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रविवार, 2 अप्रैल 2017

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-10



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-दसवां-(ध्यान: प्यास का अनुसरण)

मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल।

एक मित्र ने पूछा है कि जिस प्रभु का हमें पता नहीं, उसका नाम लेकर संकल्प कैसे करें?

प्रभु का तो पता नहीं है। लेकिन सच ही प्रभु का पता नहीं है? क्योंकि जब भी हम प्रभु से कोई प्रतिमा--कोई राम, कोई कृष्ण, कोई बुद्ध का खयाल ले लेते हैं, तभी कठिनाई हो जाती है। मेरे लिए प्रभु का अर्थ समग्र अस्तित्व है, टोटल एक्झिस्टेंस है।
ये हवाएं बहती हैं, इनका पता नहीं है? यह आकाश है, इसका पता नहीं है? यह जमीन है, इसका पता नहीं है? आप हैं, इसका पता नहीं है? होने का पता नहीं है? यह जो होने की समग्रता है, यह जो बड़ा सागर है अस्तित्व का, इस पूरे सागर का नाम परमात्मा है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-09



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-नौवां-(ध्यान: परम स्वास्थ्य का द्वार)

मेरे प्रिय आत्मन्!
दोत्तीन सवाल हैं।

एक मित्र ने पूछा है कि ध्यान से स्वास्थ्य का क्या संबंध है?

बहुत संबंध है। क्योंकि बीमारी का बहुत बड़ा हिस्सा मन से मिलता है। गहरे में तो बीमारी का नब्बे प्रतिशत हिस्सा मन से ही आता है। ध्यान मन को स्वस्थ करता है। इसलिए बीमारी की बहुत बुनियादी वजह गिर जाती है।
यह जो ध्यान की प्रक्रिया है, इससे शरीर पर सीधा भी प्रभाव होता है। क्योंकि दस मिनट की तीव्र श्वास, आपकी जीवन ऊर्जा को, वाइटल एनर्जी को बढ़ाती है। सारा जीवन श्वास का खेल है। जीवन का सारा अस्तित्व श्वास पर निर्भर है। श्वास है तो जीवन है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-आठवां-(ध्यान: भीतर की यात्रा)


मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल ले लें, फिर हम ध्यान के प्रयोग के लिए बैठें।

एक मित्र ने पूछा है कि रात्रि का प्रयोग क्या रात्रि के लिए ही है और सुबह का प्रयोग सुबह के लिए ही?

ऐसा कुछ नहीं है। दोनों प्रयोगों में से जो आपको ज्यादा गहराई में ले जाता हो, उसे आप कभी भी कर सकते हैं। अगर आपको दोनों प्रयोग एक-दूसरे के लिए परिपूरक बनते हों, तो आप दोनों प्रयोगों को सुबह और सांझ, जब जैसी सुविधा हो वैसा कर सकते हैं। अगर दो में से कोई एक प्रयोग आपके लिए अर्थ न रखता हो, तो उसे छोड़ दे सकते हैं। एक प्रयोग से भी वही परिणाम हो जाएगा। दोनों प्रयोगों से भी इकट्ठा होकर परिणाम वही होगा। एक-एक व्यक्ति के ऊपर निर्भर है कि उसे जैसी सुविधा हो वैसा चुनाव कर ले।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-07



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-सातवां-(ध्यान: समाधि की भूमिका)

मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल।


रखना ही होगा। यहां हम सिर्फ सीख रहे हैं। यहां सिर्फ आपको समझ में आ जाए पद्धति, इतना ही। फिर उस प्रयोग को घर जारी रखें तो उसमें गहराई बढ़ती जाएगी।

एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि यदि घर पर इसे हम जारी रखेंगे, तो आस-पास के लोग पागल समझने लगेंगे। चिल्लाएं या नाचें या हंसें।
                                               
आस-पास के लोग अभी भी पागल ही समझते हैं एक-दूसरे को। कहते न होंगे, यह दूसरी बात है। यह पूरी जमीन करीब-करीब मैड हाउस है, पागलखाना है। अपने को छोड़ कर बाकी सभी लोगों को लोग पागल समझते ही हैं। लेकिन अगर आपने हिम्मत दिखाई और इस प्रयोग को किया, तो आपके पागल होने की संभावना रोज-रोज कम होती चली जाएगी। जो पागलपन को भीतर इकट्ठा करता है, वह कभी पागल हो सकता है। जो पागलपन को उलीच देता है, वह कभी पागल नहीं हो सकता।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो

प्रवचन-छठवां-(ध्यान: सीधी छलांग)

मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल हैं। उन सवालों को छोड़ दूंगा, जो मात्र सैद्धांतिक हैं, थ्योरेटिकल हैं। यह बैठक सुबह और सांझ की मात्र साधकों के लिए है, सिद्धांतवादियों के लिए नहीं। सिद्धांतवादियों के लिए उनतीस तारीख से जो बैठक होगी, उसमें उन्हें जो पूछना हो पूछें। यहां तो उनसे ही बात कर रहा हूं जो करना चाहते हैं। और अक्सर ऐसा होता है, जो सोचना चाहते हैं वे करने का निर्णय कभी भी नहीं ले पाते। वे सोचते ही सोचते समाप्त हो जाते हैं। बहुत बार, सौ में निन्यानबे मौके पर, सोचना सिर्फ करने से बचने की तरकीब होती है। क्योंकि सोचने में कल तक के लिए टाला जा सकता है। जब तक निर्णय न हो, जब तक सिद्ध न हो, जब तक सिद्धांत स्पष्ट न हो, तब तक हम कुछ करेंगे नहीं।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05



ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-पांचवां-(संन्यास: एक संकल्प)


मेरे प्रिय आत्मन्!
दोत्तीन सवाल हैं, उस संबंध में थोड़ी बात समझ लें।

एक मित्र ने पूछा है कि ध्यान के प्रयोग से शरीर थक जाता है, तो प्रयोग जारी रखें या न रखें?
ऐसा ही किसी दूसरे मित्र ने भी पूछा है कि ध्यान में हाथ की गति बहुत होती है और हाथ दुख जाता है, तो प्रयोग जारी रखना या नहीं?

आप में से भी बहुतों को शरीर के किसी अंग के थक जाने का खयाल आएगा। स्वाभाविक है। जब शरीर का कोई भी अंग इतनी गति करेगा, इतना व्यायाम हो जाएगा, तो थकेगा। लेकिन दो-चार-छह दिन। जैसा कोई भी नया व्यायाम करते वक्त थकान मालूम होगी, वैसी ही। दो-चार दिन में ठीक हो जाएगा। और जब ठीक होगा, तो आपको पहली दफे पता चलेगा कि जो अंग आपका इस बीच मूवमेंट किया, गति किया, वह रुग्ण था। लेकिन जब तक स्वस्थ न हो जाए वह अंग तब तक पता भी नहीं चल सकता है। जैसे किसी आदमी के सिर में दर्द हो बचपन से ही, चौबीस घंटे दर्द हो, तो वह जानेगा कि यह दर्द ही उसका सिर है। एक बार दर्द छूटे तो ही उसे पता चलेगा कि दर्द सिर नहीं था।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04



ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-चौथा-(ध्यान: आध्यात्मिक विज्ञान)


मेरे प्रिय आत्मन्!
ध्यान के संबंध में थोड़े से सवाल हैं, उन्हें समझ लें, और फिर हम प्रयोग के लिए बैठेंगे।

एक मित्र ने पूछा है कि रात्रि के ध्यान में चश्मे वाले क्या करें? स्पष्ट करें कि आपको देखना है या आपकी ओर देखना है?

दोनों ही काम करने हैं। क्योंकि बिना मेरी ओर देखे तो मुझे नहीं देख सकते। मेरी ओर तो देखना ही है। लेकिन सिर्फ 'ओर' ही नहीं देखना है। क्योंकि 'ओर' बहुत बड़ी बात है, उसमें और भी बहुत कुछ आता है। मेरी ओर देखना है, लेकिन मुझे ही देखना है। चश्मा लगाए ही रखें। रात के प्रयोग में आपको चश्मा निकालने की कोई जरूरत नहीं है। कम से कम जो बैठे हैं उन्हें तो बिलकुल जरूरत नहीं है। जो खड़े हैं वे चश्मा निकाल लेंगे। तो जिनको देखने की तकलीफ हो, दूर से न देख सकते हों, तो वे मेरे पास मंच के पास ही खड़े होंगे। बैठे हुए लोगों को चश्मा निकालने की कोई जरूरत नहीं है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03



ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-तीसरा-(ध्यान: गुह्य आयामों में प्रवेश)


मेरे प्रिय आत्मन्!
कल प्रयोग हमने समझा है। आज उसकी गहराई बढ़नी चाहिए। संकल्प की कमी पड़ जाए, तो ही ध्यान में बाधा पड़ती है। और संकल्प की कमी कभी-कभी बहुत छोटी-छोटी बातों से पड़ जाती है।
जिंदगी में बहुत बड़े-बड़े अवरोध नहीं हैं, बहुत छोटे-छोटे अवरोध हैं। कभी आंख में एक छोटा सा तिनका पड़ जाता है, तो हिमालय भी दिखाई पड़ना बंद हो जाता है। जरा सा तिनका आंख में हो तो हिमालय भी दिखाई नहीं पड़ता। कोई अगर विचार करे और तर्क करे और गणित लगाए, तो जरूर सोचेगा कि जिस तिनके ने हिमालय को ओट में ले लिया, वह तिनका हिमालय से बड़ा होना चाहिए।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02



ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-दूसरा-(ध्यान: स्वयं में डुबकी)


मेरे प्रिय आत्मन्!
ध्यान के संबंध में दोत्तीन प्रश्न पूछे गए हैं, उनकी मैं आपसे बात कर लूं, फिर रात के प्रयोग को समझाऊंगा और हम करेंगे।

एक मित्र ने पूछा है कि श्वास गहरी लेनी है या तीव्र? डीप या फास्ट?

तीव्रता का खयाल रखें, गहरी अपने से हो जाए तो बात अलग। आप गहरे का, डीप का खयाल न करें। आप सिर्फ तीव्रता का, फास्टनेस का खयाल रखें--जितने जोर से! जितनी तेजी से! तेजी इसलिए ताकि चोट हो सके। वह जो भीतर सोई हुई शक्ति है, उसे उठाया और जगाया जा सके। हैमरिंग के लिए, हथौड़े की तरह चोट हो सके कुंडलिनी पर, इसलिए तेज का खयाल रखें।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01



 ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-पहला-(ध्यान: नया जन्म)


मेरे प्रिय आत्मन्!
जीवन में दो आयाम हैं, दो प्रकार के तथ्य हैं। एक तो ऐसे तथ्य हैं, जिन्हें जान लिया जाए तो ही किया जा सकता है। जानना जिनमें प्रथम है और करना द्वितीय है। जानना पहले है और करना पीछे है। दूसरे ऐसे तथ्य भी हैं जिन्हें पहले कर लिया जाए तो ही जाना जा सकता है। उनमें करना पहले है और जानना पीछे है।
विज्ञान पहले तरह का आयाम है, धर्म दूसरे तरह का।
विज्ञान में पहले जानना जरूरी है, तो ही पीछे किया जा सकता है। धर्म में पहले करना जरूरी है, तो ही पीछे जाना जा सकता है। विज्ञान में ज्ञान प्रथम और कर्म पीछे है, धर्म में कर्म प्रथम और ज्ञान पीछे है। विज्ञान बहिर्यात्रा है, बाहर के जगत के संबंध में है। धर्म अंतर्यात्रा है, भीतर के जगत के संबंध में है।