ध्यान योग शिविर,
2 अप्रैल1972, रात्रि।
माऊंट आबू, राजस्थान।
सूत्र :
न भूमिरापो न च वह्निरस्ति न चानिलो मेsस्ति न चाम्बरं च।
एवं विदित्वा परमात्मरूपं गुहाशयं निष्कलमद्वितीयम्।। 23।।
समस्त साक्षिं सद् असद्विहीनं प्रयाति शुद्धं परमात्यरूपं।। 24।।
अथ कैवल्योपनिषइसमाप्त।
ऊँ शांति: शांति: शांति।
मेरे लिए भूमि, जल, अग्रि, वायु आकाश कुछ नहीं है। वही मनुष्य मेरे शुद्ध परमात्मस्वरूप का साक्षात्कार करता है, जो मायिक प्रपंचों से परे, सब के साक्षी,
सत—असत अर्थात अस्तित्व—अनस्तित्व से परे, निराकार, हृदय की गुहा में स्थित मुझ परमात्मा को जान जाता है।। 23 — 24।।
इस प्रकार कैवल्य उपनिषद समाप्त होता है।
ऊँ शांति: शांति: शांति:।
