अध्याय—11
सूत्र—(140)
श्रीभगवानुवाच:
गर्दर्शमिदं
रूपं
दृष्टवानसि
यन्यम।
देवा
अप्यस्य
रूपस्य
नित्यं
दर्शनकाक्षिण:।। 52।।
नाहं वेदैर्न
तयसा न दानेन
न चेज्यया।
शक्य
एवंविधो दृष्टुं
दृष्टवानसि
मां यथा।। 53।।
भक्त्या
त्वनन्यया
शक्य
अहमेवंविधोउर्जुन।
ज्ञातुं
दृष्टुं च
तत्वेन
प्रवेष्टुं
च परंतप।। 54।।
मत्कर्मकृन्मत्यरमो
मइभक्त:
संगवर्जित:।
निर्वैर:
सर्वभूतेषु
यः स मामेति
पाण्डव।। 55।।
इस
प्रकार
अर्जुन के वचन
को सुनकर
श्रीकृष्ण भगवान
बोले हे
अर्जुन मेरा
यह चतुर्भुज
रूप देखने को
अति दुर्लभ है
कि जिसको
तुमने देखा है
क्योंकि
देवता भी सदा
इस रूप के
दर्शन करने की
इच्छा वाले
हैं।
और
हे अर्जुन न
वेदों से न तय
से न दान से और
न यह से हम प्रकार
चतुर्भुज रूप
वाला मैं देखा
जाने को शक्य हूं
कि जैसे मेरे
को तुमने देखा
है।
