ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-दसवां-(ध्यान: प्यास का अनुसरण)
थोड़े
से सवाल।
एक मित्र ने पूछा है कि जिस प्रभु का हमें पता नहीं, उसका नाम लेकर संकल्प कैसे
करें?
प्रभु
का तो पता नहीं है। लेकिन सच ही प्रभु का पता नहीं है? क्योंकि जब भी हम प्रभु से
कोई प्रतिमा--कोई राम, कोई
कृष्ण,
कोई
बुद्ध का खयाल ले लेते हैं, तभी
कठिनाई हो जाती है। मेरे लिए प्रभु का अर्थ समग्र अस्तित्व है, टोटल एक्झिस्टेंस है।
ये
हवाएं बहती हैं,
इनका
पता नहीं है?
यह
आकाश है,
इसका
पता नहीं है?
यह
जमीन है,
इसका
पता नहीं है?
आप हैं, इसका पता नहीं है? होने का पता नहीं है? यह जो होने की समग्रता है, यह जो बड़ा सागर है अस्तित्व
का, इस पूरे सागर का नाम परमात्मा
है।


