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सोमवार, 9 अप्रैल 2018

अजहू चेत गवांर-(पलटू दास)-प्रवचन-02

मनुष्‍य का मौलिक गंवारपन—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 22 जूलाई 1977;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार:

1—अजहूं चेत गंवार--पलटूदास जी का यह संबोधन तो सभी के लिए है; पर हम सबका एक मात्र गंवारपन क्या है? आप कृपा करके हमें कहें।

2—संत पलटूदास कहते हैं कि भागवत-धन की लूट हो रही है और जो चाहे सो लेय। यदि ऐसी बात है तो क्यों इस बात का धनी करोड़ों में एकाध हो पाता है?

3—संन्यास का फल मधुर है, फिर भी सभी उसे क्यों नहीं चखते? कृपा करके कहिए।


पहला प्रश्नः

"अजहूं चेत गंवार'--पलटूदास जी का यह संबोधन तो सभी के लिए है; पर हम सबका एकमात्र गंवारपन क्या है? आप कृपा करके हमें कहें।

अजहू चेत गवांर-(पलटू दास)-प्रवचन-01

प्रवचन—1    आस्‍था का दीप—सदगुरू की आँख में

दिनांक 21 जुलाई, 1977;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

नाव मिली केवट नहीं, कैसे उतरै पार। ।
कैसे उतरै पार पथिक विश्वास न आवै।
लगै नहीं वैराग यार कैसे कै पावै। ।
मन में धरै न ग्यान, नहीं सतसंगति रहनी।
बात करै नहिं कान, प्रीति बिन जैसी कहनी। ।
छूटि डगमगी नाहिं, संत को वचन न मानै।
मूरख तजै विवेक, चतुराई अपनी आनै। ।
पलटू सतगुरु सब्द का तनिक न करै विचार।
नाव मिली केवट नहीं, कैसे उतरै पार ।।1।।

 साहिब वही फकीर है जो कोई पहुंचा होय। ।
जो कोई पहुंचा होय, नूर का छत्र विराजै।
सबर-तखत पर बैठि, तूर अठपहरा बाजै। ।
तंबू है असमान, जमीं का फरस बिछाया।
छिमा किया छिड़काव, खुशी का मुस्क लगाया। ।
नाम खजाना भरा, जिकिर का नेजा चलता।
साहिब चौकीदार, देखि इबलीसहुं डरता। ।
पलटू दुनिया दीन में, उनसे बड़ा न कोय।
साहिब वही फकीर है, जो कोई पहुंचा होय। । २। ।

अजहूं चेत गवांर-(पलटू दास)--ओशो

 अजहूं चेत गंवार (संत पलटू दास)
  ओशो

पलटू उत्सव के पक्षपाती हैं
प्रभु से मित्र ने का निकटतम मार्ग. है उत्सव।
निकटतम मार्ग है : नृत्य।
बुलाओ प्रभु को--आनंद के आंसुओं से बुलाओ!
पैरों में घूंघर बांधो। नृत्य, गीत-गान से बुलाओ!
हृदय की वीणा बजाओ! गीत को फूटने दो!
उत्सव की बांसुरी बजाओ, रास रचाओ!

देखते नहीं, परमात्मा चारो तरफ कितने उत्सव में है!
चांद-तारों में, वृक्षों में, पक्षियों में!
आदमी को छोड़ कर तुम्हें कहीं उदासी दिखाई पड़ती है
आदमी को छोड़ कर तुम्हें कहीं भी पाप दिखाई पड़ता है
आदमी को छोड़ कर कहीं तुम्हें चिंता दिखाई पडती है?
सब तरफ उत्सव चल रहा है--अहर्निश!

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--20

नानक नदरी नदरि निहाल—(प्रवचन—बीसवां)

पउड़ी: 38 
जतु पहारा धीरजु सुनिआरु  
अहरणि मति वेदु हथीआरु।।
भउ खला अगनि तपताउ। 
भांडा भाउ अमृत तितु ढालि।।
घड़ीए सबदु सची टकसालु। जिन कउ नदरि करमु तिन कार।।
'नानक' नदरी नदरि निहाल।।

सलोकु:

पवणु गुरु पाणी पिता माता धरति महतु
दिवस राति दुइ दाई दाइआ खेले सगलु जगतु।।
चंगिआइआ बुरिआइआ वाचै धरमु हदूरि
करमी आपा आपणी के नेड़े के दूरि।।
जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि
'नानक' ते मुख उजले केती छूटी नालि।।



जतु पहारा धीरजु सुनिआरु अहरणि मति वेदु हथीआरु।।
भउ खला अगनि तपताउ। भांडा भाउ अमृत तितु ढालि।।
घड़ीए सबदु सची टकसालु। जिन कउ नदरि करमु तिन कार।।
'नानक' नदरी नदरि निहाल।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--19


सच खंडि वसै निरंकारु—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

पउड़ी: 37

करम खंड की वाणी जोरु। तिथै होरु न कोई होरु।।
तिथै जोध महाबल सूर। तिन महि राम रहिआ भरपूर।।
तिथै सीतो सीता महिमा माहि। ताके रूप न कथने जाहि।।
न ओहि मरहि न ठागे जाहि। जिनकै राम बसै मन माहि।।
तिथै भगत वसहि के लोअ। करहि अनंदु सचा मनि सोइ।।
सच खंडि वसै निरंकारु। करि करि वेखै नदरि निहाल।।
तिथै खंड मंडल बरमंड। जे को कथै त अंत न अंत।।
तिथै लोअ लोअ आकार। जिव जिव हुकमु तिवै तिव कार।।
वेखै विगसे करि वीचारु। 'नानक' कथना करड़ा सारु।।


नुष्य असहाय है। लेकिन तभी तक, जब तक परमात्मा से दूर है। मनुष्य दुर्बल है, दरिद्र है, दीन है, लेकिन तभी तक, जब तक परमात्मा से दूर है। उससे हमारी दूरी ही हमारी दरिद्रता है। और जितने हम उससे दूर होते जाते हैं, उतना ही जीवन अर्थहीन होता जाता है।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--18

नानक अंतु न अंतु—(प्रवचन—अट्ठाहरवां) 

पउड़ी: 35
धरम खंड का एहो धरमु।
गिआन खंड का आखहु करमु।।
केते पवन पाणि वैसंतर केते कान महेस।
केते बरमे घाड़ति घड़िअहि रूप रंग के वेस।।
केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस।
केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस।।
केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस।
केते देव दानव मुनि केते केते रतन समुंद।।
केतीआ खाणी केतीआ वाणी केते पात नरिंद।
केतीआ सुरती सेवक केते 'नानक' अंतु न अंतु।।


पउड़ी: 36

गिआन खंड महि गिआनु परचंड।
तिथै नाद विनोद कोउ अनंदु।।
सरम खंड की वाणी रूपु।
तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु।।
ताकीआ गला कथीआ ना जाहि।
जे को कहै पिछै पछुताइ।।
तिथै घड़ीऐ सुरति मति मनि बुधि।
तिथै घड़ीऐ सुरा सिधी की सुधि।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--17

करमी करमी होइ वीचारु—(प्रवचन—सतरहवां)

पउड़ी: 34

राती रुति थिति वार। पवन पानी अगनी पाताल।।
तिसु विचि धरती थापि रखी धरमसाल।
तिसु विचि जीअ जुगुति के रंग। तिनके नाम अनेक अनंत।।
करमी करमी होइ वीचारु। साचा आप साचा दरबारु।।
तिथै सोहनि पंच परवाणु। नदरी करमी पवै नीसाणु।।
कच पकाई ओथै पाइ। 'नानक' गाइआ जापै जाइ।।


नानक के सूत्र के पहले कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
पहली बात, कि जीवन को जो लक्ष्य मान लेता है, वह भटक जाता है। जीवन केवल एक अवसर है, लक्ष्य नहीं। मार्ग है, गंतव्य नहीं। उससे कहीं पहुंचना है। जीवित होने से ही मत समझ लेना कि पहुंच गए। जीवन कोई सिद्धि नहीं है, केवल एक प्रक्रिया है। उससे ठीक से गुजरे, तो पहुंच जाओगे। ठीक से न गुजरे, तो भटक जाओगे।