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शुक्रवार, 16 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)--प्रवचन--14



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—चौदहवां  
दिनांक 09 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—क्या मेरे सूखे हृदय में भी उस परम प्यारे की अभीप्सा का जन्म होगा?
2—आप वर्षों से बोल रहे हैं। फिर भी आप जो कहते हैं वह सदा नया लगता है।
इसका राज क्या है?
3—मैं संसार को रोशनी दिखाना चाहता हूं। मैं इस महत कार्य को प्रारंभ कैसे करूं?
सज्दों से अब तिश्नगी नहीं बुझती
4—जज्ब हो जाऊं रजनीश तेरे आस्ताने में।

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)--प्रवचन--13



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—तैरहवां  
दिनांक 08 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—यह भाव निरंतर उभर आता है कि हो न हो भगवान बुद्ध ने आप ही के रूप में पुनरावतार लिया है। आप बुद्धक्षेत्र निर्मित कर रहे हैं।
या कि आप लाओत्सु हैं, मैत्रेय भी नहीं?
2—मैं सुख को स्वीकार नहीं कर पाता हूं। ऐसा लगता है कि दुख मुझे भाता है। फिर भी चाहता हूं कि सुख मिले। सुख मिलता है तो लगता है कि सपना है। मेरी उलझन सुलझाएं!
3—मैं एक युवती के प्रेम में हूं। मैं आपके भी प्रेम में हूं। अब मैं क्या करूं? सब छोड़-छाड़ कर संन्यास में डूबूं? या फिर आप जैसा कहें! मेरी उम्र अभी केवल छब्बीस वर्ष ही है।

शुक्रवार, 9 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-12



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—बारहवां  
दिनांक 07 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—संन्यास का जन्म इस देश में हुआ, उसे गौरीशंकर जैसी गरिमा मिली,
पर आज उसका सम्मान बस ऊपरी रह गया है।
संन्यास और संन्यासी की अर्थवत्ता क्यों कर खो गई, कृपा करके समझाएं!

2—मैं क्या करूं? मेरो मन बड़ो हरामी!

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-11



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रवचन—ग्यारहवां  
दिनांक 06 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
भला ये रोग है कैसा?
सजन, अब तो बता दे!
अब तो बता दे, अब तो बता दे!
तड़प ये दिन-रात की...
2—प्रेम पाप है?
3—आपका जीवन-दर्शन इतना सरल, सहज और सत्य है, फिर भी भीड़ आपको गालियां क्यों दिए जाती है?
पहला प्रश्न:
तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
भला ये रोग है कैसा?
सजन, अब तो बता दे!
अब तो बता दे, अब तो बता दे!
तड़प ये दिन-रात की...

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म कथा)-अध्याय-14



(अध्‍याय—चौदहवां)—मेरा जंगल में खो जाना

 धीरे—धीरे मेरा स्‍वास्‍थ ठीक हो रहा था। अब खाना भी हजम होने के साथ—साथ मुझे भूख भी लगने लगी। इसी लिए पापा जी मुझे रोज जंगल में घुमाने के लिए ले जाते थे। पर इतवार या किसी छुटटी के दिन के तो क्‍या कहने थे। जब पूरा परिवार जंगल में जाने की तैयारी करता तो मेरे सब्र का बाध टूट जाता। एक—एक पल मुझे युगों की तरह से लगता। पर मनुष्‍य को हमारी तरह से नहीं जीना उसे तो न जाने कितने काम होते है। ये सब में देखता पर क्‍या करू मुझे खुशी बरदाश्त होती ही नहीं थी।
मेरे साथ बच्‍चे भी जूते कपड़े पहन कर तैयार हो जाते। पर मम्‍मी और मणि दीदी तो कछुवे की चाल से तैयार होती। मुझे लगता क्‍या जरूरत है इतना सब करने के लिए। कहीं खाना बनाया जाता। कहीं गंदे कपड़े साबुन एक बेग में भरे जाते। वरूण भैया अपना खेलने का सामन साथ ले कर चलते। कई बार तो पापा जी दूकान से भी आ जाते पर हमारी तैयारी पूरी नहीं होती। आखिर में रो—रो कर थक जाता। मेरे को दूध पीने के लिए कहा जाता पर मारे खुशी के दूध अंदर जाता ही नहीं था। लगता अभी पंख लग जाये और हम जंगल में पहुंच जाये।

पौनी-(एक कुत्ते की आत्म कथा)-अध्याय-13



(अध्‍याय—तैरहवां)जीवन की किरण उतरी

      जीवन संघर्ष के वो दिन जीवन में कुछ ऐसे आयाम दे गये जिन आयामों को मैं बिना उनके अंदर से गूजरें हुए उन्‍हें वैसे कभी नहीं जान सकता था। उन्‍हीं दिनों मैंने जाना मनुष्‍य की उपलब्धि को, उसके प्रेम को, उसकी बौद्धिकता को, उसका स्‍नेह को, उसका अपनापन और लगाव मेरे अंतस के गहरे तक उतर गया। कैसे वो सामर्थ है अपने संगी साथी के सहयोग में। हम दूसरे प्राणी इस विषय में सोच भी नहीं सकते। वो पहली रात मेरे तन मन पर बहुत भारी गुजरी। मेरे पूरे शरीर मैं इतनी बेचैनी की में एक जगह बैठ ही नहीं सकता था। लगता था यहां से उठ कर कही दूर चला जाऊं। कितनी बार उठ—उठ कर में कमरे से बहार गया। एक अजीब सी बेचैनी थी मेरे शरीर में। डा0 ने तो मुझे देख कर ही कह दिया था कोई उम्‍मीद नहीं है। फिर भी मनुष्‍य उम्‍मीद नहीं छोड़ता। डा0 ने अपना जो अपना काम करना था वो कर दिया। शायद मेरे शरीर में पानी की कमी हो गई थी।

गुरुवार, 8 जून 2017

पोनी--(एक कुत्ते की आत्म कथा)-अध्याय-12



(अध्‍याय—बारहवां)--मृत्‍यु से साक्षात्कार--

शायद सितम्बर का महीना था। बरसात अभी गई नहीं थी। कभी कभार रिम—झिम फुहार पड़ ही जाती थी। वैसे धूप में गर्मी बहुत दी और बादलों के बीच से जो छन का धूप आती थी और भी बहुत कर्कश ओर तेज चुभती थी। बरसात के इन दो महीनों से हम लोग जंगल कम ही गये थे। क्‍योंकि इन दिनों जंगल में सांप वगैरह का ज्‍यादा भय होता था। और  खास कर श्याम के समय जब पुरवा हवा चलती थी जो वह सांप को बहुत प्रिय होती है। दिन भर की तपीस को शांत करे के लिए इस समय अकसर बिल के बहार निकल आते थे। वैसे कहते है कि हमारे यहां का सांप बहुत शांत है, कम ही लोगों को डसा था, जिस तादाद में सांप पाये जाते है उसकी बनस्पत। वरना जितने साँपों की तादाद है उस हिसाब से बहुत लोगो का डस लेना चाहिए लेकिन कभी कभार ही सुनने में आता था कि फला आदमी को सांप ने काट लिया।

पोनी--(एक कुत्ते की आत्म कथा)-अध्याय-11



 टोनी को अंतिम बिदाई--(अध्‍याय—11)

      च्‍चे ज़िद्द करने लगे की हम आज स्‍कूल नहीं जायेगे। मम्‍मी ने भी उनके साथ जबरदस्‍ती नहीं की शायद वह भी टोनी की मृत्‍यु के दुःख से भरी हुई थी। और टोनी की अंतिम विदाई की तैयारी होने लगी। पापा जी ने टोनी को एक कपड़े से लपेट कर उसे स्‍कूटर की जाली में रख दिया। इसी जाली में एक दिन वह बैठ कर कभी इस घर में आया था। इस जाली में लेट  कर आज बिदा हो रहा है। सब बच्‍चे उसे बिदा करने जा रहे के। मेरा भी मन कर रहा था मैं भी साथ जाऊं। मैं स्‍कूटर के पास खड़ा हो गया। पापा जी ने कहा पोनी तू भी चलेगा। आपने दोस्‍त को अंतिम विदाई देने। मेंने पूछ हिलाई। दीदी ने मुझे गोद में बिठा लिया।
हम सब एक ही स्‍कूटर पर चल दिये। एक सर्कस की झांकी की तरह। आगे वरूण और हिमांशु भैया खड़े हो गये। फावड़ा पीछे बाध दिया। और दो नमक की थैलियां डिग्‍गी में डाल ली। मम्‍मी ने हमे दुकान से ही बिदा किया। हम जंगल के अंदर काफी दूर गहरे में निकल गये। पापा जी ने उस गहरे नाले को भी हमें बैठे—बिठाये पार कर लिया। पहले तो मुझे कुछ डर लगा। पर बाद में लगा जब बच्‍चे ही नहीं गिरेगे तो मैं कैसे गिर सकता हूं।

बुधवार, 7 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-10



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—दसवां  
दिनांक 05 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार-

1—बिन मांगे सच्चे रत्नों से झोली भर दी
बिन चाहे मेरे जीवन में खुशियां भर दीं
ये कैसे क्या कुछ हुआ, इसे कह दो भगवन
अनहोनी थी जो बात, उसे होनी कर दी
2—प्रार्थना कैसे और कब जन्मती है?
3—मैं ध्यान में गहरा जाना चाहता हूं। पर फिर डर लगता है कि पत्नी-बच्चों का क्या होगा?

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-09



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—नौवां  
दिनांक 04 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—मैं ध्यान करूं या भक्ति?
और चूंकि कुछ तय ही नहीं हो पाता है, इसलिए प्रारंभ भी करूं तो कैसे करूं?
2—आपने एक प्रवचन में कहा था कि पुरुष के लिए "मैं-भाव' और स्त्री के लिए "मेरा-भाव' अर्थात ममता बाधा है। क्या ममता प्रेम का ही दूसरा रूप नहीं है? क्या इतने प्रेमपूर्ण गुण को छोड़ना ही पड़ेगा रूखा-सूखा होकर रहना पड़ेगा?
3—जीवेषणा है क्या? जीवन में इतना दुख हम देखते हैं, कुछ-कुछ समझ में भी आता है,
फिर भी जीए जाने का मन क्यों होता है?
4—मैं आपको सुनता हूं तो चकित हो रह जाता हूं। अवाक होता हूं, आश्चर्यविमुग्ध होता हूं, लेकिन संन्यास में छलांग नहीं लगा पाता हूं। क्या करूं?

रविवार, 4 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-08



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—आट्ठवां  
दिनांक 03 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—तुम बसे नहीं इनमें आकर,
ये गान बहुत रोए।
कब तक बरसेगी ज्योति बार कर मुझको?
निकलेगा रथ किस रोज पार कर मुझको?
किस रोज लिए प्रज्वलित बाण आओगे?
खींचते हृदय पर रेख निकल जाओगे?
किस रोज तुम्हारी आग सीस पर लूंगा?
बाणों के आगे प्राण खोल धर दूंगा?
यह सोच विरह में अकुला कर,
ये गान बहुत रोए।
तुम बसे नहीं इनमें आकर,
ये गान बहुत रोए।
2—आपने कहीं कहा है कि मनुष्य की सुख की खोज ही बताती है कि मनुष्य दुखी है।
उसका यह बुनियादी दुख क्या है? और क्या इस दुख का निरसन भी है?
3—आप कुछ करें! आदमी रोज-रोज पापों की गर्त में डूबा जा रहा है।
आदमी ऐसा बुरा तो कभी न था, जैसा आज है। आदमी को आखिर हो क्या गया है?

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-07



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—सातवां  
दिनांक 02 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—संन्यास देकर आपने एक नया ही जीवन प्रदान किया है। सिर्फ एक ही कांटा चुभता है--इतनी सुविधा और सामीप्य होने पर भी मैं आपको पूरा का पूरा नहीं पी पा रहा हूं। अब दुई खलती है। अब मिटा ही डालें।
2—आश्रम में रह कर बहुत आनंदित हूं; पर कभी-कभी अचानक उदास हो जाती हूं।
यह उदासी क्या है, जो आती है और जाती है?
3—मैं मृत्यु से बहुत डरता हूं। क्या करूं?
4—आपने भीतर के सदगुरु की बात कही। उसका क्या अर्थ है?
वे सदगुरु कब और कैसे जाग्रत होते हैं?
5—आपका संदेश?

शनिवार, 3 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-06



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—छट्ठवां  
दिनांक 01 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—आपने वर्तमान प्रवचनमाला को नाम दिया: प्रेम-पंथ ऐसो कठिन!
आप तो कहते हैं कि प्रेम होता है, किया नहीं जाता। फिर प्रेम का मार्ग कैसे बन सकता है? और वह कठिन कैसे हो गया?
2—प्रेम अव्याख्य क्यों है?
3—आप भारत देश की महानता के संबंध में कभी भी कुछ नहीं कहते हैं। न ही इस देश के नेताओं की प्रशंसा में कुछ कहते हैं। क्यों?
4—फैलने को है विकल मेरे
हृदय का सिंधु भर कर
छोड़ कर तल आ गई है
आंख में आत्मा उमड़ कर
डोलती दुनिया सम्हालो
ज्वार आकुल फूटता है
शून्य का मैं व्यग्र
हाहाकार होना चाहता हूं
तुम मुझे अपने क्षितिज से
घेर कर बंदी बना लो
मैं तुम्हारे व्योम की
झंकार होना चाहता हूं।

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-05



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—पांचवां
दिनांक 31 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—आपसे समाधि कैसे चुराएं?
2—मैं तो परमात्मा की याद बहुत करता हूं, लेकिन मन में प्रश्न उठता है कि परमात्मा भी कभी मेरी याद करता है या नहीं?
3—मैंने संसार के सब सुख-दुख को अनुभव कर देखा है। अभी आपके कहे "ग्रुप' करके मेरा हृदय बिलकुल आपके प्रति खुल गया है। दिल होता है आप में पूरा डूब जाऊं और आपके साथ आकाश में उडूं और बहारों में फूल और आनंद बरसाऊं। मुझे अपना लो!
आपकी अनुकंपा अपार है! बहुत धन्यवाद!

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-04



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—चौथा  
दिनांक 30 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—एक कौतुक मैंने देखा: मेरी खोपड़ी में खंजड़ी बज रे लोल!
क्या भक्त को अहंकार होता है? जहां ढूंढा, तो श्री हरि आपको ही पाया।
2—ध्यान की गहराई जैसे-जैसे बढ़ रही है, वैसे-वैसे प्राणों में जैसे अनेक गीत फूट पड़ने को मचल उठे हों। क्या करूं?
3—क्या संकोच अहंकार को पुष्ट करता है?
किसी के चरणों में गिर जाने की चाह होते हुए भी संकोचवश चरण स्पर्श नहीं करता। संकोच में सोचता हूं कि लोग क्या कहेंगे?
4—क्या आत्मोपलब्धि के लिए सांसारिक जीवन जीना आवश्यक है?

शुक्रवार, 2 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-03



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—तीसरा  
दिनांक 29 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—भारतीय संसद में फ्रीडम ऑफ रिलीजन बिल, धर्म-स्वातंत्र्य विधेयक लाया जा रहा है। ईसाई उसका विरोध कर रहे हैं। मदर टेरेसा ने भी उसका विरोध किया है। आप अपना मंतव्य दें।

2—संन्यास का भाव उठ रहा है और फिर मन भाग रहा है। मुझे ऐसा लगता है कि मैं संन्यास लेने के योग्य नहीं हूं।

3—पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।
मेरे पिया तुम कितने सुहावन,
तुम बरसो ज्यों मेहा सावन।
मैं तो चुप-चुप नहा रही।
पिया मेरे तुम अमर सुहागी,
तुम पाए मैं बहु बड़भागी,
मैं तो पल-पल ब्याह रही।
पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-02



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-दूसरा
दिनांक 28 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—परमात्मा शब्द ही मेरी समझ में नहीं आता है। परमात्मा यानी क्या?

2—वैसे गत पंद्रह वर्षों से आप निरंतर प्रेरणा के स्रोत रहे हैं, परंतु यहां आपके ऊर्जा-क्षेत्र में रहते हुए कुछ माह में ही कुछ-कुछ आश्चर्यचकित घटित होने लगा है। हमें इतने दिनों तक दूर क्यों रहना पड़ा, जब कि पहली ही पहचान में आपकी भगवत्ता स्पष्ट हो गई थी?

3—संत विरहावस्था की चर्चा बहुत करते हैं। यह विरह क्या बला है?

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-01



प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-पहला
दिनांक 27 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—साधु-संतों से सुना है कि भक्ति-मार्ग ही एकमात्र सरल और सुगम मार्ग है।
लेकिन रहीम का प्रसिद्ध वचन है:
रहिमन मैन तुरंग चढ़ि, चलिबो पावक माहिं।
प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोई निबहत नाहिं।।
इस विरोधाभास पर कुछ कहें।

2—क्या प्रभु के लिए अभीप्सा पर्याप्त है?

3—क्या भगवान भक्त के बिना हो सकता है?