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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-047)



प्रवचन—47 (अकेलेपन की गहन प्रतीति है मुक्ति)

पहला प्रश्‍न:

हम तो जीते—जी और सोते—जागते भय और अपराध—भाव के द्वारा आशेष नारकीय पीड़ा से गुजर चकते हैं। क्या यह काफी नहीं है? कि मरने के बाद फिरे हमें नर्क भेजा जाए!



पहली बात, कोई भेजने वाल नहीं है, कोई भेजता नहीं है। तुम जाते हो इसे बहुत ठीक से समझ लो। अन्‍यथा बुद्ध के दृष्‍टिोण को पकड़ न पाओगे।
बुद्ध के दृष्टिकोण में जो अत्यंत आधारभूत बात है, वह यह है—धर्म, ईश्वर से शून्य। अगर तुम किसी भांति ईश्वर को पकड़े रहे, तो बुद्ध के धर्म को समझ न पाओगे। ईश्वर के बहाने तुमने किसी दूसरे पर दायित्व छोड़ा है।
तुम कहते हो, दुख तो हम भोग चुके बहुत, अब हमें नर्क न भेजा जाए—जैसे तुम्हें कोई भेजने वाला है! कि प्रार्थना और पूजा हमने इतनी की, अब हमें स्वर्ग भैजा जाए—जैसे कि कोई पुरस्कार बांट रहा है। वहां कोई भी नहीं है।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-046)



प्रवचन—46 (जीवन—मृत्यु से पार है अमृत)
सारसूत्र:

वणिजो व भयं मग्‍गं अप्‍पसत्‍थोमहद्धनो।
विसं जीवितुकामो व पापनि परिवज्‍जये।।109।।


पाणिम्‍हि चे वणो नास्‍स हरेय्य पाणिना विसं।
नाब्‍बणं विसमन्‍वेति नित्‍थ पापं अकुब्‍बतो।।110।।

यो अप्‍पदुट्ठस्‍स नरस्‍स दुस्‍सति।
सुद्धस्‍स पोसस्‍स अनंगणस्‍स।
तमेव बालं पच्‍चेति पापं।
सुखमो रजो पटिवातं व खितो।।111।।

गब्‍भमेके उप्‍पज्‍जन्‍ति निरयं पापकम्‍मिनौ।
सग्‍गं सुगतिनो यन्‍ति परिनिब्‍बन्‍ति अनासवा।।112।।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04



ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो

प्रवचन-चौथा-(ध्यान: जीवन की बुनियाद)
 
जीवन में दुख भी है और सुख भी, क्योंकि जन्म भी है और मृत्यु भी। लेकिन इस बात पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि दोनों में से हम किसको चुन कर जीवन की बुनियाद बनाते हैं।
यदि कोई व्यक्ति मृत्यु को चुन कर जीवन की बुनियाद रखे, तो फिर जन्म भी केवल मृत्यु की शुरुआत मालूम पड़ेगी। और अगर कोई जीवन को ही बुनियाद रखे, तो फिर मृत्यु भी जीवन की परिपूर्णता और जीवन की अंतिम खिलावट मालूम पड़ेगी। कोई व्यक्ति अगर दुख को ही जीवन का आधार चुन ले, तो सुख भी केवल दुख में जाने का उपाय दिखाई पड़ेगा। और अगर कोई व्यक्ति सुख को जीवन का आधार बना ले, तो दुख भी केवल एक सुख से दूसरे सुख में परिवर्तन की कड़ी होगी। यह निर्भर करता है चुनाव पर। जीवन में दोनों हैं। हम क्या चुनते हैं, इससे पूरे जीवन की व्यवस्था बदल जाती है। अशांति भी है जीवन में, शांति भी। हम क्या चुनते हैं, इस पर सब निर्भर करेगा।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03



ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-तीसरा- (ध्यान: मनुष्य की आत्यंतिक संभावना)


पहले ध्यान के संबंध में कुछ बातें और फिर हम ध्यान में प्रवेश करेंगे।
सबसे पहली बात, साहस न हो तो ध्यान में उतरना ही नहीं। और साहस का एक ही अर्थ है: अपने को छोड़ने का साहस। और सब साहस नाम मात्र के ही साहस हैं। एक ही साहस--अपने से छलांग लगा जाने का साहस, अपने से बाहर हो जाने का साहस--ध्यान बन जाता है। जैसे कोई वस्त्रों को उतार कर रख दे, नग्न हो जाए, ऐसे ही कोई अपने को उतार कर रख कर नग्न हो सके तो ही ध्यान में प्रवेश कर पाता है।
शरीर भी वस्त्र से ज्यादा नहीं है और मन भी वस्त्र से ज्यादा नहीं। लेकिन इन वस्त्रों से हमारा बड़ा मोह है। इन वस्त्रों को ही हमने अपनी आत्मा समझा है, इन वस्त्रों को ही हमने अपना जीवन माना हुआ है। इसलिए उतारने में बड़ी कठिनाई होती है।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02



ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो

प्रवचन-दूसरा (ध्यान: एक गहन मुमुक्षा)


ध्यान के संबंध में एक-दो बातें आपसे कह दूं और फिर हम ध्यान में प्रवेश करें।
एक तो ध्यान में स्वयं के संकल्प के अभाव के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। यदि आप ध्यान में जाना ही चाहते हैं तो दुनिया की कोई भी शक्ति आपको ध्यान में जाने से नहीं रोक सकती है। इसलिए अगर ध्यान में जाने में बाधा पड़ती हो तो जानना कि आपके संकल्प में ही कमी है। शायद आप जाना ही नहीं चाहते हैं। यह बहुत अजीब लगेगा! क्योंकि जो भी व्यक्ति कहता है कि मैं ध्यान में जाना चाहता हूं और नहीं जा पाता, वह मान कर चलता है कि वह जाना तो चाहता ही है। लेकिन बहुत भीतरी कारण होते हैं जिनकी वजह से हमें पता नहीं चलता कि हम जाना नहीं चाहते हैं।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01



ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो

प्रवचन-पहला (ध्यान: एक बड़ा दुस्साहस)

प्रश्न: सांझ आप कहते हैं कि इंद्रियों की पकड़ में जो नहीं आता वही अविनाशी है। और सुबह कहते हैं कि चारों तरफ वही है; उसका स्पर्श करें, उसे सुनें। क्या इन दोनों बातों में विरोध, कंट्राडिक्शन नहीं है?

इंद्रियों की पकड़ में जो नहीं आता वही अविनाशी है। और जब मैं कहता हूं सुबह आपसे कि उसका स्पर्श करें, तो मेरा अर्थ यह नहीं है कि इंद्रियों से स्पर्श करें। इंद्रियों से तो जिसका स्पर्श होगा वह विनाशी ही होगा। लेकिन एक और भी गहरा स्पर्श है जो इंद्रियों से नहीं होता, अंतःकरण से होता है। और जब मैं कहता हूं, उसे सुनें, या मैं कहता हूं, उसे देखें, तो वह देखना और सुनना इंद्रियों की बात नहीं है। ऐसा भी सुनना है जो इंद्रियों के बिना भीतर ही होता है। और ऐसा भी देखना है जो आंखों के बिना भीतर ही होता है। उस भीतर सुनने-देखने और स्पर्श करने की ही बात है। और यदि उसका अनुभव शुरू हो जाए, तो फिर वह जो विनाशी दिखाई पड़ता है चारों ओर, उसके भीतर भी अविनाशी का सूत्र अनुभव में आने लगता है।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-045)



प्रवचन—045     
सुख या दुख तुम्हारा ही निर्णय

                 
पहला प्रश्‍न:

क्‍या मेरी नियति में सिर्फ विषाद की, फ्रस्ट्रेशन की एक लंबी श्रंखला लिखी है?


तुम्‍हारे हाथ में है। लिखते जाओगे, तो लिखी रहेगी। विषाद कोई और तुम्हें नहीं दे रहा है, तुम्हारा चुनाव है। तुमने चुना है। आनंद भी कोई और नहीं देगा। तुम चुनोगे, तो मिलेगा। तुम जो खोज लेते हो, वही तुम्हारा भाग्य है।
भाग्य की पुरानी धारणा कहती है, लिखा हुआ है; और किसी और ने लिखा है, तुमने नहीं। मैं तुमसे कहना चाहता हूं? भाग्य लिखा हुआ नहीं है, रोज—रोज लिखना पड़ता है। और किसी और के द्वारा नहीं, तुम्हारे ही हाथों से लिखा जाता है। यह हो सकता है कि तुम इतनी बेहोशी में लिखते हो कि अपने ही हाथ पराए मालूम होते हैं। यह हो सकता है, तुम इतनी अचेतन अवस्था में लिखते हो कि लिख जाते हो तभी पता चलता है कि कुछ लिख गया। तुम अपने को रंगे हाथ नहीं पकड़ पाते। तुम्हारे होश की कमी है। लेकिन कोई और तुम्हारा भाग्य नहीं लिखता है।

एस धम्मो संनतनो-प्रवचन-044



एस धम्मो संनतनो-(भाग-05)
प्रवचन-044

ऊर्जा का क्षण-क्षण उपयोग: धर्म

सारसूत्र:

अभित्थरेथ कल्याणे पापा चित्तं निवारये।
दन्धं हि करोतो पुग्भ् पापस्मिं रमते मनो।।१०२।।

पापग्चे पुरिसो कयिरा न तं कयिरा पुनप्पुनं।
न तम्हि छन्दं कयिराथ दुक्खो पापस्स उच्चयो।।१०३।।

पुग्भ्ग्चे पुरिसो कयिरा कयिराथेन पुनप्पुनं।
तम्हि छन्दं कयिराथ सुखो पुग्भ्स्स उच्चयो।।१०४।।

पापोपि पस्सति भद्रं याव पापं न पच्चति।
यदा च पच्चति पापं अथ पापो पापानि पस्सति।।१०५।।

भद्रोपि पस्सति पापं याव भद्रं न पच्चति।
यदा च पच्चति भद्रं अथ भद्रो भद्रानि पस्सति।।१०६।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-043)



एस धम्मो संनतनो-(भाग-05)
प्रवचन-043  

परमात्मा अपनी ओर
आने का ही ढंग

पहला प्रश्न:


कल तक आप हमें परमात्मा की ओर जाने को कह रहे थे, आज हमें अपनी ही ओर जाने पर जोर दे रहे हैं। आपको तो दोनों ओर, दोनों अतियों में बहना सरल है, खेल है, पर हम कैसे इतनी सरलता से दोनों ओर बहें, आपके साथ-साथ बहें? कृपा कर समझाएं।

जीवन को अतियों में तोड़कर देखना ही गलत है। जीवन को दो में तोड़कर देखने में ही भ्रांति है। तुम अगर कभी एक को भी चुनते हो, तो दो के खिलाफ चुनते हो। तुम्हारे एक में भी दो का भाव बना ही रहता है। तुम एक किनारे को चुनते हो, तो दूसरे किनारे को छोड़कर चुनते हो। छोड़ने से दूसरा किनारा मिटता नहीं। तुम्हारे छोड़ने से दूसरे किनारे के मिटने का क्या संबंध है!
वस्तुतः तुम्हारे इस किनारे को पकड़ने में दूसरा किनारा बना ही रहता है। तुम उसके विपरीत ही इसे पकड़े हो। अगर दूसरा किनारा खो जाए, तो यह किनारा भी कैसे बचेगा? जाते हैं दोनों साथ जाते हैं, रहते हैं दोनों साथ रहते हैं।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-042)



एस धम्मो संनतनो-(भाग-05)
प्रवचन-042  (झुकने से उपलब्धि)


अभिवादनसीलिस्स निच्चं पद्धापचायिनो।
चत्वारो धम्मा बङ्ढन्ति आयु वण्णो सुखं बलं।।९६।।

यो च वस्ससतं जीवे दुस्सीलो असमाहितो।
एकाहं जीवितं सेय्यो सीलवन्तस्स झयिनो।।९७।।

यो च वस्ससतं जीवे कुसीतो हीनवीरियो।
एकाहं जीवितं सेय्यो विरियमारभतं दल्हं।।९८।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं उदयब्बयं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो उदयब्बयं।।९९।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं अमतं पदं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो अमतं पदं।।१००।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं धम्ममुत्तमं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो धम्ममुत्तमं।।१०१।।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-10



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-दसवां-(ध्यान: प्यास का अनुसरण)

मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल।

एक मित्र ने पूछा है कि जिस प्रभु का हमें पता नहीं, उसका नाम लेकर संकल्प कैसे करें?

प्रभु का तो पता नहीं है। लेकिन सच ही प्रभु का पता नहीं है? क्योंकि जब भी हम प्रभु से कोई प्रतिमा--कोई राम, कोई कृष्ण, कोई बुद्ध का खयाल ले लेते हैं, तभी कठिनाई हो जाती है। मेरे लिए प्रभु का अर्थ समग्र अस्तित्व है, टोटल एक्झिस्टेंस है।
ये हवाएं बहती हैं, इनका पता नहीं है? यह आकाश है, इसका पता नहीं है? यह जमीन है, इसका पता नहीं है? आप हैं, इसका पता नहीं है? होने का पता नहीं है? यह जो होने की समग्रता है, यह जो बड़ा सागर है अस्तित्व का, इस पूरे सागर का नाम परमात्मा है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-09



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-नौवां-(ध्यान: परम स्वास्थ्य का द्वार)

मेरे प्रिय आत्मन्!
दोत्तीन सवाल हैं।

एक मित्र ने पूछा है कि ध्यान से स्वास्थ्य का क्या संबंध है?

बहुत संबंध है। क्योंकि बीमारी का बहुत बड़ा हिस्सा मन से मिलता है। गहरे में तो बीमारी का नब्बे प्रतिशत हिस्सा मन से ही आता है। ध्यान मन को स्वस्थ करता है। इसलिए बीमारी की बहुत बुनियादी वजह गिर जाती है।
यह जो ध्यान की प्रक्रिया है, इससे शरीर पर सीधा भी प्रभाव होता है। क्योंकि दस मिनट की तीव्र श्वास, आपकी जीवन ऊर्जा को, वाइटल एनर्जी को बढ़ाती है। सारा जीवन श्वास का खेल है। जीवन का सारा अस्तित्व श्वास पर निर्भर है। श्वास है तो जीवन है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-आठवां-(ध्यान: भीतर की यात्रा)


मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल ले लें, फिर हम ध्यान के प्रयोग के लिए बैठें।

एक मित्र ने पूछा है कि रात्रि का प्रयोग क्या रात्रि के लिए ही है और सुबह का प्रयोग सुबह के लिए ही?

ऐसा कुछ नहीं है। दोनों प्रयोगों में से जो आपको ज्यादा गहराई में ले जाता हो, उसे आप कभी भी कर सकते हैं। अगर आपको दोनों प्रयोग एक-दूसरे के लिए परिपूरक बनते हों, तो आप दोनों प्रयोगों को सुबह और सांझ, जब जैसी सुविधा हो वैसा कर सकते हैं। अगर दो में से कोई एक प्रयोग आपके लिए अर्थ न रखता हो, तो उसे छोड़ दे सकते हैं। एक प्रयोग से भी वही परिणाम हो जाएगा। दोनों प्रयोगों से भी इकट्ठा होकर परिणाम वही होगा। एक-एक व्यक्ति के ऊपर निर्भर है कि उसे जैसी सुविधा हो वैसा चुनाव कर ले।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-07



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-सातवां-(ध्यान: समाधि की भूमिका)

मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल।


रखना ही होगा। यहां हम सिर्फ सीख रहे हैं। यहां सिर्फ आपको समझ में आ जाए पद्धति, इतना ही। फिर उस प्रयोग को घर जारी रखें तो उसमें गहराई बढ़ती जाएगी।

एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि यदि घर पर इसे हम जारी रखेंगे, तो आस-पास के लोग पागल समझने लगेंगे। चिल्लाएं या नाचें या हंसें।
                                               
आस-पास के लोग अभी भी पागल ही समझते हैं एक-दूसरे को। कहते न होंगे, यह दूसरी बात है। यह पूरी जमीन करीब-करीब मैड हाउस है, पागलखाना है। अपने को छोड़ कर बाकी सभी लोगों को लोग पागल समझते ही हैं। लेकिन अगर आपने हिम्मत दिखाई और इस प्रयोग को किया, तो आपके पागल होने की संभावना रोज-रोज कम होती चली जाएगी। जो पागलपन को भीतर इकट्ठा करता है, वह कभी पागल हो सकता है। जो पागलपन को उलीच देता है, वह कभी पागल नहीं हो सकता।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो

प्रवचन-छठवां-(ध्यान: सीधी छलांग)

मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल हैं। उन सवालों को छोड़ दूंगा, जो मात्र सैद्धांतिक हैं, थ्योरेटिकल हैं। यह बैठक सुबह और सांझ की मात्र साधकों के लिए है, सिद्धांतवादियों के लिए नहीं। सिद्धांतवादियों के लिए उनतीस तारीख से जो बैठक होगी, उसमें उन्हें जो पूछना हो पूछें। यहां तो उनसे ही बात कर रहा हूं जो करना चाहते हैं। और अक्सर ऐसा होता है, जो सोचना चाहते हैं वे करने का निर्णय कभी भी नहीं ले पाते। वे सोचते ही सोचते समाप्त हो जाते हैं। बहुत बार, सौ में निन्यानबे मौके पर, सोचना सिर्फ करने से बचने की तरकीब होती है। क्योंकि सोचने में कल तक के लिए टाला जा सकता है। जब तक निर्णय न हो, जब तक सिद्ध न हो, जब तक सिद्धांत स्पष्ट न हो, तब तक हम कुछ करेंगे नहीं।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-पांचवां-(संन्यास: एक संकल्प)


मेरे प्रिय आत्मन्!
दोत्तीन सवाल हैं, उस संबंध में थोड़ी बात समझ लें।

एक मित्र ने पूछा है कि ध्यान के प्रयोग से शरीर थक जाता है, तो प्रयोग जारी रखें या न रखें?
ऐसा ही किसी दूसरे मित्र ने भी पूछा है कि ध्यान में हाथ की गति बहुत होती है और हाथ दुख जाता है, तो प्रयोग जारी रखना या नहीं?

आप में से भी बहुतों को शरीर के किसी अंग के थक जाने का खयाल आएगा। स्वाभाविक है। जब शरीर का कोई भी अंग इतनी गति करेगा, इतना व्यायाम हो जाएगा, तो थकेगा। लेकिन दो-चार-छह दिन। जैसा कोई भी नया व्यायाम करते वक्त थकान मालूम होगी, वैसी ही। दो-चार दिन में ठीक हो जाएगा। और जब ठीक होगा, तो आपको पहली दफे पता चलेगा कि जो अंग आपका इस बीच मूवमेंट किया, गति किया, वह रुग्ण था। लेकिन जब तक स्वस्थ न हो जाए वह अंग तब तक पता भी नहीं चल सकता है। जैसे किसी आदमी के सिर में दर्द हो बचपन से ही, चौबीस घंटे दर्द हो, तो वह जानेगा कि यह दर्द ही उसका सिर है। एक बार दर्द छूटे तो ही उसे पता चलेगा कि दर्द सिर नहीं था।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04



ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-चौथा-(ध्यान: आध्यात्मिक विज्ञान)


मेरे प्रिय आत्मन्!
ध्यान के संबंध में थोड़े से सवाल हैं, उन्हें समझ लें, और फिर हम प्रयोग के लिए बैठेंगे।

एक मित्र ने पूछा है कि रात्रि के ध्यान में चश्मे वाले क्या करें? स्पष्ट करें कि आपको देखना है या आपकी ओर देखना है?

दोनों ही काम करने हैं। क्योंकि बिना मेरी ओर देखे तो मुझे नहीं देख सकते। मेरी ओर तो देखना ही है। लेकिन सिर्फ 'ओर' ही नहीं देखना है। क्योंकि 'ओर' बहुत बड़ी बात है, उसमें और भी बहुत कुछ आता है। मेरी ओर देखना है, लेकिन मुझे ही देखना है। चश्मा लगाए ही रखें। रात के प्रयोग में आपको चश्मा निकालने की कोई जरूरत नहीं है। कम से कम जो बैठे हैं उन्हें तो बिलकुल जरूरत नहीं है। जो खड़े हैं वे चश्मा निकाल लेंगे। तो जिनको देखने की तकलीफ हो, दूर से न देख सकते हों, तो वे मेरे पास मंच के पास ही खड़े होंगे। बैठे हुए लोगों को चश्मा निकालने की कोई जरूरत नहीं है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03



ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-तीसरा-(ध्यान: गुह्य आयामों में प्रवेश)


मेरे प्रिय आत्मन्!
कल प्रयोग हमने समझा है। आज उसकी गहराई बढ़नी चाहिए। संकल्प की कमी पड़ जाए, तो ही ध्यान में बाधा पड़ती है। और संकल्प की कमी कभी-कभी बहुत छोटी-छोटी बातों से पड़ जाती है।
जिंदगी में बहुत बड़े-बड़े अवरोध नहीं हैं, बहुत छोटे-छोटे अवरोध हैं। कभी आंख में एक छोटा सा तिनका पड़ जाता है, तो हिमालय भी दिखाई पड़ना बंद हो जाता है। जरा सा तिनका आंख में हो तो हिमालय भी दिखाई नहीं पड़ता। कोई अगर विचार करे और तर्क करे और गणित लगाए, तो जरूर सोचेगा कि जिस तिनके ने हिमालय को ओट में ले लिया, वह तिनका हिमालय से बड़ा होना चाहिए।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02



ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-दूसरा-(ध्यान: स्वयं में डुबकी)


मेरे प्रिय आत्मन्!
ध्यान के संबंध में दोत्तीन प्रश्न पूछे गए हैं, उनकी मैं आपसे बात कर लूं, फिर रात के प्रयोग को समझाऊंगा और हम करेंगे।

एक मित्र ने पूछा है कि श्वास गहरी लेनी है या तीव्र? डीप या फास्ट?

तीव्रता का खयाल रखें, गहरी अपने से हो जाए तो बात अलग। आप गहरे का, डीप का खयाल न करें। आप सिर्फ तीव्रता का, फास्टनेस का खयाल रखें--जितने जोर से! जितनी तेजी से! तेजी इसलिए ताकि चोट हो सके। वह जो भीतर सोई हुई शक्ति है, उसे उठाया और जगाया जा सके। हैमरिंग के लिए, हथौड़े की तरह चोट हो सके कुंडलिनी पर, इसलिए तेज का खयाल रखें।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01



 ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-पहला-(ध्यान: नया जन्म)


मेरे प्रिय आत्मन्!
जीवन में दो आयाम हैं, दो प्रकार के तथ्य हैं। एक तो ऐसे तथ्य हैं, जिन्हें जान लिया जाए तो ही किया जा सकता है। जानना जिनमें प्रथम है और करना द्वितीय है। जानना पहले है और करना पीछे है। दूसरे ऐसे तथ्य भी हैं जिन्हें पहले कर लिया जाए तो ही जाना जा सकता है। उनमें करना पहले है और जानना पीछे है।
विज्ञान पहले तरह का आयाम है, धर्म दूसरे तरह का।
विज्ञान में पहले जानना जरूरी है, तो ही पीछे किया जा सकता है। धर्म में पहले करना जरूरी है, तो ही पीछे जाना जा सकता है। विज्ञान में ज्ञान प्रथम और कर्म पीछे है, धर्म में कर्म प्रथम और ज्ञान पीछे है। विज्ञान बहिर्यात्रा है, बाहर के जगत के संबंध में है। धर्म अंतर्यात्रा है, भीतर के जगत के संबंध में है।