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गुरुवार, 16 मार्च 2017

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)-प्रवचन-10

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)-प्रवचन-10

जिज्ञासा-पूर्ति:पांच
प्रवचन दसवां ,
दिनांक २०.७.१९७५, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1— दादू और कबीर जिस गुरु-महिमा की चर्चा करते हैं, उसे हम आप में पा लिए हैं।
2— सदगुरु भी मिल गए, फिर भी अगला कदम अस्पष्ट क्यों है?
3— जिस शोले को आपने मेरे भीतर से कुरेदकर जला दिया....
4— भय से किया गया समर्पण निर्भयता को कैसे उपलब्ध होगा?
5— प्रवचन के समय आपकी कोई कोई ध्वनि सुनकर मैं कांप जाता हूं, डर जाता हूं।
6— अभी हम हैं आपके सामने, वह क्या एक लंबा सपना है?

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)-प्रवचन-09

पिव पिव  लागी  प्‍यास-(दादू दयाल)


मन चित चातक ज्यूं रटै
 प्रवचन नौवां :
दिनांक १९.७.१९७५, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सारसूत्र-
 भगवान श्री, सदगुरु दादू के वचन हैं--

मन चित चातक ज्यूं रटै, पिव पिव लागी प्यास।
दादू दरसन कारने पुरवहु मेरी आस।।
विरहित दुख कासनि कहै, कासनि देह संदेस।
पंथ निहारत पीव का, विरहिन पलटे केस।।
ना वहु मिलै न मैं सुखी कहु क्यूं जीवन होइ।
जिन मुझको घायल किया मेरी दारू सोइ।।
कर बिन सर बिन कमान बिना सा मरै खेंचि कसीस।
बागी चोट सरीर में रख सिख सालै सीस।।
विरह जगावे दरद को दरद जगावै जी।
जीव जगावै सुरति को पंच पुकारै पीव।

बुधवार, 15 मार्च 2017

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)-प्रवचन-08

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)

जिज्ञासा-पूर्ति: चार

प्रवचन: आठवां,
दिनांक १८. ७. १९७५, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1—प्रवचन कर रहे होते हैं, उस समय यदि आपका मुख निरखता हूं,तो शब्द सुनाई नहीं देते
2—महानिर्वाण को उपलब्ध हो जाने के बाद भी, ज्ञानी प्रकार हमारी सहायता करते हैं?
3— जन्मों-जन्मों से हमने दुख का अनुभव जाना है। लेकिन हमारी भूल नहीं दिख पाती?
4— क्या बुद्धपुरुष के होते हुए साधक को अपना स्वयं का समाधान खोजना अनिवार्य है?
5— ध्यान करते समय एक ओर शांति और आनंद का अनुभव होता है।
6— मुझे तो बड़े प्रयास, अभ्यास और श्रम से गुजरना पड़ रहा है, क्यों?
7— लेकिन जिस लौ के लगाम की बात संत कहते हैं, दादू कहते हैं, वह कहां उपलब्ध है?

मंगलवार, 14 मार्च 2017

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)--प्रवचन-07

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)


ल्यौ लागी तब जाणिये
प्रवचन—सातवां ,
दिनांक १७.७.१९७५, प्रातःकाल
श्री रजनीश आश्रम, पूना,
सारसूत्र:

भगवान श्री, संत श्रेष्ठ दादूदयालजी की वाणी हैं--

जोग समाधि सुख सुरति, सों, सहजै सहजै आव।
मुक्ता द्वारा महल का, इहै भगति का भाव।।
ल्यौ लागी तब जाणिए, जेवा कबहूं छूटि न जाइ।
जीवन यौं लागी रहे मूवा मंझि समाइ।।
मन ताजी चेतन चेढै, ल्यौ की करे लगान।
सबद गुरु का ताजना, कोई पहुंचे साधु सुजान।।
आदि अंत मध एक रस, टूटे नहिं धागा।
दादू एकै रहि गया, जब जाणै जागा।
अर्थ अनूपम आप है, और अनरथ भाई।
दादू ऐसी जानि करि, तासौं ल्यो लाई।।

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)--प्रवचन-06

पिव पिव लागी प्‍यास—(दादू दयाल)


जिज्ञासा-पूर्ति: तीन –(प्रवचन—छट्ठवां)  
दिनांक १६.७.१९७५, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1— क्या भय नकारात्मक होते हुए भी सोए को जगाने या होश को बढ़ाने में सहायक है?
2— क्या एक कवि काव्य-सर्जना के साथ-साथ ध्यान की साधना भी आवश्यक है?
3—धैर्य भी असीम हो; क्या ये दोनों स्थितियां असंगत नहीं हैं?
4— सब मन के रोग प्रेम की कमी से पैदा होते हैं।
5— नचिकेता की तरह जीवन के द्वार पर दृढ़ होकर बैठ जाना है।

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)--प्रवचन-05


पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)
सबदै ही सब उपजै

प्रवचन—पांचवां  
दिनांक १५. ७. १९७५, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र-

भगवान श्री, संत श्रेष्ठ दादू की कुछ साखियां हैं--

सबद बंध्या सब रहै, सबदै सब ही जाए।
सबदै ही सब उपजै, सबदै सबै समाय।।
दादू सबदै ही सचु पाइये, सबदै ही संतोष।
सबदै ही स्थिर भया, सबदै ही भागा सोक।।
दादू सबदै ही मुक्ता भया, सबदै समझै प्राण।
सबदै ही सूझै सबै, सबदै सुरझै जाण।।
पहली किया आप थैं उतपत्ती ओंकार।
ओंकार थैं उपजैं, पंच तत्त आकार।।
दादू सब बाण गुरु साध के, दूरि दिसंतर जाइ।
जेहि लागै सो ऊबरै, सूते लिए जगाइ।।
सबद सरोवर सूभर भरया, हरिजल निर्मल नीर।
दादू पीधै प्रीति सौं, तिनकै अखिल सरीर।।

पिव पिव लागी प्‍यास—(दादू दयाल)-प्रवचन-04

पिव पिव लागी प्‍यास—(दादू दयाल)


जिज्ञासा-पूर्ति: दो  --प्रवचन—चौथा
दिनांक १४. ७. १९७५,
प्रातःकाल श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1— आप बार-बार गुरु की महिमा बतलाकर क्या हमें पंगु नहीं बना रहे हैं?
2— जीवन-ऊर्जा के शीघ्र से शीघ्र रूपांतरण के लिए कौन सी ध्यान की विधि उपयोगी होगी?
3— ध्यान का फल आत्म-दर्शन है क्या? और श्रद्धा को कैसे उपलब्ध हुआ जाए?
4— सक्रिय ध्यान में अंतिम चरण में एक शांति किंतु उदासी सी घेर लेती है?
5— आपने अनेक बार कहा है कि सदगुरु शिष्य को पास भी बुलाता है, फिर दूर भी करता है।
6आने वाला युग आपको कृष्ण से भी ऊपर रखेगा। क्या इस पर आप कुछ प्रकाश डालेंगे?
7— दूसरों के सामने: विशेषकर प्रियजनों के सामने, उसे प्रतिपादित करने की इतनी आतुरता मुझमें क्यों है?
8— आपने पहले कहा, कि मेरा सारा बोलना मात्र बहाना है। फिर आपका होना क्या है?

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)-प्रवचन-03

पिव पिव लागी प्‍यास-(संत दादू दयाल)


राम नाम निज औषधि
प्रवचन-तीसरा
दिनांक १३. ७. १९७५ प्रातःकाल श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:

संत शिरोमणि दादू की कुछ साखियां इस प्रकार हैं:

मेरा संसा को नहीं, जीवन मरन का राम।।
सुपनैं ही जनि वीसरैं--मुख हिरदै हरि नाम।।

हरि भजि साफल जीवना, पर उपगार समाई।
दादू मरण तहं भला, जहं पसु-पंखी खाइ।।

राम-नाम निज औषधि, काटै कोटि विकार।
विषम व्याधिजे ऊबरै, काया-कंचन सार।।

कौन पटंतर दीजिए, दूजा नाहीं कोइ।
राम सरीखा राम है, सुमरियां ही सुख होइ।।

नांव लिया तब जानिए, जे तन-मन रहे समाइ।
आदि, अंत, मध, एक रस, कबहूं भूलि न जाइ।।

सोमवार, 13 मार्च 2017

पिव पिव लागी प्‍यास—(दादू दयाल)-प्रवचन-02

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)

जिज्ञासा-पूर्ति: एक-( प्रवचन--दूसरा)  
दिनांक १२.७.१९७५, प्रातः काल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1--सदगुरु मिल गए। साधक को इसकी प्रत्यभिज्ञा, पहचान कैसे हो?
2--मोक्ष के पश्चात कभी जन्म नहीं होता, इसकी क्या गारंटी है?
3-- असदगुरु के इर्द-गिर्द अनुयायियों की भीड़ इकट्ठी हो जाती है?
4--मैं ध्यान से भयभीत हूं। कृपया समझाएं,
5--आपने कहा कि जगत और जीवन अतिशय रहस्य से भरा है।

पिव पिव लागी प्‍यास—(दादू दयाल)-प्रवचन-01

पिव—पिव लागी प्‍यास—(दादू दयाल)


गैब मांहि गुरुदेव मिल्या—(प्रवचन—पहला)
दिनांक 11 जूलाई सन् 1975, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम पूना।

(श्री चरणों में हम अपने प्रेम और प्रणाम निवेदित करते हैं। संत श्रेष्ठ दादू के कुछ पद हैं यहां)

(दादू) गैब मांहि गुरुदेव मिल्या पाया हम परसाद।
मस्तक मेरे कर धरया देखा अगम अगाध।।

(दादू) सत्गुरु यूं सहजै मिला लीया कंठि लगाई।
दाया भली दयाल की, तब दीपक दिया जगाई।।

(दादू) सत्गुरु मारे सबद सों निरखि निरखि निज ठौर।
राम अकेला रहि गया, चीत न आवे और।।

सबद दूध घृत राम रस कोइ साध विलोवण हार।
दादू अमृत काढिलै गुरुमुख गहै विचार।।