एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
ओशो
प्रवचन-060 (जीवित धर्म का उद्गम केंद्र: सदगुरु)
सारसूत्र:
हीनं धम्मं न सेवेय्य पमादेन न संवसे।
मिच्छदिट्ठिं न सेवेय्य न सिया लोकवङ्ढनो।।१४६।।
उत्तिट्ठे नप्पमज्जेय्य धम्मं सुचरितं चरे।
धम्मचारी सुखं सेति अस्मिं लोके परम्हि च।।१४७।।
यथा बुब्बुलकं पस्से यथा पस्से मरीचिकं।
एवं लोकं अवेक्खन्तं मच्चुराजा न पस्सति।।१४८।।
एस पस्सथिमं लोकं चित्त राजरथूपमं।
यत्थ बाला विसीदन्ति नत्थि संगो विजानतं।।१४९।।
