जाति पूछना, किसी से किसी का वर्ण पूछना अभद्रता है, अशिष्टाचार है। लेकिन यही नहीं, लोग तो यहां तनख्वाहें तक पूछते हैं कि आपको तनख्वाह क्या मिलती है? यही नहीं, यह भी पूछते हैं कि ऊपर भी कुछ...?
और मजा यह है कि जवाब देने वाले भी जवाब देते हैं कि हां, थोड़ा-बहुत ऊपर भी मिल जाता है, सब भगवान की कृपा है। किसी को न लाज है, न संकोच है। लांच-घूस भी भगवान की कृपा है। लोग यह भी कहते हैं कि तनख्वाह तो ज्यादा नहीं, मगर ऊपर काफी मिल जाता है, इसलिए चित्त प्रसन्न है, सब ठीक-ठाक चल रहा है, घर-गृहस्थी की गाड़ी बड़े मजे में चल रही है। किसी को कोई संकोच नहीं। न पूछने वाले को, न जवाब देने वाले को।
मगर इस आश्रम में जरा सोच-समझ कर किसी से कुछ पूछना। यहां कोई बेहूदी बात बरदाश्त नहीं की जाती।
यह तुम किस आधार पर कहते हो, पंडित ज्ञानशंकर झा, कि महर्षि मनु ने जो वैज्ञानिक व्यवस्था दी थी, उसके रूप तो बदल सकते हैं, लेकिन आधार कभी नहीं मिट सकते?
उसका कोई आधार ही नहीं है--निराधार है, जबरदस्ती ऊपर से थोपी गई है, कृत्रिम व्यवस्था है। मनुष्य सिर्फ मनुष्य है। उसे बांटना अवैज्ञानिक है।
तुम कहते हो: "वर्ण और आश्रम नये-नये रूपों में सदा प्रकट होते रहे हैं।'
बिलकुल गलत है। वर्ण और आश्रम रोज-रोज विदा होते रहे हैं, प्रकट नहीं होते रहे। और अब आखिरी वक्त आ गया है। मेरे संन्यासी के साथ उनकी अंत्येष्टि, अंतिम संस्कार किए दे रहे हैं।
तुम कहते हो: "इन अर्थों में आपके संन्यासी नये नहीं हैं और न ही आपकी आश्रम-व्यवस्था नयी है।'
सिर्फ नाम पुराने हैं। नामों के धोखे में आ जाओ तो अलग बात है, अन्यथा सब कुछ नया है। और नाम भी पुराने मैंने जान कर चुने हैं, नहीं तो नये नाम चुन सकता था, कोई अड़चन न थी। नये नाम नहीं चुने, पुराने नाम चुने हैं। संन्यासियों को कुछ और कह सकता था।
आखिर महावीर ने अपने संन्यासियों को संन्यासी नहीं कहा, मुनि कहा। बुद्ध ने अपने संन्यासियों को संन्यासी नहीं कहा, भिक्षु कहा।
मैं भी कोई नया नाम चुन सकता था। लेकिन जान कर मैंने पुराना नाम चुना। क्योंकि संन्यास की जो पुरानी व्यवस्था है उसको भीतर से ही नष्ट करना है। बाहर से चोट करने की बजाय भीतर ही बम रख देना बेहतर है।
इतने संन्यासी मैं मुल्क में पैदा कर दूंगा कि तुम्हारे अखंडानंद, पाखंडानंद दाल में नमक के बराबर हो जाएंगे। इनसे लोग पूछने लगेंगे, माला कहां है?
मेरा संन्यास बिलकुल नया है, समग्रतया नया है। क्योंकि संन्यासी का पुराना जो रूप था, वह जीवन से भागने का था, जीवन जीने का नहीं। संन्यासी का अर्थ ही यह था कि जो जीवन को छोड़ दे, त्याग दे। और मेरे संन्यास का अर्थ है: जो जीवन को उसकी समग्रता में भोगे। त्यागे क्यों? भागे क्यों? जीवन को जीए! और यूं जीए कि जीवन को जीने में ही परमात्मा को पा सके।
जीवन मेरे लिए पवित्र है। जीवन मेरे लिए धर्म है। जीवन मेरे लिए परमात्मा की अभिव्यक्ति है। इसलिए जीवन को जीना उसे पाने की एकमात्र विधि है।
तुम्हारे संन्यासी तो सब हिप्पी थे। हिप्पी शब्द का अर्थ समझ लेना। हिप्पी शब्द का अर्थ होता है: जिन्होंने अपना हिप, जिन्होंने अपनी पीठ समाज को दिखा दी और भाग खड़े हुए। मेरे संन्यासी हिप्पी नहीं हैं। तुम्हारे संन्यासी सब भगोड़े थे, कायर थे, कमजोर थे, जिंदगी को जीने की क्षमता नहीं थी, बुद्धिमत्ता नहीं थी। जीवन की चुनौती को स्वीकार करने का बल नहीं था; नपुंसक थे। इसलिए भाग गए थे।
तुम कैसे कह सकते हो कि मेरा संन्यास पुराना संन्यास है?
नाम भर पुराना है। नाम जान कर पुराना रखा है। क्योंकि पुराने को बिलकुल नष्ट कर देना है। पुराने में एकदम आग लगा देनी है। और आग लगाने का सुगमतम उपाय यह है।
पहले मैंने बाहर से लड़ने की कोशिश की, तब तक मैंने संन्यास की व्यवस्था नहीं रखी थी। लेकिन मैंने देखा कि बाहर से लड़ना बहुत मुश्किल है, बहुत असंभव है, क्योंकि यह गढ़ सदियों पुराना है। बेहतर यही है कि भीतर प्रवेश कर जाओ।
इसलिए मैंने संन्यास की व्यवस्था दी कि ठीक है, संन्यासी हो जाओ, गैरिक वस्त्र पहनो। और भूल कर भी पुराने संन्यासी जैसे मत जीना। जीना अपनी मौज से। जीना अपनी मस्ती में। लेकिन गैरिक वस्त्र और संन्यास के नाम से भीतर प्रवेश हो जाएगा। और भीतर प्रवेश होकर इस जराजीर्ण व्यवस्था को तोड़ देना ज्यादा आसान है।
और इसीलिए तो मुझसे सारा संन्यासियों का वर्ग नाराज है--सब तरह के संन्यासियों का; क्योंकि उसको भय पैदा हो गया है, घबड़ाहट पैदा हो गई है।
न तो यह कोई आश्रम-व्यवस्था पुरानी है, न यह कोई संन्यास पुराना है।
अब तुम पूछते हो: "क्या आप महर्षि मनु की वैज्ञानिक व्यवस्था आश्रम-व्यवस्था को गलत सिद्ध कर सकते हैं?'
रोज वही कर रहा हूं।
योग प्रीतम ने यह गीत मुझे भेजा है--
हां, मेरे मनचीते प्रभु,
उठने दो ऐसी ही क्रांति का राग,
सुलगने दो और अधिक विद्रोह की आग।
हर हालत में हम तुम्हारे साथ हैं
हम ही तुम्हारे लक्ष-लक्ष बढ़े हुए हाथ हैं।
शताब्दियां गुजर गईं--
किसी ने इतने ज्वलंत प्रखर-स्वर में कभी गाया नहीं,
जर्जर परंपराएं पलती रहीं--
नये-नये वसंतों की आहुतियां लेकर,
लेकिन कोई ज्वालामुखी बन कर कभी आया नहीं।
तुम्हारा आगमन--
जीवन का शंखनाद करता हुआ तुम्हारा आगमन!
एक लंबी कालरात्रि के बाद
नवयुग का खिलखिलाता स्वर्ण-विहान है,
टूटने लगी हैं अंध तिमिर की काराएं
तुम्हारा यह कलरव--मुक्ति का मधुर गान है।
हां, मेरे क्रांतिकारी भगवान!
होने दो आरोहण चेतना के उच्च शिखरों पर,
उठने दो रोज-रोज नये-नये अभियान।
इस अभियान में--
हमारा अज्ञान भी तिरोहित हो
हमारा अहंकार भी जल जाए,
गल जाएं हमारे मन के काठिन्य
तुम्हारी दिव्यता की आंच में
हमारा रोम-रोम पिघल जाए,
ताकि हम भी ठीक से
तुम्हारे साथ स्वर मिला कर गा सकें,
यह जीवन
संगीत और नृत्य भरा उत्सव हो जाए,
नयी प्रतिमाओं के आलोक से सभी दिशाएं जगमगा सकें।
हां, प्रभु,
सब ओर मरघट बनी इस धरती पर
सृजन की नयी पौध उगानी ही है,
नयी कोंपलों--नये फूलों से
भर देनी है धरा की गोद,
नये मनुष्य में फिर से
वासंती सुषमा जगानी ही है।

आज इतना ही।


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