चौदहवां प्रवचन
24 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्न सार :
1--क्या धरती पर स्वर्ग उतारा जा सकता है? क्या इस बार हम कुछ नये की आशा संजो सकते हैं?
2--कान्हा! क्या होली नहीं खेलोगे?
3--कुंड़लिनी या सक्रिय ध्यान में ऊर्जा जाग्रत होने पर उसे नाचकर क्यों खत्म कर दिया जाता है?
4--क्या राजनीति अध्यात्म के विपरीत है?
5--एक ध्यान— अनुभव पर प्रकाश डालने हेतु भगवान से निवेदन। आपसे और आश्रम से मेरे दूर रखे जाने में राज क्या है?
6--आपको सुन—सुनकर भक्ति का रोग लग गया है। अब धैर्य नहीं रखा जाता है। आकांक्षा होती है सब अभी हो जाए।

