कुल पेज दृश्य

उपनिषद--कैवल्‍य--ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
उपनिषद--कैवल्‍य--ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 18 जून 2018

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-17

ह्रदय—गुहा में प्रवेश—कैसे?—सत्रहवां प्रवचन 

ध्‍यान योग शिविर,
2 अप्रैल1972, रात्रि।
माऊंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

 न भूमिरापो न च वह्निरस्ति न चानिलो मेsस्ति न चाम्बरं च।
 एवं विदित्वा परमात्मरूपं गुहाशयं निष्कलमद्वितीयम्।। 23।।
 समस्त साक्षिं सद् असद्विहीनं प्रयाति शुद्धं परमात्यरूपं।। 24।।
                  अथ कैवल्योपनिषइसमाप्त।
                    ऊँ शांति: शांति: शांति।


मेरे लिए भूमि, जल, अग्रि, वायु आकाश कुछ नहीं है। वही मनुष्य मेरे शुद्ध परमात्मस्वरूप का साक्षात्कार करता है, जो मायिक प्रपंचों से परे, सब के साक्षी,
सत—असत अर्थात अस्तित्व—अनस्तित्व से परे, निराकार, हृदय की गुहा में स्थित मुझ परमात्मा को जान जाता है।। 23 — 24।।
            इस प्रकार कैवल्य उपनिषद समाप्त होता है।
                  ऊँ शांति: शांति: शांति:।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-16

समग्र का माध्‍यमरहित ज्ञान है परमात्‍मा–सोलहवां प्रवचन

ध्‍यानयोग शिविर,
2 अप्रैल 1972, प्रात:
माऊंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

    वेदैरनेकैरहमेव वेद्यो वेदात्तकृद्वेदविदेय चाहम्।
    न पुण्य पापे मन नास्ति नाशो न जन्‍मदेहेन्‍द्रिय बुद्धिरस्ति।। 22।।


मैं ही वेदों का उपदेश करता हूं; मैंने ही उपनिषदों अर्थात् वेदांत की रचना की है; और सारे वेद मेरी ही चर्चा करते हैं। मैं जन्म और नाश से परे हूं। पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते। मैं शरीर, इंद्रिय और बुद्धि से रहित हूं।। 22।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-15

परमात्‍मा को पाना नहीं, जीना है—पंद्रहवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
1अप्रैल 1972, रात्रि;
माऊंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :


 अपाणिपादो है अचित्त्वशक्ति पश्याम्यचक्षु: स शृणोम्यकर्ण:।
 अहं विजानामि विविक्तरूपो न चास्ति वेत्ता मम चित्सदाउहम्।। 21।।

जिसके न हाथ—पैर हैं और न जिसके संबंध में चिंतन किया जा सकता है, वह शक्ति अर्थात् परब्रह्म मैं ही हूं। मैं बुद्धि के बिना ही सब कुछ जानने, कानों के बिना ही सब कुछ सुनने और आंखों के बिना ही सब कुछ देखने की सामर्थ्य रखता हूं। सब रूपों से परे मैं जानने वाला हूं लेकिन मुझ चित् स्वरूप को जानने वाला कोई नहीं है।। 21।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-14

तर्क से पार है द्वार प्रभु में—चौदहवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
1 अप्रैल 1972, प्रात:
माऊंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

     अणोरणीयानहमेव तद्वन्महानहं विश्वमहं विचित्रम् ।
     पुरातनोऽहं पुरुषोऽहमीशो हिरण्मयोऽहं शिवरूपमस्मि।। 20।।


मैं छोटे—से—छोटा और बड़े—से—बड़ा हूं। इस विचित्र संसार को मेरा ही रूप मानना चाहिए। मैं ही पुरातन पुरुष हूं जो सबका आधार है। मैं ही शिव का रूप हूं और मैं ही हिरण्यमय हूं।। 2०।।

जीवन खंडों में विभाजित नहीं, अखंड है। खंडों में विभाजित दिखायी पड़ता है तो भी अखंड है। बहुत तरह के खंड दिखायी पड़ते हैं, लेकिन सभी खंड मूल आधार में संयुक्त हैं और इकट्ठे हैं।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-13

स्‍वयं पर लौटती चेतना का प्रकाश ही ध्‍यान—तेरहवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
31 मार्च 1972, रात्रि
माउॅंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

            त्रिषु धामसु यहभोग्यं भोक्ता भोगश्च यइभवेत।
            तेभ्यो विलक्षण: साक्षी चिन्‍मात्रो हं सदाशिव:।।18।।
            मय्येव सकलं जातं मयि सर्वं प्रइतष्ठितम्।
            मयि सर्वं लय याति तद्ब्रह्मद्वयमत्यम्यहम्।।19।।



जाग्रत, स्‍वप्‍न और सुषुप्‍ति—इन तीनों अवस्थाओं में जौ भोग, भोग्य और भोक्ता के रूप में है उससे भिन्न वह सदाशिव, चिन्मय और अद्भुत साक्षी मैं ही हूं।। 18।।

मैं ही वह अद्वैत हूं। मुझमें ही सब कुछ उत्‍पन्‍न होता, मुझमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित रहता और मुझमें ही सब का लय होता है।। 19।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-12

वही तुम हो, तुम वही हो—बारहवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
31मार्च 1972, प्रात:
माऊंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

      यत्परं ब्रह्म सर्वात्या विछस्थायतनं महत्
      सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं नित्यं तत्वमेव त्वमेव तत्।।16।।
      जाग्रत्‍स्‍वप्‍नसुषुप्तादि प्रपंचं यत्‍प्रकाशते।
      तह ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वबन्धै: प्रमुच्चते।।17 ।।


जिस परब्रह्म का कभी नाश नहीं होता, जो सूक्ष्मतम से भी सूक्ष्म है, जो संसार के समस्त कार्य और कारण का आधारभूत है, जो सब भूतों का आत्मा है, वही तुम हो, तुम वही हो।। 16।।

जाग्रत, स्वप्र और स्तुप्ति आदि अवस्थाओं में जो मायिक प्रपंच दिखायी देते हैं वे सब ब्रह्म द्वारा ही प्रकाशित होते हैं और वह ब्रह्म मैं ही हूं—ऐसा जो जान लेता है, वह सब प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।। 17।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-11

तीन शरीर चार अवस्‍काओं की बात—ग्‍यारहवां प्रवचन

 ध्‍यान योग शिविर,
30 मार्च 1972, रात्रि।
माऊंट टाबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

      पुनश्‍च जन्मान्‍तरकर्मयोगात् स एव जीव स्वपिति प्रबुद्ध:।
      पुरत्रये क्रीडति यश्‍च जीवस्तमखु जातं सकलं विचित्रम्।
      आधारमानंदमखष्ठ बोध यस्मिन् लय जाति पुरत्रयंच ।।14।।
      एतमाज्‍जायते प्राणो मन: सवत्रियाणि च।
      खं वायुज्योर्तिराप पृथ्वी विश्वस्य धारिणी।।15।।


पिछले जन्मों के कार्यों से प्रेरित होकर वही मनुष्य कप्तावस्था से पुन: स्वप्रावस्था व जाग्रतावस्था में आ जाता है। इस तरह से ज्ञात हुआ कि जीव जो तीन प्रकार के पुरों (शरीरों ) — स्थूल, सूक्ष्म और कारण में रमण करता है, उसी से इस सारे मायिक प्रपंच की सृष्टि होती है। जब तीन प्रकार के शरीरों  (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) का लय हो जाता है, तभी यह जीव मायिक प्रपंच से मुक्त हो कर अखंडानंद का अनुभव करता है।। 14।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-10

तृप्‍ति का सम्‍मोहन जीवनक्रांति में बाधा—दसवां प्रवचन


ध्‍यान योग शिविर,
30 मार्च 1972, प्रात:
माउँट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

      स एव मायापरिमोहितात्मा शरीरमास्थाय करोति सर्वं!
      स्रियत्रपानादिविचित्रभोगै: स एव जाप्रतपरितृप्तिमेति।।12।।
      स्वप्रे स जीव: सुखदु:खभोक्ता स्वमायया कल्पितजीवलोके।
      सुषुप्‍ति काले सकलेविलीने तमोऽभिभूत: सुखरूपमोइत।।13।।



मनुष्य माया के वशीभूत होकर शरीर को ही सब कुछ समझ लेता है और सब तरह के कर्मों को करता है। वही मनुष्य विषय—वासना और मद्यपान आदि विचित्र भोगों को भोगकर जाग्रत अवस्था में तृप्त होता है।। 12।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-09

धर्म अंत: करण की तलाश है—नौवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
29 मार्च 1972, रात्रि।
माऊंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

      आत्मानं अरणि कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणीम्।
      ज्ञान निर्मथनास्थासात् पाशं दहति पष्ठित:।।11।।


ज्ञानी लोग अंतःकरण को नीचे की अरीय बनाते हैं और प्रणव को ऊपर की और इन दोनों से ज्ञान के मंथन का अभ्यास करते हैं। इससे जो शानाग्रि उत्पन्न होती है, उसमें अपने समस्त दोषों को जलाकर संसार—बंधन से छूट जाते हैं।। 11।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-08

सभी नाम इशारे अनाम की और—आठवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
29 मार्च 1972, प्रात:
माऊंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

      सब्रह्मा सशिव सेत्र सोsक्षर परम: विराट्।
      स एव विष्‍णु: स प्राण: स कालोsग्रि स चन्द्रमा:।।8।।
      स एव यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम् ।
      ज्ञात्वा तं मृत्‍युमत्‍योति नान्य: पन्या विमुक्‍तये।। 9।।
      सर्व भूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
      सम्पश्यन् ब्रह्म परमं यानि नान्येन हेतुना।।10।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-07

मिलन तक मिलन अनिश्‍चय में—सातवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
28 मार्च 1972 रात्रि,
माऊंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :
     
      उमासहायं परमेश्वर प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्‍तम्।
      ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनि समस्त साक्षिं तमस: परस्तात्।।7।।


      जिसे उमासहाय, परमेश्वर, नीलकंठ और त्रिलोचन के नामों से पुकारा जाता है, जो समस्त चराचर का स्वामी है और शांतिस्वरूप है, जो समस्त भूतों का मूल कारण और साक्षी है, जो अविद्या (तमस) से दूर है—उसको मुनिजन ध्यान से प्राप्त करते हैं।। 7।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-06

व्‍यक्‍त माध्‍यम है अव्‍यक्‍त के प्रकाशन का—छठवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
28 मार्च 1972, प्रात:
माऊंट टाबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

 अचिन्‍त्‍यं अव्यक्तं अनंतरूपं शिवं प्रशान्तं अमृतं ब्रह्मयोनिम्।
 तदsदिमध्यान्‍त विहीनमेकं विभुं चिदानन्दं अरूपं अद्भुतम् ।। 6।।


इस प्रकार मुनि लोग ध्यान के द्वारा उस चिंतन की सीमा में न आनेवाले, व्यक्त न होनेवाले, जिसके अनंत रूप हैं, जो कल्याण करने वाला है, अद्वैत है, जो ब्रह्म का मूल कारण है, जिसका कोई आदि, मध्य और अंत ही नहीं है, जो अद्वितीय, सर्वव्यापक और चैतन्य तथा आनंदमय है, जिसका कोई रूप नहीं है और जो विलक्षण है—उसको प्राप्त करते हैं।। 6।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-05

शरीर से अतादात्‍म्‍य ही शरीर का शुद्धिकरण—पाँचवाँ

ध्‍यान योग शिविर
27 मार्च 1972, रात्रि
माऊंट टाबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

विविक्त देशे च सुखासनस्थ: शुचि: समत्रीवशिर: शरीर:।
अत्याश्रमस्थ: सकलेत्रियाणि निरुथ्य भक्ला मगुरुं प्रणम्य।
हृतपुष्ठरीकं विरजं विशुद्ध विचिच मध्ये विशदं विशोकम्।। 5।।


ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा वाले संन्यास आश्रम में स्थित, स्नानादि से अपने शरीर को शुद्ध करके, स्वात स्थान में अपना आसन लगाकर, सिर, गले व शरीर को एक सीध में रखकर, समस्त इंद्रियों को एकाग्र करके, श्रद्धा व भक्ति से अपने गुरु को प्रणाम करके, अपने हृदय—कमल से दोषों को निकाल कर दुख व शोक से परे उस विशुद्ध भक्ति—तत्व का सम्यक चिंतन करते हैं।। 5।।