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बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

गीता दर्शन-(भाग-04) ओशो



गीता दर्शन (भाग—4)

ओशो

(ओशो द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के अध्‍याय आठ अक्षर—ब्रह्म—योग एंव अध्‍याय नौ राजविद्या—राजगुह्म—योग  पर दिए गए चौबीस अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।)

कृष्‍ण ने यह गीता कही—इसलिए नहीं कि कह कर सत्‍य को कहा जा सकता है। कृष्‍ण से बेहतर यह कौन जानेगा कि सत्‍य को कहा नहीं जा सकता है। फिर भी कहा; करूणा से कहा।
सभी बुद्धपुरूषों ने इसलिए नहींबोला है कि बोल कर तुम्‍हें समझाया जा सकता है। बल्‍कि इसलिए बोला है कि बोलकर ही तुम्‍हें प्रतिबिंब दिखाया जा सकता है।
प्रतिबिंब ही सही—चाँद की थोड़ी खबर तो ले आयेगा। शायद प्रति बिंब से प्रेम पेदा हो जाए। और तुम असली की तलाश करनेलगो, असलीकी खोज करने लगो, असली की पूछताछ शुरू कर दो।
ओशो

एक एक कदम-प्रवचन-07

एक एक कदम (विविध)-ओशो

संतति नियमन-प्रवचन-सातवां

मेरे प्रिय आत्मन्,
संतति-नियमन या परिवार नियोजन पर मैं कुछ कहूं, उसके पहले दोत्तीन बातें मैं आपसे कहना चाहूंगा।
पहली बात तो यह कहना चाहूंगा कि आदमी एक ऐसा जानवर है जो इतिहास से कुछ भी सीखता नहीं। इतिहास लिखता है, इतिहास बनाता है, लेकिन इतिहास से कुछ सीखता नहीं है। और यह इसलिए सबसे पहले कहना चाहता हूं कि इतिहास की सारी खोजों ने जो सबसे बड़ी बात प्रमाणित की है, वह यह कि इस पृथ्वी पर बहुत-से प्राणियों की जातियां अपने को बढ़ा कर पूरी तरह नष्ट हो गईं। इस जमीन पर बहुत शक्तिशाली पशुओं का निवास था, लेकिन वे अपने को बढ़ा कर नष्ट हो गए।

एक एक कदम-प्रवचन-06



एक एक कदम (विविध)-ओशो

समाज परिवर्तन के चौराहे पर-प्रवचन-छठवां  

मेरे प्रिय आत्मन् ,
समाज परिवर्तन के चौराहे पर--इस संबंध में थोड़ी-सी बातें कल मैंने आपसे कहीं। आज सबसे पहले यह आपसे कहना चाहूंगा कि समाज बाद में बदलता है, पहले मनुष्य का मन बदल जाता है। और हमारा दुर्भाग्य है कि समाज तो परिवर्तन के करीब पहुंच रहा है, लेकिन हमारा मन बदलने को बिलकुल भी राजी नहीं है। समाज के बदलने का सूत्र ही यही है कि पहले मन बदल जाए, क्योंकि समाज को बदलेगा कौन?
चेतना बदलती है पहले, व्यवस्था बदलती है बाद में। लेकिन हमारी चेतना बदलने को बिलकुल भी तैयार नहीं है। और बड़ा आश्चर्य तो तब होता है कि वे लोग, जो समाज को बदलने के लिए उत्सुक हैं, वे भी चेतना को बदलने के लिए उत्सुक नहीं हैं। शायद उन्हें पता ही नहीं है कि चेतना के बिना बदले समाज कैसे बदलेगा! और अगर चेतना के बिना बदले समाज बदल भी गया तो वह बदलाहट वैसी ही होगी, जैसा आदमी न बदले और सिर्फ वस्त्र बदल जाएं, कपड़े बदल जाएं। वह बदलाहट बहुत ऊपरी होगी और हमारे भीतर प्राणों की धारा पुरानी ही बनी रहेगी।

एक एक कदम-प्रवचन-05



एक एक कदम (विविध)-ओशो

विचार क्रांति की आवश्यकता-प्रवचन-पांचवां
मेरे प्रिय आत्मन् ,
एक आदमी परदेस गया, एक ऐसे देश में जहां की वह भाषा नहीं समझता है और न उसकी भाषा ही दूसरे लोग समझते हैं। उस देश की राजधानी में एक बहुत बड़े महल के सामने खड़े होकर उसने किसी से पूछा, यह भवन किसका है? उस आदमी ने कहा, कैवत्सन। उस आदमी का मतलब था: मैं आपकी भाषा नहीं समझा। लेकिन उस परदेसी ने समझा कि किसी 'कैवत्सन' नाम के आदमी का यह मकान है। उसके मन में बड़ीर् ईष्या पकड़ी उस आदमी के प्रति जिसका नाम कैवत्सन था। इतना बड़ा भवन था, इतना बहुमूल्य भवन था, हजारों नौकर-चाकर आते-जाते थे, सारे भवन पर संगमरमर था! उसके मन में बड़ीर् ईष्या हुई कैवत्सन के प्रति। और कैवत्सन कोई था ही नहीं! उस आदमी ने सिर्फ इतना कहा था कि मैं समझा नहीं कि आप क्या पूछते हैं।

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

एक एक कदम-प्रवचन-04



एक एक कदम (विविध)-ओशो

संगठन और धर्म—प्रवचन-चौथा

सुबह मैंने आपकी बातें सुनीं। उस संबंध में पहली बात तो यह जान लेनी जरूरी है कि धर्म का कोई भी संगठन नहीं होता है; न हो सकता है। और धर्म के कोई भी संगठन बनाने का परिणाम धर्म को नष्ट करना ही होगा। धर्म नितांत वैयक्तिक बात है, एक-एक व्यक्ति के जीवन में घटित होती है; संगठन और भीड़ से उसका कोई भी संबंध नहीं है।
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि और तरह के संगठन नहीं हो सकते हैं। सामाजिक संगठन हो सकते हैं, शैक्षणिक संगठन हो सकते हैं, नैतिक-सांस्कृतिक संगठन हो सकते हैं, राजनैतिक संगठन हो सकते हैं। सिर्फ धार्मिक संगठन नहीं हो सकता है।

एक एक कदम-प्रवचन-03



एक एक कदम (विविध)-ओशो

क्या भारत धार्मिक है?—प्रवचन—तीसरा
एक बहुत पुराने नगर में उतना ही पुराना एक चर्च था। वह चर्च इतना पुराना था कि उस चर्च में भीतर जाने में भी प्रार्थना करने वाले भयभीत होते थे। उसके किसी भी क्षण गिर पड़ने की संभावना थी। आकाश में बादल गरजते थे, तो चर्च के अस्थिपंजर कंप जाते थे। हवाएं चलती थीं, तो लगता था, चर्च अब गिरा, अब गिरा!
ऐसे चर्च में कौन प्रवेश करता, कौन प्रार्थना करता? धीरे-धीरे उपासक आने बंद हो गए। चर्च के संरक्षकों ने कभी दीवार का पलस्तर बदला, कभी खिड़की बदली, कभी द्वार रंगे। लेकिन न द्वार रंगने से, न पलस्तर बदलने से, न कभी यहां ठीक कर देने से, वहां ठीक कर देने से वह चर्च इस योग्य हुआ कि उसे जीवित माना जा सके। वह मुर्दा ही बना रहा। लेकिन जब सारे उपासक आने बंद हो गए, तब चर्च के संरक्षकों को भी सोचना पड़ा, क्या करें?

एक एक कदम-प्रवचन-02



एक एक कदम (विविध)-ओशो

जिज्ञासा साहस और अभीप्सा-प्रवचन-दूसरा  

अभी-अभी आपकी तरफ आने को घर से निकला। सूर्यमुखी के फूलों को सूर्य की ओर मुंह किए हुए देखा और स्मरण आया कि मनुष्य के जीवन का दुख यही है, मनुष्य की सारी पीड़ा, सारा संताप यही है कि वह अपना सूर्य की ओर मुंह नहीं कर पाता है। हम सारे लोग जीवन भर सत्य की ओर पीठ किए हुए खड़े रहते हैं। सूर्य की ओर जो भी पीठ करके खड़ा होगा उसकी खुद की छाया उसका अंधकार बन जाती है। जिसकी पीठ सूर्य की ओर होगी उसकी खुद की छाया उसके सामने पड़ेगी और उसका मार्ग अंधकारपूर्ण हो जाएगा। और जो सूर्य की ओर मुंह कर लेता है उसकी छाया उसके लिए विलीन हो जाती है तथा उसकी आंखें और उसका रास्ता आलोकित हो जाता है।

एक एक कदम-प्रवचन-01



एक एक कदम-ओशो
(विविध)
प्रवचन-पहला

कोई दो सौ वर्ष पहले, जापान में दो राज्यों में युद्ध छिड़ गया था। छोटा जो राज्य था, भयभीत था; हार जाना उसका निश्चित था। उसके पास सैनिकों की संख्या कम थी। थोड़ी कम नहीं थी, बहुत कम थी। दुश्मन के पास दस सैनिक थे, तो उसके पास एक सैनिक था। उस राज्य के सेनापतियों ने युद्ध पर जाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह तो सीधी मूढ़ता होगी; हम अपने आदमियों को व्यर्थ ही कटवाने ले जाएं। हार तो निश्चित है। और जब सेनापतियों ने इनकार कर दिया युद्ध पर जाने से...उन्होंने कहा कि यह हार निश्चित है, तो हम अपना मुंह पराजय की कालिख से पोतने जाने को तैयार नहीं; और अपने सैनिकों को भी व्यर्थ कटवाने के लिए हमारी मर्जी नहीं। मरने की बजाय हार जाना उचित है। मर कर भी हारना है, जीत की तो कोई संभावना मानी नहीं जा सकती।

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-079



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-079     
अध्याय ६
इक्कीसवां प्रवचन
श्रद्धावान योगी श्रेष्ठ है

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।। ४६।।
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, तथा सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इससे हे अर्जुन, तू योगी हो।

तपस्वियों से भी श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञाताओं से भी श्रेष्ठ है, सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है, ऐसा योगी अर्जुन बने, ऐसा कृष्ण का आदेश है। तीन से श्रेष्ठ कहा है और चौथा बनने का आदेश दिया है। तीनों बातों को थोड़ा-थोड़ा देख लेना जरूरी है।
तपस्वियों से श्रेष्ठ कहा योगी को। साधारणतः कठिनाई मालूम पड़ेगी। तपस्वी से योगी श्रेष्ठ? दिखाई तो ऐसा ही पड़ता है साधारणतः कि तपस्वी श्रेष्ठ मालूम पड़ता है, क्योंकि तपश्चर्या प्रकट चीज है और योग अप्रकट। तपश्चर्या दिखाई पड़ती है और योग दिखाई नहीं पड़ता है। योग है अंतर्साधना, और तपश्चर्या है बहिर्साधना।

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-078



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-078 
   
अध्याय ६
बीसवां प्रवचन
आंतरिक संपदा

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।। ४३।।
और वह पुरुष वहां उस पहले शरीर में साधन किए हुए बुद्धि के संयोग को अर्थात समत्वबुद्धि योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है। और हे कुरुनंदन, उसके प्रभाव से फिर अच्छी प्रकार भगवत्प्राप्ति के निमित्त यत्न करता है।

जीवन में कोई भी प्रयास खोता नहीं है। जीवन समस्त प्रयासों का जोड़ है, जो हमने कभी भी किए हैं। समय के अंतराल से अंतर नहीं पड़ता है। प्रत्येक किया हुआ कर्म, प्रत्येक किया हुआ विचार, हमारे प्राणों का हिस्सा बन जाता है। हम जब कुछ सोचते हैं, तभी रूपांतरित हो जाते हैं; जब कुछ करते हैं, तभी रूपांतरित हो जाते हैं। वह रूपांतरण हमारे साथ चलता है।

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-077



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-077  
  
अध्याय ६
उन्नीसवां प्रवचन
यह किनारा छोड़ें

श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति।। ४०।।
हे पार्थ, उस पुरुष का न तो इस लोक में और न परलोक में ही नाश होता है, क्योंकि हे प्यारे, कोई भी शुभ कर्म करने वाला अर्थात भगवत-अर्थ कर्म करने वाला, दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है।

अर्जुन ने पूछा है कृष्ण से कि यदि न पहुंच पाऊं उस परलोक तक, उस प्रभु तक, जिसकी ओर तुमने इशारा किया है, और छूट जाए यह संसार भी मेरा; साधना न कर पाऊं पूरी, मन न हो पाए थिर, संयम न सध पाए, और छूट जाए यह संसार भी मेरा; तो कहीं ऐसा तो न होगा कि मैं इसे भी खो दूं और उसे भी खो दूं! तो कृष्ण उसे उत्तर में कह रहे हैं; बहुत कीमती दो बातें इस उत्तर में उन्होंने कही हैं।

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-076



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-076  
 
अध्याय ६
अठारहवां प्रवचन
तंत्र और योग

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।। ३६।।
मन को वश में न करने वाले पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है अर्थात प्राप्त होना कठिन है और स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन करने से प्राप्त होना सहज है, यह मेरा मत है।

कृष्ण ने दोत्तीन बातें इस सूत्र में कही हैं, जो समझने जैसी हैं।
एक, मन को वश में न करने वाले पुरुष द्वारा योग की उपलब्धि अति कठिन है; असंभव नहीं कहा। बहुत मुश्किल है; असंभव नहीं कहा। नहीं ही होगी, ऐसा नहीं कहा। होनी अति कठिन है, ऐसा कहा है। तो एक तो इस बात को समझ लेना जरूरी है।
दूसरी बात कृष्ण ने कही, मन को वश में कर लेने वाले के लिए सरल है, सहज है उपलब्धि योग की।

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-075



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-075   

अध्याय ६
सत्रहवां प्रवचन
वैराग्य और अभ्यास

प्रश्न: भगवान श्री, सुबह के श्लोक में चंचल मन को शांत करने के लिए अभ्यास और वैराग्य पर गहन चर्चा चल रही थी, लेकिन समय आखिरी हो गया था, इसलिए पूरी बात नहीं हो सकी। तो कृपया अभ्यास और वैराग्य से कृष्ण क्या गहन अर्थ लेते हैं, इसकी व्याख्या करने की कृपा करें।

राग है संसार की यात्रा का मार्ग, संसार में यात्रा का मार्ग। वैराग्य है संसार की तरफ पीठ करके स्वयं के घर की ओर वापसी। राग यदि सुबह है, जब पक्षी घोंसलों को छोड़कर बाहर की यात्रा पर निकल जाते हैं, तो वैराग्य सांझ है, जब पक्षी अपने नीड़ में वापस लौट आते हैं।
वैराग्य को पहले समझ लें, क्योंकि जिसे वैराग्य नहीं, वह अभ्यास में नहीं जाएगा। वैराग्य होगा, तो ही अभ्यास होगा। वैराग्य होगा, तो हम विधि खोजेंगे--मार्ग, पद्धति, राह, टेक्नीक--कि कैसे हम स्वयं के घर वापस पहुंच जाएं? कैसे हम लौट सकें? जिससे हम बिछुड़ गए, उससे हम कैसे मिल सकें?

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-073



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-073    

अध्याय ६
पंद्रहवां प्रवचन
सर्व भूतों में प्रभु का स्मरण

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।। ३१।।
इस प्रकार जो पुरुष एकीभाव में स्थित हुआ संपूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानंदघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बर्तता हुआ भी मेरे में बर्तता है।

कृष्ण इस सूत्र में अर्जुन को सब भूतों में प्रभु को भजने के संबंध में कुछ कह रहे हैं। भजन का एक अर्थ तो हम जानते हैं, एकांत में बैठकर प्रभु के चरणों में समर्पित गीत; एकांत में बैठकर प्रभु के नाम का स्मरण; या मंदिर में प्रतिमा के समक्ष भावपूर्ण निवेदन। लेकिन कृष्ण एक और ही रूप का, और ज्यादा गहरे रूप का, और ज्यादा व्यापक आयाम का सूचन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति समस्त भूतों में मुझ सच्चिदानंद को भजता है! क्या होगा इसका अर्थ?

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-072



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-072  
 
अध्याय ६
चौदहवां प्रवचन
अहंकार खोने के दो ढंग

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।। २९।।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।। ३०।।
और हे अर्जुन, सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त हुए आत्मा वाला तथा सबमें समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को संपूर्ण भूतों में बर्फ में जल के सदृश व्यापक देखता है और संपूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है।
और जो पुरुष संपूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और संपूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अंतर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता हूं और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता है।

परमात्मा अदृश्य है, ऐसी हमारी मान्यता है। लेकिन यह मान्यता बड़ी भूल भरी है। परमात्मा अदृश्य नहीं है, हम ही अंधे हैं; खोजेंगे, तो ऐसा पाएंगे। अंधा अगर कहे कि प्रकाश अदृश्य है, तो जो अर्थ होगा, वही अर्थ हमारे कहने का होता है कि परमात्मा अदृश्य है।

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-071



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-071   
अध्याय ६
तेरहवां प्रवचन
पदार्थ से प्रतिक्रमण--परमात्मा पर

युग्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।। २८।।
और वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्तिरूप अनंत आनंद को अनुभव करता है।

पाप से रहित हुआ व्यक्तित्व आत्मा को सदा परमात्मा में लगाता हुआ परम आनंद को उपलब्ध होता है।
पाप से रहित हुआ पुरुष ही आत्मा को परमात्मा की ओर सतत लगा सकता है। पाप से रहित हुआ जो नहीं है, पाप में जो संलग्न है, वह आत्मा को सतत रूप से पदार्थ में लगाए रखता है।
अगर पाप की हम ऐसी व्याख्या करें, तो भी ठीक होगा, आत्मा को पदार्थ में लगाए रखना पाप है। आत्मा को पदार्थ में लगाए रखना पाप है और आत्मा को परमात्मा में लगाए रखना पुण्य है। पाप का फल दुख है, पुण्य का फल आनंद है।

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-070



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-070  

अध्याय ६
बारहवां प्रवचन
मन साधन बन जाए

यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।। २६।।
परंतु जिसका मन वश में नहीं हुआ हो, उसको चाहिए कि यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस-जिस कारण से सांसारिक पदार्थों में विचरता है, उसे उससे रोककर बारंबार परमात्मा में ही निरोध करे।

मन चंचल है। वही उसकी उपयोगिता भी है, वही उसका खतरा भी। मन चंचल होगा ही, क्योंकि मन का प्रयोजन ही ऐसा है कि उसे चंचल होना पड़े। मन की चंचलता ठीक वैसी है, जैसे कि हवा का रुख देखने के लिए कोई घर के ऊपर पक्षी का पंख लगा दे। अगर पंख चंचल न हो, तो हवा का रुख न बता पाए। हवा जिस तरफ बहे, पंख को उसी तरफ घूम जाना चाहिए, तो ही वह खबर दे पाएगा कि हवा का रुख क्या है।
मन, मनुष्य के व्यक्तित्व में चारों तरफ जो अंतर हो रहे हैं, उनकी खबर देने का यंत्र है। इसलिए वह चंचल होगा ही। चंचल होगा, तो ही अर्थपूर्ण है, अन्यथा उसका कोई अर्थ नहीं है। आपके बाहर सर्दी बदलकर गर्मी हो गई है। मन अगर खबर न दे, तो जीवन असंभव है।

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-069



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-069

अध्याय ६
ग्यारहवां प्रवचन
दुखों में अचलायमान

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।। २२।।
और परमेश्वर की प्राप्तिरूप जिस लाभ को प्राप्त होकर, उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता है, और भगवत्प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी बड़े भारी दुख से भी चलायमान नहीं होता है।

प्रभु को पाने की कामना पूरी हो जाए, तो फिर और कोई कामना पूरी करने को शेष नहीं रह जाती है। प्रभु में प्रतिष्ठा मिल जाए, तो फिर किसी और प्रतिष्ठा का कोई प्रश्न नहीं है। मिल जाए प्रभु, तो फिर न मिलने को कुछ बचता है, न पाने को कुछ बचता है।
कृष्ण इस सूत्र में कहते हैं कि जिसने प्रभु को उपलब्ध करने का लाभ पा लिया, उसे परम लाभ मिल गया। वैसा परम लाभ को उपलब्ध व्यक्ति, महान से महान दुख से अविचलित गुजर जाता है।
इसे थोड़ा समझें। असल में हम दुख से विचलित ही इसीलिए होते हैं कि हमें आनंद का कोई अनुभव नहीं है।

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-068



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-068

अध्याय ६
दसवां प्रवचन
चित्त वृत्ति निरोध

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।। २०।।
और हे अर्जुन, जिस अवस्था में योग के अभ्यास से निरुद्ध हुआ चित्त उपराम हो जाता है और जिस अवस्था में परमेश्वर के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ सच्चिदानंदघन परमात्मा में ही संतुष्ट होता है।

योग से उपराम हुआ चित्त!
इस सूत्र में, कैसे योग से चित्त उपराम हो जाता है और जब चित्त उपराम को उपलब्ध होता है, तो प्रभु में कैसी प्रतिष्ठा होती है, उसकी बात कही गई है।
चित्त के संबंध में दोत्तीन बातें स्मरणीय हैं।
एक, चित्त तब तक उपराम नहीं होता, जब तक चित्त का विषयों की ओर दौड़ना सुखद है, ऐसी भ्रांति हमें बनी रहती है। तब तक चित्त उपराम, तब तक चित्त विश्रांति को नहीं पहुंच सकता है। जब तक हमें यह खयाल बना हुआ है कि विषयों की ओर दौड़ता हुआ चित्त सुखद प्रतीतियों में ले जाएगा, तब तक स्वाभाविक है कि चित्त दौड़ता रहे।

गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-067



गीता दर्शन-(भाग-03)-प्रवचन-067

अध्याय ६
नौवां प्रवचन
योग का अंतर्विज्ञान

प्रश्न: भगवान श्री, योग के अभ्यास और उसकी आवश्यकता पर बात चल रही थी। आपने समझाया था कि धर्म और आत्मा तो हमारा स्वभाव ही है। उसे उपलब्ध नहीं करना है, वह मिला ही हुआ है। लेकिन योग का अभ्यास अशुद्धि को काटने के लिए करना पड़ता है। कृपया योगाभ्यास से अशुद्धि कैसे कटती है, इस पर कुछ कहें।

स्वभाव कहते हैं उसे, जो हमें मिला ही हुआ है। जिसे हम चाहें तो भी खो नहीं सकते। जिसे खोने का कोई उपाय नहीं है। स्वभाव का अर्थ है, जो मेरा होना ही है, जो हमारा अस्तित्व ही है।
जो जानते हैं, वे कहते हैं कि हमारा स्वभाव स्वयं परमात्मा होना है। ऐसा कोई एक नहीं कहता; इस पृथ्वी पर कोने-कोने में, अलग-अलग सदियों में, अलग-अलग स्थानों पर जब भी किसी ने जाना है, उसने यही कहा है। यह निरपवाद घोषणा है। ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं हुआ है मनुष्य के इतिहास में जिसने कहा हो कि मैंने जान लिया भीतर जाकर और मनुष्य के भीतर परमात्मा नहीं है।