ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
आचरण नहीं--बोध से क्रांति-(प्रवचन-नौवां)
नौवां प्रवचन; दिनांक १९ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
पहला प्रश्न: भगवान,
जमाना हो गया घायल
तेरी सीधी निगाहों से
खुदा ना खासता तिरछी
नजर होती तो क्या होता?
मुहम्मद हुसैन!
सीधी
नजर काफी हो,
तो तिरछी नजर की जरूरत क्या! और सीधे-सीधे जो काम हो जाए, वह तिरछे होने से नहीं होता। तिरछा होना तो मन की आदत है; सीधा होना हृदय का स्वभाव।
मैं
जो कह रहा हूं,
वह दो और दो चार जैसा सीधा-साफ है। जिसकी समझ में न आए, उसकी समझ तिरछी होगी, उसके भीतर विकृतियों का जाल
होगा। अगर तुम्हारे पास भी सीधा-सादा हृदय हो, तो मेरी बात
का तीर ठीक निशाने पर पहुंच ही जाएगा, पहुंच ही जाना चाहिए।
प्रेम से सुनोगे तो सुनते-सुनते ही क्रांति घट जाएगी।
मेरे
सकूने-दिल को तो होना ही था तबाह
उनकी
भी एक निगाह का नुकसान हो गया


