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रविवार, 5 नवंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--105



गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--105

दैवी या आंसुरी धारा—(अध्‍याय—9)
प्रवचनपाँचवाँ (104)
सूत्र:
 महात्मानस्तु मां पार्थ दैवौं प्रकृतिमश्रिता:।
भजज्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।। 13।।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्‍या नित्‍ययुक्‍ता उपासते ।। 141 

परंतु हे पार्थ दैवी प्रकृति के आश्रित हुए जो महात्माजन है, वे तो मेरे को अब भूतों का सनतन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूय जानकर अनन्य मन से युक्‍त हुए निरंतर भजते हैं।
और वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का र्कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए, और मेरे को बारंबार नमस्कार करते हुए, सदा मेरे ध्यान में युक्त हुए अनन्य भक्‍ति से मुझे उपासते हैं।

नुष्य की मूढ़ता के संबंध में थोड़ी बातें और जान लेनी जरूरी हैं। क्योंकि उन्हें जानकर ही हम आज के सूत्र में प्रवेश कर सकेंगे। तीन लक्षण कृष्ण ने मूढ़ता के और कहे हैं, वृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले।

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--104



गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--104

विराट की अभीप्‍सा—(अध्‍याय—9)—प्रवचन—चौथा

सूत्र:
मयाध्‍यक्षेण प्रकृति: सूयतेसचाराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्धइयीश्वर्त्से।। 10।।।
अवजानीन्त मां मूढ़ा मानुषी तनुमख्सिम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।। 11।।
मोघाशा मोघकर्माणो मोख्ताना विचेतस:।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मौहिनौं श्रिता:।। 12।।

और हे अर्जुन मुझ अधिष्ठता की उपस्थिति मात्र से यह मेरी प्रकृति अर्थात माया चराचरसहित सर्व जगत को रचती है और इस ऊपर कहे हुए हेतु से ही यह जगत
बनताबिखरता रहता है।

ऐसा होने पर भी संपूर्ण भूतों के महान ईश्वर रूप मेरे परम भाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ परमात्‍मा को तुच्‍छ समझते है। जो कि वृथा आशावृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले अज्ञानीजन राक्षसों के और असुरों के जैसे मोहित करने वाली प्रकृति अर्थात
तामसी स्वभाव को ही धारण किए हुए हैं।

शनिवार, 4 नवंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--103



गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--103

(अध्‍याय9)—प्रवचन—तीसरा
जगत एक परिवार है
सूत्र:

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये युनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।। 7।।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य धिसृजामि पुन: पुन:।
भूतग्राममिमं कृल्लमवशं क्कृतैर्वशात्।। 8।।
न च मां तानि कमगॅण निबश्वन्ति धनंजय।
उदासीनवदासीनमसक्त तेषु कर्मसु।। 9।।

और हे अर्जुन कल्य के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति की प्राप्त होते हैं अर्थात मेरी प्रकृति में लय होते हैं। और कल्य के आदि में उन्‍हें मैं फिर रचता हूं।
अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के वश से परतंत्र हुए हम संपूर्ण भूत समुदाय को बारंबार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूं।

हे अर्जुन उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदातीन के सदृश स्थित हुए मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बांधते हैं।

 स सूत्र के निकट पहुंचने के लिए हम दोचार मार्गों से यात्रा करेंतो आसान होगा। यह सूत्रमनुष्य के चिंतन में जो मूलभूत प्रश्न हैउससे संबंधित है। आदमी ने निरंतर जानना चाहा हैकैसे यह सृष्टि निर्मित होती हैकैसे विलीन होती है?कौन इसे बनाताकौन इसे सम्हालताकिस में यह विलीन होती हैकोई है इसे बनाने वाला या नहीं हैइस प्रकृति का कोई प्रारंभ हैकोई अंत हैया कोई प्रारभ नहींकोई अंत नहीं

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--102



अतर्क्‍य रहस्‍य में प्रवेश—(अध्‍याय9)

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--102
प्रवचन—दूसरा

सूत्र:

मया ततमिदं सर्व जगदस्थ्यमूर्तिना।
मत्‍स्‍थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्यवीस्थ्य:।। 4।।
न च मत्‍स्‍थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्‍न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:।। 5।।
यथाकाशीस्थ्योनित्यं वायु: सर्वन्‍नगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्‍स्‍थानीत्युयधारय ।। 6।।

और हे अर्जुन मेरे अव्‍यक्‍त स्वरूय से यह सब जगत परिपूर्ण है और सब भूत मेरे में स्थित हैं। इसलिए वास्तव में मैं उनमें स्थित नही हूं।
और वे सब भूत मेरे में स्थित नहीं हैमेरे
योगसामथ्‍र्य को देख कि भूतों को धारणपोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्‍मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है।

क्योंकि जैसे अकाश से उत्पन्न हुआ सर्वत्र विचरने वाला महान वायु सदा ही आकाश में स्थित हैवैसे ही संपूर्ण भूत मेरे में स्थित हैऐसे जान।

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--101



गीता दर्शन—(अध्‍याय9) प्रवचनपहला

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--101


 श्रीमद्भगवद्गीता
अथ नवमोऽध्याय:

 श्रीभगवानवाच
हदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसीहतं यज्ञ्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। 1।।
राजविद्या राजगुह्मं यीवप्रीमदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।। 2।।
अश्रद्दधाना: पुरूषा धर्मस्यास्य परंतप।
अप्राप्‍य मां निवर्कन्ते मृत्युसंसारवर्त्मीन।। 3।।

श्रीकृष्ण भगवान बोले हे अर्जुनतुझ दोषदृष्टि रहित भक्त के लिए हम परम गोपनीय ज्ञान को रहस्य के सहित कहूंगाकि जिसको जानकर तू दुखरूप संसार से मुक्‍त हो जाएगा। यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा तथा सब गोपनीयों का भी राजा एवं अति पवित्र उत्तम प्रत्यक्ष फल वाला और धर्मयुक्त हैसाधन करने को बड़ा सुगम और अविनाशी है। और हे परंतप इस तत्वज्ञानरूप धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मेरे को प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारचक्र में भ्रमण करते हैं।

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-100



तत्‍वज्ञ—कर्मकांड के पार—प्रवचन—ग्‍यारहवां

गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-100    
अध्‍याय—8
सूत्र:
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्मति कश्‍चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयक्तो भवार्जुन।। 27।।
वेदेषु यज्ञषु तप:सु चैव दानेषु यत्‍युण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सवर्मिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।। 28।।

और हे पार्थ इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्व से जानता हुआकोई भी योगी मोहित नहीं होता है। हस कारण हे अर्जुनतू सब काल में योग से युक्‍त हो अर्थात निरंतर मेरी प्राप्ति के लिए साधन करने वाला हो।
क्योंकि योगी पुरुष इस रहस्य को तत्‍व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञतप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा हैउस सब को निस्संदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है।

 प्रभु की खोज मेंपरम सत्य की खोज में दो मार्गों की हमने समझी उस संबंध में दों-तीन बातें और भी बात। खयाल में ले लेनी जरूरी हैं। और तब आसान होगा आज के इस अक्षर ब्रह्म योग अध्याय अंतिम दो सूत्रों को समझने में।

गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-099



गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-099   
 
अध्याय ८
दसवां प्रवचन
दक्षिणायण के जटिल भटकाव

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।। २५।।
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः।। २६।।
तथा जिस मार्ग में धूम है और रात्रि है, तथा कृष्णपक्ष है और दक्षिणायण के छः माह हैं, उस मार्ग में मरकर गया हुआ योगी, चंद्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर पीछे आता है।
क्योंकि जगत के ये दो प्रकार के शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें एक अर्चिमार्ग के द्वारा गया हुआ पीछे न आने वाली परम गति को प्राप्त होता है। और दूसरा धूममार्ग द्वारा गया हुआ पीछे आता है अर्थात जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है।

जो व्यक्ति प्रभु की साधना में लीन उत्तरायण के मार्ग से मृत्यु को उपलब्ध होता है, उसकी पुनःवापसी नहीं होती है। इस संबंध में कल हमने बात की।

गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-098



गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-098   
  
अध्याय ८
नौवां प्रवचन
जीवन ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन--उत्तरायण पथ

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।। २३।।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः।। २४।।
और हे अर्जुन, जिस काल में शरीर त्यागकर गए हुए योगीजन, पीछे न आने वाली गति को और पीछे आने वाली गति को भी प्राप्त होते हैं, उस काल को अर्थात मार्ग को कहूंगा।
उन दो प्रकार के मार्गों में से जिस मार्ग में अग्नि है, ज्योति है, और दिन है, तथा शुक्ल पक्ष है और उत्तरायण के छः माह हैं, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

कोई ऐसे भी जी सकता है जैसे मरा हुआ रहा हो, और कोई ऐसे भी मर सकता है कि उसकी मृत्यु को हम जीवंत कहें। जीवन भी मृतवत हो सकता है, और मृत्यु भी अति जीवंत।
जिस भांति हम जीते हैं, उसे जीवन नाम-मात्र को ही कहा जा सकता है। न तो जीवन का हमें कोई पता है; न जीवन के रहस्य का द्वार खुलता है; न जीवन के आनंद की वर्षा होती है; न हम यही जान पाते हैं कि हम क्यों जी रहे हैं, किसलिए जी रहे हैं। हमारा होना करीब-करीब न होने के बराबर होता है। कहना उचित नहीं कि हम जीते हैं, यही कहना काफी है कि हम किसी भांति बने रहते हैं, किसी भांति अस्तित्व को ढो लेते हैं, जीवित रहते हुए भी मुर्दे की भांति। लेकिन ऐसा भी होता है कि मरते क्षण में भी कोई इतना जीवंत होता है कि उसकी मृत्यु को भी हम मृत्यु नहीं कहते।

गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-097


गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-097 
   
अध्याय ८
आठवां प्रवचन
अक्षर ब्रह्म
और अंतर्यात्रा

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।। २१।।
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।। २२।।
और जो वह अव्यक्त अक्षर ऐसे कहा गया है उस ही अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परम गति कहते हैं, तथा जिस सनातन अव्यक्त को प्राप्त होकर मनुष्य पीछे नहीं आते हैं, वह मेरा परम धाम है।
और हे पार्थ, जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत हैं और जिस परमात्मा से यह सब जगत परिपूर्ण है, वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त होने योग्य है।

गति संसार का स्वभाव है। ठहरना नहीं और चलते ही रहना, ऐसा संसार का स्वरूप है। यहां कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है; जो ठहरा हुआ मालूम होता है, वह भी ठहरा हुआ नहीं है। जो चलता हुआ मालूम होता है, वह तो चलता हुआ है ही; जो ठहरा हुआ मालूम होता है, वह भी चलता हुआ है। पत्थर ठहरे हुए मालूम पड़ते हैं, मकानों की दीवालें ठहरी हुई मालूम पड़ती हैं, लेकिन अब विज्ञान कहता है, वे सब भी चलती हुई हैं। और यह गति बहुआयामी है, मल्टी-डायमेंशनल है। इसे हम थोड़ा समझें, तो परम गति का हमें खयाल आ सके कि वह क्या है।

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-096



गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-096 
   
अध्याय ८
सातवां प्रवचन
सृष्टि और प्रलय का वर्तुल

अव्यक्तात् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।। १८।।
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे।। १९।।
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।। २०।।
इसलिए काल के तत्व को जानने वाले यह भी जानते हैं कि संपूर्ण दृश्यमात्र भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेशकाल में अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त में ही लय होते हैं।
और हे अर्जुन, वह ही यह भूत समुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति के वश में हुआ रात्रि के प्रवेशकाल में लय होता है और दिन के प्रवेशकाल में फिर उत्पन्न होता है।
परंतु उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा अर्थात विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह पूर्ण ब्रह्म परमात्मा सब भूतों के नष्ट होने पर भी नहीं नष्ट होता है।

गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-095



गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-095  
  
अध्याय ८
छठवां प्रवचन
वासना, समय और दुख
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः।। १५।।
आब्रह्मभुवनालोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।। १६।।
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः।। १७।।
और वे परम सिद्धि को प्राप्त हुए महात्माजन मेरे को प्राप्त होकर, दुख के स्थान आलयरूप क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते हैं।
क्योंकि हे अर्जुन, ब्रह्मलोक से लेकर सब लोक पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं, परंतु हे कुंतीपुत्र, मेरे को प्राप्त होकर उसका पुनर्जन्म नहीं होता है।
और हे अर्जुन, ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसको हजार युग तक अवधि वाला और रात्रि को भी हजार युग तक अवधि वाली, ऐसा जो पुरुष तत्व से जानते हैं, वे योगीजन काल के तत्व को जानने वाले हैं।

पूरब की मनीषा ने दुख का कारण, पश्चिम की मनीषा से बिलकुल ही भिन्न जाना है। शायद धर्म और विज्ञान का वही भेद है। या ऊपर से जीवन की जो खोज करते हैं और भीतर जीवन के गहन तत्व में जो प्रवेश करते हैं, उनकी दृष्टि का वह अंतर है।

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-25



अध्‍याय—25—मां के साथ गुज़ारे वो अनमोल क्षण

      ये कैसी अनहोनी घटना थी। जो मुझे इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। एक तरफ मेरी घायल मां जो मृत्‍यु सैय्या पर पड़ी थी। शायद वह मुझे जीवित देख कर अति प्रसन्‍न थी। और मैं एक तरफ तो उदास था। और एक तरफ मां से मिलने का आनंद भी मुझे महसूस हो रहा था। अब समझ में नहीं आ रहा था किसे पहले मनाऊं। इस जंगल में भी मेरी मां मुझसे हृष्ट पुष्ट थी। मैं उसके पास जाकर बैठ गया। और उसके घावों को चाटनें लगा। जिन से बहकर खून जम कर सूख गया था। जख्‍म बहुत गहरे थे। गर्दन—सर और पीठ पर बुरी तरह से फाड़ रखा था वैसे तो पूरा का पूरा शरीर ही घायल कर रखा था। इन घावों को देख कर मुझे लगा उसके उपर कम से कम दस जानवरों ने एक साथ हमला किया होगा। मेरे इस तरह पास होने से और चाटनें से उसे कितना सुकून मिला ये उसकी आंखों की तृप्ति बता रही थी। वह आंखें बद कर गहरी श्‍वास ले रही थी। मानों मेरे प्रेम और छूआन को आत्‍म सात कर जाना चाहती हो।

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म क्था)-अध्याय-24


अध्‍याय—24—मां से मिलन

      रीर की हष्‍टपुष्‍टता के कारण हमारा मन भी निडर और साहसी हो जाता है। मुझे अपनी ताकत और शरीर की चपलता पर बड़ा नाज हो गया था। या यूं कह सकते है। कि मुझे अपने जीवनी पर बहुत घमंड हो गया था। मैं घर से निकल कर गलियों में साहस और बिना भय के निडर घूमता था। शरीर मेरा पतला और छरहरा जरूर था पर मेरी ताकत मेरी गर्दन के आस पास थी। जब मैं इन गांव के कुत्‍तों को देखता तो मुझे बड़ा अचरज होता था। ये वैसे तो देखने में बहुत हृष्टपुष्ट दिखाई देते है। परंतु इनकी गर्दन शरीर के बनस्‍पत एक दम से पतली होती है। इसी लिए जब भी मैं लड़ता तो न तो ये मुझे पकड़ ही पाते थे। अरे मेरी पकड़ के सामने उनकी बोलती बंद हो जाती थी। तब मैं यही सोचता था मेरी मां जंगली होने के कारण में इन सब से भिन्‍न हूं।
क्योंकि हमें तो शिकार को पकड़ना उसे मारना होता था। तभी अपना पेट भर पाते थे। और ये मुस्टंडा कुछ भी नहीं करते....केवल लात, घुस्‍से और दुतकार के साथ भोजन पाते है। मेरी नस्‍ल कुत्‍तों से अधिक भेडीयों से अधिक मिलती थी। भारत में हिमालय की तराई या गुजरात की पट्टी पर पाये जाने वाले भेड़िया लगभग मेरे ही जैसे होते है।

बुधवार, 1 नवंबर 2017

गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-094




गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-094
    
अध्याय ८
पांचवां प्रवचन
योगयुक्त मरण के सूत्र

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।। १२।।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। १३।।
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।। १४।।
हे अर्जुन, सब इंद्रियों के द्वारों को रोककर अर्थात इंद्रियों को विषयों से हटाकर तथा मन को उद्देश्य में स्थिर करके और अपने प्राण को मस्तक में स्थापन करके योगधारणा में स्थिर हुआ, जो पुरुष ओम, ऐसे इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मेरे को चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है।
और हे अर्जुन, जो पुरुष मेरे में अनन्य चित्त से स्थित हुआ सदा ही निरंतर मेरे को स्मरण करता है, उस निरंतर मेरे में युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूं।

गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-093



गीता दर्शन-(भाग-04)-प्रवचन-093  
   
अध्याय ८
चौथा प्रवचन
भाव और भक्ति

प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।। १०।।
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये।। ११।।
वह भक्तियुक्त पुरुष अंतकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापन करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य स्वरूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है।
और हे अर्जुन, वेद के जानने वाले जिस परम पद को
(अक्षर) ओंकार नाम से कहते हैं और आसक्तिरहित यत्नशील महात्माजन जिसमें प्रवेश करते हैं, तथा जिस परमपद को चाहने वाले ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परमपद को तेरे लिए संक्षेप में कहूंगा।