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मंगलवार, 28 नवंबर 2017

ओशो का जीवन में प्रवेश--एक परर्कमा-(खंड़-2)

ओशो का जीवन में प्रवेश

      कुछ बातें जीवन में ऐसी होती है, न तो उनके आने की आहट हमें सुनाई देती है और न ही उनके पदचाप ही हमारे ह्रदय में कही छपते है। वे अदृष्‍य मूक हमारे जीवन में प्रवेश कर जाना चाहती है। लेकिन ये कुदरत की प्रबोधन के आगमन अनुभूति इतना पारदर्शी अस्‍पर्शित होती है, कि वो अनछुआ क्वारी की क्वारी ही रह जाती है।। वो इतना शूक्ष्माति-शूक्ष्‍म होता है कि चाहे तो उसके आर-पार आसानी से आया जाया जा सकता है। मेरे जीवन में ओशो का प्रवेश भी कुछ ऐसे ही हुआ। हुआ भी नहीं का जा सकता क्‍योंकि जब उन्‍होंने आकर दस्‍तक दी तो मैं द्वार बंद कर करवट बदल कर सो गया।
      बात सन् 1985 की है उन दिनों ओशो अमरीका से भारत आये थे। मेरा व्‍यवसाय उस समय बहुत अच्‍छा चल रहा था। घर में वो सब कुछ था जो होना चाहिए। घर में ख़ुशियों के साथ-साथ जरूरत की हर चीज थी। मेरी लड़की अन्‍नू( मां बोद्धीउनमनी) उस समय पाँच वर्ष की थी। उसे एक टीचर पढ़ाने आया करता था। वो ओशो को पढ़ता था। एक दिन न जाने उस के मन में क्‍या आई वो जो ओशो पुस्‍तक हाथ में लिए हुए था।

शब्दों के आयाम—एक परिक्रमा ( 01)

शब्‍दों के आयाम
   

      ओशो के स्‍वर्णिम बचपन के सत्र-37 लिखते-लिखते अचानक बीच में ऐसा लगा की मैं जो लिख रहा हूं वो शब्‍द और में एक ही हो गए है, मैं खुद शब्‍द और अपने होने के भेद को भूल गया, इतना लवलीन हो गया शब्‍दों में की शरीर से भी नीर भार हो गया, शरीर का भी भार है। हम उसे जब महसूस करते जब हम स्‍वास्‍थ होते है वो भी पूर्ण नहीं, एक झलक मात्र, नहीं तो कितने ही लोगों को तो शारीर का होना भी जब पता चलता है जब अस्वस्थ होते है। मानों शरीर झर गया निर्झरा, शरीर एक घुल कण कि तरह छटक गया। कितना सुखद अस्‍वाद होता है शरीर विहीन होना मानों हमारी पकड़ इस पृथ्‍वी से पलभर के लिए छुट गई।
      लेकिन ये स्‍थिति ज्‍यादा देर नहीं रही और कुछ ही देर में अपने पर लोट आया। लेकिन इसके बाद मन की तरंगें ही बदल गई, मुहँ का स्‍वाद, स्वादों कि खुशबु, मन मानों समुन्दर होकर तरंगें मारने लगा , एक मीठा सा तूफान  लह लाने लगा।

संत तोता पुरी की समाधी--(पुरी जगन्ननाथ)



परम हंस तौता पुरी-(समाधि)



कभी-कभी इत्फाक भी चमत्कार से लगता है। हम (मैं ओर अदवीता) पूरी जगन्नाथ की यात्रा पर जाने की तैयारी कर रहे थे कि दो दिन पहले एक हीरा मन तोता न जाने कहां से आ गया ओर वह आने के बाद ऐसा व्यवहार करने लगा कि जैसे सालो से हमे जानता है। मैरे हाथ से खाये पेड पोधो पर किलकारी भरे मैं कम्पूटर पर कर करू तो अंदर आकर मेरे पास बैठ जाये।
कितना आनंद और उत्सव में सराबोर था, इस टेहनी से उस टहनी पर कुदता फांदता कितना मन को मोह रहा था। मैं पेड पोधो को पानी डालते उसे खुब नहलाया वह कैसे फंख खोल कर नहा रहा था। जैसे उसे वो सब चाहिए। तब हम पूरी की और चले गये वहां पहुचने पर बेटी बोधी उनमनी में कहा की वह तोता तो अपको चारो ओर ढूंढ रहा है वह बहुत शौर मचा रहा है मैंने उसे सेब आदि खाने के दिये परंतु वह कुछ ढूढता सा प्रतित हो रहा है और मेरे नीचे चले जाने के बाद बहुत शौर मचा रहा है काम करने वाली भी कह रही थी की मेरे पास आ कुछ कहना चाहता था। ओर उसका भी दिल भर आया। कि शायद मम्मी-पापा को ढूंढ रहा है। ओर सच वह श्याम होते न होते उड गया। बेटी ने फोन किया की पापा वह तोता तो उड गया....शयद आपको ढूंढता रहा...ओर आप उपर नहीं आये तो चला गया।