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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा--(भाग-1) -शांडिल्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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रविवार, 10 जून 2018

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--34

जग़ारण है द्वार स्वर्ग काचौदहवां प्रवचन

 चौदहवां प्रवचन
24 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :


1--क्या धरती पर स्वर्ग उतारा जा सकता है? क्या इस बार हम कुछ नये की आशा संजो सकते हैं?

2--कान्हा! क्या होली नहीं खेलोगे?


3--कुंड़लिनी या सक्रिय ध्यान में ऊर्जा जाग्रत होने पर उसे नाचकर क्यों खत्म कर दिया जाता है?

4--क्या राजनीति अध्यात्म के विपरीत है?

5--एक ध्यान— अनुभव पर प्रकाश डालने हेतु भगवान से निवेदन। आपसे और आश्रम से मेरे    दूर रखे जाने में राज क्या है?


6--आपको सुन—सुनकर भक्ति का रोग लग गया है। अब धैर्य नहीं रखा जाता है। आकांक्षा  होती   है सब अभी हो जाए।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग-1) प्रवचन--20

अद्वैत प्रीति की परमदशा है—बीसवां प्रवचन

दिनांक 30 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

 प्रश्‍न सार :


      1--भक्ति सहज, इसलिए वैज्ञानिक। सहज को वैज्ञानिक कहने का आपका आशय क्या है?
      प्रीति अद्वैत है तो अद्वैत के नाम पर जो कहा जाता रहा है, वह क्या है?

      2--भगवान बुद्ध और भगवान कृष्ण के दो परस्पर विरोधी लगने वाले वचनों पर प्रकाश डालने       के लिए भगवान से अनुरोध।

      3--प्रवचन के बाद आपको जाते हुए देखती हूं तो एक निःश्वास निकल जाती है कि एक दिन   और व्यर्थ गया! कि एक दिन यह दिव्यपुरुष ऐसे ही आंखों से ओझल हो जाएगा और ऐसे   ही खड़ी—खड़ी देखती रह जाऊंगी।

      4--मैं अपना प्रेम प्रकट नहीं कर पाया। न मालूम कौन से भय ने पंगु बना रखा है। यह अविकसित    प्रेम कैसे भक्ति बनेगा?

      5--अब हम करें क्या?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--19

सब हो रहा है—उन्‍नीसवां प्रवचन

दिनांक 27 जनवरी 1978; श्री रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र :

      तद्वाक्यशेषात् प्रादुर्भावेष्‍वपि सा।।46।
      जन्मकर्म्मविदश्चाजन्मशब्दात्।।47।।
      तच्च दिव्यं स्वशक्तिमात्रोद्भवात्।।48।।
      मुख्य तस्य हि कारुण्यम्।।49।।
      प्राणित्वान्न विभूतिषु।।50।।

     
      ‘युक्तौ च सम्परायात्।
      प्रकृति और पुरुष दो नहीं हैं। आत्मा और परमात्मा दो नहीं हैं। दृश्य और दृश्या दो नहीं हैं। भक्ति की यह आधारशिला है कि एक होने का उपाय है। एक होने का उपाय तभी हो सकता है, जब वस्तुत: हम एक हों ही। यथार्थ से अन्यथा नहीं हो सकता। भक्त भगवान से मिल सकता है तभी, जब मिला ही हुआ हो। जब पूर्व से ही मिला हो, जब प्रथम से ही विरह न हुआ हो, बिछुडून न हुई हो।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--18

विरह की परिपूर्णता ही परमात्मा से मिलन—अठारहवां प्रवचन

दिनांक 28 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

 प्रश्‍न सार :

      1--आपने कहा जो सहज है वही भक्त है, वही भक्ति है। पर हमारे जीवन की सहजताएं किस भांति भक्ति कहे जा सकते हैं?

      2--भगवान का प्रवचन आंख बंद करके सुनना, या खुली आंख सुनना? एक साधिका की समस्या।

      3--यह मन—पंछी बहुत ऊंची उड़ाने भरता है, लेकिन पहुंचता कहीं नहीं। प्रभु, इस पर कुछ कहने की अनुकंपा करें।

      4--शीघ्र समाधि की चाह एक भयंकर तनाव बनी जा रही है। मैं क्या करूं?

      5--क्या ध्यान भक्ति और ज्ञान से परे तीसरा ही कोई मार्ग है?

      6--विरह क्या है?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--17

भक्ति अति स्वाभाविक है—सत्रहवां प्रवचन

सत्रहवां प्रवचन
27 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र :

      युकतौ च सम्परायात्।।41।।
      शक्तित्वान्नानृत वेद्यम्।।42।।
      तत्परिशुद्धिश्च गम्यालोकवल्लिंगेभ्य:।।43।।
      सम्मान बहुमान प्रीति विरहेतर विचिकित्सा।
      महिमख्याति तदर्थ प्राण स्थान तदीयता सर्व तदभावा।
      प्रातिकूल्यादीनिच स्मरचेभ्यो बाहुल्यात्।।44।।
      द्वेषादयस्तु नैवम्।।45।।

      पूर्व—सूत्र—
      'चैत्याचितोर्नतितीयम्।
      चैत्य और चित्त, शेय और ज्ञान, दृश्य और द्रष्टा से भिन्न कोई तीसरा पदार्थ जगत में नहीं है।' जगत को दो में बांटा जा सकता है। जानने वाले मे और जो जाना जाता है। मैं और तू में। यह अंतिम विभाजन है। इसके भी भीतर गए तो विभाजन समाप्त हो जाते हैं, भेद गिर जाते है। यहा तक भेद की सीमा है, यहां तक भेद का लोक है। फिर द्रष्टा में और गहरे गए, या दृश्य मे गहरे गए तो दोनों के भीतर एक का ही आविर्भाव होता है।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--16

धर्म आमूल बगावत है—सोलहवां प्रवचन

सोलहवां प्रवचन,
26 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्‍न सार :


      1--क्या भक्ति और ज्ञान का भेद सतही है? क्या गहरे में दोनों एक हैं?

      2--क्या धर्म विद्रोह है?

      3--क्या संन्यास भक्ति की शुरुआत है?

      4--मैं तो प्रेम से बहुत पीड़ित हो चुका हूं; और आप कहते हैं—
      प्रेम का ऊर्ध्वगमन ही भक्ति है। अब उस कीचड़ में और नहीं पड़ना चाहता।

      5--भक्त, भक्ति और भगवान, इन तीनों शब्दों को समझाएं।

      6--आपके पास आना और बैठना अच्छा लगता है। प्रवचन सुनने के बाद लगता है कि कोई
      गहरा नशा किया हो; ध्यान वगैरह करने की भी इच्छा नहीं होती। पर संन्यास लेने की इच्छा  होने लगी है। क्या इस योग्य हूं?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--15

भक्ति अंतिम सिद्धि है—पंद्रहवां प्रवचन

दिनांक 25 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र :
      सर्वानृते किमितिवेन्नैव बुद्धधानत्त्वात्।।36।।
      प्रकृत्यन्तरालादवैकार्यचित्त्वेनानुवर्तमानत्वात्।।37।।
      तत्पष्ठिगृहपीठवत्।।38।।
      मिथेपेक्षणादुभयम्।।39।।
      चैत्याचितोर्नत्रितीयम्।।40।।


      एक दृष्टि पूर्व—सूत्रों पर।
      शांडिल्य ने कहा— भक्ति परम दशा है। परम दशा यानी भगवत्ता। जंहा भक्त और भगवान में भेद न रह जाए। जब तक भेद है, तब तक अज्ञान है। जब तक दूरी है, तब तक मिलने की प्यास, मिलने की पीड़ा कायम रहेगी। इंचभर भी दूरी हो, तो दुख मौजूद रहेगा।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--14

परमात्मा परमनिर्धारणा का नाम—चौदहवां प्रवचन

दिनांक 24 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्‍न सार :

     
      ।--हसीद फकीरों ने मैं —तू भाव से;सूफियो एवं भक्तो ने तू— भाव से; वेदांत, उपनिषद एवं जैन परंपरा ने मैं— भाव से; बुद्ध एवं झेन परंपरा ने न मैं—न तू— भाव से और शांडिल्य ऋषि ने उभयपरा—स्वयाद्— भाव—से ईश्वर को अभिव्यक्त किया। पर आप तो पिछले सभी उपायो से अभिव्यक्ति दे रहे हैं!
     
      2--आपने कहा, नेति—नेति ज्ञान का और इति—इति भक्ति का उदघोष है। भक्ति के इस उदघोष में तो अंधेरा, कल्मष, पाप, सब आ जाते हैं। क्या परमात्मा सब है?

      3--तथ्य और सत्य में क्या अंतर है?

      4--मैं असंतुष्ट हूं हर बात से असंतुष्ट। और कभी—कभी सोचता हूं कि आनंद मेरे भाग्य में ही नहीं।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--13

स्वभाव यानी परमात्मा—तेरहवां प्रवचन

दिनांक 23 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र :

      अभयपरां शांडिल्य: शब्दोपपत्तिभ्याम्।।31।।
      वैषम्यादऽसिद्धमितिचेन्नाभिज्ञानवदवैशिष्ट्यात।।32।।
      न च क्लिष्ट: परस्मादनन्तरं विशेषात्।।33।।
      ऐश्वर्ये तथेति चेन्‍न स्वाभाव्यात्।।34।।
      अप्रतिषिद्धं परैश्वर्थ्य तद्भावाच्च नैवमितरेषाम्।।35।।


      प्रभु को पाना कठिन। लेकिन उसे पाकर उसे कहना और भी कठिन। पाना इतना कठिन नहीं है, क्योंकि वस्तुत: हम उससे क्षणभर को भी दूर नहीं हुए है। मछली सागर में ही है। सागर का विस्मरण हुआ है, जिस क्षण याद आ जाएगी उसी क्षण सागर मिल गया। सागर छूटा कभी न था। संपत्ति गंवायी नहीं है।

शनिवार, 9 जून 2018

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--12

भक्ति एकमात्र धर्म—बारहवां प्रवचन

दिनांक 22 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

 प्रश्‍न सार :


      1--शुभ क्या है, अशुभ क्या है? फिर शुभाशुभ के पार क्या है?

      2--जीवन दुख है, फिर भी आदमी जागता नहीं। जीवन के नर्क के बावजूद आदमी जीए किस तरह चले जाता ?

      3--जिसे चाहो वह ठुकराता क्यों है?

      4--ज्ञान, ध्यान और योग के मुकाबले में भक्ति अधिक परंपराग्रस्त और रूढ़िवादी क्यों?

      5--आपने अपने प्रेमी और प्रेयसी में भी परमात्मा ही देखने को कहा, यह मेरी समझ में नहीं आया। शरीर के नाते—रिश्ते व वासना के संबंधों में कहा परमात्मा!

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--11

भक्ति आत्यंतिक क्रांति है—ग्‍यारहवां प्रवचन

दिनांक 21 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र :


      ब्रह्मकांडं तु भक्तौ तस्यानुज्ञानाय सामान्यात्।।26।।
      बुद्धिहेतुप्रवृत्तिराविशुद्धेरवधातवत्।।27।।
      तदङगानाज्‍च।।28।।
      तामैंश्वर्थ्यपदा काश्यप: परत्वात्।।29।।
      आत्मैकपरां बादरायण:।।30।।


      मनुष्य का अस्तित्व तीन तलों में विभाजित है—शरीर, बुद्धि, हृदय। या दूसरी तरह से कहें तो कर्म, विचार और भाव। इन तीनों तलों से स्वयं की यात्रा हो सकती है। स्थूलतम यात्रा होगी कर्मवाद की। इसलिए धर्म के जगत में कर्मकांड स्थूलतम प्रक्रिया है।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--10

संन्यास शिष्यत्व की पराकाष्ठा है—दसवां प्रवचन

दिनांक 20 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना


प्रश्‍न सार:

      1--क्या प्रार्थना और भक्ति भिन्न—भिन्न हैं?

      2--संन्यास की वैज्ञानिक विधि क्या है? जो पथ मुझे मौन में मिला है, वह श्रेष्ठ है या   संन्यास?

      3--क्या संन्यास लिए बगैर मेरा शिष्य रहना संभव? सोचता हूं आपकी साधना में एक शाखा ऐसी भी रहे जिसमें बिना संन्यास वगैरह लिए उस सत्ता तक पहुंचा जाए।

      4--यह संसार क्या है, यह माया क्या है?

      5--क्या आप शराब भी पीते हैं?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--09

अनुराग है तुम्‍हारा अस्‍तित्‍व—नौवां प्रवचन

दिनांक 19 जनवरी 1978श्री रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र :


       रागत्वादितिचेन्नोत्तमास्पदत्वात् संगवत्।।21।।
      तदेव कर्म्मिज्ञानियोगिभ्य आधिक्यशब्दात्।।22।।
      प्रश्ननिरूपणाभ्यामाधिक्यसिद्धे:।।23।।
      नैवश्रद्धा तु साधारण्यात्।।24।।
      तस्यां तत्वेचानवस्थानात्।।25।।


रागत्वादितिचेन्नोत्तमास्पदत्वात् संगवत्।
      ' अनुराग का ही नाम भक्ति है। कोई ऐसा भी कहते हैं कि अनुराग दुख का कारण है, इसलिए उसका त्याग करना उचित है। परंतु यह बात ऐसी नहीं है;क्योंकि संग की भांति इसका आश्रय उत्तम है। '

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--08

प्रीति की पराकाष्ठा भक्ति है—आठवां प्रवचन

दिनांक 18 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

 प्रश्‍न सार:

      1--मनुष्य की आस्था धर्म से क्यों उठ गयी है?

      2--शांडिल्य ज्ञान और योग को भक्ति का सहायक बताते हैं। वैसे ही ज्ञान और योग के    प्रस्तोता भक्ति को अपना सहायक मानते हैं या नहीं?

      3--क्या भक्त भी कभी भगवान से झगड़ता है?

      4--संन्यासी के संबंध में नीत्से का कथन—कहा तक सही, कहा तक गलत?

      5--समर्पण यानी क्या?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--1) प्रवचन--07

स्वानुभव ही श्रद्धा है—सातवां प्रवचन

दिनांक 17 जनवरी 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र :

      प्रागुक्त च।।16।।
      एतेन विकल्पोऽपि प्रत्युक्त :।।17।।
      देवभक्तिरितरस्मिन् साहचर्थ्यात्।।18।।
      योगस्तूभयार्थमपेक्षणात्प्रयोजवत्।।19।।
      गौण्यातु समाधिसिद्धि:।।20।।


      भक्ति परम है। उसके पार कुछ और नहीं, भगवान भी नहीं।
      भक्ति है वह बिंदु जंहा भक्त और भगवान का द्वैत समाप्त हो जाता है; जंहा सब दुई मिट जाती है; जहां दो—पन एक—पन में लीन हो जाता है।