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रविवार, 3 दिसंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--6) प्रवचन--146 A



परमात्‍मा का प्रिय कौन—(प्रवचन—सांतवां)

अध्‍याय—12
सूत्र—

            अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र:—— करुण एव च।
निर्ममो निरहंकार: समदुःखसुखः शमी।। 13।।
संतुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढीनश्चय:।
मय्यर्पितमनोबुद्धियों मद्भक्तः स मे प्रिय:।। 14।।

इस प्रकार शांति को प्राप्त हुआ जो पुरूष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित एवं स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममता से रहित एवं अहंकार से रहित और सुख— दुखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात अपराध करने धर्मो को भी अभय देने वाला है।
तथा जो योग मैं युक्‍त हुआ योगी निरंतर लाभ—हानि में संतुष्ट है तथा मन और इंद्रियों सहित शरीर को वश मैं किए हुए मेरे में दृढ़ निश्चय वाला है, वह मेरे मैं अर्पण किए हुए मन— बुद्धि वाला मेरा भक्त मेरे को प्रिय है।

 पहले कुछ प्रश्न। एक मित्र ने पूछा है कि निराकार की साधना इतनी कठिन क्यों है?

 निराकार शब्द भी समझ में नहीं आता। निराकार शब्द अइ भी हमारे मन में आकार का ही बोध देता है। असीम भी हम कहते हैं, तो ऐसा लगता है, उसकी भी सीमा होगी—बहुत दूर, बहुत दूर—लेकिन कहीं उसकी भी सीमा होगी। मन असीम का खयाल भी नहीं पकड़ सकता। मन का द्वार इतना छोटा है, सीमित है कि उससे अनंत आकाश नहीं पकड़ा जा सकता। इसलिए निराकार की साधना कठिन है। क्योंकि निराकार की साधना का अर्थ हुआ, मन को अभी इसी क्षण छोड़ देना पड़ेगा, तो ही निराकार की तरफ गति होगी।

मन से तो जो भी दिखाई पड़ेगा, वह आकार होगा। और मन से जहां तक पहुंच होगी, वह सीमा और गुण की होगी। मन के तराजू पर निराकार को तोलने का कोई उपाय नहीं है। जो तोला जा सकता है, वह साकार है। और हम मन से भरे हैं। हम मन ही हैं। मन के अतिरिक्त हमारे भीतर कुछ है, इसका हमें कोई पता नहीं। कहते हैं आत्मा की बात, सुनते हैं; लेकिन आपको उसका कुछ पता नहीं है। पता तो मन का है। उसका भी पूरा पता नहीं है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि दस में से केवल एक हिस्सा मन का हमें थोडा—थोड़ा पता है। नौ हिस्सा मन का भी हमें पता नहीं है। मन भी अभी ज्ञात नहीं है। अभी सीमित को भी हम नहीं जान पाए हैं, तो असीम को जानने में कठिनाई होगी।
निराकार शब्द तो खयाल में आ जाता है, लेकिन अर्थ बिलकुल खयाल में नहीं आता। अगर कोई आपसे कहे, यह जो आकाश है, अनंत है, तो भी मन में ऐसा ही खयाल बना रहता है कि कहीं न कहीं जाकर समाप्त जरूर होता होगा। कितनी ही दूर हो वह सीमा, लेकिन कहीं समाप्त जरूर होता होगा। समाप्त होता ही नहीं है, यह बात मन को बिगचन में डाल देती है; मन घबड़ा जाता है। मन विक्षिप्त होने लगता है, अगर कोई भी सीमा न हो। मन की तकलीफ है।
मन की व्यवस्था सीमा को समझने के लिए है। इसलिए निराकार को पकड़ना कठिन हो जाता है।
सुना है मैंने, एक सम्राट अपने एक प्रतिद्वंद्वी को, जिससे प्रतिद्वंद्विता थी एक प्रेयसी के लिए, द्वंद्व में उतरने की स्वीकृति दे दिया। द्वंद्व का समय भी तय हो गया। कल सुबह छ: बजे गांव के बाहर एकांत निर्जन में वे अपनी—अपनी पिस्तौल लेकर पहुंच जाएंगे। और दो में से एक ही बचकर लौटेगा। तो प्रेयसी की कलह और झगड़ा शेष न रहेगा।
सम्राट तो पहुंच गया ठीक समय पर; समय से पूर्व; लेकिन दूसरा प्रतिद्वंद्वी समय पर नहीं आया। छ: बज गया। छ: दस बज गए; छ: पंद्रह, छ: बीस—बेचैनी से प्रतीक्षा रही। तब एक घुड़सवार दौड़ता हुआ आया प्रतिद्वंद्वी का एक टेलीग्राम, एक संदेश लेकर।
थोड़े से वचन थे उस टेलीग्राम में, लिखा था, अन—एवायडेबली डिलेड, बट इट विल बी ए सिन टु डिसएप्याइंट यू सो प्लीज डोंट वेट फार मी, सूट। अनिवार्य कारणों से देरी हो गई। न पहुंचूंगा, तो आप निराश होंगे। इसलिए मेरी प्रतीक्षा मत करें, आप गोली चलाएं। लेकिन गोली किस पर चलाएं? जो उस राजा की अवस्था हो गई होगी, वही निराकार के साधक की होती है। किस पर? किसकी पूजा? किसकी अर्चना? किसके चरणों में सिर झुकाएं? किसको पुकारें? किस पर ध्यान करें? किसका मनन? किसका चिंतन? कोई भी नहीं है वहां! वह राजा भी बिना गोली चलाए वापस लौट आया होगा!
निराकार का अर्थ है, वहां कोई भी नहीं है, जिससे आप संबंधित हो सकें। और मनुष्य का मन संबंध चाहता है। आप अकेले हैं! निराकार का अर्थ हुआ कि आप अकेले हैं; वहा कोई भी नहीं है आपके सामने।
इसलिए अति कठिन है। कल्पना में भी दूसरा, हम संबंधित हो पाते हैं। न भी हो वह। दूसरा, हमें सिर्फ खयाल हो कि दूसरा है, तो भी हम बात कर पाते हैं; तो भी हम रो पाते हैं; तो भी हम नाच पाते हैं।
यह मन, दूसरा हो, तो संबंधित हो जाता है, और गतिमान हो पाता है। दूसरा न हो, तो अवरुद्ध हो जाता है। कोई गति नहीं रह जाती है। इसलिए निराकार कठिन है।
निराकार की कठिनाई निराकार की नहीं, आपके मन की कठिनाई है। अगर आप मन छोड़ने को राजी हों, तो निराकार फिर कठिन नहीं है। फिर तो साकार कठिन है। अगर मन छोड़ने को आप राजी हों, फिर साकार कठिन है। क्योंकि मन के बिना आकार नहीं बनता।
इसका यह अर्थ हुआ कि सारा सवाल आपके मन का है। इसलिए आप इसको ऐसा मत सोचें कि निराकार को चुनें कि आकार को चुनें। यह बात ही गलत है। आप तो यही सोचें कि मैं मन को छोड़ सकता हूं या नहीं छोड़ सकता हूं। अगर नहीं छोड़ सकता हूं तो निराकार के धोखे में मत पड़े। आपका निराकार झूठा होगा। फिर उचित है कि आप साकार से ही चलें। अगर आप मन को छोड़ सकते हों, तो साकार की कोई भी जरूरत नहीं है। आप निराकार में खड़े ही हो गए।
साकार भी छूट जाता है, लेकिन क्रमश:। साकार की प्रक्रिया का अर्थ है कि धीरे— धीरे आपके मन को गलाएगा। और एक ऐसी घड़ी आएगी कि मन पूरा गल जाएगा, और आप मन से छुटकारा पा जाएंगे। जिस दिन मन छूटेगा, उसी दिन साकार भी छूट जाएगा। जब तक मन है, तब तक साकार भी रहेगा।
तो साकार एक ग्रेजुअल प्रोसेस, एक क्रमिक विकास है। और निराकार छलांग है, सडेन, आकस्मिक। अगर आपकी तैयारी हो आकस्मिक छलांग लगाने की, कि रख दिया मन और कूद गए, तो निराकार कठिन नहीं है। पर रख सकेंगे मन? कपड़े जैसा नहीं है कि उतारा और रख दिया। चमड़ी जैसा है, बड़ी तकलीफ होगी। चमड़ी से भी ज्यादा तकलीफ होगी। अपनी चमड़ी निकालकर कोई रखता हो, उससे भी ज्यादा तकलीफ होती है, जब कोई अपने मन को निकालकर रखता है। क्योंकि मन और भी चमड़ी से भी गहरा भीतर है। हड्डी—हड्डी, एक—एक कोष्ठ से जुड़ा है। और हमने अपने
अपने को ही उतारकर रखना है। अपने से ही खाली हो जाना है। को मान ही रखा है कि हम मन हैं। इसलिए मन को उतारकर रखना अपनी ही हत्या है।
इसलिए निराकार के साधकों ने, खोजियो ने कहा है कि जब तक अमनी, नो—माइंड, अमन की स्थिति न हो जाए तब तक निराकार की बात का कोई अर्थ ही समझ में नहीं आएगा।
सगुण के साथ अड़चन मालूम पड़ती है, अहंकार के कारण। साकार के साथ बुद्धि विवाद करती है। तो आदमी कहता है कि नहीं, मेरे लिए तो निराकार है। यह साकार से बचने का उपाय है सिर्फ कि मेरे लिए तो निराकार है।
लेकिन पता है कि निराकार की पहली शर्त है कि अपने मन को छोड़े! उसी मन की मानकर तो साकार को छोड़ रहे हैं, और निराकार की बात कर रहे हैं। और जब कोई आपको कहेगा कि निराकार का अर्थ हुआ कि अपने मन की आकार बनाने वाली कीमिया को बंद करें, हटाए इस मन को। तब आपको अड़चन शुरू हो जाएगी।
बहुत—से लोग हैं, जिन्होंने साकार को छोड दिया है निराकार के पक्ष में, और निराकार में उतरने की उनकी कोई सुविधा नहीं बनती। जब भी कुछ छोड़े, तो सोच लें कि जिस विपरीत के लिए छोड़ रहे हैं, उसमें उतर सकेंगे? अगर न उतर सकते हों, तो छोड़ने की जल्दी मत करें।
पर हम बहुत होशियार हैं। हमारी हालत ऐसी है, जैसे मैंने सुना है कि एक शेखचिल्ली एक दुकान पर गया है। और उसने कहा कि यह मिठाई क्या भाव है? तो दुकानदार ने कहा, पांच रुपया सेर। तो उसने कहा, अच्छा, एक सेर दे दो।
जब वह तोल चुका था और पुड़िया बांध चुका था और ग्राहक को दे रहा था, तब उसने कहा, अच्छा, इसे तो रहने दो। मेरा मन बदल गया। यह दूसरी मिठाई क्या भाव है? तो उसने कहा, यह ढाई रुपए सेर है। तो उसने कहा, दो सेर, इसकी जगह वह तोल दो।
उसने दो सेर मिठाई तुलवा ली और चलने लगा। जब चलने लगा, तो दुकानदार ने पूछा कि पैसे? तो उसने कहा कि मैंने तो यह उस मिठाई के बदले में ली है; तो पैसे किस बात के?
तो उस दुकानदार ने कहा, और उस मिठाई के पैसे? उसने कहा, जो मैंने ली ही नहीं, उसके पैसे मांगते हैं?
साकार और निराकार के बीच में हम ऐसे ही गोते खाते रहते हैं। जब निराकार का सवाल उठता है, तब हम कहते हैं कि नहीं, यह अपने बस की बात नहीं है। साकार ही ठीक होगा। और जब साकार की बात उठती है, तो हम कहते हैं कि कैसे मानें कि परमात्मा का कोई आकार हो सकता है। तब बुद्धि विचार उठाने लगती है। और कैसे मानें कि परमात्मा की कोई देह हो सकती है। और कैसे मानें कृष्ण को, कैसे मानें बुद्ध को कि ये भगवान हैं!
नहीं, मन मानने का नहीं होता। हमारे जैसी ही हड्डी, मांस, मज्जा है। हमारे जैसा ही शरीर है। हम जैसे ही जीते हैं, मर जाते हैं, तो कैसे मानें कि ये भगवान हैं! नहीं, इनको नहीं मान सकते। भगवान तो निराकार है।
जब साकार में उतरने का सवाल उठे, तब बुद्धि से हम निराकार की बात करते हैं। और जब निराकार में उतरना हो, तब हिम्मत नहीं जुटती; तब हम साकार का सोचने लगते हैं। इसको मैं बेईमानी कहता हूं। और जो व्यक्ति इसको ठीक से नहीं पहचान लेता, वह जिंदगीभर ऐसे ही व्यर्थ शक्ति और समय को गवाता रहता है। सोच लें ठीक से कि आपकी सामर्थ्य क्या है, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार चलें। परमात्मा कैसा है, इसकी फिक्र छोड़े। आपसे कौन पूछ रहा है कि परमात्मा कैसा है! और आपके तय करने के लिए परमात्मा रुका नहीं है। और आप क्या तय करेंगे, इससे परमात्मा में कोई फर्क नहीं पड़ता है। आप मानें निराकार, मानें साकार, इससे परमात्मा में क्या फर्क पड़ेगा! आपकी मान्यता से आप में फर्क पड़ेगा।
तो अपनी तरफ सोचें कि मैं जैसा मानूंगा, वैसा मानने से मुझमें क्या फर्क पड़ेगा!
एक मित्र एक पंद्रह दिन हुए मेरे पास आए। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं आपको भगवान नहीं मान सकता। मैंने कहा, बिलकुल अच्छी बात है। बात खतम हो गई। अब क्या इरादा है? तो उन्होंने कहा, मैं तो ज्यादा से ज्यादा आपको मित्र मान सकता हूं। मैंने कहा, यह भी बड़ी कृपा है! ऐसा आदमी भी खोजना कहां आसान है, जो किसी को मित्र भी मान ले! यह भी बात पूरी हो गई। तब वे मुझसे कहने लगे कि मेरी सहायता करिए। मुझे शांति चाहिए, आनंद चाहिए, और मुझे परमात्मा का दर्शन चाहिए। आपकी कृपा हो, तो सब हो सकता है।
तो मैंने उनको पूछा कि एक मित्र की कृपा से यह कुछ भी नहीं हो सकता। मित्र की तो कृपा ही क्या हो सकती है! आप मुझसे मांग तो ऐसी कर रहे हैं, जो भगवान से हो सके! कि आपको शांति दे दूं आनंद दे दूं? सत्य का ज्ञान दे दूं। मल तो आप ऐसी कर रहे हैं, जो भगवान से हो सके। लेकिन किसी को भगवान मानने की मर्जी भी नहीं है। तो मित्र से जितना हो सकता है, उतना मैं करूंगा। और जिस दिन उतना चाहिए हो जितना भगवान से हो सकता है, उस दिन तैयारी कर के आना कि मैं भगवान हू। तभी मांगना।
मैं भगवान हूं या नहीं, यह बड़ा सवाल नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि आप क्या चाहते हैं अपनी जिंदगी में? क्या रूपांतरण चाहते हैं? उसको ध्यान में रखें। यहां मेरे पास बहुत—से प्रश्न हैं कि कृष्ण को हम भगवान नहीं मान सकते! बुद्ध को हम भगवान नहीं मान सकते!
तुमसे कह कौन रहा है? तुम नाहक परेशान हो रहे हो। न कृष्ण तुमसे कह रहे हैं; न बुद्ध तुमसे कह रहे हैं। और तुम्हारे कहने पर उनका होना कोई निर्भर भी नहीं है। यह कोई वोट का मामला थोड़े ही है, कि आपकी वोट मिलेगी, तो कृष्ण भगवान हो पाएंगे!
आप अकारण परेशान हैं। आप अपना सोचें कि कृष्ण से कितना लाभ लेना है! अगर कृष्ण से भगवान जैसा लाभ लेना है, तो भगवान मान लें। और न लेना हो, तो बात खतम हो गई। यह आपका ही लाभ और आपकी ही हानि और आपकी ही जिंदगी का सवाल है। इससे कृष्ण का कुछ लेना—देना नहीं है।
लेकिन लोग बड़े परेशान होते हैं। लोग दूसरों के लिए परेशान हैं कि कौन क्या है! इसकी बिलकुल चिंता नहीं है कि मैं अपनी फिक्र करूं, जिंदगी बहुत थोड़ी है।
एक के सज्जन मेरे पास आए। और वे कहने लगे, एक ही बात आपसे पूछनी है। सच में आप भगवान हैं? आपने ही दुनिया बनाई है?
तो मैंने उनको कहा कि आप जरा पास आ जाएं। क्योंकि यह मामला जरा गुप्त है। और मैं सिर्फ कान में ही कह सकता हूं। और एक ही शर्त पर कि आप किसी और को मत बताना।
वे बड़ी प्रसन्नता से पास हट आए। बूढ़े भी बच्चों जैसे ही होते हैं। बुद्धि नहीं बढ़ती। उन्होंने कान मेरे पास कर दिया। मैंने उनसे कहा, बनाई तो मैंने ही है यह दुनिया। लेकिन दुनियां की हालत देख रहे हैं कितनी खराब है! कि किसी से कह नहीं सकता हूं कि मैंने बनाई है। और आप किसी को बताना मत। वह जिसने बनाई है, वही फंस जाएगा! हालत इतनी खराब है।
तो आपसे भगवान इसीलिए छिपा फिरता है कि अगर कहीं भी किसी ने कहा मैं हूं, तो आप गर्दन पकड़ लेंगे कि तुम ही हो? यह दुनिया तुम्हीं ने बनाई है? तो कौन जुर्मी होगा इस दुनिया के लिए!
तो तुमको बताए देता हूं लेकिन किसी को कहना मत। अगर कहा, तो मैं बदल जाऊंगा। लेकिन मैंने उन के सज्जन से पूछा कि इससे तुम्हें क्या फर्क पड़ेगा कि किसने दुनिया बनाई, किसने नहीं बनाई? और मैं कह दूर ही और न। इससे तुम्हें होगा क्या? मौत करीब आ रही है, एक क्षण का कोई भरोसा नहीं है, तुम्हारे हाथ—पैर हिलने शुरू हो गए हैं। और तुम अभी बच्चों की बातों में पड़े हो? कुछ फिक्र करो अपनी!
बुद्धिमान आदमी वह है, जो अपनी फिक्र कर रहा है। नासमझ वह है, जो व्यर्थ की बातों में पड़ा है। और कई बार हम समझते हैं कि व्यर्थ की बातें बड़ी कीमती हैं, बड़ी कीमती हैं। क्या कीमत है इस बात की?
एक बात सदा ध्यान में रखें कि जो भी आप मानना चाहते हों, जो भी करना चाहते हों, जो भी धारणा बनाना चाहते हों, उससे आपको क्या होगा? क्या आप बदल सकेंगे? आपकी नई जिंदगी शुरू होगी? आपका पुराना कचरा बहेगा, जल जाएगा? आपको कोई नई ज्योति मिलेगी? इसका खयाल करें।
अगर निराकार से मिलती हो, तो निराकार की तरफ चल पड़े। अगर साकार से मिलती हो, तो साकार की तरफ चल पड़े। जहां से मिलती हो आनंद की किरण, वहा चल पड़े। चलने से यात्रा पूरी होगी, बैठकर सोचने से यात्रा पूरी नहीं होगी।
कुछ लोग जिंदगीभर विचार ही करते रहते हैं कि साकार कि ' आकार कि निराकार; निर्गुण कि सगुण; कि कृष्ण, कि राम, कि ' क्राइस्ट!
कब तक सोचते रहेंगे? सोचने से कोई यात्रा नहीं होती। चलें। और मैं मानता हूं गलत भी चल पड़े, तो हर्जा नहीं है, क्योंकि गलत से भी सीखने मिलेगा। और गलत चल पड़े, तो कम से कम चले तो। चलना तो कम से कम आ ही जाएगा, गलत रास्ते पर ही सही। वह चलना हाथ में होगा, तो कभी सही रास्ते पर भी चल सकते हैं। लेकिन साहस बिलकुल चलने का नहीं है। और हम सिर्फ सिर में ही, खोपड़ी के भीतर ही चलते रहते हैं। उस चलने से कुछ भी न होगा।

 एक मित्र ने पूछा है, अनेक — अनेक दुर्लभ भक्त हुए —चैतन्य, मीरा, कबीर, रैदास, तुलसी, नरसी — और उन्होंने व्यापक पैमाने पर भक्ति का सारे देश में प्रचार भी किया। किंतु इस सब के बावजूद भी आज भक्ति— भाव से देश रिक्त दिखाई पड़ता है। क्या कारण है?

 रसी को, या रैदास को, या दादू को, या कबीर को जो मिला है, वह उनके प्रचार से आपको नहीं मिल सकता। धर्म प्रचार से नहीं मिलता। धर्म कोई राजनीति नहीं है कि प्रचार से फैला दी जाए।
कबीर प्रचार करते भी नहीं। कबीर तो केवल खबर दे रहे हैं कि जो उन्हें मिला है, वह तुम्हें भी मिल सकता है। लेकिन कबीर के कहने से नहीं मिल जाएगा। कबीर ने जो किया है, वह तुम्हें भी करना पड़ेगा, तो ही मिलेगा।
भक्ति दी नहीं जा सकती। शान हस्‍तांतरित नहीं होता। यह कोई दे नहीं सकता कि लो, ले जाओ, यह ज्ञान रहा। बाप मरे, तो बेटे को दे दे। गुरु मरे, तो शिष्य को दे दे। ट्रांसफरेबल नहीं है।
अनुभव तो कबीर के साथ कबीर का मर जाएगा। जिन्होंने कबीर की बात सुनकर कर ली होगी, उनके भीतर फिर पैदा हो जाएगा। लेकिन यह कबीर वाला ज्ञान नहीं है। यह इनका अपना ज्ञान है, जो पैदा होगा।
कबीर के दीए से अगर आप अपना दीया जला लें, तो ही! कबीर के प्रचार से नहीं। कबीर के कहने से नहीं। कबीर की किताबों को सम्हालकर पढ़ लेने से नहीं। उससे कुछ भी न होगा। आप मूल बात तो चूक ही रहे हैं।
इस मुल्क में—इस मुल्क में ही नहीं, सारी जमीन पर, सभी मुल्कों में भक्त हुए, ज्ञानी हुए। उन्होंने जो पाया, वह कहा भी। जो नहीं कहा जा सकता था, उसको भी कहा। जिसको कहना बिलकुल असंभव था, उसको भी शब्दों में बांधने की अथक कोशिश की। सिर पटका आपके सामने। आपने सुना भी। पहले तो आपने कभी भरोसा नहीं किया कि ये जो कहते हैं, वह ठीक होगा।
कौन कबीर पर भरोसा करता है? मन में आपको ऐसा ही लगा रहता है कि पता नहीं, यह आदमी होश में है या बेहोश है? यह जो कह रहा है, सच है कि झूठ है? यह जो कह रहा है, यह सपना है या अनुभव है? आपको यह शक तो बना ही रहता है।
आप हजार तरकीब से यह तो कोशिश करते ही रहते हैं कि कहीं न कहीं कोई भूल—चूक कबीर से हो गई है। क्योंकि जो हमको नहीं हुआ, वह इसको कैसे हो सकता है? और हम जैसे बुद्धिमान को नहीं हुआ, तो ये कबीर जैसे गैर पढ़े—लिखे आदमी को हो गया! काशी के पंडितों को बड़ा शक था कि यह कबीर को हो नहीं सकता। कैसे होगा? इतने शास्त्र हम जानते हैं और हम को नहीं हुआ! किसी के पास धन है; वह सोचता है, इतना धन मेरे पास है और मुझको नहीं हुआ और इसको हो गया! जरूर कहीं कोई गड़बड़ है। यह जुलाहा या तो बहक गया, या दिमाग इसका खराब हो गया!
लेकिन कबीर जैसे लोग सुनते नहीं इस तरह के लोगों की। वे कहे ही चले जाते हैं, कहे ही चले जाते हैं। पहले लोग हंसते हैं, पहले लोग अविश्वास करते हैं। फिर नहीं मानते, तो कुछ न कुछ मानने वाले भी मिल जाते हैं। और कबीर कहे ही चले जाते हैं, तो फिर कुछ लोग कहने लगते हैं कि हो ही गया होगा! इतने दिन तक आदमी कहता है।
लेकिन कोई भी प्रयोग करने को राजी नहीं होता है कि यह जो कह रहा है, वह हम भी करके देख लें। क्योंकि प्रयोग करके देखने का मतलब तो जीवन को बदलना है। वह कठोर बात है। वह श्रमसाध्य है। इसलिए हम सुन लेते हैं कबीर को और उनकी वाणी को संगृहीत कर लेते हैं। और फिर विश्वविद्यालय में उस पर शोधकार्य और रिसर्च और डाक्टरेट बांटते रहते हैं। बस, इतना उपयोग होता है!
बड़े मजे की बात है कि जो पंडित कबीर को सुनने नहीं जा सकते थे, वे सब पंडित विश्वविद्यालयों में डाक्टरेट कबीर पर लेकर और बड़े—बड़े पदो पर बैठ जाते हैं। कबीर को कोई विश्वविद्यालय डाक्टरेट देने को राजी नहीं हो सकता था। लेकिन कबीर पर सैकड़ों लोग शोध करके डाक्टर हो जाते हैं। और इन डाक्टरों में से एक भी, कबीर अगर मौजूद हो, तो उसके पास जाने को तैयार नहीं हो सकता। क्योंकि ये पढ़े—लिखे सुसंस्कृत लोग, यह कबीर, गैर पढ़ा—लिखा, जुलाहा, इसके पास.!
हमें लगता है, इतने संत हुए, फिर भी दुनिया संतत्व से खाली क्यों है?
संत दुनिया को संतत्व से नहीं भर सकते। संत तो केवल खबर दे सकते हैं कि यह घटना भी संभव है। और संत अपने व्यक्तित्व से यह प्रमाणित कर सकते हैं कि उनके जीवन में वह घट गया है, जिसको परमात्मा कहते हैं। लेकिन वह तो संत के साथ तिरोहित हो जाएगा। दीया टूटेगा कबीर का और लौ परमात्मा में लीन हो जाएगी। आप उसको कहां सम्हालकर रखेंगे? वह तो आपका भी दीया जल जाए, आप में भी ज्योति जल जाए, तो!
लेकिन हम संतों के आस—पास संप्रदाय बना लेते हैं। मंदिर खड़े कर लेते हैं, मस्जिद बना लेते हैं, गुरुद्वारे खड़े कर लेते हैं। और संतों को उन्हीं में दफना देते हैं। बात खतम हो गई। उनसे छुटकारा हो गया!
संतों से छुटकारे के दो रास्ते हैं, या तो उनको सूली लगा दो, और या उनकी पूजा करने लगो। बस, दो ही उपाय हैं उनसे छुटकारे के। सूली लगाने वाला भी कहता है, झंझट मिटी। पूजा करने वाला भी कहता है कि चलो, फूल चढ़ा दिए दो, झंझट मिटी, तुमसे छुटकारा हुआ। अब हम अपने काम पर जाएं!
जरूर इतने संत हुए हैं, लेकिन कहीं कोई प्रभाव दिखाई नहीं पड़ता। इसका कारण यह नहीं है कि संतों को जो हुआ था, वह असत्य है। इसका कारण यह है कि हम असाध्य बीमारियां हैं। कितने ही संत हों, हम अपनी बीमारी को इतने जोर से पकड़े हुए हैं कि हम उनको असफल करके ही रहते हैं। यह हमारी सफलता का परिणाम है, यह जो दिखाई पड़ रहा है! हम सफल हो रहे हैं। और हमारी संख्या बड़ी है, ताकत बड़ी है।
और मजा यह है कि अज्ञान में जीने के लिए कोई श्रम नहीं करना पड़ता। इसलिए हम उसमें मजे से जी लेते हैं। ज्ञान में जीने के लिए श्रम करना पड़ता है। शान चढ़ाई है पर्वत के शिखर की तरफ। हम समतल जमीन पर मजे से बैठे रहते हैं। समतल पर भी कहना ठीक नहीं है। हम तो खाई की तरफ लुढ़कते रहते हैं। वहां कोई मेहनत नहीं लगती। गड्डे की तरफ गिरने में कोई मेहनत है?
श्रम से हम बचते हैं। और अध्यात्म सबसे बड़ा श्रम है। इसलिए दुनिया में बुद्ध होते हैं, महावीर होते हैं, क्राइस्ट, मोहम्मद होते हैं, खो जाते हैं। हम मजबूत हैं, वे हमें हिला भी नहीं पाते। हम अपनी जगह अडिग बने रहते हैं।
फिर अध्यात्म के साथ कुछ कारण हैं। पहला तो कारण यह है कि अध्यात्म कोई बाह्य संपत्ति नहीं है, जो संगृहीत हो सके। अगर आपके पिता मरेंगे, तो जो मकान बनाएंगे, वह आपके पास छूट जाएगा। जो धन इकट्ठा करेंगे, वह आपके नाम छूट जाएगा। कोई क्रर्डिट होगी बाजार में, उसको भी आप उपयोग कर लेंगे। लेकिन अगर आपके पिता को कोई प्रार्थना का अनुभव हुआ, तो वह कहा छूटेगा! अगर कोई ज्ञान की झलक मिली, तो वह कैसे छूटेगी! उसकी कहीं कोई रेखा ही न बनेगी पदार्थ पर। वह तो पिता के साथ ही विलीन हो जाएगी। और पिता के जाने के बाद उस पर भरोसा भी न आएगा कि वह थी।
इसलिए हम सबको संदेह है कि बुद्ध कभी सच में हुए? क्राइस्ट सच में हुए या कहानी है? क्योंकि वह जो घटना है, वह इतनी अनहोनी है कि दिखाई तो पड़ती नहीं कहीं। तो शक पैदा होता है। तो लगता है कि कहानी ही होगी।
इसलिए जिंदा संत को मानने में हमें ज्यादा कठिनाई होती है, बजाय मुर्दा संत को मानने के। क्योंकि मुर्दा संत को मानने में अड़चन इसलिए नहीं होती कि हमारे पास कोई प्रमाण भी नहीं होता कि उसको हम कहें कि नहीं, यह नहीं हुआ।
जिंदा संत को मानने में बड़ी कठिनाई होती है। क्योंकि हम पच्चीस कारण निकाल सकते हैं कि इस कारण से शक होता है। इस कारण से शक होता है। तुमको भी भूख लगती है। तो फिर हममें तुममें फर्क क्या है? तुमको भी सर्दी लगती है, तुमको भी बुखार आ जाता है। फिर हममें तुममें फर्क क्या है? फिर कुछ ज्ञान वगैरह नहीं हुआ। जैसे कि बुखार शान से डरता हो! जैसे कि मौत ज्ञानी को घटित न होती हो!
मौत भी ज्ञानी को घटित होती है। फर्क मौत में नहीं पड़ता, फर्क ज्ञानी में पड़ता है। आपको भी मौत आती है, ज्ञानी को भी मौत आती है। आपको जब मौत आती है, तो आप भयभीत होते हैं। इतनी को जब मौत आती है, तो भयभीत नहीं होता। फर्क मौत में नहीं पड़ता, फर्क ज्ञानी में पड़ता है।
हां, अगर मौत न आए तो हम मान लें कि यह आदमी हो गया परम ज्ञान को उपलब्ध। लेकिन मौत तो आती है बुद्ध को भी। कृष्ण भी मरते हैं। शरीर तो खोता है उसी तरह, जिस तरह हमारा खोता है। और शरीर से गहरी हमारी आंख नहीं जाती कि भीतर कुछ और भी है।
तो बुद्ध मिट जाते हैं जमीन से, कहानी रह जाती है। और फिर कहानी पर धीरे— धीरे हमें शक भी आता है। लेकिन. अब दो हजार साल पुरानी कहानी से झगड़ा भी कौन करे!
पर आपको खयाल है कि जिंदा गुरु का हमेशा विरोध होता है! बुद्ध जिंदा होते हैं, तो विरोध होता है; बुद्ध मर जाते हैं, तो कोई विरोध नहीं करता।
एक और मजे की बात है कि लोग मरे हुए गुरु को मानते हैं। कोई मरी हुई पत्नी से विवाह नहीं करता! आप जिंदा पत्नी चाहेंगे, अगर विवाह करना है। दो हजार साल पहले कोई औरत हुई हो,
चाहे वह कितनी ही सुंदरी रही हो, आम्रपाली क्यों न रही हो, वह कितनी ही सुंदरी रही हो जगत की, दो हजार साल पहले हुई हो और मर गई, आप उससे शादी करने को राजी न होंगे। कि होंगे? आप दो हजार साल पहले की सुंदरतम स्त्री से शादी न करके आज मौजूद जिंदा स्त्री से, चाहे वह उतनी सुंदर न भी हो, उससे शादी करना पसंद करेंगे। क्यों?
लेकिन अगर जिंदा गुरु हो, तो आप उसको नहीं मान सकते। दो हजार साल पुराना मरा हुआ गुरु हो, उसको ही मान सकते हैं। कुछ मामला गड़बड़ दिखता है।
असल में गुरु से आप बचना चाहते हैं। मरा हुआ गुरु अच्छा है, वह आपका पीछा नहीं कर सकता। जिंदा गुरु आपको दिक्कत में डालेगा। इसलिए मरा गुरु ठीक है। आप जो चाहे, मरे गुरु के साथ कर सकते हैं। जिंदा गुरु के साथ आप जो चाहें, वह नहीं कर सकते। वह जो चाहता है आपके साथ, वही करेगा। इसलिए मुर्दा गुरु के साथ दोस्ती बन जाती है।
मुर्दा पत्नी कोई नहीं चाहता, मुर्दा पति कोई नहीं चाहता। मुर्दा गुरु सब चाहते हैं। क्योंकि गुरु से लोग बचना चाहते हैं, बचाव कर रहे हैं।
नरसी हैं, कबीर हैं, इनकी क्या फिक्र करते हैं! आज भी लोग वैसे ही मौजूद हैं। लेकिन उनकी बात आप दो—तीन सौ साल बाद करेंगे, जब वे मर जाएंगे।
उनको खोजिए, जो जिंदा हैं। आपके बीच अभी भी, जमीन कभी भी खाली नहीं है। उसमें हमेशा एक अनुपात में उतने ही लोग सदा शान को उपलब्ध होते हैं हर युग में। लेकिन आपकी आंखें अंधी हैं। उनको आप देख नहीं पाते। आप तो दो हजार साल जब प्रचार चलता है किसी की कहानी का, तब उसे देख पाते हैं। आपके मानते—मानते वह आदमी खो गया होता है, तब आप मान पाते हैं। और जब वह होता है, तब आप उसे मान नहीं पाते।
जीसस को जिन्होंने सूली दे दी, वे ही अब दो हजार साल बाद पूजा कर रहे हैं। इसलिए परिणाम नहीं हो पाता।
जिंदा गुरु की तलाश करें। जिंदा भक्त को खोजें। और एक ही बात ध्यान रखें कि आपको इसकी चिंता नहीं करनी है कि वह भक्त, है भक्त या नहीं। आपको यही चिंता करनी है कि उसके सान्निध्य में मुझमें भक्ति उतरती है या नहीं। उतरे, तो समझना कि है। न उतरे, तो कोई और खोज लेना। लेकिन जिंदा दीए की तलाश करें, ताकि आपका बुझा दीया जल सके।
और जिंदा दीया हमेशा उपलब्ध है। लेकिन आप हमेशा मरे हुए दीयों के आस—पास मंडराते हैं। फिर आपका दीया नहीं जलता, तो आप पूछते हैं, नरसी हुए, मीरा हुई, कबीर हुए, दादू हुए, कुछ हुआ नहीं? वे अभी भी हैं। उनके नाम कुछ और होंगे। उन्हें खोजें। और उनकी बातें मत सुनें; उनसे जीवन की कला सीखें, अपने को बदलने की कीमिया सीखें। और साहस करें थोड़ा बदलने का।
थोड़ी—सी बदलाहट भी आपको जिंदगी में इतने रस से भर देगी कि फिर आप और बदलने के लिए राजी हो जाएंगे।
अभी आपकी जिंदगी में सिवाय दुख और पीड़ा के कुछ भी नहीं है। सिवाय उदासी और निराशा के कुछ भी नहीं है। सिवाय विषाद और संताप के कुछ भी नहीं है। अभी आप एक जीते—जागते नरक हैं। इसमें कुछ प्रकाश की किरण कहीं से भी मिलती हो, तो लाने की कोशिश करें। और कहीं से भी कुछ फूल खिल सकते हों, तो खिलाएं।
लेकिन कहीं से भी आपको फूल की खबर आए, तो पहले तो आप यह शक करते हैं कि फूल असली नहीं हो सकता। क्या कारण है? आप इतने नरक से भरे हैं कि आप मान ही नहीं सकते कि कहीं स्वर्ग हो सकता है। स्वर्ग बहुत—से हृदयों में अभी भी है, लेकिन आपके पास आंख, खुला मन, सीखने का भाव चाहिए।
दुनिया में गुरु तो सदा उपलब्ध होते हैं, लेकिन शिष्य सदा उपलब्ध नहीं होते। इससे गड़बड़ होती है। ये नरसी और कबीर और दादू असफल जाते हैं, क्योंकि गुरु हो जाना तो उनके हाथ में है, लेकिन शिष्य तो आपके हाथ में है।
तो दुनिया में गुरु भी हो, लेकिन उसे शिष्य न मिल पाएं, तो मुसीबत हो जाती है। कोई सीखने को तैयार नहीं है। सब सिखाने को तैयार हैं। क्योंकि सीखने के लिए झुकना पड़ता है। आप भी सिखाने को तैयार हैं। आप भी लोगों को सिखाते रहते हैं बिना इसकी फिक्र किए कि आप क्या सिखा रहे हैं।
अगर आपका बेटा आपसे पूछता है, ईश्वर है? तो आप में इतनी हिम्मत है कि आप कहें कि मुझे पता नहीं है? आप कहते हैं, है, बिलकुल है। और अगर आप नास्तिक हैं, कम्युनिस्ट हैं, तो आप कहते हैं, नहीं है, बिलकुल नहीं है। लेकिन एक बात पक्की है कि आप जवाब मजबूती से देते हैं, बिना इस बात की फिक्र किए कि आपको कुछ भी पता नहीं है। या तो ही कहते हैं, या न कहते हैं। लेकिन आप यह नहीं कहते कि नहीं, मुझे पता नहीं है। मैं सिखाने में असमर्थ हूं।
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन अपने बेटे के साथ बगीचे में घूम रहा था। तो उसके बेटे ने पूछा कि पिताजी, सूरज किसने बनाया?
मुल्ला ने एक क्षण तो सोचा। क्योंकि कोई भी बाप यह स्वीकार करना मुश्किल अनुभव करता है कि मुझे पता नहीं है। लेकिन ऐसे मुल्ला ईमानदार आदमी था। उसने कहा कि नहीं, मेरा मन तो उत्तर देन का होता है, लेकिन आज नहीं कल तू पता लगा ही लेगा। इसलिए मैं तुझसे साफ ही कह दूं। मुझे पता नहीं है।
घूम रहे थे। फिर उस बच्चे ने पूछा कि ये वृक्ष कौन बड़े कर रहा है? मुल्ला ने कहा कि मुझे पता नहीं है। फिर उस लड़के ने पूछा कि रात को चांद निकलता है, तो उसका एक ही पहलू हमें हमेशा दिखाई पड़ता है। दूसरा पहलू क्यों दिखाई नहीं पड़ता? मुल्ला ने कहा, मुझे पता नहीं है।
बार—बार लड़के ने यह सुनकर कि मुझे पता नहीं, मुझे पता नहीं, लड़का उदास हो गया। उसके उदास चेहरे को देखकर मुल्ला ने पूछा, बेटा पूछ। दिल खोलकर पूछ। पूछेगा नहीं, तो सीखेगा कैसे? कुछ भी पता नहीं है, फिर भी पूछेगा नहीं तो सीखेगा कैसे! हम सब सिखा रहे हैं, बिना इसकी फिक्र किए कि हमें पता है या नहीं है। धार्मिक व्यक्ति इस बात से शुरुआत करता है कि मुझे पता नहीं है और अब मैं सीखने निकलता हूं। फिर वह विनम्र होगा, फिर वह झुका हुआ होगा। फिर जहं। से भी सीखने को मिल जाए, वह सीखेगा।
सीखने वालों की कमी है, इसलिए कबीर, दादू असफल चले जाते हैं। और जो हम उनसे सीखते हैं, वह शब्द हैं, ज्ञान नहीं सीखते; उनके शब्द सीख लेते हैं।
कबीर के पद याद हो जाते हैं। तुलसी की चौपाइयां याद हो जाती हैं। लोग तोतों की तरह दोहराते रहते हैं। जब तक वह अनुभव आपको न हो जाए, जो उन पदों में छिपा है, तब तक वे पद तोते की तरह हैं। अच्छा है मत दोहराएं। क्योंकि तोता होना अच्छा नहीं है। जब तक जान न लें, तब तक चुप रहें। और जो ताकत है, वह बोलने में न लगाकर, खोजने में लगाएं। तो कबीर सफल हो सकते हैं।

 एक मित्र ने पूछा है कि मनुष्य तो अपने भाग्य को लेकर जन्मता है, तो अगर खोज भाग्य में होगी भगवान की, तो हो जाएगी। नहीं होगी, तो नहीं होगी!

ह बात मतलब की भी हो सकती है और खतरनाक भी। मतलब की तो तब, जब जीवन के और हर पहलू पर भी यही .दृष्टि हो। फिर सुख को भी मत खोजें। मिलना होगा, मिल जाएगा। फिर दुख से भी मत बचें, क्योंकि भोगना है, तो भोगना ही पड़ेगा। फिर जिंदगी में जो कुछ भी हो, उसको स्वीकार कर लें; और जो न हो, उसको भी स्वीकार कर लें कि वह नहीं होना है। तो फिर मैं आपको कहता हूं कि भगवान को भी मत खोजें। भगवान आपको खोजता हुआ आ जाएगा। लेकिन फिर भाग्य की इतनी गहरी निष्ठा चाहिए कि जो होगा, ठीक है।
सिर्फ भगवान के संबंध में यह बात और धन के संबंध में खोज जारी रखें, तो फिर बेईमानी है। धन के संबंध में खोज जारी रखें, और उसमें तो कहें कि पुरुषार्थ के बिना क्या होगा! और खोजेंगे नहीं तो मिलेगा कैसे! और जो लोग खोज रहे हैं, उनको मिल रहा है। तो ऐसे हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे, तो गंवा देंगे। तो धन की तो खोज जारी रखें, क्योंकि धन पुरुषार्थ के बिना कैसे होगा! और जब भगवान को खोजने का सवाल आए, तब कहें कि सब भाग्य की बात है। होगा, तो हो जाएगा। नहीं होगा, तो नहीं होगा। तो फिर धोखा है, आत्मवचना है।
तो मैं मानता हूं कि अगर भाग्य को कोई पूरी तरह स्वीकार कर ले, तो उसे भगवान को खोजने की जरूरत नहीं है। भगवान ही उसे खोजेगा। लेकिन भाग्य को पूरा स्वीकार करने का अर्थ समझ लेना। फिर कुछ भी मत खोजना। फिर खोजना ही मत। फिर यह बात ही छोड़ देना कि मेरे हाथ में करने का कुछ भी है। फिर तो जो भी हो, होने देना। जो भी हो, होने देना। अपनी तरफ से कुछ करना ही मत।
अगर कोई व्यक्ति इतने भाग्य पर अपने को छोड दे, तो समर्पण हो गया। उसे भगवान का पता न भी हो, तो भी भगवान उसे मिल ही गया, इसी क्षण मिल गया। कोई बाधा न रही।
लेकिन यह कानूनी बात न हो। यह कोई लीगल तरकीब न हो हमारी। क्योंकि हम बड़े कानूनविद हैं। और हम ऐसी तरकीबें निकालते हैं, जिनका हिसाब नहीं है!
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी बीमार थी। मरने के करीब थी। डाक्टर को नसरुद्दीन ने बुलाया। मरने के करीब थी पत्नी, बीमारी खतरनाक थी, तो डाक्टर ने कहा कि इलाज जरा महंगा है।
नसरुद्दीन ने कहा कि कितना ही महंगा हो, मैं सब चुकाऊंगा; अपना सब घर बेचकर चुकाऊंगा। लेकिन इसे बचाओ। तो डाक्टर ने कहा कि और यह भी हो सकता है, यह न बचे। तो नसरुद्दीन ने कहा कि अगर तुम बचा सको तो, और तुम मार डालों तो, जो भी खर्च होगा, वह तो मैं चुकाऊंगा ही।
फिर डाक्टर इलाज में लग गया। सात दिन बाद पत्नी मर गई। काफी खर्च हुआ। डाक्टर ने बिल भेजा। तो नसरुद्दीन ने कहा कि ऐसा करें कि हम गांव के पुरोहित के पास चले चलें। डाक्टर ने कहा, क्या मतलब? नसरुद्दीन ने कहा, मैं गरीब आदमी हूं यह बिल पुरोहित जैसा कह देगा, वैसा कर लेंगे।
पुरोहित के पास नसरुद्दीन गया। पुरोहित के सामने नसरुद्दीन ने कहा कि डाक्टर बोलो, हमारी क्या शर्त थी? तो डाक्टर ने कहा, शर्त थी हमारी कि मैं बचाऊं या मारूं, दोनों हालत में तुम मूल्य चुकाओगे।
तो नसरुद्दीन ने कहा, तुमने मेरी पत्नी को बचाया? तो डाक्टर ने कहा कि नहीं। तो नसरुद्दीन ने कहा, तुमने मेरी पत्नी को मारा? तो डाक्टर ने कहा कि नहीं। तो नसरुद्दीन ने कहा कि किस समझौते के बल पर ये पैसे मांग रहे हो? किस हिसाब से? न तुमने बचाया, न तुमने मारा। और मैंने कहा था, बचाओ या मारो, दोनों हालत में पैसे चुका दूंगा।
हम भी ऐसा रोज—रोज करते रहते हैं। कुछ कानूनी व्यवस्थाएं खोजते रहते हैं।
यह खयाल आपको भगवान को खोजते वक्त ही आया, कि भाग्य, या पहले भी कभी आया?
असल में जिसकी खोज से बचना है, उसको हम भाग्य पर छोड़ देते हैं। और जिसे खोजना ही है, उसे हम अपने हाथ में रखते हैं। मगर इसमें ऐसा भी लगता है कि हम तो खोजना चाहते हैं, लेकिन भाग्य में ही न हो, तो क्या कर सकते हैं!
एक तरफ राजी हो जाएं। और पूरी तरह राजी हो जाएं। और कोई तरकीबें न निकालें। तो परमात्मा को खोजना भी जरूरी नहीं है। भाग्य परमात्मा को खोजने की गहरी व्यवस्था है। शायद आपने इस तरह न सोचा होगा। भाग्यवाद का भाग्य से कोई संबंध नहीं है। भाग्यवाद का संबंध परमात्मा की खोज की एक विधि से है। इसलिए जो लोग कहते हैं कि सच में भाग्य है या नहीं, वे लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं। यह तो एक डिवाइस है, यह तो एक उपाय है परमात्मा की खोज का। यह तो जगत में परम शांति पाने की एक विधि है।
जो व्यक्ति सब कुछ भाग्य पर छोड़ देता है, उसे आप अशांत नहीं कर सकते। भाग्य सच में है या नहीं, यह सवाल ही नहीं है। यह असंगत है बात। यह तो सिर्फ एक उपाय है कि जो व्यक्ति सब कुछ भाग्य पर छोड़ देता है, उसने सब कुछ पा लिया। उससे कुछ भी छीना नहीं जा सकता। उसकी शांति परम हो जाएगी। उसका आनंद अखंड हो जाएगा। और अगर भगवान है, तो भगवान उसे मिल जाएगा। जो भी है, वह उसे उपलब्ध हो जाएगा। क्योंकि अनुपलब्धि की भाषा ही उसने छोड़ दी है। और अगर भगवान उसे न भी मिले, तो भी उसे बेचैनी नहीं होगी। यह मजा है। उसे कोई बेचैनी ही नहीं है। वह कहेगा कि जो भाग्य में है, वह होगा।
लेकिन यह बात बड़ी गहरी है। आप यह मत समझना कि आप भाग्यवादी हैं, क्योंकि आप चौरस्ते पर बैठे हुए किसी ज्योतिषी को हाथ दिखाते हैं। इसलिए आप भाग्यवादी हैं, यह आप मत सोचना। अगर भाग्यवादी ही होते, तो चौरस्ते के ज्योतिषी पर जो चार आने लेकर आपका भाग्य देखता है, उस पर आपका भरोसा नहीं हो सकता।
भाग्यवादी का हाथ तो परमात्मा देख रहा है। उसको बीच के दलालों की जरूरत नहीं है। और चार आने में यह दलाल क्या बताएगा? कितना बताएगा? और आपको पता नहीं है कि यह भी बेचारा दूसरे ज्योतिषी को हाथ दिखाता है!
मैंने सुना है कि दो ज्योतिषी पास ही पास रहते थे। सुबह जब अपने धंधे पर निकलते थे, तो एक—दूसरे से पूछते थे, मेरे बाबत आज क्या खयाल है? आज कैसा धंधा रहेगा?
एक ज्योतिषी एक बार मेरे पास आया। एक मित्र ले आए थे। ज्योतिषी बहुत कीमती था। और एक हजार एक रुपया लेकर ही हाथ देखते था। मेरे मित्र पीछे पड़े थे कि हाथ दिखाना ही है। एक हजार एक रुपया वे दे देंगे। मैंने कहा कि अगर हाथ दिखाना है, तो रुपये मैं दूंगा। तुम्हें नहीं देने दूंगा।
हाथ मैंने दिखाया। हाथ देखकर उन्होंने बहुत—सी बातें कहीं। फिर वे रुपए की राह देखने लगे। लेकिन मैंने उनसे कहा कि आप इतना भी मेरे हाथ से न समझ सके कि यह आदमी रुपए नहीं देगा! आप इतनी मेहनत कर रहे हैं! अपना हाथ देखकर घर से निकले थे? सुबह खयाल कर लिया करें कि कितना मिलेगा कि नहीं मिलेगा। ये तो नहीं मिलने वाले। ये आपके भाग्य में नहीं हैं।
वह आदमी रोने— धोने लगा कि पांच सौ भी दे दें। फिर सौ पर भी राजी हो गया, कि मैं इतनी दूर आया हूं! मैंने कहा, भाग्य इतनी आसानी से नहीं बदलता कि हजार से पांच सौ पर आ गया, सौ पर आ गया! भाग्य में तेरे है ही नहीं!
यह जो ज्योतिषी को हाथ दिखाने वाला आदमी है, यह भाग्यवादी नहीं है। भग्‍यवादी पंडितों के पास नहीं जाएगा, तांत्रिकों के पास नहीं जाएगा। क्योंकि भाग्यवादी यह 'कह रहा है कि जो होने वाला है, वह होगा; उसमें बदलने का भी कोई उपाय नहीं है।
एक तांत्रिक कह रहा है कि यह मंत्र पूरा कर लो, यह पूजा करवा दो, यह पांच सौ रुपये खराब कर दो, ऐसा करो, तो भाग्य बदल जाएगा। जो बदल सकता है, वह भाग्य ही नहीं है। जो नहीं बदल सकता.।
और ध्यान रहे, जो नहीं बदल सकता, उसको जानने का कोई उपाय नहीं हो सकता। क्योंकि जानने से भी बदलाहट शुरू हो जाती है। जानना भी एक बदलाहट है।
अगर आपको यह पता चल जाए कि कल सुबह आप मर जाएंगे, तो कल सुबह तक की जो जिंदगी बिना पता चलने में रहती, वही नहीं हो सकती पता चलने के बाद। फर्क हो जाएगा। वह जो बोध आपको आ गया कि मैं मर जाऊंगा कल सुबह, वह आपकी पूरी रात को बदल देगा। यह रात वैसी ही नहीं हो सकती अब, जैसी कि बिना पता चले आप सोए होते। अब आप सो नहीं सकते।
भाग्यवादी तो मानता है कि जो भी होगा, वह होगा। कुछ करने का उपाय नहीं है। करने वाले की कोई सामर्थ्य नहीं है। विराट की लीला है, मैं उसका एक अंग मात्र हूं। एक लहर हूं सागर पर। मेरा अपना कुछ होना नहीं है।
ऐसी समझ एक विधि है, एक उपाय है। ऐसी समझ में जो गहरा उतर जाता है, उसे फिर कुछ भी नहीं खोजना है। परमात्मा भी नहीं खोजना है। परमात्मा खुद उसे खोजता हुआ उसके पास चला आता है।
पर सोचकर! बाकी सब आप खोजें और परमात्मा आपको खोजे, ऐसा नहीं होगा। बाकी सब खोजना है, तो परमात्मा भी आपको ही खोजना पड़ेगा। कुछ भी नहीं खोजना है, तो वह आपको खोज लेगा।
अब हम सूत्र को लें।
इस प्रकार शांति को प्राप्त हुआ जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित एवं स्वार्थरहित सबका प्रेमी है और हेतुरहित दयालु है तथा ममता से रहित एवं अहंकार से रहित और सुख—दुखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है तथा जो योग में युक्त हुआ योगी निरंतर लाभ—हानि में संतुष्ट है तथा मन और इंद्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए मेरे में दृढ़ निश्चय वाला है, वह मेरे में अर्पण किए हुए मन—बुद्धि वाला मेरा भक्त मेरे को प्रिय है।
क्या है परमात्मा को प्रिय? यह प्रश्न हजारों—हजारों साल में हजारों बार पूछा गया है।
क्या है परमात्मा को प्रिय? क्योंकि जो उसे प्रिय है, वही हमारे लिए मार्ग है। क्या है उसे प्यारा? काश! हमें यही पता चल जाए, तो फिर हम उसके प्यारे हो सकते हैं। कैसा चाहता है वह हमें? कब हमें चाह सकेगा? कब हमें समझेगा कि हम योग्य हुए उसके आलिंगन के? तो उसकी क्या रुझान है? उसका क्या लगांव है? उसकी क्या पसंद है? उसकी क्या रुचि है? वह अगर हमें पता चल जाए, तो मार्ग का पता चल गया।
क्या है परमात्मा को प्रिय? इसमें बहुत बातें सोचने जैसी हैं।
इसका यह मतलब नहीं है कि जो उसे प्रिय है, उसके साथ वह पक्षपात करेगा; जो उसे अप्रिय है, उसके साथ वह भेद— भाव करेगा। इसका यह मतलब नहीं है। नहीं तो हमें यह भी खयाल होता है कि जो उसका प्रिय है, उसके पाप भी माफ कर देगा, उसके गुनाह भी क्षमा हो जाएंगे। और जो उसे प्रिय नहीं है, वह पुण्य भी करे, तो पुरस्कार न पा सकेगा।
नहीं; ऐसा नहीं है। परमात्मा के प्रिय होने का अर्थ समझ लें। परमात्मा के प्रिय होने का अर्थ है, एक शाश्वत नियम, ऋत। जिसको लाओत्से ने ताओ कहा है। परमात्मा के प्रिय होने का इतना ही अर्थ है कि वह तो हमें हर क्षण उपलब्ध है, लेकिन जब हम एक खास ढंग में होते हैं, तब हम उसके लिए खुले होते हैं और वह हमारे भीतर प्रवेश कर जाता है। और जब हम उस खास ढंग में नहीं होते हैं, तो वह हमारे पास ही खड़ा अटका रह जाता है, क्योंकि हम अवरोध खड़ा करते हैं।
ऐसे ही जैसे सूरज निकला है और मैं अपनी आंख बंद किए खड़ा हूं। तो सूरज निकला रहे, मैं अंधेरे में खड़ा रहूंगा। और ठीक मेरी पलकों पर सूरज की किरणें नाचती रहेंगी। और प्रकाश इतने करीब था, एक पलक झपने की बात थी और मैं प्रकाश से भर जाता। लेकिन मैं आंख बंद किए हूं तो मैं अंधेरे में खड़ा हूं।
सूरज को खुली आंखें प्रिय हैं, इसका मतलब समझ लेना। इसका कुल मतलब इतना है कि खुली आंख हो, तो सूरज प्रवेश कर पाता है। बंद आंख हो, तो सूरज प्रवेश नहीं कर पाता। और सूरज आक्रामक नहीं है कि जबरदस्ती आपकी आंख खोल दे। अनाक्रमक है।
प्रेम अनाक्रमक होगा ही। जबरदस्ती आपकी आंख भी खोली जा सकती है कि सूरज चोट करे और आपकी आंख खोल दे। लेकिन इस जगत में अस्तित्व की कोई भी व्यवस्था आक्रामक नहीं है। आपके लिए प्रतीक्षा करेगा। सूरज प्रतीक्षा करेगा कि खोलना जब आंख, तब प्रकाश भर जाएगा।
परमात्मा के लिए प्रिय होने का यही अर्थ है कि कुछ ढंग है व्यक्तित्व का, जब हम खुले होते हैं, रिसेप्टिव होते हैं, ग्राहक होते हैं और परमात्मा भीतर प्रवेश कर पाता है। और कुछ ढंग है व्यक्तित्व का, जब हम बंद होते हैं, और सब तरफ से द्वार, दरवाजे, खिड़कियों पर ताले पड़े होते हैं, और परमात्मा बाहर—बाहर भटकता रहता है, हमारे भीतर प्रवेश नहीं कर पाता। कृष्ण इस सूत्र में कहते हैं कि वह कौन—सा ढंग है जो परमात्मा को प्रिय है। कैसे तुम हो जाओ कि वह तुम्हारे भीतर प्रवेश कर जाएगा। समझें।
शांति को प्राप्त हुआ पुरुष!
अशांत चित्त में क्या होता है? अशांत चित्त अपने में ग्रसित होता है। आप रास्ते पर चलते लोगों को देखें। जितना अशांत आदमी होगा, उतना ही रास्ते पर बेहोश चलता हुआ दिखाई पड़ेगा। अनेक लोग खुद से बातचीत करते हुए चलते जाते हैं। होंठ हिल रहे हैं; हाथ हिला रहे हैं। किससे बात कर रहे हैं? कोई वहा है नहीं उनके साथ। खुद से ही, भीतर परेशान हैं। भीतर परेशानी की तरंगें चल रही हैं।
अगर आप भी दस मिनट बैठकर अपना लिख डालें, आपके मन में क्या चलता है, तो आप खुद ही घबड़ा जाएंगे कि यह क्या मेरे भीतर चल रहा है! लगेगा, मैं पागल हूं! आप, जो आपके भीतर चलता है, किसी को भी नहीं बताते। जिसको आप प्रेम करते हैं, उसको भी नहीं बताते जो आपके भीतर चलता है।
तो मनसविद कहते हैं कि अगर कोई आदमी अपने भीतर जो चलता है, सब बता दे, तो फिर दुनिया में मित्र खोजना मुश्किल है। आप सब दबाए हैं भीतर, बाहर तो कुछ—कुछ थोड़ी—सी झलक देते हैं। वह भी काफी दुखदायी हो जाती है। सम्हाले रहते हैं।
यह जो भीतर अशांति का तूफान चल रहा है, यह दीवाल है। इसके कारण आप परमात्मा से नहीं जुड़ पाते। आपके और परमात्मा के बीच में एक तूफान है अशांति का, विचार का, विक्षिप्तता का, पागलपन का। यह हट जाए।
कृष्ण कहते हैं, शांति को प्राप्त हुआ!
और शांति को वही प्राप्त होता है—या तो ध्यान से चले, विचारशून्य हो जाए; या प्रेम से चले और भक्तिपूर्ण हो जाए। या तो सारे विचार समाप्त हो जाएं या सारे विचार प्रेम में डूबकर प्रेममय हो जाएं और प्रेम ही रह जाए, विचार खो जाएं। या तो सब विचार पिघलकर प्रेम बन जाए और या सब विचार भाप बन जाएं, और भीतर शून्य, शांत अवस्था रह जाए।
जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित..।
और जैसे ही कोई शांत होगा, द्वेष समाप्त हो जाता है। या उलटा भी समझ लें। जैसे ही द्वेष समाप्त होता है, शांत हो जाता है। जब तक आपका द्वेष है कहीं, तब तक आप शांत नहीं हो सकते। क्योंकि जिस से द्वेष है, वही कारण बनेगा आपके भीतर अशांति का।
स्वार्थरहित, सब का प्रेमी, हेतुरहित दयालु..।
क्या है हमारी अशांति? स्वार्थ। चौबीस घंटे सोचते हैं अपनी ही भाषा में।
सुना है मैंने, जिस दिन जीसस को सूली लगी, उस दिन उस गांव में एक आदमी की दाढू में दर्द था। और जिस रास्ते से लोग जीसस को ले जा रहे थे सूली चढ़ाने, उसी रास्ते पर उसका घर था। सारे गांव से वह परिचित था। लोग देखने जा रहे थे। सारे गांव में तहलका था कि जीसस को आज सूली लग रही है। जो भी गांव का आदमी वहा से निकलता—वह आदमी, आंख में उसके आंसू थे, पीड़ा से कराह रहा था; क्योंकि उसकी दाढ़ में दर्द था।
तो लोग उससे पूछते कि अरे, क्या तुम भी जीसस के प्रेमी हो? वह कहता, भाड़ में जाए जीसस, मेरी दाढ़ में दर्द है। पूरा गांव वहां से निकला। और हर आदमी ने पूछा कि अरे, कभी हमने सोचा नहीं था कि तुम भी, जीसस से तुम्हारा कोई लगांव है! वह कहता, कैसा जीसस! कहां की बातें कर रहे हो! मेरी दाढ़ में दर्द है, रातभर से सो नहीं सका।
जीसस को सूली लग रही है, वह जरा भी मूल्य नहीं है। उसकी दाढ़ में दर्द है, वह मूल्यवान है!
वियतनाम में हजारों लोग मरते रहे हैं, वह सवाल नहीं है। आपके पैर में जरा—सा काटा लग जाए, वह मूल्यवान है। सारी जमीन पर कुछ होता रहे, आपकी जेब कट जाए सब गड़बड़ हो गया!
हम जीते हैं, एक स्वार्थ का केंद्र बनाकर। और जितना ही यह स्वार्थ का केंद्र मजबूत होता है, उतनी ज्यादा अशांति होती है। अपने संबंध में जो जितना ज्यादा सोचता है, उतना परेशान होगा। जो अपने संबंध में जितना कम सोचता है, उतनी परेशानी क्षीण हो जाती है। जो इस विराट जगत को चारों तरफ देखता है—इसकी पीड़ा को, इसके सुख को, इसके दुख को—उसे मौका भी नहीं रह जाता यह सोचने का कि मेरे पैर में काटा है। स्वार्थ की जो बुद्धि है, वह अशांति जन्माती है।
इसलिए कुछ, जैसे जीसस ने सेवा पर बहुत जोर दिया। वह इसी कारण दिया। इसलिए नहीं कि सेवा से दूसरे को लाभ होगा। वह तो होगा, पर वह गौण है। सेवा पर इसलिए जोर दिया कि उससे तू अपना खयाल भूल सकेगा। और अगर खुद का खयाल भूलता चला जाए, तो वह समर्पण बन जाता है।
तो कृष्ण कहते हैं, स्वार्थरहित जो व्यक्ति हो, वह परमात्मा के लिए खुला होता है। जो स्वार्थ से भरा हो, वह बंद होता है।
तो चौबीस घंटे में कुछ समय तो स्वार्थरहित होना सीखना चाहिए। फिर धीरे— धीरे उसका आनंद आने लगेगा। कभी स्वार्थरहित छोटा—मोटा कृत्य भी करके देखें। कभी किसी की तरफ यूं ही अकारण मुस्कुराकर देखें।
अकारण कोई मुस्कुराता तक नहीं। हालांकि मुस्कुराहट में कुछ खर्च नहीं होता। लेकिन आप तभी मुस्कुराते हैं, जब कोई मतलब हो। और जब आप मुस्कुराते हैं, तो दूसरा भी सावधान हो जाता है कि जरूर कोई मतलब है। क्योंकि कोई गैर—मतलब के मुस्कुराता भी नहीं है। कोई गैर—मतलब के किसी से राम—राम भी नहीं करता। गांव में लोग करते थे, अब तो धीरे— धीरे बात समाप्त वहा भी होती जा रही है। गांव में कोई किसी से भी राम—राम कर लेता था अजनबी से भी। तो शहर का आदमी गांव जाए और कोई राम—राम करे, तो वह बहुत डरता है। क्योंकि जिससे जान—पहचान नहीं, वह राम— राम क्यों कर रहा है! जरूर कोई मतलब होगा। मतलब के बिना तो हम राम—राम भी नहीं करते; किसी को नमस्कार भी नहीं करते। करेंगे भी क्यों? जब कोई प्रयोजन होता है।
मैं एक यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। मेरे जो वाइस—चांसलर थे, नए— नए आए थे। तो मैं उनसे मिलने गया। जैसे ही मैं उनसे मिलने पहुंचा, उन्होंने मुझसे कहा, कैसे आए? तो मैंने कहा, जाता हूं। क्योंकि किसी काम से नहीं आया। सिर्फ राम—राम करने आया।
उन्होंने कहा, क्या मतलब! वे थोड़े हैरान हुए कि पढ़ा—लिखा लडका, राम—राम करने! मैंने कहा, आप अजनबी आए हैं, नए—नए आए हैं। मैं आपके पड़ोस में ही हूं। पड़ोसी हैं। सिर्फ राम—राम करने आया। और अब कभी नहीं आऊंगा। क्योंकि मैंने यह नहीं सोचा था कि आप पूछेंगे, कैसे आए? इसका मतलब यह है कि आपके पास जो लोग आते हैं, काम से ही आते हैं, कोई गैर—काम नहीं आता। और आप भी जिनके पास जाते होंगे, काम से ही जाते होंगे, गैर—काम नहीं जाते। तो आपकी जिंदगी फिजूल है। सिर्फ काम ही काम है या कुछ और भी है उसमें!
मैं तो चला गया कहकर; वे नाराज भी हुए होंगे, परेशान भी हुए होंगे, सोचते भी रहे होंगे। दूसरे दिन उन्होंने मुझे बुलवाया कि मैं रात सो नहीं सका। तुम्हारा क्या मतलब है? सच में मुझे ऐसा लगने लगा रात, उन्होंने मुझसे कहा, कि मैंने यह पूछकर ठीक नहीं किया कि कैसे आए?
मैंने भी कहा, कम से कम मुझे बैठ तो जाने देते। यह बात पीछे भी हो सकती थी। राम—राम तो पहले हो जाती। मुझे कुछ काम नहीं है और कभी आपसे कोई काम पड़ने का काम भी नहीं है। कोई प्रयोजन भी नहीं है। लेकिन हम सोच ही नहीं सकते.।
फिर तो उनसे मेरा काफी संबंध हो गया। लेकिन अब भी वे मुझे कभी मिलते हैं, तो वे कहते हैं, वह मैं पहला दिन नहीं भूल पाता, जिस दिन मैंने तुम से पूछ लिया कि कैसे आए? और तुमने कहा कि सिर्फ राम—राम करने आया, कुछ काम से नहीं आया। उस दिन से पहले मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि बेकाम कोई आएगा!
जिंदगी हमारी धंधे जैसी हो गई है। सब काम है। उसमें प्रेम, उसमें कुछ खेल, उसमें कुछ सहज—नहीं, कुछ भी नहीं है।
स्वार्थरहित का अर्थ है, जीवन के उत्सव में सम्मिलित, अकारण। कोई कारण नहीं है, खुश हो रहे हैं। और सदा अपने को केंद्र नहीं बनाए हुए हैं। सारी दुनिया को सदा अपने से नहीं सोच रहे हैं, कि मेरे लिए क्या होगा! मुझे क्या लाभ होगा! मुझे क्या हानि होगी! हर चीज के पीछे अपने को खड़ा नहीं कर रहे हैं।
चौबीस घंटे में अगर दों—चार घंटे भी ऐसे आपकी जिंदगी में आ जाएं, तो आप पाएंगे कि धर्म ने प्रवेश शुरू कर दिया। और आपकी जिंदगी में कहीं से परमात्मा आने लगा। कभी अकारण कुछ करें। और अपने को केंद्र बनाकर मत करें।
सब का प्रेमी, हेतुरहित दयालु..।
दया तो हम करते हैं, लेकिन उसमें हेतु हो जाता है। और हेतु बड़े छिपे हुए हैं।
आप बाजार से निकलते हैं और एक भिखमंगा आपसे दो पैसे मांगता है। अगर आप अकेले हों और कोई न देख रहा हो, तो आप उसकी तरफ ध्यान नहीं देते। लेकिन अगर चार साथी साथ में हों, तो इज्जत का सवाल हो जाता है। अब दो पैसे के लिए मना करने में ऐसा लगता है कि लोग क्या सोचेंगे कि अरे, इतने कृपण! ऐसे कंजूस कि दो पैसे न दे सके?
भिखमंगा भी देखता है; अकेले में आपको नहीं छेड़ता। अकेले में आपसे निकालना मुश्किल है। चार आदमी देख रहे हों, भीड़ खड़ी हो, बाजार में हों, पकड़ लेता है पैर। आपको देना पड़ता है। भिखमंगे को नहीं, अपने अहंकार की वजह। हेतु है वहां, कि लोग देख लेंगे, तो समझेंगे कि चलो, दयावान है। देता है। या देते हैं कभी, तो उसके पीछे कोई पुण्य—अर्जन का खयाल होता है। देते हैं कभी, तो उसके पीछे किसी भविष्य में, स्वर्ग में पुरस्कार मिलेगा, उसका खयाल होता है।
लेकिन बिना किसी कारण, हेतुरहित दया, दूसरा दुखी है इसलिए! इसलिए नहीं कि आपको इससे कुछ मिलेगा। दूसरा दुखी है इसलिए, दूसरा परेशान है इसलिए अगर दें, तो दान घटित होता है। अगर आप किसी कारण से दे रहे हैं, जिसमें आपका ही कोई हित है.।
मैं गया था एक कुंभ के मेले में। तो कुंभ के मेले में पंडित और पुजारी लोगों को समझाते हैं कि यहां दो, जितना दोगे, हजार गुना वहा, भगवान के वहा मिलेगा। हजार गुने के लोभ में कई नासमझ दे फंसते हैं। हजार गुने के लोभ में! कि यहां एक पैसा दो, वहा हजार पैसा लो! यह तो धंधा साफ है। लेकिन देने के पीछे अगर लेने का कोई भी भाव हो, तो दान तो नष्ट हो गया, धंधा हो गया, सौदा हो गया।
कृष्ण कहते हैं, हेतुरहित दयालु अगर कोई हो, तो परमात्मा उसमें प्रवेश कर जाता है। वह परमात्मा को प्यारा है।
सब का प्रेमी।
प्रेम हम भी करते हैं। किसी को करते हैं, किसी को नहीं करते हैं। तो जिसको हम प्रेम करते हैं, उतना ही द्वार परमात्मा के लिए हमारी तरफ खुला है। वह बहुत संकीर्ण है। जितना बड़ा हमारा प्रेम होता है, उतना बड़ा द्वार खुला है। अगर हम सबको प्रेम करते हैं, तो सभी हमारे लिए द्वार हो गए, सभी से परमात्मा हममें प्रवेश कर सकता है।
लेकिन हम एक को भी प्रेम करते हैं, यह भी संदिग्ध है। सबको तो प्रेम करना दूर, एक को भी करते हैं, यह भी संदिग्ध है। उसमें भी हेतु है; उसमें भी प्रयोजन है। पत्नी पति को प्रेम कर रही है, क्योंकि वही सुरक्षा है, आर्थिक आधार है। पति पत्नी को प्रेम, कर रहा है, क्योंकि वही उसकी कामवासना की तृप्ति है। लेकिन यह सब लेन—देन है। यह सब बाजार है। इसमें प्रेम कहीं है नहीं।
जब आप प्रेम भी कर रहे हैं और प्रयोजन आपका ही है कुछ, तो वह प्रेम परमात्मा के लिए द्वार नहीं बन सकता। इसीलिए हम कुछ को प्रेम करते हैं, जिनसे हमारा स्वार्थ होता है। जिनसे हमारा स्वार्थ नहीं होता, उनको हम प्रेम नहीं करते। जिनसे हमारे स्वार्थ में चोट पड़ती है, उनको हम घृणा करते हैं। मगर हमेशा केंद्र में मैं हूं। जिससे मेरा लाभ हो, उसे मैं प्रेम करता हूं; जिससे हानि हो, उसको घृणा करता हूं। जिससे कुछ भी न हो, उसके प्रति मैं तटस्थ हूं उपेक्षा रखता हूं उससे कुछ लेना—देना नहीं है।
परमात्मा के लिए द्वार खोलने का अर्थ है, सब के प्रति। लेकिन सब के प्रति कब होगा? वह तभी हो सकता है, जब मुझे प्रेम में ही आनंद आने लगे, स्वार्थ में नहीं। इस बात को थोड़ा समझ लें। जब मुझे प्रेम में ही आनंद आने लगे, प्रेम से क्या मिलता है, यह सवाल नहीं है। कोई पत्नी है, उससे मुझे कुछ मिलता है, कोई बेटा है, उससे मुझे कुछ मिलता है। कोई मां है, उससे मुझे कुछ मिलता है। कोई पिता है, कोई भाई है, कोई मित्र है, उनसे मुझे कुछ मिलता है। उन्हें मैं प्रेम करता हूं, क्योंकि उनसे मुझे कुछ मिलता है। अभी मुझे प्रेम का आनंद नहीं आया। अभी प्रेम भी एक साधन है, और कुछ मिलता है, उसमें मेरा आनंद है।
लेकिन प्रेम तो खुद ही अदभुत बात है। उससे कुछ मिलने का सवाल ही नहीं है। प्रेम अपने आप में काफी है। प्रेम इतना बड़ा आनंद है कि उससे आगे कुछ चाहने की जरूरत नहीं है।
जिस दिन मुझे यह समझ में आ जाए कि प्रेम ही आनंद है, और यह मेरा अनुभव बन जाए कि जब भी मैं प्रेम करता हूं तभी आनंद घटित हो जाता है, आगे—पीछे लेने का कोई सवाल नहीं है। तो फिर मैं काहे को कंजूसी करूंगा कि इसको करूं और उसको न करूं? फिर तो मैं खुले हाथ, मुक्त— भाव से, जो भी मेरे निकट होगा, उसको ही प्रेम करूंगा। वृक्ष भी मेरे पास होगा, तो उसको भी प्रेम करूंगा, क्योंकि वह भी आनंद का अवसर क्यों छोड़ देना! एक पत्थर मेरे पास होगा, तो उसको भी प्रेम करूंगा, क्योंकि वह भी आनंद का अवसर क्यों छोड़ देना!
जिस दिन आपको प्रेम में ही रस का पता चल जाएगा, उस दिन आप जो भी है, जहां भी है, उसको ही प्रेम करेंगे। प्रेम आपकी श्वास बन जाएगी।
आप श्वास इसलिए नहीं लेते हैं कि उससे कुछ मिलेगा। श्वास जीवन है; उससे कुछ लेने का सवाल नहीं है। प्रेम और गहरी श्वास है, आत्मा की श्वास है; वह जीवन है। जिस दिन आपको यह समझ में आने लगेगा, उस दिन आप प्रेम को स्वार्थ से हटा देंगे। और प्रेम तब आपकी सहज चर्या बन जाएगी।
कृष्ण कहते हैं, प्रेमी सबका; ममता से रहित.।
यह बड़ा उलटा लगेगा। क्योंकि हम तो समझते हैं, प्रेमी वही है, जो ममता से भरा हो। ममता प्रेम नहीं है। ममता और प्रेम में ऐसा ही फर्क है, जैसे कोई नदी बह रही हो, यह तो प्रेम है। और कोई नदी बंध जाए और डबरा बन जाए और बहना बंद हो जाए और सड़ने लगे, तो ममता है।
जहां प्रेम एक बहता हुआ झरना है; किसी पर रुकता नहीं, बहता चला जाता है। कहीं रुकता नहीं; कोई रुकावट खड़ी नहीं करता। यह नहीं कहता कि तुम पर ही प्रेम करूंगा; तुम्हें ही प्रेम करूंगा। अगर तुम नहीं हो, तो मैं मर जाऊंगा। अगर तुम नहीं हो, तो मेरी जिंदगी गई। तुम्हारे बिना सब असार है। बस, तुम ही मेरे सार हो। ऐसा जहां प्रेम डबरा बन जाता है, वहा प्रेम धारा न रही; वहां प्रेम में सड़ाध पैदा हो गई।
सड़ा हुआ प्रेम ममता है, रुका हुआ प्रेम ममता है। ममता से आदमी परमात्मा तक नहीं पहुंचता। ममता से तो डबरा बन गया। नदी सागर तक कैसे पहुंचेगी? वह तो यहीं रुक गई। उसकी तो गति ही बंद हो गई।
इसलिए कृष्ण तत्काल जोड़ते हैं, सब का प्रेमी, हेतुरहित दयालु, ममता से रहित.।
प्रेम कहीं रुकता न हो; किसी पर न रुकता हो, बहता जाए; जो भी करीब आए, उसको नहला दे और बहता जाए। कहीं रुकता न हो, कहीं आग्रह न बनाता हो। और कहीं यह न कहता हो कि बस, यही मेरे प्रेम का आधार है।
ऐसा जो करेगा, वह दुख में पड़ेगा और ऐसा प्रेम भी बाधा बन जाएगा। इसलिए ममता का विरोध किया है। वह प्रेम का विरोध नहीं है। वह प्रेम बीमार हो गया, उस बीमार प्रेम का विरोध है।
ममता हटे और प्रेम बढ़े, तो आप परमात्मा की तरफ पहुंचेंगे। लेकिन हमें आसान है दो में से एक। अगर हम प्रेम करें, तो ममता में फंसते हैं। और अगर ममता से बचें, तो हम प्रेम से ही बच जाते हैं। ऐसी हमारी दिक्कत है। अगर किसी से कहो कि ममता मत करो, तो फिर वह प्रेम ही नहीं करता किसी को। क्योंकि वह डरता है कि किया प्रेम, कि कहीं ममता न बन जाए; तो वह प्रेम से रुक जाता है।
ममता से बचते हैं, तो प्रेम रुक जाता है। तब भी दरवाजा बंद हो गया। अगर प्रेम करते हैं, तो फौरन ममता बन जाती है। तो भी दरवाजा बंद हो गया। प्रेम हो और ममता न हो। नदी तो बहे और कहीं सरोवर न बने। इसको खयाल में रखें।
बच्चे को प्रेम करें। आप अपने बेटे को प्रेम करें, इसमें कुछ भी हर्ज नहीं है। शुभ है। लेकिन वह प्रेम आपके ही बेटे पर समाप्त क्यों हो? वह और थोड़ा बहे। और भी पड़ोसियों के बेटे हैं, उनको भी छुए। क्यों रुके बेटे तक? और सच में अगर आप असली बाप हैं और आपने बेटे का प्रेम जाना है, तो आप चाहेंगे कि जितने बेटे बढ़ जाएं, उतना अच्छा। क्योंकि उतना प्रेम आपको आनंद देगा। एक बेटा इतना आनंद देता है, अगर सारी जमीन के बेटे आपके बेटे हों, तो कितना आनंद होगा! एक मित्र जब इतना आनंद देता है, तो फिर क्यों कंजूसी कर रहे हैं! बढ़ने दें। सारी पृथ्वी मित्रता बन जाए, तो और गहरा आनंद होगा। अंतहीन आनंद होगा।
जब मनुष्यों को प्रेम करने से इतना आनंद मिलता, तो पशुओं को क्यों वंचित करना! फैलने दें। पौधों को क्यों वंचित करना! फैलने दें। जब प्रेम इतना आनंद देता है, तो रोकते क्यों हैं? उसे बढ़ने दें, उसे फैलने दें। उसे सारी जमीन को, सारे अस्तित्व को घेर लेने दें। तो आप परमात्मा के लिए प्रिय हो जाएंगे। क्योंकि आप खुल जाएंगे सब तरफ से। आपका रंध्र—रंध्र खुल जाएगा। सब तरफ से प्रभु की किरणें प्रवेश कर सकती हैं।
अहंकार से रहित, सुख—दुखों की प्राप्ति में सम, क्षमावान, अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला। अहंकार से रहित। जितना गहन होता है प्रेम, उतना अहंकार अपने आप शांत और शून्य हो जाता है। जितना कम होता है प्रेम, उतना अहंकार होता है ज्यादा। अहंकार और प्रेम विरोधी हैं। अगर प्रेम बढ़ता है, तो अहंकार पिघल जाता है।
लेकिन बहुत लोग पूछते हैं, एक मित्र ने आज भी पूछा है कि अहंकार से कैसे छुटकारा हो?
अहंकार से सीधे छुटकारा न होगा। आप प्रेम को बढ़ाए। जैसे—जैसे प्रेम बढ़ेगा, अहंकार विसर्जित होने लगेगा। क्योंकि जो शक्ति अहंकार बनती है, वही प्रेम बनती है। प्रेम और अहंकार में एक ही शक्ति काम करती है। इसलिए अगर आप बड़े अहंकारी हैं, तो निराश मत हों। आपके पास प्रेम की बड़ी क्षमता छिपी पड़ी है। दुखी मत हों; आपके पास बड़ा स्रोत है। यही ऊर्जा मुक्त हो जाए, तो प्रेम बन जाएगी।
लेकिन सीधा अहंकार से मत लड़े। आप जो कुछ भी करेंगे सीधा, उससे अहंकार नहीं मिटेगा। आप तो प्रेम की तरफ फैलाव शुरू कर दें। कहीं से भी प्रेम को फैलाना शुरू करें। जिस तरफ लगांव जाता हो, उसी तरफ प्रेम को बहाए। एक ही खयाल रखें कि उसको रुकने मत दें। उसे बढ़ते जाने दें। उसकी सीमाएं जितनी विस्तीर्ण होने लगें, होने दें। यह विस्तीर्ण होती सीमा, एक दिन आप अचानक पाएंगे आपके अहंकार का घाव तिरोहित हो गया। आप प्रेम से भर गए हैं और मैं का कोई भाव नहीं रह गया है।
सुख—दुखों की प्राप्ति में सम.।
सुख आता है, दुख भी आता है। लेकिन आपने कभी खयाल नहीं किया होगा कि सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सुख के पीछे ही दुख छिपा होता है, उसका ही संगी—साथी है। और दोनों में तलाक का कोई भी उपाय नहीं है। दोनों सदा साथ हैं। उनका जोड़ा कभी छूटता नहीं। जब दुख आता है, तब उसके पीछे सुख छिपा रहता है। लेकिन हमारी आंखें संकीर्ण हैं। जो होता है, उसको ही हम देखते हैं। जो पीछे छिपा है, उसको नहीं देखते हैं। जब आप खुश हो रहे हैं, तब अब की दफा ध्यान रखना, जब सुख आए, तब ध्यान रखना कि जरूर उसके पीछे उससे जुड़ा हुआ दुख आएगा। और आप घड़ी, दो घड़ी में ही पाएंगे कि दुख आ गया। और इस दुख की क्वालिटी वही होगी, जो आपने सुख भोगा था उसकी थी; वही गुणधर्म होगा।
हर दुख के पीछे उसका सुख है। और हर सुख के पीछे उसका दुख है। रुपए में जैसे दो पहलू होते हैं, ऐसे वे दो पहलू हैं।
मगर हम कभी ध्यान नहीं करते। हमने कभी निरीक्षण नहीं किया। नहीं तो आप यह पहचान जाएंगे कि हर सुख का अनिवार्य दुख है। हर दुख का अनिवार्य सुख है। और दोनों मिलते हैं, एक नहीं मिलता। अगर आप अपना दुख कम करना चाहते हैं, तो आपको अपना सुख कम करना पड़ेगा। अगर आप अपना सुख बढ़ाना चाहते हैं, आपको अपना दुख बढ़ाना पड़ेगा।
इसलिए एक बड़ी अदभुत घटना घटी है इस जमीन पर। अब हमें खयाल में आती है। जमीन पर जितना सुख बढ़ता जाता है, उतना दुख भी बढ़ता जाता है। यह बड़े मजे की बात है।
विज्ञान ने सुख के बहुत उपाय किए हैं। और सुख निश्चित ही आदमी का बढ़ गया है। लेकिन आदमी जितना आज दुखी है, इतना कभी भी नहीं था। लोगों को लगता है, इसमें बड़ा कंट्राडिक्यान है, इसमें बड़ा विरोधाभास है। विज्ञान ने इतना सुख बढ़ा दिया, तो आदमी इतना दुखी क्यों है?
इसीलिए। इसमें विरोध नहीं है। जितना सुख बढ़ेगा, उसके ही अनुपात में दुख भी बढ़ेगा। वे साथ ही बढ़ेंगे।
एक गांव का आदमी कम दुखी है, क्योंकि कम सुखी भी है। एक आदिवासी कम दुखी है। यह तो हमको भी दिखाई पड़ता है कि कम दुखी है। लेकिन दूसरी बात भी आप ध्यान रखना, वह कम सुखी भी है। एक धनपति ज्यादा सुखी है, ज्यादा दुखी भी है। एक भिखमंगा कम सुखी है, कम दुखी भी है।
जिस मात्रा में सुख बढ़ता है, उसी मात्रा में दुख बढ़ता है। वह उसी के साथ—साथ है। वह उसी की छाया है। आप उससे भाग नहीं सकते। उससे आप बच नहीं सकते।
जिस दिन व्यक्ति को यह दिखाई पड़ जाता है कि सुख—दुख दोनों एक ही चीज के दो पहलू हैं, उस दिन वह समभावी हो जाता है। उस दिन वह कहता है कि अब इसमें सुख को चाहने और दुख से बचने की बात मूढ़तापूर्ण है।
यह तो ऐसे हुआ, जैसे मैं अपने प्रेमी को चाहता हूं और नहीं चाहता कि उसकी छाया उसके साथ मेरे पास आए। और छाया को देखकर मैं दुखी होता हूं। और मैं कहता हूं छाया नहीं आनी चाहिए, सिर्फ प्रेमी आना चाहिए। वह प्रेमी के साथ उसकी छाया भी आती है। वह आएगी ही। अगर मैं छाया नहीं चाहता हूं? तो मुझे प्रेमी की चाह कम कर देनी पड़ेगी। और अगर मैं प्रेमी को चाहता हूं तो मुझे छाया को भी चाहना शुरू कर देना पडेगा। बस, ये दो उपाय हैं।
दोनों ही अर्थों में बुद्धि सम हो जाती है। या तो सुख को भी मत चाहें, अगर दुख से बचना है। और अगर सुख को चाहना ही है, तो फिर दुख को भी उसी आधार पर चाह लें। और जिस दिन आप दोनों की चाह—अचाह में बराबर हो जाते हैं, उस दिन सम हो जाते हैं। कृष्ण कहते हैं, जो सम है सुख—दुख की प्राप्ति में, वह प्रभु के लिए उपलब्ध हो जाता है।
क्षमावान, अपराध करने वाले को भी जो अभय देने वाला है।
क्षमा बड़ी कठिन है। क्यों इतनी कठिन है? किसी को भी आप क्षमा नहीं कर पाते हैं। क्या कारण है? क्योंकि आप अपने को नहीं जानते हैं, इसलिए क्षमा नहीं कर पाते।
कभी आप खयाल करें अब, जिन—जिन चीजों पर आप दूसरों पर नाराज होते हैं, विचार किया आपने कि वे सब चीजें आपके भीतर भी छिपी पड़ी हैं! कोई क्रोध करता है, तो आप कहते हैं, बुरी
बात है। लेकिन आपने सोचा कि क्रोध आपके भीतर भी पडा है! कोई चोरी करता है, तो आप कहते हैं, पाप! बड़ा शोरगुल मचाते हैं। लेकिन आपने सोचा कि चोर आपके भीतर भी मौजूद है! हो सकता है, इतना कुशल चोर हो कि आप भी नहीं पकड़ पाते। पुलिस वाले तो पकड़ ही नहीं पाते, आप भी नहीं पकड़ पाते। लेकिन क्या चोरो की वृत्ति भीतर मौजूद नहीं है?
हत्या कोई करता है। आप नाराज होते हैं। लेकिन क्या आपने कई बार हत्या नहीं करनी चाही? यह दूसरी बात है कि नहीं की। हजार कारण हो सकते हैं। सुविधा न रही हो, साहस न रहा हो, अनुकूल समय न रहा हो। लेकिन हत्या आपने करनी चाही है। चोरी आपने करनी चाही है।
ऐसा कौन—सा पाप है जो आपने नहीं करना चाहा है? किया हो, न किया हो, यह गौण बात है। और अगर जितने पाप जमीन पर हो रहे हैं, सब आप भी करना चाहे हैं, कर सकते थे, करने की संभावना है, तो इतना क्रोधित क्यों हो रहे हैं दूसरे पर?
मनोवैज्ञानिक कहते हैं बड़ी उलटी बात। वे कहते हैं कि अगर कोई आदमी चोरी का बहुत ही विरोध करता हो, तो समझ लेना कि उसके भीतर काफी बड़ा चोर छिपा है। अगर कोई आदमी कामवासना का बहुत ही पागल की तरह विरोध करता हो, तो समझ लेना, उसके भीतर कामवासना छिपी है। क्यों? क्योंकि वह उस चीज का विरोध करके अपने को भी दबाने की कोशिश कर रहा है। चिल्लाता है दूसरे पर, नाराज होता है, तो उसको अपने को भी दबाने में सुविधा मिलती है।
जिस चीज का आप विरोध करते हैं बहुत, गौर से खयाल करना, कहीं आपके भीतर अचेतन में वह दबी पड़ी है। इसीलिए इतना जोर से विरोध कर रहे हैं।
लेकिन जो व्यक्ति जितना आत्म—निरीक्षण करेगा, उतना ही क्षमावान हो जाएगा। क्योंकि वह पाएगा, ऐसा कोई पाप नहीं, जिसे मैं करने में समर्थ नहीं हूं। और ऐसी कोई भूल नहीं है, जो मुझसे न हो सके। तो दूसरे पर इतना नाराज होने की क्या बात है! दूसरा भी मेरे जैसा ही है। वह भी मेरा ही एक रूप है। जो मेरे भीतर छिपा है, वही उसके भीतर छिपा है।
तो क्षमा का भाव पैदा होता है। क्षमा का मतलब यह नहीं है कि आप बड़े महान हैं, इसलिए दूसरे को क्षमा कर दें। वह क्षमा थोथी है। वह तो अहंकार का ही हिस्सा है।
ठीक क्षमा का अर्थ है कि आप पाते हैं कि सारी मनुष्यता आप में है। और मनुष्य जो करने में समर्थ है, वह आप भी समर्थ हैं। मनुष्य जिस नरक तक जा सकता है, आप भी जा सकते हैं। एक बात। इससे क्षमा आती है।
और दूसरी बात, कि आप जिस ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं, दूसरा मनुष्य भी उसी ऊंचाई तक पहुंच सकता है। दूसरी बात। निकृष्टतम भी आपके भीतर छिपा है, यह बोध, और श्रेष्ठतम भी दूसरे के भीतर छिपा है, यह बोध; आपके जीवन में क्षमा का जन्म हो जाएगा।
अभी हम उलटा कर रहे हैं। अभी श्रेष्ठतम हम मानते हैं हमारे भीतर है, और निकृष्टतम सदा दूसरे के भीतर है। दूसरे का जो बुरा पहलू है, वह देखते हैं। और खुद का जो भला पहलू है, वह देखते हैं। इससे बड़ी तकलीफ होती है। इससे बड़ी अस्तव्यस्तता फैल जाती है। दोनों देखें।
और जिस नरक में आप दूसरे को देख रहे हैं, उसमें आप भी खड़े हैं कहीं। और जिस स्वर्ग में आप सोचते हैं कि आप हो सकते हैं, या हैं, उसमें दूसरा भी हो सकता है। तब आपके जीवन में क्षमा का भाव आ जाएगा। और यह क्षमा सहज होगी। इससे कोई अहंकार निर्मित नहीं होगा कि मैंने क्षमा किया।
तथा जो योग में युक्त हुआ योगी निरंतर लाभ—हानि में संतुष्ट, मन और इंद्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए मेरे में दृढ़ निश्चय वाला है, वह मेरे में अर्पण किए हुए मन—बुद्धि वाला मेरा भक्त मेरे को प्रिय है।
परमात्मा को जो प्रिय है, वही उस तक पहुंचने का द्वार है। ये गुण विकसित करें, अगर उसे खोजना है। इन गुणों में गहरे उतरें, अगर चाहना है कि कभी उससे मिलन हो जाए। सीधे परमात्मा की भी फिक्र न की, तो भी हल हो जाएगा। अगर इतने गुण आ गए, तो परमात्मा उपलब्ध हो जाएगा।
एक मित्र ने पूछा है कि अगर हम ठीक जीवन ही जीए चले जाएं, तो क्या परमात्मा से मिलना न होगा?
बिलकुल हो जाएगा। लेकिन ठीक जीवन! ठीक जीवन का अर्थ ही धर्म है। और ये जितनी विधियां बताई जा रही हैं, ये ठीक जीवन के लिए ही हैं।
उन मित्र ने पूछा है कि धर्म की क्या जरूरत है, अगर हम ठीक जीवन जीएं?
ठीक जीवन बिना धर्म के होता ही नहीं। ठीक जीवन का अर्थ ही धार्मिक जीवन है। शब्दों का ही फासला है। कोई हर्ज नहीं, ठीक जीवन कहें या धार्मिक जीवन कहें। लेकिन ठीक जीवन का क्या अर्थ है?
ये जो गुण कृष्ण ने बताए, ये हैं ठीक जीवन। अहंकारशून्यता, सहज सबके प्रति प्रेम अकारण, क्षमा, एकाग्र चित्त—ये घटनाएं अगर बिना ईश्वर के भी घट जाएं.।
घटी हैं। महावीर ईश्वर को नहीं मानते हैं। बुद्ध तो आत्मा तक को नहीं मानते हैं। लेकिन महावीर भगवत्ता को उपलब्ध हो गए। जो भगवान को नहीं मानते है, उनको लोगों ने भगवान कहा। बुद्ध आत्मा—परमात्मा को कुछ भी नहीं मानते। और बुद्ध जैसा पवित्र, और बुद्ध जैसा खिला हुआ फूल पृथ्वी पर दूसरा नहीं हुआ है।
ठीक जीवन पर्याप्त है। लेकिन ठीक जीवन का अर्थ यही है। ठीक जीवन ही तो प्रभु के लिए खुलना है। ठीक जीवन के प्रति ही तो उसका प्रेम है। गैर—ठीक जीवन में हम पीठ किए खड़े होते हैं। ठीक जीवन में हमारा मुंह ईश्वर की तरफ उन्‍मुख हो जाता है।
उन्मुख हो जाना उसकी तरफ ठीक जीवन है। या ठीक जीवन हो जाए तो उन्मुखता आ जाती है। अभी हम जैसे हैं, वह विमुखता है।

आज इतना ही।
पांच मिनट रुके। कोई बीच से उठे न। कीर्तन पूरा करके जाएं।


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