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शनिवार, 8 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-60



एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
ओशो
प्रवचन-060 (जीवित धर्म का उद्गम केंद्र: सदगुरु)

सारसूत्र:

हीनं धम्मं न सेवेय्य पमादेन न संवसे।
मिच्छदिट्ठिं न सेवेय्य न सिया लोकवङ्ढनो।।१४६।।

उत्तिट्ठे नप्पमज्जेय्य धम्मं सुचरितं चरे।
धम्मचारी सुखं सेति अस्मिं लोके परम्हि च।।१४७।।

यथा बुब्बुलकं पस्से यथा पस्से मरीचिकं।
एवं लोकं अवेक्खन्तं मच्चुराजा न पस्सति।।१४८।।

एस पस्सथिमं लोकं चित्त राजरथूपमं।
यत्थ बाला विसीदन्ति नत्थि संगो विजानतं।।१४९।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-59



एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
ओशो
प्रवचन-059 (गुरु को द्वार बनाना दीवार नहीं)


पहला प्रश्न:

आपको मैं क्या कहूं--प्रभु कहूं, विभु कहूं या शंभु कहूं? यह भी इसलिए कि सतत मैं आपके चरणों में नमूं। बस वहां ही मैं त्रिकाल तक नमूं। अब तो मेरी प्रार्थना सुनें!

कहने की बहुत बात नहीं है। क्या तुम मुझे कहते हो, अप्रासंगिक है। मेरे निकट क्या तुम स्वयं को समझ लेते हो, वही महत्वपूर्ण है।
तुम मुझे अच्छे-अच्छे नाम दो, उससे कुछ लाभ न होगा। तुम स्वयं को पहचानो, उससे ही कुछ होने वाला है। मेरी स्तुति से नहीं कुछ, आत्मस्मरण से कुछ होगा। स्तुति में समय खराब मत करो। कितनी तो तुम स्तुति कर चुके, कितने द्वारों पर! कितने मंदिर-मस्जिदों में तुमने प्रार्थना नहीं की, नमाज नहीं पढ़े, झुके नहीं! क्या पाया? हाथ खाली के खाली हैं। अब भीतर झुको। अब जो तुम्हारे भीतर सोया है, उसे जगाओ। अब असली मंदिर में प्रवेश करो। मुझे क्या कहो, इसकी क्या चिंता करनी! कुछ भी कह लो। बिना नाम के भी चल जाएगा।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-58



एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
ओशो
प्रवचन-058-(स्व से होकर राह सर्व को)

सारसूत्र:

अत्तना' व कतं पापं अत्तजं अत्तसंभवं।
अभिमन्थति दुम्मेधं वजिरं व' स्ममयं मणिं।।१४०।।

यस्सच्चन्तदुस्सल्यिं मालुवा सोलमिवोततं।
करोति सो तथत्तानं यथा' नं इच्छति दिसो।।१४१।।

सुकरानि असाधूनि अत्तनो अहितानि च।
यं वे हितग्च साधुग्च तं वे परमदुक्करं।।१४२।।

यो सासनं अरहतं अरियानं धम्मजीविनं।
पटिक्कोसति दुम्मेधो दिट्ठिं निस्साय पापिकं।
फलानि कट्ठकस्सेव अत्तघग्भय फल्लति।।१४३।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-57



एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
ओशो
प्रवचन-057 ('न-होना' है जीवन)


पहला प्रश्न:

कल आपने कहा कि ईश्वर को अस्वीकार कर भगवान बुद्ध ने मनुष्य को बड़ी से बड़ी गरिमा से मंडित किया। यही दलील तो नास्तिक भी ईश्वर के खिलाफ पेश करते हैं। फिर दोनों में फर्क क्या है? और क्या ईश्वर को अस्वीकार कर मनुष्य का अहंकार और भी अंधा नहीं होगा?

फर्क बारीक है। समझना चाहोगे, तो ही समझ सकोगे। सहानुभूतिपूर्वक समझोगे, तो ही समझ सकोगे। फर्क मोटा और स्थूल नहीं है।
इसीलिए तो हिंदुओं ने बुद्ध को भी नास्तिक कहा। नास्तिक कहकर भी बुद्ध की महिमा को अस्वीकार करना कठिन था। इसलिए अवतार भी स्वीकार किया। फर्क बड़ा बारीक है। मान भी न सके, इंकार भी न कर सके। बुद्ध को स्वीकार भी न कर सके, क्योंकि बात प्रगट ही नास्तिकता की मालूम होती है। लेकिन बुद्ध की महिमा को, प्रतिभा को, उनकी गरिमा को, उनके प्रकाश को अस्वीकार भी कैसे करें! हिंदू इतने अंधे भी न थे। तो अवतार भी स्वीकार किया।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-56




एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
प्रवचन-056
(अत्ताहि अत्तनो नाथो)
 
अत्तानं चे पियं अग्भ रक्खेय्य तं सुरक्खितं।
तिण्णमंग्भ्तरं यामं पटिजग्गेय्य पण्डितो।।१३६।।

अत्तानेमेव पठमं पतिरूपे निवेसये।
अथग्भ्मनुसासेय्य न किलिस्सेय्य पण्डितो।।१३७।।

अत्तानग्चे तथा कयिरा यथग्भ्मनुसासति।
सुदन्तो वत दम्मेथ अत्ताहि किर दुद्दमो।।१३८।।

अत्ताहि अत्तनो नाथो कोहि नाथो परो सिया।
अत्तना' व सुदन्तेन नाथं लभति दुल्लभं।।१३९।।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-55



मुझे शास्त्र नहीं, अनुभव बनाओ—प्रवचन—55  


पहला प्रश्न


भगवान श्री, अर्थ तो कमाया, पर शुरूआत ही गलत हो गयी। कोई छह—सात साल का ही था जब कामवासना सक्रिय हो गयी। और दस से छत्तीस की उस तक इस कदर वीर्य स्‍खलितत किया कि कोई हिसाब नहीं! और यह भी बता दूं कि केवल सात महीने ही मां के गर्भ में रहकर मैं बाहर आ गया था। आपका स्वभाव कल से बेचैन है। जब वह वीर्य न बचा सका, तब प्रज्ञा कैसे पैदा हो? तभी तो मूड़ हूं और बिना जाने जानने का दावा करता हूं। संन्यास लेकर भी पलायन ही कर रहा हूं। क्रोध और अहंकार से बुरी तरह ग्रसित हूं। बस चमड़ी—मास ही बढ़ा है। स्वभाव खुद कर—करके हार गया, प्रभु! अब आप ही कछ करें।

हली बात, जो बीता सो बीता। जो हुआ उसे न तो अनहुआ किया जा सकता है, न करने की चेष्टा में व्यर्थ समय गंवाने की कोई जरूरत है। अतीत के लिए रोओ मत, भविष्य के लिए प्रार्थना करो।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-54



समष्टि से आलिंगन है धर्म—प्रवचन—54


सूत्र:
 
अप्‍पस्‍सुतायं पुरिसो बलिवद्दो व जीरति।
मंसनि तस्‍स बड्ढन्‍ति पज्‍जा तस्‍स न बड्ढ़ति ।।131।।

अनेक जाति संसार संधविस्‍सं अनिब्‍बिसं।
गहकारकं गवेसंतो दुक्‍खा जाति पुनप्‍पुनं ।।132।।

गहकारक! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि।
सब्‍बा ते फासुका भग्‍गा गहकूटं विसंखिति।
विसंखारंगतं चितं तण्‍हानं खयमज्‍झगा ।।133।।

अचरित्‍वा ब्रह्मचरियं यलद्धा योब्‍बने धनं।
जण्‍णकोज्‍चा व झायन्‍ति खीनमच्‍छे व पल्‍लल ।।134।।

अचरित्‍वा ब्रह्मचरियं यलद्धा योब्‍बने धनं।
सेन्‍ति चापातिखित्‍ता व पुण्णानि अनुत्‍थनं ।।135।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-53



साक्षीभाव : परम सूत्र—प्रवचन—53


पहला प्रश्न :


भगवान, आखिर आप कहते वही हैं जो आपको कहना है। फिर इतर बुद्धों की खूंटी का सहारा क्यों लेते हैं? अपनी बात सीधी ही हमसे क्यों नहीं कहते? हमें उलझाते क्यों हैं?

पूछा है स्‍वभाव ने।
बहुत सी बातें समझनी होंगी। पहली बात तो यह है—हजरत प्यार है, प्यार को प्रश्न मत बनाओ!
बुद्धों से लगाव है। लगाव के लिए कोई उत्तर नहीं। जैसे तुम्हें कोई स्त्री पसंद आ जाए, मन भा जाए, कहो कि सुंदर है, बहुत सुंदर है, सिद्ध न कर सकोगे।
प्रेम तर्क से गहरा है। कोई पूछेगा, क्यों प्रेम करते हो, उत्तर न दे सकोगे। जहां तक प्रश्न और उत्तर जाते हैं, उससे आगे की बात है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-52



सूरज ढलने से पहले दीए को सम्हाल लेना!—प्रवचन—52


सूत्र:

कोनु हासो किमानंदो निच्‍चं पज्‍जलिते सति।

अंधकारेन ओनद्धा पदीपं न गवेस्‍सथ।।125।।

पस्‍स चित्‍त कतं अरूकायं समुस्‍सितं।
आतुरं बहुसंकप्‍पं यस्‍स नत्‍थि धुवं ठिति।।126।।

पिरजिण्‍णमिदं रूपं रोगनिड्डं पभंगुरं।
भिज्‍जति पूतिसंदेहो मरणन्‍तं हि जीवितं।।127।।

यानि मानि अपत्‍थानि अलाबूनेव सारदे।
कपोतकानिअट्ठीनि तानि दिस्‍वान का रति।।128।।

अट्ठीनं नगरं कतं मंसलोहित लेपनं।
यत्‍थ जरा च मच्‍चूच मानो मक्‍खो च ओहितो।।129।।

जीरंति वे राजस्‍था सुचित्‍ता अथो सरीरम्‍पि जरं उपेति।
सतं च धम्‍मो न जरं उपेति सन्‍तो हवे सब्‍भि पवेदयन्‍ति।।130।।

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06) ओशो



  एस धम्मो सनंतनो (भाग—6) ओशो


 (ओशो द्वारा भगवान बुद्ध की सुललित वाणी धम्मपद पर दिए गए नौ अमृत प्रवचनों का संकलन)
 मैं तुम्हें अपने पर नहीं रोकना चाहता। मैं तुम्हारे लिए द्वार बनूं र दीवार न बनूं। तुम मुझसे प्रवेश करो, मुझ पर रुको मत। तुम मुझसे छलांग लो, तुम उड़ो आकाश में। मैं तुम्हें पंख देना चाहता हूं, तुम्हें बाध नहीं लेना चाहता। इसीलिए तुम्हें सारे बुद्धों का आकाश देता हूं। मैं तुम्हारे सारे बंधन तोड़ रहा हूं। इसलिए मेरे साथ तो अगर बहुत हिम्मत हो, तो ही चल पाओगे। अगर कमजोर हो, तो किसी कारागृह को पकड़ो, मेरे पास मत आओ।