गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--105
दैवी या आंसुरी
धारा—(अध्याय—9)
प्रवचन—पाँचवाँ (104)
सूत्र:
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवौं प्रकृतिमश्रिता:।
भजज्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।। 13।।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ।। 141।
परंतु हे पार्थ दैवी प्रकृति के आश्रित हुए जो महात्माजन है, वे तो मेरे को अब भूतों का सनतन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूय जानकर अनन्य मन से युक्त हुए निरंतर भजते हैं।
और वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का र्कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए, और मेरे को बारंबार नमस्कार करते हुए, सदा मेरे ध्यान में युक्त हुए अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हैं।
मनुष्य की मूढ़ता के संबंध में थोड़ी बातें और जान लेनी जरूरी हैं। क्योंकि उन्हें जानकर ही हम आज के सूत्र में प्रवेश कर सकेंगे। तीन लक्षण कृष्ण ने मूढ़ता के और कहे हैं, वृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले।
भजज्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।। 13।।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ।। 141।
परंतु हे पार्थ दैवी प्रकृति के आश्रित हुए जो महात्माजन है, वे तो मेरे को अब भूतों का सनतन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूय जानकर अनन्य मन से युक्त हुए निरंतर भजते हैं।
और वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का र्कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए, और मेरे को बारंबार नमस्कार करते हुए, सदा मेरे ध्यान में युक्त हुए अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हैं।
मनुष्य की मूढ़ता के संबंध में थोड़ी बातें और जान लेनी जरूरी हैं। क्योंकि उन्हें जानकर ही हम आज के सूत्र में प्रवेश कर सकेंगे। तीन लक्षण कृष्ण ने मूढ़ता के और कहे हैं, वृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले।




