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बुधवार, 14 मार्च 2018

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-50

 निकलंक-- दीवाना था मेेेेरा 

      यह अच्‍छा है कि मैं देख नहीं सकता.....पर मुझे पता है कि क्‍या हो रहा है। पर मैं क्‍या कर सकता हूं—तुम्‍हें तुम्‍हारी टेकनालॉजी के हिसाब से चलना होगा। और मेरे जैसे आदमी के साथ स्‍वभावत: तूम बड़ी मुश्‍किल में हो। मैं बंधा हूं और तुम्‍हारी कोई मदद नहीं कर सकता।
      आशु, क्‍या तुम कुछ कर सकती हो? तुम्‍हारी थोड़ी सी हंसी उसे शांत रखने में मदद करेगी। वह बहुत अजीब बात है कि जब कोई और हंसने लगता है तो पहला आदमी रूक जाता है। उनको नहीं, पर मुझे कारण साफ है। जो हंस रहा होता है वह तुरंत सोचता है कि वह कुछ गलत कर रहा है। और तुरंत गंभीर हो जाता है।
      जब तुम देखो कि देव गीत रास्‍ते से थोड़ भटक रहा है तो हंसों, हरा दो उसे। वह नारी मुक्‍ति का सवाल है। और अगर तुम अच्‍छी हंसी हंसों तो वह तुरंत अपने नोट लेना शुरू कर देगा। तुमने अभी शुरू भी नहीं किया और वह अपने होश में आ गया।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-49

नीम का पेड़ और भूत

      च्‍छा, मैं उस आदमी को याद करने की कोशिश कर रहा था। मुझे उसका चेहरा तो दिखाई दे रहा है। किंतु शायद मैंने उसका नाम जानने की कभी कोशिश नहीं की। इसलिए मुझे वह याद नहीं है। मैं तुम्‍हें वह सारी कहानी सुनाता हूं।
      जब मेरी नानी ने देखा कि मुझे स्‍कूल भेजने से कोई फायदा नहीं । मैं पढ़ता-वढ़ाता नहीं हूं, केवल शैतानी ही करता हूं तो उन्‍होने मेरे माता-पिता को यह समझाने की कोशिश की कि वह लड़का दूसरे लड़कों के लिए एक मुसीबत बन गया है। लेकिन कोई उनकी बात सुनने को तैयार ही न था। यह उस समय की बात है जब मैंने हाईस्‍कूल में प्रवेश किया था। उन्‍होंने कहा: यह रोज कोई न कोई शरारत करता है। यह स्‍कूल भी कभी-कभी जाता है, रोज नहीं। इस प्रकार यह क्‍या सीखेगा। शिक्षा प्राप्‍त करने के लिए इसके पास समय ही नहीं है। क्‍योंकि यह सदा अपने लिए और दूसरों के लिए कोई न कोई मुसीबत खड़ी कर देता है।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-48

महर्षि महेश योगी यों सबसे अधिक चालाक

      मैं तुम लोगों को यह बता रहा था कि मैं स्‍कूल नियमित रूप से हाजिरी लगाने नहीं जाता था। मैं तो वहां कभी-कभी जाता था। और वह भी उस समय जब मुझे कोई शैतानी सूझती,शरारत और शैतानी करने में मुझे बड़ा मजा आता था और एक प्रकार से यही आरंभ था मेरे शेष जीवन के ढंग का।
      मैंने कभी कुछ गंभीरता से नहीं लिया। अभी भी ऐसा ही हूं। अगर मुझे छूट दी जाए तो मैं तो अपनी मृत्‍यु पर भी खूब हंसूगा। परंतु भारत में पिछले पच्‍चीस वर्ष तक मुझे गंभीर आदमी का पार्ट अदा करना पडा—यह अभिनय कुछ लंबा ही चला। थोड़ा मुश्‍किल था किंतु मैंने यह अभिनय इस प्रकार किया कि मैं तो गंभीर बना रहा परंतु मैंने अपने आस पास के लोगों को गंभीर नहीं होने दिया। इसी से मैंने अपने आपको बचा लिया। अन्‍यथा ये गंभीर लोग तो ज़हरीले साँपों से भी अधिक ज़हरीले होते है।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-47

 स्‍कूल का हाथी फाटक और शरारते

    मैं अपने प्राइमरी स्‍कूल की बात कर रहा था। मैं वहां कभी-कभार ही जाता था। मेरे न जाने से स्‍कूल के सब लोगों को बडी राहत मिलती थी और मैं भी उन्‍हें तकलीफ देना नहीं चाहता था। मैं तो उनको शत-प्रतिशत राहत देना चाहता था। क्‍योंकि मुझे भी उनमें बहुत प्रेम था—मेरा मतलब है लोगों से, वहां के अध्‍यापकों से,अन्‍य नौकरों से तथा मालियों से। कभी-कभी मैं उनसे मिलना चाहता था, खासकर जब तब मैं उनको को विशेष चीज दिखाना चाहता तो मैं वहां चला जाता। एक छोटा बच्‍चा चाहता है कि वह अपनी खास चीजें अपने प्रियजनों को दिखाए। किंतु ये चीजें खतरनाक भी होती थीं। अभी भी मुझे यह याद करके बहुत हंसी आती है।
      उस दिन की याद मेरे मन में बिलकुल ताजा है। वह याद इस क्षण की ही प्रतीक्षा कर रही थी। शायद अब वह क्षण आ गया है जब दूसरों के साथ इस अनुभव के मजे को बांटा जा सकता है। यह घटनाओं का एक शृंखला है....

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-46

सत्‍य साईं बाबा तो अति साधारण जादूगर

      ठीक है। मैं प्राइमरी स्‍कूल के दूसरे दिन से शुरूआत करता हूं। कितनी देर वह घटना इंतजार कर सकती है। पहले ही बहुत इंतजार कर चुकी है। सच मैं स्‍कूल में मेरा प्रवेश दूसरे दिन हुआ। क्‍योंकि काने मास्‍टर को निकाल दिया गया था। इसलिए सब लोग खुशी मना रहे थे। सब बच्‍चे खुशी से नाच रहे थे। मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था। किंतु उन्‍होंने मुझे बताया तुम्‍हें काने मास्‍टर के बारे में मालूम नहीं है। अगर वह मर जाए तो हम सारे शहर में मिठाई बांटें गे और अपने घरों में दिए जलाएंगे।
      और मेरा इस प्रकार स्‍वगत हुआ जैसे कि मैंने कोई महान कार्य किया हो। सच तो यह है कि मुझे काने मास्‍टर के लिए थोड़ी सहानुभूति भी हो रही थी। वह कितना ही बुरा था, हिंसक था किंतु था तो मनुष्‍य ही। और मनुष्‍य की सारी कमज़ोरियाँ स्‍वभाविक है। यह उसकी गलती ने थी कि उसकी एक आँख थी और चेहरा भी बहुत कुरूप था। और मैं जो कहना चाहता हूं।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-45

महात्‍मा गांधी से भेट
     

     .के.। सारी दुनिया स्‍तब्‍ध रह गई जब जवाहर लाल नेहरू रेडियो पर महात्‍मा गांधी की मृत्‍यु की सूचना देते समय एकाएक रो पेड। यह तैयार किया गया भाषण नहीं था। वे अपने ह्रदय से बोल रहे थे। और अगर अचानक  उनके आंसू उमड़ पड़े तो वे क्‍या करतेऔर अगर कुछ क्षणों के लिए उन्‍हें रूकना पडा तो इसमें उनका कोई कसूर नहीं था। यह तो उनकी महानता थी। अन्‍य कोई मूढ़ राजनीतिज्ञ अगर चाहता भी तो ऐसा नहीं कर सकता था। क्‍योंकि उनके सैक्रेटरी को अपने तैयार किया गए भाषण में यक भी लिखना पड़ता कि अब रोना शुरू कीजिए और रोते-रोते थोड़ा रुकिए ताकि लोग समझें कि यह रोना सच्‍चा है जवाहरलाल ऐसे किसी भाषण को पढ़ नहीं रहे थे। सच तो यह है कि उनके सैक्रेटरी बहुत चिंतित थे। कई बरसों बाद उनका एक सैक्रेटरी संन्‍यासी बन गया था। उसने यह बताया कि हम लोगों ने एक भाषण तैयार किया था परंतु उन्‍होंने उसको हमारे मुहँ पर फेंकते हुए कहा: बेवक़ूफ़ों, क्‍या तुम समझते हो कि मैं तुम्‍हारा लिखा हुआ भाषण पढ़ूंगा।
      मैं तुरंत पहचान गया कि जवाहरलाल उन थोड़े से व्‍यक्‍तियों में से एक है जो अति संवेदनशील होते हुए भी दूसरों की सहायता के लिए अपने पद का उपयोग करते है। ये दूसरों की सेवा करते है। ये जनता का शोषण नहीं करते।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-44

मस्‍तो की भविष्‍य वाणी—मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बनेगा

      कल मुझे अचरज हो रहा था कि परमात्‍मा ने इस दुनियां को छह दिनों में कैसे बना लिया। मुझे अचरज इस लिए हो रहा था, क्‍योंकि मैं तो अभी प्राइमरी स्‍कूल के दूसरे दिन पर ही अटका हुआ हूं, दूसरे दिन के पार भी जा सका। और उसने यह कैसी दुनिया बनाई है। शायद यह यहूदी था, क्‍योंकि यहूदियों ने ही इस विचार को फैलाया है।
      हिंदू एक परमात्‍मा में नहीं वरन अनेक परमात्मा में विश्‍वास करते है। सच तो यह है कि पहले जब उनको यह विचार सुझा तो उन्‍होंने उतने ही देवताओं की  गणना की जतनी उस समय भारतीयों की जनसंख्‍या थी। उस समय भी उनकी संख्‍या कम नहीं थी। तैंतीस करोड़ थी। हिंदुओं के मतानुसार प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को अपना एक परमात्‍मा होना चाहिए। वे तानाशाह नहीं थे। वे प्रजातांत्रिक थे—पहले के हिंदू तो बहुत अधिक प्रजातांत्रिक थे।
      हजारों साल पहले उन्‍होंने एक ऐसे अलौकिक संसार की कल्‍पना की थी जिसमें उतने ही जीवित लोग थे जितने इस पृथ्‍वी पर। बहुत बड़ा काम किया था उन्‍होंने। तैंतीस करोड़ देवताओं की गणना करना आसान नहीं है। और तुम्‍हें हिंदू देवताओं के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है। वे बिलकुल वैसे है जैसे मनुष्‍य हो सकते है—बहुत चालाक,कमीने, राजनीतिज्ञ,हर प्रकार के शोषण करने बाले। परंतु किसी ने किसी प्रकार किसी ने जनगणना कर ही ली।  

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-43

मृत्‍यु के बाद भी मैं उपल्‍बध रहूंगा

      ओके.। मुझे हमेशा इत बात पर आश्‍चर्य हुआ है कि परमात्‍मा ने इस दुनिया को छह दिनों में कैसे बना दिया। ऐसी दुनिया, शायद इसीलिए अपने बेटे को जीसस कहा। अपने ही बेटे के लिए ये कैसा नाम चुना? उसने जो किया उसके लिए यह किसी दूसरे को सज़ा देना चाहता था। किंतु दूसरा कोई तो वहां था नहीं। होली घोस्‍ट तो सदा गैर-हाजिर रहता है। वह तो घोड़े की पीठ पर बैठा रहता है। इसीलिए मैंने चेतना को उसे खाली करने को कहा है। क्‍योंकि किसी घोड़े पर बैठना जिस पर पहले से ही कोई बैठा हो, ठीक नहीं है। मेरा मतलब है कि घोड़े के लिए ठीक नहीं है। और चेतना के लिए भी। जहां तक होली घोस्‍ट का सवाल है, मुझे इससे कोई मतलब नहीं है। मुझे होली घोस्‍ट से या अन्‍य प्रकार के भूतों से काई हमदर्दी नहीं है। मैं जीवित लोगों के साथ हूं।
      भूत तो मृत की छाया है और अगर वह होली या पावन है तो भी उसका क्‍या फायदा। और वह बदसूरत भी है। चेतना, मुझे होली घोस्‍ट की जरा भी चिंता नहीं थी। अगर तुम उस पर सवार हो जाओ तो मुझे कोई आपत्‍ति नहीं है। होली घोस्‍ट की सवारी करो, परंतु यह कुर्सी तो एक पूरे आदमी के लिए भी नहीं बनी है। यह बैठने के लिए बनी ही नहीं है। आधा आदमी ही बैठ सकता है। यह इस तरह बनी हुई है कि कोई इस पर बैठ कर सो न सके।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-42

जवाहरलाल बोधिसत्‍व थे

      ओके. । मैं क्‍या बता रहा था तुम्‍हें?
      आप बता रहे थे कि सत्य भक्त और मोरार जी देसाई किसी प्रकार आपके दुश्‍मन बन गए। वे और अंत में आपने यह कहा था कि मोरार जी देसाई कह आंखों से धूर्तता और चालाकी झलकती रही थी। और यह आपको अच्‍छी तरह याद है।
      ठीक है, उसे याद न रखना ही अच्‍छा है। शायद इसीलिए मुझे याद नहीं आ रहा था, अन्‍यथा मेरी याददाश्‍त खराब नहीं है। कम से कम ऐसा किसी ने आज तक मुझसे कहा नहीं है। यहां तक कि जो लोग मुझसे सहमत नहीं हे वे भी कहते है कि मेरी स्‍मृति आश्‍चर्यजनक है। जब मैं सारे देश में घूम रहा था तो उस समय मुझे हजारों लोगों के चेहरे और नाम याद रहते थे—और इतना ही नहीं मैं जब उनसे दुबारा मिलता था तो मुझे यह भी याद रहता था कि इससे पहले में उनसे कहां मिला था और हम लोगों में क्‍या बातचीत हुई था। भले ही वह बातचीत दस पंद्रह वर्ष पहले हुई हो। मेरी बात को सुन कर लोग हैरान हो जाते थे। अच्‍छा है मेरी स्‍मृति में बहीं गड़बड़ होती है जहां होनी चाहिए—मोरार जी देसाई पर।

सोमवार, 12 मार्च 2018

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-41

चौबीस तीर्थकर एक भेड़ परम्‍परा
     
      ओं. के. । मैं जो तुम्‍हें बताना चाहता था उसे बताना शुरू भी न कर सका। शायद ऐसा नहीं ही होना था क्‍योंकि कई बार मैंने उसकी चर्चा करने की कोशिश कि किंतु कर नहीं सका। परंतु यह मानना पड़ेगा कि यह सत्र बहुत ही सफल रहा, लाभदायक रहा। हालांकि न कुछ कहा गया, न कुछ सुना गया। अच्‍छा खासा हंसी-मजाक होता रहा परंतु मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं कारावास में हूं।
      तुम लोग सोच रहे होगें कि मैं क्‍यों हंसा। अच्‍छा है कि मेरे सामने कोई दर्पण नहीं है। एक दर्पण का इंतजार करो। कम से कम यह इस स्‍थान को वैसा बना देगा जैसा इसको होना चाहिए। परंतु यह बहुत ही अच्छा रहा। मैं बहुत ही हलका महसूस कर रहा हूं। शायद वर्षो से मैं नहीं हंसा। मेरे भीतर कुछ इस सुबह की प्रतीक्षा कर रहा था। किंतु में उस दिशा में कोई कोशिश नहीं कर रहा था....शायद किसी और दिन।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-40

मैं कल्‍कि अवतार नहीं हूं
     
      मैं खड़ा हूं—अजीब बात है, इस समय तो मैं आराम कर रहा हूं—मेरा मतलब है अपनी स्मृति में मैं मस्‍तो कि साथ खड़ा हूं। निश्‍चित ही तो ऐसा कोई और नहीं है जिसके साथ मैं खड़ा हो सकता हूं। मस्‍तो के बाद दूसरे किसी का संग-साथ तो बिलकुल अर्थहीन है।
      मस्‍तो तो पूर्णतया समृद्ध थे—भीतर से भी और बाहर से भी। उनके रोम-रोम से उनकी आंतरिक समृद्धि झलकती थी। अपने विविध संबंधों का उन्‍होंने जो विशाल जाल बुन रखा था उसका हर तंतु मूल्‍य वान था और इसके बारे मैं उन्‍होंने मुझे धीरे-धीरे अवगत किया। अपने जाने-पहचाने सब लोगो से तो उन्‍होंने मुझे परिचित नहीं कराया—ऐसा करना संभव नहीं था। मुझे जल्‍दी थी वह करने की जिसे में कहता हूं, न करना। वे मेरे प्रति अपनी जिम्‍मेवारी को पूरा करने की जल्‍दी मैं थे। चाहते हुए भी वह मेरे लिए अपने सब संबंधों का लाभ उपलब्‍ध न करा सके। इसके दूसरे कारण भी थे।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-39

पंडित जवाहरलाल नेहरू से भेट

      देव गीत, मुझे लगता है तुम किसी बात से परेशान हो रहे हो। ।तुम्‍हें परेशान नहीं होना चाहिए, ठीक है?
      ठीक है।
      ....नहीं तो नोट कौन लिखेगी, अब लिखने वाले को तो कम से कम लिखने वाला ही चाहिए।
      अच्‍छा। ये आंसू तुम्‍हारे लिए है, इसीलिए तो ये दाईं और है। आशु चुक गई। वह बाईं और एक छोटा सा आंसू उसके लिए भी आ रहा है। मैं बहुत कठोर नहीं हो सकता। दुर्भाग्‍यवश मेरी केवल दो ही आंखें है। और देवराज भी यहीं है। उसके लिए तो मैं प्रतीक्षा करता रहा हूं। और व्‍यर्थ में नहीं। वह मेरा तरीका नहीं है। जब में प्रतीक्षा करता हूं। तो वैसा होना ही चाहिए। अगर वैसा नहीं होता तो इसका मतलब है कि मैं सचमुच प्रतीक्षा नहीं कर रहा था। अब फिर कहानी को शुरू किया जाए।
      मैं इंदिरा गांधी के पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू के दो कारणों से नहीं मिलना चाहता था। मैंने इसके बारे में मस्‍तो से कहा भी किंतु वे नहीं माने। वह मेरे लिए बिलकुल ठीक आदमी थे। पागल बाबा ने गलत आदमी के लिए सही आदमी को चुना था। मैं तो किसी की भी नजर में कभी भी ठीक नहीं रहा। किंतु मस्‍तो था। मेरे सिवाय आरे कोई नहीं जानता था कह वह बच्‍चें की तरह हंसता था। परंतु वह हमारी निजी बात थी—और भी कई निजी बातें थीं,अब इनकी चर्चा करके मैं इनको सार्वजनिक बना रहा हूं।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-38

मोज़ेज और जीसस—पहलगाम (कश्‍मीर)में मरे

    ओ. के.। मैं तुम्‍हें एक सीधा-सादा सरल सा सत्‍य बताना चाहता था। शायद सरल होने के कारण ही वह भुला दिया गया है। और कोई भी धर्म उसका अभ्‍यास नहीं कर सकता। क्‍योंकि जैसे ही तुम किसी धर्म के अंग बन जाते हो वैसे ही तुम न तो सरल रहते हो और न ही धार्मिक। मैं तुम्‍हें एक सीधी सह बात बताना चाहता था। जो कि मैंने बड़े मुश्‍किल ढंग से सीखी है। शायद तुम्‍हें तो यह बहुत सस्‍ते में मिल रही है। साधी और सरल सदा सस्‍ता ही माना जाता है। यह सस्‍ता बिलकुल नहीं है। यह बड़ा कीमती है। क्‍योंकि इस सरल से सत्‍य के मूल्‍य को चुकाने के लिए अपने सारे जीवन को दांव पर लगाना पड़ता है। और वह है समर्पण, श्रद्धा।   
      ट्रस्‍ट, श्रद्धा को तुम लोग गलत समझते हो। कितनी बार मैं तुम्‍हें बता चुका हूं? शायद लाखों बार बताया है। परंतु क्‍या तुमने एक बार भी ध्‍यान से सुना है। अभी उस रात मेरी सैक्रेटरी रो रही थी और मैंने उससे पूछा कि वह क्‍यों रो रही है?

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-37

बे घर का मुसाफिर
ओ. के. । हम लोग अभी मेरे प्राइमरी स्‍कूल के दूसरे दिन पर ही है। बस, ऐसा ही होगा, हर रोज नई-नई बातें खुलती जाएंगी। अभी तक मैंने दूसरे दिन का वर्णन समाप्‍त नहीं किया आज में उसे समाप्‍त करने की पूरी कोशिश करूंगा।
      जीवन अंतर्संबंधित है। इसे टुकड़ो में काटा नहीं जा सकता। यह कपड़े का टुकड़ा नहीं है। इसको तुम काट नहीं सकते। क्‍योंकि जैसे ही इसको अपने सब संबंधों से काट दिया जाएगा, यह पहले जैसा नहीं रहेगा—यह श्‍वास नहीं ले सकेगा और मृत हो जाएगा। मैं चाहता हूं कि अपनी गति से बहता रहे। मैं इसे किसी विशेष दिशा की और उन्‍मुख नहीं करना चाहता। क्‍योंकि मैंने इसका दिशा-निर्देश पहले से ही नहीं किया। यह बिना किसी पथ-प्रदर्शन के अपनी ही गति से चलता रहा है।
      मुझे इन मार्ग दर्शकों से नफरत है। क्‍योंकि ये जो है उसके साथ प्रवाहित होने से तुम्‍हें रोक देते है। वे रास्‍ता दिखाते है और उन्हें तुम्‍हें अगली जगह पहुंचाने की जल्‍दी रहती है। उनका काम है तुम्‍हें यह जताना कि तुम जानने के लिए आए हो। न जो वह जानते है, न तुम जानते हो। सच तो यह है कि जब बिना किसी दिशा-निर्देंश के, बिना किसी पथ-प्रदर्शन के जीवन को जिया जाता है तब हम जान पाते है। मैं तो इसी प्रकार जिया हूं और जी रहा हूं।  

रविवार, 11 मार्च 2018

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-36


भी-अभी मैं एक कहानी के बारे में सोच रहा था। मुझे नहीं मालूम कि इस कहानी को किसने रचा 
और क्‍यों? और मैं उसके निष्‍कर्ष से भी सहमत नहीं हूं फिर भी यह कहानी मुझे बहुत प्रिय है। कहानी बहुत सरल है। तुमने इसे सुना होगा किंतु शायद समझा नहीं होगा क्‍योंकि यह इतनी सरल है। यह अजीब दुनिया है। हर आदमी को यह खयाल है कि वह सरलता को समझता है। लोग जटिलता को समझने की कोशिश करते है और सरलता की और ध्‍यान ही नहीं देते यह सोच कर कि इसकी कोई जरूरत ही नहीं है। शायद तुमने भी इस कहानी पर अधिक ध्‍यान नहीं दिया होगा किंत1 जब मैं इसे तुम्‍हें सुनाऊंगा तो निशचित ही तुम्‍हें याद आ जाएगी।
      कहानियां विचित्र प्राणी हैं, वे कभी मरती नहीं हैं, उनका कभी जन्‍म भी नहीं होता है। वे उतनी ही पुरानी है जितना आदमी। इसीलिए तो वे मुझे बहुत प्रिय है। अगर कहानी में सत्‍य न हो तो वह कहानी नहीं है। तब वह फिलासफी होगी या थियोसाफी होगी या एन्‍थ्रोपोसाफी होगी और न जाने कितनी ही ‘’ सॉफीज ‘’ हैं, वे सब बकवास है। नॉनसेंस है। नॉनसेंस ही लिखों, शुद्ध बकवास, पयोर नॉनसेंस। प्राय: इस शब्‍द के बीच में हाइफन, संयोजक रेखा डाली जाती है—जैसे नॉनसेंस। इसकी क्‍या जरूरत है। मेरे शब्‍दों में से तो इसे हटा दो। परंतु जब मैं कहता हूं कि झेन नॉनसेंस है, तब इस हाइफन की, इस संयोजक-रेखा की जरूरत है।

शनिवार, 10 मार्च 2018

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-35

अल्‍लाउद्दीन खां और पं रविशंकर

      ओ. के.। मैं रविशंकर को सितार बजाते हुए सुना है। हम जो सोच सकें, वे सब गुण उनमें है। उनका व्‍यक्‍तित्‍व गायक का है। अपने वाद्ययंत्र पर उनका पूर्ण अधिकार है। और उनमें नवीनता उत्‍पन्‍न करने की योग्‍यता है। जो कि शास्त्रीय संगीतज्ञों में दुर्लभ ही होती है। रविशंकर को नवीनता से बहुत प्रेम है। इन्‍होंने यहूदी मैन हून की वायलिन के साथ अपनी सितार की जुगल बंदी की है। दूसरा कोई भी भारतीय सितारवादक इसके लिए तैयार नहीं होता। क्‍योंकि इसके पहले किसी ने ऐसा प्रयोग नहीं किया। वायलिन के साथ सितार वादन। क्‍या तुम पागल हो? परंतु नये की खोज करने वाल लोग थोड़े पागल ही होते है। इसीलिए तो वे नवीनता को जन्‍म दे सकते है।
      तथाकथित स्‍वस्‍थ दिमाग वाले लोग सुबह से रात तक परंपरागत जीवन ही जीते है। रात से सुबह तक, कुछ कहा ही नहीं जाना चाहिए—नहीं कि कहने में मुझे कुछ डर है। लेकिन मैं उनकी बात कर रहा हूं। वे आजीवन लकीर के फकीर बने रहते है और परंपरागत नियमों के आधार पर ही चलते है। वे कभी भी निधार्रित पथ से जरा भी इधर उधर नहीं होते।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-34

प्रोफेसर एस. एस. राय

      आज सुबह मैंने मस्‍तो से एकाएक विदा ली और दिन भर मुझे यह बात खटकती रही। कम से कम इस मामले में तो ऐसा नहीं किया जा सकता इससे मुझे उस समय की याद आ गई जब मैं कई बरसों तक नानी के साथ रहने के बाद उनसे विदा लेकर कालेज जा रहा था।
      नानी की मृत्‍यु के बाद जब वे बिलकुल अकेली हो गई तो मेरे सिवाय उनके जीवन में और कोई न था। उनके लिए यह आसान न था और न ही मेरे लिए। मैं सिर्फ नानी के कारण ही उस गांव में रहता था। मुझे अभी तक सर्दी के मौसम की वह सुबह याद है जब गांव के लोग मुझे विदा देने के लिए एकत्रित हुए थे।
      आज भी मध्य भारत के उस भाग में आधुनिक युग का आगमन नहीं हुआ। अभी भी वह  कम से कम दो हजार बरस पिछड़ा हुआ है। किसी से पास कोई खास काम नहीं है। आवारागर्दी करने के लिए सबके पास काफी समय मालूम होता है। सचमुच हर आदमी आवारागर्द है। आवारागर्द से मेरा सीधा शाब्‍दिक अर्थ है जिसके पास कोई खास काम न हो। कोई और अर्थ मत समझना। तो सब आवारागर्द वहां पर जमा हो गए थे।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-33

 मस्‍तो का सितार बजाना—नानी का नवयौवना होना
      .के.। अभी उस दिन मैं तुम लोगों को मस्‍तो के गायब हो जाने के बारे में बता रहा था। मुझे लगता है कि वह अभी भी जीवित है। सच तो यह है कि मैं जानता हूं कि वह जीवित है। पूर्व में यह एक अति प्राचीन प्रथा है। मरने से पहले व्‍यक्‍ति हिमालय में खो जाता है। किसी और जगह रहने से तो इस सुंदर स्‍थल में मरना ज्‍यादा मूल्‍य बान है। वहां पर मरने में भी शाश्‍वतता का कुछ अंश है। इसका कारण शायद यह है कि हजारों वर्षों तक ऋषि मुनि वहां पर जो मंत्रोच्‍चार कर रहे थे। उसकी तरंगें अभी भी वहां के वातावरण में पाई जाती है। वेदों की रचना वहां हुई, गीता वहां लिखी गई। बुद्ध वहां पर जन्मे और मरे। लाओत्से भी अपने अंतिम दिनों में हिमालय में ही खो गया था। और मस्‍तो ने भी ऐसा ही किया।
      किसी को यह मालूम नहीं है कि लाओत्से मरा या नहीं। इसके बारे में निश्चय रूप से कोई कैसे कुछ कह सकता है। इसलिए जनश्रुति कहती है कि वह अमर हो गया। लेकिन लोगों को उसकी मृत्‍यु की कोई जानकारी नहीं है। अगर कोई चुपचाप बिलकुल एकांत में निजी ढंग से मरना चाहे तो यह उसका अधिकार है। वह ऐसा कर सके, ऐसा होना चाहिए।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-32

( भगवान )—मस्‍तो बाबा का उद्घोष

    मुझे सदा यह हैरानी होती है कि आरंभ से ही मेरे साथ कुछ ठीक हुआ है। किसी भी भाषा में ऐसा कोई मुहावरा नहीं है। कुछ गलत हो गया, जैसा मुहावरा तो पाया गया है। लेकिन कुछ ठीक हो गया जैसा मुहावरा है ही नहीं। पर मैं भी क्‍या कर सकता हूं। जब से मैंने पहली श्‍वास ली है तब से अब तक सब ठीक चलता रहा है। आशा है कि आगे भी यह क्रम इसी प्रकार चलता रहेगा। उसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा, क्‍योंकि यही उसका ढंग बन गया है।
      न जाने कितने लोगों ने अकारण ही मुझसे प्रेम किया है। लोगों का आदर उनके गुणों या योग्‍यता के कारण होता है। लेकिन मुझे तो लोगों ने मैं जैसा हूं वैसा ही होने के कारण प्रेम किया है। सिर्फ अभी ही ऐसा नहीं है—इसीलिए मैं कह रहा हूं कि आरंभ से ही सब बातें पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार ठीक घटती रही हैं। अन्‍यथा कैसे सब सही होगा।

स्वर्णिम बचपन-(ओशो आत्मकथा)-सत्र-31

मस्‍तो बाबा से मिलन
      पागल बाबा अपने अंतिम दिनों में हमेशा कुछ चिंतित रहते थे। मैं यह देख सकता था, हालांकि उन्‍होंने कुछ कहा नहीं था, न ही किसी और ने इसका उल्‍लेख किया था। शायद किसी और को इसका अहसास भी नहीं था कि वे चिंतित थे। अपनी बीमारी, बुढ़ापा या आसन्‍न मृत्‍यु के बारे में तो निशचित ही उन्‍हें कोई फ़िकर नहीं थी। उनके लिए इनका कोई महत्‍व नहीं था।
      एक रात मैं जब उनके साथ अकेला था, मैंने उनसे पूछा, सच तो यह है कि मुझे आधी रात को उन्‍हें नींद से जगाना पड़ा, क्‍योंकि ऐसा कोई क्षण खोजना जब उनके पास कोई न हो बहुत ही कठिन था। उन्‍होंने मुझसे कहा, क्‍या बात है, अवश्‍य ही कोई बहुत महत्‍वपूर्ण बात होगी अन्‍यथा तुम मुझे न जगाते। मैंने कहा:  हां, प्रश्‍न तो यही है, मैं देख रहा हूं कि थोड़ी चिंता की छाया ने आप को घेर लिया है। पहले तो यह कभी नहीं होती थी। आपका आभा मंडल सदा सुर्य के प्रकाश की तरह स्‍वच्‍छ और तेज रहा है। लेकिन अब मुझे थोड़ी सी छाया दिखाई देती है। यह मृत्यु तो नहीं हो सकती।