दिनांक 25 नवंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूूूत्र::
आचक्ष्व श्रृणु वा तात नानाशास्त्रोण्यनेकश:।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद्वते।। 146।।
भोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते।
चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति।। 147।।
आयासत्सकलो दु:खी नैनं जानाति कश्चन।
अनेनैवोयदेशेन धन्य: प्राम्मोति निर्वृतिम्।। 148।।
व्यापारेखिद्यते यस्तु निमेषोत्मेषयोरपि।
तस्यालस्यधुरीणस्थ सुख नान्यस्य कस्यचित्।। 149।।
हदं कृतमिदं नेति द्वंद्वैर्मुक्तं यदा मन:।
धर्मार्श्रकाममोक्षेषु निरयेक्ष तदा भवेत।। 150।!
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलय।
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान्। 151।।
