ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
बुद्धत्व और पांडित्य-(प्रवचन-दसवां)
दसवां प्रवचन; दिनांक २० सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
पहला प्रश्न: भगवान,
किसी को चैन से देखा न दुनिया में कभी मैंने।
इसी हसरत में कर दी खतम सारी जिंदगी मैंने।।
कहते हैं लोग मौत से भी बदतर हैं इंतिजार।
बस राह देखते ही गुजारी जिंदगी मैंने।।
उठाए क्यों लिए जाते हो मुझको बागे-दुनिया से।
नहीं देखी है दिल भर के बहारे जिंदगी मैंने।।
लोग घबरा कर यूं ही कह देते हैं कि मर जाएं।
मर के भी लेकिन सुकूं पाते नहीं देखा मैंने।।
जब ये आसी उठाएंगे फिरदौस में जाम।
मय बदल जाएगी पानी में सुना है मैंने।।
आग दोजख की भी अर्क ए शर्म से बुझ जाएगी।
परेशां आदमी को देख ये न सोचा मैंने।।
सब तरफ कब्रें तमन्नाओं की बनी हैं यहां।
एक बस्ती को भी बसते नहीं देखा मैंने।।
इस जहां में तू कैसे बेपिए मदहोश रहता है?
ऐ साकी! आज तक देखा न तुझसा आदमी मैंने।।
बता तू कौन है इंसान या कोई फरिश्ता है?
या देखा है खुदा को ख्वाब में बना आदमी मैंने।।
अमृत प्रिया!



