मैं अपने प्राइमरी स्कूल की बात कर रहा था। मैं वहां कभी-कभार ही जाता था। मेरे न जाने से स्कूल के सब लोगों को बडी राहत मिलती थी और मैं भी उन्हें तकलीफ देना नहीं चाहता था। मैं तो उनको शत-प्रतिशत राहत देना चाहता था। क्योंकि मुझे भी उनमें बहुत प्रेम था—मेरा मतलब है लोगों से, वहां के अध्यापकों से,अन्य नौकरों से तथा मालियों से। कभी-कभी मैं उनसे मिलना चाहता था, खासकर जब तब मैं उनको को विशेष चीज दिखाना चाहता तो मैं वहां चला जाता। एक छोटा बच्चा चाहता है कि वह अपनी खास चीजें अपने प्रियजनों को दिखाए। किंतु ये चीजें खतरनाक भी होती थीं। अभी भी मुझे यह याद करके बहुत हंसी आती है।
उस दिन की याद मेरे मन में बिलकुल ताजा है। वह याद इस क्षण की ही प्रतीक्षा कर रही थी। शायद अब वह क्षण आ गया है जब दूसरों के साथ इस अनुभव के मजे को बांटा जा सकता है। यह घटनाओं का एक शृंखला है....
मैंने तब सांप पकड़ना नया-नया ही सीखा था। सांप बेचारे तो बहुत ही सीधे-सादे, सुंदर और अत्यंत जीवंत होते है। मेरी इस बात पर आपको तभी विश्वास हो सकता है अगर आपने कभी दो साँपों को प्रेम करते देखा होगा। तुम शायद सोचो कि सांप कैसे प्रेम करते है। मनुष्य कि तरह वे प्रेम को आयोजित नहीं करते—उनका प्रेम जब घट जाए तब घट जाए। और जब वे प्रेम में होते है तो उस समय वे ज्वाला की लपटों जैसे होते है। और मैं जिस कारण से यह कह रहा हूं वह आर्श्चय भरा है। क्योंकि उनमें हड्डी तो होती नहीं फिर भी एक दूसरे का चुंबन लेने के लिए वे सीधे खड़े हो जाते है। किस पर खड़े होते है। उनके पैर भी नहीं होते, वे अपनी पूंछ पर सीधे खड़े हो जाते है। अगर तुम दो साँपों को अपनी पूंछ पर खड़े एक-दूसरे का चुंबन करते देख लो तो तुम फिर कभी कोई होली वुड फिल्म देखने की चिंता न करोगे।
मैंने अभी-अभी साँपों को पकड़ना सीखा ही था और मुझे ज़हरीले और बिना जहर वाले सांप की पहचान भी हो गई थी। कुछ सांप तो बिलकुल ज़हरीले नहीं होते,उन्हें तो तुम एक तरह की मछली ही कह सकते हो। पानी में रहने वाले सांप तो बहुत ही सीधे-सादे होते है—मछली भी उससे अधिक चालाक होती है। पानी के पानी के सांप चालाक नहीं होते, मैंने सब तरह के साँपों को पकड़ा है इसलिए जब मैं कहता हूं तो यह सुनी-सुनाई बात नहीं है—मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं।
तो मैंने उस दिन एक सांप पकड़ा। अब स्कूल जाने के लिए यह सही दिन था। अजीब बात है।....अन्यथा तो मैं अपनी दुनिया में इतना व्यस्त रहता था कि मूर्खतापूर्ण प्रश्न और उत्तर और फालतू के नक़्शों में समय खराब करने का समय ही न था। तब भी मैं देख सकता था कि सारे नक्शे मूर्खतापूर्ण है क्योंकि जमीन पर तो कोई विभाजन रेखाएं नहीं है। जिले की या नगरपालिका की। तो सारे देश बेकार की बकवास है। सब गोबर के है और वह भी वह पवित्र गोबर नहीं—अपवित्र गोबर, अन होली काऊ डंग। इस जैसा अगर कुछ भी है तो वह है राजनीति—अपवित्र और गोबर,दोनों साथ-साथ। ये सब काल्पनिक रेखाएं राजनीतिज्ञों द्वारा बनाई गई है।
मैं भूगोल पढ़ने में समय बरबाद नहीं करना चाहता था। मैं तो सच्चे भूगोल से परिचित हो रहा था—मैं तो कई-कई दिनों के लिए पहाड़ों में गायब हो जाता था। केवल मेरी नानी को मालूम होता था कि मैं वहां से कब आऊँगा। कई दिनों तक न तो मैं दिखाई देता, न सुनाई देता क्योंकि मैं वहां होता ही नहीं था। इससे शायद सिवाय मेरी नानी के बाकी सारे लोग बहुत खुश हो जाते, उनकी यह खुशी उचित ही थी। उनकी इस खुशी का करण तुम्हें बाद में मालूम हो जाएगा।
तो मैंने पहली बार सांप पकड़ा था, मेरी पहली सफलता था। स्वभावत: मैं तुरंत स्कूल पहुंचना चाहता था। मैंने यूनिफार्म पहनने की चिंता नहीं की। और किसी को अपेक्षा भी नहीं हो सकती थी। प्राइमरी स्कूल में भी मैं यूनिफार्म नहीं पहनता था। मैंने कहा था कि मैं यहां पर सीखने आया हूं। पढ़ने आया हूं नष्ट या बरबाद होने के लिए नहीं आया। अगर मैं कुछ सीख सकूं तो अच्छी बात है, लेकिन मैं आप लोगों को मुझे नष्ट नहीं करने दूँगा। ओर यूनिफार्म आपने चुना है किंतु आप लोगों को तो आकार और सौंदर्य की कोई जानकारी नहीं है, कोई पहचान नहीं है। मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता। अगर आपने यूनिफार्म पहना ने की मुझसे कोई जबरदस्ती की तो मैं भी आपके लिए मुसीबत खड़ी कर दूँगा।
उन्होंने कहा: यूनिफार्म बनवा कर तैयार रखो। जब स्कूल का इंस्पेक्टर निरीक्षण करने आए उस दिन इसे पहन कर आना। उस समय भी अगर तुम नहीं पहनोगे तो हम मुसीबत में पड़ जाएंगे। हम तुम्हें मुसीबत में नहीं डालना चाहते क्योंकि हम अपने लिए मुसीबत नहीं लेना चाहते। यह महंगा सौदा है।
मेरे अध्यापक ने कहा: तुम्हारे लिए मुसीबत खड़ी करना....हमें मालूम है कि काने मास्टर के साथ क्या हुआ था। ऐसा दूसरों के साथ भी हो सकता है। परंतु हम पर इतनी मेहरबानी करो कि एक यूनिफार्म बनवा कर तैयार रखो।
और तुम्हें यह जान कर आश्चर्य होगा कि मेरे स्कूल ने मेरा यूनिफार्म बनवाया। मुझे नहीं मालूम कि उसके पैसे किसने दिए। और न ही उसकी मुझे चिंता है। मैंने उसे अपने पास रख लिया। मुझे अच्छी तरह से मालूम था कि यह संयोग बिलकुल असंभव है कि जिस दिन मैं स्कूल जाऊँ उसी दिन इंस्पेक्टर भी वहां आए। यह संभव न था। ऐसा मैंने सोचा था, किंतु फिर भी मैंने वह यूनिफार्म रख लिया। देखने में वह सुदंर था: उन्होंने अपनी तरु से पूरी कोशिश की थी और उसे पहनने के लिए अब वे लोग मेरे साथ कोई जबरदस्ती नहीं कर रहे थे।
मैं तो सदा परदेशी ही रहा। अभी भी मेरे अपने लोगों के बीच भी तो मैं यूनिफार्म नहीं पहल रहा—मैं पहन ही नहीं सकता। उस यूनिफार्म को भी मैं नहीं पहन सकता जो मैनें स्वयं तुम लोगों के लिए चुना है। क्यों? उस दिन भी यहीं प्रश्न था। आज भी वही प्रश्न सामने है। मैं दूसरों के अनुरूप नहीं चल सकता। तुम इसे मेरी सनक समझ सकते हो, पर यह मेरी सनक नहीं है। यह तो अस्तित्व गत बात है। किंतु अभी हम उसकी चर्चा नहीं करेंगें क्योंकि फिर मैं जो तुम लोगों से बात कर रहा हूं। वह छूट जाएगी और दुबारा मैं उस विषय को नहीं उठाऊ गा।
मैंने अपना पहला सांप पकड़ा था, यह बहुत खुशी,आनंद की बात थी और सांप बहुत सुंदर था, उसे छूने से ही मुझे रोमांच होता था। इसे छूना वैसा नहीं था जैसा कि औपचारिकता वश—पति-पत्नी, बेटे या अपने दामाद को छूकर उन्हें आशीर्वाद तो दिया जाता है परंतु अपने भीतर उनके प्रति कोई भाव नहीं उठता। और अगर तुम अमरीका में हो तो जी चाहता है कि इस समय टी वी देखना चाहिए और अगर तुम इंग्लैंड में हो तो जी चाहता है कि क्रिकेट मैच या फुटबाल मैच देखना चाहिए। अपने-अपने ढंग से सब लोग सनकी होते है।
वह सांप प्लास्टिक सांप नहीं था। जिसे किसी दूकान से खरीद लिया गया हो। यह वास्तविक सांप था। प्लास्टिक का सांप भी वास्तविक दिखाई दे सकता है। लेकिन वह स्वास नहीं ले सकता। वह बेजान होता है। वहीं तो एक समस्या होती है। अन्यथा तो वह बढ़िया होता है। परमात्मा भी उससे अच्छा नहीं बना पाता। सिर्फ एक बात नहीं होती—श्वास। और सिर्फ एक चीज के लिए क्या शिकायत करनी। लेकिन वह एक बात ही तो सब कुछ है, वही तो विशेषता है। मैंने तो एक वास्तविक सांप पकड़ा था जो बहुत सुंदर और बहुत चालाक था। इसलिए उसे पकड़ने के लिए मुझे बहुत सोच-समझ से काम लेना पडा क्योंकि मैं उसे मारना नहीं चाहता था।
जो आदमी मुझे सांप पकडना सिखा रहा था वह साधारण सड़क पर जादू दिखाने वाला जादूगर था और भारत में उसको मदारी कहा जाता है। ये लोग सड़कों पर मुफ्त में ही अपने जादू क खेल दिखाया करते है। और अंत में देखने वाले खुश होकर अपनी इच्छानुसार थोड़े बहुत पैसे दे देते है। खेल के अंत में मदारी अपने रूमाल को जमीन पर बिछा कर कहता है। अब मेरे पेट के लिए मुझे कुछ मिलना चाहिए। देखने वाला कितना ही गरीब क्यों न हो, इस खेल से खुश होकर कुछ न कुछ तो दे ही देता है।
तो यह मदारी साधारण सा जादूगर था। पश्चिम में इस प्रकार के मदारी नहीं होते। पश्चिम में सड़क पर भीड़ जमा हो ही नहीं सकती, तुरंत ही पुलिस की कार आकर कहेगी कि तुम ट्रैफिक जाम कर रहे हो, और उन्हें भगा देगी।
भारत में तो ट्रैफिक जाम का प्रश्न ही नहीं उठता,याता-यात के कोई नियम ही नहीं है। तुम ठीक सड़क के बीच में चल सकते हो। शाब्दिक रूप से तुम मज्झम निकाय, मध्य मार्ग अपना सकते हो। तुम अमरीकी लोगों की तरह बिलकुल दाई और जा सकते हो या तुम चाहों तो बिलकुल बाई और चलन सकते हो। बिलकुल दाईं और चलना अमरीका का ढंग है और बिलकुल बाईं और चलना रूस का ढंग है। भारत में तो तुम जो चाहों चुन सकते हो या इन दोनों के बीच कहीं भी चल सकते हो। सारी सड़क ही तुम्हारी है। तुम चाहो तो बीच सड़क पर अपना घर बना सकते हो। तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि भारत की सड़को पर तो चाहो वह कर सकते हो। जिसकी कल्पना की जा सकती है और जिस की कलपना भी नहीं की जा सकती वह भी वहां पर कर सकते हो।
इस मदारीयों के तमाशे के कारण ट्रैफिक जाम हो जाता था। किंतु उन्हें कोन मना करता, क्योंकि वहां खड़ा सिपाही भी उस तमाशे का मजा ले रहा था। वह भी दूसरों की तरह ताली बजा रहा था। उस तमाशे के देखने के लिए सभी प्रकार के लोगों की भीड़ जमा हो जाती थी। और सारी सड़क को जाम कर देते थे। अब इस प्रकार के मदारी पश्चिम में तो नहीं रह सकते। वे बहुत ही प्यारे लोग है। बहुत सीधे-सादे और साधारण परंतु वे कुछ विशेष जानते है।
वह आदमी जो मुझे सिखा रहा था। उसने मुझे बताया ता कि ऐसे साँपों को नहीं पकड़ना चाहिए क्योंकि ये बहुत खतरनाक होते है।
मैंने उससे कहा: तुम्हारा काम हो गया, तुम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए। मैं तो इन्हीं साँपों को पकडूं गा। ऐसा जीवंत, ऐसा सुंदर, ऐसा रंगीन सांप मैंने कभी नहीं देखा था। मैं अपने आप को रोक न सका। तब मैं छोटा सा बच्चा था। मैं जल्दी से जल्दी स्कूल पहुंच कर इस सांप को दिखाना चाहता था। वहां जो हुआ वह मैं बताना नहीं चाह रहा था, पर मैं बताऊंगा,क्योंकि मैं उसे फिर से देख सकता हूं।
पूरा स्कूल, जितने जो संभव थे उतने मेरे क्लास रूम में आ गए और बाकी लोग बाहर बरामदे में खड़े होकर दरवाज़ों और खिड़कियों में से झांक रहे थे। कुछ एक डर के मारे और भी दूर खड़े हुए थे कि कहीं सांप बाहर न निकल जाए। और यह लड़का पहले से ही मुसीबत खड़ी करता रहा है। और मेरी क्लास के तीस-चालीस लड़के तो डर के मारे चीख रहे थे। चिल्ला रहे थे और यह देख कर मुझे बड़ा मजा आ रहा था।
यह जान कर तुम्हें भी मजा आएगा और मुझे तो भरोसा ही नहीं आया, मेरे अध्यापक तो कुर्सी के ऊपर खड़े हो गए। आज भी मैं उन्हें कुर्सी पर खड़े होकर यह कहते देख सकता हूं। कि अरे, तुम जाओ—यहां से जाओ। हमें अकेला छोड़ दो। यहां से चले जाओ।
मैंने उनसे कहा: पहले आप नीचे उतरो।
यह सुनते ही वे चुप हो गए, क्योंकि इतने बड़े सांप के होते नीचे उतरना बहुत मुश्किल था। वह सांप छह या सात फीट लंबा था और मैं उसे एक झोले में डाल कर—उस झोले को घसीटते हुए लाया था। ताकि मैं उसे सबके सामने अचानक खोल सकूं। एकाएक जब मैंने उसे खोल दिया तो तूफान आ गया। अध्यापक तो जंप करके कुर्सी पर खड़े हो गए। मुझे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं आ रहा था। मैंने कहा: यह आश्चर्य कि बात है।
उन्होंने कहा: इसमें आश्चर्य कि क्या बात है।
मैंने कहा: आपका इस तरह जंप करके कुर्सी पर खड़े हो जाना। आप उसे तोड़ दोगे।
बच्चे पहले तो नहीं डरे लेकिन जब उन्होंने अध्यापक को इतना डरा देखा तो वे भी डर गए। देखते हो बच्चे कैसे मूर्ख और गलत लोगों से प्रभावित होते है। जब उन्होंने मुझे सांप के साथ अंदर आते देखा तो वह आह्लादित थे। ‘’अलेलुइया’’। पर जब उन्होंने अध्यापक को अपनी कुर्सी पर खड़े देखा.....एक क्षण के लिए बिलकुल सन्नाटा छा गया। केवल वे अध्यापक ही चिल्ला रहे थे। बचाओ, बचाओ, हमारी मदद करो।
मैंने उनसे कहा: मुझे समझ नहीं आ रहा, सांप तो मेरे हाथ में है। खतरा तो मुझे है। आपको तो कोई खतरा नहीं है। आप तो अपनी कुर्सी पर खड़े है। बेचारा सांप तो आपसे बहुत दूर है। अच्छा होता अगर वह आपके नजदीक पहुच जाता। और आपसे कुछ बात कर पाता।
मैं तो अभी भी उन अध्यापक को और उनके सहमे हुए चेहरे को देख सकता हूं। इस अनुभव के बाद मुझे वे केवल एक बार ही मिले थे। तब तक मैं प्रोफेसर के पर को छोड़ चुका था। और भिखारी बन चुका था। हांलाकि मैंने कभी भीख नहीं मांगी। परंतु हूं तो मैं भिखारी ही—एक विशेष प्रकार का भिखारी जो भिक्षा नहीं मांगता। अब इसके लिए तुम्हें कोई खास शब्द खोजना पड़ेगा। मेरी स्थिति को ठीक अभिव्यक्ति करने वाला तो शायद कोई शब्द ही नहीं है—शायद किसी भी भाषा में नहीं है। इसका सीधा सा कारण है कि इससे पहले इस ढंग से जीने वाला कोई और हुआ ही नहीं। न कभी कोई और ऐसा हुआ है जो इस ढंग से रहा है। कि अपने पास कुछ न होते हुए भी ऐसे रहता हो जैसे सारी दुनिया पर उसकी मलकियत हो।
मुझे याद है उन्होंने कहा था कि मैं वह दिन भूल नहीं सकता जब तुम सांप को लेकर क्लास में आए थे। मुझे तो अभी भी वह सपनों में दिखाई देता है। मैं तो विश्वास ही नहीं कर सकता कि स्कूल का वह शैतान लड़का अब बुद्ध बन गया है। यह असंभव है।
मैंने कहा: आप बिलकुल ठीक कह रहे है, वह लड़का तो मर गया है और उसकी मृत्यु के बाद जो बच गया उसे आप बुद्ध कह सकते है। या कुछ और कहां जा सकता है। आप जैसा मुझे जानते थे अब मैं वैसा नहीं हूं। मुझे तो अपना वहीं ढंग पसंद है किंतु अब क्या किया जा सकता है। मैं तो मर गया हूं।
उन्होंने कहा: देखो, मैं इतनी गंभीरता से बोल रहा हूं और तुमको मजाक करने की सूझ रही है।
मैंने उनसे कहा: मैं अपनी पूरी कोशिश कर रहा हूं, पर केवल आपको ही वह प्रसंग याद नहीं आता,मुझे भी याद आती है। जब भी कोई बुरा दिन होता है या मौसम अच्छा नहीं होता या चाय अच्छी गरम नहीं होती या खाना अच्छा नहीं होता,ऐसा कुछ जैसे जहर देने के लिए बनाया गया हो। तब उससे फिर मैं प्रसन्न हो जाता हूं। हालांकि मैं मर चुका हूं पर इससे फिर भी मदद मिलती है। मैं आपका बहुत आभारी हूं।
मैं तो ऐसी हरकतों के लिए ही स्कूल जाता था। हां, वहां जाने के अवसर कम मिलते थे। सब लोगों का भला इसी में था कि मैं वहां रोज न जाऊँ। मेरे वहां न जाने में ही वह खुश थे। तुम्हें यह जान कर हैरानी होगी कि वहां का जो चपरासी था, पूयन था—एक ऐसा व्यक्ति था जो मुझे देखे बिना दुःखी हो जाता था। बाकी सब इससे बहुत खुश होते थे। वह मुझे बहुत प्रेम करता था। उससे अधिक बूढा आदमी मैंने आज तक नहीं देखा। वह शायद नब्बे साल या उससे भी अधिक उम्र का था। शायद उसने शताब्दी पूरी कर ली थी, शायद इससे भी अधिक रहा हो। किंतु वह अपनी उम्र जितनी कम हो सके उतनी कम करके बताता था क्योंकि उम्र से अधिक हो जाने से उसे नौकरी से रिटायर कर दिया जाता।
भारत में किसी के पास जन्म-प्रमाणपत्र तो होता नहीं है। सौ बरस पहले तो इसका प्रचलन ही नहीं था। जन्म तिथि का रिकार्ड ही नहीं रखा जाता था। मैंने ऐसा कोई आदमी नहीं देखा जो इतना वृद्ध होते हुए भी इतना दिलचस्प हो।
उस सारे स्कूल में वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसका मैं आदर करता था। वह बेचारा गरीब नौकर था इसलिए दूसरे लोग तो उसकी और ध्यान ही नहीं देते थे। बस उसके कारण मैं कभी-कभी स्कूल चला जाता था। केवल उससे मिलने के लिए।
हाथी-फाटक के पास ही उसकी कोठरी थी। उस फाटक को खोलना और बंद करना उसका काम था। उसकी कोठरी के सामने ही एक घंटा टँगा हुआ था। हर चालीस मिनट के बाद उसे बजाता था। हर रोज दो बार दस-दस मिनट की आधी छुटटी होती थी—नाश्ता करने के लिए और दोपहर को खाने के लिए एक घंटे की छुटटी होती थी। उसका यही काम था—घंटा बजाना। अन्यथा वह बिलकुल खाली होता था। और वह इतना प्यारा वृद्ध आदमी था।
मैं जब उसके कमरे में जाता तो वह दरवाजा बंद कर देता ताकि कोई दूसरा आदमी अंदर न आ जाए। या में जल्दी से भाग न जाऊँ। तब वह मुझसे पूछता, अब बताओ कि पिछली बार जब हम मिले थे तो उसके बाद तुमने क्या–क्या किया। और वह इतना प्यारा वृद्ध व्यक्ति था। उसका चेहरा झुरियों से भरा हुआ था। जब वह मुझसे बात करता तो मैं उसके चेहरे की रेखाओं को गिने कि कोशिश करता, उसके माथे की रेखाओं को देखता। उसके सर पर कोई बाल नहीं था—सब सफाचट—केवल माथा ही माथा था। उसका चेहरा झुर्रियां से भरा था। परंतु उन असंख्य झुर्रियां और रेखाओं के पीछे छिपा हुआ था गहन प्रेम और गहरी समझ का व्यक्ति।
अगर मैं कई दिन तक स्कूल न जाता तो यह निश्चित था कि वह मुझे खोजता हुआ मेरे घर पहुंच जाता। इसका मतलब यह था कि मेरे पिताजी को सब कुछ मालूम हो जाता—यहीं कि मैं कभी स्कूल नहीं जाता फिर भी हाज़िरी लगती रहती। ताकि मैं कोई उपद्रव करू। मैंने स्कूल बालों से समझोता भी यही किया था कि मैं बाहर ही रहूंगा, किंतु मेरी उपस्थिति का क्या होगा। मेरे पिताजी को कौन जवाब देगा।
उन्होंने कहा: उपस्थित की तो तुम चिंता ही मत करो। हम तुम्हें शत-प्रतिशत उपस्थिति दे देंगे—छुटटी वाले दिन भी।
इसलिए मैं सदा इस बात का ध्यान रखता था कि मैं उससे मिलने उसकी कोठरी में आता था। ताकि वह मेरी खोज में मेरे घर न पहुंच जाए। किसी तरह—फिर मुझे इस शब्द का उपयोग करना होगा ‘’सिन्क्रॉनिसिटी’’—उसे पता चल जाता था कि कब मैं आ रहा हूं। उसके साथ मेरा आंतरिक संबंध इतना गहरा था। मुझे पहले से ही पता लग जाता था कि अगर आज मैं नहीं गया तो वह यह जानने आज आ जाएगा कि क्या हुआ। और यह मामला बिलकुल गणित की तरह से हो गया था।
सुबह ही सुबह नींद से उठते ही मेरे भीतर से आवाज आती, अगर आज मन्नू लाल (मन्नू लाल उसका नाम था) से मिलने नहीं गया तो वह शाम तक तुम्हारे घर पहुंच जाएगा। इससे पहले कि ऐसा हो, उससे मिलने चले जाओ।
मैं सदा इस आंतरिक आवाज को सुनता । किंतु सिर्फ एक बार मैंने उस आवाज की बात नहीं मानी, उसे अनसुना कर दिया। मैं इस क्रम से थोड़ा थक गया था। एक तरह की विवशता सी हो गई थी। डर के मारे मुझे जाना ही पड़ता कि कहीं वह मेरे पिता को यह न बता दे कि मैं कई दिनों से स्कूल नहीं गया। और तब तूफान उठ खड़ा होता। मैने अपने आपसे कहा, नहीं आज तो मैं नहीं जाऊँगा, कुछ भी हो जाए मैं नहीं जाऊँगा। और मैं नहीं गया। बस थोड़ी देर बाद ही मैंने बूढे मन्नू लाल को आते दिखाई दिए। वह सौ साल का तो जरूर था किंतु मालूम होता था। वह इतना पुरातन दिखता था। इतना प्राचीन दिखाई देता था कि तुम भरोसा ही नहीं करोगे इससे प्राचीन कुछ भी नहीं देखा। मैंने बहुत अजायबघर देखे है, सब तरह के पुरातन संग्रह देखे है, पर मन्नू लाल से पुराना कभी कुछ नहीं देखा।
मैंने उसे आते हुए देखा। तो मैं भागा-भागा उसके पास बाहर ही पहुंच गया ताकि वह मेरे घर में प्रवेश न करे। उसने कहा: मुझे यहां आना पडा क्योंकि तुम मुझसे मिलने आए ही नहीं। और तुम जानते हो कि मैं इतना बूढा हूं—कभी भी मर सकता हूं। कौन जाना है। तुम्हें एक बार देखना चाहता था। तुम्हें सदा की तरह जीवंत और स्वस्थ देख कर मुझे शांति मिल गई है। इतना कह कर वह मुझे आशीर्वाद देते हुए वापस मूड कर चला गया। मुझे अभी भी उसकी पीठ दिखाई दे रही है। वह चपरासी की खाकी रंग की अजीब वर्दी पहले हुए था। अब वह समझाना मेरे लिए बहुत ही कठिन होगा। पहला तो वह रंग—खाकी। खाकी रंग की वर्दी पहने हुए था। उसके पैरों में नीचे से लेकर घुटनों तक पट्टा बंधा हुआ था। वह भी खाकी, ताकि वह सजग और सावधान रहे।
यह बड़ी अजीब बात है पर पोशाक से आदमी का व्यवहार बदल जाता है। उदाहरण के लिए,आज युवक जैसी तंग और चुस्त पोशाक या पेंट पहन रहे है। उसे देख कर तो हैरानी होती है। कि इतनी चुस्त है कि कैसे वे उसमें घुस सकते है। मैं तो कभी नहीं पहन सका। मान लो कि अगर उसके भीतर ही उनका जन्म हुआ तो अब सवाल यह उठता है कि वह बाहर कैसे निकलेंगे। पर ये तो दार्शनिक प्रश्न है। उनको इसकी चिंता नहीं है। वे तो पॉप गाने गाते है और पॉप कॉर्न खाते है। अब वे करें भी तो क्या करें।
पर पोशाक से व्यक्ति का व्यवहार अवश्य बदल जाता है। सैनिक ढीली वर्दी नहीं पहल सकते—नहीं तो वे लड़ नहीं सकेंगे। जब इतनी तंग और चुस्त पोशाक पहनी जाएगी तो आदमी खुद ही लड़ाई करना चाहेगा। आकारण ही गुस्सा आएगा, झुंझलाहट होगी,यह वस्तुगत नहीं होगा, किसी खास व्यक्ति की तरफ नहीं होगा, यह सिर्फ आत्मगत होगा। तुम सिर्फ उससे बाहर निकलना चाहोगे। फिर क्या करो, अच्छी तरह से झगडा करो। झगडा या लड़ाई करने के बाद ही कुछ राहत मिलेगी। उसके बाद ही वे तंग कपड़े कुछ ढीले हो जाएंगे।
इसीलिए तो हर प्रेमी प्रेम करने से पहले झगड़ा करता है, तर्क करता है और तकिए फेंकता है। तब अंत में सुखांत नाटक बन जाता है। काश, प्रारंभ से ही लोग प्रेम पूर्ण हो सकें, पर नहीं उनकी अपनी ही अकड़, उस अकड़ के कारण ही लोग आरंभ में ही प्रेमपूर्ण नहीं हो पाते।
मेरे लिए केवल तीन मिनट......
अब समाप्त हुआ, अच्छा।
--ओशो
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